Sunday, May 25, 2008

कविता का भूगोल

(कविताओं में स्थानिकता भाषा और भूगोल दोनों ही स्तरों पर दिखायी दे तो छा रही एकरसता तो टूटती ही है। महेश चंद्र पुनेठा ऐसे ही कवि है जिनके यहां पहाड़ अपने पूरे भूगोल के साथ मौजूद है। इधर के युवा कवियों में महेश की यह विशिष्टता ही उसकी पहचान बना रही है। इस युवा कवि की कविताओं को वागर्थ, कृति ओर, कथादेश आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पढ़ने का अवसर समय समय पर मिलता रहा है। कविताओं के अलावा महेश पुस्तक-समीक्षा लेखन में भी सक्रिय हैं। गंगोलीहाट, पिथोरागढ़ में रहने वाले महेश चंद्र पुनेठा विद्यालय में शिक्षक हैं। महेश की ताजा कविताओं को प्रकाशित करते हुए हमें खुशी हो रही है।)


महेश चंद्र पुनेठा


सिंटोला


बहुत सुरीला गाती है कोयल
बहुत सुन्दर दिखती है मोनाल
पर मुझे
बहुत पसंद है - सिंटोला

हां, इसी नाम से जानते हैं
मेरे जनपद के लोग
भूरे बदन, काले सिर
पीले चोंच वाली उस चिड़िया को
दिख जाती है जो
कभी घर-आंगन में दाना चुगते
कभी सीम में कीड़े मकोड़े खाते
कभी गाय-भैंसों से किन्ने टीपते
तो कभी मरे जानवर का मांस खींचते

या जब हर शाम भर जाता है
खिन्ने का पेड़ उनसे

मेरे गांव की पश्चिम दिशा का
गधेरा बोलने लगता है उनकी आवाज में

बहुत भाता है मुझे
चहचहाना उनका एक साथ
दबे पांव बिल्ली को आते देख
सचेत करना आसन्न खतरे से
अपने सभी साथियों को कर लेना इकट्ठा
झपटने का प्रयास करना बिल्ली पर

न सही अधिक,
खिसियाने को विवश तो कर ही देते है वे
बिल्ली को।



गमक


फोड़-फाड़कर बड़े-बड़े ढेले
टीप-टापकर जुलके
बैठी है वह पांव पसार
अपने उभरे पेट की तरह
चिकने लग रहे खेत पर

फेर रही है हाथ
ढांप रही है
सतह पर रह गये बीजों को

जैसे जांच रही हो
धड़कन

गमक रहा है खेत और औरत।


सूचना: हमारे साथी राजेश सकलानी इधर एक श्रृखंला शुरु कर रहे हैं। जो किन्हीं भी दो कवियों की एक ही विषय वस्तु को लेकर लिखी गयी कविताओं पर केन्द्रित है। कविताओं पर उनकी टिप्पणी भी होगी। बकोल राजेश सकलानी, "ये कविताएं तुलना के लिए एक साथ नहीं रखी जायेगीं। दो भिन्न कविताओं में एक से विषय या बिम्ब या वस्तु कौतुहल तो जगाते हैं। रचनाकारों के मस्तिष्क में कैसे भिन्न किस्म की डालें विकसित होती हैं ? कुछ भिन्न किस्म के पत्ते, कुछ भिन्न किस्म की फुनगियां विकसित होती हैं। कवि की अपनी निजता साफ तरह से निकल कर आती हैं। रचना का जादू चमक उठता है। इस तरह की भिन्न कविताओं को आमने-सामने देखकर।"

3 comments:

Udan Tashtari said...

महेश चंद्र पुनेठा जी को पढ़ना एक अनुभव रहा. राकेश जी का एक ही विषय पर दो कवियों के विचार वाली श्रृंख्ला का स्वागत एवं प्रतिक्षा है. बहुत रोचक होगी यह श्रृंख्ला, ऐसा लगता है.आपका आभार.

DR.ANURAG ARYA said...

दोनों भिन्न कविताएं है पर गमक ज्यादा अच्छी लगी....

महेन said...

शिटौव, यही कहते हैं सिटोली को ठेठ कुमाउँनी में। अरसा हुआ देखे हुए। कविता पड़ी तो याद हो आई। बहुत ही अच्छी कविता है और अत्यंत सहज भी।
शुभम।