Wednesday, June 18, 2008

जवानी के इन दिनों में

(वो बरगद का पेड मुझे अब भी छाया देता है, डा० अनुराग के ब्लाग पर लगा शीर्षक मजबूर कर रहा है कि कुछ डाल ही दिया जाये, वरना मन था कि आज कुछ भी नहीं डालूंगा.)

बचपन के उन दिनों में
नहीं रहा उतना बच्चा
जितना खरगोश
जितनी गिलहरी
जितना धान का पौधा

जवानी के इन दिनों में
नहीं हूं इतना जवान
जितना गाय का बछड़ा
अमरुद का पेड

फ़िर बुढ़ापे के उन दिनों में
कैसे होऊंगा ऐसा बूढ़ा
जितना बरगद का पेड़ ।

इससे पूर्व यह कविता बया के दिसम्बर २००७ वाले अंक में प्रकाशित हुई है. हालांकि १९९६ में लिखी गयी थी.

5 comments:

jasvir saurana said...

vaha maja aa gya sir.......

Udan Tashtari said...

अरे वाह!! आनन्द आ गया भाई जी. बहुत ही उम्दा.

शिरीष कुमार मौर्य said...

अच्छी कविता विजय भाई !

अशोक पाण्डेय said...

बहुत अच्‍छी कविता है।

yadvendra said...

budhape ki or kadam badhate hue mujh jaise logo ke liye ye kavita bharosa dilanewali hai...ki shareer ko budha hone dena hai man ko nahi...chhoti lekin bedhak kavita ke liye dhanyavad
yadvendra,roorkee