Wednesday, July 16, 2008

ये दुर्ग नहीं लद्दाख के पहाड हैं








यात्रा से लौट आया हूं। जांसकर को फिर से देखा। दारचा से पदुम तक की पैदल यात्रा के बाद मन था कि कारगिल से कश्मीर होते हुए वापिस देहरादून लौट जायें। लेकिन कम्बख्त जमाने की सूचनायें बता रही थी कि कश्मीर के रास्ते जम्मू होकर निकलना आसान न होगा। यातायात बंद है। जूलूस और चक्काजाम है। लिहाजा कारगिल से लेह और लेह से मनाली होते हुए ही वापिस लौटे। अमरनाथ साइनबोर्ड को जमीन देने पर कश्मीर से लेह लद्दाख तक के लोग, जो हमें मिले, एक ही राय रखते थे। धारा 370 के उलंघन पर वे एक मत थे।




बाकि बातें विस्तार से लिखूंगा, थोड़ा समय चाहिए। अभी तो कुछ तस्वीरें, जो इस दौरान हमारी यात्रा की गवाह हैं, प्रस्तुत हैं। लेह से नुब्रा घाटी तक की यात्रा भी की, जहां लद्दाख का रेतीलापन पसरा पड़ा रहता है, तस्वीरों में दिख ही जायेगा। ये कुछ तस्वीरें हैं :







5 comments:

Udan Tashtari said...

तस्वीरें देख कर अच्छा लगा. यात्रा वृतांत कब ला रहे हैं?

महेन said...

खुशआमदीद! तस्वीरें देखकर तो लगता है कि अगली बार आपके साथ लद्दाख जाना ही पड़ेगा। कुछ और तस्वीरें डालिये कि हमारा निश्चय दृड़ हो सके।

AJEY said...

nice promo !
eagerly waiting for the release of the film.
a suggestion. the travellogue should be more factual. eg, boundary of HP ends at shinkun-la.The villages like Rarik, Chhika and Pal-lamo appear in the revenue records of Lahaul Area. ...... so dont hurry . just confirm the Facts, let your work be a Rahulji Type, or Kantikumar type ...and not Krishnanath ji type , please...Just a tip, brother, dont take it other wise...ajey

कथाकार said...

दोस्‍त मेरे
आपकी यात्रा की बोली बानी से याद आ रहा है कि कभी मैं भी ट्रैकर हुआ करता था और हिमालय की इसी तरह की यात्राएं किया करता था.
अब भी मन करता है.
सूरज

chandramani vatas said...

Asha hai aur vishwas bhi, aap isi tarah chalte aur likhte rahen.

Subhkamnayen.