Saturday, August 9, 2008

बारिस में भीगती लड़की को देखने के बाद


विजय गौड


एक


झमाझम पड़ती
वर्षा की मोटी धारों के बीच
लड़की चुपचाप
सिर पर छाता ताने चलती है

छाते से चेहरे को
इतना ढक लेती है लड़की
कि आस-पास से गुजरने वाला
चेहरा भी न देख पाये
यह कविता १९९५ के आस पास लिखी थी.

छाते से ढकी लड़की
होती है आत्म केन्द्रित;
सड़क में बहते गंदे पानी को देख
लड़की सोचती है,
कितना फर्क है नदी और नाले में
जबकि, पानी की नियति
सिर्फ बहना ही है

चप-चप करती
चप्पल की आवाज के साथ ही
लड़की गर्दन को पीछे घुमा
देखती है कपड़ों को ;
यह ख्याल आते ही
कि कपड़े तो पूरी तरह से
गंदे हो चुके हैं
लड़की कुढ़ने लगती है

बारिस है कि लगातार
बढ़ती जा रही है
लड़की चाहे जितना कोशिश कर ले
बचने की
पर सामने से आता ट्रक
नहीं छोड़ता
लड़की को भिगोये बगैर

ऊपर से नीचे तक
पूरी तरह से भीग चुकी है लड़की
यही कारण है कि
लड़की ने छाता बंद कर लिया है

बारिस के बीच ठक-ठक करती
चल रही है लड़की

दो

चाय की चुस्कियों के बीच
लड़की का ख्याल आते ही
बाहर वर्षा की मोटी-मोटी धारें
दिखायी देने लगती है
मोटी-मोटी धारों के बीच
लड़की दौड़ रही है
घंटाघर के चारों ओर

तीन

भीगी हुई लड़की को देखने के बाद
ऐसे कितने लोग हैं
जो यह सोच पाते हैं
कि लड़की का भीगना
खतरनाक हो सकता है
उसके लिए भी
और देश के लिए भी ।

7 comments:

अनुराग said...

bahut khoobsurat kavitaaye hai,bhigo gayi hai bheetar hi bheetar..

सरपंच said...

1994 आस
और
1996 पास
यह हुआ
1995 के
आस पास।

कब कविता
तो लग रहा है
कर रही है
जो कल हुई
थी तेज बारिश
उसी की बात।

हर बारिश में
ऐसे दृश्‍य आम
हैं, पर आम का
सेब तो एक कवि
की दृष्टि ही बना
सकती है।

यह सेब बहुत
पसंद आया
कविता के लिए
पुष्टिवर्द्धक है यह।

- अविनाश वाचस्‍पति

Anil Pusadkar said...

achhi rachana,

Udan Tashtari said...

अच्छा लगा पढ़ना.

सुशील कुमार छौक्कर said...

गहरी बाते कहती आपकी कविता।

छाते से ढकी लड़की
होती है आत्म केन्द्रित;
सड़क में बहते गंदे पानी को देख
लड़की सोचती है,
कितना फर्क है नदी और नाले में
जबकि, पानी की नियति
सिर्फ बहना ही है

अति सुन्दर।

नीरज गोस्वामी said...

एक लड़की भीगी भागी सी....बहुत खूब. तीनो कवितायें अपने आप में कमाल की हैं.
नीरज

महेन said...

समझने में देर कर दी मगर तो भी लड़की को समझ आया यही बहुत है… ज़्यादातर लोग अनुभव से ही सीखते हैं।

ये contrast क्यों दो कविताओं में? पहली में आप उसे भीगना सिखा रहे हैं और तीसरी में खतरे का अंदेशा? खैर… खतरनाक तो हो सकता है मगर बहुत ज़्यादा नहीं… बदलना होगा उनको जिनसे खतरा है लड़की और देश को।