Saturday, May 31, 2008

एक विषय दो पाठ


(ये कविताएं तुलना के लिए एक साथ नहीं रखी गयी हैं। दो भिन्न कविताओं में एक से विषय या बिम्ब या वस्तु कौतुहल तो जगाते हैं। रचनाकारों के मस्तिष्क में कैसे भिन्न किस्म की डालें विकसित होती हैं ? कुछ भिन्न किस्म के पत्ते, कुछ भिन्न किस्म की फुनगियां विकसित होती हैं। कवि की अपनी निजता साफ तरह से निकल कर आती हैं। रचना का जादू चमक उठता है। इस तरह की भिन्न कविताओं को आमने-सामने देखकर।)

तोप शब्द से हमारी स्मृति में कुछ आजादी से पहले की यादें भी जुड़ी हैं। वह विनाश का उपकरण तो है ही लेकिन सत्ता के अहंकार और निरंकुशता का प्रतीक भी है। "क्या तू अपने को तोप समझता है ?" इस तरह के वाक्य हमारी बातचीत में भी आते हैं। वीरेन डंगवाल तोप का मखौल उड़ाते हुए बताते हैं कि तोप कितनी भी बड़ी हो कभी न कभी उसका मुंह बन्द होना ही होता है। जनता उसको अपने संघ्ार्ष से अर्थहीन कर देती है।असद जैदी पुश्तैनी तोप के बारे में कहते हैं कि हमारा दारिद्रय कितना विभूतिमय है। यह संभवत: जड़ परम्पराओं को सहेज कर रखने की प्रवृति के विरोध हैं। इनके पीछे गतिशीलता नहीं है। इसीलिए विरोधियों को भी इस पर हंसी आ जाती है। यह तोप है जो कभी भी समाज के काम नहीं आ सकती।

तोप
वीरेन डंगवाल


कम्पनी बाग के मुहाने पर
धर रखी गयी है यह सन 1857 की तोप
इसकी होती है बड़ी सम्हाल, विरासत में मिले
कम्पानी बाग की तरह
साल में चमकायी जाती है दो बार.

सुबह-शाम कम्पानी बाग में आते हैं बहुत सैलानी
उन्हें बताती है यह तोप
कि मैं बड़ी जबर
उड़ा दिये थे मैंने अच्छे-अच्छे सूरमाओं के छज्जे
अपने जमाने में

अब तो बहरहाल
छोटे लड़कों की घुड़सवारी से अगर फारिग हो
तो उसके ऊपर बैठकर
चिड़ियां ही अक्सर करती हैं गपशप
कभी-कभी शैतानी में वे इसके भीतर भी घुस जाती हैं
खास कर गौरैयें

वे बताती हैं कि दरअसल कितनी भी बड़ी हो तोप
एक दिन तो होना ही है उसका मुंह बन्द


पुश्तैनी तोप
असद जैदी

आज कभी हमारे यहां आकर देखिये हमारा
दारिद्रय कितना विभूतिमय है

एक मध्ययुगीन तोप है रखी हुई
जिसे काम में लाना बड़ा मुश्किल है
हमारी इस मिल्कियत का
पीतल हो गया है हरा, लोहा पड़ चुका है काला

घंटा भर लगता है गोला ठूंसने में
आधा पलीता लगाने में
इतना ही पोजीशन पर लाने में

फिर विपक्षियों पर दागने के लिए
इससे खराब और विश्वसनीय जनाब
हथियार भी कोई नहीं
इसे देखते ही आने लगती है
हमारे दुश्मनों को हंसी

इसे सलामी में दागना भी
मुनासिब नहीं है
आखिर मेहमान को दरवाजे पर
कितनी देर तक खड़ा रखा जा सकता है।

Tuesday, May 27, 2008

एक विषय दो पाठ

(ये कविताएं तुलना के लिए एक साथ नहीं रखी गयी हैं। दो भिन्न कविताओं में एक से विषय या बिम्ब या वस्तु कौतुहल तो जगाते हैं। रचनाकारों के मस्तिष्क में कैसे भिन्न किस्म की डालें विकसित होती हैं ? कुछ भिन्न किस्म के पत्ते, कुछ भिन्न किस्म की फुनगियां विकसित होती हैं। कवि की अपनी निजता साफ तरह से निकल कर आती हैं। रचना का जादू चमक उठता है। इस तरह की भिन्न कविताओं को आमने-सामने देखकर।)

नागार्जुन साधारण के अभियान के कवि हैं। वे बड़ी सहजता से सौन्दर्य और व्यवहार की हमारी बनावटी और जन विरोधी समझ को तहस नहस कर डालते हैं। इतना ही नहीं वे पाठक को नए सौन्दर्य आलोक से परिचय कराते हैं। वो सच्ची समझ और आनन्द से भर उठता है। क्योंकि अपनी दुनिया को फिर से अन्वेषित कर पाने के लिए ज़रुरी नैतिक तार्किकता और विश्वास उनकी रचनाओं में बिना किसी बौद्धिक पाखंड के उपलब्ध हो जाता है। "पैने दांतों वाली" रचना में मादा सूअर मादरे हिन्द की बेटी है। हम जानते हैं कि सूअर, उससे जुड़े लोग और परिवेश को हिकारत से ही देखा जाता है। यह कविता बड़ी आसानी से इस दृष्टिकोण को तोड़-फोड़ देती है। मादा सूअर के बारह थन, जैसा कि सामाजिक उर्वरता को केन्द्र में लाकर रख देते हैं। भाषा ओर शिल्प साधने की अखरने वाली कोशिश नागार्जुन की कविता में ढूंढनी मुश्किल है। कविता का बीज कथा की ऊष्मा में ही स्फुटित होता है। 'मादरे हिन्द की बेटी' मुहावरा देशकाल को विस्तृत और सघन करता है।

वीरेन डंगवाल की रचना में बारिश में घुलकर सूअर अंग्रेज का बच्चा जैसा हो जाता है। हमारे बीच बातचीत में अंग्रेज शब्द व्यक्तित्व की शान ओ शौकत के लिए भी किया जाता है। सौन्दर्यबोध की हमारी इस जड़ता को इस पद में ध्वस्त होते देखना भी सुकून देता वाला है। हमारे जीवन की बुनावट आने वाली पंक्तियों में लगाव और कौतुक के साथ व्यक्त होती है। इसमें गाय, कुत्ता,घोडा भी शामिल हैं। चाय-पकौड़े वाले या बीड़ी माचिस वाले भी हैं। डीजल मिला हुआ कीचड़ भी अपने जीवन का हिस्सा है। बारिश में सभी जमकर भीगते हैं। सूअर के साथ हमारे हृदय में ठंडक सीझ कर पहुंचती है ओर आनन्द से भर देती है।

पैने दांतों वाली
नागार्जुन

धूप में पसर कर लेटी है
मोटी-तगड़ी, अधेड़, मादा सूअर---

जमना किनारे
मखमली दूबों पर
पूस की गुनगुनी धूप में
पसरकर लेटी है
यह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है
भरे-पूरे बारह थनों वाली!

लेकिन अभी इस वक्त
छौनों को पिला रही है दूध
मन-मिजाज ठीक है
कर रही है आराम
अखरती नहीं है भरे-पूरे थनों की खींच-तान
दुधमुंहे छौनो की रग-रग में
मचल रही है आखिर मां की ही तो जान!

जमना किनारे
मखमली दूबों पर
पसर कर लेटी है
यह भी तो मादरे हिन्द की बेटी है!
पैने दांतों वाली---

सूअर का बच्चा
वीरेन डंगवाल

बारिश जमकर हुई, धुल गया सूअर का बच्चा
धुल-पुंछकर अंग्रेज बन गया सूअर का बच्चा
चित्रलिखी हकबकी गाय, झेलती रही बौछारें
फिर भी कूल्हों पर गोबर की झांई छपी हुई है
कुत्ता तो घुस गया अधबने उस मकान के भीतर
जिसमें पड़ना फर्श, पलस्तर होना सब बाकी है।

चीनी मिल के आगे डीजल मिले हुए कीचड़ में
रपट गया है लिये-दिये इक्का गर्दन पर घोड़ा
लिथड़ा पड़ा चलाता टांगें आंखों में भर आंसू
दौड़े लगे मदद को, मिस्त्री-रिक्शे-तांगेवाले।

राजमार्ग है यह, ट्रैफिक चलता चौबीसों घंटे
थोड़ी सी बाधा से बेहद बवाल होता है।

लगभग बन्द हुआ पानी पर टपक रहे हैं खोखे
परेशान हैं खास तौर पर चाय-पकौड़े वाले,
या बीड़ी माचिस वाले।
पोलीथिन से ढांप कटोरी लौट रही घर रज्जो
अम्मा के आने से पहले चूल्हा तो धौंका ले
रखे छौंक तरकारी।

पहले दृश्य दीखते हैं इतने अलबेले
आंख ने पहले-पहले अपनी उजास देखी है
ठंडक पहुंची सीझ हृदय में अदभुद मोद भरा है
इससे इतनी अकड़ भरा है सूअर का बच्चा।

Sunday, May 25, 2008

कविता का भूगोल

(कविताओं में स्थानिकता भाषा और भूगोल दोनों ही स्तरों पर दिखायी दे तो छा रही एकरसता तो टूटती ही है। महेश चंद्र पुनेठा ऐसे ही कवि है जिनके यहां पहाड़ अपने पूरे भूगोल के साथ मौजूद है। इधर के युवा कवियों में महेश की यह विशिष्टता ही उसकी पहचान बना रही है। इस युवा कवि की कविताओं को वागर्थ, कृति ओर, कथादेश आदि महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में पढ़ने का अवसर समय समय पर मिलता रहा है। कविताओं के अलावा महेश पुस्तक-समीक्षा लेखन में भी सक्रिय हैं। गंगोलीहाट, पिथोरागढ़ में रहने वाले महेश चंद्र पुनेठा विद्यालय में शिक्षक हैं। महेश की ताजा कविताओं को प्रकाशित करते हुए हमें खुशी हो रही है।)


महेश चंद्र पुनेठा


सिंटोला


बहुत सुरीला गाती है कोयल
बहुत सुन्दर दिखती है मोनाल
पर मुझे
बहुत पसंद है - सिंटोला

हां, इसी नाम से जानते हैं
मेरे जनपद के लोग
भूरे बदन, काले सिर
पीले चोंच वाली उस चिड़िया को
दिख जाती है जो
कभी घर-आंगन में दाना चुगते
कभी सीम में कीड़े मकोड़े खाते
कभी गाय-भैंसों से किन्ने टीपते
तो कभी मरे जानवर का मांस खींचते

या जब हर शाम भर जाता है
खिन्ने का पेड़ उनसे

मेरे गांव की पश्चिम दिशा का
गधेरा बोलने लगता है उनकी आवाज में

बहुत भाता है मुझे
चहचहाना उनका एक साथ
दबे पांव बिल्ली को आते देख
सचेत करना आसन्न खतरे से
अपने सभी साथियों को कर लेना इकट्ठा
झपटने का प्रयास करना बिल्ली पर

न सही अधिक,
खिसियाने को विवश तो कर ही देते है वे
बिल्ली को।



गमक


फोड़-फाड़कर बड़े-बड़े ढेले
टीप-टापकर जुलके
बैठी है वह पांव पसार
अपने उभरे पेट की तरह
चिकने लग रहे खेत पर

फेर रही है हाथ
ढांप रही है
सतह पर रह गये बीजों को

जैसे जांच रही हो
धड़कन

गमक रहा है खेत और औरत।


सूचना: हमारे साथी राजेश सकलानी इधर एक श्रृखंला शुरु कर रहे हैं। जो किन्हीं भी दो कवियों की एक ही विषय वस्तु को लेकर लिखी गयी कविताओं पर केन्द्रित है। कविताओं पर उनकी टिप्पणी भी होगी। बकोल राजेश सकलानी, "ये कविताएं तुलना के लिए एक साथ नहीं रखी जायेगीं। दो भिन्न कविताओं में एक से विषय या बिम्ब या वस्तु कौतुहल तो जगाते हैं। रचनाकारों के मस्तिष्क में कैसे भिन्न किस्म की डालें विकसित होती हैं ? कुछ भिन्न किस्म के पत्ते, कुछ भिन्न किस्म की फुनगियां विकसित होती हैं। कवि की अपनी निजता साफ तरह से निकल कर आती हैं। रचना का जादू चमक उठता है। इस तरह की भिन्न कविताओं को आमने-सामने देखकर।"

Saturday, May 24, 2008

भाषा संवाद का एक माध्यम है

(भाषा का सीधा-सीधा संबंध साहित्य से है और साहित्य वही जो हमारे दैनिक जीवन को सम्प्रेष्रित करे। भाषा पर चंद्रिका के विचार यहां इस बहस को जन्म दे रहे है कि साहित्य के सरोकार क्या है ? उसका जन जीवन से क्या लेना देना है ? चंद्रिका युवा है। गम्भीरता से विचार करते हैं। दखल की दुनिया, उनके द्वारा जारी ब्लाग इस बात का गवाह। हिन्दी रचनाजगत और रचनाकारों से संवाद की उनकी पहल का स्वागत है।)


चंद्रिका - 09766631821



मेरे कुत्ते ने आज दूध नहीं पिया!
वह गोश्त चाह रहा था!
पर उसका गोश्त मांगना।
परसों मेरी बेटी के झींगा मछली मांगने जैसा नहीं था।
बेटी - बेटी थी।
कुत्ता - कुत्ता था।
भाषा की इस बहस में अभी तक की प्रविष्टियाँ बतौर साहित्यकार आयी है। भाषा का मतलब सम्प्रेषणियता से ही है पर सिर्फ़ सम्प्रेषणियता नहीं। सम्प्रेषणियता से भी ज्यादा जरूरी होता है उसका भाव। साहित्य के अर्थ में ये मायने और भी बढ़ जाते हैं। भाषा में भावनिहित अर्थ ही सम्प्रेषक के मायने को सही अर्थों में प्रेषित करता है। क्योंकि भाषायी प्रभाव मूलत: मनोवैज्ञानिक तरीके से परिलक्षित होता है। एक ही भाषा में बोली गयी बात अपने-अपने सच का एक पाठ रचती है।

जैसे सद्दाम को हुई फ़ांसी। सद्दाम हुए कुर्बान। या, अफजल की फ़ांसी टली। अफ़जल को फिर बख्सा गया। या, उत्तराखन्ड में पत्रकार प्रशांत राही की गिरफ्तारी पर आये समाचारों की भाषा। या, दिन-प्रतिदिन के अखबारों की भाषा को आप देख सकते हैं। झूठ कौन बोल रहा है? सम्प्रेषणियता कहाँ नहीं हो रही है? पर एक ही समाचार में एक ही भाषा में छिपे भाव अलग-अलग हैं।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजी हमारे यहां भी और पूरी दुनिया के स्तर पर भी रूलिंग क्लास की भाषा बन चुकी है। जिसको लेकर अक्सर हिन्दी प्रेमी लोग गालियाँ दिया करते हैं। यहां इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अंग्रेजी भाषा का विस्तार सम्राज्य विस्तार की प्रक्रिया है और इसी के साथ ही संभव हुआ है। जो आज प्रत्यक्ष रूप में बेशक न दिखायी दे रहा हो पर परोक्ष रूप में मौजूद है। और अंग्रेजी उसकी सहायता कर रही है। परन्तु यहां यह भी देखना है कि जो चिन्तन अंग्रेजी में हुआ है वैसा अन्य भाषा में नही है, क्यों ? कारण स्पष्ट है, यहाँ चिन्तन का अर्थ किसी भाषा की लेखनी से ही नहीं है बल्कि उस समाज, जिसकी यह भाषा है, दर्शन से भी है। भाषा का सीधा-सीधा सम्बंध उस समाज से है जिसमे वह बोली जा रही है, सोची जा रही है होती है। अब हिन्दी को ही लें हिन्दी भाषी समाज में या कहें मुख्यधारा के भारतीय समाज में आध्यात्म वादी दर्शन इतना हावी रहा है कि वैज्ञानिक तरीके से बहुत कम सोचा गया। यानि मानवीय समस्या का हल मानव समाज से दूर जाकर परलोक में खोजने की कोशिश की गयी। जबकि ये अपने आप में स्पष्ट है कि दुनिया की 1/6 जनसंख्या होने के बावजूद भी हमने रोशनी के लिये ढिबरी तक नहीं बनायी।
भाषा का निर्माण एवं विकास उत्पादन और उत्पाद की उपयोगिता पर भी निर्भर करता है। जब हमने रेलगाड़ी नहीं बनायी तो उसे लोह चक वाहिनी कहने की जिद कैसा हास्य पैदा करती है, यह किसी से छुपा नहीं है। फिर भी चुटिया धारी मानसिकता ऐसी ही जिद के साथ होती है, यह भी हर कोई जानता ही है। स्पष्ट है कि उत्पादन के महत्व पूर्ण रूप में ही भाषा का विकास निर्भर करता है। यदि किसी समाज में खोज, निर्माण, अविष्कार अधिक होगा, मूल रूप से उसी भाषा में उनका नामकरण किया जायेगा। इसके बाद भारतीय भाषा संस्थान के अलसाये हुए लोग भले ही कम्प्युटर को संगणक, माउस को चूहा कहते रहे। उससे सिर्फ उनकी आत्मतुष्टि ही हो सकती है पर उस शब्द या भाषा की स्थापना नहीं।
भाषा के विकास के लिये मौलिक चिंतन, शोध, अविष्कार निर्माण की जरूरत होती है। फिर भारत जैसे बहुभाषी समाज में हिन्दी भाषा के लोग अन्य भारतीय भाषाओं को ही सीखने की जहमत नहीं उठाना चाहते। तेलगू के बरबर राव के अलावा हिन्दी पाठक तेलगू के ही कितने अन्य कवि लेखक को जानते है? यही हिन्दी हिन्दू हिन्दुस्तान का वर्चस्व है। यही कारण है कि हिन्दी के कुछ विद्वान हिन्दी को दुनिया की दूसरे नम्बर पर बोली जाने वाली भाषा और हिन्दू को सबसे बडी जनसंख्या और हिन्दोस्तान को देश का सबसे बडा और गर्व से लिया जाने वाला नाम मानते है। इस बात का भी कई लोगों को मलाल है कि बांगला साहित्य में पाठक हिन्दी साहित्य के पासंग बराबर नहीं है। अरे भई बांगला के लेखक कवि अपनी कलम सिर्फ दिल्ली में या कलकत्ता में बैठ कर कागज पर नही उतारते बल्कि वे खुद सडकों पर भी उतरते हैं, जनता के लिये। नंदीग्राम के मसले पर इसे स्पष्ट देखा जा सकता है।
हमारे गांव में लोगों को यह नहीं पता है कि प्रेमचद के बाद भी कहानी-वहानी लिखि गयी या, लिखी जा रही है। वे नहीं जानते उदय प्रकाश कौन है ? या हिन्दी में कौन-कौन लेखक हैं ? प्रेम चंद को इसलिये जानते हैं क्योंकि जिस क्लास तक वे पढते हैं, प्रेमचंद की पूस की रात या कफ़न पढा ही दी जाती। पर बंगला के साथ यह नहीं है। आज के उपभोक्ता वादी युग में जहा एक खास संस्क्रिति के विकास और बचाव के लिये पूरा संचार माध्यम जुटा है लेखक जनता से जुडकर नही लिखेगा या उसकी लेखनी में जन समस्यायें नहीं होगी, तो पाठक कैसे उन्हें अपनी रचना समझेगा ? जब तक रचनाओं में पात्र के रुप में वह खुद नही होगा या मह्सूस नहीं करेगा तब तक आप क्या उम्मीद करते है ?
इस बात का कोई मायने नहीं है कि फैलती संचार माध्यमों की व्यवस्था साहित्य के विकास में बाधक है। विदेशों में संचार माध्यम हमसे कमजोर नही हैं पर साहित्य पढना भी इस तरह से बंद नही हुआ है। असल बात है कि सामाजिक स्थितियाँ विकट होने के बावजूद भी हिन्दी भाषा में सिर्फ शिल्प के स्तर पर गुल खिलाये जाते रहे हैं। गरम कोट पहन कर आदमी विचार की तरह कोरे कागजों पर चल रहा होता है।

Friday, May 23, 2008

टीआरपी और भाषा

(टीआरपी का भाषा से क्या लेना देना है ? यह सवाल कई दिनों से कोंध रहा है। ब्लाग की दुनिया भी क्या टीआरपी की दुनिया है? टीआरपी बढ़ानी है तो जो कुछ लिखा जाये क्या उसमें भाषा भी कोई भूमिका निभा सकती है ? यदि नहीं तो फिर एक स्वस्थ बहस की बजाय व्यक्तिगत आरोप प्रत्यारोप की भाषा में एक झूठा विवाद क्यों खड़ा हो जाता है। बहस बेशक उत्तेजक हो लेकिन तार्किक परिणिति तो होनी ही चाहिए।

भाषा को लेकर मोहल्ले में चल रही बहस शायद समाप्त हो चुकी है। शायद इसलिए कि आज जो पोस्ट लगी है पिछले कुछ दिनों पहले शुरु हुई बहस की झलक उसमें दिखायी नहीं देती। अब यह तो मोहल्ले वाले ही बता सकते हैं कि बहस समाप्त हुई या स्थगित!

वैसे जिस तरह से बहस शुरु हुई थी उम्मीद की जा सकती थी कि कुछ ऐसे प्रश्न उठेगें और उन पर गम्भीरता से विचार भी होगा जो समकालीन दुनिया के पेचोखम को भाषा के माध्यम से खोल पाये। लेकिन जैसे जैसे बहस आगे बढ़ी तो दिखायी देता रहा कि नितांत व्यक्तिगत किस्म के आरोप और प्रत्यारोपो का सिलसिला शुरु हो चुका है।
हलांकि बहस में शामिल दोनों ही रचनाकारों ने शुरुआती दौर में एक संतुलित बातचीत को आगे बढाया था। पर बहुमत के रुप में समर्थकों की भीड़ के हमले आरम्भ से ही इतने तीखे और पैने थे कि बहस में शामिल रचनाकार भी एक हद तक उससे उद्वेलित (कुछ कुछ उत्तेजित भी) हो ही गये। अच्छा ही हुआ जो बहस को रोक कर आज मोहल्ले पर कुछ अलग पोस्ट किया गया। वैसे एक स्वस्थ बहस की निश्चित ही जरुरत है। खास तोर पर ऐसे मुद्दों पर जिनकी उपस्थिति बहुत इकहरी नहीं है।
अपने इतिहास में भी और समकालीन दुनिया में भी भाषा का मसला ऐसा ही एक विषय जो उतना इकहरा नहीं कि तुरत फुरत में किन्हीं नतीजों पर पहुंचा जा सके।
भाषा के सवाल पर दलित धारा के रचनाकार ओमप्राकद्ग्रा वाल्मीकि का एक आलेख यहां प्रस्तुत है। यह आलेख पिछले दो आलेखों (वरवर राव और नवीन नैथानी )का ही विस्तार है। माहोल्ले पर चली भाषा सम्बंधी बहस के प्रश्न भी इसमें स्वभाविक रुप से आये ही हैं। यह अलग बात है कि आलेख हमारे अनुरोध पर लिखा गया और मोहल्ले की बहस से ओम प्रकाश वाल्मीकि अपरिचित नही हैं। वसुधा के 1857 पर केन्द्रित अंक में ओमप्रकाश वाल्मीकि के प्रकाशित आलेख में इसकी हल्की झलक पाठक अलग से देख सकते हैं।
कोशिश रहनी चाहिए कि टीआरपी को ध्यान में न रखते हुए भाषा की सादगी को बचाया जा सके। इस सवाल के साथ ही भाषा पर विमर्श जारी रखने का प्रयास किया जा रहा है। भाषा के सवाल पर कवि वरवर राव के वक्तव्य के विस्तार में कथाकार नवीन नैथानी की प्रतिक्रिया के बाद हमें दो और आलेख प्राप्त हुए है। दलित धारा के रचनाकार ओम प्रकाश वाल्मीकि और युवा रचनाकार चंद्रिका ने हमारे अनुरोध पर जिन्हें लिखा है। चंद्रिका का आलेख आगे प्रस्तुत किया जायेगा। )


ओमप्रकाश वाल्मीकि - 094123319034, opvalmiki@yahoo.com

भारत में भाषा का मसला काफी गंभीर है। यहां एक ही राज्य में कई बोलियां है, जिन्हें भले ही हिन्दी या उस राज्य की विशेष भाषा का अंग माने। लेकिन इन बोलियों का अपना अस्तित्व है, अपनी सांस्कृतिक महत्ता है जिसे भाषा-विमर्श में अनदेखा नहीं कर सकते हैं।
हिन्दी राजभाषा कही जाती है लेकिन वर्चस्व अंग्रेजी का कायम है। ऐसा पहली बार हुआ है कि साधारण जन भाषा राजभाषा बनी है।

अभी तक राजसत्ता की भाषा को नीचे की ओर लाया जाता था। यानि राजसत्ता या उच्चवर्ग की भाषा ही राजभाषा राजभाषा होती थी। वह चाहे संस्कृत हो, फारसी या अंग्रेजी हो। सभी उच्चवर्ग की या सत्ताधारियों की भाषा रही है। कालिदास के साहित्य में राजा, ब्राहमण ही संस्कृत बोलते हैं। स्त्रियां, कर्मचारी, सैनिक, दास-दासियां प्राकृत बोलते हैं।
1857 के बाद भाषा को लेकर जो भी माहौल बना उसने साम्प्रदायिकता को बढ़ावा दिया है। इसके तथ्य साहित्य में मौजूद हैं।
नव जागरण के उस दोर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार का श्रेय धार्मिक संस्थाओं को जाता है। डा। जगन्नाथ प्रसाद ने अपनी पुस्तक हिन्दी गद्य शैली का विकास में लिखा है - 'आर्य समाज के तत्कालीन धार्मिक एवं सांस्कृतिक आंदोलन के प्रसार के निमित जो व्याख्यानों और वक्ताओं की धूम मची, उससे हिन्दी गद्य को प्रोत्साहन मिला। दयानन्द ने राष्ट्रीयता के लिए हिन्दी की महत्ता को प्रतिपादित किया था। उन्होंने एक पत्र में लिखा था - 'मेरी आंखें उस दिन को देखने के लिए तरस रही हैं जब कश्मीर से कन्याकुमारी तक सब एक भाषा समझने और बोलने लगेगें।'
उत्तर पश्चिम भारत में आर्य समाज की भूमिका भी संदिग्ध मानी जा रही थी। रामगोपाल अपनी पुस्तक स्वतंत्रता पूर्व हिन्दी के संघर्ष का इतिहास में जिसे हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने प्रकाशित किया था, लिखते हैं - 'आर्य समाज की गणना भी वैमनस्य तथा विवादोत्पादक संस्थाओं में की जाती थी, उसे एक ओर मुसलमान अपना शत्रु समझते थे, तो दूसरी ओर हिन्दुओं का एक भाग प्राचीन हिन्दु धर्म को विकृत करने वाला घोषित करता था। संयोग से इन सभी विरोधात्मक तत्वों द्वारा हिन्दी को अपनी शक्ति बढ़ाने का अवसर मिला।'
उस काल में देवनागरी लिपि और फारसी लिपि को लेकर हिन्दू ओर मुसलिम उच्चवर्ग के शिक्षित वर्ग के मतभेद बढ़ गये थे। भाषा का मसला एक साम्प्रदायिक मसला बन गया था। धर्मिक संस्थाओं ने इसे हवा दी।
विरोध और प्रतिरोध ने हिन्दी-उर्दू के प्रश्न को हिन्दू-मुस्लिम प्रश्न बना दिया था। जिसे ब्रिटिश शासकों ने और भी ज्यादा हवा दे दी थी। इसी नवजागरण के प्रमुख व्यक्तियों में राजा राम मोहन राय भी थे। राजा राम मोहन राय ब्रहम समाज के प्रचारक थे। ओर अपने विचारों के व्यापक प्रचार के लिए उन्होंने जो पुस्तके छपवायी थी, वे हिन्दी में थी। उनकी परम्राओं को आगे बढ़ाते हुए केशव चंद्र सेन, राजनारायण बोस, भूदेव मुखर्जी, नवीनचंद्र राय ने हिन्दी के माध्यम से समाज-सुधार के कार्य आगे बढ़ाये थे। पंजाब प्रांत में उर्दू-फ़ारसी का आधिपत्य था। लेकिन श्रद्धाराम फुल्लोरी जैसे लोगों ने हिन्दी के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी थी। पंजाब में उर्दू विरोध ओर हिन्दी समर्थन से जो स्थितियां उत्पन्न हुई थी, वहां जोश ओर विरोध ने साम्प्रदायिक रुप ले लिया था, जिसे नवजागरण की चर्चा में हमेश अनदेखा किया गया। जिसकी परिणिति ने इतिहास में एक काला पृष्ठ जोड़ दिया।
महात्मा गांधी हिन्दी समर्थक थे। उन्होंने 'हिन्द स्वराज (1908) में लिखा था - 'भारत की सर्वग्राह भाषा हिन्दी होनी चाहिए और इच्छानुसार नागरी या फारसी अक्षरों में लिखी जाये।' उन्होंने भड़ौच में द्वितीय गुजरात शिक्षा सम्मेलन में सभापति पद से भाषण देते हुए कहा था - 'यह निश्चयी है कि मुसलमान अभी उर्दू की लिपि का प्रयोग करेंगे और अधिकांश हिन्दू हिन्दी का। मैंने अधिकांश इसलिए कहा कि आज भी हजारों हिन्दू उर्दू लिपि में लिखते हैं। कुछ तो ऐसे हैं, जो नागरी लिपि जानते ही नहीं हैं। अंत में, जब हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच में लेश मात्र भी संदेह न रहेगा, जब अविश्वास के सब कारण दूर हो जायेगें, तब वह लिपि जो अधिक शक्तिशाली है, अधिक व्यापक प्रयोग में आ जायेगी और राष्ट्रीय लिपि बन जायेगी।'
एक तथ्य और भी है जिसका रूप आज हिन्दी के संस्कृत रूप में सामने आ रहा है। यह मसला उस समय भी गंभीर था। महात्मा गांधी ने उस समय (1917) में भी यह स्पष्ट किया था - 'शिक्षित हिन्दू अपनी हिन्दी को संस्कृतनिष्ठ कर देते हैं, जिसका परिणाम यह होता है कि उसे मुसलमान समझ नहीं पाते हैं। इसी तरह लखनऊ के मुसलमान अपनी उर्दू का फारसीकरण कर देते हैं और वह हिन्दुओं के लिए अबोध हो जाती है।'
इन उद्धरणों से जो तसवीर बनती है, वहां भाषा को धर्म के साथ जोड़ने के प्रयास दिखायी देते हैं। जैसे संस्कृत को ब्राहमणों के साथ जोड़ कर देखना। नवजागरण में धर्म और संस्कृति को राष्ट्रवाद के साथ देखने की प्रवृत्ति भी स्पष्ट दिखायी पड़ती है। इसलिए नवजागरण सवर्ण हिन्दू नवजागरण है, जिसने भीतर छिपी साम्प्रदायिकता को खाद-पानी देकर मजबूत किया है, जो देश के हित में कतई नहीं है।
भाषा के विकास में किसी एक व्यक्ति का हाथ नहीं होता है। किसी भी समाज, राष्ट्र और देश की विकास यात्रा में भाषा की भूमिका सबसे महत्वपूण्र होती है। डा0 शम्भूनाथ ने एक जगह चार क्रान्तियों की चर्चा की थी - बुद्ध का संस्कृत की जगह पाली भाषा को अपनाना, अलवार, नयनार का शास्त्रीय भाषा को छोड़कर लोक भाषा को अपनाना, तुलसी का अवधी को अपनाना और नवजागरण के बाद अंग्रेजी की जगह अपनी भाषाओं को अपनाना। जैसे माइकल मधुसूदन दत्त का अंग्रेजी छोड़कर बंगला भाषा में साहित्य सृजन करना। ये तथ्य इस ओर संकेत करते हैं कि लोकभाषायें ही हमारी सांस्कृतिक पहचान बनाती है। हिन्दी भाषा का विकास भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।
लेकिन नवजागरण काल के दौर में इसे जिस तरह से रूपांतरित किया गया, वह एक गंभीर समस्या का निर्माण करने में सहायक हुआ। हिन्दी-उर्दू को जो साम्प्रदायिक रूप दिया गया, वह भविष्य को कई और समस्याओं में उलझा गया। उस दौर में समाज की अग्रिम पंक्ति के लोग न तो अंग्रेजी का विरोध कर रहे थे,न दासता का।
नवजागरण काल में हिन्दी भाषा और नागरी लिपि के लिए संघर्ष करने वाले साहित्यकारों में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने आंदोलन को अभूतपूव्र शक्ति प्रदान की। 1882 के शिक्षा आयोग के प्रश्नों का उत्तर देते हुए भारतेन्दु ने कहा था- 'साहूकार और व्यापारी अपना हिसाब-किताब हिन्दी में रखते हैं। हिन्दुओं का निजी पत्र व्यवहार भी हिन्दी में होता है। स्त्रियां हिन्दी लिपि का प्रयोग करती हैं। पटवारी के कागजात हिन्दी में लिखे जाते हैं और ग्रामों के अधिकतर स्कूल हिन्दी में शिक्षा देते हैं।'
राधाचरण गोस्वामि द्वारा सम्पादित तथा मथुरा से प्रकाशित समाचार पत्र भारतेन्दु ने 8 अगस्त 1884 के अंक में लिखा - '---इन देशवासियों की हिन्दी स्वाभाविक भाषा है, उर्दू अस्वाभाविक है, फिर भला उसमें लोगों की प्रवृत्ति कैसे हो ?'
इन उद्धरणों से आभास होता है कि हिन्दी के लिए जी जान से संघर्ष करने वाले उर्दू का विरोध कर रहे थे, न कि अंग्रेजी का। क्योंकि हिन्दी हिन्दुओं की और उर्दू को मुसलमानों की भाषा मान लिया गया था, जो एक गहरी साम्प्रदायिक सोच का परिणाम थी।

Thursday, May 22, 2008

भाषा और बाजार

(भाषा के सवाल पर तेलगु कवि वरवर राव के वक्तव्य के विस्तार में कथाकार नवीन नैथानी की लिखित प्रतिक्रिया प्राप्त हुई जिसको यहां प्रस्तुत करते हुए पाठकों से अनुरोध है कि नवीन नैथानी द्वारा छुए गये बिन्दु, हिन्दी भाषा का वर्तमान स्वरूप और बाजार की भूमिका पर अपनी विस्तृत राय के साथ उपस्थित हों। यदि संभव हो तो मेल करें। mail i d : vggaurvijay@gmail.com आपकी महत्वपूर्ण राय को पाठकों तक पहुंचाने में हमें प्रसन्नता होगी।
नवीन नैथानी पेशे से भौतिक विज्ञान के व्याख्याता हैं। राजकीय महाविद्यालय, डाकपत्थर, देहरादून में पढ़ाते हैं। उनकी कहानियों का अपना एक पाठक वर्ग है। उनके लेखन की विश्वसनियता के चिन्ह को रमाकांत स्मृति सम्मान और कथा सम्मान के रूप में पाठक देख सकते हैं।)

नवीन नैथानी, 09411139155 -

भाषा के विभिन्न स्वरूपों में जन भाषा और राजभाषा की स्पष्ट विभाजक रेखा इतिहास में हम देख सकते हैं। राजभाषा मूलत: सत्ता के वर्चस्व को बनाये रखने के लिए एक अभेद्य दुर्ग के रुप में गढ़ी गयी। व्याकरण की नियमबद्ध निर्मितियों में अभिव्यक्तिको बांधने की कोशिश को आप क्या कहेंगें ?
व्हां संवेदना के लिए स्थान नहीं है, जो सुनना है उसके विशेष अर्थ पर जोर है और जो अप्रिय है उसे व्याकरण निषिद्ध घोषित करते आये हैं। जन भाषा में कुछ भी अस्वीकार्य नहीं है, राजभाषा (इसे व्याकरणनिष्ठ भाषा भी पढ़े) में जनता द्वारा बहुत कुछ कहा गया दोषपूर्ण संरचना के खाते में डाल दिया जायेगा।
बहरहाल, वर्चस्व की इस लड़ाई को हम कानून की भाषा के रुप में सबसे सही तरीके से जान सकते हैं। अदालतों की भाषा एक विशेष कौशल की मांग करती है जो सिर्फ वकीलों के पास होता है। आप अपनी पूंजी उनके हवाले कीजिए और उनसे कानून की भाषा लीजिए। यह न्याय के इतिहास पर दृष्टि डालने के लिए एक सही प्रस्थान बिन्दु हो सकता है। बीसवीं शताब्दी का प्रख्यात दार्शनिक वाइट्जैस्टीन जब भाषा (उसका आशय निश्चित रूप से इसी भाषिक व्याकरण की तरफ है) की सीमाओं की तरफ संकेत करता है तो वह मनुष्य की अभिव्यक्ति की क्षमताओं पर शंका नहीं उठा रहा है, वह अभिव्यक्ति की असंख्य संभावनाओं को ही चिन्हित कर रहा है, जो दुर्भाग्य से, व्याकरण की परिधि के बाहर है।
इस भाषिक वर्चस्व का एक अन्य उदाहरण हम बाजार की भाषा के रूप में देखते हैं। जन भाषा को किसी रणभेरी की जरुरत नहीं। लेकिन बाजार की भाषा को है। वह व्याकरण (सत्ता) और जन भाषा के बीच अपने संघ्ार्ष से एक नयी ही भाषा रचने के प्रयास में दिखायी पड़ता है। दरअसल यह निर्माण की नहीं बल्कि सत्ता के वर्चस्व की प्रक्रिया है।
पुस्तकों के प्रकाशन को ही लें। यह एक जाना माना तथ्य है कि हिन्दी अब भारतीय संदर्भ में एक बाजार-भाषा में तबदील हो चुकी है। बांग्ला, मराठी, मलयालम जैसी अन्य भारतीय भाषाओं में लिखा गया साहित्य जिस तरह से उन भाषा-भाषियों के बीच खरीदा जाता रहा है, हिन्दी का साहित्य उनके पासंग में भी नहीं है। इधर कुछ वर्षों से हिन्दी में बड़े प्रकाशन गृहों से अंग्रेजी के उपन्यासों के अनुवाद अच्छी खासी तादाद में छप रहे हैं। क्या यह स्थिति अन्य भारतीय भाषाओं के साथ भी है ? इस प्रश्न का जवाब, मुझे उम्मीद है, मेरी शंकाओं को दूर करने में सहायक ही होगा।

Wednesday, May 21, 2008

राज-काज की भाषा और जनता की भाषा

(भाषा को लेकर पिछले कुछ दिनों से हमारे ब्लागर साथी एक ऐसी कार्यवाही में जुटे हैं जो मोहल्ले में विवाद नहीं तो चर्चा को तो जन्म दिये हुए ही है। कल यानि 20 मई को बुद्ध पूर्णिमा थी। वर्ष 2001 में बुद्ध पूर्णिमा के ही दिन मैंने और मेरे कथाकार साथी अरुण कुमार असफल ने तेलगू के कवि वरवर राव के साथ उनके अपने रचनाकर्म, समकालीन साहित्य सांस्कृतिक स्थितियों और तेलगू साहित्य पर कुछ बातचीत की थी। वर्ष 2002 में साहित्यिक कथा मासिक कथादेश के मई अंक में जो प्रकाशित हुई है। तेलगू के कवि वरवर राव द्वारा हिन्दी में दिया गया यह प्रथम साक्षात्कार था। हम दोनों ही साथी तेलगू साहित्य से पूरी तरह से अनभिज्ञ ही थे। कुछ छुट-पुट अनुवाद ही, जो कि सीमित ही हैं, हमने पढ़े भर हैं। बल्कि तेलगू ही क्यों अन्य भारतीय भाषाओं के साहित्य की पर्याप्त संख्या में अनुपलबधता हमें उस से अपरिचित किये हुए है। जबकि अन्य विदेशी भाषा के साहित्य के अनुवाद भी हमने इनसे कहीं ज्यादा पढ़े होंगे। ये सवाल हमारे भीतर उस वक्त मौजूद था। अपनी बातचीत को हमारे द्वारा इसी बिन्दु से शुरु करते हुए हमारी जिज्ञासा को शांत करने के लिए भाषा पर दिया गया वी वी का वक्तव्य यहां इसी संदर्भ में पुन: प्रस्तुत है।)

वरवर राव -

यह एक भूमिका की बात है। एक ऐसी भूमिका जिसका आधार राजनीतिक और आर्थिक सम्बंधों के कारण खड़ा हुआ है। हम भी हिन्दी कविताएं या हिन्दी साहित्य के बारे में थोड़ा बहुत ही जान पाये, या जान पा रहे हैं। पर अपने पड़ोसी तमिल, मराठी, कन्नड़, ओड़िया और अन्य किसी दूसरी भाषा के बारे में इससे भी कम समझ रखते हैं। हाल ही में मेरी तेलगु कविताओं का मराठी में अनुवाद हुआ। उसकी भूमिका में मैंने लिखा - 'दलित पैंथर' को छोड़कर मराठी साहित्य के बारे में मेरी जानकारी बिल्कुल भी नहीं है। हां, थोड़ा-बहत सुना है तो पहले अमर शेख के बारे में बाद में अनाभाव साठे के बारे में इसका मुख्य कारण, उनका जुड़ाव कम्युनिस्ट पार्टी के सांस्कृतिक आंदोलनों से रहा, जिससे कि मैं खुद भी जुड़ा हूं। जबकि पड़ोसी होने पर भी मराठी साहित्य के बारे में तो मैं जानता तक नहीं हूं। पड़ोसी की ही बात नहीं - तेलुगु, मराठी, कन्नड़ भाषा-भाषी बहुत साल तक एक ही राज्य में थे - हैदराबाद में। जहां से मैं आया हूं। यानि जिसमें तेलंगाना है। मैं उस तेलंगाना, मराठवाड़ा के चार जिले, कर्नाटक के तीन जिले (जिसे आज भी हैदराबाद कर्नाटक कहते हैं ) को मिलाकर कुल सोलह जिलों का भौगोलिक क्षेत्र ही हैदराबाद राज्य था। फिर भी हमको एक दूसरे की भाषा नहीं आती। यहां तक कि उनके साहित्य के बारे में भी कुछ नहीं सुना। कारण था कि राज की भाषा उर्दू थी। यानि हमारी भाषाओं ने कभी राज नहीं किया।
भाषा की सदैव दो भूमिका रही है, जबकि होनी चाहिए एक ही। वो एक मात्र भूमिका है, एक दूसरे को समझने की-सम्प्रेषण की। मगर इस देश में भाषा की एक राज करने की भूमिका भी रही है। राज करने वाले की यानि कुलीन वर्ग की भाषा रही है जिसे हम कह सकते हैं ब्राहमणीकल फ्यूडलिज्म। उस समय से लेकर मुगलों तक जनता की भाषा एक थी। राज काज की भाषा दूसरी।
भाषा का एक ऑथोरिटेरियन रोल था। यानि राज काज करने की भूमिका। जो भाषा राज-काज की भाषा रही, वह कभी किसी जनता की भाषा नहीं रही। हमारे देश के लिए यह एक खास बात है और दुर्भाग्यपूर्ण भी, जैसे कहा जाये दो हजार साल पहले जनता की भाषा थी पाली, प्राकृत और अनेक उपभाषाएं, जिन्हें डाइलेक्टस भी कहते हैं। इन सब भाषाओं से पाणिनि ने अष्टाध्यायी लिखा। ग्रामर की रचना और एक प्रमाणिक भाषा का निर्माण किया जिसे संस्कृत कहते हैं। जिसका ब्राहमण शास्त्रों में इस्तेमाल किया गया। वैसे ही एक सत्ता की भाषा बनी जो किसी की भी मातृभाषा थी ही नहीं। बुद्ध ने अपने धम्मपद पाली में लिखकर चेतना से इसका विरोध किया।
अब आधुनिक काल में आयें तो अंग्रेजी सत्ता की भाषा बन गयी। हमारी कोई भी मातृभाषा कभी भी सत्ता की भाषा नहीं रही। अंग्रेजी जो दुनिया के शासकों की भाषा है, दुनिया के साहित्य की गवाक्ष भी बन गयी। जो भी अंग्रेजी से आ रहा है वह हमें प्राप्त हो रहा है।

Tuesday, May 20, 2008

यमुना के बागी बेटे

यमुना के बागी बेटे कथाकार विद्यासागर नौटियाल का उपन्यास है। यह उपन्यास रंवाई के ढंढक की पृष्ठभूमि में लिखा गया है।
रवांई का ढंढक की वह घ्ाटना 20 मई 1930 को घटी थी। यानि 23 अप्रैल 1930 को जहां एक ओर अंग्रेज फौज के सिपाही पेशावर में निहत्थे देशवासियों पर हथियार उठाने से इंकार कर चुके थे। वहीं उस घ्ाटना के महीने भर के भीतर ही टिहरी रियासत का दीवान चक्रधर जुयाल राज्य की जनता पर हथियार चला रहा था।
पर्यावरणविद्ध सुन्दरलाल बहुगुणा के आलेखों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों के हवाले से इतिहासकार शिवप्रासद डबराल द्वारा लिखे उत्तराखण्ड का इतिहास भाग-8 में दर्ज रवांई के इस ढंढक की गाथा को देखा जा सकता है।

टिहरी में वन व्यवस्था से असन्तोष

1927-28 में राज्य टिहरी राज्य में जो वन व्यवस्था की गयी उसमें वनों की सीमा निर्धारित करते समय ग्रामीणों के हितों की जानबूझकर अवहेलना की गयी। इससे वनोंे के निकट की ग्रामीण जनता में भारी असन्तोष फैला। परगना रवांई वनों की जो सीमा निर्धारित की गयी उसमें ग्रामीणों के आने जाने के मार्ग, खलीहान तथा पशुओं को बांधने के स्थान (छानी) भी वन की सीमा में चले गए। फलत: ग्रामीणों के चरान, चुगान और घास-लकड़ी काटने के अधिकार बन्द हो गए। वन विभाग की ओर से घोषणा की गई कि सुरक्षित वनों में ग्रामीणों को कोई अधिकार नहीं दिए जा सकते। कई वर्ष पहले से ही वनों पर ग्रामीणो
के अधिकारों को रोककर उनके विक्रय से अधिकाधिक धनराशि बटोरने का क्रम चला आ रहा था। राज्स की वन विभाग की नियमावली के अनुसार राज्य के समस्त वन राजा की व्यक्तिगत सम्पति के अनतर्गत गिने जाते थे। इसलिए कोई भी व्यक्ति किसी भी अन्य किसी भी वस्तु को अपने अधिकार के रुप में बिना मूल्य प्राप्त नहीं कर सकता था। यदि राज्य की ओर से किसी व्यक्ति को राज्य के वनों से किसी वस्तु को निशुल्क प्राप्त करने की छूट दे दी जाती है तो इसे महराजा की ''विशेष कृपा"" समझना चाहिए। जो सुविधाऐं वनों में जनता को दी गई हैं, उन्हें महाराजा स्वेच्छानुसार जब चाहे रद्द कर सकते हैं।

पशुचारण और कृषि के रोजगार पर निर्भर जनता के लिए अपने पशुओं के चारागाह बन्द हो गये। खेती के उपकरण, हल आदि जो विशेष जाति के वृक्षों से अनाए जाते थे, दुर्लभ हो गए। छप्परों को छाने के लिए बांस, घास और मालू आदि की पत्तियों एवे मालू के रेशों की की कमी हो गई। वनों पर निर्भर ग्रामीणों पर कठोर प्रतिबन्ध लगादेने से स्वभाव से ही उग्र एवं अदम्य स्वतंत्रताप्रिय रवांलटों का रुधिर खौलने लगा। जनता पूछती थी वन बन्द हो जाने से हमारे पशु कहां चरेगें ? सरकार की ओर क्षुद्र और विवेकशून्य कर्मचारी जवाब देते, "ढंगारों में फेंक दो।"

आंदोलन भड़क उठा

पूरे भारत में गांधी जी के आहवान पर जनता ब्रिटिश सरकार निर्मित विधि-विधानों को अदम्य उत्साह के साथ तोड़ रही थी। सरकार के विरुद्ध आंदोलनकारियों का जयजयकार सर्वत्र बड़ी श्रद्धा, उत्साह एवं आवेश के साथ किया जाता था। चकरोता में रवांई को जाने वाले मार्ग पर स्थित राजतर नामक स्थान पर लाला रामप्रसाद की दूकान पर समाचारपत्र आते थे, जिनमें देशभर में फैले हुए सत्याग्रह के समाचार छपते थे। रवांई के निवासी इन समाचारों को बड़ी उत्सुकता से पढ़ते और सुनते थे।
रवांई में साहसी व्यक्तियों ने वनों में अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आंदोलन आरम्भ कर दिया। आंदोलन का नेतृत्व नगाणगांव के हीरासिंह, कसरू के दयाराम और खुमण्डी-गोडर के बैजराम ने सम्भाला। इनके पास समाचार पहुंचाते रहने की व्यवस्था लाला रामप्रसाद ने की। रवा्रई निवासियों ने अपनी आजाद पंचायत की स्थापना कर डाली। आजाद पंचायत की ओर से घोषणा की गई कि वनों के बीच रहने वाली प्रजा को वन सम्पदा के उपभोग का सबसे अधिक अधिकार है। रवांई वासियों ने अपनी समानान्तर सरकार की स्थापना कर ली। हीरासिंह को पांच सरकार और बैजराम को तीन सरकार कहा जाने लगा। रवाईं निवासियों ने वनों की नई सीमाओं को मानना अस्वीकार कर दिया। आजाद पंचायत की ओर से लोटे की छाप का मुहर के रूप में प्रयोग करके आदेश भेजे जाने लगे।
सारे रवांई में क्रांति की फैली हुई लहर को देखकर राजदरबार की ओर से भूतपूर्व वजीर हरिकृष्ण रतूड़ी को रवांई भेजा गया। रतूड़ी के सम्मुख आंदोलनकारियों ने मांग रखी वनों का हम लोग अब तक जिस प्रकार उपयोग करते थे, उसी प्रकार की सुविधाएं अब भी मिलनी चाहिए। ग्रमीणों की मांगों को जायज मानते हुए अपनी ओर से आश्वासन देकर रतूड़ी वापिस चले गये।
जब एक ओर समझौते की बातचीत चल रही थीए दूसरी ओर रवांई के अन्तर्गत राजगढ़ी के एसडीएम सुरेन्द्रदत के न्ययालय में आंदोलन के प्रमुख नेताओं पर राज्य के वनों को हानि पहुंचाने के अपराध में अभियोग चलाया जा रहा था। यह अभियोग राज्य की ओर से वनविभाग के डीएफओ पद्मदत्त रतूड़ी द्वारा चलाया गया था। एसडीएम ने आंदोलन के प्रमुख नेता दयाराम, रुद्रसिंह रामप्रसाद और जमनसिंह को दोषी पाया और उन्हें कारावास का दण्ड सुनाया।
पटवारी और पुलिस के साथ एसडीएम एवं डीएफओ 20 मई 1930 को आंदोलन के उन नेताओं जिन्हें सजा सुना दी गयी थी, को लेकर राजगढ़ी से टिहरी की ओर प्रस्थान कर गये। डण्डियाल गांव के नजदीक पहुंचे ही थे कि आंदोलनकारियों ने अपने साथियों को छुड़ाने के लिए हमला कर दिया। दोनों ओर से जमकर गोलीबारी हुई। डीएफओ पदमदत्त रतूड़ी की रिवाल्वर से निकली गाली से ज्ञानसिंह मारा गया। जूनासिंह एवं अजितसिंह भी मारे गये। बहुत से घायल हो गये। एसडीएम भी गाली लगने से घ्ाायल हुआ। पदमदत्त रतूड़ी जिसके पास रिवालर था, भाग गया। पुलिस वाले भी भाग गये। एसडीएम सुरेन्द्रदत्त को आंदोलनकारियों ने बन्दी बना लिया। अपने साथियों को छुड़ाकर आदोलनकारी राजतर ले गये। समाचार पाकर दीवान चक्रधर जुयाल ने रवांई के निवासियों को ऐसा पाठ पढ़ाने की सोची, जिसे वे कभी भूल न सकें। राजा यूरोप की यात्रा में गया हुआ था। दीवान ने संयुक्त प्रदेश के गवर्नर से आंदोलन के दमन करने के लिए, यदि आवश्यकता पड़ी तो शस्त्रों का प्रयोग करने की अनुमति प्राप्त कर ली। टिहरी राज्य की सेना का अध्यक्ष कर्नल सुन्दरसिंह जब प्रजा पर गोलियां चलाने के लिए प्रस्तुत न हुआ तो दीवान ने उसे हटाकर नत्थूसिंह सजवाण को राज्य की सेना का सर्वोच्च अफसर बनाकर ढंढकियों का दमन करने के लिए भेजा।
धरासू के मार्ग से राज्य की सेना राजगढ़ी पहुंची। सेना का मार्ग रोकने के लिए ग्रामीणों ने वृक्षों को काटकर सड़क पर गिराने की योजना बनाई थी। किन्तु इससे विशेष बाधा न पड़ी। थोकदार रणजोरसिंह अपने दलबल सहित मदिरा के घड़ों को लेकर सेना के स्वागत के लिए खड़ा था। रात्रि विश्राम के वक्त सेना ने जम के नाचरंग और मदिरापान का आनंद उठाया। थेकदार लाखीराम और रणजोरसिंह ने जिसे चाहा, पकड़वाया।
टगले दिन तिलाड़ी के मैदान में, चांदाडोखरी नामक स्थान पर आजाद पंचायत की बैठक हुई। जिसमें सेना के आगमन तथा समझौते की शर्तो पर विचार-विमर्श होने लगा। सेना ने घ्ाटनास्थल पर तीन ओर से घेरा डाल दिया। सेना में रवांई का ही एक सैनिक अगमसिंह था। उसने आगे बढ़कर आंदोलनकारियों को सचेत करना चाहा कि दीवान ने सीटी बजा दी। दीवान की सीटी की आवाज पर सैनिकों ने गोलियों की बौछार शुरु कर दी। प्राण बचाने के लिए कुछ जमीन पर लेट गये, कुछ पेड़ों पर चढ़ गए, कुछ ने जान बचाने के लिए यमुना में छलांग लगा दी। न जाने कितने मारे गये और कितने घायल। जान बचाकर यमुना में कूदने वालों पर चलायी गयी गोली से यमुना के पार सुनाल्डी गांव में सैनिकों की गाली से एक गाय भी मर गयी।
यमुना के बागी बेटों का यह ऐसा दमन था जिसकी खबरें प्रकाशित नहीं हुई। आंदोलन पर यकीन रखने वालों के व्यक्तिगत प्रयासों से कहीं कोई छुट-पुट कोशिश हुई भी तो खबर के फैलने से पहले ही ब्रिटिश हुकूमत गिरफ्तारियों को उतावली रही। यमुना के बागी बेटो का इतिहास तो किस्से कहानियों में ही दर्ज है।

Sunday, May 18, 2008

भगत सिंह : सौ बरस के बूढ़े के रुप में याद किये जाने के विरुद्ध

("ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगत सिंह जीवित भगत सिंह से ज्यादा खतरनाक होगा। मुझे फांसी हो जाने के बाद मेरे क्रान्तिकारी विचारों की सुगन्ध हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जायेगी। वह नौजवानों को मदहोश करेगी और वे क्रान्ति के लिए पागल हो उठेगें। नौजवानों का यह पागलपन ही ब्रिटिश साम्राज्यवादियों को विनाश के कगार पर पहुंचा देगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। मैं बेसब्री के साथ उस दिन का इंतजार कर रहा हूं जब मुझे इस देश के लिए मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वोच्च पुरस्कार मिलेगा।"
भगत सिंह का यह कथन उनके साथी शिव वर्मा के हवाले से है। परिकल्पना प्रकाशन से प्रकाशित भगत सिंह की जेल डायरी में शिव वर्मा जी ने अपने आलेख में उर्द्धत किया है।
पहल88 में प्रकाशित कवि राजेन्द्र कुमार की कविता को पढ़ते हुए जेल डायरी को पलटने का मन हो गया। यह कविता की खूबी ही है कि उसने भगत सिंह को जानने के लिए मुझे प्रेरित किया। पहल से साभार कवि राजेन्द्र कुमार की कविता आपके लिए यहां पुन: प्रस्तुत है।


मैं फिर कहता हूं
फांसी के तख्ते पर चढ़ाये जाने के पचहतर बरस बाद भी
'क्रान्ति की तलवार की धार विचारों की सान पर तेज होती है।"

वह बम
जो मैंने असेंबली में फेंका था
उसका धमाका सुनने वालों में तो अब शायद ही कोई बचा हो
लेकिन वह सिर्फ बम नहीं, एक विचार था
और, विचार सिर्फ सुने जाने के लिए नहीं होते

माना कि यह मेरे
जनम का सौ वां बरस है
लेकिन मेरे प्यारों,
मुझे सिर्फ सौ बरस के बूढ़ों में मत ढूंढ़ों

वे तेईस बरस कुछ महीने
जो मैंने एक विचार बनने की प्रक्रिया में जिये
वे इन सौ बरसों में कहीं खो गये
खोज सको तो खोजो

वे तेईस बरस
आज भी मिल जाएं कहीं, किसी हालत में
किन्हीं नौजवानों में
तो उन्हें मेरा सलाम कहना
और उसका साथ देना ---

और अपनी उम्र पर गर्व करने वाले बूढ़ों से कहना
अपने बुढ़ापे का गौरव उन पर न्यौछावर कर दें

राजेन्द्र कुमार, फोन : 0532 - 2466529

Thursday, May 15, 2008

इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे अन्य विवरणों के बिना भी

अगली सुबह अखबार पढ़ते हुए मैं चौंक गया। पुलिस ने दावा किया था कि उसके पास से अनेक आपत्तिजनक दस्तावेज मिले थे। पुलिस को शक था कि उसके सम्बंध किसी नक्सलवादी पड़ोसी मुल्क से थे और वो देश में अशांति उत्पन्न करना चाहता था। - प्रस्तुत कहानी दुर्दांत से.

(आज यथार्थ का चेहरा इतना इकहरा नहीं रह गया है कि किसी भी घटना के कार्यकारण संबंधों को आसानी से पकड़ा जा सके। समकालीन यथार्थ की इस जटिल प्रवृति ने गम्भीरता से रचनारत संवेदनशील लोगों को उसको ठीक-ठीक तरह से पुन:सर्जित करने के लिए न सिर्फ कथ्य के स्तर पर बल्कि भाषा और शिल्प के स्तर पर भी नये से नये प्रयोग करने को मजबूर किया है। समकालीन युवा रचनाकारों की कहानियों में विशेषतौर पर यह बात स्पष्ट दियायी दे रही है। शिल्प और भाषा के इस प्रयोग के चलते कहानी का पारम्परिक ढांचा एक हद तक टूटता हुआ सा भी दिख रहा है।
ऐसे में कहानी को उसकी शास्त्रियता के ढांचे में ही कह पाने की कोशिश उतनी आसान नहीं रह गयी है। यही वजह है कि हर वह कहानी जो अपने कहानीपन के निर्वाह के साथ, बिना भाषायी और शिल्प के चमत्कार के जब उसी यथार्थ को कह पाने में समर्थ होती है तो उसकी तरफ ध्यान जाना लाजिमि है। जितेन ठाकुर एक ऐसे ही कहानीकार है जो कहानी को परम्परागत शास्त्रिय ढांचे में रखते हुए ही लगातार रचनारत है। दुर्दांत उनकी ऐसी ही कहानी है जिसमें हम उसी यथार्थ को हुबहू और बहुत ही सहज ढंग से प्रकट होते हुए देखते हैं, जिसके लिए इधर की अन्य कहानियां लम्बे लम्बे पैराग्राफों में इतिहास, समाजशास्त्र और अर्थशास्त्र जैसे अन्य विवरणों के बिना संभव नहीं हो पा रही है।
"दहशतगर्द लोग", "अजनबी शहर में", "एक झूठ एक सच" जितेन ठाकुर के महत्वपूर्ण कथा संग्रह एवं "शेष अवशेष" उपन्यास के अलावा अभी हाल ही में, वर्ष 2008 में प्रकाशित एक अन्य उपन्यास "उड़ान" चर्चाओं में है। हिन्दी के अलावा जितेन डोगरी में भी समान रुप से लिखते हैं। "न्हेरी रात स्नैहरे ध्याड़े" उनके द्वारा डोगरी में लिखी कहानियों का संग्रह है।)


दुर्दांत
जितेन ठाकुर 09410593800

खलील जिब्रान को पढ़ने के बाद उसका भेजा घूम गया है- कम से कम दुनिया ने यही समझा था। उसने तय किया कि अब वो अन्याय और अव्यवस्था के विरूद्ध लड़ेगा। उसे विच्च्वास था कि उसकी आवाज पर लाखों सोई हुई आत्माएं जाग उठेंगी और करोड़ों अलसाई आत्माओं की मुटि्ठयां हवा को बींध देंगी। एक ऐसा झंझावत उठेगा जो इस गांव से उस गांव, इस कस्बे से उस कस्बे, एक द्राहर से दूसरे द्राहर होता हुआ एक दिन समुद्र की हदों को लांध जाएगा। फिर आदमी साफ हवा में सांस ले पाएगा, शुद्ध अनाज खाएगा, खालिस दूध पिएगा और हर तरफ फैली अव्यवस्था और अराजकता से मुक्त हो जाएगा।
इस सोच के बाद उसे फूलों के रंग ज्यादा शोख और चटख दिखने लगे थे। फूली हुई घास किसी सर्द और सब्ज अंगारे की तरह दहकने लगी थी। कैक्टस की फुनगियों पर बुरांस खिल उठे थे। आसमान का नीलापन उचक कर पकड़ लेने की हद तक झुक आया था और पहाड़ों की चोटियों पर अद्ध खिले चांद उतर आए थे। इस ख्याल ने उसके पोरों में होने वाली सूचनाओं की कसक को कम कर दिया था और अब कभी-कभी वो मुस्कुराने भी लगा था।
यह शहर छोटा था और यहाँ के कलैक्टर की आमदनी कुछ लाख रूपया महीना था। शहर छोटा था इसलिए पुलिस कप्तान की आमदनी भी इससे बहुत फर्क नहीं थी। थानों की बार-बार की गई निलामी और माफियाओं के साथ की गई बैठकों का भी कोई बहुत सकारात्मक प्रभाव नहीं हुआ था। पूरी कोशिशों के बाद भी माफियाओं की संख्या में वृद्धि नहीं हो पाई थी जिससे स्वस्थ प्रतिद्वंदिता का अभावा था। यहाँ का सारा अधिकारी वर्ग यह अभाव झेल रहा था और कुर्सियां सस्ते में नीलाम हो रही थी। पता नहीं लोग इस सच को जानते थे या नहीं- पर वो जानता था।
वो जानता था कि शहर की सारी बसें मिट्टी के तेल से चलती है। इसीलिए ढ़िबरी भर मिट्टी का तेल हासिल करने के लिए मजदूर को कई गुना दाम चुकाने पड़ते हैं। ढ़िबरी बुझने से पहले ही उसे नींद आ जाए इसलिए वो मिलावट वाली देसी शराब का पउआ पीता, सडे हुए सरकारी गेंहू का काला आटा फांकता और सो जाता। रात का सोया हुआ मजदूर जब सुबह उठता तो खुदा का भेजा हुआ सफैद दाढ़ी और नूरानी चेहरे वाला मौलवी मस्जिद की मीनार से उसे आवाज लगाता। भारी पेट और थुलथुले बदन वाला लिजलिजा पंडित घंटिया बजा-बजा कर उसे बुलाता। यह तब तक तक चलता जब तक उसकी जेब में बची रह गई पिछले दिन की बकाया कमाई झटक न ली जाती। खाली जेब और भूखे पेट के साथ एक भी दिन के आराम के बिना वो फिर कामगारों की पंक्ति में खड़ा पाया जाता।
वो जानता था कि ताजाबनी सड़कें क्यों एक बरसात भी नहीं झेल पातीं। लैंपपोस्ट के बल्ब आए दिन क्यों बुझे रहते हैं। क्यों द्राानदान बंगलों की घास गर्मियों में भी नहीं सूखती और म्यूनिसपैलिटी के नल सर्दियों में भी सूखे रहते हैं। पैदल चलता आदमी खादी पहनते ही कैसे शानदार गाड़ियों का मालिक हो जाता है ओर झंडा फहराकर भाषण देता अधिकारी कितना झूठ बोलता है।
वो ऐसी बहुत सी सच्चाइयां जानता था। उसका यह सब जान लेना अपराध नहीं था पर सोचना एक हिमाकत थी। उसकी यह हिमाकत आज तक ढकी-छुपी रही थी। पर आज वो द्राहर के बीचों-बची उधड़ी हुई सीवन की तरह बेनकाब हो गया था। वो सोचता है- सोच सकता है। वो बोलता है- बोल सकता है। उसके अंतस में ज्वालामुखी धधक रहा था और प्रशासन नहीं जान पाया। यह बात शासन और प्रशासन दोनों को हैरान कर रही थी। सबसे ज्यादा हैरानी उस अखबार के मालिक को थी जिसमें वो काम करता था।
मालिक ने पिछले तीन सालों में उसे बैल की तरह जोता था- वो चुप-चाप जुता रहा था। वो विज्ञापन लाता तो मालिक पीठ थप-थपाता। वो झूठ लिखता तो मालिक खुच्च होकर छापता। पर जिस दिन उसने सच लिखने की कोशिश की थी- मालिक ने झिड़क दिया था।
प्रशासन के आला हुक्मरानों की चिंता का कारण दूसरा भी था। अरबों रूपए के खर्च पर खड़ा सिस्टम आज खोखला और बेमानी साबित हुआ था। इसी शहर का एक आदमी लगातार सोचता रहा था और दसियों गुप्तचर एजैंसियां नहीं जान पाई थीं। सूचना विभाग नाराज था कि भरपूर विज्ञापन देने के बावजूद वो अखबार अपने एक अदने से नौकर पर काबू नहीं रख पाया। द्रारीफों की सांसे भी गिन लेने का दावा करने वाली पुलिस जान भी नहीं पाई और वो द्राहर के बीचों-बीच घंटाघर पर चढ़ गया था। हद तो यह थी कि घंटाघर की भरपूर ऊँचाई के बावजूद उसके हाथ में पकड़ा हुआ सच्च का पुलिंदा लोगों को दिखलाई दे रहा था और लोग उस पुलिंदे में बंधे सच को सुन लेना चाहते थे। पर विडम्बना यह थी कि उसकी ऊँचाई इतनी अधिक थी कि उसकी आवाज जमीन तक नहीं पहुंच पा रही थी।
सच का यह पुलिंदा उठाए-उठाए उसने कई दरवाजों पर दस्तक दी थी। दरवाजे खुले भी थे पर उसके पुलिंदे की गांठ खुलने से पहले ही दरवाजे बंद हो जाते थे। किसी के पास इतना समय नहीं था कि उसकी बासी बातों को- ऐसा वो लोग सोचते थे- सुन लेता।
उसे खलील जिब्रान पढ़ाने का अफसोस मुझे उस दिन हुआ था जब उसने सरे बाजार मेरे गिरेबां में भी झांक लिया।
दरअसल हुआ यह था कि हम लोग एक खोखे में बैठ कर चाय पी रहे थे। उसकी बातों से मैं प्रभावित था। उसकी तमाम नाकाम कोशिशों के बावजूद उसके होंसले में कोई कमी नहीं आई थी। उसे विश्वास था कि भले ही देर से सही पर इस देश में क्रांति का जन नायक वहीं होगा। जिस दिन उसकी आवाज आवाम तक पहुंचेगी- लोकतंत्र के सारे संदर्भ बदल जाएंगें। खलील जिब्रान को मैंने भी पढ़ा था। पर अपने होशों हवास पर काबू रख कर। इसीलिए मैंने उसे समझाने के लिए एक कविता की कुछ पंक्तियां सुनाई थी।
कविता सुनकर वो मुझे निस्पृह भाव से घूरता रहा था फिर अचानक उसका चेहरा तमतमा गया। वो लगभग चीखते हुए स्वर में बोला
"तुम साले लेखक अपने को तुर्रम खां समझते हो। जो तुमने कह दिया वही सच हो गया। अरे तुम्हारे बड़े-बड़े आलोचक पैसा लेकर किताबों को अच्छा बुरा कहते हैं। तुम्हारे जनवादी सम्पादक पैसे के लिए भगवा सरकार के विज्ञापन छापते हैं और तुम्हारे प्रगतिशील लेखक छपने और चर्चित होने के लिए इन्हीं सम्पादकों और आलोचकों की चप्पलें उठाते हैं।"
"तुम कुछ ज्यादा ही बहक रहे हो।" मैंने उसके आवेश को कम करने के लिए समझाने वाले स्वर में कहा
"बहके हुए तो तुम लोग हो। डिब्बा बंद मछली की तरह ठंडे और बासी। आम आदमी पर फिल्म बनाते हो और पैसा कमाते हो। पर आम आमदी को क्या मिलता है? आम आदमी पर कविता-कहानी लिखकर वाह-वाही लूटते हो- आम आदमी को क्या मिलता है? नंगी-भूखी तस्वीरें बनाकर अंतर्राषट्रीय हो जाते हो- आम आदमी को क्या मिलता है? अरे तुम लोग तो पैरासाईट हो - पैरासाईट।"
"पागल हो गए हो तुम सोचते हो कि खलील जिब्रान पढ़कर समाज बदल दोगे? सनकी हो तुम।"
मुझे उसके व्यवहार पर गुस्सा आ गया था। पर यह सच है कि यदि मैं जानता कि उसके पिटारे में हमारा सच भी छुपा है तो मैं इस चर्चा को आरम्भ ही नहीं करता।
"खलील जिब्रान पढ़ कर नहीं- खलील जिब्रान बनकर।" तमतमाता हुआ उसका चेहरा अचानक हंसने लगा थां पर इसे अपमान की चुभन कहें या सच का नश्तर! मैं हंस नहीं सका था। मुझे पहली बार अफसोस हुआ था कि मैंने पढ़ने के लिए उसे खलील जिब्रान क्यो दिया था। दो वक्त की रोटी कमाकर वो एक सीधी साधी जिंदगी बिता रहा था, मैंने उससे रोटी भी छीन ली थी और जिंदगी भी। अब उसके पास बेचैनी, कुढ़न और क्रोध के सिवा और कुछ नहीं था। उससे सहानुभूति होते हुए भी अब मैं उससे कतराने लगा था।
इस घटना के बाद उसने और कितने सच इठे किए थे- मैं नहीं जान पाया। पर मैंने उसके झोले को एक गट्ठर में बदलते हुए देखा। उस गट्ठर को उठाए हुए वो इतना हांफजाता कि रूक कर सुस्ताने लगता था पर गट्ठर को नीचे जमीन पर नहीं रखता था। उससे कतराने के बावजूद मुझे उससे सहानुभूति थी। द्राायद इसीलिए मैं उस दिन उससे नजर नहीं चुरा पाया।
"तुम इस गट्ठर को नीचे क्यों नही रख देते।" मैंने आत्मीय होने की तो चेष्टा की वो हंसा, फिर कड़वाहट की हद तक व्यंग्य भरे स्वर में बोला
"ताकी तुम इसे चुरा सको।"
"मैं क्या करूंगा तुम्हारा यह गट्ठर चुराकर?" मैंने खीझ कर कहा था।
"तुम्हारे लिखने के लिए इसमें तैयार शुद्ध माल है।"
उसकी यह निर्ममता मुझे अखर गई थी और मैंने उससे बोलना बंद कर दिया था।
पर मैं देख रहा था कि उसके जिस्म पर टिके कपड़ों की सिलाई उधड़ने लगी थी। उसकी खिचड़ी दाढ़ी बढ़ने लगी थी और उसके बाल लम्बे होकर बिखर गए थे। खलील जिब्रान पढ़ने से पहले तक झक काले उसके बाल अब आधे अधूरे सफेद हो चुके थे। उसका पूरा हुलिया एक बेतरतीब जिंदगी की नुमाईच्च बनकर रह गया था।
---और आज मैंने देखा कि वो घंटाघर पर चढ़ा हुआ खड़ा है और चिल्ला-चिल्लाकर लोगों को अपने पिटारे का सच बताने की कोशिश कर रहा है। उसकी आवाज शायद नीचे तक पहुँच भी जाती पर नीचे लगातार बढ़ती हुई भीड़ का शोर उसकी आवाज को गुम कर रहा था। चीखने के कारण उसके गले की नसें फूल कर चमकने लगी थीं। कनपटी पर तेज धड़कन के साथ मोटी नस फड़क रही थी। उत्तेजना के कारण चेहरा लाल हो चुका था। मेरे अलावा शायद ही कोई और समझ पाया हो कि वो खलील जिब्रान के एक उपन्यास में मठ से निकाले गए पात्र की तरह व्यवहार कर रहा था। वो भीड़ को आंदोलित करना चाहता था। उसकी पूरी कोशिश थी कि उसकी आवाज किसी तरह भीड़ तक पहुंच जाए।
पर भीड़ का सच उसके सच से अलग था। भीड़ उसके मकसद से अनजान, घंटाघर, पर चढे हुए एक पुतले को देख-देख कर उत्तेजित और अल्हादित हो रही थी। पुतला गिरा तो क्या होगा- नहीं गिरा तो क्या होगा? भीड़ की जिज्ञासा इससे अधिक और कुछ नहीं थी। पर उसके लिए संदर्भ बिल्कुल बदले हुए थे। उसे लगा था कि नीचे इठा हुई भीड़ उसके आह्वान पर एकत्रित हुई है। जब वो एक हाथ उठा कर भीड़ को सम्बोधित करता तो भीड़ दोनों हाथ उठा देती। भीड़ समझती थी कि उसका हाथ उठाना-घंटाघर से कूदने की तैयारी है। इसलिए भीड़ उसे रोकने के लिए अपने दोनों हाथ उठा लेती।
वो खुशी से झूम उठा! उसे लगा कि भीड़ तक उसकी आवाज और उसका मकसद पहुँच रहे हैं। अब उसने अपने पुलिंदे की गांठ खोलना शुरू कर दी थी और भीड़ के और करीब आने के लिए घंटाघर के छज्जे पर उतरने की कोच्चिच्च करने लगा था। तभी सामने से उसके ऊपर पानी की तेज बोछार हुई और वो पीछे हट गया। उसने दांई और मुड़ने की कोशिश की तो उस ओर भी पानी की तेज बोछार थी। मैंने देखा दमकल की गाड़ियों ने घंटाघर को चारों ओर से घेर लिया था। वो जिस तरफ भी हिलता उसी ओर बोछार शुरू हो जाती। पानी की धार इतनी तेज थी कि वो जब भी उससे टकराता- गिर पड़ता। फिर एका-एक चारों ओर से एक साथ पानी की तेज धार उस पर पड़ने लगी। मैंने देखा सच के पुलिंदे को पेट से चिपका कर वो ऊकडू बैठ गया है। वो उसे गीला होने से बचाना चाहता था। दमकल वालों के लिए इतना मौका काफी था। लम्बी सीढ़ियां घंटाघर पर छा गईं और बीसियों आदमियों ने उसे दबोच लिया।


अगली सुबह अखबार पढ़ते हुए मैं चौंक गया। पुलिस ने दावा किया था कि उसके पास से अनेक आपत्तिजनक दस्तावेज मिले थे। पुलिस को शक था कि उसके सम्बंध किसी नक्सलवादी पड़ोसी मुल्क से थे और वो देश में अशांति उत्पन्न करना चाहता था। सच्चाई जानने और उसके साथियों का पता लगाने के लिए पुलिस ने उसे पोटा में निरूद्ध कर दिया था।
मेरा शरीर कांपने लगा। हाथ में पकड़ा चाय का गिलास मेज पर रखकर मैं धीरे-धीरे सिर को दबाने लगा। बात यहाँ तक पहुँच सकती है- इसका तो मुझे अंदाज ही नहीं था। मैं तो यही मान कर चल रहा था कि पुलिस उसे सुबह से शाम तक थाने में बिठाएगी, दो चार झांपड़ रसीद करेगी और छोड़ देगी। किसी सिर फिरे के साथ और किया भी क्या सकता था। परंतु यहाँ तो पूरा घटना क्रम ही नाटकीय तरीके से बदला गया था।
उसे छुड़ाने के लिए मैं पूरा दिन अपने सम्पर्का और सम्बंधों को भुनाने की कोच्चिच्च करता रहा। पुलिस कप्तान से लेकर आई जी पुलिस तक से मिला। कलैक्टर और कमीश्नर को दुहाई दे देकर सच समझाया। विधायक और सांसद को विश्वास में लेने की कोशिश की पर सब बेकार। अब तो जनता भी पुलिस की बनाई कहानी पर चटकारा ले रही थी।
रात गए मैं कमरे पर लौटा तो निढ़ाल हो चुका था। मैं समझ चुका था कि कहीं से भी मदद की कोई उम्मीद करना बेकार है क्योंकि उसके पास सच का जो हमाम था उसमे नंगे खड़े लोग भला उसकी मदद कैसे कर सकते थे।
हर ओर से हताश और निराश मैं बिजली बुझा कर पलंग पर लेट गया। पर तभी दरवाजे पर पड़ती दस्तक ने तंद्रा तोड़ दी। उठकर लाईट जलाई तो हक्का-बक्का रह गया। कमरे की हर खिड़की में संगीन तनी हुई थी।
---पुलिस को उसके जिस साथी की तलाश थी शायद वो उन्हें मिल गया था।

Wednesday, May 14, 2008

देश जो कि बाज़ार है

(मानवीय मनोभावों को बदलते मौसम के साथ व्याख्यायित करने में समकालीन हिन्दी कविता ने जीवन के कार्य व्यापार के अनेकों संदर्भों से अपने को समृद्ध किया है। कवि दुर्गा प्रसाद गुप्त की प्रस्तुत कवितायें ऐसी ही स्थितियों को रेखांकित करती हैं।

समकालीन रचना जगत में दुर्गा प्रसाद गुप्त जहॉं एक ओर अपनी सघन अलोचकीय दृष्टि के लिए जाना पहचाना नाम है, वहीं सुक्ष्म संवदनाओं से भरी उनकी कविताऐं एक प्रतिबद्ध रचनाकार के रचनात्मक सरोकारों का साक्ष्य हैं। वर्तमान में "हिन्दी उर्दू हिन्दुस्तानी" जैसे विषय से जूझ रहे दुर्गा प्रसाद गुप्त केन्द्रीय विश्वविद्यालय जामिया मिल्लिया इस्लामिया में हिन्दी के प्रोफसर हैं। हाल ही में "आस्थाओं का कोलाज" रामशरण जोशी के लेखों की प्रकाशित पुस्तक में सम्मिलित आलेखों का चयन और सम्पादन दुर्गा प्रसाद गुप्त ने किया है। इसके अलावा "आधुनिकतावाद", "अपने पत्रों में मुक्तिबोध", "संस्कृति का अकेलापन" उनकी अन्य प्रकाशित कृतियां हैं। कविता संग्रह "जहां धूप आकार लेती है" उनकी प्रकाशनाधीन कृति है।
)



कविता का बसंत


जाड़े के दिनों की तरह बसंत के दिन उदास नहीं होते
खिड़की के बाहर कुहासा नहीं होता
धूप आती-जाती-सी नहीं लगती, और न
जाडे वाली बारिश के दिनों की तरह
गलियों में कीच और ठंड होती है, पर
जाडे के दिनों में घर में कैद, चुप और खिन्न लोगों के बारे में
सोचती हैं वह लड़की, कि
बारिश और जाडे की नमी ने ही उसके भीतर चाहत पैदा की है बसंत की
वह बसंत की कामना बाहर नहीं, अपने भीतर करती है, और
एक दिन अपनी गर्म साँसों में पाती है, कि
बसंत अपनी सहजता में निस्पंद लहलहा रहा है उसके भीतर
किसी सुदंर की सृष्टि करता हुआ।



पागल होना ज़रूरी है


जो सहना नहीं जानते, वे पागल होते हैं, और
जो पागल होते हैं, वे ही सच को भी जानते हैं
सहने की हद तक जब कोई
किसी सच के खिलाफ किसी झूठ को सच बता रहा होता है
पागल उस सच को नहीं, झूठ को भूलना चाह रहा होता है
वह जानता है कि जो अधूरे पागल हैं वे पागलखाने के बाहर हैं, और
जो पूरे हैं वे पागलखाने के अंदर, पर
पागलखाने के बाहर रहना भी एक दूसरे को धोखा देना ही है

क्योंकि-
जिस देश में पागलखाने नहीं बढ़ते
वहाँ सच की उम्मीद भी नहीं बढ़ती।



देश जो कि बाज़ार है


बाज़ार चीज़ों को खरीदता और बेचता ही नहीं है
वह चीज़ों के साथ हमारे आत्मीय सम्बंधों को भी परिभाषित करने लगा है
वह चाहता है कि उसकी तिज़ारत में हमारे सुख-दु:ख भी शामिल हों
ताकि हमें भी लगे कि बाज़ार हमारे साथ और हमारे ही लिए हैं

बाज़ार ने हमें कुछ सिखाया हो या नहीं
कम-से-कम चीज़ों का उपभोग करना तो सिखा ही दिया है
जिस तरह फिल्मों ने हमें कम-से-कम नाचना गाना तो सिखा ही दिया है
इसीलिए बाज़ार के 'लाइव शो" में बदहाली और खुशहाली सब-
'रीमिक्स" हो नाचती हैं देश के लिए,
देश जो कि अब बाज़ार है।

Wednesday, May 7, 2008

मछलियां पकडने वाला तिब्बती खरगोश

(ल्वोचू खरगोश की कथा श्रंृखंला की यह अंतिम कड़ी है)


ल्वोचू खरगोश की कथा - चार

जाड़े का मोसम शुरु हो चुका था। चोटियों पर बर्फ पूरी तरह से जम चुकी थी और नदी का पानी जमने लगा था। सर्दी से बचने के लिए जानवर अपनी मांद में दुबककर बैठ गये थे। भूख से तड़फती नीले रंग की वो मादा भेड़िया, जिसके दो साथी खरगोश की योजनाओं के शिकार हो चुके थे, जो भी छोटा मोटा जीव दिख जाता उसे दौड़ भागकर धर दबोचती।
एक दिन ल्वोचू खरगोश बर्फ जमी नदी पर अपनी पूंछ को बर्फ पर पटकने का खेल खेल रहा था। लगातार खेलते हुए वह थक गया तो आराम करने लगा।
तभी उस नर भेडिये की छोटी बहन उस नीली मादा भेडिया ने दौड़कर उसके पास आयी और बोली, "ओ तू ही है वो हरामी जिसने मेरे भाई को चट्टान के नीचे फेंका और मेरी भाभी को नदी की तेज धारा में डुबोया। तुझे तो मैं आज छोडूंगी ही नहीं। वैसे भी मुझे जोर की भूख लगी है।" और वह खरगोश पर झपटी।
बर्फ में लुढ़कने के बाद जब खरगोश खड़ा हुआ तो उसने बड़े ही कोमल ढंग से मादा भेड़िया को प्रणाम किया, "हे भेड़िया कुमारी, आप क्यों ऐसा दोष मुझ पर मड़ रही हैं। मैंने सुना है कि धूप सेंकने वाले खरगोश ने आपके भाई को अंधा बनाया और स्वर्ग के वृक्ष पर सवार होने वाले खरगोश ने आपकी भाभी की हत्या की। मैं तो मछली पकड़ने वाला खरगोश हूं, किसी की हत्या करने के बारे में तो मैं कभी सोच भी नहीं सकता।"
मादा भेड़िया पर कोई असर न हुआ, "लेकिन फिर भी मैं तुझे छोडूंगी नहीं, चाहे तू हत्यारा है या नहीं।" और उसने अपने नुकीले पंजे खरगोश की ओर बढ़ा दिये।
खरगोश थोड़ा हड़बड़ा गया, "भेड़िया कुमारी, आप देखें तो सही मैं कितना दुबला पतला हूं। मुझमें तो एक चूहे के बराबर भी मांस नहीं। मुझे खाकर भी आपकी भूख शांत न होगी। यदि आप सच में भूखी हैं तो मैं आपके लिए मछलियां पकड़ देता हूं।"
मादा भेड़िया सचेत थी। उसने खरगोश के कान उमेठे, "तू कितना दुष्ट है, मैं अच्छे से जानती हूं। तेरे मुंह में पड़ी दरार बता रही है कि तू तो तू तेरे पूर्वज भी ऐसे ही दुष्ट रहे होगें। तुम खरगोश ही मेरे भाई और भाभी के हत्यारे हो। मुझे जल्दी बता कि तू मछलियां कैसे पकड़ता है ?"
खरगोश उसे उस स्थान पर ले गया जहां कुछ ही देर पहले उसने अपनी पूंछ को पटकने का खेल खेला था और बोला, "कुमारी भेड़िया, बर्फ में छेद बना मैं पूंछ को छेद में डाल देता हूं तो भूखी मछलियां मेरी पूंछ पर चिपट जाती हैं। तब मैं झटके से अपनी पूंछ को ऊपर खींचकर पूंछ पर चिपटी मछलियों को पकड़ लेता हूं।"
मादा भेड़िया की आंखें फटी की फटी रह गयी। "यह तो तूने खूब बताया।" बस फिर तो वह खरगोश के साथ पूंछ से बर्फ पर थपेड़े मारने लगी।
इस तरह से जब बर्फ में छेद हो गया तो खरगोश ने मादा भेड़िया से पूछा, "कुमारी जी, आपको छोटी मछली खाना पसंद है या बड़ी?"
"मुझे तो बड़ी मछलियां ही पसंद है।" मादा भेड़िया ने कहा।
खरगोश तुरंत बोला, "मेरी पूंछ तो छोटी है, इसलिए छोटी मछलियां ही पकड़ पाता हूं। आपकी पूंछ तो बहुत लम्बी है, बड़ी मछलियों को आप आसानी से पकड़ पायेगीं। क्यों न आप ही पहले पकड़े।"
खरगोश की चापलूसी भरी बातों से मादा भेड़िया खुश हुई। अपनी लम्बी पूंछ को उसने झट छेद में डाल दिया।
पास ही खड़ा खरगोश लयात्मक स्वर में गाते हुए छेद में पानी उड़ेलने लगा,
"काली मछली आआ
सफेद मछली आओ
छोटी मछली आओ
बड़ी मछली आओ
दौड-दौडकर आओ
सारी मछलियां आओ।"
थोड़ी ही देर में मादा भेड़िया की पूंछ सर्दी के कारण जमती हुई बर्फ से चिपक गयी। वह सोचने लगी कि मछलियों ने उसकी पूंछ को जकड़ा हुआ है, बस मन ही मन खुश होती रही।
खरगोश वहां से एक ओर को हट गया और शरीर तान खड़ा होते हुए मादा भेड़िया को लल्कारते हुए बोला, "ऐ, इस जंगल के पशुओं की शत्रु बता जब मैं घास पर धूप सेंक रहा था तो तेरा भाई मुझ पर क्यों झपटा ? मैंने ही उसकी आंखों पर सरेस चढ़ाया और उसे गहरी खायी में गिरने को उकसाया। जब मैं पेड़ पर खेल रहा था तो तेरी भाभी ने मुझे क्यों धमकाया ? उसे स्वग की यात्रा मैंने ही करायी। अभी अभी मैं बर्फ पर खेल रहा था तो तूने भी मुझे क्यों धमकाया ? अब तो तेरी भी मृत्यू तेरा इंतजार कर रही है। तुझे जो भी कहना अब जल्द से बोल ले। आज मैं अपने सभी साथियों का बदला तुझसे भी ले रहा हूं।" और नाचने लगा।
खरगोश को खुशी से नाचता देख मादा भेड़िया जोर से गुर्रायी। अपने शरीर की पूरी ताकत लगाकर उसने जैसे ही खरगोश पर झपटना चाहा, बर्फ में फंसी पूंछ के कारण उसकी पूंछ और कूल्हा एक साथ टूट गये। कुछ देर तक वह छटपटाती रही फिर उसने दम तोड़ दिया।
खुशी की खबर लिये, ल्वाचू खरगोश विजय गीत गाते हुए अपने दोस्तों को मिलने निकल पड़ा।

यदि इस कथा को सिलसिलेवार रुप से पढ्ना चाहते है तो एक एक कर क्रमवार पढें :

एक

दो

तीन

स्वर्ग के रास्ते पर खडा तिब्बती खरगोश

(ल्वोचू खरगोश की कथा श्रंृखंला की यह तीसरी कड़ी है। चौथी और अंतिम कडी भी प्रस्तुत की जायेंगी. इंतजार करें.)


ल्वोचू खरगोश की कथा - तीन

जंगल के बीच घास के मैदान में एक रोज एक चरवाहे ने नीले रंग की मादा भेड़िया को जब अपनी भेड़ के मेमने को मुंह में दबोचते देखा तो तुरन्त पत्थर फेंक कर मारते हुए जोर से चिल्लाया। मादा भेड़िया अकबका कर मेमने को वहीं छोड़ अपनी जान बचाने के लिए भागी। पीछे से दौड़ते हुए चरवाहे से बचने के लिए उसे मजबूरन घाटी में बहने वाली नदी में कूदना पड़ा।
नदी के उस पार पहुंचकर सुस्ताने के लिए वह एक चटटान पर चढ़ गयी। ठंडे पानी से बाहर निकल उसने धूप सेंकनी चाही। तभी उसने चटटान की धार पर उगे एक पेड़ पर झूलते ल्वोचू खरगोश को देखा।
उसकी निगाहें खरगोश पर अटक गयी। उसने गौर से देखा और पहचान लिया कि यह तो वही खरगोश है जिसने उसके पति को मार डाला था। दौड़कर उसने छलांग लगायी और खरगोश को दबोच लिया, "दुष्ट, तुझे तो मैं कब से ढूंढ रही हूं। तूने मेरे पति की हत्या की। आज मैं तेरी जान लूंगी।"
खरगोश ने गिरफ्त में फंसे हुए भी धैर्य नहीं खोया और बड़े ही आत्मविश्वास से कहा, "श्रीमती जी, ऐसा मजाक न करें। मैं तो अदना सा जानवर हूं। आप हिमाच्च्छादित पर्वत की शेरनी है। आप स्वंय सोचे अपने इस मुटठीभर शरीर से मैं आपके पति की हत्या कैसे कर सकता हूं। मुझे तो इस बात को सुनकर हंसी ही आ रही है।" क्षणांश की लिए ढीली हुई पकड़ के साथ ही खरगोश ने अपने बदन को इस तरह से छुड़ाया कि उछलकर सीधे पेड़ पर जा बैठा और वहीं से बोला, "श्रीमती जी मैं तो आकाशचर खरगोश हूं। इस स्वर्ग के वृक्ष पर सवार होकर जगह-जगह जा सकता हूं। मनुष्यलोक की गतिविधियों के बारे में मुझे कुछ भी मालूम नहीं। कृपया आप मुझ पर अपना गुस्सा न उतारें।"
मादा भेड़िया ने आश्यर्च से आंखों को पूरा खोलते हुए कहा, "क्या ---? तू स्वर्गलोक तक उड़ सकता है ?"
''जी, जी ---" इठलाते हुए खरगोश बोला, "वैसे तो मैं अभागा ही ठहरा पर पूरी तरह नहीं। मेरा जीवन तो बस इसी स्वर्ग के वृक्ष पर निर्भर रहता हूं। कलम मैं इस पर सवार होकर चांद पर गया था। वहां खूब खेला। आज स्वर्ग के मैंदान में जाऊंगा। स्वर्ग में देवता रहते हैं। ढेरों रत्न और तरह तरह के व्यंजन वहां आसानी से मिल जाते हैं। मैं अभी जा ही रहा हूं बस। आपको कुछ चाहिए तो मुझे बता दें। क्या आपके लिए भेड़ों की हडि्डयां या भैंस के मोटे मांस के कुछ टुकड़े ठीक रहेगें ?"
इतना सुनते ही भेड़ के मुह से लार टपकने लगी। वह सोचने लगी, "स्वर्ग में तो हडि्डयों और मांस का ढेर लगा होगा। वहां तो सोने और खाने को आसानी मिल जाता होगा। क्या एक बार मैं नहीं जा सकती वहां !"
उसने खरगोश को पेड़ से नीचे उतर आने को कहा और स्वंय पेड़ पर बैठ गयी और वहीं से बोली, "तू किस तरह पेड़ पर बैठकर उड़ता है, जल्द से जल्द मुझे बता!"
मायूसी भरे चेहरे से खरगोश उसे देखता रहा और फिर अपने दांतों से पेड़ की जड़ कुतरने लगा। पेड़ चट्टान के एकदम किनारे पर था. तना बाहर, खायी में झुलता हुआ। जड़ के कुतरने पर पेड़ मिट्टी छोड़ने लगा और बची रह गयी कुछ जड़ों के सहारे खायी की ओर लटक गया। मादा भेड़िया पेड़ पर लटकी झूला झूलने लगी।
खरगोश ने चिल्लाकर कहा, ''श्रीमती जी डरें नहीं। बस आप कुछ ही समय में स्वर्गलोक में पहुंच जायेगीं।"
बड़ी ही लयात्मक मधुर आवाज में उसने कहा, "एक-दो-तीन, अब आप अपने पांवों को नीचे की ओर लटका जोर का झटका दें।"
जैसे ही मादा भेड़िया ने पांवों को लटकाकर झटका दिया, वह पेड़ के साथ-साथ गहरी गर्त में बह रही नदी की तेज धारा में पहुंच गयी।

सूरमें वाला तिब्बती खरगोश

(ल्वोचू खरगोश की कथा श्रंृखंला की यह दूसरी कडी है। आगे ल्वोचू खरगोश की कथा की अन्य कड़ियां भी प्रस्तुत की जायेंगी.)
ल्वोचू खरगोश की कथा - दो

एक दिन लवोचू खरगोश घास के ढेर पर आराम से धूप सेंक रहा था। अचानक उसे वह बड़ा नर भेड़िया दिखायी दिया। खाजाने वाली मुद्रा में वह उसी की ओर बढ़ा आ रहा था। खरगोश ने तुरंत आस-पास की कीचड़ को आंखों की पलकों पर लेप लिया और एक पारदर्शी बर्फ के टुकड़े को आईना बना, उसमें बार-बार अपना मुंह देखने लगा।
खूंखार नर भेड़िये को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसन एक धप्प उसके सिर पर जड़ते हुए कहा, ''ओये, होठकटे ! यह तूने क्या लगाया हुआ है ?"
खरगोश ने भेड़िये की ओर निगाह उठा ऐसे देखा मानो इससे पहले उसने भेड़िये को देखा ही नहीं था। पिछली टांगों का उठा उसने तीन बार झुक-झुककर भेड़िये को प्रणाम किया और ज़वाब दिया - ''वनराज मैं अपनी आंखों पर सुरमा लेप रहा हूं।"
''लेप, मतलब ?" भेड़िये ने आश्चर्य व्यक्त किया।
छोटे खरगोश ने बर्फ का आईना नीचे रखते हुए गम्भीरता से कहा, ''वनराज, खरगोश होने के नाते हम बड़े अभागे हैं। हर दिन अपमानित होने को अभिशप्त। पेड़ के पत्ते झड़े तो हमें लगता है कि आकाश गिर रहा है। बस्स, डर के मारे हमारी चीखें निकलने लगती है। इसीलिए मैंने आंखों में लगाने का यह विलक्षण सूरमा बड़ी मेहनत से तैयार किया है। इसे अपनी आंखों पर लेप लेने के बाद मैं कई सौ ली की दूरी तक साफ देख लेता हूं। मेरी निगाहों चट्टानों के पार भी चली जाती हैं। इसीलिए उड़ने वाले के झप्पटटा मारने से पहले मैं अपने बिल में घुस जाता हूं। शिकारी कुत्ते के हमला करने पर पेड़ पर चढ़ जाता हूं। इस तरह से जान के पीछे पड़े इन दुश्मनों से बिना डरे मैं निश्चिंतता का जीवन बीताने लगा हूं।"
नर भेड़िया मन ही मन सोचने लगा, ''ओ, तो ये बात है। लोग ऐसे ही नहीं कहते कि जंगली खरगोश बुद्धिमान होते हैं। --- अगर मैं भी अपनी आंखों पर सूरमें का लेप चढ़ा लूं तो कहीं भी छिपे हुए शिकार पर साफ नजर रख पाऊंगा। इस तरह से छुपे बैठे शिकार को ढूंढने में जो खामखां की मेहनत मुझे करनी पड़ती है, उससे तो छुटकारा मिलेगा ही साथ ही कभी शिकार न मिल पाने की स्थिति में भूखा रह जाने की संभावना भी न रहेगी।"
चेहरे पर हल्की मुस्कान बिखेरते हुए उसने खरगोश से कहा, ''मैं न तो तुम्हारी बातों पर और न ही तुम्हारे इस विलक्षण सूरमें पर यकीन कर पा रहा हूं। हां, मेरी आंखों पर लगाओं तो मैं खुद ही देख लूंगा कि यह विलक्षण है या नहीं।"
घबराहट के भावों को चेहरे पर लाते हुए खरगोश ने कहा, ''नहीं महाराज, आंखों पर लेप लगाये बिना ही जब आप मेरे जैसे न जाने कितनों को मार कर खा दिया, सूरमें का लेप आपकी आंखों में लग जाने के बाद तो हम में से कोई भी बच न पायेगा।"
भेड़िये को क्रोध आ गया। गुरर्राते हुए बोला, ''सूरमे का लेप तो तुझे लगाना ही पड़ेगा। नहीं तो मैं तेरी जान ले लूंगा।"
खरगोश ने डरने और सहमने का नाटक करते हुए चिरौरी की, ''वनराज आप नाहक क्रोधित न हो। मैं जानता हूं कि आप हम खरगोशों का ख्याल रखते रहे हैं। लेकिन अभी मेरे पास सूरमा है ही नहीं। आप कल दोपहर में आ जायें मैं तब तक सूरमा तैयार कर लेता हूं।"
भेड़िया प्रसन्न हो गया और खरगोश को प्यार से थपथपाते हुए वह दूसरे दिन पहुंचने का वायदा कर वह शिकार के लिए आगे निकल गया। उस रात खरगोश ने दबे-छुपे तरह से एक बढ़ई के घर में घुसकर भैंस के चमड़े से बने सरेस को चुरा लिया। अगले दिन सुबह ही एक चमकदार पत्थर पर उसे रख दिया। धूप की गरमी से सरेस पिघलने लगा।
दोपहर तक नर भेड़िया आ पहुंचा। खरगोश को देखते ही उसने कड़कती आवाज में कहा, ''क्या हुआ सूरमें का।"
खरगोश हड़बड़ा गया। पिछले पैरों को उछालते हुए भेड़िये के आगे दंडवत होते हुए बोला, ''महाराज मैं तो कब से आपकी ही प्रतीक्षा कर रहा हूं। आईये बैठिये और अपना सुन्दर चेहरा सूरज की ओर कर आंखें बंद कर लीजिए। मैं आपकी कोमल आंखों पर सूरमें का लेप लगाता हूं।"
एक पत्थर पर बैठते हुए भेड़िये ने आंखे मूंद ली। पिघलचुकी सरेस को, घास-पत्तों और फलों के छिलके से बनाये ब्रश से, खरगोश ने भेड़िये की आंखों में परत चढ़ानी शुरु की। गरम पिघली हुई सरेस की चढ़ती परत ने सुखती हुई पपड़ी के साथ भेड़िये की आंखों को दुखाना शुरु किया तो कराहते हुए भेड़िया क्रोध से चिल्लाया, "हरामजादे ! तू मुझे धोखा दे रहा है।"
खरगोश ने उसकी आंखों में फूंक मारते हुए कहा, ''आपकी खिदमत कर पाना भी मुश्किल है वनराज। एक ओर तो आप कई ली दूर देखना चाहते हैं, और दूसरी ओर उसे हांसिल करने के लिए थोड़ा सा भी कष्ट नहीं चाहते। --- चलिये आप ठीक से बैठे मैं आपको खरगोशों का एक गीत सुनाता हूं।"
अब आंखों पर सरेस का लेप भी लगता जा रहा था और साथ ही साथ खरगोश के गीत का असर भी भेड़िये पर हो रहा था। वह मस्त होकर सिर हिलाता रहा। थोड़ी देर बाद उसकी आंखें पूरी तरह से सरेस से चिपक गयी। भेड़िये ने लेप का असर जानने के लिए आंखें खोलनी चाही तो खुली ही नहीं। खरगोश ने तुरंत टोका, ''जल्दी न कीजिये महाराज! थोड़ी देर ऐसे ही रहने दे। फिर मैं जब आपसे कूदने को कहूं तो तब आप झटके से आंखें खोले। ऐसे हवा में उछलकर जब आप अपनी आंखें खोलेगें तो कई सौ ली की दूरी पर स्थित चीजें आप को साफ चमकती हुई दिखायी देने लगेंगी।"
अब खरगोश भेड़िये को एक पहाड़ी के कगार पर ले गया। ऐसे मानों राजा को सहारा देता हुआ सिंहासन पर बैठाने ले जा रहा हो। कगार पर पहुंचकर बडे ही गीतात्मक लहजें में उसेने भेड़िये को कूदने को कहा, ''एक-दो-तीन, ऊपर उछलों महाराज! एक-दो-तीन ---"
भेड़िया पूरी ताकत से उछला। लेकिन आंखें खुलने से पहले ही वह गहरी घाटी में गिरकर मर चुका था।

Tuesday, May 6, 2008

छत से देखो दुनिया को


(पिछले दिनों से तिब्बत खबरों में है। कथाकार उदयप्रकाश तिब्बत के बारे में अपने ब्लाग पर कुछ ऐसा लिखते रहे हैं जो लोक का पुट लिये हुए है। 9 अप्रैल 2008 को जिसकी पहली कडी से हम परिचित हुए थे.
दुनिया की छत कहे जाने वाले, बर्फली चोटियों से घिरे तिब्बत में कथा गढ़ने और कथा कहने की परम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी रही है। तिब्बत के पारम्परिक लोक साहित्य, जिसमें पौराणिक कथाएं, मिथ, नीति कथाएं आदि हैं, का अथाह भंडार है. यहां प्रस्तुत है तिब्बत की लोक कथा। ल्वोचू खरगोश की कथा श्रंृखंला की यह पहली कड़ी है। आगे ल्वोचू खरगोश की कथा की अन्य कड़ियां भी प्रस्तुत की जायेंगी।)

ल्वोचू खरगोश की कथा - एक

यालूत्साङपो नदी के तटवर्ती वन में एक घास का मैदान था। वहां झरने कलकल बहते थे, रंगबिरंगे फूल खिलते थे और नाना प्रकार के कुकुरमुत्ते उगते थे। बहुत से छोटे पक्षी और जंतु नाचते-गाते और क्रीड़ा करते हुए बहुत ही खुश रहते थे। एक दिन ऊंचे पहाड़ के पार से दौड़ते हुए तीन भेड़िए वहां आए। उनमें एक नर और दो मादा थे। नर भूरे रंग का और दोनों ही मादाओं का रंग नीला था। जंगल के बीच घास के मैदान में पहुंचते ही उन तीनों के ही मुंह से निकला, ''वाह, यह जगह तो बहुत ही सुन्दर है! हमें यहां खाने पीने की तंगी भी न रहेगी। यहीं अपना घर बना लेते है।"
बस उसी वक्त से वन अशांत और असुरक्षित हो गया। आज मुर्गी का बच्चा खो गया, तो कल कोई सुनहरी मादा हिरन गायब हो गयी। लम्बे समय से रह रहे छोटे-छोटे पक्षी और छोटे जानवर मुसिबत में फंस गये। कुछ वहां से भागकर कहीं दूसरी जगह पर शरण लेने को मजबूर होने लगे। जो कहीं और जा पाने की स्थिति में न थे गुफाओं में छिपने लगे, ऊंचे-ऊंचे पेड़ों पर घोंसला बनाने लगे। दिन दोपहरी में डरते रहते और रात के अंधेरें में तो बाहर निकलने का साहस ही नहीं करते।
वहीं एक छोटा खरगोश भी रहता था, जिसका नाम ल्वोचू था। उसने न तो भागकर कहीं और शरण लेनी चाही और न ही कहीं छुप जाना उसे उचित लगा। हिंसक भेड़ियों से निपटने के लिए वह वहीं रुका रहा और कोई कारगर उपाय सोचने लगा।

तिब्बती लोक कथाओं को आप यहां भी पढ़ सकते हैं -
tibetan folk tales
digital library of tibetan folk tales
folktales from tibet

Saturday, May 3, 2008

ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं

विजय गौड
(बेशक हम कोई इतिहासविद्ध नही तो भी यह तो कह ही सकते हैं कि सत्ता के लिए खूनी संघर्ष से भरे सामंतों के आपसी झगड़े और उनकी वंशावलियों की सांख्यिकी से भरी इतिहास की पाठ्य-पुस्तकें ऐतिहासिक दृष्टि से इस देश की भौगोलिक, सांस्कृतिक और सामाजिक स्थिति को समुचित रुप से रख पाने में अक्षम हैं। उत्तरोतर भारत के बारे में हमारे पास बहुत ही सीमित जानकारी है। वहां रहने वाले लोगों का इतिहास क्या नृशंस आक्रमणों से जान बचाकर भागे हुए लोगों का इतिहास है ? पश्चिम भारत को हड़प्पा और मोहनजोदड़ों के बाद हमने खंगाला है क्या ? दक्षिण भारत में क्या एक ही दिन में विजय नगर राज्य की स्थापना हो गयी ? सिंहली और तमिलों के विवाद की जड़ कहां है ? नागा, कुकी और मिजो जन-जाति की संस्कृति को हम कैसे जान पायेगें ? जंगलों के भीतर निवास करने वाले लोगों से हमारा रिश्ता कैसा होना चाहिए ?- ऐसे ढेरों सवालों की जद में 2 जुलाई 2006 को हिमाचल की कांगड़ा घाटी से चम्बा घाटी की ओर शिवालिक ट्रैकिंग एवं क्लाईम्बिंग ऐसोसियेशन, आर्डनेंस फैक्ट्री देहरादून का एक नौ सदस्य अभियान दल अपने 15 दिन के अभियान पर मिन्कियानी-मनाली पास से गुजरते हुए कांगड़ा और चम्बा के गदि्दयों के जीवन को जानने-समझने निकला था। - पर्यटक स्थल धर्मशाला तक की यात्रा बस द्वारा की गयी। धर्मशाला के बाद मैकलोडगंज तक की यात्रा जीप से उसके बाद पैदल मार्ग शुरु होता है। मैकलोडगंज शरणार्थी तिब्बतियों का मिनी ल्हासा है, जहां दलाई लामा रहते हैं। नाम्बग्याल मोनेस्ट्री में। अपनी कसांग के साथ। मैकलोडगंज की संस्कृति में तिब्बत की हवा है। उसी यात्रा पर लिखे संस्मरण का एक छोटा सा हिस्सा और ऐसी ही अन्य यात्राओं के अनुभवों से सर्जित एक कविता भेड़ चरवाहे यहां प्रस्तुत है।)

भटकते हुए

आकाश की ओर उछाल लेती हुई या पाताल की ओर को बहुत गहरे गर्त बनाती हुई समुद्र की लहरों पर हिचकोले खाने का साहस ही समुद्र के भीतर अपनी पाल खोल देने को उकसा सकता है। अन्जान रास्तों की भयावता और अन्होनी की आशंका में आवृत दुनिया का नक्शा नहीं बदल सकता था, यदि वे सिरफिरे, जो सुक्ष्म विवरों के गर्भग्रह की ओर लगातार खिसकती पृथ्वी के खात्मे की आशंका से डरे आत्मा की खोज में जुटे अपनी-अपनी कुंडलिनी को जागृत कर रहे होते। घर, जनपद या राज्यों की सरहदों के किवाड़ ही नहीं थल के द्वार पर लगातार थपेड़े मारते अथाह जलराशि से भरे समुद्र में उतर गये। वास्कोडिगामा रास्ता भटकने के बाद भारत पहुंचा। कोलम्बस ने एक और दुनिया की खोज की। यह भी सच है कि ऐसा करने वाले वे पहले नहीं थे, पर इस बिना पर उनको सलाम न करें, ऐसा कहना तो दूर, सोचने वालों से भी मैं हमेशा असहमत ही रहूंगा। ह्वेनसांग, फाहयान, मेगस्थनीज की यात्रा इतिहास के पन्नों में दर्ज है और समय विशेष की प्रमाणिकता को उनके संग्रहित तथ्यों में ढूंढ़ते हुए कौन उसके झूठ होने की घोषणा कर सकता है ?

प्रार्थनारत बौद्धिष्टों की अविकल शान्ति

मैकलोडगंज हमारे रास्ते पर बस रूट का आखिरी क्षेत्र था। जब मैकलोडगंज में थे तो आधुनिकता की रंगीनियों में टहलते भारतीय और योरोपिय सैलानियों के खिलंदड़ चेहरों में आक्रामक किस्म का एक हास्य देख रहे थे। बौद्ध गोम्पा में प्रार्थनारत बौद्धिष्टों की अविकल शान्ति सुन रहे थे। अभी कांगड़ा के दुर्गम इलाकों में रहने वाले गदि्दयों के गांवों से गुजर रहे हैं तो देख रहे हैं कि दो सामांतर दुनिया साथ-साथ चल रही हैं।

गदि्दयों का भौगोलिक प्रदेश

हमारा घूमना इन दोनों रेखाओं पर तिर्यक रेखा की तरह अंकित हो तो शायद कह पायें कि गदि्दयों के इस भौगोलिक प्रदेश की तकलीफों को एक सीमा तक जान समझ पायें। शायद इसीलिए निकले हैं। अपनी भेड़ों के साथ जीवन संघर्ष में जुटे उस अकेले भेड़ चरवाहे के मार्ग पर बढ़ते हुए, उसके पदचिन्हों और भेड़ बकरियों की मेंगड़ी की सतत गतिशील रेखा के साथ-साथ नदी नालों को टापते हुए, घुमावदार वलय की तरह ऊपर और ऊपर बढ़ते रास्तों के साथ हम मिन्कियानी दर्रे की ओर बढ़ते रहे। मिन्कियानी दर्रे के पार ही खूबसूरत चारागाहों के मंजर की तलाश भेड़ चरवाहों की ख्वाहिश है। पसीने से चिपचिपाये बदन, जो खुद हमारे ही भीतर घृणा बो रहे हैं, उन हरियाले चारागहों पर लौटने को हैं आतुर।
मिन्कियानी के रास्ते पर बादल घाटियों से उठते तो कभी चोटियों से उतरते। इस चढ़ने और उतरने की प्रक्रिया में शायद कभी सुस्ताते तो घने कोहरे में ढक जाते। थोड़ी दूर पर छूट गये अपने साथी को भी हम पहचान नहीं सकते थे।

बादलों का यह खेल ही तो उकसाता है

बादलों का ऐसा ही खेल एक बार फिरचेन लॉ पर देखा था। फिरचेन लॉ जांसकर घाटी में उतरने का एक रास्ता है जो बारालचा पास के बाद सर्चू से पहले यूनून नदी के साथ आगे बढ़ते हुए फिर खम्बराब दरिया को पार कर पहुंचता है। उस समय जब खम्बराब को पार कर विश्राम करने के बाद अगले दिन तांग्जे के लिए निकले तो ऊंचाई दर ऊंचाईयों को ताकते हुए बेहद लम्बे फिरचेन लॉ को पार करने लगे। ऊंचाईयों की वह ऐसी लड़ी थी कि किसी एक को भी पार करने के बाद दिखायी देता विशाल मैदान। जब मैदान के नीचे की उस ऊंचाई को पार कर रहे होते तो शायद थका देने वाले चढ़ाई ही ऐसी रही होगी कि उसे पार करने की हिम्मत इसी बात पर जुटाते रहे हों कि शायद इस ऊंचाई पर ही होगा फिरचेन लॉ उसके बाद तो फिर फिसलता हुआ ढाल मिल ही जाना है। पर अपनी पुनरावृत्ति की ओर लौटती अनगिनत श्रृंखलाबद्ध ऊंचाईयों ने न सिर्फ शरीर की ताकत निचोड़ ली बल्कि एकरसता के कारण ऊबा भी दिया था।

कौन होगा मार्गदर्शक

मौसम भी साफ नहीं था। बादल कहीं चोटियों से उतरते और हमें ढक लेते। उस वक्त रास्ते का मार्ग दर्शक, हमारा साथी नाम्बगिल अपने घोड़ों के साथ आगे निकल चुका था। अन्य साथी भी आगे जा चुके थे। सतीश, मैं और अनिल काला ही पीछे छूटे हुए थे। मैं और सतीश बिल्कुल पीछे और अनिल काला हमारे आगे-आगे। जिस वक्त वह ऐसी ही एक चढ़ाई के टुक पर था और हम उससे कुछ कदम नीचे तभी अचानक तेज काले बादलों का झुण्ड कहीं से उड़ता हुआ आया। शायद तेज गति से नीचे उतरा होगा तभी तो जब हम तक पहुंचा, शायद थक चुका था और कुछ देर विश्राम करने के लिए हमें घेर कर खड़ा हो गया। फिरचेन लॉ का टॉप नजदीक ही था, जिसका कि उस वक्त हमें आभास नहीं था, क्यों कि पुनरावृत्ति की ओर लौटती ऊंचाईयों ने हमारे भीतर उसके जल्दी आने की कामना को शायद खत्म कर दिया था और हम सिर्फ इस बिना पर चलते जा रहे थे कि जहां पहुंच कर नाम्बगिल हमारा इंतजार कर रहा होगा, मान लेगें कि वही टॉप है। इस तरह से टॉप पर बहुत जल्दी पहुंच जायें- जैसी कामना जो हमें उसके पास न पहुंच पाने पर थका देने वाली साबित हो रही थी, उससे एक हद तक हम मुक्त हो चुके थे और अनगिनत लड़ियों से भरी इन ऊंचाईयों को पार करने की ठान कर बढ़ते चले जा रहे थे। काले घने बादलों के उस घेरे में हम पूरी तरह से ढक चुके थे। चारों ओर अंधेरा छा गया था। अंधेरा ऐसा कि बैग में रखे टॉर्च को भी नहीं खोज सकते। भयावह अंधेरा जिसमें हवायें सन-सना रही थी। सतीश और मैं साथ थे इसलिए हिम्मत बांधें बढ़ते रहे। पर हमसे कुछ ही फुट आगे चल रहा अनिल काला गायब हो चुका था। आंखों को फाड़-फाड़ कर भी देखे तो भी कुछ दिखायी नहीं दे रहा था। हाथों के स्पर्श के सहारे ही हम एक दूसरे को देख पा रहे थे। काला किस दिशा में बढ़ा होगा, हम दोनों ही चिन्तित हो गये। गला फाड़-फाड़ कर पुकारने लगे। हवा इतनी विरल थी कि हमसे कुछ ही दूरी पर अंधेरे के बीच आगे बढ़ रहे अनिल काला को सुनायी नहीं पड़ रही थी। अपनी पुकार का प्रत्युतर न पा हम अन्जानी आशंकाओं से घिर गये। बस बदहवास से चिल्लाते हुए आगे बढ़ते रहे, उस ओर को जिधर उसके जूते के निशान, जो हल्की-हल्की गिरती हुई नमी से गीली हो चुकी धरती पर बेहद मुश्किलों से खोजने पर, दिखायी पड़ रहे थे। तभी अंधेरा छंटने लगा। आवाज लगाते हुए, पांवों के निशान के सहारे हम पास के एकदम नजदीक पहुंच चुके थे। पास पर पहुंचे हुए अन्य साथियों के साथ अनिल काला भी वैसी ही अन्जानी आशंकाओं से घिरा हमारा इंतजार कर रहा था। दूसरे साथियों के पद-चिन्ह उसका भी मार्ग दर्शन करते रहे थे।

भेड़ चरवाहे
एक
लकड़ी चीरान हो या भेड़ चुगान
कहीं भी जा सकता है
डोडा का अनवर
पेट की आग रोहणू के राजू को भी वैसे ही सताती है
जैसे बगौरी के थाल्ग्या दौरजे के
वे दरास में हों

रोहतांग के पार या,
जलंधरी गाड़ के साथ-साथ
बकरियों और भेड़ों के झुण्ड के बीच
उनके सिर एक से दिखायी देते हैं

बेशक विभिन्न अक्षांशों पर टिकी धरती
उनके चेहरे पर अपना भूगोल गढ़ दे
पर पुट्ठों पर के टल्ले तो एक ही बात कहेगें

दो
ऊंचे पहाड़ों पर देवता नहीं चरवाहे रहते हैं
भेडों में डूबी उनकी आत्मायें
खतरनाक ढलानों पर घास चुगती हैं

पिघलती चोटियों का रस
उनके भीतर रक्त बनकर दौड़ता है
उड्यारों में दुबकी काया

बर्फिली हवाओं के
धार-दार चाकू की धार को भी भोंथरा कर देती है
ढंगारों से गिरते पत्थर या,तेज उफनते दरिया भी

नहीं रोक सकते उन्हें आगे बढ़ने से
न ही उनकी भेड़ों को

ऊंचे- ऊंचे बुग्यालों की ओर
उठी रहती हैं उनकी निगाहें
वे चाहें तो किसी भी ऊंचाई तक ले जा सकते हैं भेड़ों को

पर सबसे वाजिब जगह बुग्याल ही हैं
ये भी जानते हैं

ऊंचाईयों का जुनून
जब उनके सिर पर सवार हो तो भी
भेड़ों को बुग्याल में ही छोड़
निकलता है उनमें से कोई एक
बाकि के सभी बर्फ से जली चट्टानों की किसी खोह में
डेरा डाले रहते हैं
बर्फ के पड़ने से पहले तक

भेड़ों के बदन पर चिपकी हुई बर्फ को
ऊन में बदलने का खेल खेलते हुए भी रहते हैं बेखबर
कि उनके बनाये रास्ते पर कब्जा करती व्यवस्था जारी है,
ये जानते हुए भी कि रुतबेदार जगहों पर बैठे

रुतबेदार लागे
उन्हें वहां से बेदखल करने पर आमादा हैं,
वे नये से नये रास्ते बनाते चले जाते हैं
वहां तक
जहां, जिन्दगी की उम्मीद जगाती घास है
और है फूलों का जंगल

बदलते हुए समय में नक्शेबाज दुनिया ने
सिर्फ इतनी ही मद्द की
कि खतरनाक ढाल के बाद
बुग्याल होने का भ्रम अब नहीं रहा
जबकि समय की नक्शेबाजी ने छीन लिया बहुत कुछ
जिस पर वे लिखने बैठें
तो भोज-पत्रों के बचे हुए जंगल भी कम पड़ जायेगें

भोज-पत्रों के नये वृक्ष रोपें जायें
पर्यावरणवादी सिर्फ यही कहेगें

उनके शरीर का बहता हुआ पसीना
जो तिब्बत के पठारों में
नमक की चट्टान बन चुका गवाह है
कि सुनी घाटियों को गुंजाते हुए भी
अनंत काल तक गाते रहेगें वे
दयारा बुग्याल हमारा है
नन्दा देवी के जंगल हमारे हैं
फूलों की घाटी में पौधों की निराई-गुड़ाई
हमारे जानवरों ने अपने खुरों से की है

Thursday, May 1, 2008

आकर हरी घाटी में बस गयी सरकार, लेकिन डर लगता है

अपने स्थापना दिवस 1 मई के अवसर पर देहरादून की नुक्कड नाट्य संस्था दृष्टि ने गांधी पार्क, देहरादून में एक कार्यक्रम का आयोजन किया। इस अवसर पर कविताओं की पास्टर प्रदर्शनी लगायी गयी और दो कवियों, जिनमें दलित धारा के कवि ओम प्रकाश वाल्मीकि एवं युवा कवि राजेश सकलानी के काव्य पाठ का आयेजन किया गया।
दृष्टि, देहरादून की स्थापना 1983 में हुई थी। वर्ष 2008 को दृष्टि ने रजत जयंति वर्ष के रुप में मनाते हुए इस कार्यक्रम का आयोजन किया। पिछले 25 वर्षो में जनपक्षधर संस्कृति के सवालों के साथ स्थानीय स्तर पर दृष्टि ने देहरादून ही नहीं बल्कि समूचे उत्तराखण्ड में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन की लड़ाई के दौरान उत्तराखण्ड सांस्कृतिक मोर्चे के गठन में दृष्टि की केन्द्रीय भूमिका रही।
आयेजित कार्यक्रम में हिन्दी के वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना जो पिछले दो वर्षो से देहरादून में रह रहे हैं, के साथ-साथ कथाकार विद्यासागर नौटियाल, सुभाष पंत, जितेन ठाकुर, गुरुदीप खुराना, गढ़वाली कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर एवं घूमंतू निरंजन सुयाल, कुसुम भट्ट, कृष्णा खुराना, सीपीआई के उत्तराखण्ड महासचिव समर भंडारी, जगदीश कुकरेती और कई ट्रेड यूनियन कार्यकर्ता एवं अन्य कविता प्रेमी श्रोता और दर्शक मौजूद थे।