Friday, January 23, 2009

दोर्जे गाईड की बातें



रोहतांग
बर्फ से ढका हुआ है। लाहौल में जनजीवन की हलचल को जानने के लिए टेलीफोन के सिवा कोई दूसरा रास्ता दिखाई देता है। केलांग लाहुल का हेडक्वार्टर है जहां हमारे प्रिय कवि अजेय रहते है। फोन की घंटी बजती है, देखता हूं अजेय का नाम उभर रहा है। बर्फ की दीवार के पार से सीलन भरे मौसम की खामोशी को तोड़ती अजेय की आवाज सुनायी देती है। कुछ मौसम की, कुछ अपनी कारगुजारियों की और एक हद तक साहित्य की दुनिया की हलचलों पर बातें होती हैं। रोहतांग की सरहद के पार से दुनिया जहान की हलचलॊं के साथ हिस्सेदारी की बेचैनी से भरा अजेय बताता है कुछ कविताएं लिखी हैं उसने इस बीच। पर उन पर काम होना अभी बाकी है। जब तक कवि उन्हें मुकम्मल करे तब तक के लिए अजेय की कुछ चुनिंदा कविताओं को यहां सबके पढ़ने के लिए रख दिया जा रहा है। पढ़ें अपनी कविताओं के बारे में अजेय का कहना है-


''कविता मेरे लिए आत्माभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मैं अपनी कविताओं द्वारा अपने पहाड़ी जनपद की उस सैलानी -छवि को तोड़ना चाहता हूं जो मेरे बर्फ़ीले जनपद को रहस्यभूमि (वंडरलेंड) बना कर पेश करते हैं। मैं यह बताना चाहता हूं कि यहां भी लोग शेष विश्व के पिछड़े इलाकों और अनचीन्हे जनपदों के निवासियों की भांति सुख-दुख को जीते हैं-पीड़ाओं को झेलते और उनसे टकराने वाले लोग बसते हैं। जिनके अपने छोटे-छोटे सपने और अरमान हैं। हम और अध्कि रहस्य, रोमांच, मनोरंजन अथवा शो-पीस बनकर चिड़ियाघर या अजायबघर की वस्तु बन कर नहीं जीना चाहते।"

अजेय

कविता खत्म नहीं होती
(मेन्तोसा1 पर एडवेंचर टीम)

पैरों तक उतर आता है आकाश
यहां इस ऊँचाई पर
लहराने लगते हैं चारों ओर
मौसम के धुंधराले मिजाज़
उदासीन
अनाविष्ट
कड़कते हैं न बरसते
पी जाते हैं हवा की नमी
सोख लेते हैं बिजली की आग।

कलकल शब्द झरते हैं केवल
बर्फीली तहों के नीचे ठंडी खोहों में
यदा-कदा
अपने ही लय में टपकता रहता है राग।

परत-दर-परत खुलते हैं
अनगिनत अनछुए बिम्बों के रहस्य
जिनमें सोई रहती है ज़िद
छोटी सी
कविता लिख डालने की।

ऐसे कितने ही
धुर वीरान प्रदेशों में
निरंतर लिखी जा रही होगी
कविता खत्म नही होती,
दोस्त ....................
संचित होती रहती है वह तो
जैसे बरफ
विशाल हिमनदों में
शिखरों की ओट में
जहाँ कोई नही पहुँच पाता
सिवा कुछ दुस्साहसी कवियों के
सूरज भी नहीं।

सुविधाएं फुसला नही सकती
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे
लेकिन हैं अड़े
संवेदना के पक्ष में
गलत मौसम के बावजूद
छोटे-छोटे अर्द्धसुरक्षित तम्बुओं में
करते प्रेमिका का स्मरण
नाचते-गाते
घुटन और विद्रूप से दूर

दुरूस्त करते तमाम उपकरण
लेटे रहते हैं अगली सुबह तक स्लीपिंग बैग में
ताज़ी कविताओं के ख्वाब संजोए
जो अभी रची जानी हैं।


1. लाहुल की मयाड़ घाटी में एक पर्वत शिखर(ऊँचाई 6500मी0)


गाँव में चक्का तलाई

मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।
गुज़र गई है एक धूल उड़ाती सड़क
गाँव के ऊपर से
खेतों के बीचों बीच
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
लाद ले जाती हैं शहर की मंडी तक
नकदी फसल के साथ
मेरे गाँव के सपने
छोटी छोटी खुशियाँ --
मिट्टी की छतों से
उड़ा ले गया है हेलीकॉप्टर
एक टुकड़ा नरम धूप
सदिZयों की चहल पहल
ऊन कातती औरतें
चिलम लगाते बूढ़े
`छोलो´ की मंडलियाँ
और विषअमृत खेलते बच्चे।
टीन की तिरछी छतों से फिसल कर
ज़िन्दगी
सिमेंटेड मकानों के भीतर कोज़ी हिस्सों में सिमट गई है
रंगीन टी वी के
नकली किरदारों में जीती
बनावटी दु:खों में कुढ़ती --
´´कहाँ फँस गए हम!
कैसे निकल भागे पहाड़ों के उस पार?´´
आए दिन फटती हैं खोपड़ियाँ जवान लड़को की
बहुत दिन हुए मैंने पूरे गाँव को
एक जगह/एक मुद्दे पर इकट्ठा नहीं देखा।
गाँव आकर भूल गया हूँ अपना मकसद
अपने सपनों पर शर्म आती है
मेरे सपनों से बहुत आगे निकल गया है गाँव
बहुत ज्यादा तरक्की हो गई है
मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।


आलू का सीज़न

गोली मार टरक को यार।
अब तो रात होने को है
ठंड भी कैसी है
कमबखत
वो सामने देखते हो लेबर कैम्प
सोलर जल रहा जहाँ
मेटनी के तम्बू में
चल , दो घूंट लगाते हैं
जीरे के तड़के वाली
फ्राईड मोमो के साथ
गरमा जाएगा जिसम
गला भी हो जाएगा तर
दो हाथ मांगपत्ता हो जाए
पड़े रहेंगें रात भर
सुबह तक पटा लेगें किसी उस्ताद को हज़ार पाँच सौ में
खुश हो जाएगी घरवाली।


छतड़ू में कैम्प फायर

ऐसे ही बैठे थे
`फायरप्लेस´ के सामने
हम पाँच छह जने
कि अचानक दीवार पर टंगी सूली से
उतर आया जीजस
चुपचाप हमारी बकवास में शमिल हो गया।

रात भर बतियाते रहे हम
अलाव तापते
बीयर के साथ
दुनियादारी की बातें
मौसम की
रंगों
कीट पतंगों की
आदमी की, पैसों की
कफ्र्यू और दंगों की
हँसता रहा पैगम्बर
रातभर।

अंतत:
सरूर में
पप्पू ने गिटार उठाई
शामू ने बाँसुरी
मैंने सीटी
स्वामी ने ताली बजाई
और झूमते हुए ईश्वर के बेटे ने गाया
एक सुन्दर यहूदी गीत-
``- - ईश्वर मरा नहीं
सो रहा है।´´


`ट्राईबल´ में स्की-फेस्टिवल

सन सन सर्र सर्र
बर्फ पर
चटख झंडे
लाल पीले नीले
मजेन्टा और पर्पल और फलॉरेसेन्ट बच्चे
पाऊडर स्कीईंग
वाह जी वाह!
अभी कल ही तो पड़ी है
पाँच-छह फुट समझो
इस बार तो
कुल मिलाकर
गाँव में बड़ी मस्ती है
उम्मीदें जगी है
बुजुर्गों ने कहा है बच जाएंगी फसलें ।
बड़ा महंगा होगा
नही शर्मा जी,
यह `इकुपमिंट´ ?
इंपोर्टिड.........
अच्छा, `स्मगल्ड´ है ?
वाह जी वाह!
मनाली वाले हैं
दो चार `इंस्ट्रक्टर´
कुछ `फोर्नर´
ये `फोर्नर´ भी बस ......
और ये छोकरू अपने
उनके पीछे-पीछे ।
वैसे एक बात कहूं सर,
यह एडवेंचर
और मस्ती-
स्वस्थ मनोरंजन है
`टॉनिक´ कहो `.......काइंड आफ´ ।
वही तो,
हमारे ऋषि मुनि
क्या करते थे दुर्गम कन्दराओं में ?
एडवेंचर तो
`हेल्दी थिंकिंग डिवलेप´ करता है जनाब ।
`एक्ज़ेक्टली सर !`
और कैसे पीके `गच्च´ रहते हैं
यहां के लोग
पिछली बार याद है
कितना नाचे थे
कपूर साब
रात भर `छंका`.........
और कैसी प्यारी-प्यारी लड़कियां आई थीं
दारचा से
वाह जी वाह!
गिल साब का भांगडा
जगह नहीं थी
हाँल में तिल धरने को ।
मैंने तो डी´स्साब से कहा
यह रौनक मेला लगे रहना चाहिए
ट्राईबल में
और क्या है
टाईम पास ।
हाँ जी, हाँ ।





केलंग
(सर्दियां -2004)

1/ हरी सिब्ज़याँ

`फ्लाईट´ में सब्ज़ी आई है
तीन टमाटर
दो नींबू
आठ हरी मिरचें
मुट्ठी भर धनियाँ
सजा कर रखी जाएँगी सिब्ज़याँ
`ट्राईबेल फेयर´ की स्मारिका के साथ
महीना भर
जब तक कि सभी पड़ोसी सारे कुलीग
जान न लें
फ्लाईट में हरी सिब्ज़याँ आई है।

2/ पानी

बुरे बक्त में जम जाती है कविता भीतर
मानो पानी का नल जम गया हो
चुभते हैं बरफ के महीन क्रिस्टल
छाती में
कुछ अलग ही तरह का होता है, दर्द
कविता के भीतर जम जाने का
पहचान में नहीं आता मर्ज़
न मिलती है कोई `चाबी´
`स्विच ऑफ´ ही रहता है अकसर
सेलफोन फिटर का।

3/ बिजली

`सिल्ट´ भर गया होगा
`फोरवे´ में
`चैनल´ तो शुरू साल ही टूट गए थे
छत्तीस करोड़ का प्रोजेक्ट
मनाली से `सप्लाई´ फेल है
सावधान
`पावर कट´ लगने वाला है
दो दिन बाद ही आएगी बारी
फोन कर लो सब को
सभी खबरें देख लो
टी. वी. पर
सभी सीरियल
नहा लो जी भर रोशनियों में खूब मल-मल
बिजली न हो तो
ज़िन्दगी अँधेरी हो जाती है।

4/ सड़कें

अगली उड़ान में `शिफ्ट` कर दिया जाएगा
`पथ परिवहन निगम´ का स्टाफ
केवल नीला टेंकर एक `बोर्डर रोड्स´ का
रेंगता रहेगा छक-छक-छक
सुबह शाम
और कुछ टेक्सियाँ
तान्दी पुल-पचास रूपये
स्तींगरी-पचास रूपये
भला हो `बोर्डर रोड्स´ का
पहले तो इतना भी न था
सोई रहती थी सड़कें, चुपचाप
बरफ के नीचें
मौसम खुलने की प्रतीक्षा में
और पब्लिक भी
कोई कुछ नहीं बोलता ।

दोर्जे गाईड की बातें
(ग³् स्ता³् हिमनद का नज़ारा देखते हुए)


इससे आगे?
इससे आगे तो कुछ भी नहीं है सर!
यह इस देश का आखिरी छोर है।
इधर बगल में तिबत है
ऊपर कश्मीर
पश्चिम मे जम्मू
उधर बड़ी गड़बड़ है
गड़बड़ पंजाब से उठकर
कश्मीर चली गई है जनाब
लेकिन हमारे पहाड़ शरीफ हैं
सर उठाकर
सबको पानी पिलाते हैं
दूर से देखने मे इतने सुन्दर
पर ज़रा यहाँ रूककर देखो .................
नहीं सर,
वह वैसा नहीं है
जैसा कि अदीब लिखता है-
भोर की प्रथम किरणों की
स्वर्णाभा में सद्यस्नात्
शंख-धवल मौन शिखर,
स्वप्न लोक, रहस्यस्थली .......
वगैरा-वगैरा
जिसे हाथों से छू लेने की इच्छा रखते हो
वो वैसा खामोश नहीं है
जैसा कि दिखता है।
बड़ी हलचल है वहाँ दरअसल
बड़े-बड़े चट्टान
गहरे नाले और खì
खतरनाक पगडंडियाँ हैं
बरफ के टीले और ढूह
भरभरा कर गिरते रहते हैं
गहरी खाईयों में
बड़ी ज़ोर की हवा चलती है
हिìयाँ काँप जाती हैं, माहराज,
साक्षात् `शीत´ रहता है वहाँ!
यहाँ सब उससे डरते हैं
वह बरफ का आदमी
बरफ की छड़ी ठकठकाता
ठीक `सकरांद´ के दिन
गाँव से गुज़रते हुए
संगम में नहाता है
इक्कीस दिनों तक
सोई रहती है नदियाँ
दुबक कर बरफ की रज़ाई में
थम जाता है चन्द्रभागा का शोर
परिन्दे तक कूच कर जाते हैं
रोहतांग के पार
तन्दूर के इर्द गिर्द हुक्का गुडगुड़ाते बुजुर्ग
गुप चुप बच्चों को सुनाते हैं
उसकी आतंक कथा।
नहीं सर
झूठ क्यों बोलना?
अपनी आँखों से नहीं देखा है उसे
पर कहते हैं
घर लौटते हुए
कभी चिपक जाता है
मवेशियों की छाती पर
औरतें और बच्चे
भुर्ज की टहनियों से
डंगरो को झाड़ते हैं-
``बर्फ की डलियाँ तोडो
`डैहला´ के हार पहनो
शीत देवता
अपने `ठार´ जाओ
बेज़ुबानों को छोड़ो´´
सच माहराज, आँखों से तो नहीं............
कहते हैं
गलती से जो देख लेता है
वहीं बरफ हो जाता है
`अगनी कसम´।
अब थोडा अलाव ताप लो सर,
इससे आगे कुछ नहीं है
यह इस देश का आखिरी छोर है
`शीत´ तो है यहाँ
उससे डरना भी है
पर लड़ना भी है
यहाँ सब उससे लड़ते हैं जनाब
आप भी लड़ो।

10 comments:

डॉ .अनुराग said...

इसे कहते है कविता........आपने एक साथ इतना स्टोक दे दिया .......पहली तीन तो खास लाजवाब है.....ठण्ड सी महसूस कर रहा हूँ कमरे में......लाजवाब

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

इतनी सारी कविताएँ एक साथ? पेट पूरी तरह से तन गया है। जैसे स्वाद में दो की जगह मकई की साढ़े तीन रोटियाँ डकार गया हूँ।

ये कविताएँ हैं लोगों को दिखाने की, कि कविता ऐसी होती है। पहचान लो और आगे से हर किसी चीज को कविता न कहना।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

नहीं भाई सहाब एसी बात नहीं हैं। दर असल जो कविताएं मुझे अच्छी लग रही थी उन्हें देने का मन था बस। इतना ही।

Udan Tashtari said...

मुझे पहले ही मालूम था कि मेरे भाई की पसंद कितनी उम्दा है...गजब भाई..अद्भुत!! आनन्द विभोर कर दिया.

शिरीष कुमार मौर्य said...

अजेय को यहां पाकर अच्छा लगा। ये तथा और सभी कविताएं जो आपको मिली, मुझे भी मिलीं पर पोस्ट करने में आप बाजी मार ले गए। बधाई !

vijay gaur/विजय गौड़ said...
This comment has been removed by the author.
vijay gaur/विजय गौड़ said...

शिरीष भाई बहुत सी दूसरी उम्दा कविताएं है और अजेय की आप उन्हें पोस्ट कर सकते हैं। मेरा तो मन था पर पोस्ट बहुत बडी हो रही थी, लिहाजा मुश्किल से अपने को कुछ पर ही रोक पाया हूं।

Anup Sethi said...

प्रिय अजेय,
रोहतांग पार के बर्फीले मैदानों, अलंघ्‍य श‍िखरों, दुर्गम घाटियों, वेगवती नदियों के बीच कठिन जीवन को काव्य-करुणामय बनाकर हमारे सामने ले आते हो. तुम्‍हारी कविता में हिमालय के सौंदर्य और संघर्ष के नाद- निनाद व‍िभोर कर जाते हैं.

AJAY said...

thanks to all.

Abhivyakti said...

koi PAHAL ka wo ank padhne ke liye le gaya,wapas nahi kiya.. jisme aapki kuchh kavitaon se rubaru hua tha. ab aisa lag raha hai jaise koi tilism haath lag gaya hai. Lahul ke utang shikhron aur gahri ghatiyon se nikli aisi naisargik va jangli kavitaon ke liye sadhuvad.