Thursday, March 5, 2009

गंदी बस्तियों के बच्चे

राजेश सकलानी

जैसे नालियॉं होती हैं वैसे ही गंदी बस्तियॉं भी होती हैं। नालियों की तरफ देखा नहीं जाना चाहिए। वे तकलीफ देती हैं। वे हमारे कारनामों को प्रकट करती है। उस गन्दगी में हम खुद ही बह रहे होते है। वे हमारी नाकामयाबी और हरामीपन को प्रकट करती हैं। हमें उन नालियों में अपनी असफलता दिखलाई देती है। यद्यपिः हम चाहते हैं कि नालियॉं हों किन्तु हम सफाई का ध्यान नहीं देना चाहते। यह हमारी परम्परा है। तथाकथित गौरवशाली परम्परा। मैली बस्तियॉं भी ऐसी ही होती है। रहना तो दूर, हम उनकी तरफ देखना भी नहीं चाहते हैं। वे हमारी सामाजिक रिश्तों की याद दिलाती है। हम हैं कि उनसे बचना चाहते है। हम चाहते हैं, मैली बस्तियॉं खत्म हो जाएं। वहां पर सुन्दर इमारतें बन जाएं, लेकिन वहां के निवासियों के लिए हम कोई कल्पना नहीं करते। हमें यह गतिहीनता भी परम्परा से ही मिली है। मनष्यता के लिए जन्मजात प्रेम का थोड़ा-सा अंश भी हमारे भीतर नष्ट प्राय: हो जाता है। क्योंकि सबको बदलने का संकल्प हमें हमारी राजनीति और सामाजिकता और धर्म नहीं देता। वह एक रूग्ण किस्म की घ्रणा में बदल जाता है। इसीलिए हम गन्दी बस्तियों को आशंका और असुविधा की तरह देखते हैं।
लेकिन पूंजीवादी, बाजारवादी मस्तिष्क इस घृणा दृश्य से भी मुनाफा ढूंढ निकालता है और मनु्ष्य की नियती को बदलने के आदर्श को कला से बहि्षकृत कर छलावे को निर्मित करता है और गुलामी के लिए हमारे बचे-खुचे संकल्प को ध्वस्त करने की को्शिश करता है। बाजार ऐसे ही उत्पादों से पेटा पड़ा है। विराट फलक पर बेहतरीन संगीत, सिनेमा, तस्वीरें, रैपर, डिब्बे आदि उपभोक्ताओं के लिए बनाए जा रहे है। नए दृ्श्यों और कथानकों की खोज में पूंजीवादी कैमरा मैली बस्तियों की मनुष्योचित ऊर्जा और जिजिविषा कों अन्यथा अचि्ह्नित जगहों पर पहुंच रहा है और जनता को मूर्ख बना कर तालियां और धन लूट रहा है। मैली बस्तियों के बाशिन्दों को कुत्तों में बदल डालता है। उनकी कला में खिलवाड़ यह है कि करोडों कुत्तों में कोई एक धनवान शोर में बदल जाएगा। विडम्बना यह है कि इस कला में दुनिया के बेहतरीन दिमागों का इस्तेमाल हो जाता है। वास्तव में इन दिमागों के मालिक खूंखार कुत्ते हैं जिनके गले में व्यवस्था का शानदार पट्टा लगा है और वे चेन से बंधे हुए हैं।
'स्लमडाग मिलेनियर" फिल्म को मिले आठ ऑस्कर पुरस्कारों में भारतीयों की अहम् भूमिका है किन्तु फिर भी गर्व करने का मौका नहीं बनता है। वैचारिक रूप से यह फिल्म दुनिया के ढांचे को बदलने से कतई इन्कार करती है। हॉं जरूर विचार आता है कि 'मां तुझे सलाम" और 'जय हो" को सशक्त तरीके से हम तक पहुंचाने वाले गायक, संगीतकार ए आर रहमान को इन गीतों के जरिए सामाजिक, राजनैतिक और कलापूर्ण हस्तक्षेप के लिए याद किया जाना चाहिए। साम्प्रदायिक द्वे्षी इसे ध्यान से सुनें।

5 comments:

राजीव तनेजा said...

पते की बात

सुशील कुमार छौक्कर said...

सही बात कह दी जी आपने।

neeshoo said...

अच्छा लिखा आपने । सहमत हैं........

shyam.skha said...

बात वाकई सही है.पर केवल बात से काम चलेगा क्या,हम मे से हर किसी को कुछ न कुछ करना चाहिये-मैने छोटी सी शुरूआत की है-क्या जल्द अपने ब्लॉग-बातां री बात पर पोस्ट करूंगा उसके बारे में
श्यामसखा श्याअम

YOGENDRA AHUJA said...

Dil ko chhoone wali aur sachchi baat kahi hai apne.