Tuesday, March 10, 2009

किसका हक है - एक्स या वाई

कविता, कहानी और आलोचना से पटे पड़े समकालीन हिन्दी साहित्य के बीच अन्य विधाएं कहीं खो सी गई हैं।व्यंग्य तो नदारद सा ही है। हां, इधर कुछ पहल होती हुई सी दिख रही है। उसी को आगे बढ़ाते हुए प्रस्तुत हैव्यंग्यकार अशोक आनन्द की ताजा रचना। अशोक आनन्द देहरादून में रहते हैं। वर्ष 2004 में उनकी व्यंग्य रचनाओं को संग्रह खुदा मेहरबान तो गधा पहलवान प्रकाशित हुआ है।

अशोक आनन्द
धन्य हो प्रभु!


कहा जाता है, कि नारखाने में तूती की आवाज का कोई महत्व नहीं होता, लेकिन जब से मुझे यह "विस्फोटक" शुभ-समाचार प्राप्त हुआ है, कि आज के इस महाप्रदूषित माहौल में आप परम-लोकप्रिय तथा चरम-सुरिंक्षत कमीशन तक को ठुकरा कर "सूखी तनख्वाह ही सबकुछ है" की मधुर-रागिनी में मदमस्त रहते हैं, तब से ही मेरे मन-मस्तिष्क में आपके "त्याग-राग" की तूती हलचल मचा रही है और मेरा ईमान मुझे "पुश" कर रहा है कि मुझ जैसे बाल-बराबर को भी आपकी ताल के साथ ताल मिलानी चाहिए और यदि मैं आपके यशोगान में महाकाव्य न भी लिख पाऊँ, तो--तो कुछ पन्ने रंगने का प्रयास अवश्य करना चाहिए।
वैसे, मौटे तौर पर, आम लोगों की घातक-धारणा यह है, कि रिश्वत और कमी्शन में जमीन-आसमान का सा अन्तर होता है। उन अक्ल के अंधों के अनुसार, रि्श्वत लेना किसी गलत काम में सहयोग देने, किसी मज़बूर को निचोड़ने अथवा मिस्टर "एक्स" के हक को श्रीमान "वाई" को दिलवाने के षड्यंत्र में शामिल होने जैसा महापाप होता है, जबकि कमी्शन ग्रहण करना तो एक शुद्व-सात्विक प्रक्रिया है, क्योंकि कमीशन स्वीकारने के दौरान न तो किसी फाईल को ठंडे बस्ते के अंधेरे से निकाल कर रौ्शनी में लाया जाता है, जिससे उसका पुर्नजन्म हो सके, न ही किसी बदनसीब को सताया-तड़पाया-रूलाया जाता है और न ही किसी प्रकार की हेरा-फेरी का दामन थामा जाता है। इस नाते, कमी्शन को अपनी अंटी के हवाले करते समय, किसी भी अपराध-बोध को नहीं पालना चाहिए और इसे कुर्सी का प्रसाद अथवा पद-वि्शेष का "हक" समझकर डकार लेना चाहिए या हस्ताक्षर रूपी चिड़िया बिठाने का 101 प्रतिशत वैध नजराना समझ कर, ईमान की घुट्टी में मिलाकर बेखटके पी जाना चाहिए।
इसी क्रम में, उनका "गणित" यह कहता है, कि रिश्वत को तो पहले इशारों-इशारों में और फिर नंगे शब्दों के साथ "एडवाँस" में माँगना पड़ता है, जबकि कमीशन गान प्रदान करने वाला, अपने पूरे होशो हवास में, होम-मिनिस्ट्री से बाकायदा नो ऑब्जेक्शन सर्टीफिकेट लेकर, रिवाज और दस्तूर के मुताबिक, लकीर का फकीर बना, निर्विघ्न कार्य-समाप्ति के पश्चात, कॉलगेट-स्माइल के साथ, चन्द दमड़े अर्पित करने पर आमादा रहता है, तो--तो इस "सूफियाना-भेंट" को स्वीकार न करने की गुँजायश ही कहाँ बचती है ? (और, उस पर तुर्रा यह, कि कमी्शन उर्फ "ऑफिस-एक्सपेंसेज" का उज्जवल-धवल लिफाफा थामने वाले आप इकलौते मेहरबान-कदरदान नहीं होते, वरन् आप तो नीचे से ऊपर तक फैली अमरबेल रूपी जंजीर की एक छुटकी कड़ी मात्र होते हैं और आपकी हाँ या न का कोई खास महत्व नहीं होता)
जाहिर है-उक्त वर्णित शब्दो के आधार पर आज अधिकाँश विभूतियाँ कमी्शन के पक्ष में ही अपना कीमती वोट अर्पित करती हैं और उससे किनारा करके इस चींटी रूपी बेईमानी को चोट पहुँचाने का दुस्साहस बिरले ही कर पाते हैं। ऐसे में, जब मैं आपको इस दूसरी पंक्ति में शान से खड़ा पाता हूँ, तो बरबस मेरे हाथ सलामी के लिए उठ जाते हैं।
यूं, रिश्वत हो या कमी्शन, कुछ महानुभावों की दिलचस्प धारणा यह होती है, कि यदि ऊपरी अन्धी-कमाई का कुछ हिस्सा नेक कार्यों में खर्च कर दिया जाये, तो--तो फिर इस लोक ही क्या, परलोक के लिहाज से भी, किसी प्रकार का "टेंशन" पालने की कोई जरूरत नहीं रह जाती। यह अलग बात है, कि शायद ऐसे ही शरीफ-बदमाशों की शान में एक शायर फर्मा चुके हैं:-
तामीरें हैं, खैरातें है, तीरथ-हज भी होते हैं।
ये दौलत वाले दामन से, यूँ खून के धब्बे धोते है।

वैसे, छोटी ही नहीं, मोटी बुद्वि वाले भी, मन ही मन यह महसूस करते ही हैं, कि कमीशन रूपी मांसल-मारक "फुलझड़ी", सरकारी खजाने के हरम से ही अगवा करके लाई जाती है और उसके उपभोग-सहवास को बलात्कार और दे्शद्रोह की ही संज्ञा दी जा सकती है। इसी कारण, ऐसे प्रत्येक दलाल की अंतरात्मा उसे कचोटती रहती है अथवा अपना विरोध प्रगट करती रहती है, लेकिन वह नशेड़ी उस कमबख्त को "शटअप" कह कर उसकी बोलती बंद करता रहता है।
पता नहीं, आप किस आधार पर, कमी्शन-कुतिया को दुत्कार रहे हैं। न जाने
क्यों मुझे यह भी विश्वास है, कि आप जैसे संभ्रात-सज्जन का "बगुला-भगत" से कोई नाता नहीं है और न ही "नौ सौ चूहे खा कर हज को जाने वाली बिल्ली" से आपका कोई लेना-देना है और आप इस तथ्य से भी भली-भाँति अवगत है, कि उच्चपद के लिए कमीशन का प्रति्शत अधिकतम होता है, किन्तु खतरा निम्रतम रहता है, क्योंकि कोई काँड हो जाने पर, बड़ा अधिकारी तो पतली गली से साफ बच निकलता है और दण्ड की गाज, किसी छोटे-मोटे कर्मचारी पर ही गिरती है। सम्भव है, आप कमी्शन-जाम से इस कारण कन्नी काट रहे हों, कि कमी्शन-जुगाली की लत पड़ जाये, तो वृहद-वि्शाल तोप-खरीद से लेकर, छुटके से "कफन-बाक्स" की खरीद तक में कमीद्गान खाना पूर्णतया जायज लगने लगता है।
आज, जब मैं अपने को, ऐसे-ऐसे सफेदपो्श लुटेरो याने कमीशन खोरों में घिरा पाता हूँ, जो सचरित्रता और "संतोषधन" का ढिंढोरा पीटते नहीं थकते और "मुँह में राम, बगल में छुरी" का शर्मनाक उदाहरण होने के बावजूद, अपने चमचमाते मुखौटे के कारण इतराते-मदमाते फिरते हैं, तो--तो उन्हें हूट करने के साथ-साथ शूट करने का मन हो उठता है। बुजदिली्वश, मैं ऐसा कुछ नहीं कर पाता और शब्दों की मरहम से अपनी खाज-खुजली मिटाने की कोशिश करता रहता हूँ तथा कमी्शन ओढ़ने-बिछाने वालों को "श्लोक" सुनाने के साथ, आप सरीखे "विल-पॉवर" के धनी महामानव के चरणों में अपनी श्रद्वा के फूल अर्पित करता रहता हूँ।
सच! आज के इस संक्रमण-काल में आप जैसे दुस्साहसी विद्रोहियों की बहुत जरूरत है, जो कमीद्गान का झंड़ा बुलन्द करने वालों के खिलाफ अपने ईमान का डंडा उठा सके।
श्रीमन! आज घर आती लक्ष्मी को लात मारना बेहद मुश्किल होता जा रहा है-भले ही वह सरकारी खजाने में सेंध लगाकर लाई जा रही हो, चाहे दीन-हीन, विवश-मजबूर दे्शवासियों के मुँह के इकलौते निवाले को नीलाम करने से प्राप्त हो रही हो और एक चतुर्थ-श्रेणी कर्मचारी से लेकर राजपत्रित अधिकारी तक, बल्कि उससे भी ऊँची कुर्सी पर विराजने वाले महान महानुभाव भी, चन्द दमड़ों की कमी्शन की एवज मे, अपनी हया और अपने आत्मसम्मान की डुगडुगी पिटवाने में अपनी शान समझते हैं। ऐसे में, आप जैसे उच्चाधिकारी द्वारा, कमी्शन-विरोधी रवैया अपनाना, वास्तव में आठवें आश्चर्य की सी चमत्कारपूर्ण ईमान की मीनार खड़ी करने जैसा भगीरथ-प्रयास दीखता है और आपके इस इकलौते कारनामे के कारण ही यह नाचीज आपको तीन शब्दों का भारत-रत्न सरीखा व्यक्तिगत-तमगा प्रदान करना चाहता है-"धन्य हो प्रभु!