Friday, March 13, 2009

सरग-दिद्दा

देहरादून की वे छवियां जो कथाकार नवीन नैथानी के भीतर दर्ज हैं, पहले भी उनके लिखे संस्मरणों से हम जान पाए हैं। कवि रमेशमिश्र सिद्धेश , सुखबीर विश्वकर्मा को उन्होंने अपने पिछले आलेखों में याद किया। इस बार वे एक ऐसे रचनाकार को याद कर रहे हैं। जो आज भी रचना रत है।

नवीन नैथानी

तो इस शहर देहरादून की फ़ितरत का दिलचस्प बयान करते हुए कभी धुरन्धर देहरादूनिये श्री सुभाष पन्त ने एक किंवदन्ती का का जिक्र करते हुए लिखा था- सवेरे की सैर करते हुए एक साहब अपनी छ्डी़ पार्क की बैंच में भूल गये. अगली सुबह वे जब पार्क में पहुंचे तो छडी़ उसी बैंच में मिल गयी.हां,अब उसमें कोंपलें निकल आयी थीं.
यह किस्सा तो लगभग सॊ साल से ज्यादा पुराना होगा, पर देहरादून का मिजाज बहुत ज्यादा नहीं बदला है.नये राज्य की राजधानी की किंचित अश्लील भूमिका निभाने ऒर नव धन-कुबेरों के प्रदर्शन-प्रिय कुत्सित आचरण के बावजूद शहर अब भी संभावना है.यहां की हवा बहुत ज्यादा नहीं बदली है.पुराने साहबों की छडी़ में जीवन के अंकुर खिलाने वाली हवा में अभी संवेदना को बचाने की तासीर नष्ट नहीं हुई है. यहां साहित्य की गतिविधियां अनॊपचारिक रूप में अधिक दिखायी पड़्ती हैं.पिछली कडी़ में कविजी का जिक्र हो चुका है. इस बार आपको श्री चारू-चंद्र चंदोला जी से मिलवाते हैं.
अनुप्रास की छटा से सुसज्जित चंदोला जी का नामकरण प्रकृति के सुकुमार कवि सुमित्रानन्दन पंत द्वारा किया गया था.यह अलग बात है कि चंदोला जी की कविता अनुप्रास से सायास बचती है .
न्द हो गया है, मॊसम का ढक्कन बद्रीनाथ के कपाट की तरह लिखने वाले चारू-चंद्र चंदोला की कविताऒं में साफ़-गोई, बात कहने की उत्कट बेचैनी लगभग अन छुए बिम्बों के रूप में अभिव्यक्ति पाती है.चंदोलाजी से पहली बार मैं १९८७ मेंअप्रैल या मई के महिने की किसी तपती दुपहरी में मिला था.वे साहित्यकारों से मेरे संपर्क के शुरुआती दिन थे. अतुल शर्मा के साथ अंक देहरादून से नाम की हस्तलिखित पत्रिका के प्रकाशन की योजना लेकर चंदोलाजी के सामने उपस्थित हुए थे.उन दिनों वे अमर उजाला या जागरण के साथ जुडे़ हुए थे. तब अखबारों के आक्रामक फ़ैलाव के दिन आने में थोडा़ वक्त था.दून-दर्पण , हिमाचल-टाईम्स , जैसे स्थानीय अखबारों की पूछ थी ऒर कव्य-गोष्ठियों की रपट अच्छी-खासी जगह घेर लिया करती थी. फालतू लाईन की कुछ टेढी़ गलियों से होते हुए चंदोलाजी के यहां पहुंचे .उनकी वाणी में एक खास किस्म की गुरुता ने ध्यान आकर्षित किया था. यह अभी भी उनके साथ चली आ रही है. वे जब कविता पढ़्ते हैं तो शब्दों का ही पाठ नहीं करते -उनकी वाणी में सरस्वती वर्णों की निरंतर धारा में प्रवाहित होती है.वे प्रायः शब्दों का उच्चारण नहीं करते , अक्षरों का घोष शब्दों की महिमा में निःसृत होता है.उनके काव्य-पाठ की शैली निराली है. पहाडी़ आदमी का हिन्दी उच्चारण उनके यहां एक विशेष नाद ले आया है.
बाईस वर्षों में चंदोलाजी के व्यक्तित्व में कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता.उनके सामने लगता है समय ठहर गया है.उनकी कविता भी लगभग समकालीनता का अतिक्रमण करती हुई दिखलायी पड़्ती है.चंदोलाजी नेपथ्य के कवि हैं.वे हालांकि मंचस्थ होते हुए बहुत बार दिखायी पड़ जाते हैं किन्तु मंच पर उनकी धज कविता के साथ ही बन पड़्ती है. वे प्रायः भाषण देते हुए भी देखे जाते हैं.बाईस वर्ष पूर्व उनकी उपस्थिति हम लोगों के लिये बहुत जरूरी थी.इस श्रंखला के शुरू में जिक्र किया जा चुका है कि मंचीय कविता के विरोध में हम लोगों का प्रयास गंभीर कवि-कर्म को जनता के बीच ले जाने की चिन्ता में ज्यादा रहता था ऒर हमें अध्यक्षता करने के लिये सम्मानित बुजुर्गों की आवश्यकता रहती थी.सिद्धेश जी सहज उपलब्ध हो जाते थे. कविजी के कुछ आग्रह रहा करते थे .चंदोलाजी से स्वीकृति मिलना सहज नहीं था.अतुल शर्मा के पास यह गुण बहुत प्रचुर मात्रा में हुआ करता था.इन बाईस वर्षों में तो इसमें ऒर सुधार ही आया होगा.अतुल के साथ सबसे बडी़ खूबी यह रही आयी है कि वह दोनों जगह आसानी से संतरण कर जाता है. अतुल के सॊजन्य से मुझे मंचों की गतिविधियों को नजदीक से देखने का अवसर भी मिला.लेकिन वह एक अलग ही किस्सा है ऒर उसे बयान करने से ज्यादा लाभ नहीं होने वाला है.
हां , तो चंदोलाजी का ज्यादा समय पत्रकारिता ने ले लिया है. लेकिन फिर भी वे काफी समय से युगवाणी में सरग-दिद्दा के नाम से चुटिले लेख लिखते रहे हैं.हिन्दी ऒर गढ़्वाली के फ़्यूजन से युक्त उनकी भाषा ने जो मुहावरा गढा़ है उस पर अभी चर्चा नहीं हुई है. हालांकि गढ़्वाल विश्वविद्यालय में उनकी कविताएं पढा़यी जाती हैं किन्तु उनकी सृजनात्मकता का अभी सही मूल्यांकन होना बाकी है.
चंदोलाजी के साथ समय बिताना अपने में एक रोचक अनुभव है. उनके पास संस्मरणों का खजाना भरा पडा़ है. युगवाणी में बहुत सारा समय उनके सान्निध्य मे बिताने का अवसर मिला है. अपने परिवार की जन्म-कुण्डली के बहुत से ग्रहों-नक्षत्रॊं का पता मुझे चंदोलाजी के श्रीमुख से ही मिला.लीलाधर जगूडी़ ऒर मंगलेश डबराल की आरंभिक रचनाओं की जानकारी चंदोला जी कुछ इस तरह देते हैं जैसे कल की ही कोई घट्ना बता रहे हों.देहरादून के केन्द्र-स्थल में होने के कारण ,ऒर अपनी प्रकृति के चलते भी ,युगवाणी एक महत्वपूर्ण मिलन-स्थल बन चुका है जहां बाहर से आने वाले लब्ध-प्रतिष्ठित विचारक ,लेखक ऒर कवि अक्सर पधारते रहते हैं.चंदोला जी को मैने बहुत कम अपने केबिन से बाहर निकलते देखा है.कितना भी महत्वपूर्ण व्यक्ति हो चंदोलाजी अगर केबिन में बैठे हों तो बाहर नहीं निकलेंगे.आप घण्टे - भर आगन्तुक से बतियाएंगे , नयी जानकारियों से भर जायेंगे ऒर आगन्तुक के जाने पर अपने को समृद्ध समझने लगेंगे.तभी चारू-भाई (उन्हें युगवाणी में इसी नाम से जाना जाता है) अपने केबिन से बाहर आयेंगे.सिगरेट सुलगायेंगे(अब वे सिगरेट पीते हैं या नहीं ,मुझे ठीक जानकारी नहीं है -काफी समय से मैने उन्हें युगवाणी में नहीं देखा है)थोडी़ देर मॊन में कुछ ढूंढेंगे ऒर जिन महानुभाव के प्रभाव में हम गद्गगद भाव में विभोर हुए जा रहे थे उनका प्रशस्तिवाचन शुरू हो जायेगा.व्यक्तित्व-विश्लेषण की इतनी निस्संग तटस्थता अन्यत्र दुर्लभ है.
समय के बीहडों में भटक कर गुम हो चुकी स्मृतियों को बटोर लाने का साहस
तो जैसे चंदोलाजी में भरा ही है,अगली पीढि़यों तक उन्हें पहुंचाने की चेष्टा उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट आभा प्रदान करती है.
उनकी कवितायें उनके व्यक्तित्व का ही विस्तार हैं.







प्रस्तुत है कवि चारु चन्द्र चंदोला की कविताएं-

चारु चन्द्र चंदोला

और

पूछती है लकड़ी की अल्मारी
क्या स्टील के भी पेड़ होते हैं ?

थोड़ी ही देर में
आ जाती है स्टील की अल्मारी
और, चली जाती है लकड़ी की वह अल्मारी
वर्षों तक
हीरे/मोती और सोने के गहने
सूंघने के बाद।

पूछते हैं कौवे
चर्चा है, स्टील के भी होने लगे हैं पेड़
बदलना तो नहीं पड़ेगा
हमें अपना बसेरा ?

अदृश्य हो जाते हैं पेड़
और, फोड़े जाने लगते हैं श्रीफल
श्रीपुत्रों के बसेरों के लिए।


खेत और पेट

मुझे मालूम है
वर्षा हो रही है
यह भी मालूम है
पेट और खेत का सम्बन्ध
अच्छा रहेगा

यह मालूम नहीं है
किस खेत का
कौन-सा अन्न
मेरी थाली में आकर
जाएगा मेरे पेट में

यह भी मालूम नहीं है
कितने पेटों में
नहीं पहुंच पाएगा
इस बार की
पैदावार का अंश

मुझे मालूम है
फिर भी आएगा
मेरे द्वार पर
कोई भूखा पेट

आएगी चिड़िया भी
अपने बच्चों के साथ

मुझे नहीं मालूम है
किनकी संख्या अधिक है
पेटों की
या खेतों की ?

3 comments:

शोभा said...

सुन्दर प्रस्तुति। देहरादून की मधुर यादों में पहुँचा दिया आपने।

Udan Tashtari said...

बहुत उत्कृष्ट रचनाऐं हैं दोनों:

मुझे नहीं मालूम है
किनकी संख्या अधिक है
पेटों की
या खेतों की ?

-झंकझोर देने वाली पंक्तियाँ.

गौतम राजरिशी said...

ये मेरा दुर्भाग्य है कि आपके ब्लौग के बारे में आज जाना कि जब चंद दिनों बाद देहरादून छोड़ कर जाना है मुझे.....
अद्‍भुत जानकारी किंतु....सलाम आपको