Thursday, July 30, 2009

गनीमत हो





बारिश के रुकने के बाद
मौसम खुला तो
रूइनसारा ताल के नीचे से
दिख गई स्वर्गारोहिणी
आंखों में दर्ज हो चुका
दिखा पाऊं तुम्हें,
खींच ही लाया बस तस्वीर

ललचा क्यों रही हो
ले चलूंगा तुम्हे कभी
कर लेना दर्शन खुद ही-
पिट्ठू तैयार कर लो
गरम कपड़े रख लो
सोने के लिए कैरी मैट और स्लिपिंग बैग भी
टैंट ले चलूंगा
बस कस लो जूते

चढ़ाई-उतराई भरे रास्ते पर चलते हुए
रूइनसारा के पास पहुंचकर ही जानोगी,
झलक भर दर्शन को कैसे तड़फता है मन
कितनी होती है बेचैनी
और झल्लाहट भी

गनीमत हो कि मौसम खुले
और स्वर्गारोहिणी दिखे।

4 comments:

naveen kumar naithani said...

तस्वीर क्या स्वर्गारोहिणी की है?
इस वक्त तो मौसम का ढक्कन पूरी तरह बन्द है

विनीता यशस्वी said...

Bahut achhi kavita hai...

Picture bhi achhi lag rahi hai...

मुनीश ( munish ) said...

Yeaaah...a nice company makes the joy go unlimited !

अजेय said...

सुन्दर कविता !