Thursday, November 19, 2009

बचा हुआ मांड हम फेंकते नहीं

भाषाओँ की विलुप्ति पर चिंता व्यक्त करने वाली कवितायेँ यादवेन्द्र जी के हवाले से पहले भी पोस्ट की गईं हैं,इस बार उन्हीम के मार्फ़त स्कॉट्लैंड की कवियित्री ओलिविया मक्महोन की भाषा सम्बन्धी दिलचस्प कविता प्राप्त हुई है। अनुवादक यादवेन्द्र जी का मानना है कि  ओलिविया की कविता में एक ताजगी भरा खिलदंड़पन है । ओलिविया एक ऎसी कवियित्री हैं जिनके कई संकलन छप चुके हैं. इसके अलावा उनके उपन्यास और स्कूल में अंग्रेजी को विदेशी भाषा के तौर पर पढ़ाने  वाली कई पाठ्य पुस्तकें भी प्रकाशित हैं. आपने खाली समय में वे
 पहाड़ो पर सैर सपाटा करना,पियानो बजाना और अमनेस्टी इंटरनेशनल के लिए धन जुटाना पसंद करती हैं.विभिन्न भाषा भाषियों और राष्ट्रीयताओं के लोगो के बीच के अपने अनुभव इन कविताओं में उन्होंने व्यक्त किये हैं..



नयी भाषा सीखना

कोई नयी भाषा सीखना
भरमाने वाली पहेली सुलझाने जैसा होता है
जिसमे होते हैं लाखों आड़े तिरछे टुकड़े
जो बनाते रहते हैं नए नए चित्र हरदम
यह वैसा ही है जैसे
भटक
 जाये कोई इन्सान परदेसी किसी शहर में
और न हो उसके पास वहां
 का कोई नक्शा
जैसे
 खेलना शुरू कर दे कोई टेनिस
और
 न हो उसके पास गेंद कोई इस खेल की
जैसे टिड्डों के झुण्ड में
धकेल दिया जाये किसी को बना के चींटी
जैसे कलाबाजियां दिखाना शुरू कर दे कोई
और टांगें ही न हो सही सलामत
जैसे अभिनय की मजबूरी आन पड़े
और स्क्रिप्ट न हो हाथ में कोई
जैसे बढईगिरी करनी पड़ जाये
और आरी का आता पता न हो दूर दूर तक
जैसे बन तो जाये कोई किस्सागो
पर
 किस्से में न तो मध्यांतर हो और न ही अंत...

पर इसके बाद धीरे धीरे
लगने लगता है जैसे आप सैर को निकल पड़े हों
अल स सुबह
और कोहरे की चादर धीरे धीरे खींच कर उतारने लगे कोई
जैसे दरवाजे के
 उस पार से कौंध जाये कोई रौशनी
जैसे अचानक हाथ आ जाये वो दस्ताना
जिसके तलाश में मचा रखी थी धमा चौकड़ी
जैसे
 भौंचक्के से पहुँच जायें हम
उस ट्रेन तक जिसका छुटना अवश्यम्भावी था
जैसे छप्पर फाड़  कर दे जाये कोई अप्रत्यासित तोहफ़ा
मंद मंद मुस्कराहट बिखेरता

इस तरह चलते चलते एक दिन लगने लगता है
कि हम चढ़ बैठे हैं साइकिल पर
जो तेजी से उतरती जा रही एक ढलान पर औंधे मुंह....


भात

एक इन्दोनेसिई,एक थाई और एक बंगलादेशी
आ कर खड़े हो गए मेरी किचन के अन्दर..,
तुम्हारे यहाँ कैसे पकाते हैं भात???
पूछती हूँ मैं उनसे.

भात पकाने के बाद हम बचा हुआ मांड फेंकते नहीं
सब इस एक बात पर राजी हो जाते हैं.....
कच्चे चावल से थोडा ऊपर तक रखते हैं पानी..
-तर्जनी जितना ऊँचा
-नहीं,बीच वाली  ऊँगली की पहली गांठ तक
-नहीं,दूसरी गांठ जितना ऊँचा

उन्हें सही सही मालूम नहीं था
कितना ऊपर तक रखना होता है पानी
अब अपने अपने घर लिखेंगे वे चिठ्ठी:
प्यारी माँ,तुम्हारी बहुत याद आती है यहाँ..
ठीक से समझा कर लिख भेजो चिठ्ठी
कैसे पकाया जाता है भात..


शब्दों की अदलाबदली

हमें शालीनता  से पेश आना चाहिए
और उसे स्त्री(१) कह कर पुकारना चाहिए
या,बेहतर हो
कि अभी उसको एक लड़की ही कहें
बात को और खींच सकें हम तो--
क्यों न कहा जाये  उसको एक औरत(२)?
वजह साफ है,औरत आकारहीन होती है
बिलकुल वैसे ही जैसे होता है
इतवार को दोपहर बाद का वक्तहर
 लड़की की होती है एक गुंजायमान आहट
और कुछ न कुछ होने ही वाला होता है उनके साथ
कुछ भी...
बस,लड़की तो होती है एक खालिस मौजयदि
 आप उसे कहने लगें औरत
जैसे कि आदमी होता है आदमी-
तो होने लगेंगे हम बेवजह धीर गंभीर
नहीं,हमें तब तक तो थम कर
इंतजार करना ही चाहिए
जब तक वो दिखने न लगे
किसी अदद माँ जैसी-
तभी वो कही जा सकेगी औरत
या,शालीनता दिखाएँ तो..एक स्त्री(१)
हो सकता है तब भी गुंजाईश बची रहे
उसमे लड़की कहलाने की-
यही होना चाहिए दरअसल
बात को और खींच सकें हम ...तो

(१)lady
(२)woman

 अनुवाद- यादवेन्द्र

7 comments:

विनीता यशस्वी said...

Behtreen kavitaye hai...

3rd kavita bahut hi achhi hai...

Science Bloggers Association said...

जिंदगी को जीती हुई कविताएँ।
------------------
11वाँ राष्ट्रीय विज्ञान कथा सम्मेलन।
गूगल की बेवफाई की कोई तो वजह होगी?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

bahut achchi kavitaayen.

vaakai yadvendra ji badhai ke patr hain.

शरद कोकास said...

यह बहुत अच्छी कविताये हैं यादवेन्द्र जी का अनुवाद भी अच्छा है लेकिन कहीं कहीं प्रवाह रुकता सा महसूस होता है ।

अजेय said...

sundar.

सुभाष नीरव said...

सभी कविताएं ध्यान खींचती हैं विशेषकर पहली कविता।

प्रदीप कांत said...

अच्छी कविताये