Sunday, December 6, 2009

किसी भी मामले में सनसनी पैदा करना आसान है

विष्णु खरे एक जिम्मेदार रचनाकार हैं- यह ब्लाग और मैं स्वंय उनको इसी अर्थ में लेते हैं। उनके मार्फत लिखी गई पोस्ट इसी का परिचायक है। लेकिन क्या एक जिम्मेदार लेखक से असहमति नहीं रखी जा सकती ? क्या उनके लिखे के उस पाठ को पकड़ना, जो गलियारों में होने वाली बातचीत का हिस्सा होता है और उसे दर्ज करना, उसका गलत पाठ है ? यह सवाल जनसत्ता में प्रकाशित उनके उस आलेख से सहमति और असहमति रखते हुए लिखी पोस्ट पर हमारे एक सहृदय पाठक भीम सिंह जी की टिप्पणी के कारण उठ रहे हैं। मैं नहीं जानता कि भीम सिंह जी कौन है ? वे सच में भीम सिंह ही है या, उनका वास्तविक नाम कुछ और है ? पर इस बिना पर कि मैं अदना सा व्यक्ति उनको नहीं जानता तो वे मुझसे असहमति नहीं रख सकते। जरूर रख सकते हैं और इससे भी तीखे स्वर में उनका स्वागत हमेशा रहेगा। मैं किसी दार्शनिक के विचारों के मार्फत कहूं तो कह ही सकता हूं कि स्वतंत्रता के मायने यह नहीं कि मेरा कोई विरोधी मेरे विरोध में बोले तो मैं उसके बोलने की स्वतंत्रता के अधिकार को छीन लूं। अब भीम सिंह जी से माफी चाहते हुए कहना चाहूंगा कि कहीं वे मुझसे उस दार्शनिक का नाम न पूछने लगें कि किसने कहा था यह (?), मैं नाम बता न पाऊंगा और फिर कहीं यादाश्त पर जोर देकर नाम बता भी दूं और वे रुष्ट होने लगें कि दार्शनिक द्वारा कहे गए वक्तव्य को मैंने अपने अंदाजों में प्रस्तुत किया है, यानी उन्हें शब्दश: नहीं कहा तो मेरे पास इस बात की सफाई देने की कोई गुंजाइश न रह जाएगी कि श्रीमान मैंने तो जो कहा वह पढ़े गए वक्तव्य का आशय है और मैं किसी भी आलेख को पढ़ने के बाद उसके आशय पर यकीन करता हूं, उसमें कहे गए हुबहू शब्दों पर नहीं। विष्णु जी के आलेख पर भी मेरी प्रतिक्रिया उसी आशय का पाठ है। यहां यह भी स्पष्ट जाने कि विष्णु जी से असहमति भी अपने आशय में एक जिम्मेदार और गम्भीर रचनाकार से असहमति है। असहमति के आशय भी स्पष्ट है, " सामूहिक कार्रवाई की किसी ठोस पहल की शुरूआत करने की बात विष्णु जी क्यों नहीं करना चाहते, जनपक्षधर लेखकों के संगठनों के सामने वे इस सवाल को क्यों नहीं रखना चाहते ? --- कौन सा पुरस्कार किस घराने और किस संस्था द्वारा किस मंशा के लिए दिया जा रहा है, इसे वक्त बेवक्त के हिसाब से परिभाषित करने के गैर जनतांतत्रिक रवैये पर भी होने वाली थुक्का-फजिहत से भी बचा जाना चाहिए।"
किसी बात को सनसनी बनाकर प्रस्तुत करने की मंशा इस "nonsense blog" की कभी न रही। अब भी नहीं है। मामला जनता के द्वारा चुनी हुई सरकार का बहुराष्ट्रीय पूंजी की वाहक सैमसुंग कम्पनी के तिजारती मंसूबों को सांस्कृतिक चेहरा प्रदान करने वाली घृणित मानसिकता का है। उसकी मुखालफत होनी चाहिए और सामूहिक रूप से होनी चाहिए। ऐसी किसी भी जनतंत्र विरोधी कार्रवाई की मुखालफत ताल ठोकू वक्तव्यों से संभव नही, यह बात मैं फिर-फिर कहना चाहूंगा।
यहां यह कहना तो अब और भी जरूरी लगने लगा है कि जब साहित्य अकादमी की इस कार्रवाई की कोई अधिकारिक सूचना (मेरी सीमित जानकारी में तो कहीं दिखाई न दी ) अभी तक भी कहीं दिखाई न दी और विष्णु जी को कहीं से पता लगी तो तय है कि किसी अन्य के द्वारा तो उसके विरोध की कोई गुंजाइश कैसे दिखाई देती भला ? लेकिन विष्णु जी का आलेख उस जानकारी को इसलिए शेयर करने के लिए कि सच में प्रतिरोध करने की गुंजाइश तलाशी जाए, दिखता नहीं। बजाय इसके चंद साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवियों के सामने चुनौति प्रस्तुत करने जैसा ही ज्यादा है।
अच्छा हो कि ऊर्जा को सनसनी पैदा करने में जाया न करें और किसी ठोस पहल की शुरूआत करने में जुटे। 

-विजय गौड़

4 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सहमत
और इन अनाम विद्वानों को ज़्यादा दिल पर लेने की ज़रूरत नहीं है। जिन सवालों की मंशा ग़लत हो उनका ज़वाब देना ज़रूरी नहीं।
हां चर्चा आज जनसत्ता में छपे उमाशंकर के लेख की भी होनी चाहिये। ऐसा लग रहा है कि एक वर्ग निश्चित रूप से अपने ''महान साहित्यिक अवदानों'' को किसी भी तरह इनकैश कराने के लिये तैयार है। पाठकों पर भरोसा है नहीं, प्रकाशकों से टकराने की हिम्मत नहीं तो बस पुरस्कारों पर गिद्ध दृष्टि लगी है। यह ख़तरनाक प्रवृति है और उन स्टार युवा लेखकों की मानसिकता को बताती है जिन्हें कई आलोचक सुपरस्टार बनाने पर तुले हैं। जैसा मैने लिखा था कि अब वह विभाजन रेखा तीखी होगी जिसके एक तरफ़ बाज़ार के समर्थक ( उमाशंकर ने इस लेख में साहित्य को बाज़ार से जोडने की वक़ालत की है) और दूसरी तरफ़ विरोधी होंगे।

शिरीष कुमार मौर्य said...

अभी फोन पर वीरेन डंगवाल जी ने उमाशंकर के लेख चर्चा की है मुझसे. वे काफी खिन्न लग रहे थे, विजय आप अपनी पोस्ट के सम्बन्ध में ज़रूर बात कीजिये वीरेन जी से - इसलिए भी कि खरे जी के लेख में उनका नामोल्लेख हुआ है. वैसे एक भीम सिंह अभी व्योमेश की कविता के विरोध में अनुनाद पर भी तशरीफ़ लाये हैं. ये उनकी तरफ से ब्लॉग पर महाभारत की शुरूआत है दिक्खे .....

dinesh chandra joshi said...

Vishnu Ji ki Chinta vastav main genuine hai,lakin mansa - vacha karmana kaviyu ki list se udhar chukane ki mansa bhi spast dikhai deti hai.Samuhik pratirodh ke liya kayayad kam.
Bhim singh Ji lagta hai koi Bhimkaya mahapurush hain jo parde ke piche hi rahete hain, kaya ko dikhete nahi.

Ek ziddi dhun said...

Umashankar Chaudhry is daur ke partinidhi hunarmand hain aur yahee chhaya chahte hain. Bheem Singh jaise bujdil blog ki duniya men bahut saare hain.