Friday, April 2, 2010

जहां दरिया बहता है

यह कविता वियतनामी कवि वो कू ने लिखी है। वो कू को वियतनाम में युद्ध का  विरोध करने के कारण लम्बे समय तक कारवास में रहना पड़ा जहां इन्होंने अनगिनत यातनायें झेली। वो कू का शहर क्वांग त्री सिटी को कई बार युद्ध झेलना पड़ा। अपने इसी शहर के लिये वो कू ने यह कविता लिखी।

 जहां दरिया बहता है

एक बहुत दूर की दोपहर
जब दरिया अपने किनारे लांघ गया था,
उस स्मृति के साथ पहुंचा
मैं अपने शहर, जो तुम्हारा और मेरा शहर था
चमकता है मेरे मन में वही स्वर्णिम दिन
तुम्हारा गोल सफेद टोप, उस संकरी गली में
दोपहर की रोशनी  में चमक रहा था
तुम्हारी जामुनी फ्राक, हवा में उड़ते लम्बे बाल
और चर्च की लगातार आवाजें लगाती, हज़ारों बार
बजती घंटिया याद आयी मुझे।
वह शहर जो पूरा बरबाद हो गया था युद्ध में
उस शहर की हर गली एक दर्द की तरह
उभरती है मेरे ज़हन में।
मेरा कोई हिस्सा हर गिरती हुई पंखरी के साथ
गिरता है धरती पर
उन चमकदार फूलों का आर पार
दर्द की तरह लहराता हुआ गिरता है धरती पर।
लेकिन मेरे सपनों में वो शहर अछूता है,
बरबादी के पहले सा अछूता
जब गलियां जिन्दा थी, बलखाती लहरों की तरह
जब तुम्हारी स्मित खिलने से पहिले गुलाब जैसी थी
जब तुम्हारी आंखें तारों की तरह सुलगती थी।
कैसी तेज याद आती है उन बहते पानियों की।
सर्दी की कमजोर रोशनी में कैसी दीखती थी तुम
जब लम्बी घास दरिया के दूसरे किनारे
पर झुका होता था।
हमारे पुराने शहर से अब भी भरा है हमारा होना
मेरे बाल पक गये हैं उस नदी किनारे घास की तरह
या तुम्हारे इतने पुराने प्यार की तरह।

अनुवाद: कृष्ण किशोर

6 comments:

Suman said...

nice

आशुतोष दुबे said...

bahut acchi rachna hai.
हिन्दीकुंज

अमिताभ मीत said...

शुक्रिया ये रचना हम तक पहुंचाने का.

सागर said...

vishwakavita ka koi mukabla nahi... shukriya...

Udan Tashtari said...

सुन्दर रचना और उम्दा अनुवाद!!

रवि कुमार, रावतभाटा said...

बेहतर कविता...
वियतनाम को ध्यान में रखते हुए और अच्छी लगी....

आभार...