Saturday, April 3, 2010

हाइजेनबर्ग और बम

(आजकल विजय भाई नीड़ के निर्माण में व्यस्त हैं। घर शिफ़्ट किया है. फ़िलहाल इण्टरनेट नहीं है. कुछ दिनों में वे लौटेंगे । तब तक बीच - बीच में आपकी खिदमत में कुछ टिप्पणियां पेश करता रहूंगा-नवीन कुमार नैथानी)
वर्नर हाइजेनबर्ग उन गिने -चुने भौतिक -विदों में हैं जो अपने अनुशासन की हदों के बाहर आम जन में खूब चर्चित रहे। उनका अनिश्चितता का सिद्धांत आज भी विझान के और दर्शन के मूलभूत प्र्श्नों से ट्कराने के लिये एक अनिवार्य प्रसंग बना हुआ है।द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब परमाणु बम बनाने की होड़ शुरू हुई तो मित्र-शक्तियो से जुडॆ वैझानिकों (जिनमें जर्मनी से भागे लोगो की अच्छी तादाद थी) को चिंता हुई कि जर्मन कहीं बम बनाने में बाजी न मार जायें।संदेह, अविश्वास, दुरभिसंधियों और षड्यंत्रों से भरे उस समय को डाइना प्रेस्टन ने बेहद पठनीय पुस्तक बिफोर द फाल आउट में प्रस्तुत किया है।
सभी लोग इस बात पर एकमत थे कि जर्मनी में इस काम को हाइजेनबर्ग ही अंजाम दे सकते हैं।१९४२ में जब यह खबर आयी कि हाइजेनबर्ग बम बनाने के जर्मन प्रोजेक्ट से जुड चुके हैं तो अमेरिका में मेनहट्टन प्रोजेक्ट से जुडॆ वैझानिकों में चिन्ता की लहर दौड़ गयी। कहा जाता है कि विक्टर वैस्कोफ ने प्रोजेक्ट के अगुआ रोबर्ट ओपेन्हाइमर ( भारतीय दर्शन से प्रभावित और गीता के अनन्य प्रशंसक) के पास एक नोट भेजा जिसमें हाइजेनबर्ग को अगुआ करने का प्रस्ताव था। इस काम को अंजाम देने के लिये वैस्काफ ने खोद की सेवाओं की पेशकश की थी।ओपेनहाइमर ने इसे एक मजाक भर समझा लेकिन दो वर्ष बाद इस पर गंभीरता से काम हो रहा था। योजना हाइजेनबर्गकी ह्त्या तक बन चुकी थी।
दिसंबर 1944 में सीक्रेट एजेण्ट मोए बर्ग को ज्यूरिख भेजा गया .उसे यह निर्देश दिये गये थे कि वह हाइजेनबर्ग के व्याख्यान सुने और यदि इस बात का आभास हो जाये कि जर्मन बम बनाने के नजदीक हैं तो तुरंत उनकी हत्या कर दी जाये. ज्यूरिख के व्याख्यान से मोए बर्ग किसी नतीजे पर नहीं पहुंच सका. उसने किसी तरह हाइजेनबर्ग से मुलाकात का जुगाड़ बैठा लिया.हाइजेनबेर्ग को इस बात का कतई अन्दाजा नहीं था कि उनकी जिन्दगी अब उन शब्दों पर टिकी है जो वे कहने वाले हैं.हाइजेनबर्ग ने बम के बारे कुछ भी नहीं कहा. उनकी बातों से बर्ग को लगा कि वे शायद इस बात से दुखी हैं कि जर्मन युद्ध हारने जा रहा है.
आप हाइजेनबर्ग और मोए बर्ग के बीच उस वर्तालाप की कल्पना कीजिये. मुझे यह स्तिथी किसी अस्तित्ववादी नाटक के दृश्य की तरह लगती है.आखिर वह युद्ध भी तो एक महाभारत ही था.वैझानिक समुदाय में यह बात युद्ध के शुरू होते ही साफ हो गयी थी कि सब्से पहले सूचनाओं का निर्बाध प्रवाह इस युद्ध की भेंट चढ़ जायेग.

2 comments:

प्रदीप कांत said...

behatareen janakaree

अशोक कुमार पाण्डेय said...

शानदार जानकारी! विजय भाई को रैन बसेरे की बधाई और उपन्यास की भी!