Thursday, June 17, 2010

जिक्र जिसका होना ही चाहिए

क्या सोचने लगे  कथाकार सुरेश उनियाल का हाल ही में प्रकाशित एक महत्वपूर्ण कहानी संग्रह हैं। पिछले दिनों इसी संग्रह से एक कहानी किताब का जिक्र यहां किया गया था, जिस पर इस ब्लाग के पाठकों की प्रतिक्रिया जो टिप्पणी और  फ़ोन द्वारा मिली उसमें कहानी को पढ़्ने की इच्छा ज्यादातर ने जाहिर की। पाठकों की इच्छाओं का सम्मान करते हुए कहानी प्रस्तुत की जा रही है। 
 
किताब

गलती मुझसे ही हो गई थी, यह स्वीकार करने में मुझे कोई गुरेज नहीं है। इनसान हूं और इनसान होता ही गलती का पुतला है।
किताब की खोज मेरी गलती नहीं थी। गलती यह थी कि अपनी खोज के पूरी होने से पहले ही मैंने इसके बारे में अपने दोस्त अनंतपाणि को बता दिया था। अनंतपाणि ठहरा व्यावसायिक बुद्धि। वह तो मेरी इस खोज में अपने लिए रुपए की खान देख रहा था।
मैंने उसे बताने की भरसक कोशिश की कि अभी किताब की खोज शुरुआती अवस्था में है। इसे पूरा होने में समय लगेगा। मैं अभी किताब के भीतर जाने का रास्ता ही बना सका हूं, बाहर निकलने का नहीं। इस बात की संभावना तो जरूर थी कि भीतर गया आदमी अपने लिए रास्ता बना सकता था और सुरक्षित बाहर आ सकता था लेकिन इस सबकी प्रोग्रामिंग मैं अभी कर नहीं पाया था। मेरे हाथ में तो इतना था कि मैं किसी आदमी को किताब के अंदर भेज सकूं और अंदर की किताब की दुनिया में उसे छोड़ दूं।
यह सब कुछ वैसा ही था जैसे महाभारत में अभिमन्यु वाले किस्से में होता है कि उसे चक्रव्यूह में जाने का रास्ता तो पता था लेकिन बाहर आने का तरीका पता नहीं था। यहां फर्क इतना है कि अंदर गए आदमी को जान का कोई खतरा नहीं था। कम से कम किसी बाहरी हमले का उसे डर नहीं था, कमजोर दिल का कोई आदमी वहां के थ्रिल को बर्दाश्त न कर सके और दिल के दौरे से मर जाए, यह बात अलग है।
मेरा डर था भी यही। मैं चाहता था कि मैं किताब की खोज पूरी कर लूं। आदमी किस तरह किताब के भीतर जाए, वहां किस तरह किताब का पूरा मजा ले और फिर किस तरह किताब से बाहर निकले, इसकी मैं पूरी प्रोग्रामिंग तैयार कर लेना चाहता था।
मैं ऐसी व्यवस्था रखना चाहता था कि कोई व्यक्ति अगर पूरी किताब से गुजरे बिना, किसी वजह से बीच में ही बाहर आना चाहे तो उसे बाहर निकाला जा सके। इस सबकी प्रोग्रामिंग मैं अभी तक नहीं कर पाया था।
माफी चाहूंगा, मैं अपनी धुन में यह सब कहे जा रहा हूं, बिना इस बात का खयाल किए कि आप मेरी बात समझ भी पा रहे हैं या नहीं। और आप समझेंगे भी कैसे। आप कैसे जानेंगे कि मैं किस किताब की बात कर रहा हूं। इक्कीसवीं सदी के इन आखिरी सालों में किताब का जिक्र ही आपको बेवकूफी लग रहा होगा।
    आपका सोचना गलत नहीं है। किताब जैसी चीज तो कोई सौ बरस पहले हुआ करती थी। वह कंप्यूटर क्रांति से पहले की चीज थी। कंप्यूटर क्रांति ने धीरे धीरे किताब को प्रचलन से बाहर कर दिया था। जो कुछ पहले किताबों में उपलब्ध था, वह अब कंप्यूटर की हार्ड डिस्क, सीडीज़ और डीवीडीज़ पर आ गया था। इंटरनेट पर भी हर घड़ी यह आपके लिए उपलब्ध था। पहले होता यह था कि किसी किताब की जरूरत है तो किताबों की दूकानों या लाइब्रेरियों की खाक छानते फिरो। कंप्यूटर और फिर इंटरनेट के आने के बाद दुनिया की कोई भी किताब आपके मॉनीटर के परदे पर आ सकती थी। जरूरी किताब है तो वह आपकी हार्ड डिस्क पर होगी ही वरना उसकी सीडी या फ्लॉपी आपके पास होगी। न हो तो इंटरनेट पर आप आसानी से उसकी तलाद्गा कर सकते थे। या फिर अपने किसी दोस्त से, जिसके पास वह किताब उपलब्ध हो, ई-मेल से मंगवाकर अपने सिस्टम में ले सकते थे।
    जाहिर है, किताब के रूप में किताब की उपयोगिता खत्म हो गई थी। दुनिया का सारा ज्ञान आपके कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाने मात्र से, आपके मॉनीटर पर आ सकता था।
    इतना ही नहीं, दुनिया का सारा साहित्य वीडियो बुक्स के रूप में भी आ गया था। एनिमेशन की तकनीक इक्कीसवीं सदी के शुरू के दस-बीस सालों में ही इतनी विकसित और इतनी सस्ती हो गई थी कि उसके बाद का साहित्य शब्दों के बजाय वीडियो छवियों के द्वारा तैयार किया जाने लगा था। यानी सीधे विजुअल में ही बनने लगा था। धीरे-धीरे पुराना सारा साहित्य भी इसी तरह वीडियो बुक्स में आ गया था।
    इसमें कोई शक नहीं कि शब्दों में लिखे साहित्य की तुलना में दृश्यों में तैयार किया गया वीडियो साहित्य लोगों के लिए ज्यादा ग्राह्य था। उन्हें शब्दों के आधार पर कल्पना करने के बजाय सीधे दृश्य रूप देखने को मिल रहे थे।
    शाब्दिक पुस्तक से दृ्श्य पुस्तक की ओर ले जाने की यह प्रक्रिया बहुत सहज थी। फिल्म और टेलीविजन ने बहुत पहले से ही घटनाओं को दृश्य रूप में देखने की आदत लोगों में डाल दी थी ।
    जब किताब थी, तब लोगों को पढ़ने आदत ज्यादा नहीं थी। ज्यादातर काम हाथ से ही करने पड़ते थे। मशीनें भी धीमी रफ्तार की होती थीं इसलिए आदमी के पास किताबें पढ़ने की फुरसत ही कम होती थी। लेकिन इक्कीसवीं सदी के आधे तक आते-आते ज्यादातर काम रोबो और कंप्यूटरों के हवाले कर दिए। तब इनसान के पास फुरसत ही फुरसत हो गई।
    इस फुरसत में वह मनोरंजन के लिए वीडियो पुस्तकों और वीडियो खेलों में व्यस्त हो गया।
    लेकिन वीडियो पुस्तकें एक सीमा तक ही आदमी को बहला सकती थीं। आखिर इस सबमें आदमी की अपनी भूमिका क्या है? वह दर्शक ही तो है न। अपने सामने चीजों को घटते देखता है। उसमें कोई हिस्सेदारी नहीं कर सकता।
    वीडियो गेम में जरूर हिस्सेदारी होती थी। एक तरफ आदमी खुद होता था और दूसरी तरफ कंप्यूटर होता था। और खेल की बिसात होती थी। लेकिन यहां दित यह थी कि खेल की शुरुआत में कंप्यूटर भले ही बाजी मार ले जाता, लेकिन धीरे-धीरे आदमी की समझ में कंप्यूटर की चालें आने लगतीं और वह कंप्यूटर को मात देने लगता। यानी यहां भी आदमी बोर होने लगा। उसे कुछ नया चाहिए।
    इसे मैंने चुनौती के रूप में लिया और तय किया कि मैं कोई ऐसी चीज खोज निकालूंगा जो आदमी की इस बोरियत को दूर करे। अब मेरे सामने संकट यह था कि इस काम में समय पता नहीं कितना लगे। और तब तक मैं कुछ और कर नहीं सकूंगा। इस दौरान मेरी रोजी-रोटी का क्या होगा और जो खर्चा इस खोज पर होगा वह कहां से आएगा?
    इस संकट से मुझे उबारने के लिए मेरा व्यवसाई दोस्त अनंतपाणि आगे आया। उसने मुझे आश्वासन दिया कि जब तक मेरी यह खोज पूरी नहीं होती, तब तक के मेरे पूरे खर्चे वह उठएगा। द्गार्त सिर्फ यह होगी कि मेरी इस खोज पर उसका कॉपीराइट मेरे बराबर का ही होगा। इससे जो भी कमाई होगी, उसके आधे-आधे के हिस्सेदार हम दोनों होंगे। इस आशय का एक इकरारनामा भी हम दोनों ने तैयार कर लिया था। इसकी एक-एक प्रति हम दोनों के वकीलों के पास सुरक्षित रख दी गई। और मैं बेफिक्र होकर अपने काम पर जुट गया।
    सबसे पहला सवाल यह था कि खोज के लिए किस दि्शा में काम किया जाए। वीडियो खेलों और वीडियो पुस्तकों से लोग उब गए थे। तो अब ऐसा क्या हो जो इससे आगे की चीज हो?
    अचानक मेरे दिमाग में कौंधा कि क्यों न इन दोनों को मिला दिया जाए। वीडियो पुस्तक हो लेकिन आदमी सिर्फ उसका दर्शक या निर्माता न हो बल्कि वह स्वयं भी उसका एक पात्र हो। वह अपने सामने घटनाओं को सिर्फ घटता ही हुआ न देखे बल्कि वह खुद भी उन घटनाओं के बीच में हो। यह किसी नाटक या फिल्म में अभिनय करने जैसा भी न हो क्योंकि वहां तो सब कुछ तयशुदा होता है और तयशुदा चीजों में थ्रिल नहीं होता। बल्कि वह तो कहीं ज्यादा उबाऊ होता है।
    तो फिर यह सब कैसे किया जाए! आदमी उन स्थितियों के बीच में हो लेकिन फिर भी न हो। आदमी को लगे कि वह घटनाओं के बीच हिस्सेदारी कर रहा है लेकिन वह वास्तव में वैसा कुछ भी न कर रहा हो। जो कुछ हो, वह उसके महसूस करने के स्तर पर हो। और यह महसूस करना ऐसा भी हो कि आदमी को कहीं से यह न लगे कि वह वास्तव में उन स्थितियों के बीच में नहीं है। क्योंकि ऐसा लगते ही सारा थ्रिल, सारा मजा खत्म हो जाएगा।
    यानी मामला पूरी तरह मानसिक होना चाहिए।
    इस तरह का मानसिक वातावरण रचना मेरे लिए ज्यादा मुश्किल काम नहीं था। टेलीपेथी का सिद्धांत तब तक आम हो चुका था। जब आदमी कुछ सोचता है तो उसके दिमाग से एक खास तरह की विद्युतचुंबकीय तरंगें निकलती हैं। हर आदमी के दिमाग में इस तरह की विद्युतचुंबकीय तरंगों का रिसीवर भी होता है। जब कभी रिसीवर की फ्रीक्वेंसी आने वाली विद्युतचुंबकीय तरंगों की फ्रीक्वेंसी के बराबर हो जाती है तो रिसीवर उन विचारों को पूरी तरह पढ़ लेता है।
    अब मेरा काम आसान हो गया था। मेरे काम का पहला हिस्सा यह था कि मैं एक ऐसी प्रोग्रामिंग तैयार करूं जिससे किसी व्यक्ति के दिमाग के रिसीवर की फ्रीक्वेंसी पता की जा सके। दूसरे हिस्से में उसी फ्रीक्वेंसी पर विद्युतचुंबकीय तरंगें उस व्यक्ति की तरफ छोड़नी होंगी जिनसे उसके रिसीवर को उस पूरे वातावरण की अनुभूति हो सके जिसमें उसे ले जाना चाहता हूं।
    इसके बाद का काम ज्यादा जटिल था। उस आदमी के खास तरह की स्थितियों के बीच पहुंच जाने पर उसके अपने दिमाग से भी प्रतिक्रिया के रूप में कुछ विद्युतचुंबकीय तरंगें निकलेंगी जिन्हें अपने कंप्यूटरीकृत रिसीवर पर लेकर मैं यह पता लगा सकूं कि वह क्या करना चाहता है।
    मैं समझ रहा हूं, इस तरह के तकनीकी ब्योरों से आप जरूर ऊब रहे होंगे। सीधे शब्दों में मैं इतना बता सकता हूं कि यह सपने या स्मृति या हेलुसिने्शन से आगे की अवस्था होती है। यहां पर इनसान पूरी तरह जागते हुए थी काल्पनिक दुनिया में विचर रहा होता है।
    अपनी खोज में मैं यहां तक ही पहुंच पाया था। ऐसा प्रोग्राम मैं तैयार कर सकता था कि आदमी को किसी कहानी की शुरुआत में भेज दूं। पूरी कहानी की प्रोग्रामिंग भी कर सकता था लेकिन कहानी की इन स्थितियों में वह आदमी क्या कर रहा है, यह जानने का जरिया और अगर वह भटक गया है तो उसे बाहर निकालने का तरीका मैं अभी खोज नहीं पाया था।
    यहां तक पहुंचने में ही मुझे करीब एक साल लग गया था। हर महीने मैं अपनी प्रगति की रिपोर्ट अनंतपाणि को भेजता रहता था। इसके बावजूद काम में होती जा रही देरी का उलाहता देते हुए वह गाहे-बगाहे मुझे फोन करता रहता।
    आदत से वह बहुत उतावला था। यों भी उसका पैसा लग रहा था और वह चाहता था कि जल्दी से जल्दी मेरा काम पूरा हो और वह पैसा गई गुना बढ़कर उसके पास लौटकर आ सके। हो सकता है उसका डर यह भी हो कि मैं काम पूरा हो जाने के बाद कहीं उसे अंगूठा ही न दिखा दूं। वह हमेशा मुझे उस कांट्रेक्ट की याद भी परोक्ष रूप से दिलाता रहता।
    अपनी इस खोज का नाम मैंने 'किताब" रखा था। यह तो मैं आपको शुरू में ही बता चुका हूं। इसके दो हिस्से थे, एक में कंट्रोल रूम था और दूसरा एक बंद केबिन, जिसमें वह आदमी बैठता था जो किताब में जाना चाहता था। यों तो इस काम के लिए उसकी सीट की काफी थी लेकिन बाहर की बाधाएं उसकी एकाग्रता में खलल न डाल सकें इसलिए केबिन की जरूरत थी।
    एक दिन मैंने अनंतपाणि को बुलाकर यह सब दिखाया और उसे बताया कि अपनी खोज का महत्वपूर्ण हिस्सा मैं पूरा कर चुका हूं, थोड़ा-सा काम बाकी रह गया है।
    मैंने जो कुछ उसे दिखाया उससे वह चमत्कृत था। मैंने उसे बताया कि इतना मैंने कर लिया है कि किसी को भी किताब के अंदर भेज सकूं। प्रयोग के तौर पर मैंने उसे 'भेड़िया आया" वाली कहानी का प्रोग्राम सेट करके किताब के अंदर भेज दिया।
    वह बाहर आया तो खु्श था। कहने लगा, 'मैंने कहानी को ही बदल दिया है। तीसरी बार जब भेड़ चुगाने वाले ने 'भेड़िया आया--- भेड़िया आया" की पुकार लगाई तो कोई उसके पास नहीं गया। लेकिन मैं एक झाड़ी के पास छिपकर बैठ गया। जैसे ही भेड़िया आया, मैंने अपनी बंदूक से उसे मार गिराया और वह लड़का बच गया।
    इस प्रयोग के बाद मैंने अंदाजा लगा लिया था कि किताब के अंदर जाने वाले ज्यादातर लोग मूल कहानी का तो सत्यानाश ही करेंगे। कम ही लोग ऐसे होंगे जो कहानी को कोई रचनात्मक मोड़ दे पाएं।
    लेकिन इससे मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। किताब के अंदर मौजूद आदमी कहानी का कुछ भी करता रहे, मूल कहानी का मेरा प्रोग्राम कंप्यूटर की मेमोरी में ज्यों का त्यों सुरक्षित रहता।
    मेरा खयाल था कि यह सब देख लेने और किताब के भीतर से गुजर चुकने के बाद अनंतपाणि को यकीन हो जाएगा कि मेरी खोज सही दि्शा में जा रही है और जल्द ही अपनी खोज पूरी करके मैं इसका व्यावसायिक इस्तेमाल करने के लिए उसे दे दूंगा।
    लेकिन उस पर इसका दूसरा ही असर हुआ। उसे लगा कि खोज का असली काम तो पूरा हो चुका है। क्यों न इसका व्यावसायिक इस्तेमाल शुरू कर दिया जाए।
    मैंने उसे समझाने की को्शिश की कि अभी हमने शुरुआती सफलता ही हासिल की है। एक तरह से हमारी खोज का पहला चरण ही पूरा हुआ है। दूसरे और तीसरे चरण के काम अभी बाकी हैं। उन्हें पूरा किए बिना खतरा हो सकता है। और दूसरे यह भी कि उनके बिना न तो इस खोज का पेटेंट हमारे नाम हो सकेगा और न व्यावसायिक लाइसेंसिंग विभाग इसे व्यावसायिक रूप से इस्तेमाल करने का लाइसेंस ही देगा।
    लेकिन अनंतपाणि ने यह कहकर मेरा मुंह बन्द कर दिया कि मेरा काम सिर्फ खोज के तकनीकी पक्ष तक सीमित है। व्यावसायिक पक्ष वह खुद देख लेगा। उसने मुझे एक तरह से हिदायत देते हुए कहा कि इस खोज की तकनीकी तफसील मैं उसे मेल कर दूं। आगे का काम वह देख लेगा।
    मैंने एक बार फिर उसे जल्दबाजी के खतरों से आगाह करने की कोशिश की तो अनंतपाणि ने यह शक जाहिर किया कि कहीं मेरी नीयत में खोट तो नहीं आ गया है। उसने चेतावनी दी कि उसके जैसे चतुर व्यवसायी के सामने किसी तरह की चाल चलने की मैं कोशिश भी न करूं वरना मेरे शरीर के कपड़े तक बिक जाएंगे। क्योंकि ऐसा करने पर वह मेरे खिलाफ अनुबंध तोड़ने का मामला बना देगा और जितने पैसे उसने मुझे इस खोज के सिलसिले में दिए हैं, उन्हें ब्याज और हरजाने समेत वसूल कर लेगा।
    जाहिर है, मैं उसकी इस धमकी से घबरा गया। मैं फौरन इस खोज की तकनीकी तफसील तैयार करने में लग गया। पूरी रात जागकर मैंने वह तफसील तैयार की। कोशिश यही थी कि इस खोज के अधूरेपन की तरफ किसी का ध्यान न जाए। जहां जरूरी था, ग्राफ और डायग्राम भी बनाए। सुबह तक मेरा प्रेजेंटे्शन तैयार हो गया था। एक बार पूरे ध्यान से मैंने प्रेजेंटे्शन को देखा। एक-दो जगह कुछ सुधार किए और जब तसल्ली हो गई कि इसमें किसी तरह की कोई कोर-कसर नहीं छूटी, तब मैंने यह पूरा प्रेजेंटे्शन अनंतपाणि को मेल कर दिया।
    थोड़ी ही देर बाद अनंतपाणि का धन्यवाद भी मेल से मुझे मिल गया। उसने मेरे प्रेजेंटे्शन की बहुत तारीफ की और पिछले दिन के अपने व्यवहार के लिए माफी भी मांगी। उसने उम्मीद जाहिर की कि मैंने उसकी बात का बुरा नहीं माना होगा और इस बात को लेकर हमारी दोस्ती या अनुबंध में किसी तरह की दरार नहीं आएगी।
    मैं इस तरह के संदेष की उम्मीद कर रहा था। मैं जानता था कि अनंतपाणि बहुत ही व्यावहारिक किस्म का आदमी है। उसकी यह दिखावटी विनम्रता उसकी इसी व्यावहारिकता की वजह से थी। वरना वह अव्वल दर्जे का धूर्त है। जहां उसे चार पैसे मिलने की उम्मीद होती है, वहां तो वह विनम्रता का पुतला है लेकिन जहां जरा नुकसान होता दिखने लगे, फौरन सांप की तरह फन फैलाकर फुफकारने लगता है। लेकिन यह सब समझने के बावजूद मैं उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता था।
    मुझे पूरा भरोसा था कि दो या तीन दिन के भीतर ही वह किताब का पेटेंट करा लेगा और इसके व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए लाइसेंस भी ले लेगा। और हुआ भी ऐसा ही। उसने मुझे यह भी बताया कि लाइसेंस उसने मेरे ही नाम से लिया है, अपना नाम तो मेरे पार्टनर के तौर पर ही डाला है। यह सब उसने क्यों किया यह तब तो मेरी समझ में नहीं आया और जब समझ में आया तब तक काफी देर हो गई थी।
    अपनी इस सफलता की जानकारी देने जब वह मेरे पास आया, तब एक बार मन हुआ कि फिर से उसे इसके खतरों से आगाह कर दूं लेकिन उसकी नाराजगी के डर से इतना ही कहा कि इसका व्यावसायिक प्ाक्ष वही देखे, मैं फिलहाल किताब के दूसरे और तीसरे चरण पर अपना काम जारी रखना चाहूंगा।
    इसके लिए वह राजी हो गया। लेकिन उसकी दो शर्तें थीं। एक तो यह कि किताब को ऑपरेट करने का काम मैं उसके किसी आदमी को सिखा दूं और दूसरे यह कि उसके खयाल से तो 'प्रोजेक्ट किताब" का काम पूरा हो चुका है, इसलिए वह इस पर और पैसा खर्च करने के जिए तैयार नहीं है। अगर मैं चाहूं तो किताब से होने वाली आय के अपने हिस्से में से इस पर पैसे लगा सकता हूं। इतना अश्वासन उसने जरूर दिया कि किताब की खोज के दूसरे और तीसरे चरण पूरे हो जाने के बाद, अगर उसे लगा कि किताब में इन्हें जोड़ने का कोई फायदा हो सकता है तो इसके ऐवज में इस मद में हुए मेरे खर्चे की वह पूरी भरपाई कर देगा।
    मैंने उससे कहा कि इसका भी अनुबंध कर लेते हैं तो उसने कहा कि इसकी कोई जरूरत नहीं है। जिंदगी में बहुत कुछ ऐतबार से भी होता है।
    चूंकि मैं इस अधूरी किताब के खतरों से परिचित था इसलिए मैंने अनंतपाणि के आदमी को कुछ छोटी-मोटी बाल कथाओं के प्रोग्राम ही बनाकर दिए : जैसे कछुए और खरगो्श की दौड़ की कहानी, बंदर और मगरमच्छ की दोस्ती की कहानी, चालाक खरगोद्गा और घमंडी शोर की कहानी, भेड़िया आया वगैरह वगैरह। ये सब छोटी-छोटी कहानियां थीं और इनमें किताब के भीतर गए व्यक्ति द्वारा ज्यादा छेड़-छाड़ की गुंजाइश भी नहीं थी क्योंकि ये कहनियां इसी रूप में बचपन से सबके दिमागों में बैठी हुई हैं।

इस किताब को ऑपरेट करने का काम सीखने के लिए अनंतपाणि ने जिस नौजवान को भेजा था वह बहुत उत्साही लग रहा था। उसका नाम अभिषेक था। हालांकि मैं उसे उतना ही बताना चाहता था जितना किताब के संचालन के लिए जरूरी था लेकिन वह इसके अलावा भी बहुत कुछ जानना चाहता था। मैं उसके उत्साह को खत्म नहीं करना चाहता था इसलिए उसने जो कुछ पूछा मैं बताता चला गया।
जब अभिषेक कहानियों की प्रोग्रामिंग के तरीके पूछने लगा तब मैंने उसे बताया फिलहाल वह उन्हीं कहानियों को ऑपरेट करे जिनकी प्रोग्रामिंग उसे दी गई है। जरूरत के मुताबिक मैं उसे और कहानियों की प्रोग्रामिंग देता रहूंगा।
   
अनंतपाणि की किताब अच्छी चल निकली। यह मैंने उसे समझा ही दिया था कि किताब का ज्यादा प्रचार प्रसार न करे क्योंकि इसकी फिलहाल हमारे पास एक ही प्रति है। अधिक प्रतियां तैयार करने का खतरा अभी नहीं लिया जा सकता। जल्दी ही इसके मॉडल में सुधार करने पड़ेंगे। इस बीच इस मॉडल को कुछ सीमित ग्राहकों को ही उपलब्ध कराया जाए। यह भी देख लिया जाए कि लोगों को यह किताब कितनी पसन्द आती है।
    बात अनंतपाणि की समझ में फौरन आ गई। मामला जहां पैसों का हो वहां अनंतपणि की समझ काफी तेज हो जाती है।
    उसने अपने कुछ अमीर दोस्तों के माध्यम से किताब की जबानी पब्लिसिटी की। वह जनता था कि अगर उसने इंटरनेट या टेलिविजन चैनलों के जरिए किया और किताब क्लिक कर गई तो मुद्गिकल हो जाएगी।
    चूंकि जिन कहानियों की प्रोग्रामिंग मैंने की थी, वे सभी छोटी-छोटी कहानियां थीं इसलिए किताब का हर पाठक दस मिनट से आधे घंटे के भीतर ही किताब के अंदर रह पाता था। शुरू में किताब की दस-बारह द्गिाफ्ट रोज लग जाती थी। फिर शिफ्टें धीरे-घीरे बढ़ने लगीं।
    अभिषेक के बाद तीन और लड़्कों को किताब के ऑपरेटर के रूप में ट्रेनिंग दी गई। छह-छह घंटों की शिफ्ट में किताब 'पढ़ी"    जाती रही। जाहिर है, अनंतपाणि का और उसके साथ ही मेरा भी मुनाफा बढ़ता जा रहा था।
    किताब के इस ज्यादा इस्तेमाल से मेरे मन में डर पैदा हो रहा था कि कहीं उसके सिस्टम में कोई गड़बड़ी पैदा न हो जाए। लेकिन जब हर हफ्ते एक मोटी रकम मेरे बैंक खाते में आने लगी तो मैंने अनंतपाणि को रोकने या सचेत करने की कोशिश भी नहीं की। खुद को यह कहकर समझा लिया कि अगर मैंने ऐसी को्शिश की भी तो वह कहां मानने वाला है।
    मैंने इतना जरूर किया कि किताब के अगले चरण के काम में जी जान से जुट गया।
    इस बीच अनंतपाणि के कई संदे्ष वीडियोफोन और मेल पर मुझे मिले कि मैं कुछ और कहानियों की प्रोग्रामिंग करके उसे भेजूं क्यॊंकि जितनी कहानियों की प्रोग्रामिंग मैंने उसे दी थी, वे सब बच्चों की कहानियां थीं और उनमें ऐसा कुछ नहीं था जो उन्हें बार-बार देखा जाए। अनंतपाणि चाहता था कि मैं ऐसी कहानियों की प्रोग्रामिंग करके दूं, जो एडवेंचरस हों, कुछ सैक्स वैक्स हो, कुछ हिंसा, मारधाड़ हो।
    मैं जानता था कि वह ऐसा ही कुछ चाहेगा। मैंने उससे साफ कह दिया कि जब तक दूसरे और तीसरे चरण का काम पूरा नहीं हो जाता, तब तक मैं उसे ऐसी किसी कहानी की प्रोग्रामिंग नहीं दूंगा।
जब कई दिनों तक मैं उसकी इस मांग को पूरा करने से इनकार करता रहा तो एक दिन वह मेरे घर पर ही आ धमका।
    मैंने उसे बताया कि दूसरे और तीसरे चरण का काम काफी हद तक पूरा हो गया है। जल्दी ही किताब का नया संस्करण तैयार करके मैं व्यावसायिक इस्तेमाल के लिए उसे दे दूंगा। तब जिस तरह की कहानी वह चाहेगा, उसकी प्रोग्रामिंग उसे मिल जाएगी।
    उसने मेरे साथ ज्यादा बहस नहीं की। मेरा खयाल था, मेरी बात उसकी समझ में आ गई है और वह मुझसे सहमत है। लेकिन उसे समझने में पहली बार मैंने गलती की।
    इसका पता मुझे उस दिन चला जिस दिन मैंने किताब के दूसरे और तीसरे चरण का काम पूरा कर लिया था। यही बताने के लिए मैंने उसके वीडियाफोन पर संपर्क किया। मैंने उसे बताया कि अब मैं किताब का नया संस्करण भी जल्दी ही तैयार कर दूंगा और फिर हम बड़े पैमाने पर इसका उपयोग कर पाएंगे।
    जवाब में उसन मुझे बधाई दी और कहा कि मैं फौरन उसके पास पहुंच जाऊं।
    उसकी आवाज काफी थकी हुई लग रही थी। उसमें वह उत्साह नहीं था जो आम तौर पर किताब के मामले में किसी सफलता की खबर मिलने पर होता था। मैंने उससे कहा कि थोड़ा सा काम बाकी रह गया है। और फिर मैं थक भी गया हूं। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि हम अगले दिन सुबह मिल लें।
    लेकिन वह अगले दिन सुबह तक इंतजार करने के लिए तैयार नहीं था। वह कह रहा था कि सारा काम छोड़ कर मैं फौरन उसके पास पहुंच जाऊं। यह इमरजेंसी है।
    उसकी आवाज में धबराहट थी। मैंने उससे जानना चाहा कि अचानक ऐसी कौन सी इमरजेंसी आ गई है लेकिन वह एक ही बात दोहराए जा रहा था कि यह सब वह मुझे वहां पहुंचने के बाद ही बताएगा। बस मैं वक्त बरबाद किए बिना फौरन उसके पास पहुंच जाऊं।
    मैंने महसूस किया कि उसकी आवाज की घबराहट लगातार बढ़ती जा रही थी। तब पहली बार मुझे खटका हुआ कि कहीं किताब के साथ तो कोई गड़बड़ी नहीं हो गई है?
   
और सचमुच ऐसा ही था। जब मैं वहां पहुंचा तो अनंतपाणि और अभिषेक के चेहरे लटके हुए थे।
    मुझे देखते ही अनंतपाणि मेरी तरफ लपका। उसने मुझे बताया कि एक आदमी किताब के अंदर पिछले चौबीस घंटे से है।
    चौबीस घंटे से वह किताब के अंदर क्या कर रहा है? मैंने जितनी भी कहानियों की प्रोग्रामिंग उन्हें दी थी, किसी में भी इतना समय लगने की गुंजाइश नहीं थी। मैंने अभिषेक से पूछा कि किताब में किस कहानी की प्रोग्रामिंग में उसे भेजा गया है।
    अभिषेक का चेहरा अभी तक लटका हुआ था। मेरे मुंह से अपना नाम सुनकर उसने चेहरा उठाकर मेरी तरफ देखा। कुछ कहने की कोशिश में मुंह भी खोला। लेकिन वह इस कदर घबराया हुआ था कि उसके मुंह से द्गाब्द तक नहीं निकल रहे थे। कुछ अस्पष्ट से स्वर उसके मुंह से निकले। वह अनंतपाणि की तरफ इशारा कर रहा था। काफी को्शिश के बाद मैं इतना ही समझ पाया कि वह एक ही वाक्यांश लगातार दोहरा रहा था : इन्होंने ही कहा था--- इन्होंने ही कहा था---
    अनंतपाणि बहुत गुस्से से उसकी तरफ देख रहा था। मैंने अनंतपाणि से जानना चाहा कि अभिषेक क्या कह रहा है?
    अनंतपाणि ने बताया कि जो व्यक्ति अंदर है, वह शहर के प्रशासक का बेटा है। उसे मेरी कहानियां पसंद नहीं आ रही थीं। वह कुछ थ्रिलर चाहता था। उसी के दबाव में आकर अनंतपाणि ने एक बार मुझसे भी ऐसी ही कुछ कहानियों की प्रोग्रामिंग करने के लिए कहा था। जब मैंने टका-सा जवाब दे दिया तो उसने अभिषेक से ऐसा करने के लिए कहा। अभिषेक काफी तेज दिमाग का लड़का था। गुरुमंत्र वह मुझसे ले ही चुका था। लिहाजा उसने एक थ्रिलर कहानी की प्रोग्रामिंग तैयार कर ली।
    प्रोग्रामिंग तैयार कर लेने के बाद उसका इसरार था कि वह प्रोग्रामिंग एक बार मुझे जरूर दिखा दी जाए। लेकिन अनंतपाणि का मानना था कि मैं जरूर इस बात पर ऐतराज करूंगा और कोई न कोई अड़ंगा लगा दूंगा।
    वह सही सोच रहा था।
    लेकिन उसकी एक दित यह भी थी कि द्गाहर के प्रद्गाासक का बेटा उसे लगातार धमका रहा था कि अगर उसे किताब में कोई थ्रिलर न मिला तो वह किताब का लाइसेंस कैंसिल करवा देगा। अनंतपाणि यह भी जानता था कि उसकी धमकी कोरी नहीं थी। वह ऐसा कर भी सकता था। वह प्रशासक का लाडला बेटा था और प्रशासक उसकी किसी बात को टाल नहीं सकता था।
    वह रोज पूछता कि किसी थ्रिलर की प्रोग्रमिंग तैयार हुई या नहीं। जब उसे पता चलता कि अभी उस पर काम चल रहा है तो वह काम जल्दी पूरा करने की ताकीद देता और फिर अपनी धमकी दोहरा देता।
    जैसे ही उसे पता चला कि प्रोग्रामिंग पूरी हो गई है, वह फौरन आ धमका। किताब के अंदर भेजने से पहले अभिषेक ने उसे समझाना भी चाहा था कि वह कहानी में ज्यादा उलझने की कोशिश न करे और जितनी जल्दी हो सके, बाहर आ जाए। लेकिन वह उस थ्रिलर की कल्पना में इस कदर उलझा हुआ था कि उसने किसी की कोई बात नहीं सुनी।
    किताब का पाठक कहानी में कहां पहुंच गया है, यह जानने का जरिया तो था। एक मॉनीटर पर वह सारी छवियां उभर आती थीं जहां से कहानी का पाठक गुजर रहा होता। लेकिन उस समय किताब का मॉनीटर बिल्कुल काला था। उस पर कोई चित्र नहीं था।
    मैंने अनंतपाणि से पूछा कि स्क्रीन ब्लैंक क्यों है तो उसने बताया कि कहानी में कुछ अपराधी नायक का अपहरण कर लेते हैं और उसे एक अंधेरे कमरे में बन्द कर देते हैं। जब से वह अंधेरे कमरे में गया है तभी से स्क्रीन ब्लैंक है।
    ऐसी स्थिति में मेरी किताब के नए संस्करण में तो व्यवस्था थी। मैं ऐसे मानसिक सुझाव उसे भेज सकता था कि वह वही सब करता जो मैं चाहता। लेकिन किताब के इस पुराने संस्करण में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी।
    फिर भी कुछ न कुछ तो किया ही जाना चाहिए। अभी तो प्रशासक को पता नहीं है कि उसका बेटा कहां है एक-दो दिन तो वह बिना बताए भी घर से गायब होता रहता था। लेकिन तीन-चार दिन बाद तो वह उसकी खोज-खबर शुरू करेगा ही। ऐसे में यह जानना ज्यादा मुश्किल नहीं होगा कि बेटा दरअसल कहां गायब हुआ है।
    यहां अनंतपाणि ने मुझे यह भी आगाह कर दिया कि उसकी जिम्मेदारी कम और मेरी ज्यादा बनती है। किताब में आने वाली किसी भी तकनीकी खामी के लिए मैं ही जिम्मेदार हूं। यह पूरा धंधा मेरा ही है। अनंतपाणि तो इसमें सिर्फ पैसा लगा रहा है।
    उसकी इस बात के जवाब में मैंने यह कहने ही कोशिश की कि किताब को इस रूप में इस्तेमाल करने की सहमति तो मैंने कभी नहीं दी थी और उसने जो कुछ किया, मेरी इच्छा के विरुद्ध ही किया। यह बात मैं एक दोस्त से शिकायती लहजे में कह रहा था लेकिन जवाब एक चतुर व्यवसायी की तरफ से आया।
    अनंतपाणि कह रहा था कि यह सब जबानी बातें हैं। इनका कोई प्रमाण नहीं है जबकि उसके पास प्रमाण के तौर पर हमारे बीच हुआ वह शुरुआती इकरारनामा है जिसके अनुसार किताब के इस धंधे में उसकी भूमिका सिर्फ पैसे लगाने वाले की है, उसकी पूरी तकनीकी जिम्मेदरी मेरी है। और फिर लाइसेंस भी तो मेरे ही नाम से था।
    मै उसके जाल में पूरी तरह फंस गया था। मैं समझ गया था कि प्रशासक के बेटे के गायब होने की पूरी जिम्मेदारी वह मेरे सिर पर डालकर खुद किनारा कर लेगा। और एक तरह से यह भी तय हो गया कि अब जो कुछ करना है, मुझे ही करना है।

किताब के दूसरे और तीसरे चरण का पूरा ब्लूप्रिंट मेरे दिमाग में साफ था। मैं ऑपरेटर की कुर्सी पर बैठकर की बोर्ड पर झुक गया। मेरी कोशिश यह थी कि किसी तरह किताब के दूसरे और तीसरे चरण के अपने काम का इस्तेमाल इस किताब में कर सकूं।
    लेकिन ऐसी कोई व्यवस्था इसमें होती तो यह सब हो पाता। कई घंटे तक मैं कीबोर्ड से जूझता रहा लेकिन सब बेकार। मैं किसी भी तरह से भीतर फंसे् प्रशासक के बेटे तक नहीं पहुंच पा रहा था। जब तक वह भीतर से कोशिश नहीं करेगा, तब तक किताब का दरवाजा नहीं खुल सकता। किताब को ऑफ करके दरवाजे को खोलने की को्शिश भी मैं नहीं कर सकता था क्योंकि ऐसा होने पर मानसिक आघात से उसकी मौत भी हो सकती थी।
    कुछ हताशा और कुछ गुस्से में आकर मैं कीबोर्ड की कुंजियों को अनाप-द्गानाप दबाने लगा। अचानक मैंने देखा कि मॉनीटर का स्क्रीन काले से सफेद हो गया है। लेकिन अब भी उस पर किसी तरह की छवि नहीं थी।
    तभी मैंने देखा, अभिषेक उछला और किताब के दरवाजे की तरफ लपका। दरवाजा खुला हुआ था।
    मैंने राहत की सांस ली और दरवाजे की तरफ देखने लगा। मुझे भरोसा था कि किसी भी क्षण अभिषेक प्रशासक के बेटे को हाथ पकड़कर बाहर लाता हुआ दिखाई देगा। ज्यादा से ज्यादा क्या हो सकता है, वह अंदर बेहोश पड़ा हो। मरने की कोई आशंका नहीं थी।
    अभिषेक बाहर आया तो उसके चेहरे पर हवाइयां उड़ रही थीं। उसने बताया कि प्रशासक का बेटा वहां नहीं है।
    ऐसा कैसे हो सकता है?
    मैं लपक कर किताब के भीतर गया।
    ऐसा कैसे हो सकता है?
किताब की पूरी तकनीक आदमी के दिमाग से ताल्लुक रखती है। उसके भीतर बैठकर आदमी कुछ करता नहीं है। उसके सारे अनुभव मानसिक होते हैं। शारीरिक रूप से तो वह एक सोए हुए व्यक्ति और एक लाश के बीच की स्थिति में होता है।
    ऐसा कैसे हो सकता है?
    प्रशासक का बेटा ऐसे कैसे गायब हो सकता है? उसके साथ ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता था कि वह किसी मानसिक आघात से मर जाता लेकिन इसकी भी संभावना नगण्य थी। लेकिन उसके शरीर को तो किताब के अंदर होना चाहिए था।
    ऐसा कैसे हो सकता है?
    मेरे दिमाग में लौट-लौटकर एक ही सवाल आ रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है?
    मैंने अभिषेक से प्रोग्रामिंग दिखाने के लिए कहा। प्रोग्रामिंग के एक-एक स्टेप को अच्छी तरह जांचा-परखा। उसमें कुछ गड़बड़ियां जरूर थीं लेकिन ऐसा कुछ नहीं था जिसकी वजह से इनसान का द्गारीर ही गायब हो जाए।
    लेकिन ऐसा हुआ है। अब मेरे पास एक ही रास्ता बचा था कि मैं खुद किताब के भीतर जाऊं। प्रोग्रामिंग यही हो। अभिषेक से मैंने कहा कि इस पूरी प्रक्रिया को वह सेव करे। हार्ड डिस्क की केपेसिटी कई मिलियन जीबी की थी इसलिए जगह की कोई समस्या नहीं थी।
   
किताब के भीतर का अनुभव जितना मैंने सोचा था, उससे कहीं ज्यादा रोमांचक था। किताब के भीतर अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद मैंने अपने दिमाग को खुला छोड़ दिया। मैं नहीं चाहता था कि मैं अपने दिमाग को अपनी तरफ से कुछ सुझाव दूं। क्योंकि ऐसा होने पर मैं उस रास्ते पर न जा पाता जिस प्रशासक का बेटा गया होगा।
    जल्दी ही मैं कुर्सी के बजाय एक कार की ड्राइविंग सीट पर बैठा था। कार एक खूबसूरत वादी में से गुजर रही थी। लेकिन मेरा दिमाग वादी की खूबसूरती का मजा लेने के बजाय अपने मकसद में उलझा था। आगे दुद्गमनों का एक गुप्त अड्डा था। एक कसीनो की आड़ में वह गुप्त अड्डा चल रहा था।
    कसीनो की एक डांसर को मैंने पटा रखा था। वह उस दिन मुझे उस गुप्त अड्डे के भीतर जाने का रास्ता बताने वाली थी।
    जब मैं कसीनो के भीतर पहुंचा तो वह नाच रही थी। नाच पूरा होने के बाद उसने मुझे इशारा किया। मैं स्टेज के पीछे बने उस कमरे में गया, जहां डांसर अपने कपड़े बदलती थी। मैं कमरे में घुसा तो वहां कोई नहीं था। अचानक दरवाजा धकेलते तीन-चार आदमी अंदर घुसे और उन्होंने मुझे दबोच कर मेरे हाथ-पांव रस्सियों से बांध लिए। मैंने देखा, उनके पीछे वही डांसर खड़ी थी। उसने मुझे धोखा देकर फंसा दिया था।
    वे लोग मुझे एक कॉरीडोर में से घसीटते हुए ले गए। वहां से वे एक कमरे में घुसे। कमरे में एक अलमारी रखी थी। मैंने देखा उस अलमारी के उपर टाइम मशीन लिखा था। मैं समझ गया था कि ये लोग मुझे टाइम मशीन के जरिए किसी दूसरे वक्त में भेज रहे हैं ताकि मैं उनके वक्त में लौट कर फिर कभी उन्हें तंग न कर सकूं।
    टाइम मशीन का दरवाजा बंद होते ही अंधेरे ने मुझे घेर लिया। अचानक मैंने अपने आपको बहुत हल्का महसूस किया।
    और मैंने यह भी महसूस किया कि मैं किताब के मानसिक संवेग से मुक्त था। मुझे याद आ गया कि मैं प्रशासक के बेटे की तलाश में किताब के भीतर आया था।
    फिर धीरे-धीरे अंधेरा दूर होने लगा। मैंने देखा कि मैं एक पहाड़ी जगह पर हूं। कुछ-कुछ वैसी ही जगह जैसी कसीनो के आसपास थी। लेकिन वहां कसीनो नहीं था। कसीनो कहानी में था। लेकिन यह जगह कहानी में नहीं थी। फिर मैं यहां कैसे? मुझे तो किताब के भीतर होना चाहिए था।
    तभी एक विचित्र बात हुई। मुझे अनंतपाणि और अभिषेक की आवाजें सुनाई देने लगीं।
    दोनों परेशान थे कि प्रशासक के बेटे की तरह मैं भी गायब हो गया हूं। मैंने आवाज देकर उन्हें अपनी मौजूदगी का एहसास कराना चाहा लेकिन शायद मेरी आवाज उन तक पहुंच ही नहीं रही थी। क्योंकि वे आपस में ही बात करते रहे, मेरी किसी बात का जवाब वे नहीं दे रहे थे।
    आपस में काफी विचार-विमर्ष करने के बाद उन दोनों ने यह तय किया कि किताब को ही डिसमेंटल कर दिया जाए। न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी।
    मैं उन्हें ऐसा करने से रोकने की कोशिश करना चाहता था लेकिन मेरे पास बात उन तक पहुंचाने का कोई जरिया ही नहीं था।               
    इसके बाद कुछ खटपट की आवाजें सुनाई दीं और फिर सब कुछ शांत हो गया।
    अब मेरा ध्यान अपनी स्थिति की ओर गया।
    जहां मैं था, उसके थोड़ा नीचे से एक सड़क गुजर रही थी। उस पर से इक्का-दुक्का गाड़ियां भी गुजर रही थीं। मैंने देखा ये सभी बहुत पुराने जमाने की गाड़ियां थीं। कुछ-कुछ वैसी जैसी सौ साल पहले होती थीं।
    तो कहीं मैं बीसवीं सदी में तो नहीं पहुंच गया हूं?
    ऐसा कैसे हो सकता है?
    किताब की खयाली टाइम मशीन मुझे यथार्थ में सौ साल पीछे कैसे धकेल सकती है?
    और इससे भी बड़ा सवाल यह है कि अब मैं यहां उस प्रशासक के बेटे को कैसे तलाश करूंगा? और अगर वह मिल भी गया तो उसे कैसे आगे के वक्त में ले जा पाऊंगा?
    और क्या मुझे भी हमेशा के लिए यहीं रहना पड़ेगा?
    क्या आप मेरी कोई मदद कर सकते हैं?

1 comment:

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी जानकारी।