Monday, July 12, 2010

जलसा-एक अनूठी किताब

इधर एक बहुत ही महत्वपूर्ण और दिलचस्प किताब आयी है-जलसा.साहित्य और विचार का अनियतकालीन आयोजन.पहले आयोजन को नाम दिया गया है-साल 2010 अधूरी बातें. इसका संपादन असद जैदी ने किया है. यह हिन्दी के अन्यतम कवि और अप्रतिम गद्यकार मंगलेश डबराल को बासठवें साल के लिये समर्पित है।

यह एक तरह से समानधर्मा रचनारत लोगों का विनम्र तोहफ़ा है.इसमें कुल सत्ताइस नक्षत्रों की ज्योतियां झिलमिला रही हैं.यहां कवितायें हैं(
विनोद कुमार शुक्ल,चन्द्रकांत देवताले,लीलाधर जगूड़ी,अशोक वाजपेयी,ग्यानेंद्रपति, वीरेन डंगवाल,नरेंद्र जैन,देवी प्रसाद मिश्र,लाल्टू,कुमार अंबुज,सत्यपाल सहगल,निर्मला गर्ग,अजन्ता देव, ज्योत्सना शर्मा,नीलेश रघुवंशी,पंकज चतुर्वेदी,शिरीष कुमार मौर्य और तरूण भारतीय). कविताओं के अनुवाद हैं( पाई चुइ यी का त्रिनेत्र जोशी द्वारा किया गया अनुवाद और तादेउश रूजेविच का उदय प्रकाश द्वारा किया गया अनुवाद),डायरी है(मनमोहन और शुभा ),रविन्द्र त्रिपाटी और प्रियम अंकित के विमर्श परक आलेख हैं.इन कवियों की कुछ गद्य रचनायें भी हैं(देवी प्रसाद मिश्र की कहानी,अल्पायु में दिवंगत हो गयीं जोत्सना शर्मा का गद्य-सहस्तर का फूल और नीलेश रघुवंशी की टिप्पणियां)जर्मन भाषा सीखते हुए शिव प्रसाद जोशी के सारगर्भित अनुभव हैं और योगेन्द्र आहुजा के मनमौजी गद्य का नायाब नमूना-परे हट, धूप आने दे और अन्य वाक्य.इस किताब की जान है-कृष्ण कल्पित का मंगलेशजी पर लिखा गया संस्मरण परक लेख!

इस किताब के आवरण पर हुसैन की प्रसिद्ध छतरियां हैं.किताब खोलते ही हमरा साक्षात्कार एक अद्भुत चित्र से होता है-इसमें मोहन थपलियाल खासे बुजुर्ग नजर आते हैं;उनकी बगल में खासे युवा जगूडीजी कैमरे को स्मित मुस्कन में तक रहे हैं और तरूण मंगलेश का हाथ सैल्यूट की मुद्रा में है-सूरज के लिये.किताब के पिछले पृष्ठ पर नजीर की कब्र का फोटो अशोक पाण्डॆ के सौजन्य से छापा गया है. इसकी सामग्री पर आगे चर्चा होती रहेगी। फ़िलहाल मनमोहन की डायरी से एक अंश

मनुष्य शरीर की रक्षा उस पुल की तरह भी की जानी चाहिये जिस पर बार बार चलना होत है.यह वो खामोश और जादुई पुल है जो हमें हर बार नई जगह ले जाता है.नई उपत्यकाओं में,नई अधिपत्यिकाओं में,नए शिखरों की ओर..

5 comments:

अजेय said...

जानकारी के लिए शुक्रिया, नैथानी जी. लगता है काफी मेहनत से ये क़िताब बनाई गई है. पढ़्ने का मन हुआ है. मनमोहन जी की * अधिपत्यिका* में जाने के लिए तो बेताब हो गया हूँ. ये मेरे लिए एकदम *नई जगह* होगी :)

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यहां प्रस्तुति के लिये आभार

Ek ziddi dhun said...

Vijay Ji, Manmohan ke tukde men `pul kee tarh` ke baad `bhee` shabd chhoot gaya hai shayad. shandar panktiyan hain.

विजय गौड़ said...

@ Ek ziddi :बहुत बहुत आभार धीरेश भाई।
छूट गई गलती को दुरस्त कर दिया गया है।

Ramesh Rishi said...

Jalsa padhne ki ichchha jagrit ho gayi hai. Kripaya pata va mulya bhee soochoit karein.