Monday, September 20, 2010

बारिश

उत्तराखण्ड में बारिश की भीषड़ मार को झेलते हुए एक दौर में लिखी गई यह कविता आज फिर याद आ रही है। 


सब कह रहे हैं
बारिश बन्द हो चुकी है
मैं भी देख रहा हूं
बाहर नहीं पड़ रहा है पानी
पर घर के भीतर तो
पानी का तल
अब भी ज्यों का त्यों है;

सड़क पर भी है पानी
आंगन में भी है पानी
र के पिछवाड़े भी है पानी
फिर मैं कैसे मान लूं
बारिश बन्द हो चुकी है

7 comments:

naveen kumar naithani said...

घर टापकता है और घर में वो मेहमान हैं
पानी पानी हो रही है आबरू बरसात में

अशोक कुमार पाण्डेय said...

बहुत दिनों बाद आपकी कविता पढ़ी…बरसते रहिये बड़े भाई…आपसे जुदाई अखरती है…

Ashok Pandey said...

अच्‍छी कविता विजय भाई। आभार।

वाणी गीत said...

बारिश अभी बंद कहाँ हुई है ...!

डॉ. मोनिका शर्मा said...

बड़ी प्यारी कविता है ..... बधाई

शरद कोकास said...

बहुत कम शब्दों में बहुत बड़ी बात है इस कविता में ।[

अजेय said...

बड़ी प्यारी ज़िद है आपकी, विजय भाई! और इसी से भीतर का कवि पहचान मे आता है.