Tuesday, November 9, 2010

हरजीत का एक अप्रकाशित शे'र

(यह स्मृति में बसा हुआ है .हरजीत की किसी संग्रह में शायद नहीं है .उसकी किसी ग़ज़ल का हिस्सा भी नहीं है ।
देहरादून को याद करते हुए यह याद आ गया .आज सिर्फ यह शे'र )

मुझसे फिर मिल कि मेरी आँखों में
धान तैयार है कटने के की
लि

2 comments:

सुबीर रावत said...

शेर लिख्रकर हरजीत भाई की याद ताज़ा कर दी आपने. आभार. एक सीधे और सच्चे इन्सान थे हरजीत भाई.

प्रदीप कांत said...

bahut badhiya prayog hai bhaai