Saturday, December 18, 2010

किसान, टेक्नोलोजी और बाजार की अद्भुत फ़ंतासी:"तरबूज के बीज" (अरूण कुमार ’असफल’ )

युवा कहानी पर केन्द्रित "परिकथा" का विशेषांक थोडा देर से नजर से गुजरा .युवा कहानी का रचना संसार बाजार , प्रेम ,कार्पोरेट जगत और कुछ नितान्त निजी अनुभवों की दुनिया से साक्षात्कार कराता है.सुधी समीक्षकों और वरिष्ठ कथाकारों की नजर में युवा कहानी बहुत आश्वस्त नहीं कर रही है.परिकथा के इसी अंक में इस आशय की टिप्पणियां भी देखने मे आयी हैं.ऐसे में "पांच का सिक्का" फ़ेम कहानीकार अरूण कुमार ’असफल’ की कहानी "तरबूज के बीज" को पढ़ना एक सुखद अनुभव रहा.किसान आत्महत्या की पृष्ठ्भूमि में रची गयी यह कहानी यथार्थ और फेंटेसी का एक खूबसूरत समन्वय है। . लगभग बोध-कथा की ऊंचाई तक पहुंचती इस रचना में एक ऐसे किसान की कहानी कही गयी है जो आत्महत्या की जगह खोजते- खोजते परेशान है, जिसके लिये "दिन इतने खराब चल रहे हैं कि वह अगर जीना चाहे तो जीने में मुसीबत और अगर मरने में सुख की आस हो तो इस नेक काम में भी अडचन." आत्महत्या की नाकाम कोशिशों के दरम्यान उसे आदमी के रेशे और तरबूज के रेशे से तैयार किया गया बीज बेचने वालों से आकस्मिक सी लगने वाली भेंट होती है और वह जीने की कोशिशों के बीच मृत्यु की अस्तित्ववादी नियति की ओर धकेल दिया जाता है. हालांकि यह कोई अस्तित्ववादी कहानी नहीं है. यह ठोस यथार्थ को बांचने वाला एक कलात्मक बयान है. इस कहानी के ब्यौरे एक तरफ प्रेमचन्द की भूलती जाती परम्परा की याद दिलाते हैं तो दूसरी तरफ जैव प्रौद्योगिकी और बौद्धिक सम्पदा अधिकारों की दुन्दुभी से भरे नितान्त आधुनिक समय में किसान की स्थिति पर ध्यान भी आकर्षित कराते हैं.
इस कहानी के साथ एक बात और साबित हो गयी है की अब अरूण कुमार "असफल" ने अपनी कहानी का मुहावरा खोज लिया है और उनके शिल्प का एक विशिष्ट अन्दाज है- वे कई उठानों वाली कहानी के लेखक हैं. जब लगता है कि कहानी अपने क्लाइमेक्स में बस पहुंचा ही चाहती है वे उसे एक और दिलकश रास्ते की तरफ निकाल ले जाते हैं. यह निश्चित रूप से एक मुश्किल शिल्प है.लेखकीय प्रतिबद्धता और लोक-जीवन की गहरी समझ के बल पर अरूण ने यह हुनर हासिल किया है. इस ब्लाग के माध्यम से उन्हें बधाई!

2 comments:

अजेय said...

soochana ke liye shukriya. is kahani ko padhoongaa. abhee kuchh din pahale parikatha PDF vijay bhai se mili. un ki bhi ek dilchasp kahani is me hai.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

उस अंक की सबसे अच्छी कहानी है यह