Wednesday, January 26, 2011

शरीर का रंग गाढ़ा है मेरा

1982 में तेहरान में कला प्रेमी माता पिता के परिवार में जन्मे सालेह आरा वैसे  तो कृषि विज्ञान  पढ़े हुए हैं पर अंग्रेजी और फारसी में अपना ब्लॉग चलते हैं और फोटोग्राफी का शौक रखते हैं. अपने ब्लॉग पर उन्होंने 2005 में एक अफ़्रीकी बच्चे की ( नाम  नहीं ) लिखी और प्रशंसित कविता उद्धृत की है. इस मासूम कविता में ऊपर से देखने पर निर्दोष  सा कौतुक लग सकता है पर बहुतायद श्वेत समुदाय के बीच अपने शरीर के गहरे रंग के कारण अनेक स्तरों पर वंचना और प्रताड़ना  झेलने की पीड़ा की भरपूर उपस्थिति महसूस की जा सकती है.साथी पाठकों को इस दुर्लभ एहसास के साथ जोड़ने का लोभ मुझसे संवरण नहीं हुआ इसलिए कविता यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ :
 
शरीर का गाढ़ा रंग
 
जब मेरा जन्म हुआ तो काला था मैं
बड़ा होने पर भी काला ही रहा
धूप में घूमते हुए मैं काला बना रहा
डर से कांपते हुए भी काले रंग ने पीछा नहीं छोड़ा
बीमार हुआ तो भी काला
मरूँगा भी तो मैं काला ही मरूँगा.
और तुम गोरे लोग
जन्म के समय गुलाबी होते हो
बड़े होकर सफेदी लिए हुए
धूप में निकलते हो तो सुर्ख लाल
सर्दी में ठिठुर के पड़ जाते हो नीले
डर की थरथर पीला रंग डालती है तुम्हें
बीमार हुए तो रंग होने लगता है हरा
और जब मरने का समय आता है
तो तुम्हारे शरीर का रंग गहरा भूरा दिखने लगता है...
इस सब के बाद भी
तुम लोग
मुझे कहते हो
कि शरीर का रंग गाढ़ा है मेरा. 
 
                                   प्रस्तुति : यादवेन्द्र 

3 comments:

Kajal Kumar said...

एक अन्यंत सुंदर कविता पढ़वाने के लिए आपका बहुत बहुत आभार.

अजेय said...

and you call me colored !

यह कविता अंग्रेज़ी मे खूब SMS हुई उन दिनों. मेरी बिटिया ने स्कूल मे इस का पाठ किया....केवल एक टीचर को पसन्द आया.

हम बड़ी कविता आराम से रेजेक्ट कर देते हैं. अभार, विजय भाई, यादवेन्द्र जी.

विजय गौड़ said...

Anonymous noreply-comment@blogger.com

6:13 AM (13 hours ago)

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