Tuesday, May 3, 2011

आदत हो चुके ढकोसले



अपने लिखे या कहे की सत्यता पर तर्क करना, दृढ़ रहना एक बात है लेकिन उसे अन्तिम सत्य मान लेना, दूसरी बात। यह दूसरी बात ही है जो विवादों को जन्म देती है। आरोप और प्रत्यारोप का मैदान इसी की चौहद्दी में फलता फूलता है। यह बात मैं उस कविता पर बात करने के लिए कह रहा हूं जिसे पिछले दिनों अशोक ने फेस बुक पर लगाया। कवि बोधिसत्व की कविता- अब जबकि जान गया हूं।  कविता के प्रस्तुतिकरण का शीर्षक और उस के पक्ष में दर्ज अशोक की टिप्पणी के आधार पर कविता के पाठ में आ रही दितों को असहमति के रूप में दर्ज करने का मन हुआ था। इधर हिन्दी साहित्य की बिगड़ैल प्रवृति में जो खतरा दिखाई देता है, उसका शिकार हो जाने की आशंकाओं ने बहुत संभलकर लिखने की हिदायत दी थी, जिसका अक्षरस: पालन न कर पाने का खामियाजा भुगतना ही पड़ा। टिप्पणी पर रचनाकार बोधिसत्व की व्यंग्योक्ति से भरी प्रतिक्रिया का जवाब फेस बुक में दिया जाना संभव न लगा।
 

चींटियों को पिसान्न डालने से मोक्ष का कोई द्वार नहीं खुलता
(कवि अग्रज बोधिसत्व की यह कविता मैंने असुविधा पर भी लगाई थी...इस कविता में मुझे जो खास लगा वह यह कि कोई प्रगतिशीलता मनुष्यता के बिना सम्पूर्ण नहीं. जो मानवीय गुणों और व्यवहार से च्युत है वह किसी समाज के लिए आधुनिक या क्रांतिकारी नहीं हो सकता. अक्सर परम्परा को आधुनिकता के नाम पर खारिज कर दिया जाता है...लेकिन यह कविता कबीर के सार-सार को गहि रहे वाले विवेक से परम्परा के मानवीय पक्षों को बचा ले जाने की वकालत करती है)
अब जबकि जान गया हूँ
 

जबकि जान गया हूँ
चींटियों को पिसान्न डालने से मोक्ष का कोई द्वार नहीं खुलता
तो क्या चींटियों को पिसान्न डालना रोक दूँ।

जबकि जान गया हूँ
बाझिन गाय को चारा न दूँ
खूंटे से बाँध कर रखूँ या निराजल हाँक दू दो डंडा मार कर
वध करूँ मनुष्य का या पशु का
कोई नर्क नहीं कहीं
तो क्या उठा लूँ खड्ग

जबकि जान गया हूँ कि क्या गंगा क्या गोदावरी
किसी नदी में नहाने से
सूर्य को अर्ध्य देने से
पेड़ को जल चढ़ाने से
खेत में दीया जलाने से कुछ नहीं मिलना मुझे
तो गंगा में एक बार और डूब कर नहाने की अपनी इच्छा का क्या करूँ
एक बार सूर्य को जल चढ़ा दूँ तो
एक बार खेत में दिया जला दूँ तो
एक पेड़ के पैरों में एक लोटा जल ढार दूँ तो


जबकि जान गया हूँ आकाश से की गई प्रार्थना व्यर्थ है
मेघ हमारी भाषा नहीं समझते
धरती माँ नहीं
तो भी सुबह पृथ्वी पर खड़े होने के पहले अगर उसे प्रणाम कर लूँ तो...
यदि आकाश के आगे झुक जाऊँ तो
बादलों से कुछ बूँदों की याचना करूँ तो

जबकि जान गया हूँ
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ
देवता तो क्या मनुष्य भी नहीं बचे हैं अब
तो भी यदि अपनी पत्नी को देवी मान कर पूजा कर दूँ तो
अपनी माँ को जगदम्बा कह दूँ तो

जबकि जान गया हूँ
अन्न कोई देव नहीं
उसे धरती को जोत-बो कर उगाते हैं लोग
किंतु यदि कौर उठाते शीश झुका दें तो

ऐसा बहुत कुछ है
जो न जानता तो पता नहीं क्या होता
लेकिन अब जो जान गया हूँ तो
क्या करूँ..... पिता
क्या करूँ गुरुदेव
क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का
vijay: "क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का" yahi tou sankat hai is duniya ka ki ek vaigyanik jo jaan raha hota hai ki chhoda ja raha upgrah yadi kinhi karano se apni kasha tak nahi pahunch paayega tou zaroor koi kharabi aajane ki wajah... se hi esa hua par use chhode jane se pahle nariyal phodne ka anushthan karte hue wah apni asfalta ke prarambh ke maafiname ke liye juta hota hai. mareej ka ilaj sirf marj ki pahchan aur sahi aushdhi se ho sakta hai yah jaane wale bhi upar wale ke bharoshe ki baat karta hai, na jane kitne uddaharna hai. aapka janna unse alag kahan hai bodhi ji, dekh nahi paa raha hu. sirf kavita me kah dene bhar se mukat ho jaana ek suvidha se jyada kuchh nahi. kavita ek kharab awdharna ko bhi pusht kar ahi hai, mujhe tou yahi lag raha hai. ummeed hai itni tareefo ke beech is ek asahamati ko anytha nahi lenge. jo laga kaha.

बोधिसत्वमैं क्या कह सकता हूँ.....विजय भाई. कमप्यूटर की दूकान का उदघाटन अगरबत्ती के धुएँ और आरती के बीच करनेवाले लोग हैं समाज में। गोर्की ने लिखा है कि ढाई हजार हार्सपावर का जहाज पादरी के आशीष और पूजादि के बाद पानी पर चलाया गया। यह कैसी वैज्ञानिकता ...है। और व्यक्तिगत रूप से मैं भी जानता हूँ कि भुना हुआ गेहूँ चाहे आप कहीं भी बो दें नहीं उगेगा। अगर कविता एक खराब अवधारणा को पुष्ट करती है तो बहुत अच्छा नहीं करती। आगे कोशिश करंगे कि किसी क्रांतिकारी अवधारणा की पुष्टि करने वाली कोई कविता लिख पाऊँ। आप का काव्यास्वाद इस कविता ने बिगाड़ा यह अपपराध क्षमा करें। आगे गलती न करने की कोशिश करूँगा....
बोधिसत्व: "आगे कोशिश करंगे कि किसी क्रांतिकारी अवधारणा की पुष्टि करने वाली कोई कविता लिख पाऊँ।" 
vijay:  jwab shraratpurna hai bodhi bhai, lagta hai dostana rai aapko pasand na aayi. Khair.
बोधिसत्व: सचमुच अच्छा लगा विजय भाई लेकिन खराब अवधारणा को पुष्ट करने वाली बात को थोड़ा सा समझा दें....मुझे सचमुच नहीं समझ आया....
मैं राह देख रहा हूँ...देखूँगा.....बिना नाराज हुए....
vijay:  kya zaroori hai abhi hi darj karu ? yadi kahenge tou vistar se likhunga
kavita ko save kiye le raha hu, dusri any rachnao par jinse asahmati ubharti rahi hai, baat karte hue jikar karne ki koshish karunga, aalekh aapko bhi mail kar dunga. kab likh payunga abhi nahi kah sakta, haa likhunga zaroor

 

बोधिसत्व: अगली गलती करूँ कि उसके पहले कुछ समझा दो भाई...यहाँ कुछ संक्षेप में ही कह दो...कौन जीता है तेरी जुल्फ सके सर होने तक...
vijay: "सूर्य को अर्ध्य देने से
पेड़ को जल चढ़ाने से
खेत में दीया जलाने से कुछ नहीं मिलना मुझे...

तो गंगा में एक बार और डूब कर नहाने की अपनी इच्छा का क्या करूँ
एक बार सूर्य को जल चढ़ा दूँ तो
एक बार खेत में दिया जला दूँ तो
एक पेड़ के पैरों में एक लोटा जल ढार दूँ तो" is tou ke baad ka rth
hai tou kya ho jayega, yahi na. yahi kya ho jayega tou wahan bhi hai ki "कमप्यूटर की दूकान का उदघाटन अगरबत्ती के धुएँ और आरती के बीच करनेवाले लोग हैं समाज में।" kahir aapke wyangy ko mai kinhi any artho me nahi le raha hu . wyangy se parhej nahi yadi usme wyaktigat aham aur dusre ko dhool chatane ki sweekarokti na ho tou. aapka wyangy dhool chatata hua. afsos hai mujhe jo tippni dene ki himakat ki. yah aap akele ki dikkat nahi hai bodhi bhai. apr mera aasay kabhi bhi vivad paida karne ka nahi raha hai. aapko lutf aaye tou bhi ab aage mujhe yahan kahna uchit nahi lag raha.
बोधिसत्व: मैं आपकी पहली बात से सहमत हूँ....वह व्यंग नहीं आपके कथन का समर्थन था....अगर आप कुछ न कहना चाहें तो बात अलग है....उसके लिए आप कोई भी राह चुन सकते हैं....

''मात्र आदत हो चुके ढकोसलों में लगभग विलुप्त हो चुकी भावना का सतर्क शोध करती" यह कविता जिस बिन्दु से शुरू होती है वहां स्पष्ट एक चुनौति है। एक ऐसी चुनौति जिसमें हुंकार है, गर्जना है और दम्भ। ये तीनों क्यों हो ? गर्वोक्ति से भरी इन पंक्तियों के उत्स क्या हैं ? उनके निहितार्थ क्या हैं ? ये कुछ सवाल हैं जिनके दायरे में ही पाठ को खोला जाना संभव हो सकता है।

जबकि जान गया हूं
चीटिंयों को पिसान्न डालने से मोक्ष का द्वार नहीं खुलता
तो क्या चीटिंयों को पिसान्न डालना रोक दूं।


कविता के उत्स का जो अपना तर्क शास्त्र है, स्पष्ट है कि जो कुछ आदत हो चुके ढकोसलों में किया जा रहा था, उसकी निरर्थकता को जान भी लिया है तो भी उसे दुनिया के बदलाव की किसी भी गतिविधि को आगे बढ़ाते रहने में क्या फर्क पड़ने वाला है। वैसे "क्या" यहां प्रश्न के रूप में नदारद है, बल्कि कहें कि निरर्थक कार्रवाइयों को जारी रखते हुए ही गतिविधियों का आगे बढ़ाते रहने की सैद्धान्तिकी की जिद्द है। कविता में जिस पड़ने वाले फर्क की बात हो रही है, संभवत: किन्हीं खास सकारात्मक स्थितियों की ओर इशारा जैसा ही कुछ होना चाहिए, ऐसा मान रहा हूं। कविता के प्रस्तोता अशोक की टिप्पणी भी ऐसे ही अर्थ तक पहुंचने की राह दिखाती है। बावजूद इसके कविता में तर्क की जगह एक कुतर्क मुझे क्यों दिखायी दे रहा है ? यदि कुतर्क न भी कहूं तो जो तर्क है उसमें दम्भ, हुंकार और गर्जना क्यों सुनायी दे रही है ? यानी एक ऐसा तर्क जो किसी तरह के अन्य तर्क की गुजांइश से परे मानने की अवधारणा को साथ लिए चलता है। तर्क वही जो अक्सर सुनायी देते हैं कि क्या फर्क पड़ता है यदि एक मंदिर और बन जाये तो। ईश्वर तरंग हैं और मंदिर रेडियो स्टेशन। ब्रहमाण्ड रूपी ब्रॉड कास्ट स्टेशन से छूटने वाली तरंगे हर रेडियों में उतर जाएंगी। बनाओ, बनाओ, खूब बनाओ मन्दिर। लड़ो उन सब खाली पड़ी जगहों के लिए, मचाओ मार-काट, जो मानवता की जरूरत के लिए भी इसलिए उपयोग में नहीं दी जा सकती कि उस पर किसी न किसी पुरखे का अधिकार है।

यह कहना उपयुक्त लग रहा है कि सिद्धान्त और व्यवहार की अस्पष्टता के चलते ही हावी होते मनोगतवाद से कवि संचालित दिखाई दे रहा है। स्पष्ट है कि मनोगतवाद जब हावी होने लगता है तो स्थितियों का समूचित मूल्यांकन इतना भ्रामक होता है कि दिखाई दे रही स्थितियों से निपटने के लिए कर्ता अनायास ही व्यवहार की उस चपेट में होता है जिसको सिद्धान्त: अस्वीकारे हुए हो। यानी सिद्धान्त और व्यवहार की भिन्नता में प्रतिक्रान्ति का भाष्य हो जाना एक प्रवृत्ति हो जाती है। बेशक क्रान्ति को बेहद स्थूल अर्थों में इस्तेमाल करते हुए कवि बोधिसत्व ने प्रतिक्रिया के जवाब में उस व्यंग्यात्मकता का सहारा लिया हो जिसमें क्रान्ति का मखौल उड़ाया जाना निहित हो, पर कविता के भाष्य में निहित शब्द "क्रान्ति" तो वहां मौजूद ही है। हां सिद्धान्त और व्यवहार की भिन्नता में "प्रतिक्रान्ति" का वाहक हो जाना उसकी स्वाभाविकता है। कविता में मौजूद गड़बड़ी जिसको इशारे में खराब अवधारणा को पुष्ट करती हुई है, कहकर, मैंने सिर्फ एक छोटी सी टिप्पणी भर करनी चाही थी। आशय बिल्कुल स्पष्ट था कि कविता के मूल विचार से सहमति नहीं बन रही है।

इस कविता पर बात करने के लिए एक सवाल मन में उठ रहा है कि रचनाकार का भौतिक जीवन और सास्कृतिक जीवन क्यों एक नहीं होना चाहिए ? रचनाकार के जीवन की सम्पूर्ण पदचाप क्यों उसकी रचनाओं में सुनायी नहीं देनी चाहिए ?
व्यवहार ज्ञान से बढ़कर है। यह मेरा कथन नहीं महान विचारक लेनिन कह गये। क्योंकि मानते थे कि उसमें न सिर्फ सर्वव्यापकता का गुण होता है बल्कि प्रत्यक्ष वास्तविकता का गुण भी होता है। प्रत्यक्ष वास्तविकता की व्याख्या के लिए आस-पास के आन्तरिक अन्तर्विरोधों की पड़ताल जरूरी होती है। तभी देखी-जानी स्थितियों से प्राप्त ज्ञान से उस सिद्धान्त का प्रतिपादन हो सकता है जो उन्न्त से उन्न्त की ओर अग्रसर होता है। व्यवहार और सिद्धान्त का संक्षिप्तिकरण या एकमेव हो जाना इससे अलग नहीं हो सकता। बोधिसत्व की कविता में वे अपने अपने जुदा रास्तों के साथ है।

जबकि जान गया हूं
जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां
देवता तो क्या मनुष्य भी नहीं बचे हैं अब
तो भी यदि पत्नी को देवी मान कर पूजा कर दूं तो
अपनी मां को जगदम्बा कह दूं तो

बहुत स्पष्ट श्ब्दों में जो स्वीकारोक्ति है वह सिद्धान्त के साथ है, जिसमें अभी तक के ज्ञान विज्ञान से बनी समझ के प्रति कोई संदेह नहीं लेकिन व्यवहार में उसके लागू करने के सवाल पर जो द्विविधा और असमंजस है वह एक तर्क बन जा रहा है- यदि ऐसा कर दूं तो
और इस "तो" से जो ध्वनी उठती है वह एक चुनौति भी है कि तो क्या हो जाएगा ?

यहां कहना पड़ रहा है कि अप्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान व्यवहारिक दिक्कतों का कारण हो जाता है। ज्ञान प्रत्यक्ष का दर्शन है। प्रत्यक्ष ही रूप की समस्या को हल करने में सहायक होता है और विषय वस्तु का सवाल सिद्धान्त से हल किया जा सकता है। लेकिन इन दोनों समस्याओं को व्यवहार से अलग कतई हल नहीं किया जा सकता। पर कविता व्यवहार के सवाल पर ही एक गलत समझ के साथ हो जाने की चुनौतियों को रख रही है। स्पष्ट है कि यह दम्भ भरी चुनौति अप्रत्यक्ष ज्ञान से ही हासिल हुई समझ का नमूना है। यह अप्रत्यक्षता कहां से आती है ? तय है कि इसका उत्स फेशन में मौजूद प्रगतिशीलता के मानक हैं जबकि भीतर जड़ जमायी संकीर्णता अवचेतन के बहाव में आ जाती है। यही कारण है कि उसका बहुत प्रकट रूप वहां ज्यादा साफ दिख रहा होता है जब रचनाकार के निजी जीवन और रचना से उदघाटित होते सत्य स्पष्ट होते हैं और साथ-साथ दिखाई देते हैं। अप्रत्यक्ष ज्ञान की यह दिक्कत ही है कि जब चाहे उस पर यकीन किया जा सकता है और जब मन हो भाषायी घुमेर देकर उस से हटा जा सकता है। विचलन की इस अवस्था को कई बार व्ववहार में लचीलेपन की संज्ञा वाली शब्दावली कह दिया जा रहा होता है। यहां लचीलेपन की वह प्राकृतिक व्याख्या अट नहीं पा रही होती है जो शहतूत की टहनी-सा मजबूती वाला वास्तविक लचीलापन होता है। व्यवहार में वास्तविक लचीलापन सिद्धान्त पर दृढ़ रहते हुए ही संभव हो सकता है। कला में वही यथार्थ को परिभाषित करता है, वहां यथार्थ की पूर्णता के लिए यथार्थ की जरूरत होती है। जोखिम उठाने की ललक होती है। विश्व के रूपान्तर में सक्रिय सहयोग का निर्धारण होता है। महज ज्ञान प्राप्त कर लेने और अमल में लाये बिना उसका जाप करते रहने से दुनिया के रूपान्तर की प्रक्रिया का एक भी कदम नहीं बढ़ सकता।
क्रांति सिर्फ मारकाट की कार्रवाइयां नहीं, जैसा कि बोधिसत्व जी की टिप्पणी इशारा करती है। सिद्धान्त और व्यवहार की सही समझ के साथ चरण बद्ध प्रक्रिया में अपनी निश्चित भूमिका के साथ मौजूद रहना भी क्रांति का हिस्सा हो जाना होता है। एक रचनाकार की भूमिका उसकी रचना के सत्य से ही निर्धारित होती है। सत्य को लागू करने में आ रही दितों को बेचारगियों की तरह जाहिर करने से सत्य कहीं अंधेरे कोनों में खो जाता है। व्यवहारिक दिक्कतों को ठीक से समझकर, लागू करने की अस्पष्टता को, बहस का हिस्सा बना देना कहीं ज्यादा सार्थक है। रही बात सामंती मूल्यों की, दक्षिपंथी मान्यताओं की, तो दुनिया के कई हिस्सों में आगे बढ़ चुके समाजों के अनुभव आज हमारे सामने हैं। उनकी सत्यता के सवाल पर संदेह न रहा है। उन्हें फिर-फिर परखने की कार्रवाइयां एक झूठ को स्थापित करने की चालाक कोशिशें हैं। मनोगत कारणों से उपजा एकांगीपन। वस्तुगत यथार्थ के आगे बढ़ जाने की स्थितियों से पिछड़ जाने पर ही कटटरपंथी मान्यताएं लुभाने लगती हैं। रचना के सत्य और जीवन के सत्य को अलग-अलग मानने की हठधर्मिता व्यवहार का हिस्सा हो जा रही होती है। रचना में कलावाद को इससे अलग नहीं माना जा सकता।

समाज को बदलने की प्रक्रिया और उसे बेहतर देखने की उम्मीदों भरी हमारी रचनाओं की पड़ताल की जाए तो देखेंगे कि उसकी सीमाएं वैज्ञानिकता और तकनालॉजी की सीमा भर नहीं है, बल्कि वस्तुगत यथार्थ से हमारे आत्म साक्षात्कार की श्रेणीबद्धता उसका एक कारण है। सामाजिक बदलाव में दर्शन की विशिष्टता आध्यात्मिक और भौतिकवादी अन्तर्विरोधों पर निर्भर होती है। विशिष्टता के इस पहलू के आधार पर ही दोनों की परस्पर निर्भरता तथा विरोधपूर्ण समग्र मूल्यांकन पर ही रचनात्मक कृति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार होती है। अन्तर्विरोधों की विशिष्टता और जटिलता पर विचार किए बगैर रचना के किसी एक धुर छोर तक पेंग मार जाने की अवस्था से बचा नहीं जा सकता। भाववादी रचनाओं के साथ यही दिक्कत होती है कि विशिष्टता से बचकर वे नितांत निजीपन की स्थितियों को सर्वोपरी मान लेने के साथ होती हैं। व्यवहार में एकांगीपन भी इन्हीं स्थितियों में जन्म लेता है। सिर्फ परम्परा और आधुनिकता का जिक्र भर कर देने से अन्तर्विरोधों की विशिष्टता उभर नहीं पाती है। मनोगत आग्रहों से मुक्त होकर ठोस धरातल पर टिका हमारा आत्म खुद की आलोचना का आधार दे सकता है। आत्म से साक्षात्कार की उन्नत अवस्था में ही स्वंय की रचना पर आलोचनात्मक टिप्पणी हमें तिलमनाने की बजाय फिर से पुनर्विचार करने का अवसर दे सकती है। तर्क की जमीन पर खड़े होकर तभी हम दोस्ताना संघर्ष के रास्ते को चुन सकते हैं।
 

विजय गौड़

32 comments:

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

भाई, समकालीन हिंदी कविता परम्परा और आधुनिकता के ऐसे असंख्य अंतर्विरोधों से भरी पड़ी है... भाई बोधिसत्व की यह कविता एक बारगी जिस किस्म की बेचैनी और उत्सुकता पैदा करती है, वह अंत में एक पारंपरिक हताशा में समाप्त होती है, और एक ऐसी दिशा-हीनता की ओर ले जाती है, जहाँ परम्परा के आगे तर्क का अस्वीकार ही होना है.. एक सामान्य भारतीय 'उत्तर आधुनिक मानसिकता' का प्रत्याख्यान है यह कविता..

dhiresh saini said...

kavita shuru hi behad pratigaami aur hinsak dhag se hoti hai. lekin aisa hona ajkal koii hairaanee paida nahi karta.

dhiresh saini said...

America Se BHARAT BHUSHAN TIWARI ki tippani jo unhone ye kavita padhkar mujhe mail kee thee-
अब जबकि जान गया हूँ

जबकि जान गया हूँ
सुनील गावस्कर की चोट बाबा की भभूत से ठीक हुई थी
उनके देहावसान पर सचिन तेंदुलकर भी रोया था
भारत ने विश्व कप हरभजन के या युवराज के गुरूजी के प्रताप से जीता
तो क्यों ना...

जबकि जान गया हूँ
देश को गांधी से अधिक शिवाजी की ज़रूरत है
भगत सिंह और राजगुरु वन्दे मातरम् कहते हुए फांसी के तख्ते पर चढ़े थे
गुजरात का 'विकास' का मॉडल तारीफ़ के काबिल है
तो क्यों ना...

जबकि जान गया हूँ
ब्राह्मण हिन्दुओं की बौद्धिक विरासत के संरक्षक हैं
भारत में आरक्षण की आवश्यकता ख़त्म हो चुकी है
भगवान राम 'वहीं' अवतरित हुए थे
तो क्यों ना..

ऐसा बहुत कुछ है
जो न जानता तो पता नहीं क्या होता
लेकिन अब जान गया हूँ तो
क्यों ना...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भारत भाई ने यह पैरोडी मुझे भी मेल की थी. इसे पढते हुए ही मुझे लगा कि कविता कों धैर्य से पढाने की जगह कुछ शब्दों, कुछ प्रतीकों कों लेकर अति संवेदनशील (जिसकी परिणिति संवेदनहीनता में होनी ही है) तरीके से प्रतिक्रया की गयी है. शब्द कविता के मूल भाव पर हावी हो गए हैं.प्रकृति के प्रति जहाँ सामंतवाद में धार्मिक भय और लोभ पैदा करके चींटियों कों पिसान्न, जानवरों कों चारा, प्रकृति के प्रति श्रद्धा जैसी चीजें थीं तो क्या उस भय के समाप्त हो जाने के बाद यह सब समाप्त हो जाना चाहिए? क्या बुजुर्गों का आदर भी 'सामंती' मूल्य हो गया है? क्या यह जान लेने के बाद कि बीमारी असाध्य है उस व्यक्ति कों लैटिन अमेरिका के प्राचीन आदिवासी समाजों की तरह मरने के लिए यूं ही छोड़ दिया जाना चाहिए? किस धार्मिक ग्रन्थ में पत्नी की पूजा करने का जिक्र है? क्या यह कविता पत्नी की पूजा करने की जो बात कर रही है वह अभिधा में दिया-बत्ती लेकर आरती करने की है...प्रेमचंद गांधी फिर भी संयत हैं जहाँ वह आरम्भ कों सकारात्मक बताते हुए अंत पर आपत्ति करते हैं ...लेकिन धीरेश कों अगर यह कविता शुरू से ही आक्रामक लगती है तो मेरे लिए इसे समझ पाना मुश्किल है.

भारत भूषण तिवारी said...

अशोक भाई,
आपने कविता के मेरे पाठ में धैर्य की कमी, अति-संवेदनशीलता (और अंततः संवेदनहीनता) जैसी बातों की ओर ध्यान दिलाया इसका शुक्रिया. कविता का मूल भाव समझ में आने के लिए शायद कवि से नज़दीकी या रचना प्रक्रिया में सहभागिता ज़रूरी होती है, इसीलिये मैं मूल भाव को 'मिस' कर गया और मेरी समझ पर शब्द हावी हो गए.
अगर मान भी लिया जाए कि यह कविता पत्नी की पूजा करने की जो बात कर रही है वह अभिधा में दिया-बत्ती लेकर आरती करने की नहीं है, तब भी सूर्य को पानी देने, खेत में दिया जलाने, पृथ्वी को प्रणाम करने, कौर उठाते शीश झुकाने जैसी बातों का क्या मतलब है. इन सारी क्रियाओं से कौनसी मनुष्यता प्रदर्शित होती है? बुजुर्गों के प्रति आदर अलग बात है पर इन क्रियाओं से प्रदर्शित होने वाली प्रकृति के प्रति श्रद्धा को क्या सचमुच आप इतना कीमती मानते हैं कि उसे 'पर्पीच्युएट' किया जाए.
इस कविता के पक्ष में जितने तर्क दिए जा सकते हैं, वे सभी मेरी काव्यात्मक प्रतिक्रिया (जिसे आप पैरोडी कहते हैं) के पक्ष में भी खड़े किया जा सकते हैं. अगर यह कविता 'जानने' की वैज्ञानिकता के बरक्स 'अजाने' को सेलेब्रेट करती है, तो मेरी कविता (या पैरोडी) 'इनवर्स' तरीके से 'जाने' और 'अजाने' के बीच झूल रहे मन के द्वंद्व को उभारने का काम करती है.

अविनाश वाचस्पति said...

पिसान्‍न नहीं
साबुतान्‍न डाल दें
स्‍वयं पीस लेंगी चीटिंयां
आलसी नहीं
श्रमजीवी होती हैं चीटियां
नहीं भेजती हैं चिट्ठियां
भेजो पिसान्‍न
या साबुतान्‍न
पर मन माने तो भेजो
टोटका मत मानो
हमें भी अच्‍छा लगता है
मेहनत करना
गिरने पर बार बार चढ़ना
चढ़ना और फिर चढ़ ही जाना
पीस लेंगी जरूर
दानदाता जी हुजूर
पीसना अन्‍न का
नहीं होता है कसूर
मन न पीसो
विचार न पीसो
पीसो बुरे विचार
निकाल दो कचूमर
दांतों में दबा दबाकर।

अनूप शुक्ल said...

कविता के बहाने रोचक बातचीत पढ़कर अच्छा लगा। बहुत अच्छा अंदाज कविताओं की चर्चा करने का।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भारत भाई, नजदीकी का सवाल उठाकर आपने सारी चर्चा की वस्तुपरकता पर सवाल उठा दिया है. दूरी तो मेरी आपसे भी नहीं है साथी.शायद आप भूल गए कि विभूति राय के मुद्दे पर मैं उनके नहीं आप लोगों के साथ था...और भी मुद्दों पर.

Anonymous said...

बोधि की कविता के सन्दर्भ में आप लोगों के बीच बेहद समृद्ध बहस में सीधे हस्तक्षेप न करते हुए मैं एक आध अनुभव आपके साथ साझा करना चाहता हूँ. इलाहाबाद विश्विद्यालय में जब पढ़ाने आया तो किसी भी कक्षा को पढ़ाना शुरू करने से पहले मैं छात्रों से कहता था कि पैर छूने को मैं अच्छा नहीं मानता क्योंकि इसमें इतना झुकना पड़ता है कि दो मनुष्यों के बीच गैर -बराबरी ज़्यादा प्रकट होती है, एक की दूसरे के प्रति इज्ज़त उतनी नहीं. तमाम छात्र नेताओं को देखता था कि वे गुरु जी का पैर छूते हुए एक धमकी भरे अंदाज़ में कहते थे ," गुरूजी! हम आपका बहुत सम्मान करते हैं." . लिखने में यह टोन आ ही नहीं सकती, लेकिन आशय यहाँ होता था कि यदि गुरु जी ने उनका कहा नहीं माना तो वे सम्मान भूल जाएंगे और तब गुरु जी समझ लें कि आगे क्या होगा. मतलब यह कि पैर छूने में जो बचा खुचा सम्मान भाव रहा होगा उसे भी गुरु को दबाव में लेने की नीति के तहत बरतते थे. मैं छात्रों से कहता कि गले लगना, नमस्कार करना और हाथ मिलाना सम्मान देने के बेहतर तरीके हैं. इसपर छात्रों की मुझसे और आपस में भी खूब बहस होती, लेकिन कुछ छात्र तब भी यही कहते कि आप की बात ठीक है, लेकिन ये हमारी परम्परा है ,आप को जो लगता हो हम तो आप का पैर छूएंगे. मैं मज़ाक में कहता कि तब मैं भी तुम्हें दौड़ा कर बदले में तुम्हारा पैर छुऊँगा , क्या बढ़िया दृश्य होगा! बहरहाल , कई सालों में कुछ ही छात्र बदले और मैंने भी थक कर यह सब उपदेश बंद कर दिया. अब मैं पैर छूने बढ़ रहे किसी भी छात्र को एक बार मना तो करता हूँ, अगर उसकी गति से मेरी गति तेज़ हुई, लेकिन छू ही लिया, तो आशीर्वाद दे देता हूँ.
इस सन्दर्भ में एक बात और गौर करने लायक है. पैर छूने के ही नज़दीक था पुराने समय का आदाब जो लगभग ९० डिग्री पर कमर को झुका कर किया जाता था. बाद के समय में झुकाव लगभघ ख़त्म हो गया, माथे पर हाथ लगा कर महज 'आदाब ' शब्द कहना रह गया. 'पांव लागी' शब्द का भी व्यवहार मैंने बगैर झुके या महज थोड़ा सा झुक कर लोगों को करते देखा है. ज़ाहिर है कि अभिवादन में झुकाव कम होते जाना और पुराने शब्द का रह जाना यह दिखाता है कि बगैर मेरे जैसों का लेक्चर सुने भी लोग बराबरी के आधुनिक मूल्य से संचालित होते हैं और बीच का रास्ता अपनाते हुए आदतन शब्द का व्यवहार जारी रखते हैं. कुछ पेचीदा परिस्थितियाँ भी होती हैं, जैसे किसी ऐसे बुज़ुर्ग से आपका सामना हो जिसका आप सम्मान करते हों, लेकिन जो पैर छुए जाने के अलावा किसी और अभिवादन को सम्मान का तरीका ही न मानता हो, ऐसे में शायद आपको ही अपनी समझ के बावजूद झुक लेना चाहिए. ऐसे अनेक प्रसंग बहुस्तरीय, बहुसंरचनात्मक ढाँचे वाले समाजों में अंतर्वैयक्तिक आदान-प्रदान के क्रम में आते हैं.
सामंती समाजों के ज़्यादातर मूल्यों के स्रोत धार्मिक हैं. उनमें कुछ मूल्य अपने अंतर्य में मानवीय भी होते हैं जिनका धर्म विश्वास त्याग देने के बाद भी लोग संवर्धन करना चाहते हैं , उन्हें मानवीय आधार पर पुनर्परिभाषित करके. लेकिन यह चयन-विवेक की भारी परीक्षा है और खतरे भी कम नहीं. आप लोगों में से कई साथी शायद बोधि को इसी से आगाह कर रहे हैं. एक उदाहरण और देकर बात ख़त्म करूंगा. आप सभी को याद होगा लोहिया जी का एक प्रसिद्द वाक्य जो उन्होंने 'राम, कृष्ण और शिव' नामक निबंध में लिखा था, " भारत माता ! हमें राम का चरित्र दो, कृष्ण का ह्रदय दो और शिव का मस्तिष्क दो." ज़ाहिर है कि लोहिया नास्तिक थे और इस निबंध में उन्होंने परम्परा से पूजित मिथकीय और महाकाव्यात्मक चरित्रों को धर्म का आवरण हटाकर भारतीयता के प्रतीक रूप में प्रतिष्ठित किया. मुश्किल यहाँ ये उत्पन्न होती है कि समूची भारतीयता के प्रतीक क्या परम्परा से ही ग्रहण किए जा सकते हैं? यहाँ भी कि क्या भारत में दूसरी तमाम परम्पराएं भी नहीं हैं जिनसे चरित्र , ह्रदय और मस्तिष्क के आदर्श लिए जा सकें? सबसे बढ़कर तो यह कि भारत जैसे समाज में जहां सामन्ती अवशेष अभी भी आधार में भी ( सिर्फ अधिरचना में ही नहीं ) मज़बूत हैं , वहां इन चरित्रों का इहलौकीकरण कितना ग्राह्य होगा?
बहरहाल कविता पर मैंने बात नहीं की है , क्षमा चाहूंगा लेकिन शायद प्रकारांतर से बहस में मेरी यह बकवास भी उपयोगी हो.
प्रणय कृष्ण

भारत भूषण तिवारी said...

अशोक भाई,
विजय जी की इस पोस्ट पर आपका कमेन्ट पढ़ने के बाद मैंने असुविधा पर वापिस जा कर कविता और आपकी सम्पादकीय टिप्पणी पढ़ी और धैर्य के साथ पढ़ी. तब भी मैं कविता के मूल भाव को पकड़ नहीं पाया. फिर आपकी टिप्पणी के अंतिम वाक्य से मुझे बोध हुआ कि आप इस कविता की रचना प्रक्रिया में शामिल रहे हैं और बोधिसत्त्व जी से आपकी मित्रता है ही. मेरे विचार में इन दो बातों की वजह से रचना का वस्तुपरक विश्लेषण प्रभावित हो सकता है. कम से कम मेरे साथ तो ऐसा होना संभव है; अर्थात आपके मित्र के तौर पर अगर मैं आपकी कविता की रचना में सहभागी रहूँ तो शायद मैं निरपेक्ष आकलन नहीं कर पाऊंगा. कोई ज़रूरी नहीं है कि ऐसा हुआ ही हो पर मैंने अपनी बात सामने रखना चाही. आपको इससे दुःख पहुंचा है सो माफ़ी चाहता हूँ.
और वस्तुपरकता पर सवाल केवल इस कविता के विषय में उठाया गया है. आपकी प्रतिबद्धता और इतर जगहों/विषयों/मुद्दों पर आपकी प्रामाणिकता और वस्तुपरकता से मैं भली-भांति परिचित हूँ और मानता हूँ कि वह संदेह से परे है.

Ek ziddi dhun said...

हिंदी साहित्य में बहुत से लेखकों की धुर पोंगापंथी रचनाओं को असली प्रगतिशील रचनाएं साबित करने पर खासा श्रम किया जाता रहा है. यहाँ तक कि `ढ़ोल, गंवार, शूद्र, पशु, नारी...` की भी बहुत सी महान व्याख्याएं अपने महान `प्रगतिशील` करते रहे हैं. यह परम्परा ऐसी है कि रामप्रसाद शुक्ल और भारतेंदु जैसे लेखक आज जिंदा हो जाएं तो सिर पीट लें कि जो हम इतने स्टेंड के साथ कहते रहे, उसे ठीक उल्टा क्यूँ कर दिया गया है. अब जबकि मैं इस परम्परा को जानता था तो क्यूँ चुप न रहा, यह मेरा कसूर है.

बहरहाल, मेरा कसूर ये भी है कि मुझे बोधिसत्व की यह `कविता` शुरू में ही क्यूँ प्रतिगामी और हिंसक लगी. अब `कविता` शुरू ही इस एलान से होती है कि जान गया हूँ. अब यह बाताइएगा कि कब जान गए, और आपके जानने का स्रोत क्या है.
खैर, आप जान गए हो तो ठीक है, हम तो मानते हैं कि आप हमेशा ही आदिकाल से जानते रहे हैं, पीढी-दर-पीढी. कभी-कभी कर्मकांडों को वैज्ञानिक बताने का उपक्रम भी चलता रहता है. पर आप इस मामले में ईमानदार हैं और बताते हैं कि जान गया हूँ (या आदिकाल से ही जानता हूँ) कि (सब पोंगापंथ है?) और जान गया हूँ के एलान के साथ ताल ठोंकते हैं कि जान गया हूँ- तो.
तो का तुर्रा ख़ासा धमकाने वाला है या फिर दिलचस्प है?
तो क्या, पंडित जी? आपको रोक कौन रहा है चीटियों को पिस्सान डालने से? आपको खड्ग उठाकर गाय, मनुष्य या किसे पशु पर टूट पड़ने के लिये किसने कहा है (वैसे कबीर कहते हैं- `पांडे तू तो निपुण कसाई)? यह आप अचानक इतने उग्र क्यूँ हो रहे हैं? यह किस राजनीति का हिस्सा है? इस अंदाज में तो हम उत्तर भारत में सांप्रदायिक अभियानों के तहत `संतों` के `प्रवचन` और उनके असर देखते ही रहे हैं.
आप शौक से नदियों में नहाइए, सूर्य को, पेड़ को, खेत को अर्ध्य दीजीइए, दिया जलाइए, धरती, आसमान, बादलों से प्रार्थना कीजिए. चाहो तो पत्नी को पूजिए, चाहो तो... - पत्नी क्या कह सकती है, और `बेचारी` माँ भी? - यही परम्परा है.

@ प्रगतिशीलता मनुष्यता के बिना सम्पूर्ण नहीं- तो क्या कोई ऐसी प्रगतिशीलता भी होती है, जो मनुष्यता के बिना होती है?
@परम्परा- परम्परा मतलब? क्या कोई एक ही परम्परा होती है. परम्परा यदि शोषण, धर्मान्धता, लूट, हरामखोरी है तो इसके विरोध की भी शानदार परम्परा है, मनुष्यता की परम्परा. अब अपनी-अपनी परम्पराएं हैं.
छुआछूत, स्त्रीवध और तमाम बर्बरताएं इसी परम्परा की आड़ में `वैधानिक` हैं. सुन्दर-सुन्दर तस्वीर खींचने से बर्बर्ताएं वैधानिक हो जाती हैं क्या? पितृ पक्ष में कव्वे जिम लेने से बुजुर्गों से मानवीय व्यवहार होने लगता तो क्या बात थी. कन्या जिमाने के ढोंग से कन्या वध, भ्रूण हत्या रूक जातीं, जगदम्बा पूजन से पत्नी तो क्या, माँ की ही दुर्दशा नहीं रुकती. ये किसने कह दिया कि प्रगतिशीलता प्रकृति, पशु और मनुष्य से प्रेम में बाधक है? आपके यहाँ होती होगी. हम तो कर्मकांड के साथ नदियों को नालों में तब्दील होते, पशु-पक्षियों को लुप्त होते, स्त्री जाति को अपमानित होते और पैदा होने से पहले ही ख़त्म होते, बुजुर्गों को बेसहारा दम तोड़ते देख रहे हैं.
@मनुष्यता- संतों ने कहा है कि मनुष्य ब्रह्म से पैदा हुआ है और ब्रह्म तो ब्राह्मण है. सो वही मनुष्य और मनुष्यता का पेटेंट लिए है. जबकि इसकी असलियत जान गयाहूँ तो क्या ब्राह्मणों की हाँ में हाँ मिलाये बिना, अपनी सारी बकवास के लिये माफी मांगे बिना इस समाज में मेरी समाई संभव है?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

धीरेश आपकी यह 'ब्राह्मण बैशिंग' जल्द ही आपको दलित विमर्श में स्थापित करेगी...शुभकामनाएं...

आप मित्र हैं...अक्सर आपके साथ मिलकर लड़ाइयां लड़ीं हैं...इसीलिए उस स्तर पर आकर आपको जवाब देने की इच्छा नहीं हो रही...

अजेय said...

आप लोगों ने खूब चर्चा की है.
मैं ज़िद्दी धुन के साथ सहमत होना चाहता हूँ, लेकिन कवि को भूल कर कविता पढ़ी जाए तो कुछ वे कुछ ज़्यादा आक्रमक हो गए हैं. हम हिन्दी लोग हर बात को जाति विमर्श की ओर धकेल देने के भी आदी हो गए हैं.
दर असल मैंने कविता को एक अति साधारण स्तर पर समझने की कोशिश की है. यह जानने का दु:ख है. प्रकारांतर से देखने , सुनने वगैरा का भी. और एक कलाकार का सब से बड़ा दु:ख है. जेनुइन दु:ख. सच्चा है कवि , क्या करे वह इस जानने का? मेरी सलाह है, बाँटे ! ताकि सब जानने लग जाएं. और मिल कर तय करें कि उस जानने का क्या करना है !
अद्भुत कविता है. आप लोग जो मर्ज़ी व्याख्याएं कर लीजिए.आभार पढ़वाने का विजय भाई.

अभय तिवारी said...

मेरी अपनी समझ में अपनी भावना में सही होने के बावजूद अपने शिल्प में कमज़ोर कविता है। ख़ासकर जिस तरह से कविता का अंत हुआ है। लेकिन मज़े की बात ये है कि यहाँ कविता के कथ्य को लेकर कवि की क्लास लगा के उसे उपदेश दिया जा रहा है। यह कविता सीधे तौर पर प्रकृति के प्रति एक कृतज्ञता और अपने आस-पास के प्रति मैत्रीभाव रखने की बात कर रही है, वैज्ञानिक चेतना आ जाने के बाद भी। यह कृतज्ञभाव और मैत्रीभाव पुराने भारतीय मूल्यबोध का सकारात्मक पहलू रहा है। और इसमें ब्राह्मणवाद जैसा कुछ पढ़ना बेवजह की क़वायद है। कोई भी क़बीलाई या ‘आदिवासी’ मूल्यबोध भी यही होता है। वे पत्थर, पेड़, नदी आदि को पूजते हैं, और मातृसत्ता को भी। इस मूल्यबोध से पश्चिमी समाज आकर्षित होता रहा है। और जो आज के पर्यावरणीय संकट में फिर से प्रासंगिक हो गया है। अगर थोथी औद्योगिक वैज्ञानिकता आपको गहरे प्राकृतिक संकट और व्यापक पैमाने पर पशु-पक्षियों के विनाश की ओर ले जा रही है तो कृतज्ञता के इस मूल्य बोध को फिर से संजो लेने की ज़रूरत बनी हुई है। इसको समझने में लोगों को कठिनाई क्यों आ रही है? क्या इसलिए कि प्रगतिशीलता का मतलब कुछ प्रतीकों का विरोध भर मान लिया गया है? शायद इसी उथली समझ के प्रति बोधि लिख रहे हैं .. पर शायद कुछ लोग कभी नहीं समझेंगे..

रही बात इस आलोचनात्मक टिप्पणी की- तो क्या कहूँ- लग रहा है कि सोवियत काल के किसी कमिसार ने लिखी है। अमूर्तन तभी अच्छा होता है जब वो सार को पकड़ रहा हो.. मगर सारहीन शब्दों की सैद्धान्तिक जुगाली जैसे निहायत बेमज़ा होती है। ये टिप्पणी वैसी ही बेमज़ा पाई।

प्रणय जी ने समझदारी की बातें कही हैं उन पर ग़ौर किया जाना चाहिये!

विजय गौड़ said...

अभय जी
सर्व प्रथम तो आपका आभार कि ब्लाग तक पहुंचे और अपनी उपस्थिति को दर्ज किया। मित्र यद्यपि कविता पर टिप्पणी कर देने के बाद रचनाकार की राय के बिना मैं कुछ भी कहने से बचना चाहता था क्योंकि स्पपष्ट जानिये, लिखी गई टिप्पणी कवि बोधिसत्व की कविता के बहाने बहुत सी दूसरी अन्य ऎसी ही रचनाओं के पाठ की विसंगतियों को समेटने के साथ लिखी गयी थी। यहां आपकी सुविधा के लिए की गई टिप्पणी का वह अन्तिम पैरा फ़िर से दे रहा हूं-
"समाज को बदलने की प्रक्रिया और उसे बेहतर देखने की उम्मीदों भरी हमारी रचनाओं की पड़ताल की जाए तो देखेंगे कि उसकी सीमाएं वैज्ञानिकता और तकनालॉजी की सीमा भर नहीं है, बल्कि वस्तुगत यथार्थ से हमारे आत्म साक्षात्कार की श्रेणीबद्धता उसका एक कारण है। सामाजिक बदलाव में दर्शन की विशिष्टता आध्यात्मिक और भौतिकवादी अन्तर्विरोधों पर निर्भर होती है। विशिष्टता के इस पहलू के आधार पर ही दोनों की परस्पर निर्भरता तथा विरोधपूर्ण समग्र मूल्यांकन पर ही रचनात्मक कृति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार होती है। अन्तर्विरोधों की विशिष्टता और जटिलता पर विचार किए बगैर रचना के किसी एक धुर छोर तक पेंग मार जाने की अवस्था से बचा नहीं जा सकता। भाववादी रचनाओं के साथ यही दिक्कत होती है कि विशिष्टता से बचकर वे नितांत निजीपन की स्थितियों को सर्वोपरी मान लेने के साथ होती हैं। व्यवहार में एकांगीपन भी इन्हीं स्थितियों में जन्म लेता है। सिर्फ परम्परा और आधुनिकता का जिक्र भर कर देने से अन्तर्विरोधों की विशिष्टता उभर नहीं पाती है। मनोगत आग्रहों से मुक्त होकर ठोस धरातल पर टिका हमारा आत्म खुद की आलोचना का आधार दे सकता है।"
रही बात सोवियत कमिसार की तो आप भी उसी प्रवत्ति से ग्रसित दिख रहे हैं इस वक्त, जिस प्रवत्ति ने इस टिप्पणी को लिखने को मजबूर किया। किसी खास भूत से डरे हुए हैं और तर्क की कसौटी पर खुद को खड़ा न पाते हुए छिछोरा व्यंग्य करते हुए आत्ममुग्धता के शिकार लगते हैं। सारहीन शब्दों की सैद्धान्तिक जुगाली क्या होती शायद मुझे समझाने की जरूरत नहीं अन्य टिप्पणियों के बहाने कविता को खोलने की आपकी कोशिश, खुद देख लें।
मेरा आपसे विनम्र अनुरोध है यदि टिप्पणी पर असहमति है तो तर्क पूर्ण तरह से प्रस्तुत होइये अन्यथा सिर्फ़ विवाद को जन्म देने से मैं बचना चाहूंगा।

भारत भूषण तिवारी said...

शायद कुछ लोग कभी नहीं समझेंगे. क्योंकि वे हठधर्मी हैं, कट्टरपंथी हैं, जिद्दी हैं या निपट धूर्त हैं?
अभय जी की अदाएँ वाकई माशाअल्लाह होती हैं! एक ओर कविता के शिल्प को कमज़ोर बता दिया, और दूसरी ओर उसकी व्याख्या करके पर्यावरणवादी बता दिया. थोथी औद्योगिक वैज्ञानिकता, गहरे प्राकृतिक संकट जैसी बातें अरुंधती रॉय के मुंह से उन्हें अच्छी नहीं लगती, पर यही बात भारतीय मूल्यबोध के तौर पर संजो लेने (जिसका सन्देश कथित तौर पर यह कविता दे रही है) को वे तत्पर नज़र आते हैं.
फिर कविता के कथ्य को लेकर बात करने को उन्होंने 'कवि की क्लास लगाना' और 'उसे उपदेश देना' करार दे रहे हैं.

Ek ziddi dhun said...

प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और मैत्री भाव का यह तरीका काफी धमकाने वाला है, एक और कृतग्य कवि अशोक वाजपेयी से आगे का संस्करण. ये दोहराने का शायद कोई मतलब नहीं है कि वैज्ञानिक चेतना या प्रगतिशीलता तो प्रकृति और मनुष्य के प्रति जेनुइन रिश्ता बनाती है, उसे इसके लिए किसी कर्मकांड या एलान या धमकी की जरुरत नहीं ही पड़ती है. इस अन्ख्मुन्दी समझ का क्या किया जाय कि घुमा-फिराकर पुनरुत्थानवाद और कर्मकांड को प्राकृतिक संकट का हल बताये. सूखी-सड़ी हुई नदियाँ अपने इन कृतग्यओं से बेहाल है.

रही बात क़बीलाई या ‘आदिवासी’ मूल्यबोध की तो उसका प्रकृति से रिश्ता ब्राह्मणवादी चालाकी, बोधिसत्व की हुंकार (गाय का जिक्र लाकर पूछना कि क्या खडग उठा लूं, किस राजनीति का हिस्सा हो सकता है? उन्हें ऐसा करने के लिये कौन मजबूर कर रहा है? ) और इस हुंकार में मनुष्यता के दर्शन करने जैसा नहीं है. पुरानी बातें दोहराना नहीं चाहता.

ऐसे अधिकाँश लोग हैं, जो जानते हैं कि बहुत से कर्मकांडों का कोई वैज्ञानिक औचित्य नहीं है पर उन्हें पाप और अनिष्ट की आशंका डराती है, पुण्य ललचाता है. कवि का मामला इस दुविधा से अलग है. वो तो जान चुका है और जान चुका है `तो`. तो क्या किया जा सकता है. कवि अपने व्याख्याकार से ज्यादा ईमानदार और चेलेंजिंग है.

@अशोक कुमार पांडे: आपकी व्याख्या अपने लिये हैरानी भरी है और असहमति को आप संवेदनहीन बता चुके हैं. अब मैं कोई लेखक तो नहीं हूँ कि किसी विमर्श में करिअर के जुगाड़ की चिंता हो. पर आपकी शुभकामना के लिए आभार.
-मध्यप्रदेश में पैदा हुए हरिशंकर परसाई के परम्परा संबंधी व्यंग्य बहुत याद आ रहे हैं.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

@ धीरेश कुमार सैनी - याद मुझे भी बहुत कुछ आ रहा है परसाई जी का...अतिक्रान्तिकारिता से संबंधी उनके व्यंग्य कम नहीं हैं. आप शायद वैज्ञानिक प्रगतिशीलता और सामंती परंपरा के बीच की कड़ी पूंजीवाद को भूल चुके हैं जो अपने इसी वैज्ञानिक 'जानने' के दावे के साथ दुनिया की सारी प्राकृतिक संपदा को नष्ट करने पर तुली है. जिन 'सूखी-सडी' नदियों की बात आप कर रहे हैं वे किसी सामंती युग में नहीं बल्कि इसी 'प्रबोधित पूंजीवाद' के युग में हुई हैं.

शायद आप मान के चल रहे हैं कि सामंती परम्परावाद के बाद सीधे मार्क्सवाद दुनिया भर में आ गया है और आप उसके कन्सेन्स कीपर नियुक्त कर दिए गए हैं. इस मानने को लेकर आप इतने मुतमईन हैं कि साहित्य के इतिहास से न जाने किस 'राम प्रकाश शुक्ल' को ले आये हैं और हम तो खैर आपको लेखक मानते हैं लेकिन विमर्शों में जुगाड की ज़रूरत अक्सर अलेखकों को ही पडती है. आप शायद माने बैठे हैं कि आपके अलावा दुनिया में हर कोई बस किसी न किसी जुगाड के लिए सारे कर्म कर रहा है. आप यह मानने के लिए स्वतन्त्र हैं और मुझे नहीं लगता कि मैं अपनी किसी क्रांतिकारिता के लिए आपसे सर्टिफिकेट लेने आपके दरवाजे पर खडा हूँ.

कविता कितना धमाका कर रही है या धमका रही है वह तो अलग बात है लेकिन आप जो डंडा मार आलोचना कर रहे हैं उससे तो हिन्दी के बड़े-बड़े आलोचक भी थर्रा जाएँ.इस जोश में आप इतने मोहान्ध हैं कि कि मेरे लिखे '''मुझे लगा कि कविता को धैर्य से पढने की जगह कुछ शब्दों, कुछ प्रतीकों कों लेकर अति संवेदनशील (जिसकी परिणिति संवेदनहीनता में होनी ही है) तरीके से प्रतिक्रया की गयी है.' को 'असहमति को आप संवेदनहीन बता चुके हैं. ' के रूप में व्याख्यायित कर रहे हैं. यह आपके कविता की जगह कोई पर्सनल एजेंडा साधने की जल्दबाज क्रांतिकारी भंगिमा कों स्पष्ट करता है.

कविता अच्छी-बुरी हो सकती है, उसे लेकर हमारी अलग-अलग राय हो सकती है. न तो मैं और न हीं आप 'कविता का सुप्रीम कोर्ट' हैं...लेकिन उस पर बात करने के लिए एक न्यूनतम धैर्य, वस्तुपरकता और भाषिक नियंत्रण की ज़रूरत होती है. आपने अपनी टिप्पणियों से जो कुछ प्रदर्शित किया है वह इसके बिलकुल प्रतिकूल है.

और हरिशंकर परसाई की जन्मभूमि कों लेकर इतनी संवेदना की क्या ज़रूरत? यह 'जननी जन्मभूमिश्च' वाला मामला है या फिर किसी 'क्रांतिकारी क्षेत्रवाद' का घोषणापात्र? खैर आपने उनकी जन्मजाति बताकर इस रिश्ते को और 'प्रगाढ़' करने का प्रयास नहीं किया इसके लिए आभारी हूँ.

वैसे जिस शमशेर का शेर आपने अपने परिचय में लगा रखा है उनका एक भजन है -

हरी मोरी आड, हरी ही मोरी आड
हरि मोरी झांकी, हरि ही केंवाड

और उनके मरने के बाद प्रकाशित उनके संकलन 'कहीं दूर से सुन रहा हूँ' में ही अंतिम कविता है

सर्वोच्च लहर
आकाशगंगा में
आकाशगंगा में
विसर्जित
एक दीया


जानना चाहूँगा कि आप इस पर क्या राय रखते हैं?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

आप ही के ब्लॉग पर लगी एक पूर्व आई ए एस अधिकारी सुदीप बनर्जी की कविता लगी है

मलबा
-----
समतल नहीं होगा कयामत तक
पूरे मुल्क की छाती पर फैला मलबा
ऊबड़-खाबड़ ही रह जाएगा यह प्रसंग
इबादतगाह की आख़िरी अज़ान
विक्षिप्त अनंत तक पुकारती हुई।
-सुदीप बनर्जी

अब 'इबादतगाह की आखिरी अजान'...इसे कैसे व्याख्यायित करेंगे आप? क्या यह 'इबादतगाह' और 'अजान' की पवित्रता कों स्थापित नहीं करती? क्या यह उस सामंती अवशेष की प्राण प्रतिष्ठा नहीं करती? क्या एक समाजवादी समाज में 'इबादतगाह की आखिरी अजान' प्रसन्न होने वाली चीज़ नहीं होगी? लेकिन यह कविता तो इबादतगाह में अजान के खत्म हो जाने से विगलित है...इस कविता में उस 'अजान' को बचा ले जाने की करुणामयी पुकार है...और यह आपकी आदर्श कविता है...आपके घोषणापत्र का हिस्सा! क्या यह सिर्फ इसलिए प्रगतिशील है कि इसमें 'पूजा' नहीं 'अजान' है?

आपके ब्लॉग में ही असद जी का फैज पर आलेख है जिसमें बड़ी मेहनत से साबित किया गया है कि 'फैज इस्लामी धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल जिया उल हक के खिलाफ लड़ाई में कर रहे थे'...यह आपकी नज़र में प्रगतिशीलता है? इस्लाम क्या वाम का समर्थक धर्म है? आप अपनी तर्क पद्धति से इसे कैसे समझायेंगे? मान लीजिए आज कोई हिन्दुस्तान में यही तर्क देते हुए भजन के सहारे जनता को सत्ता के खिलाफ खडा करे तो आपका स्टैंड क्या होगा? क्यूँ हम अन्ना के खिलाफ इसलिए खड़े हो जाते हैं कि वह धार्मिक प्रतीकों के सहारे अपनी बात कह रहा है?

क्या यह दोहरापन नहीं है साथी?

अशोक कुमार पाण्डेय said...

'भरत मुनि के नाट्यशास्त्र में वर्णित अभिप्राय की ही तरह मैं प्रस्तुति कला को एक गंभीर अध्यात्मिक कार्य मानता हूँ.'


यह भी आपके ब्लॉग पर लिखे एक लेख का हिस्सा है...

अजेय said...

अरे , अरे; हम कविता से दूर भटक रहे हैं. मैंने इस बीच फिर से कविता पढ़ी है. और अभी भी मुझे वह उतनी ही ईमान दार कविता लग रही है...जैसे कोई अपने संस्कारों से मुक्त होना चाह रहा हो, नहीं हो पा रहा हो. जैसे कि जानना
( विचार)उस के संस्कारों को धो नहीं पा रहा हो. और फिर से कवि ( वाचक) को सर्व प्रथम तो *जानने* की बधाई देना चाहता हूँ. और फिर सलाह देना चाहता हूँ, कि इस *जानने* को वह बाँटे. महज़ *जान गया हूँ* कह कर नहीं, समझा समझा कर बाँटे. इस नीयत से बाँटे कि पढ़्ने वाला भी *जान* जाए .... कि क्यों स्त्री की पूजा करने से,अपनी माँ को जगदंबा कह देने से, चींटी को पिसा हुआ या मुना भाई के शब्दो मे साबुत ही खिला देने से , कि क्यों सूर्य को सुबह सुबह पानी या कोई भी द्रव स्प्रे कर देने वगैरा वगैरा *ढकोसलों* (विजय भई ने बहुत सटीक कहा) से जीवन मे समाज मे या ब्र्म्हाण्ड वगैरा मे कहीं कोई क्रांति नही आती .....क्रांति जाने हुए , देखे हुए , अनुभूत सच को बाँटने से ही आती है. ;)

अशोक कुमार पाण्डेय said...
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Ek ziddi dhun said...
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Ek ziddi dhun said...

@अशोक कुमार पण्डे-
रामचंद्र शुक्ल को गलती से रामप्रकाश शुक्ल लिख बैठा हूँ.
आप नाहक नाराज हो रहे हैं. आप मुझ अयोग्य को दलित विमर्श में स्थापित होने की शुभकामना दे रहे थे तो ये जुगाड़ की बात तो मैंने अपने लिये ही लिखी है.
शमशेर की जो पंक्तियाँ आपने यहाँ दी हैं, मैं नहीं समझ पा रहा हूँ कि उनका बोधिसत्व की कविता पर बातचीत से क्या ताल्लुक है. मेरा सवाल यही था कि बोधिसत्व आखिर कह क्या रहे हैं?
कवि सुदीप बनर्जी को आपने पूर्व आई ए एस अधिकारी के तौर पर भी याद किया है. इस भूमिका में वो किस तरह सेक्युलर मूल्यों के लिये प्रयासरत रहे, यह याद दिलाना शायद यहाँ जरूरी नहीं है. उनकी कविता `मलबा` को लेकर आपकी राय और आपके सवालों को लेकर हैरानी हुई. इस कविता में अजान का जिक्र उस कारुणिक, मार्मिक पुकार के तौर पर ही है जो फासिस्ट हिन्दुत्ववादियों द्वारा किये जा रहे फासिस्ट हमलों और अल्पसंख्यकों, सेक्युलरों की बेबसी भी दर्शाती है. निश्चय ही यह प्रसन्नता की नहीं बेचैनी की बात है. आप कविता के आपने पाठ के लिए निश्चय ही स्वतंत्र हैं. अजान और पूजा को तराजू में रखकर तौलते हुए किए गए सवाल का जवाब कम से कम अशोक कुमार पांडे को देने की जरूरत मैं नहीं समझता, सिर्फ़ अफ़सोस ही कर सकता हूँ कि अपना मित्र एक प्रतिगामी कविता को प्रगतिशीलता को सम्पूर्ण करने वाली कविता बताते-बताते कहाँ तक चला आया है. ऐसे सवाल तो हम सभी से जो तत्व पूछा करते हैं, उन्हें आप जानते ही हैं.
आपने असद जी का यह कहते हुए उल्लेख किया है कि उनका फ़ैज़ पर आलेख है जिसमें बड़ी मेहनत से साबित किया गया है कि 'फैज इस्लामी धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल जिया उल हक के खिलाफ लड़ाई में कर रहे थे'. आप इस पर अपनी राय दे सकते हैं, असहमति जाता सकते हैं, लिख सकते हैं लेकिन यहाँ जेरे बहस कविता में तो मेरे ख्याल से उल्टा है. खतरनाक ढंग से वैज्ञानिक चेतना, प्रगतिशीलता और मनुष्यता का विरोध करते हुए सांप्रदायिक टोन तक से गुरेज नहीं किया गया है. तुर्रा यह कि इसे प्रकृति प्रेम और मनुष्यता का जामा पहनाने की कोशिश की जा रही है.

मुझे नहीं लगता कि मैंने बहस हिन्दू विरोध या मुस्लिम समर्थन को लेकर की हो. आपने `क्या यह (अजान) सिर्फ इसलिए प्रगतिशील है कि इसमें 'पूजा' नहीं 'अजान' है? और `इस्लाम क्या वाम का समर्थक धर्म है?` जैसे सवाल भी पूछे हैं, अब बताइए कि आप जैसे विद्वान वामपंथी को मैं क्या जवाब दूं, मैं तो सिर्फ़ सकते में हूँ.
बाकी मुझे कुछ नहीं कहना है, कविता पर एतराज की बातें पहले ही कह चुका हूँ.
उम्मीद है कि नाराज नहीं होइएगा.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

धीरेश भाई

शायद आपको मेरा सवाल पूछना बुरा लगा...बिलकुल जायज था. फैज की नज़्म हो या कि सुदीप जी की कविता मलबा...मैं दोनों को शानदार मानता हूँ...मानता रहूँगा. मै बस यह याद दिला रहा था कि जब आप केवल प्रतीकों के सहारे कविता तक पहुँचने का प्रयास करेंगे तो कैसे भयावह सवाल/निष्कर्ष निकल कर आ सकते हैं. वह आपकी तर्क पद्धति से उन कविताओं का (कु) पाठ था. अपनी इसी तर्क पद्धति के सहारे आप इस कविता के प्रति भी अपने एकांगी निष्कर्ष तक पहुंचे हैं जहाँ

जबकि
जान गया हूँ
बाझिन गाय को चारा न दूँ
खूंटे से बाँध कर रखूँ या निराजल हाँक दू दो डंडा मार कर
वध करूँ मनुष्य का या पशु का
कोई नर्क नहीं कहीं
तो क्या उठा लूँ खड्ग

में आपको केवल गो रक्षा का उद्घोष सुनाई दे रहा है.

वध करूँ मनुष्य का या पशु का
कोई नर्क नहीं कहीं
तो क्या उठा लूँ खड्ग

जैसी पंक्तियों में साम्प्रदायिक तथा अन्य हिंसाओं में मनुष्यों के संहार का प्रतिकार आप नहीं देख पा रहे.

हुआ यह है कि कम से कम हिन्दी में एक अजीब सी अवधारणा बनी है जहाँ कुछ प्रतीकों के आते ही हम शोर मचाना शुरू कर देते हैं. मत भूलिए कि फैज़ इस्लामी बहुलता वाले देश में इस्लाम के प्रतीकों का सहारा लेकर जिया को चुनौती दे रहे थे. तो हमारे देश में अगर उन प्रतीकों के सहारे कोई कुछ कहना चाहे तो उस कहे पर तुरत शक शुरू कर देना क्या है? मैं व्यक्तिगत रूप से धार्मिक प्रतीकों का कभी प्रयोग नहीं करता क्योंकि वे मेरे सहजबोध का हिस्सा ही नहीं रहे. लेकिन तमाम प्रगतिशील लोग हैं जो आज भी एक हद तक आस्तिक हैं...मैं उन सबको भगवा ब्रिगेड का हिस्सा नहीं कहता...ये हिन्दू भी हो सकते हैं और अन्य धर्मों से भी. उस केस में मैं देखता हूँ कि उन प्रतीकों के सहारे जो बात कही जा रही है वह कितनी सकारात्मक है. और अगर प्रतीकों कों खारिज करना है तो फिर सभी धर्मों के प्रतीकों को एक साथ खारिज करना होगा.
आपका सवाल यह नहीं था कि 'बोधि क्या कह रहे हैं' आप बोधि और प्रस्तोता की जन्मजाति को लेकर बिलकुल प्रहार की मुद्रा में थे. मैं औरों की नहीं जानता लेकिन खुद के बारे में मुतामइन हूँ कि अपनी जन्मजाति कों लेकर न तो मुझमे कोई श्रेष्ठताबोध है न कोई हीनताबोध. शमशेर का सवाल उसी परिप्रेक्ष्य में आया था.वह भी पहली बार मित्रता का पूरा लिहाज करने के बावजूद आपके नृशंश दुसरे आक्रमण की प्रतिक्रया में. मैं जानना चाह रहा था कि क्या आप शमशेर की इन पंक्तियों के सहारे उन्हें 'ब्राह्मणवादी', 'पुनरुत्थानवादी'वगैरह-वगैरह कहेंगे? आप कहते तो मैं पुनर्जन्म वगैरह का समर्थन करती उनकी पंक्तियाँ भी पेश कर दूंगा.जहाँ तक मेरा सवाल है मै उन भटकावों के बावजूद उन्हें एक जनपक्षीय कवि मानता हूँ...२४ कैरेट की तलाश में मैं २२ कैरेट के अपनों को किसी दूसरी ब्रिग्रेड में नहीं सौंप सकता. कुछ असहमतियों से मैं दोस्तों की जन्मजातियों और धर्म के आधार पर व्याख्या करने की हद तक नहीं जा सकता.

खैर आज विजय भाई से चैट पर काफी कुछ बात हुई ..उसका रेलीवेंट हिस्सा लगा दे रहा हूँ ...उससे ज़्यादा कुछ कहने के लिए मेरा पास नहीं

अशोक कुमार पाण्डेय said...

खैर छोडिये...निजी कों सार्वजनिक करना बिना उनकी अनुमति के सही नहीं होगा. तमाम मुद्दों पर सहमत रहते हुए हम एक कविता पर असहमत तो हो ही सकते हैं.

कम से कम मैं न तो आप जैसे मित्र को खोना चाहूँगा...न चोट पहुंचाना...इस बहस में जो अप्रिय है उसे भूल जाना चाहूँगा...आप भी शायद...

अशोक कुमार पाण्डेय said...

विजय भाई के कहने पर पूरी बातचीत लगा रहा हूँ

भाग-१

vijay: ashok ajkal technical ho rahe h o

:D
२:३७ अपराह्न
मुझे: क्या हुआ?

vijay: socho

:)

मुझे: नहीं सोच पा रहा भाई...

आप बता ही दीजिए
२:३८ अपराह्न
vijay: dhreesh ke kathan par aapki tippni dekhi abhi

मुझे: जी

vijay: brahmanwaad janmana ya jatiwaad

bhai uska aasy tou tum samjh hi gaye the
२:३९ अपराह्न
kyon khinchne lage fir use

h a ha ha

मुझे: आपलोग सारे सवाल मुझसे ही क्यूँ कर रहे हैं भाई?

vijay: tum technical ho ja rahe ho na

मुझे: धीरेश कों क्या कुछ भी कहने सुनने की छूट है?

लाजिकल

vijay: yah kaam ham karkhanewalo ka hai
२:४० अपराह्न
abhi tumhara gussa utra nahi

lagta hai

baad me baat karenge

मुझे: आप ही बताइये कि क्या 'ब्राह्मण' जाति में पैदा हो जाने से कोई ब्राह्मणवादी हो जाता है

vijay: aaj ek alekh hai jansandesh times me

dekhna

nahi

मुझे: किसका ?
२:४१ अपराह्न
vijay: mera likha

मुझे: वाह

vijay: bela negi ki film par hai

मुझे: देखता हूँ वेब पर

vijay: 24 no page

मुझे: अच्छा सुनिए कहानी पढ़ी?

vijay: haa padhi par

bahut concentrate nahi hone de rahi hai

vivran bahut jyada ho ja rahe hai
२:४२ अपराह्न
dubara padhunga

मुझे: थोड़ा काम किया है दुबारा भेजता हूँ..

vijay: tumhare likhne me we kahin gum ja rahe hain esa pahle paath se laga

abhi mujhe lagta hai shurati draft hai

मुझे: बस इतना आग्रह की ज़रा आराम से पढियेगा

vijay: isliye esa hua hoga

मुझे: दुबारा भेज रहा हूँ

vijay: bilkul aaram se padhta hu bhai

waise tou
२:४३ अपराह्न
fir mitro ko tou jarur hi

khas kar tum jaise mitro ko

jinse ek bebak ummeed rahti hai

suno ab man ki baat batayu

मुझे: बिलकुल

आपको दुबारा फारवर्ड की है

vijay: ji
२:४४ अपराह्न
bhejo

मुझे: हाँ मन की बात बताइये

vijay: sirf ladne ke liye ladoge tou nahi ?

मुझे: क्या भाई

क्या हम पहले असहमत नहीं हुए ?
२:४५ अपराह्न
vijay: wo tippni maine bodhisatw ji ki kavita par likhi par samvaad sahi artho me tumse kiya

मुझे: हाँ

vijay: yaar jamana dekh rahe ho na

मुझे: हाँ

मुझे उस पर कोई एतराज़ भी नहीं था

vijay: bodhi ji ka jawab tou abhay tiwari ke marfat jaan gaya

मुझे: दिक्कत बस धीरेश के टोन से है
२:४६ अपराह्न
vijay: mai use wyaktigat nahi janta

par lagta hai wah bhi tumse hi samvad kar raha tha

kyonki jante ho jo mujhe laga ki kavita tou jo hai so hai ashok usme un dikkto ko kyon nahi dekh paa raha hai

मुझे: 'ब्राह्मण' कहकर?
२:४७ अपराह्न
vijay: wo tou jab yudh shuru ho jata hai na tabki baat hai

mai pakshdhar nahi ese wyangy ka

par use chhodo abhi

मुझे: मैं इस बात से परेशान हूँ कि आप लोग सिर्फ प्रतीकों के पीछे क्यूँ नहीं भाग रहे हैं?

नहीं हटा दीजिए

vijay: nahi bhai wo kharab awdharna ke saath hai
२:४८ अपराह्न
mai hi nahi yahan tamam mitro ki hamre dehradun me yahi rai hai

मुझे: मैंने धीरेश के ब्लॉग से जो कविता कोट की है उसमें जो 'अजान' आया है उससे दिक्कत क्यूँ नहीं?

vijay: jante ho mahila sathiyon ki bhi rai achchi nahi us kavita par

dekho wo kavita ashok kumar pandey ne lagayi thi apni tippni ke sath
२:४९ अपराह्न
warna mai tippni bhi shayad na chhodta

bilkul saty kah raha hu

मुझे: नहीं होगी...हिन्दी में एक अवधारणा बन गयी है जिसमें हिन्दू प्रतीक देखते ही हम परेशान हो जाते हैं

vijay: chahe mano ya nahi

nahi bhai

esa nahi

मुझे: एक सवाल पूछूं?

vijay: kam se kam mai is tarah se uska paath nahi kar raha tha

zaroo

r
२:५० अपराह्न
hamm

मुझे: क्या पूंजीवाद इसी वैज्ञानिक 'जानने' के दंभ में सबकुछ नष्ट नहीं कर रहा ?

vijay: dekhna hoga kis janne me aur kaise
२:५१ अपराह्न
yadi hamre jaan lene ke baad laagu karne me koi dikkat hai tou share karenge

anunad par aaj ek kavita hai

dekho use

chandrakant devtale ki

मुझे: आपने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया

vijay: kabad kahana me bhi ek do din pahle ek geet tha

jawab de chuka hu

tippni me bhi vistar se diya
२:५२ अपराह्न
kaho tou ansh fir se copy kiye deta hu yahan

अशोक कुमार पाण्डेय said...

भाग - २
मुझे: वह जवाब है ही नहीं...वहाँ 'चींटियों कों पिसान्न डालना' भी ढकोसला हो गया है
२:५३ अपराह्न
एक पूंजीवादी समाज अपने इसी 'जानने' के दंभ में प्रकृति कों नष्ट करता चला जा रहा है

लोसा का स्तोरीतेलर पढियेगा
२:५४ अपराह्न
vijay: zaroor padhunga bhai

मुझे: स्टोरीटेलर

vijay: par link hai tou do
२:५५ अपराह्न
मुझे: कि कैसे आदिवासी और पारंपरिक रीति रिवाजों को अवैज्ञानिक बताकर पूरी प्रकृति कों नष्ट किया जा रहा है

यहाँ तक कि समाजवादी शासन व्यवस्थाएं भी इससे मुक्त नहीं

vijay: yahi kutark hai bhai us kavita ke paksh me

मुझे: जो आपकी नज़र में असहमति है वह कुतर्क है
२:५६ अपराह्न
वाह

आप कहें तो तर्क

बाक़ी सब कुतर्क

'असहमति का सम्मान '

vijay: इस कविता पर बात करने के लिए एक सवाल मन में उठ रहा है कि रचनाकार का भौतिक जीवन और सास्कृतिक जीवन क्यों एक नहीं होना चाहिए ? रचनाकार के जीवन की सम्पूर्ण पदचाप क्यों उसकी रचनाओं में सुनायी नहीं देनी चाहिए ?
व्यवहार ज्ञान से बढ़कर है। यह मेरा कथन नहीं महान विचारक लेनिन कह गये। क्योंकि मानते थे कि उसमें न सिर्फ सर्वव्यापकता का गुण होता है बल्कि प्रत्यक्ष वास्तविकता का गुण भी होता है। प्रत्यक्ष वास्तविकता की व्याख्या के लिए आस-पास के आन्तरिक अन्तर्विरोधों की पड़ताल जरूरी होती है। तभी देखी-जानी स्थितियों से प्राप्त ज्ञान से उस सिद्धान्त का प्रतिपादन हो सकता है जो उन्न्त से उन्न्त की ओर अग्रसर होता है। व्यवहार और सिद्धान्त का संक्षिप्तिकरण या एकमेव हो जाना इससे अलग नहीं हो सकता। बोधिसत्व की कविता में वे अपने अपने जुदा रास्तों के साथ है।

Read more: http://likhoyahanvahan.blogspot.com/2011/05/blog-post_2359.html#ixzz1LkeSoHS2

yakeenan nahi

मुझे: मैं इसे हज़ार बार पढ चुका हूँ

vijay: haa abhi us kavita par raho

मुझे: कविता पर ही हूँ

vijay: lagta hai fir baat karna bekar hi hai us par tou
२:५७ अपराह्न
yadi hajar baar padha ja chuka hai

kahani mil gayi hai

मुझे: अगर यह सिर्फ उस हालत में 'सकारात्मक' है कि मैं सब मान लूं तो अलग बात है

vijay: abhi use padhta hu

मुझे: जी

vijay: nahi

us halat menahi

apne se tark karo
२:५८ अपराह्न
tum sab jante ho

mera yakeen hai

ha sirf tark karna

kutark na dhundhna

apne se hi

mujhse bhi nahi

chahe tou
२:५९ अपराह्न
मुझे: फैज जनता को जिया के खिलाफ खडा करने में सीधे -सीधे इस्लामी मान्यताओं का साथ देते हैं तो वह हमें एसेप्तेबल है

यही आप से भी अनुरोध है कि

ha sirf tark karna
kutark na dhundhna
apne se hi
mujhse bhi nahi
chahe tou

vijay: dekho kahan kahan ki baato se sirf tum apni jankariyon ko rakh sakte ho

jo tark hai wah jankariyon se nahi tay hota
३:०० अपराह्न
ye janne se hota hota tou wyawahr ki baat na hui hoti

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जारी...
मुझे: यह जानकारी नई नहीं है ...अभय के ब्लॉग पर मै उस नज़्म कों सपोर्ट कर चुका हूँ

vijay: tumne kaha maine hajar baar padha us tippni ko maai kahta hu fir se padho

मुझे: और तब भी मेरे तर्क वही हैं

vijay: yah tark nahi

kuchh jankariya hai
३:०१ अपराह्न
maine beena kisi jankari ki madad liye baat kahne chahi hai

sirf ek jagah lenin ka jikr hua hai

jo jankari nahi usi baat ke reference me hai

मुझे: माफ कीजिए लेकिन जो आपकी तर्कपद्धति है उसमे भी आप एक कविता के सहारे पूरी प्रवृति पर ही टिप्पणी कर रहे हैं

vijay: poori pravarti ji ha
३:०२ अपराह्न
yah dikhayi deta hua satay hai

wyawahr me

मुझे: तो मैं अगर उसी तर्कपद्धति पर कुछ जानी-मानी रचनाओं के पुनर्पाठ का अनुरोध कर रहा हूँ तो क्या गलत है?

vijay: na dekhna chaho tou wo alag baat hai

wo un par bhi baat honi chaiye ye ek baat hai

मुझे: हिन्दी में एक अवधारणा बन गयी है जिसमें हिन्दू प्रतीक देखते ही हम परेशान हो जाते हैं
३:०३ अपराह्न
इस बात पर बस 'ऐसा नहीं है'

vijay: wo bhi yadi us awdharna ke saath ahi tou yakeenan nahi tik paayengi

मुझे: कहकर चुप्पी क्यूँ?

vijay: chuppi lagane se hi tou parhej kiya bhai

chupi kahan lagayi
३:०४ अपराह्न
मुझे: अजान कैसे एसेप्तेबल ...और वह कविता धीरेश के घोषणापत्र के रूप में है

vijay: mai dheeresh ko sirf uske blog ki post ke badualat hi janta raha hu

tumhe usse jyada
३:०५ अपराह्न
tumhara likhe or najdeek se bhi

beshak kuchh ghante

haa dhereesh ka ladne wala andaj jo uske blog post se dikhta hai, uske prati utsukta jagata hai
३:०६ अपराह्न
jaise aapke likhe ne jagayi

mai tumse samvadrat hu abhi
३:०७ अपराह्न
dheeresh ne kya kaha wo tumhare or dheeresh ke beech ke risto se tay hoga, dono ka ek dusre par prahar karna aur prem karna

मुझे: वह कविता उनके ब्लॉग के बाईं तरफ हमेशा से लगी है

vijay: hamara hamare se

samjhe

bodhisatw tumhare beshak mitr ho mere bhi pasandida kaviyon me hain
३:०८ अपराह्न
bawjud uske unka wywahar behad bigdel hai esakah sakta hu

atarkik hone ki had tak bigdail

mai tumse unke wywahar par koi rai nahi chahta

wo alag baat hai
३:०९ अपराह्न
मुझे: http://ek-ziddi-dhun.blogspot.com/

देखिये

मैंने तो साफ़ पूछा था

आप शायद वैज्ञानिक प्रगतिशीलता और सामंती परंपरा के बीच की कड़ी पूंजीवाद को भूल चुके हैं जो अपने इसी वैज्ञानिक 'जानने' के दावे के साथ दुनिया की सारी प्राकृतिक संपदा को नष्ट करने पर तुली है. जिन 'सूखी-सडी' नदियों की बात आप कर रहे हैं वे किसी सामंती युग में नहीं बल्कि इसी 'प्रबोधित पूंजीवाद' के युग में हुई हैं.


देखिये भाई..व्यक्तिगत रूप से मै धार्मिक प्रतीकों का बिलकुल प्रयोग नहीं करता

कभी भी नहीं

देखिये भाई..व्यक्तिगत रूप से मै धार्मिक प्रतीकों का बिलकुल प्रयोग नहीं करता
कभी भी नहीं
लेकिन जब उनका प्रयोग होता है तो देखता हूँ कि उसका उद्देश्य क्या है. और वह मुझे फैज की नज्म या अजान वाली सुदीप की कविता या फिर बोधि की इस कविता में भी सकारात्मक लगता है
३:१० अपराह्न
व्यक्तिगत व्यवहार कविता के मूल्यांकन कों तय नहीं करते
कम से कम मेरे लिए

अशोक कुमार पाण्डेय said...

vijay: baat ho rahi hai tou sirf tumhe yah samjhane ke liye rakh rahahu ki ese hi dheeresh ki tippniyon
३:११ अपराह्न
ab tum bilkul sahi kah rahe ho

prateek kyon aaya hai yah dekhna hota hai

tou dekhiye samy kaal aur sthitiyan prateeko ke arth ko vistar bhi deti hain aur badalti bhi hai

मुझे: बिलकुल
३:१२ अपराह्न
vijay: us kavita ke prateeko ko dekhiye fir

मुझे: जबकि जान गया हूँ
बाझिन गाय को चारा न दूँ
खूंटे से बाँध कर रखूँ या निराजल हाँक दू दो डंडा मार कर
वध करूँ मनुष्य का या पशु का
कोई नर्क नहीं कहीं
तो क्या उठा लूँ खड्ग


vijay: definite tum sahi ansh chuna
३:१३ अपराह्न
mai is par koi apna arth nahi ladna chahta

khud soch lo aur bata do

aur fir ant me chale jao kavita ke

मुझे: क्या यह किसी हिन्दू राष्ट्रवाद का घोषणा पात्र है? लेकिन आप सिर्फ गाय देख रहे हैं जबकि यहाँ 'वध करूँ मनुष्य का या पशु का' है

vijay: jahan guruo aur bujurgo se kaha ja raha hi

kya karu is janne ka
३:१४ अपराह्न
मुझे: रुकिए

जबकि जान गया हूँ कि क्या गंगा क्या गोदावरी
किसी नदी में नहाने से
सूर्य को अर्ध्य देने से
पेड़ को जल चढ़ाने से
खेत में दीया जलाने से कुछ नहीं मिलना मुझे
तो गंगा में एक बार और डूब कर नहाने की अपनी इच्छा का क्या करूँ
एक बार सूर्य को जल चढ़ा दूँ तो
एक बार खेत में दिया जला दूँ तो
एक पेड़ के पैरों में एक लोटा जल ढार दूँ तो



vijay: ye to kya hota hai

jala lijiye na

ye tou kisse swal kar rahahi

मुझे: अगर मेरी सुनना ही नहीं है तो आप ही बोलिए
३:१५ अपराह्न
vijay: kaun hai jisko chunoti di ja rahi hai

boliye
३:१६ अपराह्न
chalo chup rah jata hu

waise bhi ek kavita par kai din ho gaye

kavi gayab hai

मुझे: ऐसा बहुत कुछ है
जो न जानता तो पता नहीं क्या होता
लेकिन अब जो जान गया हूँ तो
क्या करूँ..... पिता
क्या करूँ गुरुदेव
क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का

३:१७ अपराह्न
यहाँ चुनौती नहीं है ...एक दुविधा है...कि उस मार-काट में शामिल हो जाया जाया या फिर उन मानवीय मूल्यों कों जारी रखा जाय

तो' एक सवाल के रूप में कविता की टेक है

इस तो में कोई हिंसा या नकार नहीं
३:१८ अपराह्न
धरती माँ नहीं
तो भी सुबह पृथ्वी पर खड़े होने के पहले अगर उसे प्रणाम कर लूँ तो...
यदि आकाश के आगे झुक जाऊँ तो
बादलों से कुछ बूँदों की याचना करूँ तो


याद कीजिए

एक कविता में मनमोहन कहते हैं कि

नदी मेरी माँ है
३:१९ अपराह्न

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अब जानने का तो यह है कि नदी काहे की माँ? नागार्जुन बादलों कों देखकर कैसे रिएक्ट करते हैं?

vijay: man duvidha me nahi dikh rahe is pankti me we

sapasht hai

मुझे: स्पष्ट में नकार या स्वीकार होता है

vijay: bilkul
३:२० अपराह्न
मुझे: न कि 'क्या करूँ' की पुकार

vijay: jab nakar ya asweekar nahi hota aur duvidha hoti hai tab moothbhed karni hoti hai

ye pukar moothbhed ki nahi hai

ansh tumne upar diya hai
३:२१ अपराह्न
sweekar ki bat hai

spast

jahan tou aa jata jai

hai

मुझे: वह मुठभेड़ पूरी कविता में जारी है .... उस ज्ञानांध पूंजीवादी समाज के खूनी खेल में शामिल होने के बरक्स जो मानवीय है उसे बचा ले जाने की

vijay: fir se padh lo us ansh ko ab
३:२२ अपराह्न
khair

मुझे: ऐसा बहुत कुछ है
जो न जानता तो पता नहीं क्या होता
लेकिन अब जो जान गया हूँ तो
क्या करूँ..... पिता
क्या करूँ गुरुदेव
क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का


vijay: bahut baaten hui

मुझे: लेकिन अब जो जान गया हूँ तो
क्या करूँ.

vijay: tou kya karu

yani karna hi ab tou

yahi na
३:२३ अपराह्न
मुझे: उस खूनी खेल में शामिल हो जाऊं या इन मानवीय मूल्यों कों जारी रखूँ

vijay: kya kavi ko is par nahi sochna chahiye yadi we apne se spasht hai

मुझे: निर्द्वन्द्व होकर पशुओं और मानवों की हत्या करूं या
३:२४ अपराह्न
vijay: ki unki kavita ka ek wah paath yadi jo we nahi chahte, kyon ho rahaha hai
३:२५ अपराह्न
मुझे: वह इस पर निर्भर करता है कि पाठ कहाँ खडा हो कर किया जा रहा है. जैसे मैं कहूँ कि एक प्रगतिशील समाज में धर्म की कोई जगह नहीं इसलिए अजान का आखिरी होना शुभ है

vijay: shayad wah ek sthiti hoti jisme esi kisi bahas ki sarthakta ho sakti hai

मुझे: और अजान की बात करती वह कविता अप्रगतिशील
३:२६ अपराह्न
vijay: dekho ashok baar baar kavita se baahar ki jankariyon ko lakar tum use sahi sabit karne ki jidd par ade ho

bahas sirf bahas ke liye nahi

ek sthiti par pahunchne ke liye honi chahiye
३:२७ अपराह्न
baad me baat karna theek rahega

abhi aur wakt chahaiye hame aapas me batiyane ke liye

kuchh rukkar

अशोक कुमार पाण्डेय said...

मुझे: यही मै आपके सन्दर्भ में कह सकता हूँ...कोई कविता जितनी अपने भीतर होती है उतनी ही बाहर...किसी कविता का पाठ एक स्थापित रीति से होता है.
३:२८ अपराह्न
लेकिन जो असुविधाजनक है उससे आप भिडना ही नहीं चाहते

vijay: beshak mujhe apne ko tark par khara na pane par sweekar lene me gurej na hoga

nahi

ye asuvidha nahi

chalaki hai
३:२९ अपराह्न
sandarbhi ki chalaki

मुझे: दिक्कत यही है कि आप उस कविता कों सेलेक्तिवेली पढ रहे हैं...

vijay: jise chahe tum jitna idhar udhar rakh kar baat karo

bilkul

we selectiv tarah se parateeko ko uthati hai
३:३० अपराह्न
ladai bahut hui

ab thdoa halka ho lete hai

मुझे: आप इसकी बात कर रहे हैं

vijay: bahas se nahi hat raha

bas yuhi abhi lagta hai wavelenght match nahi kar rahi

ha ha ha

मुझे: भाई फैज की तो वह पूरी नज्म ही इस्लामी परम्परा पर है

:)
३:३१ अपराह्न
vijay: faiz me kai dikkate idhar bhai rajesh saklani ne chinhit ki hai

pichhle dino unhe padhte hue

suno wo aalekh padhna

film wala

mai kahani padhta hu
३:३२ अपराह्न
updated wali

मुझे: ओके
३:३४ अपराह्न
vijay: bhai ye kis formate me bhej di

मुझे: अरे

vijay: mai offce 2003 wala hu

मुझे: मैं पी दी एफ भेजता हूँ

vijay: haa
३:३७ अपराह्न
ashok wo kahani padhi thi

khilandad that

jo maine pichhle dino bheji thi

tumhe padhne ko
३:३८ अपराह्न
मुझे: जी
३:३९ अपराह्न
vijay: theek hai ?

kahani

ya

मुझे: मै मेल करूँगा

vijay: theek hai