Friday, September 2, 2011

रैणीदास का जनेऊ

गाथाओं, किंवदतियों, लोककथाओं और मिथों में छुपे उत्तराखण्ड के इतिहास को जिस तरह से उदघाटित किया जाना चाहिए, अभी वह पूरी तरह से संभव नहीं हो पाया है। इधर हुई कुछ कोशिशों के बावजूद उसके किये जाने की ढेरों संभावनाओं मौजूद हैं। उत्तराखण्ड के इतिहास को केन्द्र में रखकर रचनात्मक साहित्य सृजन में जुटे डॉक्टर शोभाराम शर्मा की कोशिशें इस मायने में उल्लेखनीय है। प्रस्तुत है ऎसे ही विषय पर लिखी उनकी ताजा कहानी।
वि.गौ

डा शोभाराम शर्मा

उस साल मौसम के बिगड़े मिजाज ने कुछ ऐसा रंग दिखाया कि भुखमरी की नौबत आ गई। चौमास के आखिरी दिनों पानी इतना बरसा कि तैयार फसल चौपट हो गई। और इधर मौसम ने फिर ऐसी करवट बदली कि पूरा जाड़ा बिना बरसे ही बीत गया, रबी की फसल भी सूखे की भेंट चढ़ गई। जाड़ों भर कड़ाके की कोरी ठण्ड ने जीना मुहाल कर दिया था। अलाव के सहारे दिन भी कटने मुश्किल हो गए थे। और एक दिन जब आंख खुली तो खुली की खुली रह गयी। खेत, खलिहान, बाटे । घाटे, पेड़-पौधे और छत आंगन सब के सब जैसे किसी सफेद चादर से ढ़क गए थे। अजीब नजारा था। आंखे हरियाली देखने को तरस गयी। पहले बर्फवारी का भ्रम हुआ लेकिन जल्दी ही टूट भी गया। आसमान तो साफ था तो फिर बर्फ कैसे? सचमुच वह पाला ही था और कुदरत का वह करिश्मा बड़े बूढों ने भी पहली बार देखा था। पिघल तो गया एक ही दिन में लेकिन अपने पीछे पत्ते पेड़ों की टहनियां तक झुलसा गया। अनाज के अभाव में उन दिनों लोग जाड़ों की जिन सब्जियों से जैसे-तैसे काम चला रहे थे, पाले ने उन्हें भी नहीं छोड़ा और तो और सकिन और बिच्छूघास जैसी जंगली वनस्पतियां भी झुलसकर रह गयी।
कुदरत की मार तो इलाके भर के लोग झेल ही रहे थे, लेकिन गांव के एक छोर पर बसे औजी (वादक और दर्जी) परिवारों की हालत सबसे पतली थी। आरम्भ में कोई एक औजी परिवार ही वहां आकर बसा होगा। सवर्ण परिवारों से मिलने वाले डडवार (हर फसल पर मिलने वाला अनाज) से उसकी गुजर-बसर हो जाती होगी। उसी एक परिवार के अब पांच-छह परिवार हो गये थे। हालांकि सवर्ण परिवार भी कुछ बढ़ गये थे लेकिन इतने नहीं कि सारे औजी परिवारों का गुजारा हो सके। ऐसे में तीन-चार बच्चों के बाद एक और बच्चे का आगमन परिवार को खुशी देने की जगह दुखी ही तो करता । कड़ाके की ठण्ड और ओढ़ने-बिछाने को एकाध चीथड़ा भी नहीं। ऊपर से अशौच की चिंता। प्रसूता को उस सीलनभरी कोठरी में जहां एक कोने में बकरी और बांझ गाय बंधी थी दूसरे कोने में गोबर और मेंगनी के बीच बच्चे को जन्म देना पड़ा। और वही दिन था, जिस दिन धरती पाले का सफेद कफन ओढ़े मुर्दे की तरह अकड़ी पड़ी थी। पराल के बिस्तर पर तड़पते पूरा एक दिन और एक रात बीत गए लेकिन प्रसव नहीं हो पाया, मरणान्तक प्रसव-पीड़ा सुयरि (दाई) जिसके प्रयास से प्रसूता और नवजात दोनों की जान बच गयी। लेकिन खून जमा देने वाली ठण्ड के कारण जिस टैणी(मांस पेशियों में होने वाली जकड़न) का अनुभव प्रसूता को हो रहा था, उससे बचने का प्रयास करना जारी था। पराल के बिस्तर के पास ही चार पत्थर रखकर अंगीठी बना दी गयी। प्रसूता के लिए जिस गिजा की जरूरत थी, उसे जुटा नहीं पाए तो चुनमण्डी (मंडुवे के आटे का फीका तरल पेय) से ही काम चलाना पड़ा। पेट चल गया तो प्रसूता की जान पर बन आई। कहीं से मांग मूंग कर सेर-आध सेर-चावलों का जुगाड़ बिठाया और तब कहीं माण्ड पी-पीकर उसकी जान बच पाई।

इसी बीच दादी ने गांव के पण्डित जी से नवजात के लक्षणों के बारे में पूछा तो यह जानकर सोच में पड़ गयी कि पोता मूल में पैदा हुआ है। एक तो उसके जन्म का दिन ही मनहूस था और उपर से बाप के लिए भी बुरा! दादी गहरी चिंता में पड़ गयी। कहीं कमाउ जवान बेटे को कुछ हो गया तो! आखिर वह जिस नतीजे पर पहुंची शायद ही दुनिया की कोई दादी-अम्मा पहुंची हो। दिल पर पत्थर रखकर उसने नवजात से छुटकारा पाने का मन बना लिया। प्रसूता की गैर मौजूदगी में उसने पहले तो गला दबाने की सोची लेकिन नवजात के मासूम चेहरे को देखकर हिम्मत जबाब दे गयी। बाहर निकली तो उसकी नजर में जहरीला च्यूं (कुकरमुत्ता) पड़ गया। उसी को लेकर झटपट भीतर आई और आंखे बंद नवजात के मुंह में ठूंसकर वापस लौट गई। बहू को भी हिदायत दे डाली कि वह नवजात को दूध पिलाना बंद कर दे। अगर पति को कुछ हो गया तो वह क्या करेगी! दो बच्चों की मां को तीसरे के न रहने से क्या फर्क पड़ेगा। यह सोचकर मां ने उस दिन नवजात को दूध नहीं पिलाया । हां इतना जरूर किया कि मुहं में ठुंसे कुकरमुत्तों को होंटो से बाहर निकलने दिया। रात को अंगीठी की हल्की लपट के उजास में उसने जब नवजात के चेहरे पर देखा तो उसकी मासूमियत मां के दिल को चीर गयी और वह सास की हिदायत भूलने पर मजबूर हो गयी। नवजात जहरीले कुकरमुत्ते के जहर को भी पचा गया था। सच ही कहा है कि - जाको राखे साइयां मारि सके न कोय।
सूखी लकड़ियां उपलब्ध न होने पर पति ने कुछ अमलाट (अधसूखी) लकडियां ही अंगीठी में डाल दी थी। फलस्वरूप कोठरी में इतना धुआं भर गया कि सांस लेना दूभर हो गया और आंखे बुरी तरह बरसने लगी। प्रसूता अधसूखी लकड़ियां हटाने को उठी तो राख की परत से ढके अंगारे पर पैर पड़ गया। पैर के तलुबे से सिर की चोटी तक ऐसी रणकताल (जलने पर मांस-पेशियों में होने वाला तीखा दर्द) मची कि वह बिलबिला उठी। ठण्ड के मारे टैणी और दाह की यह रैणी(रणकताल) ऊपर से अधभरे पेट में उठते मरोड़-नवजात अपने साथ दु:ख-दर्द की ऐसी सौगात लेकर आया कि मां-बाप ने उसका नाम रैणी ही रख दिया। रैणी के साथ दास जुड़ना तो लाजिमी था क्योंकि औजी जात के फरुषों के नाम में दास जुड़ने की परम्परा न जाने कब से चलन में थी।
बालक रैणी जैसे-तैसे जिन्दा तो रह गया लेकिन जन्म के साथ जो कटुता पैदा हुई थी परिवारवालों का व्यवहार जब-तब उसी को सामने ला देता। भाई-बहनों के बीच भी वह अपने को बेगाना महसूस करता। परिवार के दुलार का भूखा बालक सहमा-सहमा सा रहता। डांट-फटकार और बार-बार की धुनाई उसे अब भीतर प्रतिरोध के लिए उकसाने लगी। फलस्वरूप वह अपनों की कम ही सुनता। लेकिन गांव के बामन-ठाकुरों से बड़े अदब से पेश आता। ऐसा भी कई बार हुआ कि जब किसी शरारत पर माघ्-बाप ठुकाई पर उतर आते तो वह गांव के सवर्ण घरों की ओर भाग लेता और मां-बाप को दस बातें सुननी पड़ती। लोग कहते कितना भला लड़का है फिर भी पीछे पड़े रहते है। कैसे मां-बाप हैं ये? अपनों को दूसरों की झिड़की खाते देख पता नहीं क्यों उसे दिली खुशी होती। एक दिन तो हद ही हो गयी रैणी को बकरी चुगाने का काम सौंपा गया था। बकरी किसी के खेत में जा घुसी और मे के हरे भरे पौधे चट करने लगी। रैणी ने उसे खेत से भगाना चाहा लेकिन बकरी कहां मानने वाली थी। वह एक ओर भागता तो बकरी दूसरी ओर के पौधों पर पिल पड़ती। आखिरकार बकरी की जिदद से परेशान रैणी ने पत्थर उठाकर जो मारा तो बकरी की टांग ही टूट गयी। बाप ने देखा तो बेटे की टांग तोड़ने पर उतारू हो गया। उसकी चीख फकार सुनकर खेत का मालिक सामने आया, बोला- "अरे क्या कर रहे हो? कोई बच्चे को इस तरह मारता है क्या"?
"ठाकुरो, आप नहीं जानते यह बच्चा नहीं कोई शैतान है शैतान जो हमारी जान लेने हमारी कोख में पैदा हो गया। आप देखते नहीं, बेचारी बकरी की टांग ही तोड़कर रख दी इसने" बाप ने कहा।"तो तुम बच्चे की टांग तोड़ डालोगे? हमारा जो नुकसान हुआ, उसकी भरपाई कौन करेगा? बता। अरे बच्चे ने तो नुकसान करने से रोकना चाहा था। पत्थर टांग पर लग गया तो बेचारे का क्या कसूर"? खेत के मालिक ने कहा।
"नुकसान तो हो ही गया मालिक! लेकिन इसकी सजा बकरी को नहीं बकरी चुगाने वाले को मिलनी चाहिए थी।" बाप ने कहा और फिर रैणी के दोनों कान इतने जोर से उमेठे कि वह बिलबिला उठा। छूटने के लिए छलांग लगायी तो बिच्छूघास के घगने झाड़ में जा घुसा। सारे बदन पर फफोले जैसे उभर आए। उसकी चीख-चिल्लाहट और दशा देखकर बाप का हृदय भी पसीज उठा। किसी तरह झाड़ से बाहर निकला खेत के मालिक ने फटकारा- 'कैसे बाप हो तुम! बेटे की इस हालत के जिम्मेदार स्वयं तुम हो। जान-बूझकर तो इसने बकरी की टांग नहीं तोड़ी। तुम तो जान लेने पर ही उतारू हो गये। देखो इसे फौरन घर ले जाओ। गोबर से शरीर मलो और फिर गरम पानी से धो डालो ऐसा करने से कण्डाली का असर जाता रहेगा।"
रैणी ने दिन-प्रतिदिन अनुभव किया कि परिवार में उसकी गलतियों पर औरों से कुछ ज्यादा ही सख्ती बरती जाती है। फलत: उसमें विरोध का भाव अमली जामा पहनने लगा। उसने ढोल-दमाउ बजाने की अपनी पारम्परिक कला से भी कोई लगाव नहीं रखा और दर्जी के काम से भागता फिरा। जबरदस्ती करने पर उसने किसी जजमान का नया कपड़ा इस तरह फाड़ डाला कि वह किसी काम का न रहा। परिवार को दूसरा कपड़ा खरीदकर नुकसान की भरपाई करनी पड़ी। वह पिटता रहता लेकिन बस में नहीं आया और नहीं आया। प्राय: घर से निकलकर इधर-उधर आवारागर्दी करता रहता। पूरब जाने को कहा जाता तो वह पश्चिम को रुख कर डालता। लेकिन गांव के सवर्ण परिवार जो भी काम करने को कहते खुशी-खुशी कर लेता। उनकी नजर में उस जैसा सुशील और आज्ञाकारी लड़का तो गांव भर में कोई दूसरा नहीं था। मां-बाप या परिवार वाले जब भी किसी शैतानी पर उसे सजा देते तो उल्टे उन्हें गांव वालों की झिड़की खानी पड़ती। अगर भूखा रखने की सजा मिलती तो कोई न कोई सवर्ण उसे कुछ ऐसा खिला देता कि जिसका स्वाद वह भुला न पाता। घर में तो उसे अधभरे पेट बाड़ी (मडुंवे के आटे का फीका हलुवा) गंजुडू, भट ;सोयाबीन की पहाड़ी किस्मद्ध और झंगोरे की खिचड़ी, धबड़ू ;हरी सब्जियों वाली खिचड़ीद्ध जौ और मंडुवे की रोटियां ही खाने को मिलती जिनके स्वाद से वह आजिज आ चुका था।
किशोर रैणी स्थानीय मिडिल स्कूल की उस आर्य-समाजी सभा में भी शामिल हुआ था जिसमें केसी ने सवाल उठाया था कि जनेउ धारण करने से क्या खाली पेट भर जाएघ्गे। केसी का वह कथन उसके जेहन में इतना रच बस गया कि वह उसे कभी भुला नहीं पाया। सभा से लौटते समय उसने जंगली बन्दरों का एक बड़ा सा झुण्ड देखा। उसने पाया कि झुण्ड की एक बन्दरिया अपने शावकों को पेड़ की एक डाली से दूसरी डाली पर लटकने और उछलने का प्रशिक्षण दे रही है। इस परीक्षा में एक शावक असफल रहा और नीचे जमीन पर गिर पड़ा। बन्दरों के झुण्ड ने उस असफल शावक को मार डालने हेतु घेर लिया। कहते हैं कि इस तरह के असफल शावक को बन्दर या तो स्वयं मार डालते हैं या मरने के लिए अकेला छोड़ जाते है। बन्दरिया जब स्वयं उसे काट खाने को दौड़ी तो रैणी से रहा न गया। उसने पत्थर मार-मार कर बन्दरों को भागने पर मजबूर कर दिया। रैणी पास गया तो शावक सहमकर जमीन से चिपट गया। किसी तरह फचकार कर रैणी ने उसे गोद में उठा लिया। उसकी बटन जैसी नन्हीं आंखों में मौत के आसन्न भय की जगह एक निरीह निश्छलता की झलक देखकर रैणी का मन और भी पसीज उठा और उसने उसे पालने का मन बना लिया। वह शावक को घर उठा क्या लाया कि बवाल मच गया। परिवार के लोग उसे जंगल में छोड़ आने पर जोर देने लगे। एक लड़के ने बंदरिया की बच्ची को पत्थर क्या मारा कि रैणी आपा खो बैठा। उसने लड़के को दो चांटे मार दिये। इस पर परिवार के लोग औरभी खफा हो बैठे। कहने लगे कि- ''एक बंदरिया के बच्चे के लिए अपने ही भाई-भतीजों पर हाथ उठायेगा। नालायक जहाघ् से इस बला को उठा लाया वहीं फेंक आ।" इस पर रैणी शावक को लेकर चुपचाप खिसक गया। लेकिन जंगल न जाकर गांव के खाते-पीते सवर्ण घरों की ओर।
रैणी के पास बंदरिया की बच्ची देखकर बच्चों और औरतों की भीड़ जमा हो गयी। एक औरत ने कहा- ''बाप रे! इतनी कमजोर! रैणी कहीं तेरी गोद में ही मर गई तो?"" वह तुरंत अपने घर में घुसी और कटोरा भर दूध ले आई। भूखी बंदरिया दूध पर पिल पड़ी यह देखकर बहुत से लोग खाने पीने की चीजें रैणी को इस आशय से सौंपने लगे कि भूखी बंदरिया का पेट भर सके। सामान को देखकर रैणी को लगा कि इस बंदरिया के सहारे अपने गुजारे का इंतजाम भी बखूबी किया जा सकता है।
पेट भरने पर बंदरिया उछल कूद मचा कर भीड़ का मनोरंजन करने लगी। रैणी ने उसी दिन से बंदरिया को खेल तमाशे के कुछ ऐसे गुर सिखाने शुरू कर दिये जिनसे लोगो का मनोरंजन होने लगा। मसलन पीछे के पांवों पर खड़े हो कर अगले पांवो को जोड़कर अभिवादन करना या दर्शकों के पांवो पर लोट पोट होना आदि। बच्चों को उसका रैणी के कंधे से सिर पर उछलकर जा बैठना या जमीन पर लेटे रैणी के सिर से जूं बीनकर चबाने की क्रिया बहुत पसंद आने लगी। खाने-पीने का इतना सामान मिलने लगा कि परिवार को भी अब रैणी का बंदरिया पालने का शौक पसंद आने लगा। पकी पकाई भोजन-सामाग्री प्राय: बर्बाद हो जाती थी। इसलिए रैणी अब इलाके भर से आटा-दाल-चावल जितना भी हो सका घर लाने लगा। इलाके भर के बच्चे और स्त्रियां रैणी का बेसब्री से इंतजार करते कि कब वह आए और बंदरिया के करतब दिखाए।
देखते ही देखते रैणी जवान भी हो गया। परिवार को उसकी शादी की चिंता सताने लगी। लेकिन जहां भी बात चलाते कोई भी औजी परिवार अपनी बेटी व्याहने को तैयार नहीं होता। उनकी नजर में बंदर-रीछ नचाने का काम तो मदारियों का था, उसे तो औजी होने के नाते वादन और सिलाई में कुशल होना चाहिए था। फिर भी पड़ोसी गाघ्व का एक औजी परिवार अपनी बेटी ब्याहने को तैयार हो गया। बात यह थी कि इधर रैणी के परिवार वालों ने उस गांव में घुस पैठ आरंभ कर दी थी। उस गांव के कुछ परिवार उन्हें सिलाई का काम देने लगे थे और कुछ तो उनसे पूजा-पाठ या ब्याह शादी में वादन का काम भी यदा-कदा लेने लगे थे। यजमानी पर खतरा मंडराते देखकर उस परिवार ने रिश्ता जोड़ने का मन बना लिया। उनका विश्वास था कि नातेदारी के नाते उनकी यजमानी से छेड़-छाड़ नहीं होगी। और इस तरह रैणी की शादी भी हो गयी। परिवार पहले से ही जगह की तंगी का अनुभव कर रहा था। शादी से पहले तो रैणी बंदरिया को दादा-दादी वाले छोटे से कमरे के एक कोने में बांध देता और खुद दूसरे कोने में सो जाया करता था। लेकिन शादी के बाद वह आसरा भी छिन गया। आदत के अनुसार उसने विरोध भी जताया कि उसे ही क्यों गोशाला में रहने को कहा जा रहा है लेकिन परिवार के किसी भी सदस्य ने उसका साथ नहीं दिया। उसे ही अपनी व्याहता व बंदरिया के साथ गोबर और भेंगनी से पटी गोशाला के एक कोने पिस्सुओं के बीच रहने पर मजबूर होना पड़ा।
परिवार की झोपड़ी एक लंबे चौड़े खेत के किनारे पथरीली जगह पर बनी थी। खेत के तब के मालिक ने दो-तीन पीढी पहले उस किनारे पर झोपडी बनाने की इजाजत दी होगी। खेत और झोपड़ी के बीच अभी भी एक छोटा सा चटटानी हिस्सा बचा था। रैणी ने सोचा कि अगर उस चटटान को तोड़ दिया जाए तो उस जगह कम से कम दो कमरे तो निकल ही सकते हैं। उसकी यह बात परिवार को पसंद आई और दूसरे ही दिन से चटटान तोड़ने का काम शुरू हो गया, पत्थर जमा होने लगे। कुछ ही दिनों में चट्टान में समतल भूमि निकल आई। दो कमरों की नींव रखने वाले थे कि खेत का मालिक आड़े आ गया। बोला- ''वाह! उंगली पकड़कर पहुघ्चा पकड़ना इसी की तो कहते हैं। मेरे पड़दादा ने तुम लोगों को घर बनाने की अनुमति क्या दी कि तुम लोग अब खेत को ही अपना समझने लगे। अगर बाज नहीं आए तो मैं झोपड़ी भी उखाड़ फेंकूंगा। तुम्हारी झोपड़ी भी मेरे खेत में हैं। और वह चट्टान भी मेरे खेत का हिस्सा थी जिसे तुमने बगैर इजाजत तोड़ डाला। चट्टान के ये पत्थर भी मेरे है। खबरदार, जो इन पर हाथ लगाया।"
खेत के मालिक की वह धमकी कोरी धमकी नहीं थी। परिवार के लिए भरपूर जगह बनाने का सपना सपना ही बनकर रह गया। रैणी को केसी का वह कथन याद आया जब शिल्पकारों को जमीन जायदाद से महरूम रखने की शिकायत आम सभा में की थी।
गांव में उसी दौरान एक शादी हुई थी। ढेर सारा भात बच गया था। घर की मालिकन उसे ढोर-डंगरो के आगे फेंकने जा रही थी। रैणी ने प्रार्थना की कि भात उसे दे दे तो उसके परिवार का दो-तीन दिनों का काम चल जायेगा। भात को सुखाकर फिर से गरम पानी में डालकर खाने योग्य बनाने की तरकीब उसका परिवार जानता था। वह भात घर ले आया माघ् ने भात सुखाने और चील-कौवों से बचाने की हिदायत रैणी की घरवाली को दी थी। इसी बीच बंदरिया न जाने क्यों रैणी के कंधे से उछलकर सूखते भात के उपर कूद पड़ी। घरवाली चूल्हे से जल्ाती लकड़ी लेकर बंदरिया को मारने झपटी। बंदरिया जैसे चीं बोल गयी। इस पर रैणी का पारा चढ़ गया बोला- ''बेवकूफ औरत, थोड़े से भात के लिए बंदरिया को मार डाला।" और उसने झोंटा पकड़कर दो चांटे इतने जोर से मारे कि उसकी नकसीर फूट गयी। वह रोती-चिल्लाती भाग खड़ी हुई। बंदरिया तो कुछ ही देर में उठ खड़ी हुई लेकिन घरवाली का पता नहीं चला। घरवालों ने रैणी की ऐसी लानत मलामत कर डाली कि उसे घ्ारवाली की खोज-खबर लेने पर बाघ्य होना पड़ा। रास्ते भर ढूंढा कहीं नहीं मिली। उसे लगा कि जरूर मायके पहुंच गयी होगी। ससुराल में भी उसे बहुत कुछ बुरा-भला सुनने को मिला। घरवाली ने तो रैणी के सिर पर बैठी बंदरिया को अपनी सौतन बताकर उसके साथ जाने से इंकार कर दिया। उसका कहना था कि वह जब तक बंदरिया को नहीं छोड़ देता वह ससुराल नहीं जायेगी। रैणी ने समझाया कि उसे न तो कपड़े सिलना आता है और न वह बाजे बजाना ही जानता है। बंदरिया के खेल-तमाशे दिखाकर वह अपना और परिवार का गुजारा कर सकता है। सास-ससुर को रैणी की बात में सार नजर आया और उन्होंने बेटी को अपने पति के साथ जाने के लिए मना लिया।
इधर मिडिल स्कूल के अहाते में हुई आर्य समाज की असफल सभा अब तक अपना असर दिखाने लगी थी। रैणी के अपनी बिरादरी के लोग जनेउ धारण कर चुके थे और उस पर भी दबाव बनाए थे। वे लोग "समन्या साब और समन्या ठाकुरो" की जगह 'नमस्ते" और उनमें से कुछ नौजवान तो "जै हिंद" कहकर अभिवादन करने लगे। अपने लिये "आर्य" का प्रयोग करते देख सामान्य सवर्ण लोगों के शब्द कोश मे वह वही अर्थ देने लगा जो अछूत 'शिल्पकार" या 'हरिजन" शब्द देने लगे थे। रैणी अपने लोगों के मना करने पर भी 'समन्या साब और समन्या ठाकुरो" का ही प्रयोग करता रहा। बिरादरी और उसके बीच खाई बढ़ती ही गयी लेकिन वह था कि झुका नहीं। उसके अपने बड़े भी उससे दूरी रखने लगे थे। एक दिन रैणी के अपने ही चाचा, घर के आगे जाड़ों की धूप का आनन्द ले रहे थे। अपनी मैली-कुचैली, फटी-फरानी कमीज उतारकर जनेउ की जूं बीन-बीनकर मार रहे थे। लीखों (जूं के अण्डो) की तो कतार पर कतार चिपकी पड़ी थी। जिन्हें मसलते देख रैणी हंस पड़ा और बोला- ''काका उतारकर बंदरिया को दे दो ना, एक पल में साफ कर देगी।"
''जा रे जा! लगता है तू हमारा नहीं किसी बंदर की औलाद है। जनेउ क्या जब-तब उतार फेंकने की चीज है, नालायक कहीं का।" चाचा ने डांटा।
"तो ठीक है जुंये पालते रहो और खून चुसाते रहो। मेरा क्या?" रैणी बोल उठा।
''तेरी तो खोपड़ी ही औंधी है, अपने सारे लोग जनेउ धारण कर चुके लेकिन एक तू है कि मानता ही नहीं।" चाचा ने कहा।
''मान गया काका मान गया। यह देखो मेरा जनेउ।" और उसने भी कमीज उतार दी।
चाचा ने देखा कि उसने भैंस की खून से लथपथ आंत जनेऊ की तरह धारण कर रखी है।
''धत तेरी की! जनेउ का ऐसा अपमान!" और चाचा ने घ्रणावश जमीन पर थूक दिया।
''काका मेरा जनेउ तो खून बढ़ाने के काम आएगा। मैं शोरबा बनाकर पीउंगा लेकिन आपका जनेउ तो खून की प्यासी जूंओ का ही घर बनेगा। खुजाते-खुजात ऊपर से नाखून भी घिस जायेगे सो अलग। बोलो मेरा जनेउ अच्छा है या आपका?" रैणी ने एक और चोट की।
बात यह थी कि कुछ दिनों से चाचा रैणी को जनेउ धारण करने के लिए समझा बुझा रहे थे। रैणी को उनका दबाव पसंद नहीं आया तो उसने इस तरह उनसे पिण्ड छुड़ाने का मन बनाया। एक दिन पहले ही पड़ोस के गाघ्व में गौं-पूजा सम्पन्न हुई थी और केर (अभिमंत्रित सीमा) पर जिस भैंसे की बलि दी गयी थी, उसी की आंत निकालकर रैणी ने तमाशा खड़ा किया। चाचा को कुछ कहते नहीं बना। रैणी बंदरिया को लेकर आंगन से एक ओर खिसकने लगा।
दो बातें सुनाकर रैणी का इस तरह खिसकना चाचा को रास नहीं आया। झल्लाकर बोले- ''तू अपने को समझता क्या है रे! बड़ों से इस तरह बात की जाती है क्या? लोगों के बीच इज्जत पाने के लिए हमारी जो कोशिश है तू उसी की हघ्सी उड़ाता है।""
रैणी ने पलटकर कहा- ''तो मिल गयी वह इज्जत? क्या बामन-ठाकुर हमें अपने रों में घुसने देते है? यहां जो गुरूजी का झण्डा है, उसकी चाहरदीवारी के भीतर जाकर क्या आपको अरदास करने की इजाजत मिल गयी? गैर-बराबरी की दीवार को क्या जनेउ तोड़ पायेगा? चाचा जब तक जमीन-जायदाद का हक नहीं मिलता, जनेऊ धारण करने से कुछ नहीं होने वाला, कहे देता हूं।"
रैणी झटके से एक ओर निकल गया। चाचा उसका मुंह देखते रह गये।

4 comments:

chandramani vatas said...

Amazing !

सुबीर रावत said...

डॉक्टर शोभा राम शर्मा जी की यह कहानी मन को छू गयी. वे जो भी लिखते हैं दिल से लिखते हैं और उसमे कल्पना नहीं, जीवन का यथार्थ झलकता है, उनका अनुभव बोलता है..... मै उनकी कहानियों, उनकेलेखों का मुरीद हूँ.
उनको मेरा प्रणाम और प्रस्तुति के लिए आपका बहुत बहुत आभार.

नीरज बसलियाल said...

बढ़िया कहानी |

Anonymous said...

is kahani ko mai uttarakhand ke dalit sahitya ki kahaani kahna chahunga. uttarakhand me is tarah ki kahaniya khaskar pahadi samaaj me dalit samasya par par shayad hi likhi gayi hai.yahan ke tathakathit pragatisheel sawarn lekhak in sawalon se takrane ki bajay unse bachte rahe hai.phir chahe ve kitne krantikari bante hon. ant me sawarn hi ho jate hai