Thursday, January 26, 2012

तोहफ़े


मदन शर्मा
संजीव और मैं, एक ही सरकारी संस्थान में नौकरी करते थे। हमारे बीच मित्रता का भाव था। जब भी समय या अवसर मिलता, हम इधर-उधर की दिलचस्प बातें करके, अपना और पास बैठे लोगों का दिल बहलाया करते। संजीव, कुछ अर्सा पहले, सरकारी नौकरी छोड़, किस्मत आज़मार्इ के लिये किसी प्राइवेट फ़र्म में जा लगा था। सुना है, वह आजकल दिल्ली में रह कर कारों के कारोबार में, खूब रूपये कमा रहा है।
    यहां से जाने से पूर्व, संजीव मुझे दो ऐसी चीज़ें सौंप गया, जिसके कारण, मैं शायद ही उसे कभी भूल पाऊं!
    मेरे घर में टी वी तो था, मगर रेडियो या ट्रांसिस्टर नहीं था। आकाशवाणी से प्रसारित अपनी कहानियां या व्यंग्य सुनने के लिये, मुझे इसकी ज़रूरत थी। संजीव ने बताया, कि उसके पास एक बढि़या रेडियो सेट पड़ा है। कहानियां सुनने के लिये वह काफ़ी होगा। नया लेने की क्या ज़रूरत है।
    रेडियो सौंपते हुए संजीव ने बताया, कि इसमें मामूली-सा नुक्स है। पांच-सात रूपये में यह अच्छा काम करने लगेगा।
    चालीस रूपये ख़र्च करके रेडियो ठीक चलने लगा। अपनी एक-आध रचना भी उस पर सुन ली। घर में रेडियो और मेरी कहानी की प्रशंसा हुर्इ। किंतु सप्ताह भर बाद ही उस रेडियो की मरम्मत का ऐसा सिलसिला चला, कि महसूस होने लगा, कि यह मरम्मत यदि यों ही चलती रही, तो इस बढि़या रेडियो के साथ-साथ, मेरा टी वी और फि्रज भी बिक जायेगा।
    संजीव ने वायदा किया, कि वह मुझे कहीं से नया टं्रासिस्टर सस्ते में दिला देगा। मगर उसका मौक़ा ही न आया।
    संस्थान में कुछ वर्करों का प्रमोशन हो जाने पर, उन्हें अलग अलग अनुभागों या दफ़तरों में नियुक्त किया जाना था। संजीव ने चुपके से मुझे सुझाया,  "आप गुरमीत को अपने स्टाफ में ले लो, बहुत बढि़या आदमी है।"
"मैंने तो सुना है, वह शराब पीता है।"
"तो क्या हुआ? मैं शराब नहीं पीता? यक़ीन मानो, उस जैसा आदमी आपको खोजने पर भी नहीं मिलेगा।"
    मैंने ऊपर कहसुन कर, गुरमीत को अपने स्टाफ में ले लिया। लम्बा-चौड़ा मगर ढीला-ढाला और फैला हुआ सा शरीर, उसी तरह की ढीली पगड़ी और दाढ़ी। लिबास तुड़ा-मुड़ा। आंखों में और चेहरे पर सुर्खी, जैसी शराबियों के चेहरों पर तमतमाहट-सी होती है।
"आप यहां मेहनत से काम कर सकेंगे?" मैंने पूछा।
"बिल्कुल जी। आप जैसा भी कहेंगे, वैसा ही करेंगे जी।"
    चार-पांच दिन में ही पता चल गया, गरमीत नाम की यह चीज़, उस रेडियो से कुछ अलग नहीं। यह आदमी तो यहां का साधारण कार्य भी सीखने के योग्य नहीं। बड़ी ग़लती हो गर्इ! मगर अब क्या हो! मैंने तो स्वयं ही सिफ़ारिश करके यह बला, अपने सिर पर ले ली है!
    उससे कोर्इ भी काम नहीं हो पा रहा था। न उसकी समझ में कुछ आ रहा था। परेशान होकर मैंने उसे रिकार्ड स्पलायर का काम करने को कह दिया।
    सुपरवाइज़र के पद पर होकर, रिकार्डस्पलायर का काम सौंपे जाने पर उसने कोर्इ आपति न की। वह बड़े उत्साह में भरकर यह काम करने लगा। बलिक जब अर्दली छुटटी पर होता, तो चाय तैयार करके, पूरे स्टाफ़ को सर्व कर देता।
    वह थोड़ा लंगडा कर चलता था। पता चला, कभी फुटबाल खेलते हुए उसका एक्सीडेंट हो गया था। यह भी पता चला, वह अच्छे घर से है।  बड़ी बहन डाक्टर है। बच्चे पढ़ने लिखने में तेज़ हैं और इसकी पत्नी किसी अच्छे स्कूल में अंग्रेजी़ पढ़ाती है।
    दफ़तर में उससे किसी को कोर्इ शिकायत न थी। वह बड़ी विनम्रता से बात करता। कभी किसी की निंदा वह नहीं करता था।
    उसे कभी किसी बात पर क्रोध न आता था। कोर्इ बीमार होता, तो वह पता लेने उसके घर या अस्पताल पहुंचता। कोर्इ मौत हो जाने पर, वह अंतिम कि्रया में शामिल होने के लिये सबसे पहले मौजूद रहता। वह कितने ही ज़रूरतमंद रोगियों को अपना खून दे चुका था और खूबी यह, कि वह ये सब काम हंसते हुए और सहज भाव से करता था। मैं उसे 'संत जी कहने लगा।
    शराब तो वह पीता ही था। अब कुछ और अधिक पीने लगा। वह स्वयं पीता और यार-दोस्तों को भी पिलाता और शराब के साथ मछली के पकौड़े भी ज़रूर होते। यही साथ पीने वाले यार भार्इ ही उसे उस खर्च के लिये रूपये सूद पर उधार देते और बड़ी सख्ती से वसूल भी करते।
    कई लोग उसे दफ़तर में ही मिलने आने लगे। उसे बाहर ले जाकर मालूम नहीं, कैसे धमकाते रहते। वह वापिस लौटता, तो उसका चेहरा बुझा-बुझा-सा होता।
    पता चला, गुरमीत के सिर पर भारी कर्ज चढ़ चुका है। वे लोग दफ़तर में आकर ही उसे धमकाने लगे। मैंने उन लोगों का दफ़तर में आना बंद करा दिया, तो कर्ज वसूल करने वाले, उसे बाहर सड़क पर घेरने लगे। जेब में जो कुछ होता, वे छीन लेते। जेब खाली होती, तो उसके दो-चार हाथ जड़ देते।
    शराब पीने के लिये गरमीत जो रूपये उधार लेता, वह दस के बारह रूपये वाला होता था। वह तीन सौ उधार लेता, जो कुछ ही दि्नों में दो हज़ार हो जाता। बढ़-बढ़ कर क़र्ज़ की यह राशि साठ हज़ार तक पहुंच गर्इ थी। पूरा वेतन, ओवर टाइम और एरियर के पैसों में से, उसके पास कुछ भी हाथ में न रहता। घर खाली हाथ पहुंचता, तो वहां भी अच्छी आवभगत होती। खाने को कुछ न दिया जाता। दिन में भी भूखा रहता। छुटटी के बाद फिर कोर्इ मिल जाता, जो उधार रूपये देता और उसके साथ ठेके पर चल कर शराब पीता और मछली के पकौड़ों का मज़ा लेता।
    गुरमीत कई दिन से दफ़तर नहीं आ रहा था। पता चला, वह घर से भी ग़ायब है। बीस दिन बाद, दफतर वाले, उसे सड़क पर घूमते हुए को पकड़ कर ले आये।
    उसके कपड़े फटे और बेहद गंदे थे। नहाना तो क्या, उसने शायद कर्इ दिन से मुंह भी नहीं धोया था। आंखों में कीच भरी थी। दाढ़ी उलझी हुई। मुंह से गंदा-सा पानी बाहर को आ रहा था। उसके शरीर से बदबू आ रही थी। हाथ में छुटटी का आवेदन लिये, वह मेरे सामने सहमा-सा खड़ा था।
    "बैठिये संत जी।" मैंने कहा।
    वह बैठ गया।
    "छुटटी की अर्जी बाद में देखेंगे। पहले यह बताइये, बीस दिन तक कहां ऐश उड़ाते रहे?"
    वह रोने लग पड़ा। थोड़ा शांत हुआ, तो बोला, "कौन सी ऐश साहब, बीस दिन से धक्के खाता फिर रहा हूं। किसी की सब्ज़ी की दुकान पर, आलुओं के ढेर पर सोता रहा हूं। कमर बुरी तरह दर्द कर रही है।"
    "मगर घर से भागे क्यों?"
    "भागा कहां, धक्के मार कर निकाला गया। वरना अपना घर छोड़कर जाने को किसका मन होता है!"
   "जब घर पर कुछ दोगे नहीं, तो धक्के ही मिलेंगे। वह बेचारी प्राइवेट स्कूल की नौकरी करके घर चला रही है और तुम्हें शराब पीने से फर्सत नहीं। शरम आनी चाहिये!"
    वह फिर रोने लग पड़ा। चुप हुआ, तो कहने लगा, "यह बात नहीं सर! कभी किसी ने यह नहीं सोचा, गुरमीत शराब क्यों पीता है।"
    "क्यों पीता है?" मैंने जानना चाहा।
    "मैं आप को अब क्या बताऊं!... मेरा जब से एक्सीडेंट हुआ है, मैं तब से... वह दरअसल अपने स्कूल के एक टीचर के साथ ... बच्चे स्कूल जाते हैं और वह घर में जमा रहता है...।"
    "तुमने मना नहीं किया?"
    "वह तो उसे ही भला मानती है। दोनों ने मिलकर ही तो मुझे घर से बाहर निकाला था।"
    मगर मिसेज गुरमीत ने किसी को बताया कि उसका पति एक नम्बर का झूठा है। वह अपनी मर्जी़ से घर छोड़ कर गया है। यह घर तो उसी का है। जब चाहे, लौट कर आ सकता है।
    कुछ दिन के बाद मिसेस गुरमीत ने महाप्रबंधक के पास अपील कर दी, कि उसका पति घर में बाल बच्चों की परवरिश के लिये, एक पैसा भी नहीं देता, लिहाज़ा घर में गुज़र के लिये, वेतन की राशि, बेदी के बजाय, स्वयं उसे देने की व्यवस्था कर दी जाये।
    महाप्रबंधक ने मुझे अपने दफ़तर में बुलाकर कहा, "आपके स्टाफ़ का कोर्इ गै़र जि़म्मेदार आदमी है, जिस की बीवी ने अपील की है। आप इस केस को जल्दी निबटाइये।"
    मैंने श्रमकल्याण अधिकारी और कैशप्रभारी से मिलकर, व्यवस्था करा दी, जिससे गुरमीत का वेतन हर मास, उसकी पत्नी को फैक्टरी गेट पर दिया जा सके।
    गुरमीत रोनी सूरत लिये मेरे पास आकर बोला, "सर, यह आपने क्या कर डाला! अब मेरा क्या होगा?"
    मैंने उसे सांत्वना दी, "मेरी बात हो चुकी है। तुम्हें घर से दोनों वक़्त का खाना और नाश्ता मिलेगा। धुले कपड़े और बस का किराया भी मिलेगा। और क्या चाहिये?"
"साहब मेरे पीने का क्या होगा?"
    मन हुआ, जूता निकाल कर, इसके सिर पर दे मारूं! मगर उस मरदद की शक्ल ही कुछ ऐसी थी, कि पहले देखते ही मुंह पर दो थप्पड़ मारने की इच्छा होती थी। मगर उसके चेहरे पर पसरी बेबसी देख, फिर उसके लिये कुछ करने का कर्तव्य बोध होने लगता था।
    मैंने बार बार कोशिश की, कि गुरमीत नाम की इस बीमारी को अपने दफ़तर से भगा दूं। मगर कोर्इ सुनने को तैयार ही न था। उपमहाप्रबंधक हंसकर कहते, "यह हीरा तो आपने अपनी मर्जी से ही चुनकर लिया है। इसे अपने पास ही रखिये। कोई और इसे लेने को तैयार भी नहीं । वैसे मुझे आपसे पूरी हमदर्दी है!"
    मिसेस गुरमीत हर महीने मेनगेट पर आकर, गुरमीत का वेतन ले जाती। मेरी सिफ़ारिश पर गुरमीत को तफ़रीह के लिये भी थोड़ा-बहुत मिल जाता। सभी कुछ सामान्य हो चला। किंतु गुरमीत से जो क़र्ज वसूल करने वाले थे, वे तो परेशान हो चले थे। एक दो बिफरे हुए से आकर मुझे भी कह गये थे... शर्मा साहब, आपने हमें मुशिकल में डाल दिया है...।
    गुरमीत के वेतन का एक भाग, हम उसके बैंक के खाते में डालते जा रहे थे। पास बुक हम लोगों ने अपने पास सम्भाल ली थी और बैंक वालों से कह रखा था, कि गुरमीत को बिना पास बुक, रूपया न निकालने दें। दरअसल हम दफ़तर वाले यह चाहते थे, कि यह रूपया इकटठा करके गुरमीत की बेटी के विवाह पर दे देंगे।
    किंतु एक दिन सभी यह जान कर चकित रह गये, कि गुरमीत के एकाउंट में कुछ भी नहीं है। पता भी न चला, वह कब से, बैंक के किसी कर्मचारी को पटा या पिला कर अपना कार्य सम्पन्न करने लग पड़ा था।
    गुरमीत की फिर पिटार्इ हो गई। इस बार अच्छी खासी धुनाई हुई थी। पूरा मुंह सूजा पड़ा था। ठीक से चला भी नहीं जा रहा था। कपड़े फटे पडे़ थे। बराबर रोये चला जा रहा था। दफ़तर वालों ने आपस में मिलकर रूपये इकटठे किये और संडे मार्किट से उसके लिये कपड़े ख़रीद कर लाये। मैंने स्वयं अपने घर में वे कपड़े धो, सुखा और प्रेस करके उसे पहनने को दिये।
    मैं बार बार संजीव की जान को रो रहा था।
मिसेस गुरमीत को नियमित रूपये मिल रहे थे। गुरमीत का अपना काम चल ही रहा था। किंतु क़र्ज़ वसूल करने वाले तो बराबर तिलमिला रहे थे। वे क्या करें, मार पिटार्इ से उनके हाथ में कुछ भी नहीं पड़ रहा था। उन्हीं में से एक ने जाकर मिसेस गुरमीत को कह डाला, "गुरमीत  के दफ़तर वाले, आपके स्कूल के किसी टीचर के साथ, आपके सम्बन्धों की चर्चा करते रहते हैं। वहां का इंचार्ज मदन शर्मा नाम का आदमी, इस बारे में कोर्इ कहानी लिख कर अख़बार में देने वाला है।"
    मिसेस गुरमीत ने तुरंत लिख कर, महाप्रबंधक के पास शिकायत भेज दी, कि दरअसल गुरमीत के दफ़तर वाले ही उसे तबाह और बर्बाद कर रहे थे। इसलिये उसकी किसी अन्य अनुभाग में बदली कर दी जाये।
    गुरमीत  भागता हुआ मेरे पास आया और बोला, "सर, मेरा यहां से ट्रांसफर हो रहा है। मैं साफ़ कहे देता हूं, मैं यहां से कहीं नहीं जाउंगा। आप किसी तरह मुझे यहीं रूकवा लें।"
मैंने कहा, "मैं भला कैसे रूकवा सकता हूं! जी. एम. का आर्डर है। तुम्हें यहां से जाना होगा।"
"नहीं सर, मैं यहीं रहूंगा। ऐसे लोग मुझे कहां मिल सकेंगे, जो मेरा इतना ध्यान रखें। आप जैसे इंचार्ज को मैं कभी छोड़कर नहीं जा सकता, भले ही मुझे अपने बाल बच्चों को छोड़ना पड़ जाये।"
"मगर अब तो बहुत देर हो चुकी है।"
"कोई देर नहीं हुई जी, मैं अभी जनरल मैनेजर के पास जा रहा हूं। मैं उन्हं बता देता हूं। मैं उन्हें बता देता हूं, किस किसने हमारे खि़लाफ़ साजि़श की है।"
संजीव ने एक बात तो ठीक ही कही थी... गुरमीत जैसा आदमी खोजने पर भी नहीं मिलेगा!

4 comments:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

63वें गणतन्त्रदिवस की शुभकामनाएँ!

कविता रावत said...

vastavik dharatal par likhi yatharthparak kahani padhne ke baad apne aas-paas ke paatra jiwant ho uthte hain..
bahut badiya sarthak prastuti..

vidha said...

har office me koi na koi gurmeert hota hai.

अनूप शुक्ल said...

अपने यहां हर फ़ैक्ट्री में कोई न कोई गुरमीत मिल जायेगा। अच्छी सच्ची सी कहानी।