Sunday, September 9, 2012

बाबा नागार्जुन , हरिजन गाथा और दलित विमर्श

- महेश चंद्र पुनेठा                                                                               

    नागार्जुन जीवन से सीधे मुठभेड़ करने वाले विरले कवियों में से एक हैं । उनकी कोशिश हमेशा कवि या साहित्यकार बनना  नहीं बल्कि एक आदमी बनना रही। उनकी प्रतिबद्धता  शोषित-दलित -पीड़ित के प्रति रही । शोषित-उपेक्षित के दु:ख-दर्द, हर्ष-उल्लास तथा आशा-आकांक्षाएं हमेशा उनके लेखन के केंद्र में रहे। जहॉ भी शोषण-अत्याचार-उत्पीड़न देखते वहॉ नागार्जुन पहुंच जाते । अपने समकालीन यथार्थ से वे कभी ऑख मूंद कर नहीं रहे । इसलिए उनकी कविता पर तात्कालिकता का आरोप भी लगता रहा। लेकिन कोई परवाह नहीं ,क्योंकि वे तो कविता को प्रतिरोध के एक हथियार की तरह इस्तेमाल करते थे । इसी के चलते उन्हें अनेक बार जेल की यात्रा भी करनी पड़ी । प्रेमचंद की " साहित्य राजनीति के आगे चलने वाली मशाल है " वाली बात नगार्जुन के साहित्य को लेकर बहुत हद तक सही सिद्ध होती है। उनकी कविता अपने समकालीन राजनीति पर जरूरी हस्तक्षेप करने के साथ-साथ आगे की दिशा भी दिखाती है। उन्होंने समाज को जाति और वर्ग दोनों ही दृष्टियों से देखा। दलितों को लेकर भी उनकी दृष्टि एकदम साफ थी दलितों पर लिखा गया उनका साहित्य केवल सहानुभूति का साहित्य नहीं कहा जा सकता है, गहरी संवेदना ,समझ और आक्रोश उनके यहॉ दिखाई देता है। वे केवल स्थितियों का चित्रण नहीं बल्कि उन्हें बदलने की बात भी करते हैं।एक ऐसे समय जब दलित विमर्च्च की कोई अनुगूंज हिंदी साहित्य में नहीं थी उन्होंने "बलचनमा" जैसा उपन्यास तथा " हरिजन गाथा" जैसी कविता रची।
   " हरिजन गाथा" जनसंहार की पृष्ठभूमि पर लिखी गई कविता है। सन् 1977 ई0 में 27 मई को पटना जिले के बेलछी गॉव में कुर्मी भूस्वामियों ने 13 दलितों  को आग में झोंककर जिंदा जला दिया। इस हृदयविदारक और नृ्शंस घटना की भयावहता को कवि कुछ इस तरह व्यक्त करता है-ऐसा तो कभी नहीं हुआ था कि /एक नहीं ,दो नहीं, तीन नहीं-/तेरह के तेरह अभागे-/अकिंचन मनुपुत्र /जिंदा झोंक दिए गए हों/प्रचंड अग्नि की विकराल लपटों में /साधन-संपन्न ऊॅची जातियों वाले/सौ-सौ मनुपुत्रों द्वारा! दुखद यह है कि यह घटना पुलिस प्रशासन के नाक के नीचे घटती है । घटना की सूचना उनके पास पहुंच जाती है लेकिन फिर भी उसको रोकने के कोई प्रयास नहीं किए जाते। सचमुच कितनी बिडंबना है - महज दस मील दूर पड़ता हो थाना / और दरोगा जी तक बार-बार /खबरें पहुंचा दी गई हों संभावित दुर्घटनाओं की । बावजूद इसके पुलिस प्रशासन घटना स्थल पर नहीं पहुंचा । इससे  पता चलता है कि देश का शासन-प्रशासन किस वर्ग और जाति के हितों के लिए काम करता आ रहा है। दलित उत्पीड़न के इतिहास में यह एक मात्र घटना नहीं थी जिसमें सूचना होने के बावजूद भी पुलिस प्रशासन समय पर घटना स्थल पर समय पर नहीं पहुंची , इससे पहले भी ऐसा देखा गया है और उसके बाद भी। पिछले दिनों मिर्चपुर में हुई घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ। यह कहना गलत नहीं होगा कि यह तो हमारे व्यवस्था की सामंती पुलिस का चरित्र ही है। भले ही शासन व्यवस्था कहने के लिए लोकतांत्रिक हो गई हो पर उसको संचालित करने वालों की मानसिकता अभी तक भी लोकतांत्रिक नहीं हो पाई है। यदि लोकतांत्रिक हो गई होती तो  साधन-संपन्न ऊॅची जातियॉ इस तरह के सुपर मौज में नहीं दिखती - खोदा गया हो गड्ढा हॅस-हॅसकर/और ऊॅची जातियोंवाली वो समूची आबादी/आ गई हो होली वाले "सुपर मौज" के मूड में / और ,इस तरह जिंदा झोंक दिए गए हों/ तेरह के तेरह अभागे मनुपुत्र/ सौ-सौ भाग्यवान मनुपुत्रों द्वारा । कैसी हृदयहीनता है यह ! अपने को श्रेष्ठ घोषित करने वाली जाति की संवेदनशीलता देखिए ! किसी की मौत का सामान जुटाया जा रहा है वह भी "हॅस-हॅसकर"।  कविता में प्रयुक्त "सुपर मौज" शब्द इस हृदयहीनता की पराका्ष्ठा को बताता है। शब्दों का ऐसा सटीक चयन एक बड़ा कवि ही कर सकता है, ऐसा कवि जो हृदय से उत्पीड़ितों के साथ हो।
  कवि नागार्जुन इस कविता में आगे एक दलित-सर्वहारा बच्चे के माध्यम से उनके भवि्ष्य की अनि्श्चितता तथा दलितों के अभावग्रस्त जीवन-स्थितियों  को बारीकी से उजागर करते हैं  -क्या करेगा भला आगे चलकर? ।।।।कौन सी माटी गोड़ेगा ?/ कौन सा ढेला फोड़ेगा ?/ मग्गह का यह बदनाम इलाका /जाने कैसा सलूक करेगा इस बालक से/पैदा हुआ है बेचारा-/ भूमिहीन बंधुआ मजदूरों के घर में/ जीवन गुजारेगा हैवान की तरह/ भटकेगा जहॉ-तहॉ बनमानुस-जैसा / अधलपेटा रहेगा अधनंगा डोलेगा। यह स्थिति केवल भोजपुर के मग्गह इलाके की नहीं है बल्कि दे्श के किसी भी इलाके में देख लें दलित-भूमिहीन-बंधुआ मजदूरों की यही स्थिति है। यही शोषण-उत्पीड़न और यातना है। यही अनिश्चितता है कि कल क्या खाएगा-क्या लगाएगा-क्या रोजगार करेगा ? यही अनिश्चितता है जो उन्हें भाग्यवादिता की ओर धकेलती है-रामजी के आसरे जी गया अगर ।।।।।रामजी ही करेंगे इसकी खैर । पर यह महत्वपूर्ण है कि इतने भगवान भरोसे रहने वाले लोगों के भीतर प्रतिरोध की प्रेरणा भरती है यह कविता। उनके माथे के अंदर हथियारों के नाम और आकार-प्रकार नाचने लगते हैं। उनको सब कुछ नया-नया लगने लगता है। यह इस कविता की ताकत कही जाएगी । एक बड़ी कविता यह काम करती भी है।  इस कविता के संदर्भ में मैनेजर पाण्डेय की टिप्पणी बहुत सारगर्भित है, ""इस कविता में भारतीय समाज-व्यवस्था के वर्तमान रूप का यथार्थ चित्र और उसके भावी विकास का संकेत है । भारत के गॉवों में सामंतों द्वारा खेतिहर मजदूरों -हरिजनों के क्रूरतम द्राोद्गाण और बर्बर दमन का जैसा प्रभावच्चाली चित्रण हरिजन गाथा में है ,वैसा इस बीच की किसी दूसरी कविता में नहीं है। नागार्जुन इस भयानक यथार्थ का त्रासद चित्रण करके चुप नहीं हो गए हैं । उन्होंने इस यथार्थ के परिवर्तन का संकेत भी दिया है । कविता में एक बच्चे के माध्यम से इतिहास प्रक्रिया व्यक्त हुई है।वह बच्चा इतिहास का बेटा है और भावी इतिहास का निर्माता है।""
   यह बात बिल्कुल सही है। इस कविता में समाज में दलितों की यातनामय स्थितियों का चित्रण मात्र नहीं है  बल्कि उससे मुक्ति का मार्ग भी यह कविता बताती है। इस दृष्टि से दलित विमर्श की अन्य कविताओं से हटकर है यह कविता। कवि जब अपने पात्रों से पुछवाता है- तोतला होगा कि साफ-साफ बोलेगा/जाने क्या होगा/बहादुर होगा कि बेमौत मरेगा। इन पंक्तियों में कवि उस ओर संकेत कर देता है कि मुक्ति चाहिए तो प्रतिरोध करना होगा तोतला बोलकर काम नहीं चलेगा अन्यथा बेमौत मारा जाएगा । उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है।  मुक्ति का एकमात्र रास्ता संघर्ष ही है किसी की सहानुभूति या कृपा नहीं।कोई अवतार मुक्ति नहीं दिला सकता है बल्कि सामूहिक और संगठित संघर्ष से ही मुक्ति संभव है।नागार्जुन मानते हैं - जुलुम मिटाएंगे धरती से /इसके साथी और संघाती /यह उन सबका लीडर होगा। लीडर भी कैसा होगा ? इस पर कवि बिल्कुल स्पद्गट है, जो लीडर होगा वह -सबके दु:ख में दु:खी रहेगा/सबके सुख में सुख मानेगा / समझ-बूझकर ही समता का / असली मुद्दा पहचानेगा। वह कर्म वचन का पा होगा । वह अपने स्वार्थपूर्ति के लिए लीडर नहीं बनेगा। वह वोट की राजनीति करने वाला नेता नहीं होगा। शोषण समाप्त करने के इसके अपने तरीके होंगे। किन्ही बने बनाए नियमों -सिद्धांतों से नहीं बॅधा होगा- इस कलुए की तदबीरों से /शोषण की बुनियाद हिलेगी । इस कविता से यह बात भी निकलकर आती है कि दलितों का उद्धार कोई बाहर से आया नेता नहीं करेगा बल्कि उन्हीं के बीच से नेतृत्व उभर कर आएगा-श्याम सलोना यह अछूत शिशु /हम सब का उद्धार करेगा। एक बात और यह अकेला नहीं होगा-  दलित माओं के /सब बच्चे अब बागी होंगे/अग्निपुत्र होंगे वे ,अंतिम /विप्लव में सहभागी होंगे।।।।।।।। होंगे इसके सौ-सहयोद्धा/लाख-लाख जन अनुचर होंगे।।।।। इस जैसे और भी होंगे- अभी जो भी शिशु / इस बस्ती में पैदा होंगे/सब के सब सूरमा बनेंगे/सब के सब ही द्रौदा होंगे।।।।।  इस रास्ते पर ही चलकर मुक्ति संभव है। यह मुक्ति संघर्ष वर्गीय और जातीय दोनों तरह का  होगा। इस संघर्ष में शत्रु केवल उच्च जाति का ही नहीं बल्कि उच्च वर्ग का भी है। यहॉ सवाल केवल सामाजिक नहीं आर्थिक भी है।ये दोनों लड़ाइयॉ साथ-साथ लड़नी होंगी। केवल जाति मुक्ति से शोषण से मुक्ति नहीं होगी । नागार्जुन साफ-साफ बताते हैं कि लड़ाई किस-किस के बीच होगी-बड़े-बड़े इन भूमिधरों को /यदि इसका कुछ पता चल गया /दीन-हीन छोटे लोगों को /समझो फिर दुर्भाग्य छल गया ।  इस लड़ाई में "जनबल धनबल सभी जुटेगा"। इसके लिए एक दल का होना उन्हें जरूरी लगता है- इसकी अपनी पार्टी होगी/इसका अपना ही दल होगा। " बलचनमा" उपन्यास के इस अंच्च के साथ इन पंक्तियों को पढ़ते हुए नागार्जुन की बात बिल्कुल स्पष्ट हो जाती है- बाहरी लीडरों के भरोसे मत रहिए अपना नेता आप खुद बनिए । ।।।।।लीडर लोग तो आपकी कमाई का हलवा खाकर लेक्चर देने आते हैं और अपने दिमाग व पेट की बदहजमी मिटाते हैं ।।।।आप लोग सब कुछ पैदा करते हैं तो अपना लीडर भी अपने यहॉ पैदा कीजिए । जो आपका आदमी होगा वही आपकी तकलीफों को समझेगा ।।।आप अकेले नहीं हैं करोड़ों की तादाद है आपकी । आप जब उठ खड़े होंगे और एक कंठ हुंकार करेंगे तो जालिम जमींदारों का कलेजा दहकने लगेगा।वे हैं ही कितने दाल मंे नमक के बराबर । अपने बल पर नहीं सरकारी अफसरों के बल पर ही जुल्म करते हैं।
  आगे वे कहते हैं- हिंसा और अहिंसा दोनों /बहनें इसको प्यार करेंगी/ इसके आगे आपस में वे /कभी नहीं तकरार करेंगी। यहॉ नागार्जुन इस बात को बहस का विषय नहीं मानते कि संघर्ष हिंसक होगा कि अहिंसक बल्कि वे मानते हैं आंदोलन की आवश्यकता इसका निर्धारण करेगी। वक्त की जरूरत के अनुसार जनता अपना रास्ता स्वयं चुन लेती है।  इस तरह दलित मुक्ति का यह एकदम अलग तरीका है। यही सही तरीका भी है। इसी से दलित मुक्ति सच्चे अर्थों में संभव है। यही होगी संपूर्ण क्रांति । यहॉ यह सम्पूर्ण क्रान्ति ,जयप्रकाच्च नारायण वाली संपूर्ण क्रांति नहीं है।उससे नागार्जुन का मोहभंग हो गया था । अपने एक साक्षात्कार में वे कहते हैं ,"" जयप्रकाच्च नारायण के नेतृत्व में चलने वाले आंदोलन के वर्ग-चरित्र को मैं अंध कांग्रेस विरोध के प्रभाव में रहने के कारण नहीं समझ पाया।"संपूर्ण क्रांति" की असलियत मैंने जेल में समझी । सीवान,छपरा और बक्सर की जेलों में "संपूर्ण क्रांति" के जो कार्यकर्त्ता थे,उनमें अस्सी प्रतिश्त जनसंघी और विद्यार्थी परि्षद वाले थे।सो्शलिस्ट पार्टी के कार्यकर्त्ता दाल में नमक के बराबर थे और भालोद के कार्यकर्त्ता दाल में तैरते हुए जीरे के बराबर ! औद्योगिक और खेत-मजदूर न के बराबर थे। हरिजन भी इक्के-दुक्के ही थे। यह सब देखकर मैं समझ गया कि यह आंदोलन किन लोगों का था ।""  इसके बाद से  उसे वे  झूठी  क्रांति कहने लगे थे क्योकि वे मानते थे कि संपूर्ण क्राति के लिए समाज के सभी दमित-शोषित वर्गों और जातियों का प्रतिनिधित्व होना जरूरी है। यह बात उन्हें जयप्रकाच्च नारायण की संपूर्ण क्रांति में नहीं दिखाई दी। संपूर्ण क्राति के लिए नागार्जुन वर्गीय एकता और जातीय एकता जरूरी मानते हैं इस कविता में पहले वे कहते हैं - खान-खोदने वाले सौ-सौ /मजदूरों के बीच पलेगा/युग की ऑचों में फौलादी /सॉचे सा वह वहीं ढलेगा। दूसरी जगह वे लिखते है- झरिया ,फरिया ,बोकारो /कहॉ रखोगे छोकरे को ? वहीं न ? जहॉ अपनी बिरादरी के /कुली-मजूर होंगे सौ-पचास ? जातीय एकता से ही वर्गीय एकता का विस्तार संभव है ,उक्त पंक्तियों से यही ध्वनि निकलती है।
  नव शिशुका सिर सूंघ रहा था /विह्वल होकर बार-बार वो। इन पंक्तियों में आने वाले नए समाज के संकेत दिए गए हैं जिसके बारे में सोच-सोचकर गुरू महाराज खुश हुए जा रहे हैं। वे आने वाले समाज की कल्पना करते हैं कि उस समाज में सारी धरती पर दलित-मजदूरों का राज होगा ।  इस समाज के नए नियम-कानून होंगे जिससे -च्चोद्गाण की बुनियाद हिलेगी ।  इसमें दलितों को न केवल राजनीतिक वर्चस्व  बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का नायक भी बताया गया है- दिल ने कहा -अरे यह बालक /निम्न वर्ग का नायक होगा/नई ऋचाओं का निर्माता/नये वेद का गायक होगा।  ये पंक्तियॉ उस जरूरत की ओर भी संकेत करती हैं कि दलित मुक्ति के लिए कहीं न कहीं सांस्कृतिक परिवर्तन की भी आवश्यकता होगी। वर्णव्यवस्था का अंत करना होगा , तभी भारतीय समाज में ढॉचागत परिवर्तन आएगा। एक ऐसे ढॉचे का निर्माण होगा जिसमें प्रत्येक मनुष्य को मनु्ष्य समझा जाएगा हैवान नहीं । यह किसी से छुपा नहीं है कि दलितों को वेद पढ़ने का अधिकार नहीं था। इसलिए भरतमुनि ने इस वर्ग के लिए पॉचवे वेद की बात की । उक्त पंक्तियों को लिखते हुए नागार्जुन के मन में यह बात रही होगी। यहॉ कवि एक ऐसे नए वेद की रचना की बात करता है जो वर्णव्यवस्था जैसी अमानवीय एवं अवैज्ञानिक व्यवस्था को नकारता हो ,उसके स्थान पर समतावादी तथा भेदभाव रहित समाज की सृष्टि करता हो और मानव मात्र को एक इकाई मानता हो। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के समय से ही दलित-मुक्ति को लेकर  दो धाराएं सक्रिय रही हैं  पहली धारा खुद को वर्ग-संघर्ष और वर्ग ईर्ष्यासे अलग रखती है। उनका उद्देश्य अपने समाज को सुधारना और पुनर्गठित करना रहा। वे सवर्ण हिंदुओं से दलितों का केवल सामाजिक-आर्थिक मतभेद मानते थे सांस्कृतिक नहीं। दूसरी धारा इसके विपरीत थी । नागार्जुन इस दूसरी धारा का प्रतिनिधित्व करते हैं।वे मानते हैं कि सवर्णों की बहुजन समाज के प्रति कभी भी नियत साफ नहीं रही वे संस्कृति और कला में अपना वर्चस्व कभी नही छोड़ना चाहते । इसलिए नए वेद और नई ऋचाओं की सृ्ष्टि जरूरी है। यही मनता नागार्जंुन की प्रस्तुत कविता में व्यक्त हुई है।
    इस कविता में कथा सी रोचकता तथा भरपूर नाटकीयता है। मिथकों का कवि ने बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है। गर्भावस्था में प्रभाव ग्र्रहण करने वाली अभिमन्यु की कथा , वारह अवतार द्वारा पृथ्वी के उद्धार की कथा तथा वासुदेव द्वारा कृद्गण को कंस के हाथों बचाने के लिए मथुरा ले जाने की कथा संबंधी मिथकों का प्रयोग करते हुए कविता के फलक को विस्तृत कर दिया गया है। एक दलित बालक को कृष्ण,अभिमन्यु तथा वाराह से जोड़कर कवि ने दलितों के प्रति अपने सम्मान को व्यक्त किया है। उनके प्रति रागात्मकता रखने वाला कवि ही ऐसा कर सकता है। उनकी रागात्मकता ही कही जाएगी कि वे सॉवले रंग के शिशु मुख की छटा को सलोनी और निराली देखते हैं।
  इसमें कोई दो राय नहीं कि "हरिजन गाथा" जातिवादी और सामंती बर्बरता के विरुद्ध उस कवि की उत्कट आकांक्षा का बखान है जो सदियों से शोषित-पीड़ित-वंचित जन को गौरवपूर्ण सुखी मानवीय जीवन जीते हुए देखने के लिए निरंतर बेचैन रहा है।(नंद किशोर नवल) पर कविता की एक पंक्ति  "ऐसा तो कभी नहीं हुआ था।।।।" बार-बार हंट करती है  । यह पंक्ति घटना की भयावहता ,विकरालता और बेचैनी की तीव्रता को व्यक्त करने में तो सहायक है ,मगर  नागार्जुन के इतिहासबोध पर प्रश्न चिह्न भी लगाती है। इस पंक्ति से लगता है कि ना्गार्जुन दलितों की यातना-उत्पीड़न -बर्बबरता के पूरे इतिहास की ओर ऑखें बंद कर लेते  हैं। जबकि सत्यता तो यह है कि सवर्ण जातियॉ सदियों से दलितों का उत्पीड़न करते आ रहे हैं। बहुत पीछे भी न जाकर बिहार की ही बात करें तो सन् 1971ई के आसपास पूर्णिया में एक साथ 14 आदिवासियों को जिंदा आग में झोंक दिया गया। रूपसमुर-चंदवा कांड के नाम से उसे आज भी लोग जानते हैं। हम इतिहास की बात भले न करें हमें काव्य परम्परा के रूप में भी यह दिखाई देता है जब निराला लिखते हैं- श्रुति निगमागम शब्द शूद्र के सीसा कानों में भरते /मंत्रोचार किया तो उसका सर उतार सब दुख हरते । तब यह समझ में नहीं आता है कि नागार्जुन ऐसा क्यों कहते हैं -"ऐसा तो कभी नहीं हुआ था।।।।" या फिर  प्रबल वर्ग ने निम्न वर्ग पर /पहले नहीं किया था ऐसा ।
    नागार्जुन के पूरे जीवन-वृत्त को जानते हुए उनकी नीयत पर बिल्कुल द्राक नहीं किया जा सकता है ,नि:संदेह वे दलितों के प्रखर पक्षधर  तथा ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कटु आलोचक रहे लेकिन न जाने क्यों वे ब्राह्मणवादी प्रतीकों के प्रयोग से मुक्त नहीं हो पाए ? नागार्जुन ऐसे प्रतीकों को कविता में इस्तेमाल करते हैं जो द्विज संस्कृति की पहचान है। यह कविता दलितों पर हो रहे अत्याचार-उत्पीड़न का विरोध तो करती है पर ब्राह्मणवादी तदवीरों से परहेज नहीं करती ।   गुरूजी से हाथ दिखवाने वाला प्रकरण रोचक तो है पर हस्तरेखा देख कर भाग्य बताने का तरीका बहुत पुराना है जिसने लोगों में अंधविश्वास को बढ़ाया है। यह शोषण का भी तरीका रहा है। भाग्यफल द्विज संस्कृति का हिस्सा है। यह पूर्वजन्म से भी चीजों को जोड़ता है।यह वह औजार रहा है जिसके माध्यम से ब्राह्मणों ने दलितों को बहुत पहले से ठगा तथा यथास्थिति को कायम रखा । प्रस्तुत कविता में इस प्रतीक का जिस तरह से उपयोग किया गया है वह  कहीं न कहीं एक अंधविश्वास को मान्यता देना है। यह भूलना नहीं चाहिए कि यदि ब्राह्मणवादी व्यवस्था से लड़ना है तो उसके प्रतीकों ,कर्मकांडों , नियम-कानूनों को नकारे  बिना यह लड़ाई आगे नहीं बढ़ सकती है। जबकि नागार्जुन स्वयं यह बात मानते हैं कि निम्न वर्ग का नायक ,नई ऋचाओं का निर्माता तथा नए वेद का गायक होगा अर्थात पुराने वेदों को नहीं मानेगा । उन्हें अस्वीकार करेगा । यह कुछ उसी तरह से है जैसे निम्न जाति के लोग जातिवादी व्यवस्था की आलोचना और विरोध तो करते हैं पर  ब्राह्मणवादी व्यवस्था के उन कर्मकांडों को अपनाते हैं जो इस जातिवादी व्यवस्था के मूल में हैं । यहॉ तक कि वे जातीय पदसोपान क्रम से भी मुक्त नहीं हो पाते हैं। अपने से छोटी कही जाने वाले जातियों के साथ वे वही व्यवहार करते हैं जो उनसे उच्च जातियॉ उनके साथ । आज बहुत सारे दलित आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद ब्राह्मणवादी मानसिकता से मुक्त नहीं हो पाए हैं। कहना होगा कि वे ब्राह्मण बनने की चाह में इसकी और अधिक गिरफ्त में आ गए हैं। वे उन सारे कर्मकांडों को अपनाने लगे हैं जो द्विज संस्कृति के परिचायक हैं।इनको यह भ्रम है कि ऐसा करने से वे सवर्णों की जमात में शामिल हो जाएंगे। वे भूल जाते हैं कि  जाति का आधार कर्म नहीं जन्म को माना गया है जिससे मुक्ति जाति विहीन समाज के बनने से ही मिल सकती है। मेरी समझ से सच्चे अर्थों में दलित मुक्ति तभी संभव है जब दलितों की लड़ाई सवर्णो से नहीं बल्कि सवर्णवादी मानसिकता से हो।क्या भविष्य के संकेत देने के लिए नागार्जुन किसी और प्रतीक का प्रयोग नहीं कर सकते थे? जैसा कि इसी कविता में आगे " दिल ने कहा " पंक्ति के द्वारा किया भी गया है। यह प्र्श्न बार-बार कचोटता है।
   कविता का शिल्प बहुत मजबूत है। कविता मुक्त छंद में होते हुए भी लयविहीन नहीं है। एक सतत प्रवाह कविता में है। मनुपुत्रों शब्द का भी कवि ने बहुत सुंदर प्रयोग किया है दो जगह यहशब्द आया है और दोनों स्थानों पर अलग-अलग अर्थों को व्यंजित करता है जहॉ पहले मनुपुत्रों का आशय मनु्ष्य के पुत्रों से है तो दूसरे का मनुवादी सोच के सवर्णों से । पहले अभागे हैं तो दूसरे सौभाग्य्शाली । यहॉ व्यंग्य भी है। कविता की भा्षा सहज संप्रेद्गाणीय है।कविता में चाक्षुष बिंब बहुत सुंदर हैं। पूरे-पूरे चित्र ऑखों के सामने उतर आते हैं,उदाहरण के लिए संत गरीबदास का यह बिंब- बकरी वाली गंगा-जमनी दाड़ी थी /लटक रहा था गले से / अंगूठानुमा जरा -सा टुकड़ा तुलसी काठ का /कद था नाटा ,सूरत थी सॉवली /कपार पर ,बाई तरफ घोडे के खुर का/निशान था /चेहरा था गोल-मटोल ,ऑखें थी घुशी /बदन कठमस्त था ।।।।।
  यहॉ एक बात और कहना चाहुंगा- दलित साहित्यकार, दलित साहित्य का उद्देश्य दलित्व की मुक्ति ,शूद्रत्व से मुक्ति ,ऊॅच-नीच के पदानुक्रम से मुक्ति ,शोषण से मुक्ति और समतावादी समाज की सृ्ष्टि और स्थापना मानते हैं। हम पाते हैं कि "हरिजन गाथा" कविता इन सभी उद्देश्यों से युक्त  है। कुछ सीमाओं को छोड़ दे तो यह इस बात का खंडन करती है कि दलित साहित्य केवल दलित ही लिख सकता है या दलित साहित्य दलितों का दलितों के बारे में लिखा साहित्य है। वैसे भी  ऐसा कहना उन सभी रचनाकारों को दलित मुक्ति आंदोलन से दूर कर देता है जो खुद को डिकास्ट करके इस आंदोलन में शामिल होना चाहते हैं। यह आंदोलन की मजबूती की दृष्टि से सही समझ नहीं कही जा सकती है। यह कविता दलितों के प्रति सवर्णों के व्यवहार पर चोट करने या प्रश्न उठाने तक सीमित नहीं है बल्कि उसको बदलने की दि्शा भी बताती है। जबकि इससे पूर्व की दलित चेतना की कविताओं में हम पाते हैं कि उनमें वर्णव्यवस्था ,अश्यपृ्श्यता या दलितों की दयनीय स्थिति पर केवल प्र्श्न खड़े किए गए हैं । ये चाहे हीरा डोम या स्वामी अछूतानंद की कविताएं रही हों या किसी और की । इस प्रकार यह कविता एक कदम आगे की कविता है। इसमें वर्गीय और जातीय संघर्ष एक साथ चलाने  की बात की गई है। एक ओर वे जहॉ मजदूरों की एक जुटता की बात करते हैं तो दूसरी ओर जाति विरादरी की । यह कविता एक बड़े समुदाय को चेतना युक्त करके अपने स्वाभिमान और अधिकारों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित करती है। भूमिहीन मजदूरों के भीतर एक ताकत पैदा करती है। एक स्वाभिमान जगाती है। नया जोश देती है। दुर्गति ,हीनता और परमुखापेक्षिता से बचाती है। नई ऊर्जा का संचार करती है। पाठक के हृदय को परदुखकातर और संवेदन्शील बनाती है। इस कविता में कवि की आकांक्षा है कि दलित उठ खड़े होंगे और अपने साथ हो रहे अत्याचार-उत्पीड़न का संगठित होकर विरोध करेंगे । अंतत: समता का मुद्दा समझते हुए एक समतावादी व शोषण विहीन समाज की स्थापना करेंगे । इसके लिए मौजूदा पीढ़ी को अपनी तैयारी करनी होंगी । बूद्धू , खदेरन ,सुखिया ,संत गरीबदास आदि को अपना-अपना योगदान देना होगा। "अंतिम विप्लव" अपने समय पर होगा लेकिन उसकी तैयारी अभी से करनी होगी। ऐसे में दलित चेतना की कविताओं में इस कविता का जिक्र न होना थोड़ा खलता है। जबकि इसमें दलित जीवन की पीड़ा सिद्दत से व्यक्त हुई है। यह दूसरी बात है कि यह भोगी हुई पीड़ा नहीं है।
  अंत में प्रसंगानुकूल एक बात और जोड़ना चाहुंगा कि इस बात पर विचार होना चाहिए कि क्या दलित साहित्य वही होगा जो दलितों द्वारा लिखा गया हो जैसा कि अनेक दलित चिंतकों द्वारा कहा जाता है। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि श्रेष्ट साहित्य के लिए केवल जीवनानुभव का होना ही पर्याप्त नहीं है साहित्य के लिए वि्श्वदृ्ष्टि का होना भी जरूरी है।जब तक हम स्थितियों का द्वंद्वात्मक तरीके से विश्लेषण नहीं करेंगे तो हम भावुकता के शिकार हो जाएंगे। कोरी भावुकता किसी रचना को कालजयी नहीं बना सकती है। हॉ यह अवश्य स्वीकार किया जा सकता है कि एक दलित साहित्यकार जिसके पास जीवनानुभव के साथ-साथ गहरी वि्श्वदृ्ष्टि भी है तो दलित जीवन के बारे में लिखा गया उसका साहित्य गैर-दलित साहित्यकार के द्वारा लिखे गए साहित्य की अपेक्षा अधिक प्रमाणिक होगा।

इस कविता पर एक अन्य टिप्पणी यहां भी पढ़ी जा सकती है ।- वि.गौ.










 

2 comments:

Ashok Kumar Pandey said...

लेख मेहनत से लिखा गया है. अंतिम पंक्तियों में दलित साहित्य को लेकर जो स्वीपिंग रिमार्क है, उस पर और गंभीरता से बात किये जाने की ज़रुरत है.

सुबोध शुक्ल said...

रेखांकित किये जाने लायक आलेख है. अकादमिक भाषागत बारीकियों में हमारे समय के खौफनाक सच जिस तरह से जायकेदार नैरेटिव में बदल कर शोभा की बहसों तक सीमित रह जाते हैं, ऐसे विश्लेषण स्वयं ही प्रतिरोध और संघर्ष का भरोसा हैं.