Monday, September 19, 2016

नदी गुमसुम क्यों हो गयी

85 वर्षीय ज़करिया तामेर सीरिया के दुनिया भर में लोकप्रिय कथाकार हैं जिनकी रचनाएं अनेक भाषाओं में अनूदित हुई हैं,अंग्रेज़ी में उनके तीन कहानी संकलन प्रकाशित हुए।वे कहानी को साहित्यिक अभिव्यक्ति का सबसे मुश्किल स्वरुप मानते हैं और मानव त्रासदी और शोषण को अपनी रचनाओं का मुख्य स्वर बनाते हैं।उनकी कुछ कहानियां तो तीस चालीस शब्दों तक सीमित हैं। मैंने ज़करिया तामेर की अनेक कहानियों के अनुवाद किये हैं। वर्तमान कहानी भले ही फ़ेबल जैसी लगती हो पर विषय वस्तु के दृष्टिकोण से भारतीय समाज में सिर उठा रही असहिष्णुता और तलवारभाँजी पर सटीक टिप्पणी करती है - हमारी पीढ़ी का दायित्व है कि नदी हताश होकर गुमसुम होने का फैसला करे इस से पहले सक्रिय संघर्ष छेड़ के आततायी को भगाने का संकल्प लें।

प्रस्‍तुति : यादवेन्‍द्र 


ज़करिया तामेर 


एक समय था जब नदी बात करती थी.... जो बच्चे उसके किनारे पानी पीने या हाथ मुँह धोने आते उनसे नदी खूब घुलमिल कर बातें करती। वह  अक्सर बच्चों को छेड़ने के लिए उनसे सवाल करती :"अच्छा बोलो ,धरती सूरज के चारों ओर घूम रही है .... या सूरज धरती के चारों ओर ?"
पेड़ों की जड़ें सींचना  और उनके पत्ते हरे भरे बनाये रखना नदी  को अच्छा लगता था... गुलाब मुरझा न जाएँ इसको ध्यान में रखना और दूर देशों तक उड़ कर जाने वाले  परिंदों की यात्रा शुरू करने से पहले प्यास बुझाना उसको बहुत भाता था। बिल्लियों के साथ वह  खूब छेड़छाड़ भी करती जब वे नदी किनारे आकर पानी उछालते हुए उधम करतीं। 
एकदिन सारा मंजर बदल गया ,पथराई शक्ल वाला एक आदमी तलवार लेकर वहाँ आ पहुँचा और अकड़ कर बैठ गया कि उसकी इजाज़त के बगैर कोई भी नदी का पानी नहीं पियेगा - चाहे बच्चे हों ,पेड़ पौधे हों ,गुलाब हो या कि बिल्लियाँ हों। उसने फ़रमान सुनाया कि अब से नदी का मालिक सिर्फ़ वह है कोई और नहीं। 
नदी तुमक कर बोली : मैं किसी की मिल्कियत नहीं हूँ। 
एक बूढ़ा पक्षी बोला : इस धरती पर कोई प्राणी ऐसा नहीं जन्मा है जो दावा करे कि नदी का पूरा पानी मैं पी जाऊँगा। 
पर तलवारधारी व्यक्ति किसी की सुनने को तैयार नहीं था - नदी या बूढ़े पक्षी की बात का उसपर कोई असर नहीं हुआ। भारी भरकम रोबीली आवाज़ में उसने हुक्म दिया : अब से नदी का पानी जो भी पीना चाहेगा उसको मुझे सोने की एक अशर्फ़ी देनी पड़ेगी। 
सभी परिन्दे मिलकर बोले : हम तुम्हें दुनिया के सबसे खूबसूरत गीत गाकर सुनायेंगे। 
आदमी बोला : मुझे दौलत चाहिये ,संगीत तुम अपने पास ही रखो...मुझे नहीं चाहिए। 
पेड़ बोले : हम अपने फलों की पहली फसल तुम्हें दे देंगे। 
आदमी अकड़ कर बोला ; जब मेरा मन करेगा फल तो मैं वैसे भी खाऊँगा ही.. देखता हूँ  मुझे कौन रोकता है।
गुलाब एक स्वर में बोले : हम अपने सबसे सुंदर फूल तुम्हें दे देंगे। 
आदमी ने जवाब दिया : कितने भी सुंदर हों पर मैं उन फूलों का करूँगा क्या ?
बिल्लियां बोलीं : हम तुम्हारे मनोरंजन के लिए तरह तरह के खेल खेलेंगे ... और रात में तुम्हारी देखभाल भी करेंगे। 
आदमी को गुस्सा आ गया : खेल कूद से मुझे सख्त नफ़रत है ... और रही मेरी हिफ़ाजत की बात तो यह तलवार ही मेरा पहरेदार है  जिसका  मैं भरोसा करता हूँ। 
अब बच्चों की बारी थी ,बोले : हम वह सब करेंगे जो तुम कहोगे। 
बच्चों की ओर हिकारत से देखते हुए आदमी बोला : तुम सब मेरे किसी काम के नहीं मरगिल्लों... तुम्हारे बदन में कोई जान नहीं है। 
उसकी बातें और धिक्कार सुनके सब के सब मुँह लटका कर एक तरफ़ खड़े हो गए ,पर वह आदमी बोलता रहा : बात एकदम पक्की है ,नदी का पानी जिसको भी पीना हो वह मुझे सोने की अशर्फ़ी दे और पानी पी ले। 
एक नन्हा पक्षी प्यास से बेहाल हो रहा था और वह सब्र नहीं कर पाया ,उसने नदी का पानी पी ही लिया। आदमी उसके पास आया , कस कर उसको मुट्ठी में मसलने लगा और फिर तलवार से टुकड़े टुकड़े काट कर ज़मीन पर फेंक दिया।
उसकी दरिंदगी देख कर गुलाबों को रुलाई आ गयी ,पेड़ रोने लगे , पक्षी भी अपना धीरज खो बैठे , बिल्लियाँ भी स्यापा करने लगीं... बच्चे भला कहाँ पीछे रहते ,वे भी जोर जोर से रोने लगे। उनमें से कोई नहीं था जिसके पास एक भी अशर्फ़ी हो ,और पानी के बगैर उनका जीवन बचना असंभव था। और तलवारधारी आदमी था कि अपनी ज़िद पर कायम था ,पानी तभी मिलेगा जब सोने की अशर्फी के तौर पर उसको उसकी कीमत मिलेगी। देखते ही देखते गुलाब मुरझा गए ,पेड़ पौधे सूख गए ,पक्षी जान बचाने की ख़ातिर जहाँ तहाँ चले गए ,हँसते खेलते बच्चे और बिल्लियां सब वहाँ से गायब हो गए। इस दुखभरी वीरानी ने नदी को इतना हतोत्साहित किया कि उस दिन से उसने अपना मुँह सी लिया - उसने फैसला किया कि अब वह बोलेगी नहीं पूरी तरह गुमसुम रहेगी।
कुछ दिन ऐसे वीराने बीते पर बच्चों बिल्लियों गुलाबों पेड़ों और पक्षियों को प्यार करने वाले लोग वहाँ लौट आये - उन्होंने तलवारधारी आदमी के साथ लड़ाई की और उसको मिलजुल कर वहाँ से मार भगाया। उन्होंने नदी का पानी पहले जैसा सबके लिए मुहैय्या करा दिया - बगैर कोई कीमत अदा किये सब उसका पानी पी सकते थे। पर सब कुछ बदल जाने के बाद भी नदी की आवाज़ नहीं लौटी। लोगों ने बहुतेरा हौसला दिया पर नदी बीच बीच में अचानक घबरा कर थरथराने लगती है - उसके मन से तलवारधारी का खौफ़ गया नहीं। ... नदी को लगता है कभी भी वह आततायी लौट आएगा। 

3 comments:

सुभाष चन्द्र कुशवाहा said...

अनुवाद उपलब्ध कराने के लिए आभार . अच्छी कहानी .

Ahead Incorporations: Just Go Ahead! said...

sweet story

Kamal Choudhary said...

Bahut achchhi kahaani. Shukriya bhai !!
-Kamal Jeet Choudhary