Tuesday, December 9, 2008

संवेदना देहरादून, मासिक गोष्ठी - दिसम्बर 2008

संवेदना की मासिक गोष्ठी की रिर्पोट आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली पवि ने, हमारे द्वारा उपलब्ध करवायी गयीसूचनाओं के आधार पर लिखी है। जिसे ज्यों का त्यों, सिर्फ टाइप करके, प्रस्तुत किया जा रहा
पवि



देहरादून की साहित्यिक संस्था संवेदना हमेशा महीने के पहले रविवार को गोष्ठी आयोजित करती है। इस बार की दिसम्बर के पहले रविवार (7) को गोष्ठी आयोजित की। इसमें सभी कथाकर उपस्थित थे। इस बार की गोष्ठी को हिन्दी भवन पुस्तकालय में रखा गया। इसमें कथाकार सुभाष पंत जी,, सुरेश उनियाल जी,, दिनेश चंद्र जोशी जी,, नवीन नैथानी जी, विद्या सिंह जी,, प्रेम साहिल जी,, शकुंतला जी, मदन शर्मा जी आदि लोग उपस्थित थे। इस गोष्ठी में सुरेश उनियाल जी एवं सुभाष पंत जी ने अपने-अपने कहानी संग्रह से एक-एक कहानी पढ़ी। सुभाष पंत जी की कहानी का नाम एक का पहाड़ा था और सुरेश उनियाल जी कहानी का नाम बिल्ली था। मदन शर्मा जी ने एक संस्मरण पढ़ा और दिनेश चंद्र जोशी जी ने कविता पढ़ी।

Monday, December 8, 2008

शहंशाही में है बालकनी नाम का ठेका

देहरादून की लेखक बिरादरी के, अपने शहर से बाहर, कुछ ही सामूहिक दोस्त हैं। कथाकर योगेन्द्र आहूजा उनमें से सबसे पहले याद किये जाने वालों में रहे हैं। बेशक योगेन्द्र कुछ ही वर्षों के लिए देहरादून आकर रहे पर सचमुच के देहरादूनिये हो गये। यह सच है कि पहल में प्रकाशित उनकी कहानी सिनेमा-सिनेमा को पढ़कर इस शहर केलिखने पढ़ने वाली बिरादरी के लोग उन्हें देहरादून में आने से पहले से ही जानने लगे थे। वे भी देहरादून को वैसे हीजानते रहे होंगे- उस वक्त भी, वरना सीधे टिप-टाप क्यों पहुंचते भला। ब्लाग में अवधेश जी की लघु कथाओं कोपढ़ने के बाद हमारे प्रिय मित्र ने अवधेश जी को याद किया है। उनका यह पत्र यहां प्रकाशित है। पत्र रोमन में था, उसे देवनागरी में हमारे द्वारा किया गया है।
अवधेश जी कविताएं कुछ समय पहले पोस्ट की गयीं थीं। पढने के लिए यहां जाएं

प्रिय विजय

बहुत समय के बाद अवधेश जी की रचनाएं देखने का अवसर मिला। इन्हें इतने समय के बाद दुबारा पढ़ कर शिद्दत से एहसास हुआ कि उनकी असमय मृत्यु हम सबके लिए कितनी बड़ी क्षति थी।

उनके साथ बिताये दिन फिर स्मृति में कौंध गये। शहंशाही में बालकनी नाम के ठेके पर उनके साथ बिताये पल विशेष रूप से याद आये। लगातार बरसात, तेज सर्दी, हवा में हल्की-सी धुंध और समकालीन कविता और कवियों के बारे में उनकी अनवरत और बेशुमार बातें।

वे दिन ना जाने कहां चले गये और अब कभी लौट कर नहीं आयेंगे।

आज इतने समय के बाद में उन दिनों को भावसिक्ता होकर याद कर रहा हूं। लेकिन क्या उन दिनों और पलों को मैंने पूरी तरह डूब कर और शिद्दत के साथ जिया था ? नहीं।

शायद यह इजराइल के कवि इमोस ओज का या पोलैण्ड की कवियत्री विस्सवा शिम्बोरस्का का कथन है कि चूंकि सब कुछ क्षणभंगुर है और एक दिन सब कुछ समाप्त हो जाने वाला है, हमें हर दिन का उत्सव मनाना चाहिए।

अवधेश जी को हिन्दी कविता में वह जगह और पहचान नहीं मिली जिसके वे हकदार थे, हालांकि विष्णु खरे जैसे विद्धान आलोचक उनकी कविताओं के प्रशंसक थे। उन्होंने जिप्सी लड़की पर एक समीक्षा भी लिखी थी जो उनकी किताब "आलोचना की पहली किताब" में संकलित है।

आभारी होऊंगा यदि उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताएं (फोटो के साथ हों तो और भी बेहतर है) भी ब्लोग पर उपलब्ध करा सकें। और हां उनके कुछ गीत भी, विशेषकर धुंए में शहर है या शहर में धुंआ

वे बहुत अच्छे पेंटर और स्क्रेचर भी थे। कृप्या उनकी कुछ पेंटिग और स्केच भी उपलब्ध करवायें। संभव हो तो नवीन कुमार नैथानी जी का उन पर लिखा संस्मरण भी।


आपका


योगेन्द्र आहूजा

दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो

यूं तो अवधेश कुमार अपनी कविताओं या अपने स्केच के लिए जाने जाते रहे। पर अवधेश कहानियां भी लिखतेथे। "उसकी भूमिका" उनकी कहानियों का संग्रह इस बात का गवाह है। उनकी कहानियों में उनकी कवि दृष्टिकितनी गद्यात्मक है इसे उनकी लघु कथाओं से जाना जा सकता है।

अवधेश कुमार

भूख की सीमा से बाहर



उन्होंने मुझे पहले तीन बातें बताईं-
एक: जब तक लोहा काम करता है उस पर जंग नहीं लगता।
दो: जब तक मछली पानी में है, उसे कोई नहीं खरीद सकता।
तीन: दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं है कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो।

यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने खाने की मेज पर छुरी के साथ एक बहुत बड़ी भुनी हुई मछली रख दी और बोले, "आओ यार अब इसे खाते हैं और थोड़ी देर के लिए भूल जाओ वे बातें जो भूख की सीमा के अन्दर नहीं आतीं।"




बच्चे की मांग

बच्चे ने अपने पिता से चार चीजें मांगीं। एक चांद। एक शेर। और एक परिकथा में हिस्सेदारी। चौथी चीज अपने पिता के जूते।

पिता ने अपने जूते उसे दे दिये। बाकी तीन चीजों के बदले उस बच्चे को कहानी की एक किताब थमा दी गई।

बच्चा सोचता रहा कि अपने पैर किसमें डाले ? जूते में या उस किताब में।



बच्चों का सपना


बच्चा दिनभर अपने माता-पिता से ऐसी-ऐसी चीजों की मांग करता रहा जो कि उसे सपने में भी नहीं मिल सकती थीं।

खैर वे उसे नहीं मिलीं।

श्रात को ज बवह सो गया तो उसकी नींद के दौरान उसका सपना उससे वो-वो चीजें छीनकर अपने पास छुपाता रहा जो-जो उसे सपने में नहीं दे सकता था।

Saturday, December 6, 2008

दिसम्बर 1992

(एक पुरानी कविता)
विजय गौड

आस्थओं का जनेऊ
कान पर लटका
चौराहे पर मूतने का वर्ष
बीत रहा है

बीत रहा है
प्रतिभूति घोटालों का वर्ष
सरकारों के गिरने
और प्रतिकों के ढहने का वर्ष

अपनी अविराम गति के साथ
बीत रहा है
सोमालिया की भीषण त्रासदी का वर्ष
हड़ताल, चक्काजाम
और गृहयुद्धों का वर्ष

अपने प्रियजनों से बिछुड़ने का वर्ष

हर बार जीतने की उम्मीद के साथ
हारने का वर्ष

Friday, December 5, 2008

साहित्य धंधा नहीं है, जनाब!

यह आम बात है कि कई बार बातचीत के दौरान वक्ता अपनी बात को रखने के लिए कुछ ऐसे मुहावरों को प्रयोगकर लेते हैं जो गैर जरूरी तरह की टिप्पणी भी हो जाती है। जो अपने मंतव्य में वक्ता के ही उदगारों के विरुद्ध हो जारही होती है। ऐसी स्थितियां क्या कई बार रचनाओं में भी नहीं दिख जा रही होती हैं ? मुझे लगता है कि अवचेतन मेंमौजूद किसी विषय की अस्पष्टता ही ऐसी गैर जरूरी टिप्पणियों के रूप में रचनाओं में भी और बातचीत में दिखजाती है। वरना अध्यनशील लोगों के लिए यह चिन्हित करना कोई मुश्किल काम नहीं कि क्या बात तार्किक रूप सेगलत है और जिसे नहीं कहा जाना चाहिए। वो तो अवचेतन ही है जहां हमारे मानस की वह महीन बुनावट होती हैजिसमें हम अपनी तमाम कमजोरियों के साथ पकड़ लिए जाते है। कथाकर जितेन ठाकुर का यह आलेख ऐसी हीस्थितियों पर चोट करता है और गैर जरूरी तरह से की जाने वाली टिप्पणियों की पड़ताल करता है।

जितेन ठाकुर

मौका था एक उदीयमान लेखक के पहले कथा संग्रह पर आयोजित संगोष्ठी का। संगोष्ठी में चर्चाओं का दौर, सहमति-असहमति, शिक्षा-दीक्षा सभी कुछ उफान पर था। पुस्तक की समीक्षा में सम्बंधों का निर्वाह भी हो रहा था और निर्ममता भी बरती जा रही थी। 'मैं लिखता तो ऐसे लिखता" की तर्ज पर कहानियों की चीर-फाड़ जारी थी। तभी महफिल की शमा एक स्वनामधन्य कवि के सामने पहुँच गई। कविराज ने अपने पहले ही वाक्य में साहित्य को 'धंधा" बतलाया तो मुझे हंसी आ गई। बात गम्भीर थी- हंसी की तो बिल्कुल भी नहीं थी। पर पता नहीं क्यों मुझे हंसी आ गई। मुझे समझ लेना चाहिए था कि यह वक्ता का नितांत व्यक्तिगत अनुभव है और इसे वक्ता से ही जोड़ कर स्वीकार कर लिया जाना चाहिए। पर सोच की जिस पैनी कनी ने मुझे तत्कला छील दिया था वह यह थी कि अगर साहित्य को धंधा मान लिया जाए तो लेखकों को तो धंधे वाला कह कर निपटाया जा सकता है पर लेखिकाओं को कैसे सम्बोधित किया जाएगा।
बहरहाल! मेरे हंसने के बाद वक्ताश्री सतर्क हो गए और अपनी कही हुई बात को सिद्ध करने की मुहिम में लग गए। अनेक उदाहरण देकर उन्होंने सिद्ध किया कि हम सब झूठ घड़ते हैं। ये झूठ की हमें साहित्यकार बनाता है, स्थापित करवाता है और बदले में ढेरों लाभ भी दिलवाता है। अब ये उन स्वनाम धन्य कवि का स्वानूभूत सत्य था, अतिरेक था या फिर अति आत्मविच्च्वास। पर ये जो भी था साहित्य के परिप्रेक्ष्य में व्यावसायिक दृष्टिकोण के साथ नकारात्मक सोच के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं था।
जिस प्रकार कोई भी धंधा साहित्य नहीं हो सकता ठीक उसी प्रकार साहित्य भी धंधा नहीं हो सकता। साहित्य से जुडे अन्य सभी कर्म यथा छापाखाना, जिल्दसाजी विक्रय और प्रबंधन धंधा हो सकते हैं। साहित्य की आड़ लेकर पद, प्रतिष्ठा और पुरुस्कार हथियाने के लिए पैंतरे बाजी करना भी धंधा हो सकता है। साहित्यक चेले इठे करके महंत हो जाना, प्रायोजित चर्चाएं करना-करवाना, पुरुस्कारों की होड़ में सौदे पटाना, इसको उठाना- उसको गिराना यानी साहित्य की आड़ में ये सब धंधे हो सकते हैं पर इन सब कृत्यों की नींव में दफ्न साहित्य न कल धंधा था- न आज धंधा है। साहित्य को धंधा बना दिया जाए ये और बात है पर साहित्य धंधा हो जाए- ये मुमकिन ही नहीं है। इसलिए परिस्थितियों का सरलीकरण करते हुए साहित्य को धंधा कहने या फिर साहित्य कर्म को 'झूठ घड़ने" का फतवा देने से पहले आवच्च्यक है कि आत्म मंथन किया जाए। यह शोभनीय नहीं कि हम अपने को अपने से ही छुपाने की को्शिश में उन सब पर कीचड़ उछाल दें जो आज भी साहित्य को साहित्य ही मानते हैं- धंधा नहीं।
दरअसल, साहित्य जीवन की एक द्रौली है। तटस्थ और शुश्क इतिहास की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है। तीर और तलवार से पैनी और बारूद से अधिक विध्वंसक होते हुए भी जल से ज्यादा शीतल और प्रवाहमय है। साहित्य समय की अर्न्तधारा है, केवल स्थूल चित्रात्मकता नहीं। समाज की शिराओं में बहता हुआ लहू हैं साहित्य। साहित्य कंठ से नीचे उतरता कौर नहीं है बल्की श्वास नलिका में रिसती हुई प्राण-वायु है। साहित्य संस्कार है, आचमन है और तर्पण भी है साहित्य। शवों की सीढ़ियाँ चढ़ कर सिंहासन तक पहुँचने वालों के लिए चुभते रहने वाली कील है साहित्य। और यही साहित्य किसी प्रलंयकारी रात में सूरज की उम्मीद भी है।
साहित्य चेतना है, स्वाभिमान है और आत्ममंथन के लिए भी है। ऐसे में साहित्य को धंधा कहना किसी व्यापारी का दृष्टिकोण तो हो सकता है पर किसी साहित्यकार का नहीं।
साहित्य न तो त्रिवेणी में डुबकी का मोहताह है न हज का। न तो अमृत छकने में साहित्य बनता है और न ही शराब में भीगी रोटी जुबान पर छुआने से। इसे न तो कालिंदी तट की रास लीलाएँ दरकार हैं और न ही किसी आराध्य की एकांत उपासना। कोई दृद्गय, कोई स्थिति, कोई विचार, समय या समाज इनमें से कुछ भी अकेला साहित्य हो जाए ये सम्भव ही नहीं हैं- पर साहित्य इनमें से कुछ भी हो सकता है। क्योंकि साहित्य अनुकृति नहीं है सृजन है और सृजन की सीमाएँ नहीं होतीं। जिसकी सीमाएँ नहीं उसका व्यापार कैसा?
दरअसल जब हम साहित्य को धंधा कहते हैं तो हम आत्मप्रवंचना से भरे हुए होते हैं। हमें लगता है कि हमारा कहा हुआ वाक्य ही समय है और यही युगों के शिलालेख पर अंकित होने जा रहा है। आत्मकुंठा और आत्ममुग्धता के बीच की स्थितियों से गुजरते हुए, अपने होने के अहसास को बनाए रखने के लिए हम कई-कई बार ऐसी घोषणाएँ करते हैं- जो हमारे वजूद के लिए दरकार होती हैं। हम मान लेते हैं कि हमारा झूठ समय का झूठ है, हमारी कुंठा समय की कुंठा है। हम अपनी प्रवंचना को समय के साथ गूंथ कर उसे कालजयी बना देना चाहते हैं। हम यह सिद्ध कर देना चाहते हैं कि हम श्वास नहीं लेते फिर भी जीते हैं, हम नेत्र नहीं खोलते फिर भी देखते हैं। हमारे कान वो सब सुन सकते हैं जो पीढ़ियों पहले से वायुमण्डल में अटका हुआ है और हमारी जीह्वा जो कहती है- वही सत्य है। इसलिए जब हम कहें कि साहित्य धंधा है- तो उसे धंधा मान ही लिया जाए। नहीं तो इसे सिद्ध करने के लिए हमारे पास दलीलें हैं। हम जिरह कर सकते हैं और इस जिरह के लिए लावण्यमयी भाषा भी घड़ सकते हैं।
मुझे याद आता है कि वर्षों पहले अनेक संगोष्ठियों में साहित्य के कुछ पंडित अपना पांडित्य प्रदर्शित करते हुए बार-बार एक ही बात कहते थे कि साहित्य के पास अब पाठक नहीं रहा। साहित्य के पास पाठक रहा या नहीं- ये एक अलग बहस की बात हो सकती है पर उनके इस कथन में जो अर्थ निहित था वो यही था कि 'हे लेखक! हमारी शरण में आ जाओ क्योंकि साहित्य में तुम्हें स्थापित करने वाला पाठक अब शेष नहीं है। हमारे शरणागत होने के बाद ही तुम स्थापित और चर्चित हो पाओगे।" बहुत से लेखकों ने इस कथन के निहितार्थ को भांपा और शरणागत हुए। ऐसे ही साहित्य को धंधा बताने वाले स्वनामधन्य भी यदि नये लेखकों को अपने धंधे के गुर सिखाने के लिए कोई नया संस्थान खोल लें तो आश्चर्य नहीं।
अरविंद त्रिपाठी ने एक बार कहा था कि यह महत्वपूर्ण है कि हम अपनी रचना के साथ कितना समय बिताते है। इसका यही अर्थ है कि हमने जो लिखा उसका गुण-दो्ष हमें तुरंत ही पता नहीं चलता क्यों कि हम लम्बे समय तक अपनी रचना के सम्मोहन में जकड़े रहते हैं। इस सम्मोहन से मुक्त होने के बाद ही हम तटस्थ होकर अपने लिखे हुए का विश्लेषण कर सकते हैं। फिर ये कितना उचित है कि किसी संगोष्ठी में प्रतिक्रिया स्वरूप उत्पन्न हुए विचार से कोई स्वयं ही इतना सम्मोहित हो जाए कि उसे प्रमाणिक बनाने और मनवाने के लिए इतना जूझे कि विवेक को ही ताक पर रख दे। पर शायद कुछ लोगों का यही धंधा है क्योंकि उनके लिए यही साहित्य है।