Saturday, May 18, 2013

नागरिक कर्म और रचना कर्म को साथ-साथ चरित्रार्थ करने की बेचैनी से भरा कवि



                                   
                                                                          - महेश चंद्र पुनेठा



  भले ही हिंदी कविता में जनपदीयता बोध की कविताओं की परंपरा बहुत पुरानी एवं समृद्ध है पर उच्च हिमालयी अंचल की रूप-रस-गंध ली हुई कविताएं अंगुलियों में गिनी जा सकती हैं। अजेय उन्हीं गिनी-चुनी कविताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनकी कविता के केंद्र में इस अंचल का क्रियाशील जनजीवन ,प्रकृति तथा विकास के नाम पर होने वाली छेड़छाड़ के चलते भौतिक और सामजिक पर्यावरण में आ रहे बदलाव हैं। कविता में उनकी कोशिश है कि अपने पहाड़ी जनपद की उस सैलानी छवि को तोड़ा जाय जो इस बर्फीले जनपद को वंडरलैंड बना कर पे्श करती है। वे बताना चाहते हैं कि यहां भी लोग शेष वि्श्व के पिछड़े इलाकों और अनचीन्हे जनपदों के निवासियों की भांति सुख-दु:ख को जीते हैं-पीड़ाओं को झेलते और उनसे टकराते हैं। जिनके अपने छोटे-छोटे सपने और अरमान हैं। कहना होगा कि इस कोशिश में कवि  सफल रहा है। हिंदी कविता में अजेय का नाम नया नहीं है। एक चिरपरिचित नाम है जो अपनी कविता की इस वि्शिष्ट गंध के लिए जाना जाता है। वे अरसे से कविता लिख रहे हैं और महत्वपूर्ण लिख रहे हैं। उन्होंने अपनी देखी हुई और महसूस की हुई दुनिया को बड़ी तीव्रता एवं गहराई से उतारा है  इसलिए उनके कहन और कथ्य दोनों में मौलिकता है। निजी आत्मसंघर्ष और सूक्ष्म निरीक्षण इस मौलिकता को नई चमक प्रदान करते हैं। सहज रचाव , संवेदन, ऊष्मा ,लोकधर्मी रंग , एंद्रिक-बिंब सृजन ,जीवन राग और सजग रचना दृष्टि इन कविताओं की विशिष्ट्ता है। अजेय बहुत मेहनत  से अपने नाखून छीलकर लिखने वाले कवि हैं जो भी लिखते हैं शुद्ध हृदय से ,कहीं कोई मैल नहीं। लोक मिथकों का भी बहुत सुंदर और सचेत प्रयोग इन कविताओं में मिलता है। अजेय उन लोगों में से हैं जो लोक के ऊर्जावान आख्यानों , सशक्त मिथकों और जीवंत जातीय स्मृतियों को महज अनुसंधान और तमा्शे की वस्तु नहीं बनाए रखना चाहते हैं बल्कि उन्हें जीना चाहते हैं। साथ ही किसी अंधविश्वास और रूढ़िवादिता का भी समर्थन नहीं करते हैं।

   उनकी कविताएं देश के उस आखिरी छोर की कविताएं हैं जहां आकाश कंधों तक उतर आता है। लहराने लगते हैं चारों ओर घुंघराले मिजाज मौसम के। जहां प्रकृति , घुटन और विद्रूप से दूर अनुपम दृश्यों के रूप में दुनिया की सबसे सुंदर कविता रचती है। जहां महसूस की जा सकती है सैकड़ों वनस्पतियों की महक व शीतल विरल वनैली छुअन। इन कविताओं में प्रकृति के विविध रूप-रंग वसंत और पतझड़ दोनों ही के साथ मौजूद हैं। प्रकृति के रूप-रस-गंध से भरी हुई इन कविताओं से रस टपकता हुआ सा प्रतीत होता है तथा इन्हें पढ़ते हुए मन हवाओं को चूमने,पेड़ों सा झूमने ,पक्षियों सा चहकने ,बादलों सा बरसने तथा बरफ सा छाने लगता है। इस तरह पाठक को प्रकृति के साथ एकमेक हो जाने को आमंत्रित करती हैं।  इन कविताओं में पहाड़ को अपनी मुटि्ठयों में खूब कसकर पकड़ रखने की चाहत छुपी है। पहाड़ ,नदी ,ग्लेशियर , झील ,वनस्पति , वन्य प्राणी अपने नामों और चेहरों के साथ इन कविताओं में उपस्थित हैं जो स्थानीय भावभूमि और यथार्थ को पूरी तरह से जीवंत कर देती हैं। अजेय उसके भीतर प्रवेश कर एक-एक रगरेशे को एक दृष्टा की तरह नहीं बल्कि भोक्ता की तरह दिखाते हैं। वे जनपदीय जीवन को निहारते नहीं उसमें शिरकत करते हैं। अपनी ज्ञानेन्द्रियों को बराबर खुला रखते हैं ताकि वह आसपास के जीवन की हल्की से हल्की आहट को प्रतिघ्वनित कर सकें।  यहां जन-जीवन बहुत निजता एवं सहजता से बोलता है।  ये कविताएं अपने जनपद के पूरे भूगोल और इतिहास को बताते हुए बातें करती हैं  मौसम की ,फूल के रंगों और कीटों की ,आदमी और पैंसे की , ऊन कातती औरतों की ,बंजारों के डेरों की ,भोजपत्रों की , चिलम लगाते बूढ़ों की , आलू की फसल के लिए ग्राहक ढूंढते का्श्तकारों की, विष-अमृत खेलते बच्चों की ,बदलते गांवों की। इन कविताओं में संतरई-नीली चांदनी ,सूखी हुई खुबानियां ,भुने हुए जौ के दाने ,काठ की चटपटी कंघी ,सीप की फुलियां ,भोजपत्र ,शीत की आतंक कथा आदि अपने परिवेश के साथ आती हैं।  

  यह बात भी इन कविताओं से मुखर होकर निकली है कि पहाड़ अपनी नैसर्गिक सौंदर्य में जितना रमणीय है वहां सब कुछ उतना ही रमणीक नहीं है। प्रकृति की विभिषिका यहां के जीवन को बहुत दुरुह बना देती है। यहां के निवासी को पग-पग पर प्रकृति से संघर्ष करना पड़ता है। उसे प्रकृति से डरना भी है और लड़ना भी। प्रकृति की विराटता के समक्ष आदमी बौना है और आदमी की जिजीवि्षा के समाने प्रकृति। उनकी कविता में प्रकृति की हलचल और भयावहता का एक बिंब देखिए- बड़ी हलचल है वहां दरअसल/बड़े-बड़े चट्टान/गहरे नाले और खड्ड/ खतरनाक पगडंडियां हैं/बरफ के टीले और ढूह/ भरभरा गर गिरते रहते हैं/गहरी खाइयों में/ बड़ी जोर की हवा चलती है/ हडि्डयां कांप जाती हैं।       

 कवि के  मन में अपनी मिट्टी के प्रति गहरा लगाव भी है और सम्मान भी जो इन पंक्तियों से समझा जा सकता है- मैंने भाई की धूल भरी देह पर/ एक जोर की जम्फी मारी /और खुश हुआ/मैंने खेत से मिट्टी का/एक ढेला उठाकर सूंघा/और खुश हुआ। मिट्टी के ढेले को सूंघकर वही खु्श हो सकता है जो अपनी जमीन से बेहद प्रेम करता हो। वही गर्व से यह कह सकता है- हमारे पहाड़ शरीफ हैं /सर उठाकर जीते हैं/सबको पानी पिलाते हैं। उसी को इस बात पर दु:ख हो सकता है कि गांव की निचली ढलान पर बचा रह गया है थोड़ा सा जंगल , सिमटती जा रही है उसकी गांव की नदी तथा जंगल की जगह और नदी के किनारे उग आया है बाजार ही बाजार , हरियाली के साथ छीन लिए गए हैं फूलों के रंग ,नदियों का पानी ,उसका नीलापन ,तिलतियां आदि। वह जानता है यह सब इसलिए छीना गया है ताकि-खिलता ,धड़कता ,चहकता ,चमकता रहे उनका शहर ,उनकी दुनिया। इसलिए  कवि को असुविधा या अभावों में रहना पसंद है पर अपनी प्रकृति के बिना नहीं। वे अपने जन और जनपद से प्रेम अवश्य करते हैं पर उसका जबरदस्ती का महिमामंडन नहीं करते हैं। ये कविताएं जनपदीय जीवन की मासूमियत व निष्कलुशता को ही नहीं बल्कि उसे बदशक्ल या बिगाड़ने वालों का पता भी देती हैं। जब वे कहते हैं कि- बड़ी-बड़ी गाड़ियां /लाद ले जाती शहर की मंडी तक/बेमौसमी सब्जियों के साथ/मेरे गांव के सपने । तब उनकी ओर स्पष्ट संकेत करती हैं । बड़ी पूंजी गांव के सपनों को किस तरह छीन रही है? कैसे गांव शहरी प्रवृत्तियों के शिकार हो रहे हैं तथा अपने संसाधनों के साथ कैसे अपनी पहचान खोते जा रहे हैं? ये कविताएं इन सवालों का जबाब भी देती हैं। गांवों से सद्भावना और सामूहिकता जैसे मूल्यों के खोते जाने को कवि कुछ इस तरह व्यंजित है- किस जनम के करम हैं कि/यहां फंस गए हैं हम/कैसे भाग निकलें पहाड़ों के उस पार?/ आए दिन फटती हैं खोपड़ियां जवान लड़कों की /कितने दिन हो गए गांव में मैंने /एक जगह /एक मुद्दे पर इकट्ठा नहीं देखा---शर्मशार हूं अपने सपनों पर/मेरे सपनों से बहुत आगे निकल गया है गांव/बहुत ज्यादा तरक्की हो गई है /मेरे गांव की गलियां पी हो गई हैं। यहां गांव की तरक्की पर अच्छा व्यंग्य किया गया है। आखिर तरक्की किस दिशा में हो रही है? यह कविता हमारा ध्यान उन कारणों की ओर खींचती है जो गांवों के इस नकारात्मक बदलाव के लिए जिम्मेदार हैं। यह कटु यथार्थ है कि 'तरक्की’ के नाम पर आज गांवों का न केवल भौतिक पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है बल्कि सामाजिक पर्यावरण भी प्रदूषित हो रहा है। यह आज हर गांव की दास्तान बनती जा रही है।    

  स्त्री पहाड़ की जनजीवन की रीढ़ हैं। उसका जिक्र हुए बिना पहाड़ का जिक्र आधा है। उसकी व्यथा-कथा पहाड़ की व्यथा-कथा का पर्याय है। ऐसे में भला अजेय जैसे संवेदनशील एवं प्रतिबद्ध कवि से वे कैसे छूट सकती हैं। उनकी कविताओं में आदिवासी स्त्रियों के दु:ख-दर्द-संघर्ष पूरी मार्मिकता से व्यक्त हुए हैं। कवि को चुपचाप तमाम अनाप-शनाप संस्कार ढोती हुई औरत की एक अंतहीन दबी हुई रुलाई दिखाई देती है। साथ ही वह औरत जो अपनी पीड़ाओं और संघर्षों के साथ अकेली है पर 'प्रार्थना करती हुई/उन सभी की बेहतरी के लिए /जो क्रूर हुए हर-बार /खुद उसी के लिए "। इस सब के बावजूद कवि औरत को पूरा जानने का कोई दावा नहीं करता है- ठीक-ठीक नहीं बता सकता है/कि कितना सही-सही जानता हूं /मैं उस औरत को /जबकि उसे मां पुकारने के समय से ही/उसके साथ हूं---नहीं बता सकता/कि कहां था /उस औरत का अपना आकाश।  यह न केवल कवि की ईमानदारी है बल्कि इस बात को भी व्यंजित करती कि पहाड़ी औरत के कष्ट-दु:ख-दर्द इतने अधिक हैं कि उसके साथ रहने वाला व्यक्ति भी अच्छी तरह उन्हें नहीं जान पाता है। उन्होंने आदिवासी औरत की ब्यूंस की टहनियों  से सटीक तुलना की है- हम ब्यूंस की टहनियां हैं /जितना चाहो दबाओ/झुकती ही जाएंगी /जैसा चाहो लचकाओ /लहराती रहेंगी / जब तक हममें लोच है /और जब सूख जाएंगी/ कड़ककर टूट जाएंगी। यही तो है पहाड़ी स्त्री का यथार्थ। एक असहायता की स्थिति। वह अपने साथ सब कुछ होने देती है उन मौकों पर भी जबकि वह लड़ सकती है। उसके जाने के बाद ही उसके होने का अहसास होता है।  वे औरत के गुमसुम-चुपचाप बैठे रहने के पक्षधर नहीं हैं उनका प्रतिरोध पर विश्वास है ,तभी वे कहते हैं- वहां जो औरत बैठी है/उसे बहुत देर तक/ बैठे नहीं रहना चाहिए/ यों सज-धज कर/गुमसुम-चुपचाप।

   अजेय अपने को केवल अपने जनपद तक ही सीमित नहीं करते हैं। उनकी कविताओं में खाड़ी युद्ध में बागी तेवरों के साथ अमरीकी सैनिक , अंटार्कटिका में शोधरत वैज्ञानिक ,निर्वासन में जीवन बिता रहे तिब्बती ,उनके धर्मगुरू आदि भी आते हैं। इस तरह उनकी कविता पूरी दुनिया से अपना रिश्ता कायम करते हैं। उनकी कविता का संसार स्थानीयता से वैश्विकता के बीच फैला है। अनुभव की व्यापकता के चलते विषयों की विविधता एकरसता नहीं आने देती है।  कहीं-कहीं कवि का अंतर्द्वद्व भी मुखर हो उठता है। कहीं-कहीं अनिर्णय और शंका की स्थिति में भी रहता है कवि । यह अनिर्णय और शंका व्यवस्था जनित है। उनके यहां ईश्वर भी आता है तो किसी चत्मकारिक या अलौकिक शक्ति के रूप में नहीं बल्कि एक दोस्त के रूप में जो उनके साथ बैठकर गप्पे मारता है और बीड़ी पीता है। यह ईश्वर का लोकरूप है जिससे कवि किसी दु:ख-तकलीफ हरने या मनौती पूरी करने की प्रार्थना नहीं करता है। यहां यह कहना ही होगा कि भले ही अजेय जीवन के विविध पक्षों को अपनी कविता की अंतर्वस्तु बनाते हैं पर सबसे अधिक प्रभावित तभी करते हैं जब अपने जनपद का जिक्र करते हैं। उनकी कविताओं में जनपदीय बोध का रंग सबसे गहरा है।

  युवा कवि अजेय की कविता की एक खासियत है कि वे इस धरती को किसी चश्में से नहीं बल्कि अपनी खुली आंखों से देखते हैं उनका मानना है कि चश्में छोटी चीजों को बड़ा ,दूर की चीजों को पास ,सफ्फाक चीजों को धुंधला ,धुंधली चीजों को साफ दिखाता है। वे लिखते हैं -लोग देखता हूं यहां के/सच देखता हूं उनका /और पकता चला जाता हूं /उनके घावों और खरोंचों के साथ। कवि उनकी हंसी देखता है ,रूलाई देखता है ,सच देखता है ,छूटा सपना देखता है। इस सबको किसी चश्में से न देखना कवि के आत्मविश्वास को परिलक्षित करता है। एक बात और है कवि चाहे अपनी आंखों से ही देखता है पर उसको भी वह अंतिम नहीं मानता है। विकल्प खुले रखता है। अपनी सीमाओं को तोड़ने-छोड़ने के लिए तैयार रहता है। हमेशा यह जानने की कोशिश करता है कि- क्या यही एक सही तरीका है देखने का। अपने को जांचने-परखने तथा आसपास को जानने-पहचानने की यह प्रक्रिया कवि को जड़ता का शिकार नहीं होने देती। यह किसी भी कवि के विकास के लिए जरूरी है। इससे पता चलता है कि अजेय किसी विचारधारा विशेष के प्रति नहीं मनुष्यता के प्रति प्रतिश्रुत हैं। उनकी कविताएं इस बात का प्रमाण हैं कि अगर कोई रचनाकार अपने समय और जीवन से गहरे स्तर पर जुड़ा हो तो उसकी रचनाशीलता में स्वाभाविक रूप से प्रगतिशीलता आ जाती है। 

   उनके लिए कविता मात्र स्वांत:सुखाय या वाहवाही लूटने का माध्यम नहीं है। वे जिंदगी के बारे में कविता लिखते हैं और कविता लिखकर जिंदगी के झंझटों से भागना नहीं बल्कि उनसे मुटभेड़ करना चाहते हैं। कविता को जिंदगी को सरल बनाने के औजार के रूप में प्रयुक्त करते हैं। उनकी अपेक्षा है कि- वक्त आया है/कि हम खूब कविताएं लिखें/जिंदगी के बारे में/इतनी कि कविताओं के हाथ थामकर/जिंदगी की झंझटों में कूद सकें/जीना आसान बने/और कविताओं के लिए भी बचे रहे/थोड़ी सी जगह /उस आसान जीवन में। अर्थात कविता जीवन के लिए हो और जीवन में कविता हो। उनकी कविता ऐसा करती भी है जीवन की कठिनाइयों से लड़ने का साहस प्रदान करती है। वे जब कहते हैं कि-यह इस देश का आखिरी छोर है/'शीत" तो है यहां/पर उससे लड़ना भी है/यहां सब उससे लड़ते हैं /आप भी लड़ो। यहां पर 'शीत" मौसम का एक रूप मात्र नहीं रह जाता है। यह शीत व्यक्ति के भीतर बैठी हुई उदासीनता और निराशा का प्रतीक भी बन जाता है , सुंदर समाज के निर्माण के के लिए जिससे लड़ना अपरिहार्य है। कविता का ताप इस शीत से लड़ने की ताकत देता है। कविता अपनी इसी जिम्मेदारी का निर्वहन अच्छी तरह कर सके उसके लिए कवि चाहता है कि कविता में -एक दिन वह बात कह डालूंगा /जो आज तक किसी ने नहीं कही/जो कोई नहीं कहना चाहता। यह अच्छी बात है कि कवि को अपनी अभिव्यक्ति में हमेशा एक अधूरापन महसूस होता है। अब तक न पायी गई अभिव्यक्ति को लेकर ऐसी बेचैनी के दर्शन हमें मुक्तिबोध के यहां होते हैं।यह नागरिक कर्म और रचना कर्म को साथ-साथ चरितार्थ करने की बेचैनी लगती है। वे मुक्तिबोध की तरह परम् अभिव्यक्ति की तलाश में रहते हैं। यह अजेय की बहुत बड़ी ताकत है जो उन्हें हमेशा कुछ बेहतर से बेहतर लिखने के लिए प्रेरित करती रहती है। उनके भीतर एक बेचैनी और आग हमेशा बनी रहती है। एक कवि के लिए जिसका बना रहना बहुत जरूरी है। जिस दिन कवि को चैन आ जाएगा। समझा जाना चाहिए कि उसके कवि रूप की मृत्यु सुनिश्चित है क्योंकि एक सच्चे कवि को चैन उसी दिन मिल सकता है जिस दिन समाज पूरी तरह मानवीय मूल्यों से लैस हो जाएगा ,वहां किसी तरह का शोषण-उत्पीड़न और असमानता नहीं रहेगी। जब तक समाज में अधूरापन बना रहेगा कवि के भीतर भी बेचैनी और अधूरापन कायम रहेगा। यह स्वाभाविक है। कवि अजेय अपनी बात कहने के लिए निरंतर एक भाषा की तलाश में हैं और उन्हें विश्वास है कि वह उस भाषा को प्राप्त कर लेंगे क्योंकि आखिरी बात तो अभी कही जानी है । कितनी सुंदर सोच है- आखिरी बात कह डालने के लिए ही /जिए जा रहा हूं /जीता रहुंगा। आखिरी बात कहे जाने तक बनी रहने वाली यही प्यास है जो किसी कवि को बड़ा बनाती है तथा दूसरे से अलग करती है। मुक्तिबोध के भीतर यह प्यास हमेशा देखी गई। उक्त पंक्तियों में व्यक्त संकल्प अजेय की लंबी कविता यात्रा का आश्वासन देती है साथ ही आश्वस्त करती है कि कवि अपने खाघ्चों को तोड़ता हुआ निरंतर आगे बढ़ता जाएगा जो साहित्य और समाज दोनों को समृद्ध करेगा।

  अजेय उन कवियों में से हैं जिन्हें सुविधाएं बहला या फुसला नहीं सकती हैं। चारों ओर चाहे प्रलोभनों की कनात तनी हों पर वे दृढ़ता से संवेदना के पक्ष में खड़े हैं। यह सुखद है कि कवि तपती पृथ्वी को प्रेम करना चाहता है -कि कितना अच्छा लगता है/ नई चीख/नई आग/ और नई धार लिए काम पर लौटना। ठंड से कवि को जैसे नफरत है । वह ठंडी नहीं तपती पृथ्वी को प्रेम करना चाहता है। तपते चेहरे की तरह देखना चाहता है पृथ्वी को। आदमी की भीतर की आग को बुझने नहीं देना चाहता है शायद इसीलिए इन कविताओं में 'आग’ शब्द  बार-बार आता है। यही आग है जो उसे जीवों में श्रेष्ठतम बनाती है। कवि प्रश्न करता है-खो देना चाहते हो क्या वह आग? यह आग ही तो आदमियत को जिंदा रखे हुए है। आदमियत की कमी से कवि खुश नहीं है। कवि मानता है कि ठंडे अंधेरे से लड़ने के लिए मुट्ठी भर आग चाहिए सभी को। उनके लिए महज एक ओढ़ा हुआ विचार नहीं सचमुच का अनुभव है आग। इन कविताओं में अंधेरे कुहासों से गरमाहट का लाल-लाल गोला खींच लाने की तासीर है जिसका कारण कवि का यह जज्बा है -कि लिख सको एक दहकती हुई चीख/ कि चटकाने लगे सन्नाटों के बर्फ/ टूट जाए कड़ाके की नींद।  

   जहां तक भाषा-शिल्प का प्रश्न है , कहना होगा कि उनकी काव्यभाषा में बोधगम्यता और रूप में विविधता है। वे परिचित और आत्मीय भाषा में जीवन दृश्य प्रस्तुत करते हैं। उनकी भाषा में जहां एक ओर लोकबोली के शब्द आए हैं तो दूसरी ओर आम बोलचाल में प्रयुक्त होने वाले अंग्रेजी शब्दों का भी धड़ल्ले से प्रयोग हुआ है। इन शब्दों का अवसरानुकूल और पात्रानुकूल प्रयोग किया गया है।  इसके उदाहरण के रूप में एक ओर बातचीज तो दूसरी ओर ट्राइवल में स्की फेस्टीवल कविता को देखा जा सकता है। कवि जरूरत पड़ने पर अंग्रेजी शब्दों के प्रयोग से भी परहेज नहीं करता है। स्वाभाविक रूप से उनका प्रयोग करता है। रूप की दृ्ष्टि से भी इनकी कविताओं में विविधता और नए प्रयोग दिखाई देते हैं। आर्कटिक वेधशाला में कार्यरत वैज्ञानिक मित्रों के कुछ नोट्स और 'शिमला का तापमान" इस दृष्टि से उल्लेखनीय कविताएं हैं। ये बिल्कुल नए प्रयोग हैं। इस तरह के प्रयोग अन्यत्र कहीं नहीं दिखते।कनकनी बात, कुंआरी झील, तारों की रेजगारी, जैसे सुंदर प्रयोग उनकी कविताओं के सौंदर्य को बढ़ाते हैं। उनके अधिकांश बिंब लोकजीवन से ही उठाए हुए हैं जो एकदम अनछुए और जीवंत हैं। इन कविताओं का नया सौंदर्यबोध ,सूक्ष्म संवेदना और सधा शिल्प अपनी ओर आकर्षित करता है।

    अजेय की कविताओं को पढ़ते हुए मुझे कवि भवानी प्रसाद मिश्र की ये पंक्तियां बार-बार याद आती रही कि यदि कवि व्यक्तित्व स्वच्छ है ,उसने जाग कर जीवन जिया है और उसके माध्यम के प्रति मेहनत उठाई है तो वह सौंदर्य से भरे इस जगत में नए सौंदर्य भी भरता है। ये पंक्तियां अजेय और उनकी कविताओं पर सटीक बैठती हैं। उनकी कविताओं में भरपूर सौंदर्य भी है और सीधे दिल में उतरकर वहांघ् जमी बर्फ को पिघलाने की सामर्थ्य भी। आ्शा है उनकी धुर वीरान प्रदेशों में लिखी जा रही यह कविता कभी खत्म नहीं होगी तथा कविता लिखने की जिद बनी रहेगी। हिंदी के पाठक  इसका पूरा आस्वाद लेंगे।







  

Monday, April 22, 2013

पेशावर विद्रोह की वर्षगांठ (23 अप्रैल:) पर विशेष



हुतात्मा एक सच्चे जनयोद्धा की महाकाव्यात्मक संघर्ष गाथा
एक सच्चे जनयोद्धा की महागाथा


उषा नौडियाल



डॉ. शोभा राम शर्मा द्वारा रचित महाकाव्य हुतात्मा पेशावर विद्रोह के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के संपूर्ण जीवन की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति है। आत्मविज्ञापन, आत्मश्लाघा के इस दौर में जब हर वस्तु, हर विचार बाजारवाद का शिकार या पोषक हो रहा है। ऐसे समय में साहित्य ही मनुष्य को उसके जीवन मूल्यों का बोध कराने के साथ साथ उसकी संघर्षशीलता का स्मरण करा सकता है। 
आजादी के सच्चे सिपाहियों के जीवन संघर्ष और आत्म बलिदान से अवगत कराए बिना दिग्भ्रमित युवा पीढी को विचार शून्यता से बचाना असं व है। उत्तराखंड समेत पूरे देश में आज निजी स्वार्थों को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है उसमें पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और ी प्रासंगिक हो गए हैं। इन स्थितियों में वंशवाद व सांप्रदायिकता में लिपटी थोथी देशभक्ति की पोल खोलना ी जरूरी है। चंद्र सिंह गढ़वाली जिन्हे पहले अंग्रेजों ने करीब 13 वर्ष फिर देश की आजाद सरकार ने कई बार कारावास में रखा। आर्य समाज से गांधीवाद, फिर कम्युनिज्म तक उनकी विचारयात्रा ,उथलपुथल से री 20वीं सदी के ारत के राजनीतिक इतिहास की महागाथा है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में ी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली टूटे न झुके। वह चाहते तो आसानी से विधायक या सांसद हो सकते थे। पंडित नेहरू ने उन्हे खुद कांग्रेस का टिकट देने की पेशकश की थी। लेकिन उन्होनेे विचारधारा से समझौता नहीं किया। आर्थिक तंगी के वावजूद वे विचारधारा की तलवार लिए आजादी के बाद ी वंचित वर्ग की असली आजादी के लिए लड़ते रहे। जिसका स्वप्न कितने कर्मवीरों और शहीदों ने देखा था। कविता के रूप में उनके संघर्ष का समग्र चित्रण निश्चय ही पाठकों को कौतुहूल के साथ उद्वेलित, आनंदित व किंचित विस्मित करने में समर्थ है। 
कविता का वास्तविक उद्देश्य जितना पाठकों के हृदय में सौंदर्यानुभूति जगाना है,उससे अधिक उद्दात मानवीय अनुभूतियों का प्रस्फुटन करना है। प्रकृति की तरह ही कविता ी त्रस्त हृदय के लिए मरहम का काम करती है। 
नर को अपना लोक न ाता, ाता मन का छायालोक। 
त्रस्त हृदय की पीड़ा हरता, सुख सपनों का मायालोक।। (केदार यात्रा पृष्ठ-28)
उच्च कोटि की कविता में एक यूनिवर्सल अपील होती है। वह सार्वभौमिक और सर्वकालिक होती है। हुतात्मा महाकाव्य का फलक अपने नाम के अनुरूप विस्तृत और व्यापक है। जहां एक ओर नायक के जीवन का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन समाज, उसके परिवेश, संस्कृति का सूक्ष्म और गहन चित्रण ी है। मानवीय ावनाओं पर गहरी पकड़ और अंतर्मन की गुत्थियों को उजागर करता मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ी परिलक्षित होता है। प्रामाणिक युग चित्रण कवि की विद्वता और अध्ययनशीलता की छाप छोड़ जाता है। महाकाव्य एक ओर गुलाम ारत में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दारुण यंत्रणा का मार्मिक चित्रण है वहीं दूसरी ओर प्रथम विश्वयुद्ध व सके कारणों और प्रभावों का सरल विवरण है
पूरबपश्चिम, उत्तर दक्खिन बांट चुके सब योरुप वाले।
दुनिया उनके हाथों में थी, दास बने जन पीले काले।।
बाजारों की छीनाझपटी, अपनी अपनी धाक जमाना।
गौरांगों में होड़ लगी थी, युद्ध-युद्ध का छेड़ तराना।। (प्रथम विश्वयुद्ध पृष्ठ-4)
  ारत की आजादी के संघर्ष का हो या आजादी के बाद का काल। तमाम राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का विशद विवरण निश्चय ही गहन अध्ययन और सूक्ष्म अनुसंधान के बिना सं व नहीं हो सकता। पर्वतवासियों के सरल जीवन की विकट परिस्थितियों का चित्रण, उनकी स्वभावगत सरलता, जुझारूपन और खुद्दारपन का चित्रण गढ़वालीजी के जीवन चित्रण के माध्यम से उ रकर आया है। पलायन की समस्या पर ये पंक्तियां सटीक और मार्मिक प्रतीत होती हैं- 
इस धरा के फूल कितने खल अ ावों में पले हैं।
शठ उदर का पेट रने हर छलावों में छले हैं।।
स्वर्ग जैसी ूमि से उड, दूर बीती है जवानी।
हिम शिलाओं के तले यह आपबीती है पुरानी ।।(केदारभूमि पृष्ठ-14)
प्रगतिशीलता के प्रति कवि की निजी प्रतिबद्धता, व्यवस्था परिवर्तन की अदम्य आकांक्षा काव्य में आद्योपांत झलकती है। अभिव्यक्ति की स्पष्टता, ावोें की संप्रेषणीयता ाषा के सहज सौंदर्य व सौष्ठव के माध्यम से बरकरार है। प्रकृति चित्रण में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग जहां अनिवार्य प्रतीत होता है वहीं अन्य घटनाओं के चित्रण में बोलचाल की ंिहदी और स्थानीय गढ़वाली शब्दों का प्रयोग प्रशंसनीय है। करीब 300 पृष्ठो का यह महाकाव्य इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि हिंदी कविता से लग ग बाहर कर दी गई छंदबद्ध कविता को यह पुनर्प्रतिष्ठित करने का प्रयास करता है। हुतात्मा को ंिहदी कविता में महाकाव्य और छंद की वापसी के तौर पर ी देखा जा सकता है। महाकाव्यो में जहां नायक राजा महाराजा, उच्चकुल उत्पन्न, दिव्यगुणों, महान आदर्शों वाले व मानवीय दुर्बलताओं से मुक्त होते हैं वहीं हुतात्मा का नायक वीर ढ़़वाली एक सामान्य कुल में उत्पन्न आम आदमी हैं जिन्होंने उच्च मानवीय आदर्शों को जिया। इस नाते यह पुस्तक महाकाव्य की शाóीय परिभाषा की रुढ़ि को ी तोड़ती है।  

Thursday, April 18, 2013

हरजीत का एक शे’र

(य्ह पोस्टर पुराने देहरादूनी और अब जयपुर वासी दीपक द्वारा परिकल्पित)

Saturday, April 13, 2013

चिनुआ अचेबे की कहानी : वोटर

(पिछले दिनों अफ़्रीकी साहित्य के शिखर पुरूष चिनुआ अचेबे के निधन से विश्व कथा साहित्य का नायाब हीरा हमारे बीच से गुम हो गया है.एक सम्मानित समालोचक ने उनके बारे में ठीक ही कहा है कि जैसे शेक्सपियर  के माध्यम से अंग्रेजी साहित्य और पुश्किन के माध्यम से रूसी साहित्य को अभिव्यक्ति मिली ,वैसे ही चिनुआ अचेबे के माध्यम से अफ़्रीकी साहित्य को अभिव्यक्ति मिली।यहाँ प्रस्तुत है उनकी कहानी वोटर जो लगता है कि भारत के बारे में ही लिखी गयी है. इसका अनुवाद किया है यादवेन्द्र ने)

           वोटर 
                   -- चिनुआ अचेबे

रुफुस ओकेके -- जिसको लोगबाग  संक्षेप में रूफ़ कह कर बुलाते थे --अपने गाँव का बेहद लोकप्रिय व्यक्ति था।गाँव वालों के बीच उस ऊर्जावान युवक की लोकप्रियता का कारण था कि आजकल के अन्य नौजवानों की तरह उसने  काम की तलाश में गाँव छोड़ कर शहर की ओर रुख नहीं किया -- और गाँव में रहते हुए भी उसकी छवि किसी आवारा मनचले की नहीं थी।सबने उसको दो साल तक साईकिल मरम्मत करने वाली दूकान पर काम सीखते हुए देखा था और उसके बाद स्वेच्छा से गाँव लौट कर इस मुश्किल दौर में अब सबकी मदद करते हुए देख रहे थे -- उसको लगता था ऐसा करते हुए उसका भविष्य जल्दी ही बेहतरी की करवट लेगा।        
उमोफिया गाँव अब पीपुल्स एलाएंस पार्टी का मजबूत गढ़ बन चुका था और उसके सबसे देदीप्यमान नक्षत्र मारकुस इबे उसके अंतिम सरकार के संस्कृति मंत्री के आसन पर विराजमान थे --अब जबकि लोगों को भरपूर यकीन था कि अगली सरकार भी उसी पार्टी की बनेगी सो उसके बासिंदों को अच्छे नेतृत्व  की दरकार थी। शायद ही कोई ऐसा होगा जिसको यह भरोसा न हो कि मंत्री दुबारा इस इलाके से जीत कर सत्ता हासिल करेंगे।

सबकी उम्मीदों के अनुरूप रूफ माननीय मंत्री की खिदमत में जी जान से जुटा हुआ था। चुनाव प्रचार की तमाम बारीकियाँ और नुस्खे उसको मालूम थे जिनका प्रयोग गाँव से लेकर देश तक की राजनीति में कामयाब रहते।चुनावी हवा के रुख और वोटरों की नब्ज भांपने में उसको महारत हासिल थी।अभी कुछ दिन पहले ही उसने मंत्री को गाँव के लोगों की  सोच में   रहे बदलावों के बारे में आगाह किया था।पिछले पाँच सालों में राजनीति  की मार्फ़त गाँव के लोगों को अच्छी भली दौलत और रसूखदारी हासिल हुई ,हाँलाकि कई मामलों में  लोगों को इनसे सीधा लाभ क्या मिलेगा इसका कुछ भी पता नहीं चला -- उनको तो किसी डाक्टर का मतलब सिर्फ यह समझ आता है कि रोगी उसके इलाज से चंगा हो जाए।मंत्री को देश के  तमाम बड़े खिताब और सम्मान पाँच साल के शासन काल में हासिल हो गए  कि उनको किसी और की तरफ देखने की जरूरत नहीं महसूस हुई।
गाँव के एक एक आदमी को पता था कि  मारकुस इबे राजनीती में आने से पहले एक मामूली स्कूल मास्टर था और उसकी छवि भी कोई अच्छी नहीं थी ... पर जब से उसने राजनीति का दामन थामा है  और उसकी शोहरत बढती गयी है लोगों की स्मृति से यह बात धुँधली पड़ती गयी है  कि स्कूल के एक साथी टीचर के गर्भ ठहर जाने का मामला इतना  तूल  पकड़ चुका था कि उसको स्कूल से निकाले   जाने का फैसला किया जा चुका था।
आज की तारीख में गाँव का माननीय प्रधान था ...उसके पास दो लम्बी चमकदार गाड़ियाँ थीं और उसकी कोठी तो इतनी शानदार थी  कि पूरे इलाके में वैसी कोठी कभी किसी ने देखी ही नहीं।पर सबसे बड़ी बात थी कि मारकुस के सिर पर इतनी दौलत और रसूख चढ़ी नहीं जबकि कोई और होता हो उसके पाँव ज़मीन पर बिलकुल  पड़ते।मारकुस था की अपने लोगों के लिए वैसा ही समर्पित बना रहा .. जब भी देश की राजधानी की चकाचौंध से उसको फुर्सत मिलती वह अपने गाँव लौट आता भले ही वहां हरदम बिजली और पानी की किल्लत रहती।कुछ दिन पहले ही उसने अपनी  कोठी को चौबीस घंटे बिजली पहुंचाने के लिए  निजी जेनरेटर लगवा लिया था।उसको अपने उज्जवल भविष्य का पक्का यकीन था। अपनी कोठी का नाम उसने अपने गाँव को सम्मान प्रदान करते हुए उमोफिया मैन्शन रखा था , और जिस दिन आर्च बिशप ने उसका उद्घाटन किया था उस दिन लोगों को खिलाने के लिए उसने पाँच भैंसों और अनगिनत बकरों का गोश्त परोसा था।
दावत खाने वालों में कोई भी ऐसा नहीं था जिसकी जुबान पर उसकी तारीफ़ के बोल  हों .. एक बुजुर्ग बोले :" हमारा बच्चा बेहद नेक इंसान है .. यह उन नामुरादों में शामिल नहीं है जिनके सामने थोड़ी सी  दौलत आई नहीं कि उन्होंने अपने लोगों से मुंह फेर लिया।" पर दावत ख़तम होने पर लोगबाग आपस में इस बात पर चर्चा करते रहे कि उनको नहीं लगता था कि बैलट पेपर की इतनी अहमियत होती है ...अब आने वाले चुनाव में वे इसको जाया नहीं करेंगे।  मारकुस इबे भी चुनाव के पूरी तरह से तैयार और मुस्तैद था ..उसने पाँच महीने का वेतन अग्रिम निकाल लिया था और नए चमकते हुए नोटों की गड्डियाँ इकठ्ठा कर रखी थीं।
अपने प्रचार दस्ते के नौजवानों को उसने सुन्दर सा जूट का बैग बनवा कर दिया था। दिन भर वह जगह जगह घूम कर धुंआधार भाषण देता और अँधेरा होने के बाद घर घर घूमकर वोट जुटाने के लिए उसका चुनाव दस्ता सक्रिय हो जाता।जाहिर था रूफ इस दस्ते का सबसे भरोसेमंद कार्यकर्ता था।

" इसी गाँव का एक आदमी देश का मंत्री है ..हमारा अपना लाडला बेटा"...उसने प्रचार के दौरान ओगबेफी एज़ेनवा के घर पर एकत्रित हुए बड़े बूढ़ों के समूह को संबोधित करते हुए रूफ ने कहा .." किसी गाँव के लिए इस से बढ़ के इज्जत की और क्या बात होगी? आपने कभी ठहर का ठन्डे दिमाग से यह सोचने विचारने की कोशिश की है कि हमारे ही गाँव को यह इज्जत क्यों बख्शी गयीमैं आपको एक राज की बात बताता हूँ .. यह गाँव पी पी पी ( पार्टी) नेतृत्व का प्रिय और पसंदीदा गाँव है। हम बैलट पेपर पर इस पार्टी को ठप्पा लगाएँ या  लगाएँ ..जीत तो पी पी पी की ही होनी है ..सरकार तो इसी पार्टी की बनेगी। अब आप गाँव गाँव तक पाइप से पानी पहुँचाने की बात ही लीजिये -- पार्टी ने इसका वादा आपसे किया ही है .."

जब यह बात कही जा रही थी तो उस कमरे में रूफ के अलावा पाँच और लोग थे .. लोगों के बीच धुंआता हुआ हलकी रोशनी फेंकता हुआ एक लैम्प रखा था।लोग एक घेरे में बैठे थे और सब के सामने चमकते कड़कडाते नोटों की एक एक गड्डी  रखी हुई थी ..दरवाजे के बाहर साफ़ आकाश में चाँद अपनी चमक बिखेर रहा था।
हमें तुम्हारी एक एक बात का भरोसा है .." एज़ेनवा ने आश्वस्त करते हुए हामी भरी " हम सब ..एक एक व्यक्ति ..सबलोग मारकुस के निशान पर ही ठप्पा लगायेंगे ..अब भला कौन ऐसा मूरख होगा जो दावत छोड़ कर सूखी रोटी खाने जायेगा। मारकुस को बोल दो कि हमारे वोट ...हमारी बीवियों के वोट भी ...सब उसी को मिलेंगे ..पर हमारी एक गुजारिश है , ये पैसे आज के समय में कम हैं .. इनको बढवा  दो।" यह कहते हुए उसने एक बार फिर से नोटों की गड्डी को उलट पुलट कर देखा कि कहीं वह उनकी कीमत को लेकर कोई गलती तो नहीं कर रहा है।

"बात तो सही है ..इतने पैसे बहुत कम हैं ...यदि मारकुस कोई गरीब आदमी होता तो मैं सबसे पहला आदमी होता जो उसको अपना वोट मुफ्त में दे देता ...पिछली बार मैंने ऐसा ही किया था। पर अब मारकुस दौलतमंद आदमी है सो उसको अपना कद देख कर काम भी करना चाहिए .. देखो , हमने पहले भी अपने लिए कोई मदद उस से नहीं मांगी ...आगे भी नहीं माँगेंगे ...पर आज तो हमारा दिन है ..आज हम जब पेड़ पर चढ़ गए हैं तो बगैर चूल्हे चौके के लिए लकड़ी काटे उतर गए तो हमसे बड़ा नादान भला और कौन होगा?"  

रूफ को बुजुर्गों की बात माननी पड़ी ..अबतक पेड़ की सबसे ज्यादा लकड़ी वो खुद अपने हिस्से में रखता जा रहा था                                
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अभी कल की ही तो बात है , मारकुस की सबसे मँहगी जैकेटों में से एक उसने माँगी थी। पिछले हफ़्ते मारकुस की बीवी ( वही टीचर जिसको लेकर उसकी नौकरी पर बन आई थी) ने रूफ को रोक था जब एक के बाद एक बियर की पाँचवी बोतल उसने फ्रिज से निकालने के लिए हाथ बढ़ाया था ..हाँलाकि सबके बीच में ही उसके पति ने ऐसा करने पर उसको खूब बुरा भला कहा था। बहुत दिन नहीं हुए जब एक विवादित ज़मीन वह अपने नाम लिखवाने में कामयाब हो गया था क्योंकि वह मंत्री की शोफ़र वाली गाड़ी जुगाड़ कर पूरे लाव लश्कर के साथ वहां पहुंचा था। यही कारण था कि बुजुर्गों की लकड़ी वाली बात उसको फ़ौरन समझ आ गयी।
अंग्रेजी में उसने कहा " ऑल राइट" और इबो की बात पर दुबारा आ गया:" अरे छोड़ो भी, छोटी मोती बातों पर विवाद करने का समय यह नहीं है।" वह उठ खड़ा हुआ ,अपने कपड़ों की सलवट सीधी की और बैग के अन्दर हाथ डाल कर कुछ टटोलने लगा।बैग से और पैसे निकाल कर उसने वहां मौजूद सबको ऐसे बाँटा जैसे कोई साधु  अपने थैले से निकाल कर मंदिर का प्रसाद बाँटता है --- पर ये पैसे उसने गाँव वालों की हथेली पर नहीं रखे बल्कि उनके सामने जमीन पर गिरा दिए। अबतक बुजुर्गों में से किसी ने भी जमीन पर रखे नोट छुए नहीं थे -- अब उन्होंने सामने नीचे देखा और इनकार में अपने अपने सिर हिला दिए।इसके बाद रूफ फिर से हरकत में आया -- बैग से और पैसे निकाले और उनको भी पहले से पड़ी नोटों की गड्डी के साथ मिला दिया।
"अब बहुत हो गया" उसने ऊँची आवाज में अपना गुस्सा प्रदर्शित करते हुए कहा हाँलाकि यह असली गुस्सा नहीं था। गाँव के बुजुर्गों को भी मालूम था कि बगैर बदमजगी किये हुए कितनी दूर तक जाया जा सकता है, इसलिए जैसे ही रूफ ने चिढ़ कर कहा कि " अब जाओ ... और मन में आये तो दुश्मनों के निशान पर ही मुहर लगा दो।" तो एक एक कर सबने बारी बारी से उसको शान्त करने के लिए कोमल शब्दों के लच्छेदार भाषण दिए ... जब आखिरी आदमी ने भाषण पूरा किया तो सबने झुक कर सामने जमीन  पर पड़े नोटों की गड्डी उठानी शुरू कर दी।
रूफ ने जिस दुश्मन का जिक्र किया था वह कोई बाहरी नहीं बल्कि चुनाव में पी पी पी की  प्रतिद्वन्द्वी  पार्टी पी ओ पी थी जिसका गठन सागर तट पर रहने वाले कबीलों ने अपने हितों की रक्षा की खातिर किया था क्योंकि उनको लगता था कि वर्तमान शासक पार्टी उनका पूर्ण राजनैतिक,सांस्कृतिक और धार्मिक सफाया करने पर तुली हुई है।हाँलाकि यह सबको मालूम था कि  इस इलाके में उसकी विजय की दूर दूर तक कोई संभावना नहीं  है फिर भी कुछ स्थानीय गुण्डों मवालियों को चुनाव प्रचार के लिए गाडी और लाउडस्पीकर देकर वह मैदान में दिखाई देने का फर्ज निभा रही थी। किसी को यह पक्के तौर पर तो नहीं मालूम था कि पी ओ पी ने कितना पैसा इस गाँव में फूंका है पर प्रचार और शोर देख कर सबका अनुमान था कि यह रकम अच्छी खासी थी। एक बात बिलकुल तयशुदा थी कि इसके लिए प्रचार करने वाले स्थानीय नौजवानों के हाथ तगड़ी रकम आने वाली थी।
रूफ की मानें तो बीती रात तक सब कुछ बिलकुल वैसा ही चल रहा था जैसी योजना बनायी गयी थी। उसके बाद अचानक उसके पास पी ओ पी का कोई नेता पहुंचा -- ऐसा नहीं था कि दोनों एक दूसरे से अपरिचित  थे  --बल्कि उनको एक दूसरे का दोस्त कहना ज्यादा मुनासिब होगा-- पर उनकी यह मुलाकात बिलकुल काम के मद्दे नजर थी।निहायत कामकाजी तौर पर उनके बीच संक्षिप्त बातचीत हुई , एक शब्द भी फालतू नहीं। नेता ने रूफ के सामने नोटों की एक मोती गड्डी रख दी और बोला: "अब हमें तुम्हारा वोट चाहिए".रूफ अपनी जगह से उठा,बिना एक शब्द बोले दरवाजे तक गया और सावधानी से दरवाजा बंद कर के अपनी कुर्सी पर लौट आया। कुछ सेकेण्ड का यह अंतराल रूफ को आगामी नफे नुक्सान का हिसाब किताब करने के लिए काफी था -- जितनी देर वह बोलता रहा उसकी निगाहें सामने जमीन पर रखे लाल लाल नोटों पर लगी रहींरूफ नोटों पर खेत की फसल काटते किसान की तस्वीर देखते देखते कहीं और खो गया था।
"तुम्हें यह तो मालूम ही है कि मैं मारकुस के लिए काम करता हूँ " लगभग फुसफुसाते हुए उसने कहा .."मेरा ऐसा करना अच्छा नहीं होगा ..."
"जब तुम अपना वोट डाल रहे होगे तब मारकुस वहां नहीं रहेगा" हमें आज की रात बहुत सारे काम निबटाने हैं .. बोलो , तुम यह कबूल कर रहे हो या नहीं?"
" यह बात इस कमरे से बाहर तो नहीं जायेगी?" रूफ ने जानना चाहा।
"देखो , हम यहाँ वोटों का जुगाड़ करने आये हैं .. गप्पें मारने  और यहाँ वहां बातें फैलाने"
"" ऑल राइट".. रूफ ने अंग्रेजी में कहा।
नेता ने अपने एक साथी को आँख मारी और फ़ौरन वह लाल कपडे से पूरी तरह से ढँका हुआ डिब्बा लेकर हाजिर हो गया।जैसे ही उसने ढक्कन खोला अन्दर चिड़िया के पंखों के बीच में रखा हुआ जादू टोने वाला एक पत्थर दिखाई दिया।
"ये म्बाता ने तुम्हारे पास भेजा है ...तुम्हें इस तरह के जादू टोने वाले  पत्थर के  बारे में मालूम तो होगा ही .. इसके सामने वादा करो कि मादुका को वोट डालोगे .. यदि तुमने वादा खिलाफी की तो यह पत्थर ही तुम्हारा हिसाब किताब करेगा।"
उस पत्थर को देखते ही रूफ के होश उड़ गए ..वह लगभग बेहोश होने की कगार तक आ गया ..इन मामलों में म्बाता की शोहरत उस तक पहुँच चुकी थी।पर रूफ आनन् फानन में दो टूक फैसला करने वाला शख्स था,उसने मन ही मन हिसाब लगाया कि  चोरी छुपे यदि एक वोट मादुका को दे भी दिया गया तो मारकुस की पक्की जीत पर क्या असर पड़ने वाला है .. कुछ भी तो नहीं।
"मैं अपना वोट मादुका को ही डालूँगा ...जानता हूँ वादा खिलाफी करने पर यह पत्थर मेरा क्या हस्र कर देगा।"
"बिलकुल  सही ...तुम काफी समझदार हो।"नेता ने उठते हुए जवाब दिया जबकि उसका साथी पत्थर को वापस डिब्बे में रख के गाडी की ओर मुखातिब हुआ।
"पर तुम्हें यह तो मालूम होना चाहिए कि मारकुस के रहते उसकी चुनाव में कोई हैसियत नहीं है।"रूफ बोला।
"उसको गिनती के कुछ वोट भी मिल जाएँ तो इस बार के लिए बहुत हैं ..अगली बार हम देखेंगे कि ज्यादा वोट कैसे मिलें ..लोगों तक यह बात तो पहुँचेगी कि मादुका छोटे नोट नहीं बल्कि बड़े नोटों की गड्डियाँ बाँटता है .. लोगों को उनके वोट की कीमत समझने में देर नहीं लगेगी।"
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चुनाव के दिन की शुरुआत .. हर पाँच साल बाद लौट कर आने वाला यह महान दिवस जब आम लोग अपनी शक्ति और अधिकार का प्रयोग करते हैं ... घरों की दीवारों पर, पेड़ के तनों पर और टेलीफोन के खम्भों पर चिपके पोस्टर मौसम की मार सहते सहते बदरंग हो चुके हैं ..जो थोड़े बहुत पोस्टर जवान बचे थे उनपर लिखी इबारत पढ़ कर समझ जाने वाले ग्यानी कम ही थे ... पी ए पी ... पी पी पी ...पी ओ पी ...तमाम पार्टियों को वोट देने की अपील ...
हर बार की तरह अपनी जीत के लिए पूरी तरह से आश्वस्त मारकुस अपना हर काम उसी शान शौकत के साथ कर रहा था ..उसने एक महँगा बैण्ड वोटिंग बूथ से इतनी दूर बुला कर तैयार कर रखा था जिससे कानूनी अड़चन न आये ..अनेक गाँव वासी बूथ तक आते हुए हाथ लहराते हुए अपनी पसंद की पार्टी के गीत गाते चल रहे थे ..रसूखदार मारकुस अपनी चमचमाती हुई हरे रंग की कार के अन्दर शान से पसर कर बैठा हुआ था। ख़ुशी से झूमता हुआ एक एक गाँव वासी कार के पास आया और मारकुस से हाथ मिलाते हुए बोला:" बधाई ".उसका ऐसा करना था कि मारकुस के पास आकर हाथ मिलाने वालों और बधाई देने वालों का ताँता लग गया।
रूफ और उसके संगी साथी पसीने से लथपथ वोटरों को बूथ तक खींच लाने की भाग दौड़ में लगे हुए थे।
" भूलना मत "वह हंसी ठिठोली करती अनपढ़ औरतों के एक झुण्ड को निर्देश दे रहा था "हमारा निशान  है मोटर कार ... उसी पर मुहर लगाना".
" वैसी ही मोटर कार जैसी मारकुस की है ..बाहर वह जिसमें बैठा हुआ है।"
" आप ठीक समझीं काकी ... उसी कार की फोटो पर मुहर लगानी है ...उस कार के साथ ही मुहर लगाने की जगह बनी है" रूफ समझा रहा था .." ध्यान रखना ,दूसरी  जो आदमी के सिर की फोटो है,वह सही आदमियों के लिए नहीं है ..जिनका सिर फिर गया है वह उनके लिए है।" 
रूफ की  यह बात  सुनकर लोग हँस पड़े ..रूफ ने तिरछी  निगाहों से मारकुस की ओर ताका जिस से यह पता लग सके उसकी बात पर उसकी प्रतिक्रिया क्या हुई -- मारकुस की निगाहों में उसके लिए शाबाशी के भाव थे।
"कार के ऊपर मुहर लगाना" रूफ इतनी जोर जोर से यह कह रहा था कि चेहरे और गर्दन की सभी नसें बेतरह उभर आती थीं .." कार को वोट दोगे तो कार पर चढ़ने को मिलेगा ..कार पर मुहर लगाओ".
"चलो हमें कार पर चढ़ने को न भी मिले ...हमारे बाल बच्चों को तो मिलेगा ही" वही औरत मजाकिया लहजे में बोल पड़ी।
तभी बैंड पर नया गाना चालू हो गया .." पैदल चलें तेरे दुश्मन ...मैं तो चढूँगी मोटर कार ..."
ऊपर से बेखबर और आश्वस्त दिखने के बावजूद मारकुस के मन को चैन नहीं पड़  रहा था ..उसको बार बार अखबारों की इबारत याद आती थी कि उसकी रिकार्ड तोड़ विजय निश्चित है पर एक एक वोट का खटका उसको लगा हुआ था ..जैसे ही वोटरों का पहला जत्था निबट के बाहर निकला उसने अपने कार्यकर्ताओं को एक साथ जाकर वोट डालने का हुकुम दिया।
" रूफ , तुम सबसे पहले वोट डालने जाओ" उसने फरमान सुनाया।
रूफ की तो जैसे जान ही निकल गयी ,पर उसने पल भर में ही खुद को संभाल लिया जिस से किसी को खटका न हो।सुबह से ही वह अपने मन की बेचैनी को किसी न किसी ढंग से मुखौटे के अन्दर ढाँपने की जुगत कर रहा था और इसी क्रम में वह ज्यादा से ज्यादा अ सहज होता जा रहा था।फरमान सुनते ही वह बूथ की ओर तीर की गति से चलने को मुड़ा , दरवाजे पर खड़े पुलिस वाले ने नकली बैलट पेपर के लिए उसकी तलाशी ली .. चुनाव अफसर ने दो बक्सों में से किसी एक बक्से में बैलट पेपर डालने की हिदायत उसको दी।अबतक उसकी तीर जैसी गति पर ब्रेक लग गया था .. अन्दर पहुँचते ही अलग अलग बक्सों पर उसको कार और आदमी  के सिर  की फोटो दिखाई दी। अपनी जेब से उसने बैलट पेपर निकाला और उसको गौर से देखा .. भले ही यहाँ उसको देखने के लिए मारकुस खड़ा नहीं था पर उसके मन में एकदम से विश्वासघात की बात आ गयी, मारकुस को वह धोखा कैसे दे सकता था? उसने मन ही मन में ठान ली कि जिस से उसने विरोध में वोट देने के पैसे लिए हैं उसको नोटों की गड्डी वापस करके आएगा ..पर उसको भली प्रकार मालूम था कि अब इस घड़ी पैसे वापस करना संभव नहीं था ..उसने तो जादू टोने  वाले पत्थर के सामने वादा भी किया था ...लाल लाल नोट अब भी उसकी जेब में मौजूद थे जिनपर काम में लगे हुए किसानों की फोटो छपी थी।
रूफ इस उधेड़ बुन में था कि तभी उसको पुलिस वाले की आवाज सुनाई पड़ी ...वह अफसर से दरयाफ्त कर रहा था कि जो बाँदा अन्दर गया था वह इतने देर से बाहर क्यों नहीं निकला?
रूफ ने यह सुना तो बिजली की गति से एक विचार उसके मन में कौंधा ..उसने हाथ में पकडे बैलट पेपर की तहें कीं ..देखते देखते उसने उसको बीच से आधा आधा फाड़ डाला और सामने रखे दोनों बक्सों के अन्दर एक एक टुकड़ा डाल दिया। हाँ ,यह सावधानी उसने जरूर बरती कि उपरी हिस्सा पहले मादुका के बक्से में डाला ..यह बुदबुदाते हुए कि " मैं मादुका को वोट डालता हूँ।"  
वहाँ तैनात कर्मियों ने उसकी ऊँगली पर आसानी से न छूटने वाली स्याही लगा दी जिस से दुबारा वह वोट न आ सके .. रूफ तीर की गति से कमरे से बाहर निकल गया जिस तेजी के साथ वोट डालने बूथ के अन्दर दाखिल हुआ था।
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                             प्रस्तुति : यादवेन्द्र