Saturday, June 5, 2010

कंक्रीट के अन्दर से झांकता गुलाब

तुपाक शकूर (१९७१-१९९६) अश्वेत अमेरिकी  रैप  डांस  के अद्वितीय  कलाकार  के तौर पर जाने जाते हैं, पर उन्होंने अमेरिकी समाज में अश्वेत लोगों को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए बड़े आक्रामक ढंग से काम किया जिसका खामियाजा उन्हें अनेक जेल यात्राओं और गोलियों  से भुगतना पड़ा. उनके एल्बम  की बिक्री ने अपने समय के अनेक कीर्तिमान तोड़े.अपने २५ साल के बेहद छोटे जीवन काल में उन्होंने कई लोकप्रिय  फिल्मों में भी काम किया. उन्होंने छोटी छोटी पर मारक कवितायेँ लिखीं और मृत्यु के इतने दिन बाद भी अनेक स्कूलों और विश्वविद्यालयों में उनकी कवितायेँ पढाई जाती हैं. उनकी प्रकाशित कविता पुस्तक का नाम है द रोज दैट ग्रिऊ  फ्रॉम कंक्रीट. गोली लगने से उनकी मृत्यु १९९६ में हो गयी,पर उसके बाद उनके चार एल्बम निकले जिनकी लाखों की संख्या में बिक्री हुई.यहाँ प्रस्तुत हैं तुपाक की कुछ लोकप्रिय कवितायेँ:        
-यादवेन्द्र

 
     कंक्रीट के अन्दर से झांकता गुलाब 
क्या कभी सुना है कि कंक्रीट के बीच पड़ी दरार से
मुंह निकाल कर खिल पड़े कोई गुलाब?
इसने कर दिया कुदरती कानून को उल्टा पुल्टा
और सीख लिया चलना फिरना पैरों के बगैर ही...
लगे चाहे ये मसखरी जैसा
पर लेना सीख ही गया ये
ताज़ा हवा की सांसें
जिससे खूब प्रशस्त फलें फूलें इसके स्वप्न.
  मुस्कान की शक्ति
बन्दूक की शक्ति ले सकती है कोई जान
और अग्नि की शक्ति से भस्म हो  सकता है कुछ भी
तेज हवा की शक्ति ठण्ड से जमा सकती है
और दिमाग की शक्ति से सीखा जा सकता है कुछ भी..
क्रोध की शक्ति अन्दर की दुनिया मटियामेट कर सकती है
और बिखरा सकती है सब कुछ खंड खंड...
पर मुस्कान की शक्ति ऐसी है...वो भी तुम्हारी..
कि जड़ बन चुके दिलों को भी
छूकर कर सकती है भला चंगा...
मुस्कान कामदेव की
मैं भाग आया बाहर कमरे से
कि बदन पर महसूस करूँ बारिश की बूंदें
और खड़ा रहा वहीँ देर तक...
जब बरस चुका पानी तो झटके से निकल आया सूरज..
इसी को कहते हैं मुस्कान कामदेव की. 
कामदेव की आँखों के आंसू 
जिस दिन तुमने फैसला किया
हो रही हो  मुझसे जुदा
बाहर बरसता रहा धारासार  पानी अविराम...
सचाई तो ये है 
कि मैं बरसात से करता रहा मिन्नतें
उस पल बस  जाये वो
कामदेव की आँखों में
बन कर आंसू...
   
वंशवृक्ष
हम सब कोंपल से  फूटते तो हैं
अलग अलग वृक्षों से
पर इसके मायने ये नहीं कि
हमारी उत्पत्ति में नहीं बरता  गया  था  बराबरी का सिद्धांत... 
मालूम नहीं कि वास्तविक सौंदर्य उस वृक्ष में समाया हुआ है
या उस जंगल में जिसके बीचों बीच ये वृक्ष
लेता रहा है सांसें  
पर वृक्ष को वंशवृद्धि के लिए करनी पड़ती है लड़ाई
खर पतवार की दुष्ट सेना से..
मुझे तो तमाम वजहें दिखती हैं वृक्ष की महानता  की
जो सभी प्रतिकूलताओं को धकेलता हुआ
उचक उचक कर छूने को उद्यत  है आसमान
अंधियारे में भी खिलाता है फूल
और अपने इर्द गिर्द उगाता जाता है उम्मीदों की फसल...
इन्ही खर पतवारों के बीच में हृष्ट पुष्ट  हो रहा है वृक्ष
शर्म से एक बार भी गर्दन झुकाए बगैर
मेरा सिर भी किसी लज्जा से कभी नहीं झुका
मैं तो बल्कि इतरा रहा हूँ
ताबड़तोड़ बढ़ते हुए  इस वंशवृक्ष पर.

 अनुवाद एवं प्रस्तुति - यादवेन्द्र

4 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

सुन्दर…बहुत सुन्दर कवितायें…दिन की शानदार शुरुआत

प्रदीप जिलवाने said...

तुपाक शकुर की कविताओं में उनका जीवन संघर्ष की एक स्‍पष्‍ट झलक मिलती है. कुछ तल्‍खी के साथ. अनुवाद एवं प्रस्‍तुति के लिए यादवेन्‍द्रजी एवं बधाई एवं आभार.

बेचैन आत्मा said...

मैं भाग आया बाहर कमरे से
कि बदन पर महसूस करूँ बारिश की बूंदें
और खड़ा रहा वहीँ देर तक...
जब बरस चुका पानी तो झटके से निकल आया सूरज..
इसी को कहते हैं मुस्कान कामदेव की.
...वाह! बेहतरीन.

हेमा दीक्षित said...

यहाँ तक आना इन कविताओं के हासिल से सार्थक हो गया ...