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Tuesday, February 24, 2026

सिडनी से कैनबरा    दिनेश चन्द्र जोशी

 (दिनेश चन्द्र जोशी ने साहित्य की बहुत सारी विधाओं को साधा है। आजकल वे आस्ट्रेलिया में हैं । ‘लिखो यहाँ वहाँ ’ के लिये उन्होंने यह यात्रा-वृतान्त भेजा है )

  गत वर्ष,दिसम्बर 2025 के आखिरी दिन हम लोग प्रात: सात बजे सिडनी के बाखम हिल क्षेत्र से आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के भ्रमण हेतु निकले।
कैनबरा नाम यहां के मूल निवासी आदिवासी समाज की भाषा से निकला है। जिसका अर्थ है, 'मिलने वाला स्थल'। यहां के 'नगाम्ब्री' व 'न्गुनवाल'
जनजाति के लोग जो यहां पर बीस हजार सालों से रहते आये थे तथा इस जगह पर आपस में किसी समारोह आदि के मौके पर मिलते थे,इसलिए इस स्थल का नाम कैनबरा है।
कुछ बुजुर्ग स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि यह नाम ब्लैक माउंट व ऐंन्सिले पहाड़ियों के बीच की घाटीनुमा जगह होने के कारण स्त्रियों के स्तनों के मध्य स्थल का पर्यायवाची नाम है।
बहरहाल कैनबरा नाम के पीछे जो भी मान्यता सत्य हो,इतना तय है कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक देश से जुड़ा नाम नहीं है, जैसे यहां की पूर्व में प्रस्तावित राजधानी 'ईडन' शहर के बारे में कहा जाता।

सिडनी शहर के उत्तर पश्चिम क्षेत्र से अपने वाहन से चल कर हमें शहर के बाहरी दक्षिण पश्चिम क्षेत्र लिवरपूल तक जाने में लगभग 45 मिनट  का समय लग गया,प्रात: के समय ट्रैफिक कम था। यूं जाम की स्थिति तो दिन के सामान्य समय में कभी नहीं लगती। लिवरपूल नाम इंग्लेंड के शिपयार्ड शहर के नाम से ही लिया गया होगा,क्योंकि यहां आस्ट्रेलिया में कई सड़कों शहरों के नाम मूल ब्रिटेन के नामों से ही लिये गये हैं। सिडनी के इस लिवरपूल में पुराने युरोपियन वास्तु के घरों के साथ नयी बहुमंजिला इमारतें भी हैं। लिवरपूल से 'ह्यूम हाई वे' प्रारंभ होता है जो सिडनी से मेलबोर्न जाने का इनलेंड (गैरतटीय) राजमार्ग है। क्योंकि यह समुद्र तट के समानांतर न जा कर अंदरूनी जमीनी भू भाग से होकर जाता है इसीलिए इसे इनलैंड हाई वे कहते हैं। मैलबोर्न जाने का दूसरा  लोकप्रिय राजमार्ग तटीय इलाकों से होकर जाता है,इसे प्रिंसेस हाई वे कहते हैं। 'प्रिंसेस हाई वे' सिडनी के किंग स्ट्रीट न्यू टाउन से प्रांरभ होकर वूलंगगौंग उपनगर होते हुए अनेक सुरम्य तटीय शहरों से गुजरता हुआ
न्यू साउथ वेल्स राज्य को पार कर विक्टोरिया प्रांत में पंहुचता है। मेलबोर्न विक्टोरिया प्रांत की राजधानी है।
हमें चूंकि कैनबरा जाना था,जो मेलबोर्न की दिशा में ही है,लेकिन समुद्र तट पर स्थित न होकर अंदरूनी भू भाग पर स्थित है,इसलिए 'इनलेंड रुट' से ही कैनबरा जाने वाला राजमार्ग हमने चुना।
लिवरपूल सिडनी शहर का बाहरी छोर है, इसके आगे आधे घंटे की दूरी पर कैंपबैल टाउन उपनगर है। इस उपनगर में से काफी लोग सिडनी में काम काज के वास्ते आते हैं। किराया कम होने के कारण यहां निवास करना आसान है।
कैंपबैल टाउन उपनगर से आगे वास्तविक रूप से 'हाई वे' का अह्सास होता है। यहां हर पांच सौ हजार मीटर की दूरी पर गोल वृत्त से घिरा वाहन का स्पीड इंडीकेटर अवश्य नजर आता है। कैमरे से वाहन स्पीड की निगरानी रखे जाने वाले अलार्म संदेश भी नजर आते हैं।
हाई वे पर अधिकतम गति व न्यूनतम गति प्रति घंटा के निर्देश बोर्ड नजर आये।
कैंपबैल टाउन से आगे,काफी दूर तक आठ लेन हाई वे चलता रहा,आगे चल कर वह चार लेन में परिवर्तित हो गया था। 
ऐतिहासिक बैरिमा टाउन होते हुए हम सूटन फोरेस्ट क्षेत्र को पार कर निर्धारित तेज गति से आगे बढ़ते जा रहे थे। 
बायें हाथ की दिशा में 'इंजर्ड वाइल्ड लाइफ' व  
'पुलिस रडार यूज्ड इन दिस एरिया' के नोटिस बोर्ड लगे नजर आये। 
यह क्षेत्र युक्लिप्टस के जंगलों से युक्त चट्टानों को काट कर बनायी हुई चौड़ी सड़क के इर्दगिर्द ऊंचे नीचे ढालू भू दृश्यों के बाद फिर दूर तक समतल होते चले जाने वाले कुदरती नजारे का लुत्फ प्रदान कर रहा था।राजमार्ग पर जगह जगह वाहनों हेतु रिवाइव,सर्वाइव रैस्ट सेन्टर व रुकने के स्थल भी बने थे। जो हमारे यहां के आधुनिक हाईवेज पर बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं।
बांये हाथ पर 'मौस वेल' व 'वूलंगगौंग' की ओर फटने वाले रास्ते के लिए एक्जिट का बोर्ड लगा देख कर यह भान हुआ की तटीय क्षेत्रों को जाने के कई
सुविधाजनक विकल्प प्रदान कर रक्खे हैं।


इसी राजमार्ग पर आगे चल कर एक घंटे बाद गोलबर्न नाम का ऐतिहासिक शहर आया।
इस शहर को आस्ट्रेलिया के प्रथम इनलेंड (गैरतटीय) शहर होने होने का सौभाग्य प्राप्त है। 1830-33 में शिलान्यास किये गये इस शहर का एक छोटे से अभियुक्त कैंप से शुरु होकर बड़ी खुशहाल आबादी बनने का सफर बड़ा रोचक है। 
1863 में इस कस्बे को प्रथम गैरतटीय समृद्ध शहर के नाम  से दस्तावेजों में दर्ज किया गया। यहां पर विक्टोरियन वास्तु के प्राचीन भवन,गिरिजाघर व डाकघर बना है।
मैरिनो भेड़ के ऊन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र की खासियत के कारण शहर के मध्य में मैरिनो
भेड़ की पाषाण मूर्ति बनी है। किसी भेड़ की विश्व भर में इतनी ऊंची यह अकेली पत्थर की प्रतिमा है।
इसको देखने के लिए खास तौर पर पर्यटक, गोलबर्न में रुकते हैं। हमने भी थोड़ी देर रुक कर मैरिनो के दर्शन किये व उसकी तस्वीर कैमरे में कैद की।
गोलबर्न से कैनबरा की दूरी भी एक घंटे की यात्रा में तय होती है। इस क्षेत्र में ऊंची नीची घाटियां कम हैं,ज्यादातर सपाट समतल रेगिस्तानी झाड़ीनुमा परिदृश्य दिखाई देते हैं।
गोलबर्न से आगे बढ़ते जाने पर मैलबोर्न वाले 'ह्यूम हाई वे' को छोड़ कर कैनबरा की तरफ जाने वाले फेडरल हाइवे की ओर मुड़ना पड़ता है। यहीं से आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी क्षेत्र प्रारंभ  हो जाता है। थोड़ी देर तक चलने के बाद एक बड़ी जल राशि के दर्शन हुए। इस झील के किनारे किनारे का रमणीय पथ बड़ा दर्शनीय लग रहा था। यह झील 'लेक जार्ज' के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट प्रतिनधि जार्ज तृतीत के नाम पर इस झील का नाम रक्खा गया है।
इसी इलाके में विंडमिलों की कतारें भी नजर आई जो बच्चों को बड़ी मनभावन लग रहीं थी।
लेक जार्ज से कैनबरा शहर बहुत पास है। आधे घंटे से भी कम दूरी पर। कैनबरा के पास आने पर हम लोग उत्सुकता से पुलकित हर्षित हुए जा रहे थे। आस्ट्रेलिया के बड़े तटीय शहरों से हट कर यह गैरतटीय राजधानी क्षेत्र था। इसे ए.सी.टी (आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी) कहते हैं,जैसे हमारे भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  को एन.सी.आर कहा जाता है,ठीक वैसे ही।
कैनबरा को आस्ट्रेलिया की राजधानी बनाने से पहले अनेक अन्य विकल्प प्रस्तावित हुए,'ईडन टाउन' इनमें प्रमुख था।
बाद में मैलबोर्न और सिडनी दोनों के बीच राजधानी बनाने को लेकर जबरदस्त खींचतान हुई,अन्तत: इन दोनों बड़े शहरों को राजधानी न बना कर 1908 में कैनबरा को चुन लिया गया,जो इन दोनों बड़े शहरों के लगभग मध्य में स्थित है। एक कटोरेनुमा आकार के अत्यधिक क्षेत्रफल वाले खाली भू भाग,कैनबरा को राजधानी हेतु उपयुक्त पाया गया।
कैनबरा ठंडी जलवायु वाला शहर है। यहां जाड़ों में बर्फीली हवायें चलती हैं,तथा रात्रि में यदा कदा तापमान माइनस में चला जाता है।


हम लोग साढ़े दस बजे कैनबरा पंहुच  गये थे। वहां किंग्सटन एरिया में 'होली डे होम' बुक था, लेकिन आपस में यह तय हुआ कि पहले तीन घंटे बाहर घूम लिया जाय,फिर अपराह्न में वहां जाकर विश्राम करके सायं व रात्रि में बाजार आदि चहल पहल वाली जगहों पर चले जायेंगे।
कैनबरा शहर में प्रवेश करते ही एक खास परिवर्तन यह लगा कि यहां सिडनी के पुराने ढालू छतों वाले विक्टोरियन भवनों से हट कर नये वास्तु के बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली आधुनिक इमारतों की भरमार है।
सुंदर कतारबद्ध पेड़ों से आच्छादित विस्तृत चौड़ी सड़कें,गोलाकार चौराहे,साफ सुथरे,पैदल पथ व साइकिल ट्रैक युक्त फुटपाथों से निर्मित इलाके को देख कर ही लगने लगा था कि यहां राजधानी की जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए सरकारी इमारतों का निर्माण किया गया है।
पार्लियामेंट हाउस,नेशनल लाइब्रेरी,म्यूजियम,वार मैमोरियल,हाई कोर्ट,आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी जैसी महत्वपूर्ण जगहें पास पास में ही पैदल दूरी पर अवस्थित होने के कारण पर्यटकों को घूमने में आसानी प्रदान करने के साथ राजधानी की गरिमा का अह्सास कराती हैं।
यह सब,एक सर्वथा नये क्षेत्र को राजधानी हेतु छांटे जाने के पश्चात प्रख्यात वास्तुविदों द्वारा टाउन प्लानिंग व निर्माण का नतीजा था। कुछ कुछ वैसे ही,जैसे हमारे यहां चंडीगढ़ और लुटियन की नई दिल्ली।
शहर के मध्य में मुख्य क्षेत्र में ऊंचे खंबों पर कतारबद्ध सभी राष्ट्रमंडल देशों के रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे थे। बड़ी सी इमारत के दांयें और बायें भाग में विश्व के लगभग डेड़ सौ देशों के प्रतीक बड़े मनोरम लग रहे थे।
हमने कार पार्क की और उतर कर उस नजारे का लुत्फ लिया। इंडिया का झंडा देख कर हम हर्षित हुए। 'बताओ ऐसा किस देश का झंडा है,जो आयताकार नहीं है?' साथ चल रहे मेजबान सज्जन ने मुझसे पूछा। मुझे ऐसे किसी झंडे का ध्यान नहीं आ रहा। मैने असमर्थता जाहिर की।
फिर उन्हीं झंडों में से एक की ओर इशारा करते हुए,वह बोले,वो देखिये,नेपाल का झंडा बीच से कटा हुआ है। वास्तव में नेपाल का झंडा बीच से कटा था,धार्मिक ध्वजा जैसा।
'अमेरिका,इंग्लैंड,के झंडे के प्रतीक चिह्न याद रहते हैं हमें,ऐन अपने पढ़ोसी का याद नहीं,'मुझे थोड़ा झेंप हुई।
दाहिनी ओर आने पर एक लंबी वर्तुलाकार मनोरम झील के दर्शन हुए। शहर के बीचोबीच बनी यह झील कैनबरा को अद्भुत आकर्षण प्रदान कर रही थी। इसके समानांतर किनारे बने रेस्तराओं पर पर्यटकों की चहल पहल से माहौल गुलजार था।
कैनबरा शहर के बीचोबीच स्थित यह झील वास्तव में एक कृत्रिम झील है। इसका नाम 'लेक ग्रिफिन' है।अमेरिकी वास्तुविद वाल्टर बर्ली ग्रिफिन को कैनबरा के मूल नक्सानवीस व टाउन प्लानर का श्रेय दिया जाता है,जिन्होंने 1907 में अभिकल्पित अपने नक्से में पास में अवस्थित एक नदी पर बांध बनाकर उसके पानी से शहर के केंद्र में 11 किलोमीटर लंबी तथा  लगभग सवा किलोमीटर चौड़ी वर्तुलाकार झील का डिजाइन तैयार किया था। बाद में कतिपय विवादों शंकाओं,संशोधनों की पैरवी व विश्व युद्ध आदि के कारण झील का निर्माण कार्य स्थगित हो गया।
बीसवी शताब्दी के दूसरे तीसरे दशक में पुराना पार्लियामेंट हाउस,सचिवालय भवन,प्रधान डाकघर  बन गये थे लेकिन कैनबरा शहर के आधुनिकीकरण का निर्माण रुका रहा। सन 1960 के पश्चात नयी पार्लियामेंट व सरकारी भवनों  सहित इस झील के निर्माण ने गति पकड़ी।
सन 1964 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राबर्ट मैन्जींज ने निर्णायक कदम उठा कर द्रुत गति से झील का निर्माण पूरा कराया।
इस प्रकार 1907 में वास्तुविद वाल्टर बर्कले ग्रिफिन द्वारा तैयार किये गये मूल मानचित्र में कुछ संशोधनों के साथ अन्तत: यह झील बनी। लेकिन धरातल पर साकार होकर शहर के सौन्दर्य में चार चांद लगाने में इसे पांच दशक से ज्यादा का वक्त लग गया। 
कहा जाता है कि झील का नाम प्रधानमंत्री राबर्ट मैनजींज के नाम पर रखने की कुछ अधिकारियों ने सिफारिश की,लेकिन मैंनजीज ने अपना नाम न रख कर मूल वास्तुविद ग्रिफिन के नाम से ही झील का नामकरण किया। यह एक मिसाल है, मौलिक काम करने वालों को सम्मान अर्पित करने की इच्छा की।ऐसे जेनुइन व ईमानदार राजनेता हमारे देश में चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे।
बहरहाल लेक ग्रिफिन आज कैनबरा शहर की शान है। इसमें नावें,याट,कियाकिंग चलती रहती है। साथ ही फिशिंग के प्वाइन्ट भी हैं।
लेक के समानांतर विस्तृत पार्क हैं,जिनमें  कलात्मक वास्तु के आकर्षण नजर आते हैं।
उस रोज दोपहर में हमने ओल्ड पार्लियामेंट भवन देखा जो अब दर्शकों हेतु म्यूजियम की तरह खोल दिया गया है। गाइड ने बताया कि जब 1907 में यह पार्लियामेंट बनी तब 75 एम.पी.थे,अब वर्तमान में 175 सदस्य हैं जो नये पार्लियामेंट भवन में बैठते हैं। पार्लियामेंट की गोलाकार खाली पड़ी सीटों पर बैठ कर हमें भी ऐतिहासिक गौरव का अह्सास हुआ। उसके पश्चात हम लोग पास में ही स्थित नेशनल लाइब्रेरी देखने गये। यह भव्य इमारत भी दर्शनीय है। भीतर कई मंजिलों में शांत विशाल हाल की रैकों में हजारों पुस्तकों को करीने से सजाया गया है। बैठ कर पढ़ने के लिए गोल मेजें व कुर्सियां रक्खी हैं। हर खंड के पास सहायता हेतु हैल्प काउंटर व डेस्कों में तत्पर विनम्र प्रतिनिधि बैठे मिले। बहुत बुजुर्ग प्रोफेसर नुमा विद्वानों सहित युवा शोधार्थी लाइब्रेरी के शांत वातावरण में ज्ञान पिपासा शांत करते नजर आये।


 

नेशनल लाइब्रेरी आफ आस्ट्रेलिया का भवन

 


दोपहर के बाद हम लोगों ने  किंग्सटन स्थित अपने 'होली डे होम में'  विश्राम किया। 'होली डे होम' की बालकनी से भी सुरम्य झील का एक हिस्सा इमारतों के बीच से आंख-मिचौली करता झांक रहा था।
दो ढाई घंटे आराम करने के बाद फिर कैनबरा की सांध्य व नाइट लाइफ देखने निकल पड़े। पैदल दूरी पर ही स्थित झील पर बने लकड़ी के पुल पार करते ही दाहिनी ओर की दिशा में  कतारबद्ध रेस्तराओं के खुले बरामदों में पर्यटकों व स्थानीय लोगों की पार्टियों का दौर परवान चढ़ाने लगा था। ऊंची ऊंची गोलाकार कुर्सी  मेजों में बैठ कर झील की ओर मुखातिब होते हुए वाइन के गिलास हाथ में लिये युवक युवति


यों सहित बुजुर्ग ही नहीं,अति बुजुर्ग महिला पुरुषों के समवेत स्वर गुंजायमान हो रहे थे। ऐसा लग रहा था,जिंदगी की सारी जद्दोजहद और चिंताओं को दूर झटक कर ये लोग सिर्फ व सिर्फ वर्तमान क्षणों का आनंद ले रहे हैं तथा अपने पसंदीदा पकवानों के साथ बीयर,वाइन आदि पेयों का दिव्यानंद प्राप्त कर अतंरग वार्तालाप में मशगूल हैं। अकेले दुकेले कम तीन चार के ग्रुप मे बैठै,  हंसते,मुस्कराते,ठहाकेदार वार्तालाप करते लोगों की शाम,अंधेरा घिरते घिरते पूरे शबाब पर पंहुच रही थी,झील के किनारे किनारे फुटपाथ पर चलते हुए मुख्तलिफ देशों के रेस्तराओं की कतार के बीच हमें इंडियन व गुरखा नेपाली रेस्तरां नजर आये। गोरखा रेस्तरां के वेटर-मैनेजर नेपाली टोपी पहने हुए अलग से पहचान में आ रहे थे।
कैनबरा में नेपाली समुदाय के काफी लोग दिखाई दिये। यूं तो पूरे आस्ट्रेलिया में नेपाली लोग अपने देश की आबादी के अनुपात में काफी हैं।  ब्रिटेन की रायल गोरखा बटालियन के कारण भी संभवत: इस देश में इनका अप्रवासन हुआ होगा।
हमने इंडियन रेस्तरां में ठेठ उत्तर भारतीय पंजाबी स्वाद का खाना खाया। मेक्सिकन ,थाई व चायनीज श्रीलंकन फूड के रेस्तरां भी हर जगह मौजूद रहते हैं। 
खाना खा कर हम लोग यहां के लकदक,भव्य बाजार यानी बूंडा स्ट्रीट गये। सेंटर में बड़े आधुनिक फैशन शो रूम, बुटीक मंहगे होटल,रेस्तरां,बार,पब आदि हैं।
रात में होली डे होम में आकर हमने आज छूट गयी जगहों की सूची बनायी और आज की सैर के नजारों से मुग्ध होते हुए आराम से सो गये।
सबसे अच्छी बात यह लगी कि बड़ा कैपिटल शहर होते हुए भी तीन चार किलोमीटर के दायरे में ही सारे स्थल मौजूद हैं। सरकारी कार्यालय,स्मारक,बाजार माल,पर्यटक केंद्र,पार्क व लेक। इतनी पास कि पैदल चलते हुए भी आराम से घूमा जा सके।
अगले दिन प्रात: 'होली डे होम' के अपार्टमेंट की बालकनी में बैठ कर बाहर का नजारा लिया तो सामने ग्राउंड में बने पार्क में सिर पर हैट पहने दो बुजुर्ग दिखे। वे पेवमेंट के इर्द गिर्द की सफाई के साथ सूखे पेड़ पौधों की सिचाई कर रहे थे। पार्क के एक छोर को,झील के बैक वाटर से मिला कर तालाब बना दिया गया था,उसमें बतखें अन्य पक्षी व जलीय वनस्पतियां मिल कर बड़ा सुंदर दृश्य रच रहीं थी। हाथ में ग्लव्स पहन कर बुजुर्ग महिला कूड़ा करकट उठा कर उसे एक पालीथीन में भर रही थी। बुजुर्ग 'जेट' से सिचाई कर रहे थे। आधा पौन घंटा उन्होने यह स्वैच्छिक सामाजिक कार्य किया,फिर एक छोटी सी ह्वील ट्राली में पाइप,पोर्टेबल पंप आदि लेकर अपने अपार्टमेंट की ओर चले गये।
उनका यह रोज का या साप्ताहिक रुटीन होगा।जीवन की सार्थकता के ऐसे प्रेरणादायी दृश्य देखकर मन तरल हो गया। ऐसे स्वैच्छिक काम करते अन्यत्र भी यहां लोग,खास तौर पर बुजुर्ग दिखाई जाते हैं। हमारे देश में ऐसा काम करने पर लोग उपहास करने लगते हैं।
'होली डे होम' के सुविधा सम्पन्न किचन में स्वयं नाश्ता तैयार कर हम लोगों ने नाश्ता किया और भ्रमण हेतु निकल पड़े।
आज के भ्रमण हेतु,नेशनल म्यूजियम,नेशनल गैलरी,वार मैमोरियल सहित अन्य आउटडोर जगहें भी प्रस्तावित थी।
म्यूजियम वास्तव में भव्य था। आदिवासी जनजीवन की झलकियों सहित नवनिर्माण की विरासत भी संजोई थी। नेशनल गैलरी,त्रिभुजाकार
ज्यामिति वास्तु पर आधारित विस्मित करने वाली इमारत है। इसके तलों में बनी सर्पिलाकार गैलरियों में स्थानीय व विश्व भर के कलाकारों की डेड़ लाख से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गयी हैं। 
वार मैमोरियल एक पहाड़ी की तलहटी में बना है।
उसको देखने भी पर्यटक आवश्यक रुप से आते हैं।
इसमें प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध सहित शांति सेना व सभी सैनिक अभियानों में प्राण गंवाने वाले योद्धाओं के नाम अंकित है। सैन्य अभियानों के कारण हताहत हुए आम नागरिकों का भी उल्लेख कर उन्हें भी श्रद्धांजलि दी गयी है। एनजैंक (आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड आर्मी कार्र्पस) दिवस परेड भी यहां हर साल 25 अप्रैल को आयोजित की जाती है।
एक खास बात यहां यह भी देखी कि राजधानी के अतिरिक्त छोटे छोटे शहरों व कस्बों में भी आवश्यक  रुप से वार मैमोरियल बने हैं,जो  काउन्सिल क्षेत्र के अन्तर्गत विभिन्न युद्धों में शहीद हुए स्थानीय सैनिकों की स्मृति में बने हैं। उनका रखरखाव व स्वच्छता का ध्यान काउन्सिल सहित पर्यटक स्वयं भी रखते हैं।
वार मैमोरियल के दर्शन के पश्चात माउन्ट एन्सिली पहाड़ी की चोटी तक का ड्राइव वाला लुभावना सफर तय किया। ऐसा लग रहा था जैसे हम अपने यहां उत्तराखंड की हल्की चढ़ाई वाले स्थल पर आ गये हैं। 850 मीटर की उंचाई पर स्थित इस ऊंचे 'लुक आउट' से कैनबरा शहर का विहंगम दृश्य बड़ा मनोहारी लगता है। ग्रिफिन लेक,दोनों पार्लियामेंट हाउस,वार मैमोरियल सहित सभी भवन,चौराहे,सड़कें व हरियाली 
दिखाई देती है। इस दृश्य  को देख कर ऐसा आभास होता है,जैसे वास्तुविद ग्रिफिन के बनाये नक्शे की कागजी अनुकृति साक्षात मूर्तिमान हो उठी हो। यहां से हमने शहर के विहंगम  मनोरम दृश्यों को मोबाइल कैमरे में कैद किया तथा वीडियो बनाये।
खूबसूरत माउन्ट एन्सिली की सैर के बाद हम लोग नेशनल आर्बोरिटम देखने गये। बोनसाई प्रजाति के पेड़ों सहित विविध जलवायु के वृक्षों की नर्सरी, पैदावार, संरक्षण के आश्चर्यजनक कारनामे यहां देखने को मिले। शहर के केन्द्र से छह सात किलोमीटर की दूरी पर 250 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह ढालूदार वनस्पति उद्यान एक माया लोक सा अद्भुत नजारे का आनंद प्रदान करता है। 40000 से अधिक दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां यहां मौजूद हैं।  उद्यान की सबसे ऊंची भूमि पर बने पौली हाउस में बोनसाई व पेन्जिंग प्रजाति के वृक्षों का म्युजियम, क्यूरेटरियम,विक्रय केन्द्र व गिफ्ट शाप है। बोनसाई प्रजाति के 70 से अधिक बृक्षों का आकर्षक संग्रह चकित करता है।
इस उद्यान का सबसे आकर्षक व मनोरंजन का केन्द्र है,यहां का भव्य कैफेटोरिया। शिखर पर स्थित इस कैफेटेरिया के 'सन रूफ' से झांकती रोशनी के तले,ग्लास वाल से अंदर बैठे बैठे उद्यान का विहंगम नजारा लिया जा सकता है। हमने भी वहां बैठ कर कौफी पी व स्नेक्स लिए और काफी देर तक खूबसूरत दृश्यों का आनंद लिया। केफेटेरिया के विशाल हाल में सकून से बैठै पर्यटक, प्रकृति का आनंद लेते हुए गपशप करते प्रफुल्लित नजर आये 
हमने फिर गाड़ी में बैठ कर समूचे उद्यान का भ्रमण किया। हिमालयन सीडार (देवदार) वृक्षों का जंगल बड़ा सम्मोहक लग रहा था। लेकिन अपने उत्तराखंड के घने और ऊंचे देवदारों के सामने वे कम ऊंचाई के दोयम ही नजर आ रहे थे।
एक और अचम्भित करने वाली बात  यह लगी कि इतने बड़े भ्रमण के दौरान सरकारी इमारतों,सार्वजनिक स्थलों,सड़कों चौराहों पर हमें कहीं भी वर्दीधारी पुलिस,दरबान या गार्ड नजर नहीं आये,यह रहस्य अनसुलझा ही रहा कि कैसे इतने शांतिपूर्ण व्यवस्थित तरीके से बिना सुरक्षा के शहर का संचालन होता है,संभवत: चुपचाप कैमरों से निगरानी हो रही होगी। कहीं भी पहचान-पत्र,पासपोर्ट दिखाने या नाम पता मोबाइल नम्बर आदि दर्ज कराने को नहीं कहा गया।
उस रोज का हमारा भ्रमण का कोटा समाप्त हो गया था।
हम लोग शारीरिक रुप से थक गये थे लेकिन मानसिक रूप से परम आनंदित पुलकित थे

 अगले दिन हमें सिडनी लौट जाना था। इसलिए नाश्ते के बाद अगले दिन पूर्वाह्न में हमने कार में बैठे बैठे चक्कर लगाते हुए बार पुन: कैनबरा शहर के सिविक सेंटर मार्केट की चहल पहल देखी।

सेंट्रल प्लाजा में आस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध चिड़िया 'मैगपाई' की बड़ी सी ऊंची मूर्ति एक प्लेटफार्म के ऊपर बनी देखी। 'बिग स्वूप' के नाम से विख्यात यह वास्तु कला पर्यटकों को आकर्षित करने तथा पक्षियों के प्रति सम्मान व प्रेम को प्रकट करने का नायाब उदाहरण लगी। मैरिनो भेड़ की मूर्ति के बाद यह पक्षी की प्रतिमा। यहां महान व्यक्तियों,नेताओं  के स्टेच्यू,पार्क चौराहों आदि में नहीं दिखे जैसे हमारे देश में बहुतायत में मिल जाते हैं।
अब हमारे भ्रमण का आखिरी मकसद बचा था,एक बार यहां के भारतीय दूतावास व अन्य दूतावासों को बाहरी बाहर देखते हुए एम्बैसी एरिया का नजारा लेने के बाद सिडनी को जाने वाले हाई को पकड़ना ताकि अपराह्न में हम आराम से सिडनी स्थित निवास में पहुंच जायें।
बिना जाम की खूब खुली चौड़ी सड़कों में कार  चलाते हुए हम यारामूला क्षेत्र के 'डिकिन' में स्थित दूतावास वाले इलाके में पंहुच गये। यह शांत भव्य इलाका विभिन्न देशों के स्थानीय वास्तु प्रतीकों से सुसज्जित उच्चायुक्त भवनों की खूबी के लिए प्रसिद्ध है। भारतीय दूतावास, यू.एस.ए. दूतावास के बगल में था,लोग हम इस बात से हर्षित हुए। 
चीनी दूतावास तथा न्यू पापुआ गिनी के दूतावास अपनी विशिष्ट वास्तु छटा से सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहे थे। अपने देश सहित,पास पास सटे लगभग पचास से अधिक देशों के दूतावास भवनों की छवि को निहार कर हम अपने गंतव्य की ओर चल निकले। राजधानी से बाहर निकलते ही हमने सिडनी की ओर जाने वाली सड़क पकड़ ली।
लेक जार्ज झील के तट से होकर लौटने के पश्चात गोलबर्न शहर के मध्य से गुजरते हुए,कैनबरा भ्रमण की संचित यादों से सम्मोहित,प्रफुल्लित हम चार घंटे का सफर तय कर शाम को सिडनी के बाखम हिल स्थित अपने निवास पर पंहुच गये।


Sunday, September 28, 2014

नन्दा राजजात के फलितार्थ

(हाल ही में संपन्न हुई नन्दा राजजात यात्रा को लेकर मीडिया में खूब चर्चा रही .दिनेश चन्द्र जोशी ने इस आलेख में राजजात यात्रा के आयोजन को लेकर कुछ जरूरी सवाल उठाये हैं जो एक लोकधर्मी सांस्कृतिक यात्रा को आडंबरपूर्ण उत्सवी माहोल में बदलने से उत्पन्न संकटों की ओर संकेत करते हैं)

दिनेश चंद्र जोशी


उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में चल रही नन्दा राजजात यात्रा अब लगभग सकुशल सम्पन्न हो चुकी है। लगभग, इसलिये कहना पड़ रहा है कि मौसम की मार व अति दुर्गम मार्ग के कारण समय समय पर अनिष्ट की आशंका बनी रही,ऊपर से अनियंत्रित भीड़ का जमावड़ा पुलिस प्रशासन के लिये चिन्ता का कारण बना। कुछ लोगों के वापिस घर न पहुचने व लापता हो जाने की खबरें भी आ रही हैं।
बहरहाल अपनी हर साल की बाढ़, भूस्खलन, आपदा जैसी स्यापा प्रधान खबर से हट कर इस वर्ष की यह उत्सवधर्मी घटना कही जा सकती है। नन्दा राजजात की अर्थवत्त्ता से प्रदेश के बाहर वाले क्या, यहीं के बहुसंख्य जन अनभिज्ञ थे। इसका कारण एक तो बारह वर्ष पश्चात इसका दुबारा आयोजन होना तथा एक सीमित भूगोल के वासियों द्वारा इसमें शिरकत करना माना जा सकता है।
एतिहासिक रुप से यह यात्रा सातवी शताब्दी पूर्व के पाल राजवंशी राजा शालिपाल के समय से प्रचलित है। कन्नौज के राजा जसधवल का लावलश्कर के साथ इस यात्रा में शामिल होने, पातर (नर्तकियों) नचाने तथा मौसम की मार के कारण सैकड़ों लोगों के काल कवलित होने के संदर्भ इतिहास में मिलते हैं।रुपकुंड में पाये जाने वाले नर कंकालों को भी उस घटना से जोड़ा जाता है। बीच बीच में कुछ समय के लिये बाधित होकर ब्रिटिश काल में भी एशिया  महाद्वीप की यह सबसे दुर्गम ऊचाई वाले पथ की 280 कीलोमीटर लम्बी सांस्कृतिक धार्मिक यात्रा अनवरत चल रही है।
इधर राज्य निर्माण के पश्चात पिछले वर्ष 2013 की यात्रा को आपदा के कारण स्थगित करके इस वर्ष 2014 में सम्पन्न किया गया। नये राज्य के नव उत्साह व मीडिया की सक्रियता के कारण यह यात्रा बेहद ग्लैमरस नजर आई। पिछले दो तीन वर्षों से राजजात आयोजन समिति के गठन, पुनर्गठन तैयारियों व आर्थिक, प्रशासनिक प्रबन्धन की खबरें समय-समय पर आती रही। इन्ही तैयारियों के फलस्वरूप इस वर्ष की यात्रा के शुभारम्भ पर चढ़ावा व श्रीफल राष्ट्रपति महोदय के कर कमलों से प्रदान करवा कर समिति ने यात्रा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास किया।
राजजात समिति में वर्चस्व किन विचारधाराओं का रहा , यह तो नहीं कहा जा सकता पर, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को खास तवज्जो नहीं मिली, ऐसा सुनने में आया। राज्यसभा सांसद तरूण विजय का नाम बार बार आता रहा, अलबत्ता राष्ट्रपति महोदय द्वारा श्रीफल प्रदान करवा कर इसे गैर राजनैतिक रंग देने की नीति संतुलित कही जा सकती है,वरना कहीं मोदी जी के हाथों यह काम करवा दिया जाता तो बात बिगड़ सकती थी।
        बहरहाल राजनैतिक मंतव्य चाहे जो रहे हों, अब यात्रा सकुशल संपन्न हो चुकी है, यह राहत की बात है। गोया बेदनी बुग्याल जैसी 15000 फिट की दुर्गम ऊंचाई में 50,000 यात्रियों के जमावड़ा लगने के बावजूद आंधी, तूफान,वर्षा व हिमपात के कोप का प्रचन्ड रूप न लेने की सुखदायी धटना सांसतभरी है।
पर, क्या इतनी ऊंची दुर्गम लोक यात्रा में इतनी अधिक भीड़ जुटनी या जुटाई जानी चाहिये? जबकि  एक महाविनाश की त्रासदी अभी स्मृतियों में बिल्कुल ताजा है। उस त्रासदी से सबक लेने के बजाय इस भीड़ आकर्षण को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है ,यह बात समझ से परे है। इसके पीछे फेसबुकवादी व्यक्तिगत मीडिया से लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय यहां तक कि विदेशी मीडिया भी सक्रिय हो गया था। लिहाजा एक निहायत शान्त, शालीन,एकाकी व भव्यताविरोधी आस्था पर्व को रैलीनुमा  भीड़ में तब्दील कर दिया गया। ऐसी खबरें भी आ रहीं हैं कि कुछ लोग घर नहीं लौटे, लापता हो गये हैं। लोकपर्व के बाजारीकरण  की ऐसी पराकाष्ठा आखिर हमें कहां ले जायेग! इस प्रचारवादी नीति से न तो उत्सवों की मौलिकता बचेगी और न ही पावनता, शुचिता। उत्साहीजन कहेंगें कि क्या बिगड़ गया, पहाड़ों के उजड़े गांवों के लोग अपने घर लौटे, दिल्ली,मुम्बई व विदेशों से भी प्रवासीजन तथा पर्यटक इस यात्रा में शामिल होने पंहुचे,पहली बार। यह खाये पीये, अघाये प्रवासियों का नोस्टलजिया बहुत भावुकतापूर्ण होता है, वे आते हैं तो अपनी कुल देवी या देवता को पूजने,ताकि अनिष्ट से बचें रहें; गांवों की दुर्दशा को सुधारने या वहां बसने-बसाने की उनकी कोई मंशा नहीं होती ।उल्टा वे पहाड़ों के धूसर उजड़े गांवों व सुरम्य प्रकृति पर फिल्म,वीडियो आदि बना कर अपना निजी स्वार्थ साधते हैं।        
           यह सच है कि नन्दा मघ्य हिमालय के सीमान्त जिलों व उससे सटे जनपदों के जनमानस की जातीय चेतना में सदियों से रची बसी एक बेहद अलौकिक आस्था की प्रतीक है। पर्वतीय अंचलों के बच्चे होश संभालते ही नंदा देवी, नंदाष्टमी,नैनादेवी नाम के मन्दिरों व मेलों से परिचित होते हैं। भूगोल की जानकारी होने पर उनका त्रिशूल,पंचचूली के साथ नन्दादेवी नाम की उच्च हिमालयी चोटी से भी परिचय होता है। इस दृष्टि से नन्दा राजजात के प्रति जन मन में औत्सुक्य व उत्साह का संचार होना लाजमी है।
        नई पीढ़ी का वास्तव में इस शब्द ने इस बार पहली बार ध्यान खींचा है, इसे मीडिया का प्रभाव मान सकते हैं।राजजात के अर्थानुसार तो यह राजजात्रा अथवा राजाओं की यात्रा ही थी। इसमें कुंवर ,कत्यूरी, पंवार, चन्द वंशीय राजाओं के वंशजों,  क्षत्रियों व ब्राहमण कुलपुरोहितों की भागीदारी होती है, निम्न जातियों व ,दलितों की भूमिका का कोई जिक्र नहीं होता। होता भी होगा तो वह ढोल दमुआ,,रणसिंघा बजाने वाले बाजियो के रूप में या दोली ढोने वाले कहारों के रूप में, संभवतः डोली भी उनको स्पर्श नहीं करने दी जाती है। इस लिहाज से यह राजकुलीन भद्र सामन्ती यात्रा है। समय के अनुसार इसमें कितना बदलाव आया; आया या नहीं, यह भी विचारणीय प्रश्न है।
नन्दा की डोलियों, छतोलियों के अनेक समूहों के सम्मिलन स्थलों ,गांवों में उनके पहुंचने पर पसुवा, जागर,अवतार देवी देवता अवतरण जैसी आदिवासी अवैज्ञानिक अन्धविश्वासी रीतियो, पद्धति्यों का इस यात्रा में जम कर संवर्घन संरक्षण हुआ जो किसी मायने में लोक हितकारी नहीं है। ऐसी प्रथाओं से नई पीढ़ी का जितना कम परिचय हो उतना अच्छा है।
        नन्दा को मायके भेजने के भावुकतापूर्ण लोकगीत व महि्माओं के सामुहिक रुदन के दृश्य एक और जहां पहाड़ की परिश्रमी नारी के स्नेहसूत्र व भावविह्वलता को दर्शाते हैं वहीं यह प्रश्न भी छोड़ जाते हैं कि सीमान्त पर्वतीय नारी आखिर कब तक इतनी भावुकता ढोती रहेगी।
यद्यपि इन्हीं नारियों के बीच से बछेन्द्री पाल व चन्द्रप्रभा ऐतवाल जैसी साहसी पर्वतारोही महिलायें भी उभर कर आई हैं। अब वक्त आ गया है, बहुत प्राचीन भावुकतापूर्ण मिथकीय प्रतीकों के बजाय ठोस आधुनिक प्रगतिशील नन्दाओं  के प्रतीकों का प्रचार प्रसार किया जाय और परम्परागत राजजात को अल्प तामझाम व एकान्तप्रियता के साथ ही सम्पन्न किया जाय।
ताजा खबरें आई हैं कि इस यात्रा की भीड़ में यारसागम्बू जड़ी(कीड़ा जड़ी) के दोहन करने वाले माफिया भी शरीक हो गये थे जो बेदनी बुग्याल के आसपास अपने अभियान में लिप्त पाये गये। भीड़ , प्रचार व बाजारवादी यात्रा में ऐसा होना तय है, चाहे वह बद्री केदार की धार्मिक यात्रा हो अथवा नन्दा राजजात की लोकधर्मी संस्कृतिक यात्रा।
पारिस्थिकी व पर्यावरण पर इस भीड़ का कितना दुष्प्रभाव पड़ा यह तो बेदनी बुगयाल के रौंदे गये चरागाह बयान करेंगें।
एकमात्र मूक प्राणी , चारसिंघा खाड़ू (चार सींग वाला बकरा) जोकि यात्रा की अगुवाई करता है तथा अन्त में निर्जन हिमघाटी में अकेला छोड़ दिया जाता है, पर क्या बीतती होगी । लगता है मेनका गांधी के पी. एफ. ए. को इस निरीह प्राणी के साथ हुए अन्याय की खबर नहीं हैं।
भीड़ व बाजार के केन्द्र पहले चौरस घाटियों ,मैदानों के समतल हाट मेले हूआ करते थे। अब राज्य निर्माण के
पश्चात एक और विकृति आ गई है कि शान्त उच्च हिमालयी स्थलों, बुग्यालों, चोटियों में भी हो हल्ला हुड़दंग से भरपूर धार्मिक सांस्कृतिक राजनैतिक आयोजन सम्पन्न किये जाने लगे हैं, जिससे पहाड़ के पर्यावरण के साथ साथ सामाजिक ताने बाने को भी क्षति पहुंच रही है।
पहाड़ अपने स्वाभाविक रूप में अतिविकसित होने व अति जनभार को वहन करने के काबिल नहीं हैं, उनके विकास का माडल संतुलित,शान्त, एकाकी, पुरानी ग्राम बसाहटों के स्वरुप के अनुकूल होना चाहिये। राजधानी, केबिनेट मीटिंग और सरकार की रैलि्यों से पहाड़ की शान्ति व  एकान्तप्रियता भंग हो यह कौन न चाहेगा ?

Tuesday, February 5, 2013

दिनेश चन्द्र जोशी की कविता



धारकोट

शहर की आरामतलबी व एकरसता से ऊब कर

हम ट्रेकिंग पर निकल पडते हैं पास की

छोटी-छोटी पहाडियों की ओर



पक्के रास्ते को छोडकर पकडते हैं कच्चे रास्ते

और फिर पगडंडियां थामे चढ़ाई चढ़ने लगते हैं

अपने शरीर की सामर्थ्य जांचते हुए



गांव, खेत, जंगल,नदी, खाले पार करते हुए हम कोसते

 हैं शहर की भीड और शोरगुल को

राहगीर जो मिलते हैं इतने निर्जन पथ पर इक्का-दुक्का

उनका अभिवादन और प्रेम देखकर हमारा पथराया हुआ

 दिल पिधल उठता है

रास्ते में मिलती हैं घास का बोझा लाती हुई युवतियां

कहती हैं ,भाई जी नमस्ते

बस्स,थोडी सी ओर चढ़ाई है,फिर आ जायेगा धारकोट

हम भीतर तक धुल जाते हैं,बहिनों ,बेटियों के श्रम,सौंदर्य

व अभिवादन से



उधर अखबारों में दिल्ली रेप काण्ड का हाहाकार मचा है

टी वी पर चर्चा जारी है

हम सोचते हैं दिल्ली में क्या हो गया ऐसा

क्यों छा गयी इतनी विकृति,इतनी क्रूरता

इतनी हिंसा , लोगों की चेतना पर

यहां धारकोट में तो ऐसा कुछ भी नहीं