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Friday, July 24, 2026

यात्रा संस्मरण : दिनेश चंद्र जोशी



 

 


 

 
(दिनेश चन्द्र जोशी का एक संस्मरण ‘सिडनी से केनबरा’ इस ब्लॉग में प्रकाशित हो चुका है। इस बार वे लखनऊ को  एक नये अन्दाज में याद कर रहे हैं. इसमें उनका व्यंग्यकार भी यात्रा के बीच कभी कभी अपनी झलक दिखा जाता है ) 
 

            बेगाना शहर

 

          
मशहूर शायर हसरत मोहानी की पंक्तियां अक्सर जेहन में घुमड़ती रहती हैं,

'भुलायी न जा सकेगी कभी 
हसरत इसकी तल्खी
वो लखनऊ की शामें वो मुलाकातें।'

और भी

'कशिश ए लखनऊ अरे तौबा!
फिर वही हम,वही अमीनाबाद।'
'यगाना चंगेजी'

इस बार मैने खुद अपने अशआर कहे,लगभग पचास साल पहले के अपनी किशोरावस्था व युवावस्था के दिनों में अजीज रहे शहर लखनऊ के बारे में।

'मैने क्या छोड़ा तुझे लखनऊ 
तू इस कदर बेगाना हुआ कि 
मुझे अब पहचानता नहीं।'

सचमुच लखनऊ ने इस बार मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। या कि उसकी शक्ल इस कदर बदल गई थी कि मैं ही उसके पुरानी सड़कों, गलियों दरो दीवारों को ढूंढने की असफल कोशिश करता झुंझलाता व खींजता रहा था।
पहले तो बेगानापन वहीं से शुरू हो गया जब ट्रेन के रुट में बदलाव के कारण हमारी ट्रेन चिरपरिचित चारबाग स्टेशन न रुक कर आलमनगर स्टेशन पर रूकी और लखनऊ की सारी  सवारियों को वहीं उतरना पड़ा।
आलमनगर से मेरा ज्यादा वास्ता पचास साल पहले भी नहीं रहा,जब मैं लखनऊ में पढ़ता था,किशोर और जवान वहीं हुआ। हां, नाम जरुर सुना था,आलमनगर का। जानकीपुरम, तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र में तब शुरुआती बसाहट निर्मित होने लगी थी। बेरोजगारी के दिनों में तालकटोरा में नौकरी ढूंढने की सलाह मिलने लगी थी।
मेरा वास्ता अपने रिहाइशी इलाके गोमती पार के  निशातगंज,महानगर, बादशाह नगर,अलीगंज चांदगंज,निरालानगर,बाबूगंज डालीगंज से अधिक था।
ट्रेन से उतरने के बाद ओटो वाले ने जिस रुट से हमें आधे घंटे में अपने गंतव्य अलीगंज के चर्च रोड की देवलोक कालोनी में पंहुचा दिया उसका शुरुआती  हिस्सा स्टेशन के बाद जानकीपुरम मुहल्ले से गुजरता हुआ लंबे फ्लाई ओवर ब्रिज को पार कर एक पतली ऊबड़खाबड़ गली थी,जो घनी मुस्लिम बस्ती प्रतीत हो रही थी, उसका शार्ट कट लेकर ओटो वाले ने हमें मेन रोड पर पंहुचा दिया,जो मेरी परिचित थी,मेडिकल कॉलेज से डालीगंज पुल को जाने वाली सड़क। मुस्लिम बस्ती वाली गली के बारे में पूछने पर आटो वाले ने सिर्फ इतना बताया,ये इमामबाड़े के पीछे वाला इलाका है,आप चिंता मत करो मैं अभी लिए चलता हूं आपको डालीगंज बाबूगंज होते हुए अलीगंज।
बचपन में मैं इमामबाड़ा तो कई बार आया था,साइकिल से दोस्तों के साथ। लेकिन उसके पिछवाड़े की इस गली को नहीं पहचान पा रहा था। शहर अपने मुख्य चेहरे के पीछे कितने और चेहरे छिपाये रखता है,इसका अह्सास आज वरिष्ठ नागरिक हो जाने के बाद वर्षों पहले के अपने रिहाइशी शहर की धमनियों को तलाशने की जिज्ञासा और उत्साहवश हो रहा था।
डालीगंज पुल के बाद तो मैं,साथ बैठी पत्नी को गाइड की तरह बताने लगा, ये देखो पुराना डालीगंज बजार है,इसी रास्ते से हम लोग साइकिल
चलाते हुए जुबली इंटर कालेज में पढ़ने आते थे,महानगर से। कम से कम आठ दस किलोमीटर तो होगा ही सिटी स्टेशन के पास स्थित तब के लखनऊ का प्रसिद्ध राजकीय इंटर कालेज।
पत्नी लखनऊ से ज्यादा परिचित नहीं थी,उसका मायका इलाहाबाद था। वह बड़े गर्व से इलाहाबाद के अपने क्रास्थवेट स्कूल के किस्से सुनाया करती थी। आज मैं उसे साक्षात अपने स्कूल की छवि व वहां के रास्तों की सैर करा रहा था।
मैं उसे बता रहा था ये देखो बायें हाथ में रामाधीन सिंह कालेज है,यहां हमारा हाईस्कूल बोर्ड का सेंटर पड़ा था। इससे आगे आई.टी कालेज का चौराहा है।
वहां से बायें निरालानगर होते हुए चांदगंज रेलवे फाटक को पार कर हम अलीगंज के हनुमान मंदिर होते हुए महानगर के सेक्टर सी में स्थित अपने घर पंहुच जाते थे,सरपट साइकिल चलाते हुए। 
लेकिन इस बार आटो वाला हमें आई.टी चौराहे से न लाकर पहले ही बाबूगंज वाली सड़क से बायां टर्न लेकर विवेकानंद हास्पिटल के ऊपर बन गये फ्लाई ओवर से सीधे कपूरथला अलीगंज में ले आया। मैं देखता ही रह गया। मेरा पुराना रूट तो अनदिखा ही रह गया। संभवत: 'वन वे' कर देने से ऐसा हुआ था। फ्लाई ओवर के कारण मेरा पुराना चिरपरिचित चांदगंज का रेलवे फाटक भी नजर नहीं आया,और हम सीधे अलीगंज हनुमान मंदिर होते हुए अलीगंज की संकरी बजार से गुजर कर कुर्सी रोड पर आ गये थे। 
मेरा गंतव्य वहीं कहीं था। चर्च रोड पर स्थित देवलोक कालोनी। गूगल लोकेशन डालने से ओटो वाले को सुविधा हो गयी। थोड़ी ही देर में उसने कालोनी के गेट पर पंहुचा दिया था। मैने घड़ी देखी, ठीक छत्तीस मिनट में उसने हमें आलमनगर से कुर्सी रोड पहुंचा दिया था। मैं सोच रहा था अगर ट्रेन हमें सामान्प दिनों की तरह चारबाग मेन स्टेशन भी उतारती तो हुसैनगंज, विधान सभा, सिकन्दर बाग,गोमती ब्रिज,निशातगंज वाले मुख्य मार्ग से इससे ज्यादा वक्त लग जाता।


आलमनगर वाले स्टेशन के डायवर्जन के कारण पैदा हुई दुश्चिंता काफूर हो गयी थी,उल्टा मुझे इमामबाङे के पीछे की गली वाला शार्ट कट भी पता चल गया था।
पैंतालीस पचास साल बाद शहर का हुलिया कितना अधिक बदल जाता है। वे मेरे छात्र जीवन के किशोरावस्था और युवावस्था की दहलीज के दिन थे। सन पचहत्तर में  इमरजैन्सी के दिनों में मैं जुबली इंटर कालेज में ग्यारहवीं का छात्र था।  बगल में सिटी स्टेशन था,उसके उल्टी तरफ के बजार में लारी खानदान की बड़ी सी कोठी थी। ये लखनऊ का बड़ा राजनीतिक खानदान है,यह बात बहुत बाद में पता चली। तब तो सिर्फ  बड़ी सी कोठी और 'लारी' जैसा विशेष टाइटिल देखकर ही हम लड़के आकर्षित होते थे। जुबली कालेज की चढ़ाई पर हम साइकिल से उतरते थे,और 'डयोड़ी आगामीर','ड्योड़ी आगामीर' हमको भी बना दे वजीर' रटते हुए चढ़ाई चढ़ते हुए अपनी थकान भगाते थे। 
दरअसल उस सारे इलाके का नाम नवाब के वजीर आगामीर के नाम पर रक्खा हुआ  था।
यह तथ्य हमें बहुत  बाद में पता चला। हम नासमझ तब डयोड़ी आगामीर शब्द का महत्व नहीं जानते थे और पहले से चले आ रहे मुहावरे को रटते जाते थे।इमरजैंसी के प्रभाव की तब ज्यादा अकल तो नहीं थी,हां इतना जरुर हमें अह्सास  हो गया था कि कोई  धारा लग गई है एक साथ पांच जने इकट्ठा खड़े नहीं हो सकते। हम स्कूली बच्चों ने झुंड में सिटी स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाना छोड़ दिया था। हाई स्कूल की परीक्षा मैने निशातगंज के माध्यमिक विद्यालय से पास की थी। गोमती पुल के ऐन किनारे स्थित यह विद्यालय पहले जे.बी.टी.सी के नाम से जाना जाता था। 
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कुर्सी रोड का यह इलाका चर्च रोड तब नया नया विकसित हो रहा था। पुराने हनुमान मंदिर से आगे कुछ नहीं था,खेत व झाड़ियां थी। मंदिर तक हम आते थे बस,उससे आगे नहीं। कुर्सी रोड आगे गुड़म्बां तक जाती है, बस इतना पता था। बगल की विष्णुपुरी कालोनी में इक्का दुक्का बसाहट शुरू हो चुकी थी।सन अस्सी के बाद फिर तेजी से विस्तार हुआ होगा। सन बयासी में नौकरी लग जाने के बाद मेरा लखनऊ से नाता टूट गया। उसके बाद तीन चार बार आना जाना हुआ लेकिन दो तीन दिन के वास्ते संक्षिप्त दौरा निजी व्यस्तता के साथ,सो शहर के बदलाव को तसल्ली से जानने समझने का मौका नहीं मिल पाया। इस बार अवकाशप्राप्त बुजुर्ग होकर अपने बचपन के शहर में थोड़ा तसल्ली के साथ आया हूं। हलांकि जून माह की गर्मी के दिन हैं,ज्यादा सैर सपाटे की गुंजाइश नहीं है,फिर भी बाहरी बाहर टैक्सी और ओटो में घूमता हुआ नजारा ले रहा हूं बदलाव का। बड़ा अच्छा लग रहा है,आधुनिकता और अथाह निर्माण से भीड़ और वाहनों के कोलाहल से खीझ भी पैदा हो रही है। हालांकि शहर की  शक्ल का कायापलट हो चुका है,फिर भी जो पुराने घर बजार हू बहू बचे हैं,उन्हें देखकर भावुकता से मन भींग जा रहा है।
समय का इतना लंबा वक्फा हमें कितना बदल देता है, हमारी तब की मासूम शक्ल और सुगठित शरीर भी कितना जीर्ण शीर्ण हो जाता है,आंखों में वह उत्साह व चमक नहीं रहती, पैरों में साइकिल से सरपट भागने की जान नहीं होती। अब साधन सम्पन्नता है,तब फाके मस्ती थी। चलो कुछ नहीं तो टैक्सी या ओटो हायर कर शहर की पुरानी देखी भाली जगहों की बाहरी बाहर सैर तो की ही जा सकती है। इस बार की यात्रा में इतना तो किया और  उमंग उत्साह वाली अपनी 'टीन एज' उम्र में जिये शहर की भरपूर यादें ताजा की।
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अलीगंज के चर्च रोड की जिस कालोनी मैं इस बार मेहमान बन कर  सपत्नीक आया था,वहां हफ्ते भर का पारिवारिक आयोजन था। 
आयोजन से समय निकाल कर शहर में घूमने हेतु पर्याप्त समय था, हां जून माह की गर्मी जरूर बाधा थी। पहले दिन देर शाम को अकेले पैदल निकल गया। पास में ही डंडैया मार्केट थी। सत्तर के दशक में डंडैया मार्केट को हम लोग डंडैया बजार कहते थे वह उस इलाके की सब्जी मंडी थी। बजार में सड़क के इर्दगिर्द आज की तरह असंख्य दुकानें व भीड़भाड़ नहीं थी। दूर दूर कुछ मकान जरुर थे। आस पास गांवों के लोग सड़क के किनारे जमीन पर ताजी सब्जियों की ढेरी लगाते थे। महानगर के सेक्टर सी से यह बजार बहुत पास थी,हम लोग अक्सर घर के लिए सब्जी लेने डंडैया बजार आते थे साइकिल में।
इस बार मेंहदी टोला वाली गली से पूछते हुए डंडैया मार्केट पंहुचा। 
‘भैय्या,डंडैया बजार निकल जायेगा ये रास्ता?’
 ‘कहां जाना है डंडैया में’ 
'कोई खास जगह नहीं,वहां जहां बहुत पहले सब्जी मंडी लगती थी।'
'हां,हां सीधे चलते जाइये आ जायेगा बजार।'
मेंहदी टोला से चलते हुए मैं डंडैया बजार पंहुच गया था। वहां वो,जमीन पर बैठने वाले सब्जी वाले कतई नहीं दिखे,बल्कि घने व्यवसायिक बजार की भीड़भाड़ व चहलपहल नजर आई। पुरानी पहचान का कोई भी घर दुकान नहीं थे,सब कुछ नया बिल्कुल अजनबी माहौल था। होता भी क्यों नहीं,चालीस साल में क्या कुछ नहीं बदल जाता।
डंडैया बजार पर मैने कवितानुमा पंक्तियां रच दी।

'पचास साल बाद
मैं उस डंडैया बजार
को ढूंढ रहा हूं
जहां पर ऊबड़ खाबड़
अधकच्ची रोड पर गांव 
के लोग ताजी सब्जियों
के ढेर सजा कर रखते थे।
कुछ नहीं था, वहां
न दुकानें,न होटल न माल
इक्का दुक्का कुछ घर थे
सड़क के इर्द गिर्द ।
अब नहीं है वो सब्जी मंडी
दुकानें ही दुकानें हैं,भीड़ है
ठेलियां हैं। मैं पूछता हूं
एक युवक से 
'भैय्या पुराना डंडैया बजार 
यहीं था,कहां गया होगा'
'किसी बुजुर्ग से पूछो अकंल
मैं तो तब पैदा ही नहीं हुआ था
मुझे नहीं मालूम कैसा था
पुराना डंडैया बजार
अब तो यह डंडिया मार्केट है।'
सचमुच अब वहां मार्केट था
मैं ही बजार ढूंढने वाला
जईफ पगलट था।'
         
  
बहरहाल अपने जमाने की जगहों की  शिनाख्त के लिए मैं आगे बढता हुआ अलीगंज की मुख्य बजार से होते हुए आई.टी.आई तिराहे की ओर चल पड़ा। इस बजार का हुलिया अमूमन वैसा ही था, दुकानें पहचान में आ रही थी। वर्मा ज्वैलर वालों एक लड़का हमारा सहपाठी था,उसकी दुकान में हम लड़कपन में आ जाते थे। वो दुकान वैसी ही थी। थोड़ी राहत मिली परिचित जगहों को पाकर अच्छा लगा।
आई.टी.आई तिराहे पर बन गया नीरा गुप्ता क्लिनिक शायद तब के उस इलाके के एकमात्र होम्योपैथिक डाक्टर गुप्ता के परिवार व बहू बेटों का था। डा. गुप्ता बड़े लोकप्रिय,सौम्य सुदर्शन सज्जन थे। उनकी छवि अभी भी हू बहू मनो-मस्तिष्क में संचित है,वे लाल मैरुन रंग के लम्ब्रेटा स्कूटर से चलते थे। निशातगंज में भी उनकी क्लिनिक थी। चलते चलते मैं अलीगंज के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के गेट तक चला आया। उसके समाने की पुरानी इमारत जर्जर खंडहर हो चुकी थी,उसके अवशेष अभी मौजूद थे।
इस मंदिर के दर्शन व शरारत भरे लड़कपन की बातें याद आते ही मेरे चहरे पर भावुकता भरी मुस्कान तिर आई। मंगल के दिन दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ रहती थी,और बड़े मंगल की तो पूछिये ही मत। दूर दूर बाराबंकी,फैजाबाद, सीतापुर हरदोई, उन्नाव से भक्त गण जमीन में लेट कर सड़क नापते हुए आते थे और जेठ के महीने के बड़े मंगल में मंदिर में पंहुच कर दर्शन करते थे।
हम तीन चार लड़के मंदिर के दर्शन के बहाने घर से पुरानी चप्पल पहन कर निकलते थे और मंदिर के बाहर लगे जूते चप्पलों के ढेर से बढ़िया नयी चप्पल या सेंडिल पहन कर लौट आते थे। हमारे लिए यह बड़ा एडवेंचर भरा खेल व शरारत जैसा था।
आज उस शैतानी की याद आते ही नादानी पर पश्चात भी हो रहा था,हंसी भी आ रही थी।
इस चप्पल चोरी प्रसंग के साथ हाल ही में पढ़ी काजी नजरूल इस्लाम की वह प्रसिद्ध रूबाई याद आने लगी, जिसका अर्थ था,
'हम बहुत श्रद्धा से मस्जिद में आये हैं
लेकिन खुदा की कसम नमाज पढ़ने नहीं
जो चटाई  यहां से चुराई थी,
वह पुरानी हो गयी है
अब नयी चटाई  चुराने आये हैं।'
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कहां की हरकतें स्मृति के किन संदर्भों से तार जोड़ देती हैं। हनुमान मंदिर में शांति थी,रात के उस वक्त भक्तों की भीड़ नहीं थी,मैने प्रसाद के लड्डू लिये और दर्शन किये। मंदिर की तब की व्यवस्था और साफ-सफाई में जमीन आसमान का अंतर था। लंबे गलियारे में कार्पेट बिछा था, मूर्ति के पास भी सजावट सुरुचिपूर्ण थी। संभवत: भीड़ के न होने से माहौल बहुत शांत व आनन्ददायक लग रहा था।
पहले लड़कपन में हम लोग हनुमान चालीसा की चौपाई पढ़ते हुए सेकिंड या अधिक से अधिक गुड सेकिंड डिविजन पास होने की कामना करते थे।
इस बार बुजुर्ग होने के कारण मैं खुद के अच्छे स्वास्थ्य,परिवार व बच्चों के भले की कामना कर रहा था। अपनी बचपन की शरारतों हेतु बजरंगबली से माफी मांग रहा था।                
उस शाम चर्च रोड के देवलोक कालोनी से अपने पुराने डंडैया बजार को ढूंढने की जिज्ञासा मुझे हनुमान मंदिर तक ले आई,यह बड़ी बात थी।मैने मंदिर सहित उसके सामने के प्राचीन खंडहरों के फोटो लिए, मंदिर से अधिक वे पुराने घर खंडहर मुझे सम्मोहित कर रहे थे,जिनके सामने मैने बचपन में सैकड़ों बार दौड़ लगाई थी,कभी पैदल कभी साइकिल से। रात हो जाने से सूरज की रोशनी के अभाव में फोटो धुंधले आये,लेकिन इतने सालों बाद पुराने दरो दीवारों,घरों,खंडहरों से मेरी मुलाकात की तस्दीक तो कर ही रहे हैं।  मंदिर के दर्शन कर मैं  पैदल चलते चलते अलीगंज बजार डंडैया होते हुए मेजबान के घर लौट आया।
                        ***
अगले दिन शाम को मैं पत्नी के साथ महानगर के सेक्टर सी में स्थित उस घर में गया जहां मेरी किशोरावस्था के  बाद की स्कूली शिक्षा से लेकर इन्जीनियरिंग डिप्लोमा तक की शिक्षा दीक्षा हुई।
मेरे बड़े भाई के ससुराल वालों का वह घर उसके गृहस्वामी लोहनी जी ने सन 1958 में बना लिया था। महानगर जैसे संभ्रांत इलाके में उस जमाने में जमीन खरीद कर घर बनाने वाले लोहनी जी कितने पुरूषार्थी व दूरदर्शी व्यक्ति रहे होंगे,यह बात अब मुझे समझ आ रही है।
आठ भाई बहिनों के उस परिवार में मैं भी उसी परिवार के सदस्य की तरह रहने लगा था। अब बुजुर्गों व तीन भाइयों के गुजर जाने के बाद व बच्चों के बंगलोर,नोएडा,विदेशों आदि में बस जाने के बाद भी उस घर में ताला नहीं लगा था। लोहनी जी की दो बहुएं उन दिनों उस घर में मौजूद थी,मेरे घर के अंदर जाने व स्वागत की गुंजाइश थी।
पत्नी के साथ अपने उस पुराने आशियाने में जाने पर वे आत्मीय व खुशमिजाज व स्नेहिल महिलायें बहुत खुश हुई। 
काफी देर तक घर परिवार की बातें हुई। मैने उस घर के एक एक कमरे,बरामदे,स्टोर,कोठरी,रशोई में जाकर अपने बचपन की यादों को दोहराया। उस घर में मेरे प्रवेश के  सात आठ साल बाद ब्याह कर आई उन जेठानी देवरानियों को बताया कि यहां पर पहले पारिजात का पेड़ था,यहां पर तीन डाली वाले फूल का पेड़ था,जो संभवत: उन्होंने ने भी नहीं देखा था।
सौभाग्य की बात थी कि वह घर अभी तक बिका नहीं था,उसी परिवार के पास था,वर्ना उसके अगल बगल वाले ज्यादातर घर बिक कर उनमें मल्टी स्टोरी काम्प्लेक्स बन गये थे।
घर के सामने की साठ फिट चौड़ी सड़क को देख कर मैं चकित था,हम लोगों को बाद में इतनी चौड़ी सड़क वाले मुहल्लों में रहने का अवसर नहीं मिला।मुश्किल से बीस तीस फिट चौड़ी सड़क वाले घरों में हम रह रहे थे।
यह मेरा परम सौभाग्य थी कि महानगर लखनऊ के  'पास' इलाके में  आत्मीय रिश्तेदारी के उस सांस्कृतिक व सुशिक्षित घर में बचपन के बाद किशोरावस्था व यवावस्था के मेरे जीवन के निर्माणकर्ता दस बारह साल बीते। जीवन में साहित्य के प्रति अभिरुचि व संस्कार भी उसी घर के कारण पड़े। घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग,नवनीत जैसी पत्रिकायें आती थी। स्वयं गृहस्वामी लोहनी जी की आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित होती थी। पढ़ने लिखने गायन वादन ,नृत्य नाटक का माहौल था। इस कारण मुझे भरपूर सुविधायें प्राप्त हुई। उस घर की दुछत्ती में रक्खे एक वृहद हिंदी शब्द कोश व दो बड़े विशाल 'वर्ल्ड एटलसों के पन्ने पलटने की स्मृति अभी भी मेरे मस्तिष्क में संचित है। अपनी शब्द सामर्थ्य व दुनिया के भूगोल की जानकारी में रुचि का श्रेय मैं उन्हीं ग्रन्थनुमा पुस्तकों को देता हूं।
सन तिरासी के बाद दो तीन बार सूक्ष्म समय के लिए मैं इस घर में आया था,आज लगभग बीस साल बाद फिर पुन: गया हूं।
जीवन का चक्र हमें कहां कहां घुमाता है, हम कहां जन्म लेते हैं, कहां बचपन बीतता हैं,कहां शिक्षा दीक्षा होती है,कहां नौकरी लगती है,यह सब हमारे हाथों में नहीं रहता। हां,जीवन के पच्चीस तीस साल के बाद का समय हमारा मुकम्मल निवास, हमारी नौकरी या व्यवसाय का क्षेत्र तय कर देता है।
सन तिरासी मैं देहरादून में स्थाई  केंद्र  सरकार की  नौकरी लग जाने के बाद वहीं बस जाने व वहीं से अवकाश प्राप्ति हो जाने के कारण मुझे चालीस से अधिक वर्षों तक लगातार रहते हुए देहरादून का निवासी कहलाने का अधिकार प्राप्त हो गया है। 
मैं अब साधिकार खुद को देहरादून वासी कहता हूं,
लेकिन अपने पुराने जिये शहरों को खुद से अलगाने का अधिकार भी मुझे क्यों मिलना चाहिए। 

                      


तब के महानगर की अनगिनत यादें स्मृति में दर्ज है।
इसी सेक्टर सी के पीछे उन्हीं दिनों विज्ञान पुरी कालोनी निर्मित हो चुकी थी। हाकी के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी के.डी सिंह बाबू वहीं रहते थे। उन्हीं सालों में उन्होंने विज्ञान लोक के निवास में दुखद आत्महत्या की थी। इस घटना से हम सब स्तब्ध थे।
ब्रिगेडियर यू.सी पंत का बंगला रहीमनगर रोड पर था। सुदर्शन काया के वह सेनाधिकारी हाथ में स्टिक लेकर प्रात: काल घूमते हुए आमजन से बातें भी करते थे। वायरलेस चौराहा से संत मार्केट की ओर आने पर साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा का घर 'चित्रलेखा' था। उनके घर के बगल वाले खाली प्लाट में हम लोग खेलते थे और अमरूद तोड़ कर खाते थे।भगवती बाबू  सफेद कुर्ता पाजामा पहने वायरलैस चौराहे पर चार न. के गणेश टैंम्पू से उतर कर पैदल 'चित्रलेखा की ओर आते थे। साथियों के साथ मैने भी कई बार उनको चरण स्पर्श किया है।
वायरलेस चौराहा से गोल मार्केट की जाने पर 'मोहन मेकिन्स' वालों का बड़ा सा बंगला 'मोहन्स'
नाम से था। और आगे जाने पर यशपाल जी का घर था। बाहर नेम प्लेट पर बड़े से अक्षरों में 'यशपाल' लिखा था। यशपाल जी को भी लाठी टेक कर चलते हुए देखे की याद है। महानगर पोस्ट आफिस के बगल में ही साहित्यकार कुंवर नारायण रहते थे,यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली।
इसी रोड में बायें हाथ में अंदर जाकर 'सेक्टर बी' में मुख्यमंत्री एन.डी तिवारी रहते थे। उनके घर के बगल वाले प्लाट में पुलिस का टैंट गड़ा था,जिसमें सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे। वह दुमंजिला घर असल में उनके ससुर गंगा दत्त सनवाल जी का था,डा.सुशीला तिवारी के पिता। मैं बुजुर्ग सनवाल जी से मिला हूं। होली के दिन महानगर के पर्वतीय लोगों की साथ जाकर तिवारी जी को गुलाल लगाने व गले मिलने की याद है। उनकी तोंद के टकराने के कारण गले मिलने में आई बाधा का ध्यान भी है। शायद तब वह पद पर नहीं थे। 1976 में पहली बार उनके मुख्यमंत्री बनने पर बड़े से खाली प्लाट में महानगर वासियों ने उनका सम्मान किया था, मैदान में तब बहुत भीड़ थी। उनके पी.ए चमोली क्षेत्र के मूल निवास मेहता जी काफी लोकप्रिय थे। मेहता जी के  तीन चार पुत्र गण सामाजिक कार्य में काफी सक्रिय रहते थे। बहुत बाद में तिवारी जी का अपना निजी घर महानगर में कहीं और बना,वह घर मैने नहीं देखा है।
सन 1972 में, मैं मुरादाबाद के हरथला से सातवी कक्षा पास करने के बाद भाई साहब के साथ लखनऊ आया था। लखनऊ आने के बाद स्मृतियों से न मिटने वाली दो घटनायें अभी भी विचलित करती हैं। एक तो भयंकर बाढ़ की याद है। गोमती नदी का पानी निशातगंज,पेपरमिल कालोनी,बादशाह नगर होते हुए महानगर तक आ गया था। नावें चलने लगी थी,फूड पैकिट बंटने लगे थे। कुकरैल का पानी भी सचिवालय कालोनी व पी.ए.सी लाइन की ओर आ गया था। बादशाह नगर कालोनी के भूतल में रहने वाला एक परिवार शरण लेने हमारे घर में आया था। 
कुकरैल नाले में तब गंदगी नहीं थी। यह एक निर्जन नदी की भांति शांत बहती थी। पानी जरुर रेतीला बलुई था। गर्मी के दिनों में हम बच्चे कुकरैल में तैरना सीखने जाते थे,और उस पार के फाट जहां अब कूर्माचल नगर बस गया है,से कुकरैल में छलांग लगाया करते थे। कुकरैल के उद्गम स्थल को मगरमच्छ कहते थे। वह सुदूर पश्चिम की तरफ घने पेड़ों और झुरमुटों के मध्य स्थित जगह थी।
कुकरैल के बारे में एक किवदंती यह थी कि कुत्ते के काटे हुए किसी व्यक्ति को इसमें नहलाने से वह रोगमुक्त हो जाता है। कहते थे दूर दूर से लोग कुकरैल में इस निवारण हेतु मरीजों को लाकर नहलाते थे।
सन तेहत्तर में लखनऊ का कुचर्चित पी.ए.सी विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह के दौरान पी.ए.सी.के जवानों व राज्य पुलिस के बीच भीषण युद्धनुमा संघर्ष छिड़ गया था। गोलियों की आवाज महानगर से सटे पी.ए.सी लाइन से हमें भी सुनाई देने लगी थी। बड़ा दहशत का वातावरण छा गया था। पी.ए सी. के जवानों ने तनख्वाह बढ़ाने व अन्य मांगों को लेकर विश्वविद्यालय के छात्रों की मदद से सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया था। यह घटना आजादी के बाद भारत के इतिहास में पहली असाधारण घटना थी।
इस विद्रोह को कुचलने के लिए सेना व अर्ध सैनिकों को बुला लिया गया था। सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी थी। कमलापति त्रिपाठी  मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार भंग करके राष्ट्र पति शासन लागू कर दिया गया था। 
इस विद्रोह के कारण हुई असुरक्षा के कारण पी.ए.सी क्वार्टरों में रह रहा एक परिचित परिवार भी महानगर में मेरे रिश्तेदार लोहनी जी के यहां रहने आया था।
राष्ट्रपति शासन के पश्चात हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री बने थे।1975 में इमरजेन्सी के दौरान  संजय गांधी की नीतियों के कारण इन्द्रा गांधी से मतभेद होने के कारण उन्होने इस्तीफा दे दिया था।
बहुगुणा जी इतने तेज तर्रार व लोकप्रिय नेता थे कि लोग कहने लगे थे,उनकी वजह से इंद्रा गांधी को अपनी गद्दी खतरे में नजर आने लगी है।
बहुगुणा जी ने सन 1977 में जगजीवन राम के साथ  मिलकर 'कांग्रेस फार डेमोक्रेसी' नाम की पार्टी बनाई थी। जिसका विलय जनता पार्टी में हो गया था।
इन घटनाओं का मैं साक्षात गवाह रहा हूं,लेकिन तब उम्र कम होने के कारण उनके परिप्रेक्ष्य व कारणों की समझ नहीं थी,आज अब तत्कालीन घटनाओं
का इतिहास पढ़ता हूं तो अपने अनुभवों के कारण उनका वास्तविक विश्लेषण अच्छी तरह कर पाता हूं। तब के महानगर में कई गणमान्य व्यक्तियों के घर थे,जिनकी महत्ता बचपने के कारण मैं नहीं समझ पाते थे। बाटेनिकल गार्डन के निदेशक 'खुशू साहब' का छोटा लेकिन नये डिजायन का घर बना था। सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक छत्रपति जोशी का 'ध्रुव' नाम का घर भी आकर्षक था। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एम.डी जोशी के घर में ब्रह्मकुमारी आश्रम की गतिविधियां होती थी।
राजनैतिक व्यक्तियों में डी.पी बोरा का नाम चर्चित रहता था। वे इस क्षेत्र के विधायक थे। विश्वविद्यालय के नेता अतुल अंजान,रविदास मल्होत्रा के अतिरिक्त सी.बी.सिंह,भगवती सिंह आदि महानगर क्षेत्र में आते रहते थे। आर.डी शुक्ला,मनोज तिवारी उन दिनों महानगर मुहल्ले के हमारे अग्रज युवा थे,जो पत्रकारिता में चले गये थे।
अल्मोड़ा क्षेत्र की विधायक रमा पंत हमारे घर के सामने स्थित अपने भाई के निवास पर आती रहती थी। हरीश रावत लखनऊ विश्वविद्यालय से परास्नातक होकर सन सत्तर के बाद अपने क्षेत्र भिकियासेन अल्मोड़ा में राजनीति करने लगे थे। वहां से ब्लाक प्रमुख चुने गये थे। हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक स्व.वीरेंद्र यादव उनके सहपाठी थे। सन सतहत्तर में मैं,जुबली इंटर कालेज से इंटरमीडिएट पास कर जी.टी.आई चिनहट से इंजीनियरिंग डिप्लोमा करने लगा था। लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में कामरेड अतुल अंजान के प्रचार हेतु हम बाहरी संस्थानों के छात्र भी संख्या बल बढ़ाने हेतु जाते थे। उन दिनों चुनाव प्रचार में कुछ छात्र हाथी में चढ़ कर विश्वविद्यालय के अंदर आते थे,उसमें बैठ कर प्रचार करते थे। बड़ा चहल पहलभरा,रोचक माहौल होता था।
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इतने सालों बाद लखनऊ आकर अपने लड़कपन के प्रिय आशियाने में जाना मुझे बड़ा सकूंन दे गया।
देर रात गये हम दोनों पति पत्नी इस बार के मेजबान के घर चर्चरोड अलीगंज लौट आये।
अगली सुबह सुबह हमने अयोध्या जाने का प्लान बनाया। इसे संयोग कहें या दुर्योग कि ऐन इन दिनों अयोध्या में दान चोरी प्रकरण की एस.आइ.टी जांच चल रही थी। जनता के मन में भ्रम व आशंका के बादल छाये थे। लेकिन इतने पास आकर फिर दुबारा आने का अवसर नहीं मिलेगा,यह सोच कर मंदिर की बनावट,भव्यता व अपने पुराने परिचित बाराबंकी फैजाबाद रोड में हुए बदलाव को जानने देखने का उत्साह मुझे अयोध्या दर्शन करा ही लाया।
अलीगंज के इस इलाके से फैजाबाद रोड का लिंक अब कई नये मुहल्लों से गुजारता हुआ हमें हाई वे पर ले आया था। मैं इन्द्रानगर,लक्ष्मणपुरी,भूतनाथ मंदिर,एच.ए.एल वाली सन सत्तर अस्सी के दशक की सड़क व बाजार ढूंढ रहा था,पर वो कहां मिलते। टैक्सी से गुजरते हुए वे इलाके ओवर ब्रिज के नीचे लुप्त हो गये थे।
पालीटेक्निक चौराहे पर तो हमारा इंस्टीट्यूट ही था।
आगे चिनहट गांव में हमारे सहपाठी किराये में रहते थे। कुकरैल पिकनिक स्पाट उन्हीं दिनों बन रहा था।
तेज रफ्तार टैक्सी की खिड़की से कुछ पुरानी जगहों की झलकी मिली,कुछ अजनबी नजर आई। 
बाबू बनारसी दास इंस्टीट्यूट व हाईकोर्ट की इमारत मेरे लिए नई थी।
बहरहाल फैजाबाद रोड अथवा अयोध्या हाई वे का दर्शनीय बदलाव सुरुचिपूर्ण लग रहा था। हम सवा दो घंटे में अयोध्या पंहुच गये थे। जून माह की गर्मी व एस.आई.टी जांच प्रकरण के बावजूद सन्नाटा नहीं था,ठीक ठाक संख्या में श्रद्धालु आ जा रहे थे।
बंबई से आये कुछ यात्रियों से मैने दान पात्र व चंदा चोरी प्रसंग पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। वे निर्लिप्त थे।बोले इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है,दर्शन करने के लिए लोग पूर्ववत आते रहेंगे। हां दान या चढ़ावे में थोड़ा-बहुत कमी पेशी हो सकती है।सबकी अपनी इच्छा है,कोई जोर जबरदस्ती तो नहीं हो रही है।' उनका जवाब था।
मंदिर के बाहरी परिसर में अभी निर्माण,लान फुलवारी आदि का काम चल ही रहा था। सुरक्षाकर्मी जगह जगह तैनात थे। एक मायूसी कर्मचारियों के चेहरे पर अवश्य तिर रही थी।
इतनी प्रतिष्ठित आस्था की जगह की छवि पर लगे दाग की जांच के माहौल में मंदिर प्रांगण में खुशपुसाहट,शंका,मायूसी का होना लाजमी था।
सरयू स्नान करने के पश्चात हनुमानगढ़ी के दर्शन कर हम लोग लौट आये।
अयोध्या से लौटते हुए अधिक उत्सुकता मुझे फिर अपने बाराबंकी चिनहट लखनऊ वाली सड़क के इर्दगिर्द की पुरानी जगहों के मोह से बांधे हुए थी।
वापसी में डेड़ घंटे बाद मेरी नजरें खिड़की से बाहर
गौर से अपनी परिचित जगहों को तलाशने लगी थी। इस बार अपेक्षाकृत सड़क के दाहिनी ओर की काफी पुरानी इमारतों को देखकर मैं पुलकित हुआ। मेरा शिक्षण संस्थान,पालीटेक्निक साफ नजर आया। हमारे इसी संस्थान के बगल से एक सड़क कुकरैल पिकनिक स्पाट के लिए जाती थी,उन दिनों वहां सिर्फ जंगल था। पिकनिक स्पाट नया नया विकसित हो रहा था। केन्द्रीय सरकार के 'सुंगध पादप संस्थान' का भवन भी निर्मित हो चुका था।
हम लोग संस्थान से फर्लो मार कर कर झुंड में पिकनिक स्पाट जाने लगे थे। एक लड़कियों से भरी बस उस तरफ जाती दिखी,हम लड़के तो सहमे सहमे उसे ताक रहे थे,जब लड़कियों ने हंसते हुए खिड़की से हाथ हिला कर हमारी हिम्मत बंधाई तो हमने भी प्रत्युत्तर में उनका अभिवादन किया। लड़कियों को हाथ हिलाकर 'हैलो -हाय' कहने का वह हमारी जिंदगी का पहला रोमांचक और पुलकित करने वाला अनुभव था। वे संभवत: किसी आधुनिक कालेज की लग रहीं थी। लालबाग गर्ल्स कालेज,महिला कालेज या आई.टी.कालेज की ही न हों,कौन जाने।
एच.ए.एल का तब का बड़ा सा गेट मैं नहीं देख पाया,न जाते हुए,न आते हुए। हमारे सामने ही तो 
उस जमाने के लखनऊ की शान इस रक्षा उत्पादन फैक्ट्री की नीव रक्खी गई थी। इस संस्थान में नौकरी पाने के लिए मैने बहुत प्रयास किये,लेकिन मुझे देहरादून के रक्षा संस्थान में नौकरी करनी लिखी थी,सो एच.ए.एल में नौकरी नहीं मिली। सब डेस्टिनी की बात है। मैं सोच रहा था काश,टैक्सी वाला कुकरैल पुल,बादशाह नगर,निशातगंज से गोल मार्केट होते हुए वायरलेस चौराहा रहीमनगर से ले जाकर हमें अलीगंज के गंतव्य पर छोड़े, ताकि मैं अपने बचपन के प्रिय सड़क बजार मुहल्लों की एक झलक देख सकूं,लेकिन यह संभव नहीं हुआ,पहले ही उसने खुर्रम नगर से मोड़ते हुए कुर्सी रोड वाली दिशा पकड़ ली और दोपहर के दो बजे हमें वहीं छोड़ दिया जहां से सुबह पांच बजे 'पिक' किया था।
इस प्रकार कुल सात घंटे में हम लोग अयोध्या दर्शन व फैजाबाद राजमार्ग की सैर करके लखनऊ लौट आये थे।
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जिस दिन हम लौटे,यानी 22 जून 2026 को उस रोज लखनऊ में दो अवांछित व अरुचिकर घटनायें घटी,एक तो एस.आई.टी ने अयोध्या चंदा चोरी प्रकरण की जांच सरकार को सौंपी और उसी दोपहर में अलीगंज क्षेत्र के ही पुरनियां इलाके के एक कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड की खबर आई। मन काफी व्यथित हुआ। नियमों की अनदेखी कर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया निर्माण कार्य कितना घातक हो सकता है,जिसने 15 युवाओं की जान ले ली। ऐसे अंधाधुंध निर्माण व विकास की बाढ़ ने महानगरों का जीवन कितना मृत्युभक्षी बना दिया है,यह देख कर व सोचकर दिल दहल जाता है।

              

            
                                                                                                       लखनऊ में इस बार निशातगंज गोमतीपुल सिकन्दरबाग,नरही,विधानसभा,हजरतगंज,हुसैनगंज,वाले मुख्य मार्ग की तरफ जाने का मौका नहीं मिला वर्ना अतीत में यह रुट तो अपना बहुत लंगोटिया यार था। गोमती तट पर स्थित निशातगंज के राजकीय इंटर कालेज से मैने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। जुबली इंटर कालेज,सिटी स्टेशन से इंटर पास किया था। उसके पश्चात इंजीनियरिंग डिप्लोमा जी.टी.आई फैजाबाद रोड से पास करने के पश्चात दो तीन साल बेरोजगारी का अनुभव व छुटपुट नौकरियां की थी। इन्हीं फाकेमस्ती के दिनों में साहित्य की अभिरुचि ज्यादा उछाल मारने लगी थी। पढ़ने लिखने का खूब मन करता था।
हजरतगंज काफी हाउस के बाहर बरामदे में मैग्जीन व किताबों के स्टाल में खड़े खड़े घंटों हम लोग उनको चाट जाते थे। उस जमाने की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकायें वहां रक्खी रहती थी। सारिका की तो दो तीन कहांनियां तक पढ़ लेते थे। काफी हाउस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी,लेकिन बाहर से ही अंदर गोल मेज के इर्दगिर्द बैठे साहित्यकारों की झलक मिल जाती थी। मुद्रा जी,भगवती बाबू,के पी सक्सेना, राम लाल जी आदि को तब मैं पहचानने लगा था। अन्य लोग राजनीतिज्ञ,पत्रकार,वकील आदि बुद्धिजीवियों की चहलपहल व गर्मागर्म बहस वहां चलती रहती थी।
बारह तेरह साल पहले सूक्ष्म दौरे पर लखनऊ गया तो थोड़ी देर को काफी हाउस में जाना हुआ। वहां पर वीरेन्द्र यादव, मुद्रा जी,अखिलेश,डा.रूपरेखा वर्मा आदि से मुलाकात की। वे लोग देहरादून के साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि के बारे में जानने को काफी उत्सुक थे। मैने बताया वाल्मीकि जी हमारे अनन्य मित्र थे। हम लोग साथ ही रक्षा संस्थान में काम करते थे।अतुल अंजान एक अलग मेज पर कुछ मित्रों के साथ  बैठे थे। मैने उन्हें पुरानी याद दिलाई,नेशनल इंटर कालेज वाली। वे खुश हुए। उन्होंने देहरादून के कामरेड समर भंडारी के बारे में पूछताछ की।
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सन अस्सी के साल में ही अमीनाबाद के कंचना रेस्टोरेंट से भी मेरा परिचय हो गया था। वह भी साहित्यकारों का चर्चित अड्डा था। रेस्टोरेंट के मालिक मिश्र जी स्वयं साहित्यकार थे। वहां पर लगभग नियमित बैठने वाले कवि राजेश विद्रोही,राजहंस मिश्र दीपक,अजय प्रसून,अगीत वाले रंगनाथ मिश्र आदि से बातचीत होती थी। 
कंचना के बारे में हम सुनते थे कि किसी जमाने में वहां निराला,पंत,महादेवी,बच्चन,नरेंद्र मिश्र आदि साहित्यकार भी लखनऊ आने पर मिलते बैठते बतियाते थे।अमीनाबाद जाने पर कंचना में बैठ कर चाय पीना व साहित्यकारों की संगत करने का चश्का मुझे भी लग गया था।
लीलाधर जगूड़ी भी तब पहाड़ से आकर लखनऊ के सूचना केंद्र हजरतगंज में नौकरी करने लगे थे। उनसे तब मुलाकात नहीं हुई। मंगलेश डबराल से अमृत प्रभात कार्यालय में मिलना हुआ था। हिंदी संस्थान में ठाकुर प्रसाद सिंह अध्यक्ष थे। 'वंशी और मांदल' नवगीत संग्रह के लिए चर्चित थे।
मंगलेश जी की का संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' चर्चित  होने लगा था। हिंदी संस्थान के दो मंजिले के हाल में मुझे भी कुछ युवाओं के साथ सोहन लाल द्विवेदी जी के सान्निध्य में काव्य पाठ का अवसर मिला।आकाशवाणी के उत्तरायण कार्यक्रम विभाग में मैठाणी जी,वंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' व जीत सिंह जड़धारी जी थे। जिज्ञासु जी ने कुमाउंनी 'कथा किस्सों' के वाचन  व प्रसारण हेतु मुझे भी बुलाया था। 'कमल जी' उन दिनों आकाशवाणी के लोकप्रिय कार्यक्रम संयोजक थे। शिवानी का स्तंभ 'वातायन',के.पी सक्सेना के व्यंग्य,उर्मिल कुमार थपलियाल की 'सप्ताह की नौटंकी',स्वतन्त्र भारत अखबार में खूब पढ़ी जाती थी।
'स्वतंत्र भारत' के रविवारीय परिशिष्ट में मेरी भी कहानियां नवगीत आदि छपने लगे थे।                    



लखनऊ में पुनर्गमन के बहाने इतनी पुरानी संचित स्मृतियां छन छन कर बाहर आ रही हैं। जो संभवत: वहां लगातार निवास करते रहने पर न खुलती शायद। लंबा बहिर्गमन भी हमारे प्रिय स्थानों की यादों को संभाले संजोये रखता है। यह अनुभव शिद्दत से हो रहा है।
रवीन्द्रालय में हुए कुछ कार्यक्रमों में दर्शक के तौर पर शिरकत करने की याद अभी ताजा है। इन्हीं कार्यक्रमों के दौरान कथाकार शिवानी,चित्रकार रणबीर सिंह बिष्ट, बिरजू महाराज,अवधी कवि रमई काका को पास से देखने का अवसर मिला था।
केशरबाग की 'बारादरी' में हुए एकाध मुशायरों में देर रात तक बैठे रहने की धूमिल स्मृति भी है।
अवध जिमखाना क्लब में टेनिस का एक विश्व स्तरीय मैच सन 1975-76 में हुआ था। हम स्कूली लड़के क्लब के बाहर सामने बने ऊंचे मकबरे में चढ़ कर मैच देखने लगे थे। इस मैच में न्यूजीलैंड के खिलाड़ी ओनी पारून व अमृतराज बंधुओं का मुकाबला हुआ था,इतना याद है।
गोमती के किनारे बना लखनऊ का पहला पांच सितारा होटल क्लार्क अवध उन्हीं दिनों बन कर तैयार हुआ था। हम लड़के गोमती के दूसरे पाट पर देर शाम तक तैरते फांदते थे और मद्दिम रौशनी में नदी में बन रही होटल की छाया के ऊपरी हाल को इंगित कर आपस में हंसी ठिठोली करते एक दूसरे से कहते थे,देखो वहां कैबरे डांस शुरू हो गया है। क्लार्क अवध के बगल में ही स्थित 
अपने वास्तु के लि प्रसिद्ध छतर मंजिल  (सी.डी.आर.आई ) की छाया भी गोमती नदी में बड़ी मनोरम नजर आती थी। छतर मंजिल का निर्माण अवध के नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने करवाया था सन 1820 के आसपास। 
निशातगंज चौराहे से जुड़े तो बहुत किस्से हैं। तब ओवर ब्रिज नहीं बना था। पालीटेक्निक के पहले साल में खूब रैगिंग हुई थी। कालेज जाने वाली बस पकड़ने के वास्ते हम नये लड़के डरे सहमे हनुमान मंदिर के पास खड़े रहते थे। सीनियरों के आदेशानुसार उनको हाथ जोड़ कर नमस्कार करने के पश्चात नजर तीसरे बटन पर झुकानी होती थी।
एक रोज एक सीनियर ने बड़े पशोपेश में डाल दिया।
'बोला वो देखो सामने तुम्हारी बहिनें खड़ी हैं,उनके पांव छू कर आओ। अपरिचित लड़कियों के पास जाकर उनके पांव छूने की बदतमीजी कैसे करते। हाथ जोड़कर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा,'सर
यह सजा मत दिजिए चाहे उठक बैठक करा लीजिए सौ। 'चलो अच्छा,कान पकड़ कर उठकर बैठक लगाओ।' फर्स्ट इयर के हम दो तीन लड़कों ने वहां पर सबके सामने कान पकड़ कर उठक बैठक लगाई। जनता के लिए वहां रोज कोई  न कोई रोचक तमाशा होता था। एवज में सीनियर बस का टिकट स्वयं लेते थे। कैंटीन में ले जाकर कहते थे 'तीन गर्म समोसे एक साथ खाओ।'
निशातगंज के ओवर ब्रिज के विरोध में व्यापारियों ने खून से चिट्ठी लिखकर विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को पकड़ाई थी। हालांकि बाद में ब्रिज बना
और उनका व्यवसाय यथावत चलता रहा।
निशातगंज का 'उमराव' पिक्चर हाल भी तभी दो एक साल बाद बना। गोमती के पार बना वह लखनऊ का पहला पिक्चर हाल था। 'शोले' हम लोगों ने उसी हाल में देखी थी। 



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लखनऊ में हफ्ते भर के निवास के पश्चात लौटने की तिथि आ गई थी। ट्रेन के रूट डायवर्जन के कारण हमें ट्रेन चारबाग से न पकड़ कर आलम नगर से पकड़नी थी। आते समय भी हम आलमनगर ही उतरे थे। अलीगंज से आलमनगर ले जाने के वास्ते टैक्सी वाले ने वही रुट पकड़ा, डालीगंज चौक इमामबाड़ा वाला। कपूरथला बाग के बाद  पहले चांदगंज आता था, फिर रेलवे फाटक और उसके बाद बायें हाथ में विवेकानंद हास्पिटल।
इस बार ओवर ब्रिज बन जाने से आधा चांदगंज नजर ही नहीं आया। विवेकानंद अस्पताल ऊपर से दिखा। इस अस्पताल से जुड़ी मेरी  बड़ी दुखद स्मृतियां हैं। 


सन 1973 में मैं कक्षा नौ का विद्यार्थी था। बड़े भाई, ईजा (मां) को भी गांव से इलाज के वास्ते लखनऊ ले आये थे। उनकी कमर में साल  छह महीने से असहनीय दर्द रहता था। लखनऊ में लाकर कई डाक्टरों को दिखाने के बाद विवेकानंद हास्पिटल में भर्ती किया। उनके गहन टैस्ट हुए। उन दिनों वहां के सर्जन डाक्टर भट्टाचार्य का बड़ा नाम था। उन्हें भी दिखाया। मां,वहां एक माह से ज्यादा भर्ती रही। वहां के बड़े स्वामी जी सहित उनके सहयोगी नियमित मरीजों से मिलने एक चक्कर लगाते थे। अक्सर मां के साथ बैड पर मैं बैठा मिलता था। मां को हाथ जोड़ कर  उनसे हालचाल पूछने के बाद स्वामी जी मेरे सिर में भी हाथ फेर कर सांत्वना देते थे। मां को गले का कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उन्हें नहीं बचाया जा सका। जनवरी 1974 में लखनऊ में ही उनका देहांत हो गया था। नया नया बना रामकृष्ण मिशन का यह अस्पताल उन दिनों लखनऊ में अपने विशाल आधुनिक भवन,साज सज्जा,सुविधाओं व सस्ते उपचार के लिए प्रसिद्ध था। इसके बाहर प्रवेश द्वार पर फौब्बारे लगे थे तथा स्वच्छ पानी के विस्तृत ताल में रंगबिरंगी मछलियां तैरती थी। सफेद चिकने संगमरमर की सीढियां चढ़ने के बाद विशालकाय ऊंचा हाल व गलियारे बने थे। सरकारी अस्पतालों के मुकाबले यह लाख गुना दर्शनीय व सुविधाजनक था। एक बार इच्छा हुई देखें अब इतने सालों बाद क्या परिवर्तन हुआ है अस्पताल में, लेकिन यह संभव नहीं था। यूं अब तो बड़े बड़े सुपर स्पेशियलिटी मंहगे प्राइवेट अस्पतालों के जमाने में रामकृष्ण मिशन के इस अस्पताल की पहचान धूमिल सी हो गई होगी,ऐसा आभास जरुर हो रहा था।
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आगे चल कर टैक्सी वाला आई.टी चौराहे से डालीगंज को मुड़ गया था। आई.टी कालेज तो आजादी के पहले से ही उत्तर भारत का लड़कियों का जाना माना कालेज था। बड़े आधुनिक संभ्रांत घरों की लड़कियां वहां पड़ती थी। उसके गेट के बाहर एक ओर को खुला कैफे था,जहां झुंड में  फैशनेबल लड़कियां रंगबिरगी छतरी वाली मेजों से सटी कुर्सियों में बैठ कर चाय काफी आदि पीती थी। वहां से फैजाबाद रोड की ओर जाते हुए साइकिल धीमी कर हम लड़के आपस में खुसुर-पुसुर करते थे,'यार सुना है यहां बैठ कर लड़कियां सिगरेट भी पीती हैं।'
लड़कियों को सिगरेट पीना देखना हमारे लिये असंभव दृश्य को देखने जैसा रोमांचक कारनामा था। खैर, इस बार मैने  टैक्सी से उस ओर नजर घुमाई तो वहां सन्नाटा नजर आया,अलबत्ता ब्रिटिश कालीन वास्तु से बनी उस भव्य इमारत के आलीशान स्तम्भ व बड़ा सा पोर्च अभी भी शान से प्रसिद्ध आई.टी कालेज का हुस्न नुमाया कर रहे थे। उर्दू की मशहूर लेखिकाओं इस्मत चुगताई,कर्तुरलैन हैदर,आयरीन पंत सहित कई जानी मानी महिलायें किसी जमाने में इस कालेज में पढ़ती थी।
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हमारी यात्रा में आते वक्त तो सुबह का समय था,और ओटो वाहन था,इसलिए उसने हमें नये नये गलियों वाले शार्टकट दिखाये और आधे घंटे में ही आलमनगर स्टेशन से चर्च रोड अलीगंज पहुंचा दिया। इस बार  लौटते हुए दोपहर का वक्त था और टैक्सी,गलियों से नहीं जा सकती थी,इसलिए  डालीगंज ब्रिज के बाद चौक की ओर मुड़ने के बाद उसने हमें भव्य एतिहासिक रूमी दरवाजे से प्रवेश करा कर बड़े इमामबाड़े के सामने से होते हुए छोटे इमामबाड़े व घंटाघर से ले जाकर खुनखुन जी रोड अमृतलाल नागर चौक के आगे पुराने लखनऊ की ऐसी विस्तृत सैर करा दी जो मैने अपने विद्यार्थी जीवन में भी नहीं की थी। शिया मुस्लिमों की रिहाइश के लिए विख्यात चौक की पुरानी इमारतें अभी भी उस पुराने अतीत की जीवंत यादगार हैं जब यहां पर अवध के नवाबों का कला संस्कृति,वास्तु,अदब के उन्नत कार्यों व संस्कारों से समृद्ध शासन था। 
जून की गर्मी के कारण बजार में जगह जगह मुस्लिम भाइयों ने प्याऊ के स्टाल लगा रक्खे थे।
पिछले दिनों ईरान में अयातुल्ला खुमैनी की हत्या के पश्चात लखनऊ के इस इलाके के बहुसंख्य शिया समुदाय में शोक की लहर फैल गई थी। उनकी अकीदत में लगे खुमैनी के पोस्टर  जगह जगह नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मुस्लिम देश की घनी बस्ती में आ गये हों,लेकिन हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की तस्वीर व तहरीरें साझा करते पोस्टर भी लगे थे। रस्तोगी व्यापारियों के लिए प्रसिद्ध हिंदू समुदाय के घर दुकानें स्कूल मंदिर दर्शा रहे थे कि लखनऊ की साझा संस्कृति व गंगाजमनी तहजीब अपने आप में एक मिसाल है।





टूरियागंज आयुर्वेदिक अस्पताल से मैं पहले से परिचित था,उसके गेट के सामने से आलमनगर की ओर टैक्सी वाला ले जा रहा था। शायद वह इस रुट से बहुत वाकिफ नहीं था,और उसका मोबाइल एप भी घपला रहा था,इसीलिए आलमनगर पहुंचने में उसे लगभग एक घंटा लग गया।
खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। हमारी ट्रेन के प्रस्थान में अभी पर्याप्त वक्त बचा था। हमने तसल्ली पूर्वक अपना सामान उतारा। और पुराने लखनऊ की तफसील से सैर कराने के वास्ते टैक्सी वाले को धन्यवाद के साथ अलग से मेहनताना भी दिया। उसकी झुंझलाहट कम हुई,उसके चेहरे पर चमक आई उसने सलाम कर हमें विदा किया।
ट्रेन के आने के पश्चात अपनी सीटों पर बैठ जाने व 
ट्रेन के चल देने पर हमने भी खिड़की से प्लेटफार्म पर पीछे छूटते जाते लखनऊ को भावुक होकर विदा किया और हाथ हिलाये।

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@दिनेश चंद्र जोशी
मो.9411382560 

Tuesday, February 24, 2026

सिडनी से कैनबरा    दिनेश चन्द्र जोशी

 (दिनेश चन्द्र जोशी ने साहित्य की बहुत सारी विधाओं को साधा है। आजकल वे आस्ट्रेलिया में हैं । ‘लिखो यहाँ वहाँ ’ के लिये उन्होंने यह यात्रा-वृतान्त भेजा है )

  गत वर्ष,दिसम्बर 2025 के आखिरी दिन हम लोग प्रात: सात बजे सिडनी के बाखम हिल क्षेत्र से आस्ट्रेलिया की राजधानी कैनबरा के भ्रमण हेतु निकले।
कैनबरा नाम यहां के मूल निवासी आदिवासी समाज की भाषा से निकला है। जिसका अर्थ है, 'मिलने वाला स्थल'। यहां के 'नगाम्ब्री' व 'न्गुनवाल'
जनजाति के लोग जो यहां पर बीस हजार सालों से रहते आये थे तथा इस जगह पर आपस में किसी समारोह आदि के मौके पर मिलते थे,इसलिए इस स्थल का नाम कैनबरा है।
कुछ बुजुर्ग स्थानीय आदिवासियों का मानना है कि यह नाम ब्लैक माउंट व ऐंन्सिले पहाड़ियों के बीच की घाटीनुमा जगह होने के कारण स्त्रियों के स्तनों के मध्य स्थल का पर्यायवाची नाम है।
बहरहाल कैनबरा नाम के पीछे जो भी मान्यता सत्य हो,इतना तय है कि यह ब्रिटिश औपनिवेशिक देश से जुड़ा नाम नहीं है, जैसे यहां की पूर्व में प्रस्तावित राजधानी 'ईडन' शहर के बारे में कहा जाता।

सिडनी शहर के उत्तर पश्चिम क्षेत्र से अपने वाहन से चल कर हमें शहर के बाहरी दक्षिण पश्चिम क्षेत्र लिवरपूल तक जाने में लगभग 45 मिनट  का समय लग गया,प्रात: के समय ट्रैफिक कम था। यूं जाम की स्थिति तो दिन के सामान्य समय में कभी नहीं लगती। लिवरपूल नाम इंग्लेंड के शिपयार्ड शहर के नाम से ही लिया गया होगा,क्योंकि यहां आस्ट्रेलिया में कई सड़कों शहरों के नाम मूल ब्रिटेन के नामों से ही लिये गये हैं। सिडनी के इस लिवरपूल में पुराने युरोपियन वास्तु के घरों के साथ नयी बहुमंजिला इमारतें भी हैं। लिवरपूल से 'ह्यूम हाई वे' प्रारंभ होता है जो सिडनी से मेलबोर्न जाने का इनलेंड (गैरतटीय) राजमार्ग है। क्योंकि यह समुद्र तट के समानांतर न जा कर अंदरूनी जमीनी भू भाग से होकर जाता है इसीलिए इसे इनलैंड हाई वे कहते हैं। मैलबोर्न जाने का दूसरा  लोकप्रिय राजमार्ग तटीय इलाकों से होकर जाता है,इसे प्रिंसेस हाई वे कहते हैं। 'प्रिंसेस हाई वे' सिडनी के किंग स्ट्रीट न्यू टाउन से प्रांरभ होकर वूलंगगौंग उपनगर होते हुए अनेक सुरम्य तटीय शहरों से गुजरता हुआ
न्यू साउथ वेल्स राज्य को पार कर विक्टोरिया प्रांत में पंहुचता है। मेलबोर्न विक्टोरिया प्रांत की राजधानी है।
हमें चूंकि कैनबरा जाना था,जो मेलबोर्न की दिशा में ही है,लेकिन समुद्र तट पर स्थित न होकर अंदरूनी भू भाग पर स्थित है,इसलिए 'इनलेंड रुट' से ही कैनबरा जाने वाला राजमार्ग हमने चुना।
लिवरपूल सिडनी शहर का बाहरी छोर है, इसके आगे आधे घंटे की दूरी पर कैंपबैल टाउन उपनगर है। इस उपनगर में से काफी लोग सिडनी में काम काज के वास्ते आते हैं। किराया कम होने के कारण यहां निवास करना आसान है।
कैंपबैल टाउन उपनगर से आगे वास्तविक रूप से 'हाई वे' का अह्सास होता है। यहां हर पांच सौ हजार मीटर की दूरी पर गोल वृत्त से घिरा वाहन का स्पीड इंडीकेटर अवश्य नजर आता है। कैमरे से वाहन स्पीड की निगरानी रखे जाने वाले अलार्म संदेश भी नजर आते हैं।
हाई वे पर अधिकतम गति व न्यूनतम गति प्रति घंटा के निर्देश बोर्ड नजर आये।
कैंपबैल टाउन से आगे,काफी दूर तक आठ लेन हाई वे चलता रहा,आगे चल कर वह चार लेन में परिवर्तित हो गया था। 
ऐतिहासिक बैरिमा टाउन होते हुए हम सूटन फोरेस्ट क्षेत्र को पार कर निर्धारित तेज गति से आगे बढ़ते जा रहे थे। 
बायें हाथ की दिशा में 'इंजर्ड वाइल्ड लाइफ' व  
'पुलिस रडार यूज्ड इन दिस एरिया' के नोटिस बोर्ड लगे नजर आये। 
यह क्षेत्र युक्लिप्टस के जंगलों से युक्त चट्टानों को काट कर बनायी हुई चौड़ी सड़क के इर्दगिर्द ऊंचे नीचे ढालू भू दृश्यों के बाद फिर दूर तक समतल होते चले जाने वाले कुदरती नजारे का लुत्फ प्रदान कर रहा था।राजमार्ग पर जगह जगह वाहनों हेतु रिवाइव,सर्वाइव रैस्ट सेन्टर व रुकने के स्थल भी बने थे। जो हमारे यहां के आधुनिक हाईवेज पर बड़ी मुश्किल से नजर आते हैं।
बांये हाथ पर 'मौस वेल' व 'वूलंगगौंग' की ओर फटने वाले रास्ते के लिए एक्जिट का बोर्ड लगा देख कर यह भान हुआ की तटीय क्षेत्रों को जाने के कई
सुविधाजनक विकल्प प्रदान कर रक्खे हैं।


इसी राजमार्ग पर आगे चल कर एक घंटे बाद गोलबर्न नाम का ऐतिहासिक शहर आया।
इस शहर को आस्ट्रेलिया के प्रथम इनलेंड (गैरतटीय) शहर होने होने का सौभाग्य प्राप्त है। 1830-33 में शिलान्यास किये गये इस शहर का एक छोटे से अभियुक्त कैंप से शुरु होकर बड़ी खुशहाल आबादी बनने का सफर बड़ा रोचक है। 
1863 में इस कस्बे को प्रथम गैरतटीय समृद्ध शहर के नाम  से दस्तावेजों में दर्ज किया गया। यहां पर विक्टोरियन वास्तु के प्राचीन भवन,गिरिजाघर व डाकघर बना है।
मैरिनो भेड़ के ऊन उत्पादन के लिए प्रसिद्ध इस क्षेत्र की खासियत के कारण शहर के मध्य में मैरिनो
भेड़ की पाषाण मूर्ति बनी है। किसी भेड़ की विश्व भर में इतनी ऊंची यह अकेली पत्थर की प्रतिमा है।
इसको देखने के लिए खास तौर पर पर्यटक, गोलबर्न में रुकते हैं। हमने भी थोड़ी देर रुक कर मैरिनो के दर्शन किये व उसकी तस्वीर कैमरे में कैद की।
गोलबर्न से कैनबरा की दूरी भी एक घंटे की यात्रा में तय होती है। इस क्षेत्र में ऊंची नीची घाटियां कम हैं,ज्यादातर सपाट समतल रेगिस्तानी झाड़ीनुमा परिदृश्य दिखाई देते हैं।
गोलबर्न से आगे बढ़ते जाने पर मैलबोर्न वाले 'ह्यूम हाई वे' को छोड़ कर कैनबरा की तरफ जाने वाले फेडरल हाइवे की ओर मुड़ना पड़ता है। यहीं से आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी क्षेत्र प्रारंभ  हो जाता है। थोड़ी देर तक चलने के बाद एक बड़ी जल राशि के दर्शन हुए। इस झील के किनारे किनारे का रमणीय पथ बड़ा दर्शनीय लग रहा था। यह झील 'लेक जार्ज' के नाम से प्रसिद्ध है। ब्रिटेन के तत्कालीन सम्राट प्रतिनधि जार्ज तृतीत के नाम पर इस झील का नाम रक्खा गया है।
इसी इलाके में विंडमिलों की कतारें भी नजर आई जो बच्चों को बड़ी मनभावन लग रहीं थी।
लेक जार्ज से कैनबरा शहर बहुत पास है। आधे घंटे से भी कम दूरी पर। कैनबरा के पास आने पर हम लोग उत्सुकता से पुलकित हर्षित हुए जा रहे थे। आस्ट्रेलिया के बड़े तटीय शहरों से हट कर यह गैरतटीय राजधानी क्षेत्र था। इसे ए.सी.टी (आस्ट्रेलियाई कैपिटल टैरिटरी) कहते हैं,जैसे हमारे भारत के राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र  को एन.सी.आर कहा जाता है,ठीक वैसे ही।
कैनबरा को आस्ट्रेलिया की राजधानी बनाने से पहले अनेक अन्य विकल्प प्रस्तावित हुए,'ईडन टाउन' इनमें प्रमुख था।
बाद में मैलबोर्न और सिडनी दोनों के बीच राजधानी बनाने को लेकर जबरदस्त खींचतान हुई,अन्तत: इन दोनों बड़े शहरों को राजधानी न बना कर 1908 में कैनबरा को चुन लिया गया,जो इन दोनों बड़े शहरों के लगभग मध्य में स्थित है। एक कटोरेनुमा आकार के अत्यधिक क्षेत्रफल वाले खाली भू भाग,कैनबरा को राजधानी हेतु उपयुक्त पाया गया।
कैनबरा ठंडी जलवायु वाला शहर है। यहां जाड़ों में बर्फीली हवायें चलती हैं,तथा रात्रि में यदा कदा तापमान माइनस में चला जाता है।


हम लोग साढ़े दस बजे कैनबरा पंहुच  गये थे। वहां किंग्सटन एरिया में 'होली डे होम' बुक था, लेकिन आपस में यह तय हुआ कि पहले तीन घंटे बाहर घूम लिया जाय,फिर अपराह्न में वहां जाकर विश्राम करके सायं व रात्रि में बाजार आदि चहल पहल वाली जगहों पर चले जायेंगे।
कैनबरा शहर में प्रवेश करते ही एक खास परिवर्तन यह लगा कि यहां सिडनी के पुराने ढालू छतों वाले विक्टोरियन भवनों से हट कर नये वास्तु के बहुमंजिला अपार्टमेंट वाली आधुनिक इमारतों की भरमार है।
सुंदर कतारबद्ध पेड़ों से आच्छादित विस्तृत चौड़ी सड़कें,गोलाकार चौराहे,साफ सुथरे,पैदल पथ व साइकिल ट्रैक युक्त फुटपाथों से निर्मित इलाके को देख कर ही लगने लगा था कि यहां राजधानी की जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए सरकारी इमारतों का निर्माण किया गया है।
पार्लियामेंट हाउस,नेशनल लाइब्रेरी,म्यूजियम,वार मैमोरियल,हाई कोर्ट,आस्ट्रेलियन नेशनल यूनिवर्सिटी जैसी महत्वपूर्ण जगहें पास पास में ही पैदल दूरी पर अवस्थित होने के कारण पर्यटकों को घूमने में आसानी प्रदान करने के साथ राजधानी की गरिमा का अह्सास कराती हैं।
यह सब,एक सर्वथा नये क्षेत्र को राजधानी हेतु छांटे जाने के पश्चात प्रख्यात वास्तुविदों द्वारा टाउन प्लानिंग व निर्माण का नतीजा था। कुछ कुछ वैसे ही,जैसे हमारे यहां चंडीगढ़ और लुटियन की नई दिल्ली।
शहर के मध्य में मुख्य क्षेत्र में ऊंचे खंबों पर कतारबद्ध सभी राष्ट्रमंडल देशों के रंग-बिरंगे झंडे फहरा रहे थे। बड़ी सी इमारत के दांयें और बायें भाग में विश्व के लगभग डेड़ सौ देशों के प्रतीक बड़े मनोरम लग रहे थे।
हमने कार पार्क की और उतर कर उस नजारे का लुत्फ लिया। इंडिया का झंडा देख कर हम हर्षित हुए। 'बताओ ऐसा किस देश का झंडा है,जो आयताकार नहीं है?' साथ चल रहे मेजबान सज्जन ने मुझसे पूछा। मुझे ऐसे किसी झंडे का ध्यान नहीं आ रहा। मैने असमर्थता जाहिर की।
फिर उन्हीं झंडों में से एक की ओर इशारा करते हुए,वह बोले,वो देखिये,नेपाल का झंडा बीच से कटा हुआ है। वास्तव में नेपाल का झंडा बीच से कटा था,धार्मिक ध्वजा जैसा।
'अमेरिका,इंग्लैंड,के झंडे के प्रतीक चिह्न याद रहते हैं हमें,ऐन अपने पढ़ोसी का याद नहीं,'मुझे थोड़ा झेंप हुई।
दाहिनी ओर आने पर एक लंबी वर्तुलाकार मनोरम झील के दर्शन हुए। शहर के बीचोबीच बनी यह झील कैनबरा को अद्भुत आकर्षण प्रदान कर रही थी। इसके समानांतर किनारे बने रेस्तराओं पर पर्यटकों की चहल पहल से माहौल गुलजार था।
कैनबरा शहर के बीचोबीच स्थित यह झील वास्तव में एक कृत्रिम झील है। इसका नाम 'लेक ग्रिफिन' है।अमेरिकी वास्तुविद वाल्टर बर्ली ग्रिफिन को कैनबरा के मूल नक्सानवीस व टाउन प्लानर का श्रेय दिया जाता है,जिन्होंने 1907 में अभिकल्पित अपने नक्से में पास में अवस्थित एक नदी पर बांध बनाकर उसके पानी से शहर के केंद्र में 11 किलोमीटर लंबी तथा  लगभग सवा किलोमीटर चौड़ी वर्तुलाकार झील का डिजाइन तैयार किया था। बाद में कतिपय विवादों शंकाओं,संशोधनों की पैरवी व विश्व युद्ध आदि के कारण झील का निर्माण कार्य स्थगित हो गया।
बीसवी शताब्दी के दूसरे तीसरे दशक में पुराना पार्लियामेंट हाउस,सचिवालय भवन,प्रधान डाकघर  बन गये थे लेकिन कैनबरा शहर के आधुनिकीकरण का निर्माण रुका रहा। सन 1960 के पश्चात नयी पार्लियामेंट व सरकारी भवनों  सहित इस झील के निर्माण ने गति पकड़ी।
सन 1964 में तत्कालीन प्रधान मंत्री राबर्ट मैन्जींज ने निर्णायक कदम उठा कर द्रुत गति से झील का निर्माण पूरा कराया।
इस प्रकार 1907 में वास्तुविद वाल्टर बर्कले ग्रिफिन द्वारा तैयार किये गये मूल मानचित्र में कुछ संशोधनों के साथ अन्तत: यह झील बनी। लेकिन धरातल पर साकार होकर शहर के सौन्दर्य में चार चांद लगाने में इसे पांच दशक से ज्यादा का वक्त लग गया। 
कहा जाता है कि झील का नाम प्रधानमंत्री राबर्ट मैनजींज के नाम पर रखने की कुछ अधिकारियों ने सिफारिश की,लेकिन मैंनजीज ने अपना नाम न रख कर मूल वास्तुविद ग्रिफिन के नाम से ही झील का नामकरण किया। यह एक मिसाल है, मौलिक काम करने वालों को सम्मान अर्पित करने की इच्छा की।ऐसे जेनुइन व ईमानदार राजनेता हमारे देश में चिराग लेकर ढूंढ़ने पर भी नहीं मिलेंगे।
बहरहाल लेक ग्रिफिन आज कैनबरा शहर की शान है। इसमें नावें,याट,कियाकिंग चलती रहती है। साथ ही फिशिंग के प्वाइन्ट भी हैं।
लेक के समानांतर विस्तृत पार्क हैं,जिनमें  कलात्मक वास्तु के आकर्षण नजर आते हैं।
उस रोज दोपहर में हमने ओल्ड पार्लियामेंट भवन देखा जो अब दर्शकों हेतु म्यूजियम की तरह खोल दिया गया है। गाइड ने बताया कि जब 1907 में यह पार्लियामेंट बनी तब 75 एम.पी.थे,अब वर्तमान में 175 सदस्य हैं जो नये पार्लियामेंट भवन में बैठते हैं। पार्लियामेंट की गोलाकार खाली पड़ी सीटों पर बैठ कर हमें भी ऐतिहासिक गौरव का अह्सास हुआ। उसके पश्चात हम लोग पास में ही स्थित नेशनल लाइब्रेरी देखने गये। यह भव्य इमारत भी दर्शनीय है। भीतर कई मंजिलों में शांत विशाल हाल की रैकों में हजारों पुस्तकों को करीने से सजाया गया है। बैठ कर पढ़ने के लिए गोल मेजें व कुर्सियां रक्खी हैं। हर खंड के पास सहायता हेतु हैल्प काउंटर व डेस्कों में तत्पर विनम्र प्रतिनिधि बैठे मिले। बहुत बुजुर्ग प्रोफेसर नुमा विद्वानों सहित युवा शोधार्थी लाइब्रेरी के शांत वातावरण में ज्ञान पिपासा शांत करते नजर आये।


 

नेशनल लाइब्रेरी आफ आस्ट्रेलिया का भवन

 


दोपहर के बाद हम लोगों ने  किंग्सटन स्थित अपने 'होली डे होम में'  विश्राम किया। 'होली डे होम' की बालकनी से भी सुरम्य झील का एक हिस्सा इमारतों के बीच से आंख-मिचौली करता झांक रहा था।
दो ढाई घंटे आराम करने के बाद फिर कैनबरा की सांध्य व नाइट लाइफ देखने निकल पड़े। पैदल दूरी पर ही स्थित झील पर बने लकड़ी के पुल पार करते ही दाहिनी ओर की दिशा में  कतारबद्ध रेस्तराओं के खुले बरामदों में पर्यटकों व स्थानीय लोगों की पार्टियों का दौर परवान चढ़ाने लगा था। ऊंची ऊंची गोलाकार कुर्सी  मेजों में बैठ कर झील की ओर मुखातिब होते हुए वाइन के गिलास हाथ में लिये युवक युवति


यों सहित बुजुर्ग ही नहीं,अति बुजुर्ग महिला पुरुषों के समवेत स्वर गुंजायमान हो रहे थे। ऐसा लग रहा था,जिंदगी की सारी जद्दोजहद और चिंताओं को दूर झटक कर ये लोग सिर्फ व सिर्फ वर्तमान क्षणों का आनंद ले रहे हैं तथा अपने पसंदीदा पकवानों के साथ बीयर,वाइन आदि पेयों का दिव्यानंद प्राप्त कर अतंरग वार्तालाप में मशगूल हैं। अकेले दुकेले कम तीन चार के ग्रुप मे बैठै,  हंसते,मुस्कराते,ठहाकेदार वार्तालाप करते लोगों की शाम,अंधेरा घिरते घिरते पूरे शबाब पर पंहुच रही थी,झील के किनारे किनारे फुटपाथ पर चलते हुए मुख्तलिफ देशों के रेस्तराओं की कतार के बीच हमें इंडियन व गुरखा नेपाली रेस्तरां नजर आये। गोरखा रेस्तरां के वेटर-मैनेजर नेपाली टोपी पहने हुए अलग से पहचान में आ रहे थे।
कैनबरा में नेपाली समुदाय के काफी लोग दिखाई दिये। यूं तो पूरे आस्ट्रेलिया में नेपाली लोग अपने देश की आबादी के अनुपात में काफी हैं।  ब्रिटेन की रायल गोरखा बटालियन के कारण भी संभवत: इस देश में इनका अप्रवासन हुआ होगा।
हमने इंडियन रेस्तरां में ठेठ उत्तर भारतीय पंजाबी स्वाद का खाना खाया। मेक्सिकन ,थाई व चायनीज श्रीलंकन फूड के रेस्तरां भी हर जगह मौजूद रहते हैं। 
खाना खा कर हम लोग यहां के लकदक,भव्य बाजार यानी बूंडा स्ट्रीट गये। सेंटर में बड़े आधुनिक फैशन शो रूम, बुटीक मंहगे होटल,रेस्तरां,बार,पब आदि हैं।
रात में होली डे होम में आकर हमने आज छूट गयी जगहों की सूची बनायी और आज की सैर के नजारों से मुग्ध होते हुए आराम से सो गये।
सबसे अच्छी बात यह लगी कि बड़ा कैपिटल शहर होते हुए भी तीन चार किलोमीटर के दायरे में ही सारे स्थल मौजूद हैं। सरकारी कार्यालय,स्मारक,बाजार माल,पर्यटक केंद्र,पार्क व लेक। इतनी पास कि पैदल चलते हुए भी आराम से घूमा जा सके।
अगले दिन प्रात: 'होली डे होम' के अपार्टमेंट की बालकनी में बैठ कर बाहर का नजारा लिया तो सामने ग्राउंड में बने पार्क में सिर पर हैट पहने दो बुजुर्ग दिखे। वे पेवमेंट के इर्द गिर्द की सफाई के साथ सूखे पेड़ पौधों की सिचाई कर रहे थे। पार्क के एक छोर को,झील के बैक वाटर से मिला कर तालाब बना दिया गया था,उसमें बतखें अन्य पक्षी व जलीय वनस्पतियां मिल कर बड़ा सुंदर दृश्य रच रहीं थी। हाथ में ग्लव्स पहन कर बुजुर्ग महिला कूड़ा करकट उठा कर उसे एक पालीथीन में भर रही थी। बुजुर्ग 'जेट' से सिचाई कर रहे थे। आधा पौन घंटा उन्होने यह स्वैच्छिक सामाजिक कार्य किया,फिर एक छोटी सी ह्वील ट्राली में पाइप,पोर्टेबल पंप आदि लेकर अपने अपार्टमेंट की ओर चले गये।
उनका यह रोज का या साप्ताहिक रुटीन होगा।जीवन की सार्थकता के ऐसे प्रेरणादायी दृश्य देखकर मन तरल हो गया। ऐसे स्वैच्छिक काम करते अन्यत्र भी यहां लोग,खास तौर पर बुजुर्ग दिखाई जाते हैं। हमारे देश में ऐसा काम करने पर लोग उपहास करने लगते हैं।
'होली डे होम' के सुविधा सम्पन्न किचन में स्वयं नाश्ता तैयार कर हम लोगों ने नाश्ता किया और भ्रमण हेतु निकल पड़े।
आज के भ्रमण हेतु,नेशनल म्यूजियम,नेशनल गैलरी,वार मैमोरियल सहित अन्य आउटडोर जगहें भी प्रस्तावित थी।
म्यूजियम वास्तव में भव्य था। आदिवासी जनजीवन की झलकियों सहित नवनिर्माण की विरासत भी संजोई थी। नेशनल गैलरी,त्रिभुजाकार
ज्यामिति वास्तु पर आधारित विस्मित करने वाली इमारत है। इसके तलों में बनी सर्पिलाकार गैलरियों में स्थानीय व विश्व भर के कलाकारों की डेड़ लाख से अधिक कलाकृतियां प्रदर्शित की गयी हैं। 
वार मैमोरियल एक पहाड़ी की तलहटी में बना है।
उसको देखने भी पर्यटक आवश्यक रुप से आते हैं।
इसमें प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध सहित शांति सेना व सभी सैनिक अभियानों में प्राण गंवाने वाले योद्धाओं के नाम अंकित है। सैन्य अभियानों के कारण हताहत हुए आम नागरिकों का भी उल्लेख कर उन्हें भी श्रद्धांजलि दी गयी है। एनजैंक (आस्ट्रेलिया न्यूजीलैंड आर्मी कार्र्पस) दिवस परेड भी यहां हर साल 25 अप्रैल को आयोजित की जाती है।
एक खास बात यहां यह भी देखी कि राजधानी के अतिरिक्त छोटे छोटे शहरों व कस्बों में भी आवश्यक  रुप से वार मैमोरियल बने हैं,जो  काउन्सिल क्षेत्र के अन्तर्गत विभिन्न युद्धों में शहीद हुए स्थानीय सैनिकों की स्मृति में बने हैं। उनका रखरखाव व स्वच्छता का ध्यान काउन्सिल सहित पर्यटक स्वयं भी रखते हैं।
वार मैमोरियल के दर्शन के पश्चात माउन्ट एन्सिली पहाड़ी की चोटी तक का ड्राइव वाला लुभावना सफर तय किया। ऐसा लग रहा था जैसे हम अपने यहां उत्तराखंड की हल्की चढ़ाई वाले स्थल पर आ गये हैं। 850 मीटर की उंचाई पर स्थित इस ऊंचे 'लुक आउट' से कैनबरा शहर का विहंगम दृश्य बड़ा मनोहारी लगता है। ग्रिफिन लेक,दोनों पार्लियामेंट हाउस,वार मैमोरियल सहित सभी भवन,चौराहे,सड़कें व हरियाली 
दिखाई देती है। इस दृश्य  को देख कर ऐसा आभास होता है,जैसे वास्तुविद ग्रिफिन के बनाये नक्शे की कागजी अनुकृति साक्षात मूर्तिमान हो उठी हो। यहां से हमने शहर के विहंगम  मनोरम दृश्यों को मोबाइल कैमरे में कैद किया तथा वीडियो बनाये।
खूबसूरत माउन्ट एन्सिली की सैर के बाद हम लोग नेशनल आर्बोरिटम देखने गये। बोनसाई प्रजाति के पेड़ों सहित विविध जलवायु के वृक्षों की नर्सरी, पैदावार, संरक्षण के आश्चर्यजनक कारनामे यहां देखने को मिले। शहर के केन्द्र से छह सात किलोमीटर की दूरी पर 250 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला यह ढालूदार वनस्पति उद्यान एक माया लोक सा अद्भुत नजारे का आनंद प्रदान करता है। 40000 से अधिक दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां यहां मौजूद हैं।  उद्यान की सबसे ऊंची भूमि पर बने पौली हाउस में बोनसाई व पेन्जिंग प्रजाति के वृक्षों का म्युजियम, क्यूरेटरियम,विक्रय केन्द्र व गिफ्ट शाप है। बोनसाई प्रजाति के 70 से अधिक बृक्षों का आकर्षक संग्रह चकित करता है।
इस उद्यान का सबसे आकर्षक व मनोरंजन का केन्द्र है,यहां का भव्य कैफेटोरिया। शिखर पर स्थित इस कैफेटेरिया के 'सन रूफ' से झांकती रोशनी के तले,ग्लास वाल से अंदर बैठे बैठे उद्यान का विहंगम नजारा लिया जा सकता है। हमने भी वहां बैठ कर कौफी पी व स्नेक्स लिए और काफी देर तक खूबसूरत दृश्यों का आनंद लिया। केफेटेरिया के विशाल हाल में सकून से बैठै पर्यटक, प्रकृति का आनंद लेते हुए गपशप करते प्रफुल्लित नजर आये 
हमने फिर गाड़ी में बैठ कर समूचे उद्यान का भ्रमण किया। हिमालयन सीडार (देवदार) वृक्षों का जंगल बड़ा सम्मोहक लग रहा था। लेकिन अपने उत्तराखंड के घने और ऊंचे देवदारों के सामने वे कम ऊंचाई के दोयम ही नजर आ रहे थे।
एक और अचम्भित करने वाली बात  यह लगी कि इतने बड़े भ्रमण के दौरान सरकारी इमारतों,सार्वजनिक स्थलों,सड़कों चौराहों पर हमें कहीं भी वर्दीधारी पुलिस,दरबान या गार्ड नजर नहीं आये,यह रहस्य अनसुलझा ही रहा कि कैसे इतने शांतिपूर्ण व्यवस्थित तरीके से बिना सुरक्षा के शहर का संचालन होता है,संभवत: चुपचाप कैमरों से निगरानी हो रही होगी। कहीं भी पहचान-पत्र,पासपोर्ट दिखाने या नाम पता मोबाइल नम्बर आदि दर्ज कराने को नहीं कहा गया।
उस रोज का हमारा भ्रमण का कोटा समाप्त हो गया था।
हम लोग शारीरिक रुप से थक गये थे लेकिन मानसिक रूप से परम आनंदित पुलकित थे

 अगले दिन हमें सिडनी लौट जाना था। इसलिए नाश्ते के बाद अगले दिन पूर्वाह्न में हमने कार में बैठे बैठे चक्कर लगाते हुए बार पुन: कैनबरा शहर के सिविक सेंटर मार्केट की चहल पहल देखी।

सेंट्रल प्लाजा में आस्ट्रेलिया की प्रसिद्ध चिड़िया 'मैगपाई' की बड़ी सी ऊंची मूर्ति एक प्लेटफार्म के ऊपर बनी देखी। 'बिग स्वूप' के नाम से विख्यात यह वास्तु कला पर्यटकों को आकर्षित करने तथा पक्षियों के प्रति सम्मान व प्रेम को प्रकट करने का नायाब उदाहरण लगी। मैरिनो भेड़ की मूर्ति के बाद यह पक्षी की प्रतिमा। यहां महान व्यक्तियों,नेताओं  के स्टेच्यू,पार्क चौराहों आदि में नहीं दिखे जैसे हमारे देश में बहुतायत में मिल जाते हैं।
अब हमारे भ्रमण का आखिरी मकसद बचा था,एक बार यहां के भारतीय दूतावास व अन्य दूतावासों को बाहरी बाहर देखते हुए एम्बैसी एरिया का नजारा लेने के बाद सिडनी को जाने वाले हाई को पकड़ना ताकि अपराह्न में हम आराम से सिडनी स्थित निवास में पहुंच जायें।
बिना जाम की खूब खुली चौड़ी सड़कों में कार  चलाते हुए हम यारामूला क्षेत्र के 'डिकिन' में स्थित दूतावास वाले इलाके में पंहुच गये। यह शांत भव्य इलाका विभिन्न देशों के स्थानीय वास्तु प्रतीकों से सुसज्जित उच्चायुक्त भवनों की खूबी के लिए प्रसिद्ध है। भारतीय दूतावास, यू.एस.ए. दूतावास के बगल में था,लोग हम इस बात से हर्षित हुए। 
चीनी दूतावास तथा न्यू पापुआ गिनी के दूतावास अपनी विशिष्ट वास्तु छटा से सबसे ज्यादा आकर्षित कर रहे थे। अपने देश सहित,पास पास सटे लगभग पचास से अधिक देशों के दूतावास भवनों की छवि को निहार कर हम अपने गंतव्य की ओर चल निकले। राजधानी से बाहर निकलते ही हमने सिडनी की ओर जाने वाली सड़क पकड़ ली।
लेक जार्ज झील के तट से होकर लौटने के पश्चात गोलबर्न शहर के मध्य से गुजरते हुए,कैनबरा भ्रमण की संचित यादों से सम्मोहित,प्रफुल्लित हम चार घंटे का सफर तय कर शाम को सिडनी के बाखम हिल स्थित अपने निवास पर पंहुच गये।


Sunday, September 28, 2014

नन्दा राजजात के फलितार्थ

(हाल ही में संपन्न हुई नन्दा राजजात यात्रा को लेकर मीडिया में खूब चर्चा रही .दिनेश चन्द्र जोशी ने इस आलेख में राजजात यात्रा के आयोजन को लेकर कुछ जरूरी सवाल उठाये हैं जो एक लोकधर्मी सांस्कृतिक यात्रा को आडंबरपूर्ण उत्सवी माहोल में बदलने से उत्पन्न संकटों की ओर संकेत करते हैं)

दिनेश चंद्र जोशी


उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में चल रही नन्दा राजजात यात्रा अब लगभग सकुशल सम्पन्न हो चुकी है। लगभग, इसलिये कहना पड़ रहा है कि मौसम की मार व अति दुर्गम मार्ग के कारण समय समय पर अनिष्ट की आशंका बनी रही,ऊपर से अनियंत्रित भीड़ का जमावड़ा पुलिस प्रशासन के लिये चिन्ता का कारण बना। कुछ लोगों के वापिस घर न पहुचने व लापता हो जाने की खबरें भी आ रही हैं।
बहरहाल अपनी हर साल की बाढ़, भूस्खलन, आपदा जैसी स्यापा प्रधान खबर से हट कर इस वर्ष की यह उत्सवधर्मी घटना कही जा सकती है। नन्दा राजजात की अर्थवत्त्ता से प्रदेश के बाहर वाले क्या, यहीं के बहुसंख्य जन अनभिज्ञ थे। इसका कारण एक तो बारह वर्ष पश्चात इसका दुबारा आयोजन होना तथा एक सीमित भूगोल के वासियों द्वारा इसमें शिरकत करना माना जा सकता है।
एतिहासिक रुप से यह यात्रा सातवी शताब्दी पूर्व के पाल राजवंशी राजा शालिपाल के समय से प्रचलित है। कन्नौज के राजा जसधवल का लावलश्कर के साथ इस यात्रा में शामिल होने, पातर (नर्तकियों) नचाने तथा मौसम की मार के कारण सैकड़ों लोगों के काल कवलित होने के संदर्भ इतिहास में मिलते हैं।रुपकुंड में पाये जाने वाले नर कंकालों को भी उस घटना से जोड़ा जाता है। बीच बीच में कुछ समय के लिये बाधित होकर ब्रिटिश काल में भी एशिया  महाद्वीप की यह सबसे दुर्गम ऊचाई वाले पथ की 280 कीलोमीटर लम्बी सांस्कृतिक धार्मिक यात्रा अनवरत चल रही है।
इधर राज्य निर्माण के पश्चात पिछले वर्ष 2013 की यात्रा को आपदा के कारण स्थगित करके इस वर्ष 2014 में सम्पन्न किया गया। नये राज्य के नव उत्साह व मीडिया की सक्रियता के कारण यह यात्रा बेहद ग्लैमरस नजर आई। पिछले दो तीन वर्षों से राजजात आयोजन समिति के गठन, पुनर्गठन तैयारियों व आर्थिक, प्रशासनिक प्रबन्धन की खबरें समय-समय पर आती रही। इन्ही तैयारियों के फलस्वरूप इस वर्ष की यात्रा के शुभारम्भ पर चढ़ावा व श्रीफल राष्ट्रपति महोदय के कर कमलों से प्रदान करवा कर समिति ने यात्रा को राष्ट्रीय पहचान दिलाने का प्रयास किया।
राजजात समिति में वर्चस्व किन विचारधाराओं का रहा , यह तो नहीं कहा जा सकता पर, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को खास तवज्जो नहीं मिली, ऐसा सुनने में आया। राज्यसभा सांसद तरूण विजय का नाम बार बार आता रहा, अलबत्ता राष्ट्रपति महोदय द्वारा श्रीफल प्रदान करवा कर इसे गैर राजनैतिक रंग देने की नीति संतुलित कही जा सकती है,वरना कहीं मोदी जी के हाथों यह काम करवा दिया जाता तो बात बिगड़ सकती थी।
        बहरहाल राजनैतिक मंतव्य चाहे जो रहे हों, अब यात्रा सकुशल संपन्न हो चुकी है, यह राहत की बात है। गोया बेदनी बुग्याल जैसी 15000 फिट की दुर्गम ऊंचाई में 50,000 यात्रियों के जमावड़ा लगने के बावजूद आंधी, तूफान,वर्षा व हिमपात के कोप का प्रचन्ड रूप न लेने की सुखदायी धटना सांसतभरी है।
पर, क्या इतनी ऊंची दुर्गम लोक यात्रा में इतनी अधिक भीड़ जुटनी या जुटाई जानी चाहिये? जबकि  एक महाविनाश की त्रासदी अभी स्मृतियों में बिल्कुल ताजा है। उस त्रासदी से सबक लेने के बजाय इस भीड़ आकर्षण को क्यों बढ़ावा दिया जा रहा है ,यह बात समझ से परे है। इसके पीछे फेसबुकवादी व्यक्तिगत मीडिया से लेकर स्थानीय, राष्ट्रीय यहां तक कि विदेशी मीडिया भी सक्रिय हो गया था। लिहाजा एक निहायत शान्त, शालीन,एकाकी व भव्यताविरोधी आस्था पर्व को रैलीनुमा  भीड़ में तब्दील कर दिया गया। ऐसी खबरें भी आ रहीं हैं कि कुछ लोग घर नहीं लौटे, लापता हो गये हैं। लोकपर्व के बाजारीकरण  की ऐसी पराकाष्ठा आखिर हमें कहां ले जायेग! इस प्रचारवादी नीति से न तो उत्सवों की मौलिकता बचेगी और न ही पावनता, शुचिता। उत्साहीजन कहेंगें कि क्या बिगड़ गया, पहाड़ों के उजड़े गांवों के लोग अपने घर लौटे, दिल्ली,मुम्बई व विदेशों से भी प्रवासीजन तथा पर्यटक इस यात्रा में शामिल होने पंहुचे,पहली बार। यह खाये पीये, अघाये प्रवासियों का नोस्टलजिया बहुत भावुकतापूर्ण होता है, वे आते हैं तो अपनी कुल देवी या देवता को पूजने,ताकि अनिष्ट से बचें रहें; गांवों की दुर्दशा को सुधारने या वहां बसने-बसाने की उनकी कोई मंशा नहीं होती ।उल्टा वे पहाड़ों के धूसर उजड़े गांवों व सुरम्य प्रकृति पर फिल्म,वीडियो आदि बना कर अपना निजी स्वार्थ साधते हैं।        
           यह सच है कि नन्दा मघ्य हिमालय के सीमान्त जिलों व उससे सटे जनपदों के जनमानस की जातीय चेतना में सदियों से रची बसी एक बेहद अलौकिक आस्था की प्रतीक है। पर्वतीय अंचलों के बच्चे होश संभालते ही नंदा देवी, नंदाष्टमी,नैनादेवी नाम के मन्दिरों व मेलों से परिचित होते हैं। भूगोल की जानकारी होने पर उनका त्रिशूल,पंचचूली के साथ नन्दादेवी नाम की उच्च हिमालयी चोटी से भी परिचय होता है। इस दृष्टि से नन्दा राजजात के प्रति जन मन में औत्सुक्य व उत्साह का संचार होना लाजमी है।
        नई पीढ़ी का वास्तव में इस शब्द ने इस बार पहली बार ध्यान खींचा है, इसे मीडिया का प्रभाव मान सकते हैं।राजजात के अर्थानुसार तो यह राजजात्रा अथवा राजाओं की यात्रा ही थी। इसमें कुंवर ,कत्यूरी, पंवार, चन्द वंशीय राजाओं के वंशजों,  क्षत्रियों व ब्राहमण कुलपुरोहितों की भागीदारी होती है, निम्न जातियों व ,दलितों की भूमिका का कोई जिक्र नहीं होता। होता भी होगा तो वह ढोल दमुआ,,रणसिंघा बजाने वाले बाजियो के रूप में या दोली ढोने वाले कहारों के रूप में, संभवतः डोली भी उनको स्पर्श नहीं करने दी जाती है। इस लिहाज से यह राजकुलीन भद्र सामन्ती यात्रा है। समय के अनुसार इसमें कितना बदलाव आया; आया या नहीं, यह भी विचारणीय प्रश्न है।
नन्दा की डोलियों, छतोलियों के अनेक समूहों के सम्मिलन स्थलों ,गांवों में उनके पहुंचने पर पसुवा, जागर,अवतार देवी देवता अवतरण जैसी आदिवासी अवैज्ञानिक अन्धविश्वासी रीतियो, पद्धति्यों का इस यात्रा में जम कर संवर्घन संरक्षण हुआ जो किसी मायने में लोक हितकारी नहीं है। ऐसी प्रथाओं से नई पीढ़ी का जितना कम परिचय हो उतना अच्छा है।
        नन्दा को मायके भेजने के भावुकतापूर्ण लोकगीत व महि्माओं के सामुहिक रुदन के दृश्य एक और जहां पहाड़ की परिश्रमी नारी के स्नेहसूत्र व भावविह्वलता को दर्शाते हैं वहीं यह प्रश्न भी छोड़ जाते हैं कि सीमान्त पर्वतीय नारी आखिर कब तक इतनी भावुकता ढोती रहेगी।
यद्यपि इन्हीं नारियों के बीच से बछेन्द्री पाल व चन्द्रप्रभा ऐतवाल जैसी साहसी पर्वतारोही महिलायें भी उभर कर आई हैं। अब वक्त आ गया है, बहुत प्राचीन भावुकतापूर्ण मिथकीय प्रतीकों के बजाय ठोस आधुनिक प्रगतिशील नन्दाओं  के प्रतीकों का प्रचार प्रसार किया जाय और परम्परागत राजजात को अल्प तामझाम व एकान्तप्रियता के साथ ही सम्पन्न किया जाय।
ताजा खबरें आई हैं कि इस यात्रा की भीड़ में यारसागम्बू जड़ी(कीड़ा जड़ी) के दोहन करने वाले माफिया भी शरीक हो गये थे जो बेदनी बुग्याल के आसपास अपने अभियान में लिप्त पाये गये। भीड़ , प्रचार व बाजारवादी यात्रा में ऐसा होना तय है, चाहे वह बद्री केदार की धार्मिक यात्रा हो अथवा नन्दा राजजात की लोकधर्मी संस्कृतिक यात्रा।
पारिस्थिकी व पर्यावरण पर इस भीड़ का कितना दुष्प्रभाव पड़ा यह तो बेदनी बुगयाल के रौंदे गये चरागाह बयान करेंगें।
एकमात्र मूक प्राणी , चारसिंघा खाड़ू (चार सींग वाला बकरा) जोकि यात्रा की अगुवाई करता है तथा अन्त में निर्जन हिमघाटी में अकेला छोड़ दिया जाता है, पर क्या बीतती होगी । लगता है मेनका गांधी के पी. एफ. ए. को इस निरीह प्राणी के साथ हुए अन्याय की खबर नहीं हैं।
भीड़ व बाजार के केन्द्र पहले चौरस घाटियों ,मैदानों के समतल हाट मेले हूआ करते थे। अब राज्य निर्माण के
पश्चात एक और विकृति आ गई है कि शान्त उच्च हिमालयी स्थलों, बुग्यालों, चोटियों में भी हो हल्ला हुड़दंग से भरपूर धार्मिक सांस्कृतिक राजनैतिक आयोजन सम्पन्न किये जाने लगे हैं, जिससे पहाड़ के पर्यावरण के साथ साथ सामाजिक ताने बाने को भी क्षति पहुंच रही है।
पहाड़ अपने स्वाभाविक रूप में अतिविकसित होने व अति जनभार को वहन करने के काबिल नहीं हैं, उनके विकास का माडल संतुलित,शान्त, एकाकी, पुरानी ग्राम बसाहटों के स्वरुप के अनुकूल होना चाहिये। राजधानी, केबिनेट मीटिंग और सरकार की रैलि्यों से पहाड़ की शान्ति व  एकान्तप्रियता भंग हो यह कौन न चाहेगा ?