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Thursday, August 6, 2026

संतरों के उजाले - फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि : यादवेन्द्र

 

 

  

 

 

 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति


 
 (  निर्वासन , विस्थापन और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति के विभिन्न कलात्मक रूपों से गुजरते हुए यादवेन्द्र ने इस आलेख में   फिलिस्तीन के सांस्कृतिक परिद्र्श्य पर एक लग दृष्टिकोण से नज़र डाली है।  हम इस आलेख के लिये यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं)
 
 
संतरों के उजाले : फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि 

 

हममें से कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जो भूगोल के बाहर या उस से परे हो, न ही भूगोल को लेकर छिड़े संघर्ष से हम कभी पूरी तरह से मुक्त या असंबद्ध और निरपेक्ष हो सकते हैं। संघर्ष निहायत संश्लिष्ट  और दिलचस्प होता है क्योंकि यह न सिर्फ़ सैनिकों और तोपों की बात करता है बल्कि इसको निर्मित करने में शामिल होते हैं विचार, संरचना, बिंब और कल्पना भी।
निर्वासन चीजों को दो स्तरों पर देखता है - हम पीछे क्या छोड़ आए हैं और काल और स्थान की वर्तमान स्थिति में नई जगह पर क्या है? इसलिए किसी बात या घटना को अपने एकांगीपन में नहीं देखा जा सकता बल्कि संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा।
                                                                                -     एडवर्ड सईद
 

तरबूज, संतरे, जैतून और बैंगन इन सबको एक सूत्र में बांधने वाला सामान्य कारक क्या है?

वैसे तकनीकी तौर पर तो यह सभी फल हैं। हो सकता है आपको यह सभी स्वादिष्ट भी लगते हों लेकिन फिलिस्तीनियों के लिए वे उनकी संस्कृति और जातीय पहचान के प्रतीक हैं। फिलिस्तीनी इन सबको अपनी राष्ट्रीय पहचान और अपनी धरती से जुड़ाव के तौर पर देखते हैं जहां एक दिन लौट कर जाने का उनका संकल्प उनके मन मस्तिष्क  में पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी बसा हुआ है। यही कारण है कि यह सब मामूली लगने वाली चीजें  फिलिस्तीनी प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में भी देखी जाती  हैं। यहाँ इस आलेख में हम फिलिस्तीनी संतरों की बात करेंगे। 

फिलिस्तीन में संतरों की बागवानी का इतिहास लिखने वाले प्रो मुस्तफ़ा काभा  ने लिखा है कि 1920 के दशक में फिलिस्तीनी प्रेस ने अपने नागरिकों के सामने यह सवाल बड़ी प्रमुखता के साथ रखा था कि आज़ादी मिलने पर वे अपना राष्ट्रीय ध्वज किस तरह का बनाना चाहते हैं ? सबसे ज्यादा लोगों ने संतरे के रंग का झंडा सुझाया हालाँकि इतिहास ने अपनी तरह से करवटें बदलीं और स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना का स्वप्न धूमिल पड़ गया .लेकिन आज भी दुनिया भर में रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए संतरे उनकी मातृभूमि के सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतीक हैं। 

फिलिस्तीन के राष्ट्र कवि माने जाने वाले महमूद दरवेश ने अपनी एक कविता में लिखा है :

सूरज तुम्हारे दिल को 
संतरे के उजाले से 
भर देता है।
              
 
 
 
 
मैं जाफा के संतरों और शरणार्थियो की स्मृतियों की सौगंध खाकर ऐलान करता हूं कि हम न उन्हें बख्शेंगे जिन्होंने हमारी धरती का सौदा किया है, न उन्हें चैन से रहने देंगे जिन्होंने उसे खरीदा।
               जॉर्ज हबाश 
(पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ़ फिलिस्तीन  के संस्थापक)


विस्थापित होने के बाद पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी फिलिस्तीनी शरणार्थी यह कभी नहीं भूले कि इजराइलियों ने उनके गांव कस्बों पर कब्जा करते ही सबसे पहले जो काम किया वह था जैतून और संतरे के बागों को तहस नहस कर देना जिससे वे यह दावा कभी न कर सके कि संतरे वे इस धरती पर सदियों से उगाते आए हैं और इजराइली तो बहुत बाद में दूसरे देशों से वहां पहुंचे हैं - यह धरती मूलतः फिलिस्तीनियों की ही है।संतरे के बागों को उजाड़ना इजराइलियों का एक सैद्धांतिक जेहाद था - कि न इस धरती पर फिलिस्तीनी रहते थे न उनके बाग बगीचों का कोई अस्तित्व है।

फिलिस्तीनी मूल की कवि,कलाकार,फ़िल्म  निर्देशक  एनीमेरी ज़ाकिर की फ़िल्म साल्ट ऑफ दिस सी में अमेरिका में पली बढ़ी और रह रही सोरैया अमेरिका से फिलिस्तीन लौटती है पिता की मृत्यु के बाद , 1948 में दादा को सबकुछ छोड़ छाड़ कर भागना पड़ा था। रामल्ला में रहने वाले नए बने अपने दोस्त इमाद के साथ बात करते हुए अमेरिका छोड़कर फिलिस्तीन आकर रहने का इरादा करने वाली सुरैया कहती है कि  उसके दादा हमेशा फिलिस्तीन की धरती की बातें किया करते थे। उनकी सुनाई ढेर सारी कहानियों में इतना फिलिस्तीन था कि मुझे लगा कि मैं एक दिन यहां आकर जरूर रहूंगी। उसे दादा की सुनाई यहां पैदा होने वाले संतरे की कहानियां याद हैं। इमाद को भी याद आता है कि उसने जीवन में जितने भी संतरे खाए हैं उनमें फिलिस्तीन के संतरों का स्वाद सबसे अलग था। सुरैया के लिए फिलिस्तीन जाकर नया  जीवन शुरू करना उसका आदर्श था... इस तरह वह अपने दादा की स्मृतियों के भी ज्यादा करीब बनी रहेगी।और  संतरा उसके लिए फिलिस्तीन की संस्कृति का प्रतीक है।
यही कारण है कि वह अपने जन्म स्थान पर पहुंचकर पुराने घर को देखती है तो सबसे पहला  काम वहां के बाग में जाकर प्यार से संतरे निहारने और तोड़ने का  करती है। यह काम सुरैया को उसके पारंपरिक जीवन के साथ जोड़ता है। उसे लगता है कि वह जब यहां आकर  रहने लगेगी तो अपने लोगों के बीच रह कर धीरे-धीरे अपनी जड़ों के साथ उसका रिश्ता ज्यादा सार्थक और सघन रूप में जुड़ जाएगा।

उसके दादा को 1948 में जब जाफा छोड़कर भागने की नौबत आई थी तो ब्रिटिश पेलिस्टीनियन बैंक में उनके पैसे जमा थे। सुरैया अपने दादा के उन पैसों को वापस लेना चाहती है जो राशि अब बढ़ कर 15000 डॉलर तक पहुंच गई है। जब बैंक  पैसे इस आधार पर वापस देने से मना कर देता है कि उनके रिकॉर्ड में उसके दादा के नाम का अब कोई ग्राहक नहीं है तो सुरैया उस बैंक को लूटने की योजना (निर्देशक का काल्पनिक हस्तक्षेप ) बनाती है। वह अपने फिलिस्तीनी  दोस्त इमाद के साथ मिलकर बैंक लूट भी लेती है (जब इजराइलियों ने फिलिस्तीनियों के माल असबाब बाग घर और जमीन जायदाद सब लूट लिए तो बदले में उनका बैंक लूटना कोई गुनाह नहीं है ,यह प्रतिरोध है)

इमाद - तुम यह बताओ यहां ऐसा क्या रखा है जो तुम्हें खींच लाया?
सुरैया - हमारा यहां कुछ था जो पीछे छूट गया... यहां हमारी जिंदगी थी। हमारा जो कुछ भी था वह इन्होंने लूट लिया।

सुरैया के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि उसके दादा का बनवाया अपना घर अभी एक इजराइली स्त्री के हवाले है जिसने रहम  करके उन्हें रात भर रुकने का नेता दिया है। 
सुरैया - मैं यह तय करुंगी कि तुम यहां इस घर में रहोगी या नहीं। ये खिड़कियां, ये दीवारें यह सब हमारे घरों की हैं... हमारे घरों से चुराई हुई हैं।
               
 सुरैया इमाद के साथ मिलकर अपने लिए अल दवाइमा में अपने सपने का घर बनाना चाहती  है ... 1948 के कत्लेआम में पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया अल दवाइमा अब भी उजाड़ पड़ा हुआ है। निर्देशन में बड़ी वैचारिक कल्पनाशीलता के साथ यहां अतीत और भविष्य को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

फिल्म में संतरों का उपयोग कई स्तरों पर कुछ कहने की कोशिश करता है - सबसे पहले तो यह कि अपने नए घर और देश को सुरैया उम्मीद भरी नज़रों से देखती है। दूसरे स्तर पर देखें तो संतरे फिलिस्तीन पर इजराइल के कब्जे के विरुद्ध एक रूपक के तौर पर दिखाई देते हैं। फिलिस्तीन सहित अनेक अरबी फिल्मकार अपनी फिल्मों में संतरों को प्रतिरोध के उस प्रतीक के तौर पर देखते और दिखाते हैं जिस पर राजनैतिक एजेंडा का प्रचार कह कर प्रतिबंध लगाना मुश्किल है।

यह फ़िल्म सामूहिक इतिहास के पुनर्लेखन आंदोलन का एक हिस्सा है। यह फिलिस्तीनी इतिहास के उस पक्ष को उजागर करने की कोशिश करती है जिसपर दुनिया भर का मेनस्ट्रीम मीडिया आमतौर पर चुप्पी साधे रहता है।
यह निरा संयोग नहीं है कि फ़िल्म अक्टूबर 1948 के अल दवाइमा कत्लेआम की स्मृति को समर्पित है।

फिलिस्तीन के संतरों पर मुस्तफा काभा और नहुम कार्लिंस्की की बेहद चार्चित किताब है द लॉस्ट ऑर्चर्ड: द पेलेस्टीनियन अरब साइट्रस इंडस्ट्री,1850-1949 जिसमें वे दिलचस्प बात उद्घाटित करते हैं कि  फिलिस्तीन के सर्वाधिक चर्चित और प्रतिनिधि कवि महमूद दरवेश की कविताओं में संतरों का ज़िक्र 67 बार आता है। 
अपनी शोध आधारित खिताब में काभा और कार्लिंस्की बताते हैं कि 1948 के पहले फिलिस्तीन में संतरे के ज्यादातर बगीचे फिलिस्तीनियों के थे लेकिन यहूदियों की आवक के कारण दोनों के बीच व्यावसायिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती चली गई। 1948 के बाद जब बड़ी संख्या में यहूदियों ने फिलिस्तीनियों को उनके धरती से खदेड़ कर निर्वासन में भेज दिया तो बड़े जोर शोर से यह नैरेटिव चलाया गया कि यहां की धरती पर फिलिस्तीनी कभी थे ही नहीं, जो कुछ भी हरा भरा इस पर दिख रहा है वह बाहर से आकर बस गए यहूदी सेटलर के पराक्रम के कारण है। देखते-देखते जिन संतरों को दुनिया भर में फिलिस्तीनी संतरा कहा जाता था उसे इजराइली संतरा कह के बेचा जाने लगा।

किताब में काभा लिखते हैं: मैं अपने पिता के साथ पहली बार जाफा 8 साल की उम्र में गया था, उस यात्रा में मुझे बहुत निराशा हुई थी क्योंकि उस जगह को लेकर मेरे मन में जो कल्पनाएं थीं चित्र थे वास्तविकता उससे बहुत मिलती-जुलती नहीं लगी। इस बारे में जब मैंने अपने पिता से पूछा तो उनके जवाब भी बहुत संतुष्ट करने वाले नहीं थे, वह बहुत कम शब्दों में और अस्पष्ट ढंग से उनका जवाब दे देते थे जैसे मेरे सवालों को टाल रहे हों।इसके 11 साल बाद हम फिर से जाफ़ा गए। इस बार मुझे पिता ज्यादा खुले हुए और साफ-साफ बातें करते हुए दिखाई दिए ,इससे पहले मैंने उनको कभी इस तरह की स्पष्टवादिता  के साथ नहीं देखा था। मुझे मई 1948 के उस दिन के उनके बताए विवरण ने बहुत छुआ जो यहूदियों के आक्रमण के बाद वहां उनका अंतिम दिन था। उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत दुख निराशा और पीड़ा हुई। उसके बाद में जब कभी भी जाफ़ा जाता हूं मेरा मन तरल भावनाओं के कारण बहुत भारी हो जाता है और मन ही मन में उन दिनों की तस्वीर बनाने लगता हूं जब मेरे परिवार को अचानक सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा होगा - अपनों की लाशों को, अपने बागों को, बाजार और यहां वहां की हवा में तैरते संतरों के फूलों की खुशबू को भी।

वे आगे लिखते हैं कि आज के दौर में जाफ़ा और फिलिस्तीनी के अन्य इलाकों के पुराने संतरे के बागानों के बारे में जानकारी एकत्र कर पाना बहुत कठिन है - आधी अधूरी स्मृतियां, अभिलेखागारों के अंदर धूल भरे दस्तावेज, पुराने उखड़े हुए पेड़ ही मिलेंगे और मिलेंगे भी तो नए मालिकों के बागानों में लगे नई नई नस्लों के नए पेड़। जो इलाका पहले अपनी उर्वर भूमि, कुओं और तालाबों के लिए जाना जाता था उस पर बुलडोजर चला कर सारे बागान नष्ट कर डाले गए और सीमेंट की नई बुनियाद डाल कर ऊंचे अपार्टमेंट निर्मित कर पूरा नक्शा बदल डाला गया। ऐसे में पुरानी खुशबू को फिर से प्राप्त कर लेने की क्या ही उम्मीद की जा सकती है।

मशहूर फिलिस्तीनी पत्रकार लेखक कवि घसन कनाफानी की बहुचर्चित कहानी है ' द लैंड ऑफ़ सैड ऑरेंजेज़' जिसमें  संतरों को फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद का रूपक बना कर प्रस्तुत किया गया है।कनाफानी मानते थे कि यह संतरे उन्हें उनकी धरती, स्मृति, उनके छोड़े हुए घर परिवार के साथ जोड़े रखते  हैं जिसमें एक दिन अपने गांव घर देश लौट कर जाने का अधिकार और संकल्प निहित है।

कहानी 1948 के नक्बा के दौरान दो बच्चों  के बीच की बातचीत से शुरू होती है। वे देखते हैं कि आस पड़ोस के परिवार के लोगों को अपने बहुत जतन से पाले पोसे और बड़े किए गए संतरे के पेड़ों को छोड़कर आनन फ़ानन में कहीं  दूर जाना पड़ रहा है। सब लोग बड़ी सी फौजी गाड़ी  में ठूँस ठूँस कर लादे  जा रहे हैं , बच्चों को उसमें बैठते हुए यह लगता है कि वे सब घर परिवार और पड़ोसियों के साथ कहीं सैर सपाटे पर  जा रहे हैं। अपनी  इस यात्रा में वे देखते हैं कि सड़क के किनारे किनारे उनके साथ संतरे के पेड़ भी चल रहे हैं - दर असल जहाँ जहाँ वे जाते हैं हर जगह संतरे के पेड़ नज़र  आते हैं तो उनके बाल मन को  लगता है कि वे भी सबके साथ साथ चल रहे हैं। 

इस संवाद के बाद यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि जहां कहीं भी फिलिस्तीनी जाते हैं वहां उनके साथ-साथ चलते हुए संतरे के पेड़ क्यों पहुंच जाते हैं।यह भी समझ में आता है कि जब फिलिस्तीनी औरतें बाहर के इलाकों में पहुँच कर  संतरे  खरीदती हैं तो इतनी कातर क्यों हो जाती हैं कि उन्हें रुलाई  आने लगती है? और पिता की नजर जैसे ही किसी संतरे पर पड़ती है तो वे बच्चों की तरह फफक फफक कर  रोने क्यों लगते हैं? 
कहानी में जब पूरा परिवार अपने संतरों के पेड़ों से आच्छादित जगह को छोड़कर जान बचाने को भागने लगता है तो कहानी का वाचक बच्चा अचानक सयाना  और समझदार हो जाता है और स्वयं दहाड़ें मार कर रोने लगता है। वह कोई मामूली जगह नहीं थी बल्कि सभी फिलिस्तीनियों की सामूहिक विरासत थी जिसे छोड़कर उन्हें भागना पड़ा।
लेखक इस कहानी में कहता है कि वह सभी संतरे के पेड़ जो दुनिया भर से आकर उनकी धरती पर बस गए यहूदियों   को सौंप कर पिता को भागना पड़ा उन पेड़ों की छवि उनकी दो आंखों में साफ-साफ अंकित है। अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से हर एक पौधा जो उन्होंने खरीदा, रोपा और उसे पाल पोस कर बड़ा किया उनकी छवि उनके चेहरे पर चस्पां हैं... जब पुलिस पोस्ट पर तैनात ऑफिसर के सामने उनके सब्र का बांध टूट गया तो आंसुओं की धार में एक एक पेड़ का प्रतिबिंब साफ़ साफ़ दिख रहा था।
 
मश्हूर  फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति
 
 
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(अपनी धरती से उजाड़ कर जब पूरे गांव को इजराइली अपनी फौजी गाड़ियों से लेबनान के शरणार्थी कैंपों में छोड़ने जा रहे थे तो गाड़ियों का यह काफिला बीच रास्ते में थोड़ी देर के लिए रुका।)
"सामानों के बीच किसी तरह दुबक कर बैठी औरतें गाड़ी से उतरीं और सड़क किनारे बैठ कर एक संतरा बेचने वाले के पास पहुंचीं। जब वे संतरे लेकर लौट रही थीं तो हमें दूर बैठे भी उनके सुबकने की आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थी। मुझे तब पहली बार एहसास हुआ कि संतरे कितने प्यारे और दिल के करीब हैं और ये खूब बड़े सुंदर चमकते हुए संतरे कोई मामूली और कहीं भी मिल जाने वाली आम फ़हम चीज़ नहीं बल्कि मन और स्मृति में  खूब संजो कर रखने की चीज़ हैं। तुम्हारे पिता ड्राइवर के पीछे-पीछे गाड़ी से नीचे उतरे, एक संतरे को बहुत प्यार से अपने हाथ में लिया और देर तक किसी अनमोल असबाब की तरह ख़ामोशी से निहारते रहे... और देखते-देखते किसी बच्चे की तरह फफक फफक कर रो पड़े जैसे उनका अपने ऊपर कोई वश रहा ही नहीं।"

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फिलिस्तीनी लेखक उपन्यासकार हुजामा हबायेब अपने एक इंटरव्यू में स्मृतियों को लेकर दिलचस्प और भावुक कर देने वाली चर्चा करती हैं:

मेरे किए लेखन सामूहिक स्मृतियों की पुनर्रचना कर के फिलिस्तीनी वृत्तांत/आख्यान (नैरेटिव) को सुरक्षित बचाए रखने का एक जरिया है - इसमें छवियों, ध्वनियों, गंधों, बहुरंगी जीवन और आख्यानों को नॉस्टल्जिक भाव से साकार रूप देना शामिल है। यह प्यार और तड़प के अनवरत चलते चक्र का विस्तारित रूप है। अपनी बात समझाने के लिए मैं एक नितांत निजी अनुभव आपके साथ साझा कर रही हूँ ::

जब कभी भी मैं कोई संतरा छीलती हूँ  मुझे अपने पिता की याद आती है, वैसे उन को गुजरे हुए 5 साल से ज्यादा हो गए ।उन्हें संतरे बहुत प्रिय थे - उनका जीवन बगैर रोटी के चल सकता था लेकिन संतरे के बगैर चल जाए यह बिल्कुल मुमकिन नहीं। जब कभी मैं उनसे मिलने जाती थी वह मेरे लिए संतरे की कोई न कोई नई डिश बनाकर जरूर खिलाते थे। अब जब  कभी संतरे की सुगंध मेरी नाक में जाती है तो मुझे एकदम से सबसे पहले पिता के बचपन की याद आती है हालांकि मुझे उस समय का कुछ भी पता नहीं - न तो मैंने उस उम्र में उन्हें देखा था न उस समय की कोई फोटो मेरे पास है। सच्चाई तो यह है कि मैंने उन्हें बड़ी उम्र में ही पहली और अंतिम बार देखा था ।
1948 के नक्बा के दौरान मेरे पिता के परिवार को जाफ़ा के दक्षिण पूर्व के गांव से बेदखल कर भगा दिया गया था,तब उनकी उम्र मुश्किल से 7 साल की थी। लेकिन बचपन में जिस हादसे से उनका सामना हुआ था वह जीवन के अंतिम समय तक उनकी स्मृति में पूरी तरह से जिंदा रहा। जब वह घर छोड़कर भागे तो चलते चलते हाथ में अपने बगीचे के पेड़ का एक संतरा ले जाना नहीं भूले- एक हाथ में खूब कसकर पकड़ा  हुआ संतरा और दूसरे हाथ से अपनी मां के कपड़े ।
वे फिलिस्तीनी शरणार्थियों की पहली खेप में शामिल थे।यह कैसा विचित्र संयोग है कि घर बार से उजड़ कर विस्थापन की अनिश्चित दुनिया में दर-दर भटकने वाले मेरे पिता की नाक में इस सुस्वादु फल की मादक गंध जीवन भर बसी रही। वह फिलिस्तीन की आखिरी गंध थी जो उनके साथ साथ चलती रही। वे जीवन भर उस गंध को सजीव साकार करने और अपने साथ जोड़े रखने के लिए हर संभव यत्न करते रहे। जब भी किसी संतरे की गंध मेरे आस पास तैरती हुई आती है, उसके साथ ही मैं मन की आंखों से उस छोटे बच्चे को देखने लगती हूँ  जो  घर बार छोड़ कर भागते हुए भी अपने बाग का संतरा साथ ले जाना नहीं भूला। संतरे की उस गंध में मुझे फिलिस्तीन की गंध आती है। मेरे मन में प्यार और तड़प का यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
किसी कृति के लिखने के दौरान सिर्फ़ शब्द मेरे दिमाग़ में नहीं होते। मैं घटनाओं को देखती हूँ , मैं संवादों को सुनती हूँ। मैं  उनकी धड़कनों को महसूस करती हूँ ।
newarab.com (05082020) से साभार

1948 के हादसे में आनन फानन में अपना घर बार छोड़कर शरणार्थी बनने को मजबूर नुहा बैटशॉ फिलिस्तीन की एक प्रतिष्ठित कलाकार और ऐतिहासिक कला संग्रहकर्ता मानी जाती हैं। 12 साल की उम्र में पेश आए हादसे ने उनके ऊपर इतना असर डाला कि उनकी याददाश्त खो गई। उनसे उनके लिखे विवरणों और बातचीत के आधार पर तैयार की गई सामग्री का जब वास्तविक संदर्भों से मिलान किया गया तो आश्चर्यजनक रूप से दोनों में पर्याप्त समानता पाई गई। उन्होंने अम्मान में रहते हुए अपने जीवन के ब्योरों को एकत्र कर एक किताब में संकलित किया जिसका शीर्षक है: "ए नन विदाउट ए मोनेस्ट्री"
यहाँ प्रस्तुत है उनका एक संस्मरण :
"एक बार की बात है मैं रोम से सोरंटो की यात्रा कर रही थी। पूर्व दिशा से समुद्री हवा आ रही थी जिसमें मेडिटरेनियन सागर , जाफा पोर्ट और संतरों की गंध समाई हुई थी। मैंने गाड़ी का शीशा खोला तो मेरी नाक में संतरों के फूलों की मादक गंध भर गई। उसके बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ- बस इतना जानती हूँ  कि मैंने  खुद को आपे से बाहर होकर सुबकता हुआ पाया। मुझे ऐसा लगा कि अपने गांव घर को छोड़कर आते समय दहशत की जिन अनुभूतियों से मैं रू ब रू हुई थी वह अचानक फिर से जीवित हो गईं । सबसे ज्यादा ताज़्जुब की बात तो यह है कि इस गंध ने मेरी मरणासन्न स्मृतियों को फिर से जिंदा कर दिया.....
जो हमारा बाग था उसमें मेरे पिता ने एक बड़ी सी टेबल रखी हुई थी। वह गिनती से संतरे और तरबूज खरीदते थे उसके बाद थैलों में भरकर गधे की पीठ पर दोनों तरफ लटका कर बेचने ले जाते थे। तरबूजों को हम अपनी खाट के नीचे ठंडा होने के लिए रखते थे और संतरों को बाहर ही टेबल पर छोड़ देते थे। स्कूल से लौटने के बाद हम संतरों को निचोड़ कर अपने पीने के लिए रस निकालते।
संतरे की एक प्रजाति लंबी होती थी जिससे हम लैंप बनाया करते। पहले उसको ऊपर से काटते, उसके बाद अंदर से गूदा निकाल कर फेंक देते ...उसकी धड़ पर छोटे-छोटे छेद बनाते और अंदर मोमबत्ती रखकर जला देते। उन छेदों से छन कर बाहर आती हुई रोशनी कमरे को रोशन कर  पढ़ाई में हमारी मदद करती।"
वे अपनी बातचीत में जाफ़ा में बिताए दिनों  को बहुत शिद्दत से याद करतीं और उनमें बार-बार संतरों का ज़िक्र होता - ऐसा लगता जैसे संतरों की गंध उनके शरीर में अंतरात्मा तक समाई हुई है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों के फोटोग्राफ बहुत संभाल कर रखे थे जिसमें संतरे प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
रोम से सोरंटो की यात्रा के दौरान जब उनकी स्मृति धीरे-धीरे लौटने लगी तो अपनी पीड़ा को दर्ज़ करने की गरज़ से उन्होंने उन्हें डायरी के पन्नों में लिखना शुरू किया जो बाद में किताब के रूप में छपकर सामने आया।बाद में उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और बीबीसी और जॉर्डन टीवी सहित अनेक मीडिया समूहों में काम किया और बाद में अम्मान जाकर बस गईं।
फिलिस्तीनी म्यूजियम में उनके उपलब्ध दस्तावेज और संग्रह प्रमुखता से प्रदर्शित  है।
(http://raseef22.net/english/  में प्रस्तुत सामग्री के आधार पर)

संतरे का उपयोग अपनी पेंटिंग में जब कोई बड़ा कलाकार करता है तो वह राष्ट्रीय और राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर होता है और इस बारे में बात करते हुए लोग मानते हैं कि जाफा के संतरे जो ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी संतरों के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर थे, 1948 के कब्जों के बाद से इजराइल ने बड़े जोर शोर से उन संतरों को इजराइली उत्पाद  कह के बेचना शुरू किया। विजुअल आर्ट में संतरों  की उपस्थिति ऐसे इजराइली नैरेटिव का प्रतिकार है और बडे़ नामचीन कलाकार इन कृतियों के माध्यम से अपने फिलिस्तीन देश पर फिर से दावा ठोंकते हैं, उसके साथ अपना रिश्ता दर्ज करते हैं। 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर ने जाफा के संतरों को लेकर अनेक पेंटिंग बनाई है लेकिन उनकी "जाफ़ा" (1979) इस विषय पर बनाई गई सर्वाधिक चर्चित कलाकृति है जिसमें पारंपरिक परिधान पहने एक सुंदर फिलिस्तीनी स्त्री संतरों से भरी टोकरी लिए हुए है, पृष्ठभूमि में अनेक अन्य स्त्रियां बाग के पेड़ों से संतरे तोड़ रही हैं। मंसूर अपने बचपन के दिनों में देखे संतरे के बगीचों को याद करते हैं और इन कलाकृतियों के माध्यम से दर्शकों को अपने प्यारे समृद्ध फिलिस्तीन के खूबसूरत और शांतिप्रिय लोगों को दिखाना चाहते हैं।

वॉशिंगटन में फिलिस्तीन म्यूज़ियम शुरू करने वाले अहमद हमीदत ने ' री इमेजिनिंग ए फ्यूचर' श्रृंखला में जाफ़ा के संतरों को केन्द्र में रख कर अनेक पेंटिंग बनाई है। इन कलाकृतियों में वे उन सुनहरे दिनों को याद कर रहे हैं जब भविष्य में एक बार फिर से फिलिस्तीन की धरती पर फिलिस्तीनी काबिज़ होंगे और अपने संतरों के निर्यात से पूरी दुनिया को लुभाएंगे। उनका मानना है कि उनके माध्यम से वे फिलिस्तीनियों के अपनी धरती पर लौटने की संकल्प रेखांकित कर रहे हैं और उन्होने संतरे को फिलिस्तीनी पहचान और स्मृतिलोक के रूपक के तौर पर देखा है।

यादवेन्द्र 
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक
सीएसआईआर - सीबीआरआई , रूड़की

पता : 72, आदित्य नगर कॉलोनी,
जगदेव पथ, बेली रोड,
पटना - 800014 
मोबाइल - +91 9411100294 




 

Friday, March 12, 2021

आक्रामक खेल के बीच शेष विरल कोमलता

यादवेन्द्र



खेल आम तौर पर निर्मम आक्रामकता के लिए जाने जाते हैं - खास तौर पर आमने सामने एक दूसरे को चुनौती देने वाले खिलाड़ी ज्यादा रसहीन इंसान साबित होते हैं।टेनिस की दुनिया पर दशकों राज करने वाली सेरेना विलियम्स वैसे भी अपने विजय अभियान और रिकॉर्ड को लेकर बहुत सजग और निर्मम मानी जाती हैं पर पिछले कुछ वर्षों में उन्हें एक युवा अश्वेत टेनिस सितारे से बार बार मुखातिब होना पड़ा -- नाओमी ओसाका ने चौबीस ग्रैंड स्लैम जीतने के उनके स्वप्न को एक नहीं अधिक बार तोड़ा।पर टेनिस कोर्ट के इन धुर प्रतिद्वंद्वियों के बीच दुनिया ने जिस ढंग की आत्मीय सहचरी देखी वह भी टेनिस की दुनिया में विरल है - खेल समीक्षक मानते हैं कि ओसाका सेरेना की सुयोग्य उत्तराधिकारी साबित होने की राह पर अग्रसर हैं।



हाल में संपन्न हुए ऑस्ट्रेलियन ओपन में विजय का ताज पहनने के बाद के इंटरव्यू में जब नाओमी ओसाका से (इसके सेमी फाइनल में उन्होंने सेरेना विलियम्स को पराजित कर टूर्नामेंट से बाहर कर दिया था) एक पत्रकार ने पूछा:
"अभी कुछ दिन पहले आपने कहा था कि जब तक सेरेना खेलती रहीं वे टेनिस का चेहरा हुआ करती थीं। क्या आपको लगता है कि ऑस्ट्रेलियन ओपन में आपने जो उनके खिलाफ जीत हासिल की वह पूर्व स्थिति के बदलाव का सूचक है?"
युवा पर चतुर ओसाका को पल भर भी सोचने की जरूरत नहीं पड़ी,बोलीं: नहीं,ऐसा बिल्कुल नहीं है।"
(20 फरवरी 2021 का WTA Insider का एक ट्वीट)
इसी टूर्नामेंट के दौरान ओसाका ने ट्वीट कर सेरेना विलियम्स के बारे में कहा: "जब मैं छोटी थी और उन्हें खेलते हुए देखती थी तो हमेशा मुझे  लगता था कि कभी मैं उनके साथ खेलूं... यह मेरा एक सपना था...जब जब भी मैं उन के साथ खेलती हूं तो मुझे बचपन के वे दिन याद आते हैं और मुझे लगता है कि मैं उन मौकों को हमेशा याद रखूंगी... ये खेल मेरे लिए कुछ खास हैं।"
"जहां तक मेरा सवाल है मैं उन्हें हमेशा खेलते हुए देखना चाहती हूं। मेरे अंदर एक बच्चा भी रहता है।"

2018 के यूएस ओपन फाइनल मैच में नाओमी ओसाका से मुकाबला करते हुए अंपायर ने मां बनने के बाद पहला बड़ा मैच खेल रही सेरेना पर अपने कोच के इशारों के अनुसार खेलने का आरोप लगाया था और अंपायर के साथ सेरेना की तीखी नोकझोंक हुई थी। सेरेना ने बार बार दंडित करने वाले अंपायर को झूठा भी कहा था और गुस्से में अपना रैकेट तोड़ कर कोर्ट में फेंक दिया था। उन्होंने अपने कोच से निर्देश लेने के आरोप से इनकार किया और अंततः मैच हार गई थीं - वह भी ढाई दशक से टेनिस के शिखर पर राज करने वाली सेरेना अपने से सोलह साल जूनियर और बिल्कुल नयी खिलाड़ी नाओमी ओसाका से।यहां यह जानना समीचीन होगा कि ओसाका भी हैतियन पिता और जापानी मां की अश्वेत संतान हैं और अमेरिका में रहती हैं।

यह ओसाका के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी और वे इतनी भावुक हो गईं कि लगभग सुबकने लगीं।उम्मीद से पलट नतीजे से नाखुश उपस्थित दर्शक शोर मचाने लगे और सेरेना जैसी दुर्दमनीय खिलाड़ी को मात देने वाली नाओमी ओसाका को हूट करने लगे।इस पर ओसाका बोलीं:
"मैं जानती हूं यहां इकट्ठा सभी लोग उन (सेरेना विलियम्स)के लिए तालियां बजा रहे हैं, चीयर कर रहे हैं।मुझे अफ़सोस है कि इस मैच को इस तरह खत्म होना था....आप आए और आपने मैच देखा,इसके लिए हार्दिक आभार।"
सेरेना ने अप्रत्याशित सहृदयता दिखाते हुए आगे बढ़ कर उत्तेजित दर्शकों से अपील की:
"मेरी गुजारिश है कि आप अब किसी तरह का सवाल मत उठाइए। मैं आपसे कहना चाहती हूं कि आज  ओसाका बहुत अच्छा खेली... यह उसका पहला ग्रैंड स्लैम है। अब आप उसे हूट करना बंद करिए।"

इस ऐतिहासिक घटना पर theundefeated.com (8 सितम्बर 2018) ने लिखा : "विजयी होकर भी जीत के लिए माफी मांगती और सुबकती हुए नाओमी ओसाका को सेरेना ने आगे बढ़ कर गले लगाया - पल भर भी नहीं लगा कि सेरेना प्रतिद्वंद्वी की भूमिका छोड़ कर रोती हुई ओसाका को सांत्वना देती हुईं मां की भूमिका में आ गईं।"

इस घटना के अगले दिन ओसाका से जब यह पूछा गया कि मैच के बाद सेरेना विलियम्स उन्हें गले लगाते हुए कान में क्या कह रही थीं तो ओसाका ने जवाब दिया: "सेरेना ने मुझे कहा कि मुझे तुम पर गर्व है और दर्शकों की भीड़ चिल्ला चिल्ला कर तुम्हें अपमानित नहीं कर रही थी। मुझे उनका यह कहना कितना अच्छा लगा, मैं बता नहीं सकती।"

इसके बाद सेरेना ने गहरे विचार मंथन के बाद नाओमी ओसाका को चिट्ठी लिखी जिसका एक अंश पढ़िए:
" हाय नाओमी, मैं सेरेना विलियम्स! जैसा मैंने कोर्ट में भी कहा था, मुझे तुम पर बहुत गर्व है... और जो कुछ भी उस समय हुआ उस का अफसोस भी। उस समय मुझे ऐसा लगा था कि मुझे अपनी बात पर अड़े रहना चाहिए और ऐसा करते हुए मैं सही कर रही हूं। लेकिन मुझे कतई इसका आभास नहीं था कि मीडिया इस घटना के बाद हमें और तुम्हें एक दूसरे के खिलाफ खड़ा कर देगा। उन पलों को मैं चाहती हूं एक बार फिर से जीना संभव हो पाता... काश कि हम फिर से कोर्ट पर आमने सामने  हो पा ते। मैं तुम्हारे लिए बहुत खुश हूं,खुश थी और हमेशा खुश रहूंगी और तुम्हें सपोर्ट करती रहूंगी। मैं कभी नहीं चाहूंगी कि कामयाबी की रोशनी किसी दूसरी स्त्री से हट कर अलग किसी और पर चली जाए - खासतौर पर जब वह रोशनी एक काली स्त्री खिलाड़ी पर पड़ रही हो। तुम्हारे भविष्य को लेकर मैं बहुत ज्यादा इंतजार अब नहीं कर सकती और मेरा यकीन करो, तुम्हें खेलते हुए देखना और वह भी तुम्हारे बहुत बड़े फैन के रूप में देखना मुझे बहुत अच्छा लगेगा। आज की बात करें तो तुम्हारी सफलता के लिए मैं शुभकामनाएं देती हूं... लेकिन यह सिर्फ आज तक सीमित नहीं है, भविष्य में भी तुम्हारा मार्ग बहुत प्रशस्त हो। एक बार फिर, मुझे तुम्हारे ऊपर बहुत गर्व है। मेरा ढेर सारा प्यार...
तुम्हारी फैन
सेरेना "
(हार्पर बाजार पत्रिका/9 जुलाई 2019)

Saturday, December 5, 2020

कहां हो साहेबराव फडतरे?


चाहता तो था कि यादवेन्‍द्र जी की इधर की गतिविधियों पर बात करूं। हमेशा के घुमडकड़ इस जिंदादिल व्‍यक्ति ने पिछले कुछ वर्षों से फोटोग्राफी को लगातार अपने फेसबुक वॉल पर शेयर किया है। उन छवियों में 'अभी अभी' का होना इतना प्रभावी हुआ है कि शाम और सुबह की रोशनी में वर्तमान राजनीति के षडयंत्रों पर भी लगातार टिप्‍पणी की छायाएं बहुत साफ होकर उभरती हुई हैं। लेकिन अपने अनुवादों के लिए प्रसिद्ध यादवेन्‍द्र जी के मेल से प्राप्‍त एक महत्‍वपूर्ण पत्र को प्रकाशित कर रहा हूं। अनुवादों में यादवेन्‍द्र जी के विषय चयन उनके भीतर के उस व्‍यक्ति से भी परिचय रहे हैं, जिसकी काफी स्‍पष्‍ट झलक प्रस्‍तुत पत्र के प्रभाव में भी दिखती है।

सभी चित्र यादवेन्‍द्र जी के ही हैं।

 

वि गौ   

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कहां हो साहेबराव फडतरे? कैसे हो? उम्मीद नहीं पक्का भरोसा है कि अब तक बंदीगृह से मुक्त हो गए होगे और लगभग पचपन साल का प्रौढ़ जीवन एक बार फिर से  पटरी  पर लौट आया होगा - चाहे अध्यात्म के रास्ते पर...या गृहस्थी के रास्ते पर।भारत भ्रमण के अपने सपने को पूरा करते हुए यदि कभी इधर पटना या बिहार का कार्यक्रम बनाओ तो तुम्हें अपने घर आमंत्रित करना मुझे बहुत अच्छा लगेगा।

(पच्चीस साल पुरानी बात है मैंने किसी अंग्रेजी अखबार या पत्रिका में(अब नाम याद नहीं) पुणे के येरवडा जेल के कैदी कवियों की कविताएं अंग्रेजी अनुवाद में पढ़ी थीं। उस पढ़ कर मैंने जेल के प्रमुख को उन कवियों की कविताओं के हिंदी अनुवाद करने की इच्छा के साथ एक अनुरोध पत्र लिखा था जिसे उन्होंने सहर्ष स्वीकार कर लिया।कुछ कवियों के साथ मेरा सीधा पत्र व्यवहार भी हुआ और उनमें से कुछ ने काम चलाऊ हिंदी में और कुछ ने मराठी में कविताएं मुझे भेजीं। कविताओं के साथ साथ उन्होंने अपने जीवन अनुभव और सजा के कारणों के बारे में भी मुझे बताया। इस सामग्री का उपयोग कर मैंने अपनी मित्र क वि सीमा शफक के साथ मिलकर "अमर उजाला" की रविवारी पत्रिका के मुखपृष्ठ के लिए एक विस्तृत आलेख तैयार किया - दुर्भाग्य से वह प्रकाशित सामग्री मेरे पास अब नहीं है पर एक कवि साहेबराव फड तरे की यह चिट्ठी आज हाथ लगी।इस चिट्ठी के कुछ अंश यहां प्रस्तुत हैं:)
यादवेन्द्र yapandey@gmail.com
09411100294






 । श्री।
।। ओम, नमो गणेशाय।।

पुणे -येरवडा
दिनांक 27- 11- 1995

प्यारे भाई साहब यादवेंद्र जी, अनोखा साथी साहेबराव का प्यार भरा सलाम

खत लिखने का वजह आपका अंतर्देशी कार्ड मिला। पढ़कर आपके दिल की बात मालुम हो गयी। मेरे यहां के साथी (कवि) उनको आपका अड्रेस देता हुं। और कविताये भेजना या नही भेजना यह उन्ही के ऊपर छोड़ देना। क्योंकि हरेकी पसंती अलग-अलग होती है। मैं और एक बात आपसे पुछना चाहता हुं। की जो कभी हिंदी में ही कविताये लिख रहे हैं। उनकी कविता भेज दिया तो चलेगा क्या? अगर आपने लिखा चलेगा, तो उन्ही को भी आपका अड्रेस दे 
दुंगा।
 आपने और चार पांच कविताये मांगी है। मैं जरूर भेज दुंगा।
 लेकीन पहले कवि तों का अनुवाद पसंत आया तो।
**********
आपको मैंने पहले "आक्रोश" नाम की कविता भेजी थी। उसमें दुःख से रोने वाला मैं अब बोल रहा है - "अब रोना छोड़ दे"। इतना फर्क मुझ में क्यु हो गया। इसकी वजह मेरी जन्मठेप सजा है। मैंने दुःख को ही गुरु बनाया। और दुःख का वजह भी ढुंडा। अब मुझे ऐसा लग रहा है। मुझे सजा हो गई यही अच्छा हुआ। मैंने अपने बिवी को खत लिखा की तुम मेरी जिंदगी में आयी, इसलिए मुझे खुदा मिला। अब छुटने के बाद अगर तुम मेरे जिंदगी में आने की कोशीस की तो मैं तेरे पैर छु लेगा। मैं तुझे मां कहुंगा। तुझे दुसरी शादी बनाना है तो बना डाल।
**********
भाई साब, अपनी दोस्ती कितने दिनों की है। यह मुझे भी मालुम नहीं। खुदा ने चाहा तो, आप से बाहर भी मुलाकात होगी। आप अपनी एड्रेस मराठी दोस्तों से लॉन्ग फॉर्म में लिखवा के भेजना (अच्छी अक्षर में) ।अब मेरी उम्र 39 साल की चालु है। अब मेरे पास लिखने के लिए कुछ नहीं है। इसलिए कविता भी लिखना बंद कर दीया है। आप मेरी नजर बाहर की दुनिया में लगी है। सन्यास ले के मैं पैदल से भारत भ्रमन  कर दुंगा। और क्या लिखुं। आपको लिखने के वजह से मैं अपनी बिती हुयी जिंदगी में घूम के आया। जो भुल गया था, उसको याद करना पड़ा। अच्छा कोयी बात नहीं। आपके आने वाले लेटर की राह देखुंगा। आपके दोस्त यार, घर वालों को सलाम।
आपका अनोखा दोस्त 
साहेबराव फडतरे

(यहां मैंने वर्तनी की अशुद्धियां प्रामाणिकता को बरकरार रखने के उद्देश्य से छोड़ दी हैं, मेरी कोई और मंशा नहीं है। यादवेन्द्र  )










Sunday, August 2, 2020

अपने शब्दों में सेरेना विलियम्स

यह हमारे लिए गर्व की बात है कि वर्ष 2008 के आस-पास इंटरनेट की दुनिया में अपने लिखे हुए के प्रकाशन के लिए यादवेन्द्र जी ने सर्वप्रथम इस ब्लाग को ही चुना। दूसरी भाषओं के अनुवाद ही नहीं, यादवेन्द्र जी की रचनाएं भी इस ब्लाग को तब से ही समृद्ध करती रही हैं।

इस दौरान अनुवादों पर आधारित उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं।

हिंदी की दुनिया यादवेन्द्र जी को उनके अनुवादों की वजह से ही नहीं, उनके विषय चयन से भी पहचानती है। टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स के जीवन संघर्ष का ब्योरा प्रस्तुत करने की कोशिश उनकी अगली पुस्तक का विषय है।

प्रस्तुत है संभावना प्रकाशन,हापुड़ से इस साल के अंत तक प्रकाशित होने वाली उनकी किताब का एक अंश।

यादवेन्द्र

 

हालाँकि सेरेना अपने बारे में व्यक्तिगत विवरणों का ज्यादा खुलासा करने की अभ्यस्त नहीं हैं फिर भी मीडिया में उपलब्ध उनके कुछ इंटरव्यू से लिए गए उद्धरणों के आधार पर उनकी शख्सियत को समझना कुछ कुछ संभव है : 

 

वैसे मैं बहुत साफ तौर पर तो नहीं जानती लेकिन मुझे लगता है कि मैंने जब से होश संभाला तब से मुझे मालूम है कि मैं काली हूं। जिस दिन से मैं टेनिस की दुनिया  में आई हूँ  उस दिन से मुझे ऐसा ही लगता है। जब हम छोटे थे उस समय के बारे में बताती हूँ : हम घर से बाहर निकल कर पास के पार्क में जाते थे जहाँ  हम खेलने की प्रैक्टिस करते थे। उन पार्कों में हमें हमेशा गोरे लोग दिखाई देते थे , शायद ही कोई काला इंसान दिखाई देता था...वे वहाँ  टेनिस खेला करते थे। जहाँ  तक मेरी स्मृति जाती है, मुझे लगता है कि शुरू से मुझे मालूम था : मैं काली हूँ । मुझे यह भी मालूम था कि मैं औरों से थोड़ी अलग हूँ , जो मैं कर रही हूँ वह औरों से कुछ अलग है। हमारे साथ हमारा परिवार होता था, वीनस होती थी हमारी अन्य बहनें भी होती थीं।एक बार की बात याद आती है जब मैं और वीनस प्रैक्टिस कर रहे थे, आसपास के तमाम गोरे लड़के हमारे पास आये और हमें घेर कर खड़े हो गए -वे ब्लैकी ब्लैकी कह कर हमें चिढ़ाने लगे।तब मेरी उम्र सात साल के करीब रही होगी... मुझे अच्छी तरह याद है,उनका चिढाना सुन कर मेरे मन में निश्चय आया : मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता,तुम्हें जो कहना हो कहते रहो। अब सोचती हूँ तो लगता है कि उस उम्र में ऐसी बातें सोचना बहुत सामान्य नहीं था, उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए.... वह हिम्मत मुझ में शुरू से ही थी।

 

मेरे माता पिता शुरू से यह चाहते थे और हमें सिखाते थे कि हम जो हैं जैसे हैं,उसके लिए हमारे मनों में किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं बल्कि गर्व का भाव होना चाहिए।      अफ़सोस यह कि अपने आसपास हम देखते हैं बहुत सारे काले लोगों -खास तौर पर युवाओं  को -हर पल यह कह कर निरुत्साहित किया जाता रहता है कि तुम बदसूरत हो...तुम्हारे केश भद्दे लगते हैं...तुम्हारी त्वचा कितनी काली है। हमें शुरू से खुद को प्यार करना, खुद को सम्मान देना सिखाया गया। मेरे डैड हमेशा कहते कि तुम्हें अपना इतिहास अपनी विरासत जाननी चाहिए - जो अपनी विरासत  अपना इतिहास जानता है वही अपने भविष्य को महान ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। हम लोगों को शुरू से टीवी पर अपने इतिहास, अपने संघर्षों, अपने विरासत के प्रोग्राम देखने को कहा जाता था .......एलेक्स हेली के आत्मकथात्मक उपन्यास पर आधारित रूट्स जैसे प्रोग्राम - इस तरह के कार्यक्रम हम जरूर देखते थे और ढूंढ ढूंढ कर देखते थे जिससे हम अपने इतिहास से रू ब रू हो सकें। जब आप अपने पुरखों को इस तरह के संघर्षों से जूझते हुए विजयी होकर निकलते हुए देखते हैं तब आपका मन गर्व से भर जाता है और भविष्य के लिए रास्ते खुलते हैं। माया एंजेलू ने भी तो अपनी कविता में कहा है: हम गुलामों की उम्मीदें हैं, हम गुलामों के सपने हैं। यह पता चलने के बाद कि अपने पुरखों के ऐसे कठिन संघर्षों की बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं और ढ़ंग की जिंदगी जी रहे हैं , मैं काले रंग के अलावा किसी और रंग में जन्म नहीं लेना चाहती। किसी और कुल वंश (रेस) का  सैकड़ों सैकड़ों सालों का ऐसा कठिन संघर्ष का इतिहास नहीं रहा है और यह तो जगजाहिर है कि मजबूत इंसान ही काल के थपेड़ों को झेल कर जिंदा बच पाते हैं,पनप पाते हैं - कोई शक नहीं कि हम काले लोग शरीर और मन दोनों से सबसे मजबूत लोग हैं।अपने जीवन के पल पल मैं अपना काला रंग धारण कर के गौरवान्वित महसूस करती हूं।

 

वीनस ने और  मैंने टेनिस की दुनिया में जब से कदम रखा है सफलता हमारे पक्ष में रही है और हम दोनों एक के बाद एक अगली  सीढ़ी पर चढ़ते गए हैं। हम दोनों में एक और बात समान थी कि हम अपने किए को लेकर कभी किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं महसूस करते थे।हम अपने केशों में जिस तरह की लड़ियाँ  बनाते थे उसको लेकर हमें कभी यह नहीं लगा कि घर से बाहर निकलेंगे तो कैसा लगेगा। गोरों की दुनिया का खेल है टेनिस और हम काले थे लेकिन हमें कभी उनके बीच रहकर खेलते हुए डर नहीं लगता...यह कोई सहज सामान्य बात नहीं थी पर हममें थी।

 

हमारी माँ ने हमें बचपन से भावनात्मक रूप से मजबूत बनाया जिससे जब दर्शक हमारे काले होने या स्त्री होने को लेकर फब्तियाँ  कसें या हमें निशाना बनाएँ तो मालूम हो हमें उससे कैसे निबटना है। उन्होंने हमें यह पाठ पढ़ाया कि हम जैसे हैं  उस पर किसी तरह की शर्मिंदगी न महसूस करें - खास तौर पर अपने केश और शारीरिक बनावट को लेकर , अपनी विरासत, अपने पुरखों के संघर्ष को लेकर मन में निरंतर गर्व का भाव महसूस करें। मुझे उनकी परवरिश का यह पक्ष सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है। मैं अपनी बेटी को इन्हीं मूल्यों के साथ बड़ा कर रही हूँ ।

 

 जब मैं किसी काम को हाथ लगाती हूँ  तो उतना फोकस अपने काम में लाती हूँ  जिससे मैं दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बन जाऊँ - और ऐसा नहीं कि मैं इतने से संतुष्ट हो जाती हूँ   बल्कि निरंतर और बेहतर काम करने की कोशिश करती हूँ । काफी कम उम्र में - जहाँ  तक मुझे याद आता है 17 साल की उम्र में - मैंने अपने बारे में अखबारों में छपा कोई समाचार पढ़ना छोड़ दिया था।मुझे लगता है कि इस आत्मसंयम के कारण मुझे बहुत लाभ हुआ, मैं अपने खेल पर ज्यादा फोकस कर पाई। मैं उन दिनों को याद करती हूँ तो मुझे लगता है  मेरे खेल की ज्यादा नुक्ताचीनी इस लिए की जाती थी क्योंकि मैं मुझमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा हुआ था - लोगों को ताज्जुब होता था मैं गोरी नहीं बल्कि काली हूँ , गोरों का खेल टेनिस खेलती हूँ  और आत्मविश्वास से इतनी लबरेज हूँ , ऐसा कैसे हो सकता है?

 

मैं अपने आप को हमेशा यह कहती थी कि मैं एक दिन दुनिया की नंबर एक टेनिस खिलाड़ी बनूँगी, मुझ में वह काबिलियत है। और हाँ मैं क्यों न सोचूँ  ऐसा - जब मैं दुनिया के शिखर पर होने के बारे में सोचूँगी ही नहीं तो मैं उस श्रेणी का खेल खेल भला कैसे सकती हूँ ?

 

एक समय ऐसा था जब अपने शरीर को लेकर मैं खुद भी असहज रहती थी, मुझे लगता था कि मैं बहुत बलवान और हृष्ट पुष्ट हूँ । फिर एक सेकंड को सोचती: कौन कहता है कि मैं इतनी बलवान और तगड़ी हूँ ? इसी शरीर ने तो मुझे दुनिया का महानतम खिलाड़ी बनाया, मैं उसके बारे में ऐसी ऊल जलूल बातें भला क्यों सोचने लगी।और आज मेरा यही शरीर एक स्टाइल बन गया है, मुझे इसके बारे में सोच सोच कर बहुत अच्छा लगता है। अब वह समय आ गया है जब मेरा यही शरीर दुनिया भर में एक स्टाइल बन कर धूम मचा रहा है। यहाँ  तक पहुँचने में वक्त लगा - जब मैं पीछे मुड़ के देखती हूँ  तो अपने अपनी मॉम और डैड का शुक्रिया अदा करना कभी नहीं भूलती जिन्होंने बचपन से मुझ में विश्वास कूट कूट कर भरा।

ऐसा भी तो हो सकता था कि वे  रंग,केश और शरीर को लेकर मुझे औरों की तरह हतोत्साहित करते... तब तो मैं आज जिस सीढ़ी पर हूँ  वहाँ  तक पहुँचने का कोई सवाल ही नहीं होता। तब मैं अलग तरह से अपना जीवन जीती,अलग ढंग की एक्सरसाइज करती, कोई और अलग ही काम कर सकती थी। आज यहाँ खड़े होकर मैं जो कुछ भी हूँ , जैसी भी हूँ  उसको लेकर  बेहद खुश हूँ ,जिन लोगों ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचने में मदद की उनकी  शुक्रगुजार हूँ । मुझे इस रूप में ऐसा होना बहुत रास आ रहा है, यहाँ खड़ी होकर मैं बेहतर और शक्ति संपन्न महसूस कर रही हूँ।"

 

अपनी आत्मकथा "क्वीन ऑफ़ द कोर्ट : ऐन ऑटोबायोग्राफ़ी" में सेरेना विलियम्स बचपन का उदहारण देती हैं कि अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने की धुन मेरे  ऊपर इस कदर सवार थी कि प्रेरक उद्धरणों को कागज़ पर लिख कर मैं  अक्सर अपने रैकेट बैग के ऊपर उन्हें चिपका देती स्व मार्टिन लूथर किंग जूनियर का यह उद्धरण मुझे  बेहद प्रिय था :" अपने भावों को चेहरे पर मत आने दो तुम काले हो और तुममें कुछ भी झेल लेने की कूबत है ....डटे रहो डिगो नहीं ,झेल लो जो भी सामने आये .... बस तन कर खड़े रहो। " और "शक्तिशाली बनो काले हो तो क्या हुआ अब तुम्हारे चमकने निखरने का वक्त आ गया है अपनी श्रेष्ठता पर भरोसा रखो। लोग तुम्हें क्रोधित देखना चाहते हैं .... क्रोध करो,पर ऐसे करो कि लोगों को यह आग दिखायी न दे।" 

जाहिर है उन्हें अपनी ऐतिहासिक भूमिका और जिम्मेदारी का भरपूर एहसास है तभी तो वे कहती हैं :"मैं खुद के लिए खेलती हूँ पर साथ साथ उनके लिए भी खेलती हूँ जिनकी हैसियत मुझसे ज्यादा बड़ी है - मैं उनका प्रतिनिधित्व भी करती हूँ। मैं अपने बाद आने वाली पीढ़ी के लिए भी दरवाज़े खोलती हूँ।"

 

(सेरेना की तस्‍वीरें इंटरनेट से साभार ली जा रही हैं)