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Tuesday, December 16, 2025

 


 

वे अपने वक्त से बहुत आगे थीं- योगेन्द्र आहूजा

(यह आलेख  ‘विदुज बेटन ’ द्वारा आयोजित  स्त्रियों की यात्रा को लेकर लिखी गयी कहानियों पर  केन्द्रित  ‘उजास की ओर’ सीरीज के अन्तर्गत दिनांक 6 दिसंबर 2025  को रशीद  जहाँ की कहानियों पर चर्चा के दौरान पढ़ा गया.)


 


 

 

 

उर्दू, जिसकी शाइस्तगी, शगुफ्तगी और शीरीं-बयानी के हम सभी कायल हैं - में अफसाने की एक मजबूत रवायत रही है। जिस तरह हिंदी की मेनस्ट्रीम कहानी मानवीय, प्रगतिशील, ताकत और सत्ता के विरुद्ध और वंचितों के पक्ष में रही है, उर्दू की कहानी भी यही राह लेती रही है। उसके जो बड़े अफसाना-निगार हैं –इस्मत, मंटो, बेदी, कृश्न चंदर – हिन्दी के अपने लेखकों की तरह ही पढे जाते रहे हैं। सबकी तरह मुझे भी उनसे प्रेम रहा है, लेकिन पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट फिल्मों के नायकों जैसा खामोश, पोशीदा और सिर्फ दिल ही दिल में। उसके बारे में कुछ कहने या लिखने का मौका कभी नहीं आया। आज रशीद जहां के बहाने मुझे इस बारे में कुछ कहने का मौका देने के लिए मैं इस मंच का शुक्रगुजार हूँ।  

उनके बारे में कुछ कहने के लिए इस कहानी को कुछ पहले से शुरू करना होगा। जिस तरह दुनिया में हर चीज की एक कहानी होती है, उसी तरह कहानियों की भी एक कहानी होती है ... दरअसल हर कहानी की अपनी एक अलग कहानी होती है। हर व्यक्ति की तरह हर जुबान और मुल्क में भी ऐसे दौर आते हैं जब लगता है जैसे उसकी सारी शक्तियाँ एक साथ जाग पड़ी हों। किसी चमत्कार या जादू की तरह अचानक या अपने-आप नहीं, उसके पीछे बरसों और दशकों की ऐतिहासिक प्रक्रियायें होती हैं। तब एक नयी भाषा, नये ख्याल, नये कला-रूप पैदा होते हैं। बने-बनाये साँचों को तोड़कर नये कवि, लेखक, विचारक और विद्वान पैदा होते हैं। हर शख्स दूसरे से सीखता है, एक दूसरे को पछाड़ता है, एक दूसरे को आग और रोशनी देता है। ऐसा एक विस्फोट या उबाल अब से नब्बे बरस पहले, पिछली सदी की चौथी दहाई में हुआ था। आज जब हम उसे उस वक्त के बरक्स देखते हैं, यह बहुत आश्चर्यजनक, एक चमत्कार जैसा लगता है।

पिछली सदी का चौथा दशक... जब देश पर अंग्रेज काबिज हैं और पूरे देश के 28 प्रतिशत हिस्से में प्रिंसली स्टेट्स हैं, राजाओं और नवाबों के अधीन। सतह पर सुस्त बहते पानी जैसा आम जीवन है, मगर तली में झाँकने पर दुर्गंध और दमन और उत्पीड़न की एक दम घोंटने वाली अनुभूति। एक ओर औपनिवेशिक गुलामी और दूसरी तरफ वर्णव्यवस्था के शिकंजे में पिसते साधारण जन बेउम्मीद, पस्त और मायूस थे। तीस के दशक की शुरुआत में, दिसंबर 29 में लाहौर-अधिवेशन में कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वराज्य का रिजोल्यूशन एडाप्ट किया। 26 जनवरी 1930 को पूरे देश में पूर्ण स्वराज दिवस मनाया गया। इसी साल मार्च-अप्रैल में गांधी जी ने डांडी मार्च किया और पूरे देश में सिविल नाफ़रमानी मूवमेंट में एक लाख गिरफ़्तारियाँ हुईं, जिनमें बड़ी तादाद में औरतें थीं। 23 मार्च 1931 को भगतसिंह फांसी पर चढ़ाये गये।

ऐसी राजनीतिक हलचलो के बीच, इसी महान दशक में शुरुआत हुई अंजुमन तरक्कीपसंद मुसन्निफीने हिंद या प्रोग्रेसिव राइटर्स मूवमेंट की जिसका स्वर सामा्ज्यवाद विरोधी और वामोन्मुख था। प्रगतिशील लेखक संघ की स्थापना लखनऊ में जुलाई 1936 में हुई। इसके बाद भारतीय साहित्य वह नहीं रहा जो पहले था। हमेशा के लिये बदल गया।

उस वक्त हिंदुस्तान में ही नहीं, पूरे दक्षिण एशिया में औरतों के लिये किसी भी तरह की बौद्धिक गतिविधि मना थी। परंपरागत रूप से उनकी आवाज को गले में ही घोंट देने के पुख्ता इंतजाम थे। ऐसे वक्त में बदायूं जैसे कस्बे के एक मध्यवर्गीय परिवार से एक औरत आती है, बेबाक, दिलेर और बागी - और अपनी तरह से उर्दू अफसाने की दुनिया को बदल देती है। मैं इस्मत चुगताई की बात कर रहा हूँ। वे वर्जनाओं से लदे, दमनपूर्ण मध्यवर्गीय समाज में औरत की स्थिति की पड़ताल करती हैं उस वक्त जब पश्चिम में भी नारीवाद एक नया विचार था।

1936 में जब वे बी.ए. में पढ़ रही थीं, लखनऊ में प्रलेस की मीटिंग में हिस्सा लेने गईं। वहां उनकी मुलाकात हुई रशीद जहां से और वहीं उनके जीवन की दिशा तय हो गयी। वे उनकी मुरीद हो गयीं, और उनका असर जीवनपर्यंत रहा। उनकी आज़ाद लेखन-शैली और बेबाक आवाज़ ने इस्मत चुगताई को वह दृष्टि दी, जिससे उन्होंने उर्दू अदब में महिलाओं की जिंदगी और उनकी चाहतों को मुखर बनाया। इस्मत स्वीकार करती थीं कि रशीद जहाँ न होतीं, तो शायद वे वह लेखक न बन पातीं जो बनीं। उन्होंने लिखा है – उन्होंने मुझे बिगाड़ दिया, क्योंकि वे बहुत बोल्ड थीं और हर बात बेझिझक, बगैर किसी दुविधा के, ऊँची आवाज़ में कहती थींमैं उनकी नकल करना चाहती थी, चाहती थी कि बस उन्हें देखती रहूँ, ‘खा जाऊँ उन्हें - और यह भी – सुंदर नायक-नायिकाएँ… मोम जैसी उँगलियाँ, नींबू और गुलाबी फूल—सब गायब हो गए। धरती-सरीखी रशीद जहाँ ने मेरे सारे हाथी-दाँत के बने देवताओं को चकनाचूर कर दिया… ज़िंदगी नंगी-सच्चाई के साथ मेरे सामने खड़ी हो गई।

 रशीद जहां की शख्सियत चकित करती है। 1905 में अलीगढ़ में जन्मी रशीद जहां के parents महिलाओं की शिक्षा के हिमायती और एक महिला-कॉलेज की स्थापना से जुड़े थे। 1931 में आये कहानी-संग्रह ‘‘अंगारे’’ की एक लेखक, उर्दू अदब में एक नये युग की शुरुआत करने वाली, दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज में गायनाकालिस्ट और लेखक, प्रलेस की एक आवाज, कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रिय मेम्बर। पिछली शताब्दी के तीसरे दशक में औरतों के लिये यह कितना मुश्किल रहा होगा, आज इसका पूरा अंदाज लगा पाना असंभव है। ये बोल्ड, प्रखर, तेजस्वी, बागी औरतें सिर्फ अपने वक्त की अभिव्यक्ति नहीं, अपने वक्त से बहुत आगे थीं । रशीद जहां के गैर-पारंपरिक लिबास, उनके हेयर-स्टाइल को लेकर मंटो ने कुछ फिकरे कसे हैं(*), जो उन जैसे अजीम अफसानानिगार को ज़ेब नहीं देते। बात छिड़ी है तो ... just to put on record - कहना चाहता हूँ कि मंटो ने मीना बाज़ार में नृत्यांगना और अभिनेत्री सितारा देवी का जो स्केच खींचा है, वह भी उन जैसे बड़े लेखक के लिए शोभनीय नहीं है। बहरहाल, मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर पता चले कि रशीद जहां इस उपमहाद्वीप की पहली मुस्लिम लेडी डाक्टर थीं। पहली महिला डाक्टर आनंदी गोपाल जोशी ने 1886 में मेडिकल की डिग्री ली थी। गूगल बताता है कि पहली मुस्लिम महिला डाक्टर जोहरा बेगम काजी थीं, जिन्होंने 1935 में लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज से डिग्री ली थी। यह बात कुछ उलझन भरी है क्योंकि रशीद जहां 1931 में उसी लेडी हार्डिंग मेडिकल कालेज से ग्रेजुएट हुईं थीं। इस तरह इस उपमहाद्वीप की पहली मुस्लिम महिला डाक्टर वे ठहरती हैं। उनका नाम इस रूप में क्यों दर्ज नहीं है। जो साहित्य के रिसर्चर हैं इसकी तफतीश कर सकते हैं। अगर यह बात सही है तो इसे जरूर दर्ज होना चाहिये।

लेकिन हम यहां डाक्टर रशीद जहां को नहीं, लेखक रशीद जहां को याद कर रहे हैं, जो उर्दू में ही नहीं, शायद किसी भी भारतीय भाषा में पहली नारीवादी थीं, पर्दे के पीछे’ जो पर्दे के विरुद्ध पहली कहानी है, और ‘दिल्ली की सैर’ जैसी कहानियों की लेखिका। ये दोनों कहानियां ‘अंगारे’ संग्रह में हैं, जिसका उर्दू की लिटरेरी हिस्टी में क्या महत्व है, इसे जानकार लोग जानते हैं। इस संग्रह को अंग्रेज सरकार ने जब्त किया था। इसके अलावा वे ‘चिंगारी’ की संपादक थीं जो उर्दू की पहली मार्क्सवादी पत्रिका थी। यही नहीं वो इप्टा की स्थापना से भी पहले इस देश में प्रोग्रेसिव थियेटर की संस्थापकों में से एक थीं। उन्होंने चेखव और प्रेमचंद से लेकर ब्रेख्त और जेम्स ज्वाइस तक की रचनाओं का नाट्य-रूपांतर और उनकी प्रस्तुति, निर्देशन किया। और यह सब तीस के दशक में ... इस बात को बार-बार दोहरा कर भी इसका महत्व पूरी तरह नहीं बताया जा सकता। 

इस्मत, रशीद जहां, और अन्य भी ... मैं उन्हें सिर्फ लेखिकाओं या घटनाओं की तरह नहीं, परिघटनाओं की तरह, फिनामिनन की तरह देखता हूं। हिंदी के लोग रशीद जहां को कम जानते हैं और उन्हें याद करने के मौके तो और भी कम आते हैं। रशीद जहां, इस्मत, रजिया सज्जाद जहीर ये किसी और दुनिया से नहीं आये थे। उसका संबंध उस वक्त के राजनीतिक वातावरण से है। गांधी जी से असहमतियां हो सकती हैं लेकिन यह तथ्य मिटाया नहीं जा सकता कि उनके असहयोग आंदोलन में, इस मुल्क के इतिहास में महिलायें शायद सैकड़ों सालों के बाद पहली बार घर से बाहर आयी थीं। और उर्दू अदब में यह सिर्फ शुरुआत थी । उसके बाद बागी लेखिकाओं और शायराओं की एक ऐसी भरी-पूरी रवायत बनी जिस पर अन्य भाषाओं को रश्क हो सकता है । बुरी औरत की कथा, बुरी औरत के खुतूत, रबे शर्तनामाऔर वहशत और बारूद में लिपटी हुई शायरीजैसी रचनाओं की लेखिका किश्वर नाहीद, जो पाकिस्तान के दमनपूर्ण समाज में अंतश्चेतना की आवाज बनीं। नींद की मुसाफतें और रास्ते मुझे बुलाते हैं जैसी रचनाओं की लेखिका अजरा अब्बास और सिर्फ यही नहीं ... अदा जाफरी, खदीजा मस्तूर, जमीला हाशमी, बानो कुदसिया, फहमीदा रियाज, मुमताज शीरीं, जीलानी बानो, परवीन शाकिर, जाहिदा हिना, जाहिरा परवीन, शबनम शकील, शाहिदा हसन ... यह सूची बहुत-बहुत लंबी है। सबका स्वर रूढ़ियों, दमन और अन्याय के प्रति कमोबेश वैसा ही अवज्ञाकारी या डिफाएंट है जो मंटो या इस्मत चुगताई का था। रशीद जहां इन सबकी pioneer और प्रेरक थीं।  

वे सिर्फ एक अफसाना-निगार नहीं थियेटर और दीगर राजनीतिक, सांस्कृतिक गतिविधियों में सक्रिय थीं और इनके अलावा डॉक्टर थीं ही। सिर्फ लेखक होने से बढ़कर वे अपने आप में वे एक पूरी तहरीक थीं। वे अधिक नहीं लिख सकीं, लेकिन अदृश्य रूप से उस समय की कितनी ही रचनाओं में मौजूद हैं। उनका एक परिचय यह है कि प्रेमचंद की ‘गोदान’ की ‘मालती’ — जो पेशे से डॉक्टर, आधुनिक, आत्मविश्वासी, सामाजिक कुरीतियों के प्रति आलोचनात्मक और स्त्री-स्वतंत्रता की समर्थक थीं, दरअसल वही हैं।  प्रेमचंद रशीद जहाँ के बेहद क़रीबी थे (प्रगतिशील लेखक संघ के शुरुआती स्तंभों में दोनों शामिल थे)। उनकी शख्सियत का असर प्रेमचंद के कई स्त्री-पात्रों पर दिखता है, लेकिन मालती सबसे प्रत्यक्ष और पहचानी जाने वाली छवि है। यह आलोचकों और शोधकर्ताओं की लगभग सर्वसम्मत राय है।

एक कयास-आराईमैं भी करना  चाहता हूँ और वह यह कि प्रेमचंद की विलक्षण कहानी क्रिकेट मैच की मिस हेलेन मुखर्जी जैसा गैर-मामूली पात्र  भी कभी न सिरजा जाता अगर वे रशीद जहां को न जानते। हेलेन मुखर्जी ने भी डाक्टरी की पढ़ाई की है। कहानी में वे अंग्रेजों की क्रिकेट टीम के विरुद्ध हिन्दुस्तान की टीम तैयार करती हैं।

उनके बारे में अन्य तथ्य ये हैं - 1934 में उन्होंने महमूद-ज़फ़र से विवाह किया। उनकी साहित्यिक-राजनैतिक गतिविधियां अंत तक जारी रहीं जिनके कारण उन्हें अक्सर निगरानी और चुनौतियों का सामना करना पड़ा। 1949 में रेल्वे हड़ताल में भाग लेने पर वे कुछ समय जेल में भी रहीं। 1952 में कैंसर से उनका निधन हुआ।

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(*)डॉक्टर रशीद जहां का फ़न आज कहाँ है? कुछ तो गेसुओं के साथ कटकर अलैहदा हो गया और कुछ पतलून की जेबों में ठुस कर रह गया। फ़्रांस में जॉर्ज सेड ने निस्वानियत का हसीन मलबूस उतार कर तसन्नो की ज़िंदगी इख़्तियार की। पुलिस्तानी मूसीक़ार शोपाँ से लहू थुकवा-थुकवा कर उसने ला’ल-ओ-गुहर ज़रूर पैदा कराए, लेकिन उसका अपना जौहर उस के बतन में दम घुट के मर गया।

(मंटो के एक आलेख से)


 

 

Sunday, March 27, 2016

अस्पताल के उस कमरे

एक छुअन की याद

योगेंद्र आहूजा 

पिछले कुछ बरसों में कर्इ बार ऐसा हुआ कि वीरेन जी को मिलने देखने अलग अलग अस्पतालों मेें जाना पड़ा, शीशों के पीछे दूर से ही देखकर वापस आना पड़ा । एक अस्पताल में उनके साथ, उनके बेड के करीब काउच पर दो रातें भी बितार्इं । फिर भी मुझे कभी यकीन नहीं हुआ कि वह शख्स किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त है या हो सकता है । इसलिये कि बीमारी के सबसे कठिन क्षणों में, उपचारों के बीच के अंतरालों, मुशिकल शल्यक्रियाओं के बीच की मोहलतों में या एक से दूसरे अस्पताल आते जाते उनसे जो बातें होती थीं उनमें दुनिया जहान के सारे विषय आते थे, लेकिन जिस पर कभी चर्चा नहीं होती थी, वह था - उनकी बीमारी । वे उसकी चर्चा सफार्इ से टाल देते थे या जरा सा कुछ कहतेे थे तो एक ऊबे हुए स्वर में, निर्वैयकितक भाव से ।  मसलन 'हां यार इधर से काट दिया है उन्होंने या गर्दन की पटटी को छूकर - 'कुछ नहीं, जरा सा रेडियेशन से जल गया है । शायद ही किसी ने उनका दर्द से विकृत चेहरा देखा हो, कराहना सुना हो । उनके तार तो हमेशा पूरी कायनात से जुड़े थे । बीमारी बस एक व्यतिक्रम थी, थोडी देर का व्यवधान या 'ब्लैक आउट का एक संक्षिप्त अंतराल जब  रोशनियों कुछ देर के लिये बुझती हैं, मगर फिर जल उठती हैं, पहले से भी उज्जवल और प्रकाशमान । उन्हें बहुत अधिक मिजाजपुर्सी या अतिरिक्त चिंता दर्शाना पसंद न थे । वे साहित्य की दुनिया और असल दुनिया, दोनों के एक एक रग रेशे की खबर रखते थे, बहसों और वार्तालापों और मनोविनोदों में पूरी चेतना के साथ मौजूद रहते थे । इसलिये, वे अब नहीं हैं, यह खबर अभी तक मुझे एक अफवाह  सरीखी लगती है । उस चलती फिरती रौनक या छलकते प्याले का बीमारी और मृत्यु से कोर्इ नाता जोड़ पाना मुझे असंभव जान पड़ता है ।
दिल्ली के कटवारिया सराय में स्थित राकलैंड अस्पताल में शुरुआती सर्दियों की वह रात धप से अचानक उतरी । केरल या मणिपुर से आयी नर्स बीच बीच में आती जाती थी । पास में रखे स्टैंड पर ग्लूकोज नली में टप टप टपकता था । नर्स नली में ही इंजेक्शन से दवाइयां उंडेलती थी जो ग्लूकोज के संग बहते हुए हाथ की उभरी हुर्इ शिराओं में चली जाती थीं । वीरेन जी इसे बहुत कौतूहल से देख रहे थे ।
'इसी दुनिया में के कवि के लिये जो कुछ था, बस यही दुनिया थी, भले ही यह उनके लिये छोटी पड़़ जाती थी । यह अधूरी थी, मनमुताबिक नहीं थी और रोज ब रोज भयावह होती जाती थी - मगर जो कुछ भी था वह यही । उन्हें जैसे सांस लेने को हवा काफी नहीं थी, सूरज, पक्षी, पौधे, पेड़़ और न जाने क्या क्या चीजें उन्हें हरदम पास बुलाती रहती थी । ( एक बार किसी चिडि़याघर से कोर्इ गैंडा भाग गया था और वे बरेली के मित्रों के साथ जीप में बहुत दूर उस जंगल में चले गये थे जहां उसका होना संभावित था । ) उन्हें लोगों से घिरे रहना, इर्द गिर्द मानवीय चेहरों की मौजूदगी पसंद थी और वे भी जैसे पूरे जुटते नहीं थे । मगर किसी दूसरी दुनिया में न उनका यकीन था, न कहीं और जाने की आकांक्षा । चालीस बरसों के लंबे साथ में, स्वाभाविक ही, अनेक बार प्रियजनों की मौतों की खबरें आयीं । ऐसे अवसरों पर मैंने उन्हें विचलित, शोकाकुल यहां तक कि अथाह शोक में डूबे हुए भी देखा( याद आता है कि गोरख पांडेय की मृत्यु की खबर आने पर वे किस कदर गमगीन हुए थे, और इसी तरह उत्तराखंड के पत्रकार उमेश डोभाल की हत्या पर, अभिनेत्री सिमता पाटिल की मृत्यु पर )  - लेकिन मृत्यु को लेकर दार्शनिक चिंतन करते, फिलासफी में फिसलते कभी नहीं । वे हमेशा मौत के खिलाफ थे और मौत के फलसफों और मृत्योन्मुख  रचनाओं के उससे भी अधिक । सिर्फ स्थूल मृत्यु नहीं बलिक उसके जो भी संभव मायने हो सकते हैं मसलन ठहराव, गतिहीनता, खालीपन, खात्मा, मातम, सूनापन, पराजय, बिछोह, अलविदा । वह शख्स दर्द को भीतर भींचे, हाथों में एक डायरी थामे, आधे कटे चेहरे और रिसते घावों के साथ आखिरी पल तक जनांदोलनों में कवितायें पढ़ता यूं ही नजर नहीं आता था । बेशक वह फासीवाद के विरुद्ध अपनी मुटठी उठाना, प्रतिरोध के स्वरों में अपनी आवाज मिलाना चाहता था । बेशक वह कर्इ दशकों पहले, शुरुआती युवावस्था में अपने आप से किया वादा आखिरी सांस तक निभाना चाहता था - भाषा को रस्से की तरह थामे, दोस्तों केे रास्ते पर चलते जाने का । मगर यह मौत की घूरती आंखों से एक मुठभेड़ भी थी, उनकी निजी लड़ार्इ, जिसमें हर बार मौत को ही मुंह की खानी होती थी । इसलिये उस सर्वदा अपराजेय शख्स का इस दुनिया को अलविदा कह जाना मुझे घोर अतार्किक जान पड़ता है । उसे स्वीकार कर पाने के लिये मेरे पास कोर्इ तार्किक तसल्ली नहीं, न कोर्इ दार्शनिक दिलासा  । 

वे चार दशकों पहले के दिन थे । वे बरेली के उस कालेज में पढ़़ाते थे जहां मैं नैनीताल जिले के छोटे से कस्बे काशीपुर से आगे पढ़ने के लिये आया था । वे हिंदी विभाग में थे और मैं विज्ञान का विधार्थी था । ये दोनों विभाग एक दूसरे के लिये जैसे परग्रही थे, प्रकाश वर्षो की दूरी पर । लैबोरेटरी के सन्नाटे और सिर चकरा देने वाली गंधों के बीच उनके नाम का जिक्र कभी कभी चला आता था । कभी मैं भी मानविकी विभागों का एक खामोश चक्कर लगा आता था, यूं ही निरुददेश्य । उन दिनों एक ही कालेज में होने के बावजूद उनसे कभी भेंट नहीं हुर्इ । मैं उन्हें सिर्फ दूर दूर से देखा करता था । वे आपातकाल के सहमे हुए दिन थे । याद आता है कि कालेज के मेन हाल में कोर्इ साहित्यिक कार्यक्रम था । भीतर एक इंतजार करती, कसमसाती  हुर्इ भीड़ थी और मैं बाहर गलियारे में टहल रहा था । एक स्कूटर आकर रुकता है । वीरेन जी तेजी में हैं, मशहूर लेखक मटियानी जी के साथ भीतर जाते हुए ।  सीढि़यों पर उनके सैंडिल में कुछ उलझा, वे क्षणांश के लिये लड़खड़ाये । मैं पास ही खड़ा था, संकोच में सिमटा हुआ । मैं उस घड़ी आगे बढ़़कर उस हाथ को थामना चाहता था जिसे आगे चलकर असंख्य बार मुझे थामना था, भरोसा और दिलासे देने थे । लेकिन चूक गया, बस यूं ही खड़ा रहा । कर्इ सालों के बाद दोस्ती होने पर एक बार यह घटना उन्हें बतार्इ । हर 'टच अपने भीतर इतनी संभावनायें लिये होता है, उन्होंने कहा । हर छुअन कोर्इ दरवाजा खोल सकती है । क्या पता कि वह टच होते होते रह न जाता तो हमारी दोस्ती को इतने सालों का नुकसान न होता । 

उसके बाद न जाने कितने कुंओं की मुंडेरों पर साथ साथ बैठे, कितनी स़ड़कें नापीं । समुद्र तटों तक जाने वाली सड़कें, और धूल धक्कड़ से भरी और कबि्रस्तानों के करीब से गुजरने वाली उजाड़, सब प्रकार की । आलमगीरीगंज की सड़कों पर बेपनाह धूल हुआ करती थी और सिविल लाइंस की अभिव्यंजनावादी चित्रों सरीखी थीं, नीलवर्णी, नयनाभिराम । वह मेरे लिये एक अनखोजा, अनजाना, रोमांचक अनंत था । विचारधारा, मनुष्य, दुनिया, इंसान की जददोजहद, कवितायें और महान रचनायें और ख्ुाद अपना आप - जितना जानना संभव था, उसी दौरान, उनकी सोहबत मेें ही जाना । उसी दौरान विचार स्पष्ट और एनेलिसिस धारदार हुए । दुनिया और समाज की पोलें खुलीं, रहस्य उजागर हुए, मायने प्रकट हुए । वीरेन जी की सर्वाधिक प्रिय जगह सड़कें थीं और वे खुद को एक गरबीला सड़क छाप कहते थे । उनकी सड़क सीरीज की कवितायें इलाहाबाद की सड़कों के बारे में हैं लेकिन संभवत: सबसे अधिक वे बरेली की ही सड़कों पर दोहरायी गयीं । उन पर चलते हुए उन्होंने न जाने कितनी बार कहा होगा कि अपनी जमीन यही है, वे उसे छोड़कर कभी नहीं जाने वाले, या वहां से कहीं भी जाना वहीं वापस आने के लिये होगा । वहां की हर सड़क का मन में एक अलग संस्मरण है । 

बरेली कालेज के दिनों की दशकों पुरानी उस अनहुर्इ छुअन की याद से एक दूसरी छुअन की याद उभर आयी है । वे राकलैंड अस्पताल में थे । अगले दिन उनका एक आपरेशन होना था । उनका फोन आया । वे चाहते थे कि मैं वह रात अस्पताल के कमरे में उनके साथ बिताऊं । 'साथ में कुछ लेते आना यार, सुनाना यह भी कहा उन्होंने । कवि होने के नाते उनका ज्यादा राब्ता, स्वाभाविक रूप से, कविता की दुनिया से था । उनके लिये मुझे गल्प और गध के संवाददाता का रोल निभाना होता था । हमारे बीच का यह एक स्थायी मजाक था, एक नकली बहस ... मैं उन्हें छेडने के लिये कहता था कि रही होगी कभी कविता अग्रगामी विधा, लेकिन अब वह पिछड़ गयी है । इस वक्त का असल प्रातिनिधिक कृतित्व गध में लिखा जा रहा है, गध में ही मुमकिन है । कविता काल कवलित हो चुकी या कहानी के पीछे पीछे चलती है, लड़खड़ाती हुर्इ । 'क्षुधा के राज्य में पृथ्वी गधमय है बांग्ला कवि सुकांत का यह वाक्य हमारी बातचीत में आता था । वीरेन जी कहते थे कि यह वाक्य स्वयं अपने में एक कविता का अंश है, और मानवीय अभिव्यकित का सर्वश्रेेष्ठ रूप, कुछ भी कहो, कविता ही है, वही हर लफज की कीमत पहचानना सिखाती है, और, कि तुम लोग लफजों की कितनी बरबादी करते हो ।

दिल्ली के कटवारिया सराय में स्थित राकलैंड अस्पताल में शुरुआती सर्दियों की वह रात धप से अचानक उतरी । केरल या मणिपुर से आयी नर्स बीच बीच में आती जाती थी । पास में रखे स्टैंड पर ग्लूकोज नली में टप टप टपकता था । नर्स नली में ही इंजेक्शन से दवाइयां उंडेलती थी जो ग्लूकोज के संग बहते हुए हाथ की उभरी हुर्इ शिराओं में चली जाती थीं । वीरेन जी इसे बहुत कौतूहल से देख रहे थे । बाद में उन्होंने मुझसे एक सहज शरीर-वैज्ञानिक जिज्ञासा प्रकट की - अच्छा, इस नली में इंजेक्शन से थोड़ी शराब डाली जाये तो  ?

बिस्तर के करीब बेंच पर बैठकर मैंने धीमे धीमे ब्राजील के लेखक जोआओ गाउमरास रोजा की बहुप्रशंसित, बहुअनुवादित कहानी पढ़ी जिसका शीर्षक था  - नदी का तीसरा किनारा । वे कंबल ओढ़कर लेटे थे, ध्यानमग्न सुनते हुए ।  वह उन्हें बहुत भावसिक्त करने वाली कहानी लगी लेकिन हमारी छदम बहस के संदर्भ में  उन्होंने कहा कि उस कहानी के सारे मायने तो वाक्यों के बीच हैं । उस पर खुद कविता का एक भारी कर्ज है । रात्रि काफी बीतने पर, अस्पताल के सन्नाटे में मैंने उन्हें जो दूसरी कहानी सुनार्इ वह पोलेंड के लेखक फि्रजेश कारिंथी की थी । वे खुद एक डाक्टर थे और कहानी भी अस्पताल की पृष्ठभूमि पर थी । इतने वर्षो के बाद उस रात्रि को याद करते हुए मुझे यह कुछ अतिरिक्त रूप से मानीखेज लग रहा है । एक अस्पताल में एक डाक्टर लेखक की कहानी का पढ़ा जाना, अस्पताल की पृष्ठभूमि पर ।

एक आपरेशन के तुरंत बाद एक बहुत सम्मान्य सीनियर सर्जन के दो सहायक, जो जूनियर डाक्टर हैं, दस्ताने उतारने के बाद हाथ धो रहे हैं । प्रथम सहायक वयदा गुस्से में उबल रहा है । 'जहन्नुम में जायें । उसका चेहरा लाल हो रहा है । 'डांट सुनने को मैं ही एक रह गया हूं । मैं कोर्इ बच्चा नहीं हूं । वे दोनों उस सर्जन को कोस रहे हैं जिसने आपरेशन के दौरान उन्हें छोटी छोटी गलतियों पर कस कर लताड़ लगार्इ है, मरीज के सामने ही जो बेहोश नहीं था । 'उसका असिस्टेंट होने का गौरव मेरे लिये दो कौड़ी का है । अब मुझ पर चिल्लाया तो ...। इसी दौरान प्रोफेसर सर्जन अचानक कमरे में चले आये थे । उन्होंने उनका चिल्लाना सुन लिया है मगर अनजान बनकर वे कहते हैं -  अच्छा भाइयो, आज का काम खत्म हुआ । 

दोनों की जान में जान आती है । मुंह से खून के छींटे धोते हुए सर्जन दर्र्द से कराहता है । दोनों सहायक दौड़ते हैं । 'ओह यह मुझे चैन न लेने देगा । इसका इंतजाम करना ही होगा । वह कहता है । सहायक हक्के बक्के खड़े हैं। 

'मुंह बाये क्या खड़े हो ? जैसे तुम्हें मालूम ही नहीं कि मुझे हर्निया है । काम करते वक्त जब मैं दर्द के मारे दांत भींचता हूं और तुम छिप छिप कर हंसते हो तो तुम समझते हो कि मैं जानता नहीं ? 

वीरेन जी आंखें मेरे चेहरे पर टिकाये ध्यानमग्न सुन रहे हैं ।

आने वाले कुछ दिन छुटिटयों के हैं । सर्जन के मन में जैसे उसी क्षण विचार आया हो, वह तय करता है कि क्यों न तत्काल उसका आपरेशन कराकर छुटटी पायी जाये । उसकी स्फूर्ति का असर सहायकों पर भी होता है । वे सुझाव देते हैं कि फलाने सर्जन को बुलाया जाये । 'दिमाग ठिकाने है ? प्रोफेसर भयंकर चेहरा बनाकर कहता है । 'भला किसी अन्य प्रोफेसर की मजाल जो मेरे पेट में पंजा घुसेड़े ? आपरेशन थियेटर तैयार होता है । वही सहायक आपरेशन करेंगे । बस चिमटियां, औजार, रुर्इ पकड़ाने के लिये एक नर्स और रहेगी । चीरा लगाने के लिये स्थानीय रूप से सुन्न करना काफी है । इत्तफाक से वे सुबह नाश्ता गोल कर गये थेे इसलिये जुलाब देने की भी जरूरत नहीं । एक बड़ा सा शीशा लैंप के ऊपर तिरछा लटकाया जायेगा कि प्रोफेसर सारा तमाशा साफ साफ देखते रहेें । 

जीवन अगर स्पर्शो का जमा खाता है तो मेरी स्पर्श एलबम का अब तक का सबसे चमकीला स्पर्श वही है । अनगिनत बार उसकी याद आंखें गीली कर चुकी है ।
वीरेन जी उठकर बैठ जाना चाहते हैं । नर्स भागी हुर्इ आती है । वह टूटी फूटी हिंदी में कुछ कहती है और उन्हें फिर लेटने को बाध्य कर सिरहाना और नलियां ठीक करती है । उसके जाने के बाद वीरेन जी कहते हैं, चिटखनी लगा दो । 

इसके बाद कहानी में उस आपरेशन का विस्तार से विवरण है ।  दोनों जूनियर सहायक डरे सहमे हैं और प्रोफेेसर उन्हें हर बात पर डांटता है - रोशनी का फोकस, चीरे की पोजीशन और लंबार्इ, चिमटियां रखने की जगह ।  उनका चेहरा अपमान के मारे काला पड़ जाता है । आपरेशन चल रहा है और वह उन्हें गालियों से नवाज रहा है । 'कसार्इ, साले, नालायक । वे घबराये हुए, गलतियों पर गलतियां करते हैं । माथे पर पसीना झलमला रहा है । जख्म बहते जा रहे हैं, उनसे धागे निकल रहे हैं । 'धन्य हो, जनाब सर्जन । अब क्या करना होगा ? बता दूं तो बड़ा अच्छा हो, क्यों ? लेकिन अपनी प्रतिष्ठा की जिस सर्जन को इतनी चिंता हो, उसे पता होना चाहिये । मैं कौन हूं ? मैं तो इस वक्त असहाय मरीज हूं । अपनी मुकित का इंतजाम खुद ही करो । 

वीरेन जी के चेहरे से जाहिर है कि कहानी का एक एक लफज दिल को चीरता चल रहा है । एक कामिक कथा होने का भ्रम देने वाली यह कहानी जब अवाक कर देने वाले बेहद मानवीय और हृदयस्पर्शी अंत पर पहुंचती है, उनका चेहरा उत्तेजना से आरक्त है । उनकी आंखें चमकने लगी थीं । 'यह मुझे फोटो स्टेट चाहिये यार ।  यहां के सारे डाक्टरों और नर्सो को दूंगा । उन्होंने कहा । 

अस्पताल के उस कमरे में न कोर्इ बीमारी थी न अंत की दूर दूर तक कोर्इ आहट । वहां दवाइयों की गंध थी मगर हमारे लिये उस रात अस्पताल का वह कमरा जैसे 'बहारों का जवाब था । ओह काश मुझे अंदाजा होता कि . . .
कुछ देर में वीरेन जी सो गये । वे हल्की सर्दियों के दिन थे । पास के काउच पर लेटे मुझे भी न जाने कब नींद आ गयी । वह ऊषाकाल रहा होगा जब आप गहरी नींद में होते हुए भी जागृत होते हैं । मैंने महसूस किया गरमार्इ का एक सुखद घेरा पैरों की तरफ से उठता, मुझे ढ़कता हुआ । कोर्इ मुझे कंबल ओढ़ा रहा था । वह जो भी था, उसका नर्स होना तो नामुमकिन था क्यों कि रात को सोते वक्त कमरे का दरवाजा मैंने ही बंद किया था । नींद में ही अवचेतन ने हर हरकत, छोटी से छोटी चीज दर्ज की । किस तरह वीरेन जी ने मुझे कंबल ओढ़ाने के लिये अपने हाथ से वह सुर्इ सावधानी से अलग की होगी । ग्लूकोज वाला स्टैंड परे खिसकाया होगा । बिस्तर से उतर कर कुछ कदम चल कर मुझ तक आये होंगे ।

जीवन अगर स्पर्शो का जमा खाता है तो मेरी स्पर्श एलबम का अब तक का सबसे चमकीला स्पर्श वही है । अनगिनत बार उसकी याद आंखें गीली कर चुकी है ।