Tuesday, September 1, 2026

शताब्दी स्मरण: विजयदान देथा



 

 ( विजय दान देथा  को उनकी जन्म शताब्दी के अवसर  कथाकार और  धरती के माप-जोख के गहन अनुसन्धानकर्ता अरुण कुमार ‘असफल’ ने यह आलेख विशेष रुप से  ‘लिखो यहां वहां’ के लिये लिखा है। )

 

 यह उस समय की बात है जब मैं बोरुन्दा में था

अरूण कुमार ‘असफल’ 


 
’ एक था राजा, एक थी रानी...’ या फिर ‘ किसी जमाने की बात है...’ , दादी-नानी के क़िस्सों की शुरुआत ऐसी ही होती थी। यह शुरुआत इतनी सम्मोहक और मासूम होती थी कि हम शनैः शनैः डूबते चले जाते थे। कुछ ऐसी ही शुरुआत विजयदान देथा (बिज्जी) की कहानियों की होती है, उदाहरणार्थ ‘ किसी एक वक़्त की ढलान पर कुदरत का एक गांव बसा हुआ था ’ (लजवन्ती), बड़ी रातों का बड़ा भोर’, जूनी बातों का नया जोर’ (बड़ा कौन) या ‘ एक धनी सेठ था। उसके इकलौते बेटे की बरात धूमधाम से शादी संपन्न का वापस लौटते हुए जंगल में विश्राम करने के लिए रुकी। घनी खेजड़ी की ठंडी छाया। ’ (दुविधा) । जब कहानियों की शुरुआत इतनी मोहक हो तो क्या बड़ा क्या छोटा, क्या गँवई क्या शहराती, कौन नहीं फंसेगा बिज्जी की क़िस्सगोई के जाल में! कहानियां पढ़ते हुए जब सुनने का सुख मिलता है तो ऐसा व्यक्ति जब मुंह खोलता होगा तो क़िस्से ही क़िस्सें निकलते होंगे, ऐसी हमारी कल्पना थी।
इसलिए बिज्जी को सुनने को बहुत मन था। पर बिज्जी सर्वथा सर्वत्र उपलब्ध नहीं रहते थे। बोरुन्दा से बाहर निरुद्देश्य भ्रमण नहीं करते थे। कभी गोष्ठी सेमिनार वगै़रह में बाहर जाते भी थे तो तुरंत वापस आ जाते थे। बिज्जी उन दुर्लभ साहित्यकारों में थे जिन्होने ता उम्र अपना गांव नहीं छोड़ा, पर जिनकी प्रसिद्वि दूर दूर तक थी। एक बार मैं किसी काम से जोधपुर गया भी था पर पारिवारिक अड़चनों की वज़ह से बोरुन्दा नहीं जा पाया था। पर यात्रा की यह अपूर्णता मुझे काफ़ी समय तक कष्ट देती रही थी। इससे मुक्ति पाने के लिए ही मैं सपरिवार अगस्त 2011 में बोरुन्दा जा पहुँचा। बोरुन्दा पहुँचना आसान नहीं था। पर जब आकर्षण जबरदस्त हो तो बाधाओं के बावज़ूद आदमी उस ओर खिंचा चला जाता है। कहा जा सकता है कि उनकी कहानियों के आकर्षण से खिंचते हुए हम अंततः बोरुन्दा जा पहुँचे।
 
हमारे लिए बोरुन्दा पहुँचना भले ही कठिन था पर बोरुन्दा से उनके घर पहुँचना कितना आसान था यह हमें बस स्टेशन पहुँच कर पता चल गया। बस से उतरते ही जिस पहले व्यक्ति से बिज्जी का घर पूछा तो उसने बिना देर किये इशारे से उनके घर का रास्ता बता दिया। इसके बाद भी जिस किसी से भी बिज्जी के घर का रास्ता पूछा , किसी ने भी यह नहीं कहा कि उसे उनके घर का रास्ता नहीं मालूम। एक साहित्यकार की समाज में इतनी स्वीकार्यता कम ही देखने को मिलती है। जिस ‘ लोक’ के सुख,दुख, चिंताओं को वह अपनी कथाओं के माध्यम से व्यक्त करते हैं उस ‘ लोक’ को उनको आदर भाव देना ही था। पर जब मेरी मुलाकात इस सम्मानीय व्यक्त्तिव से हुई तो मुझे बहुत पीड़ा हुई। अपने प्रिय लेखक को बिस्तर पर पड़े देख कर मेरी खुशी आधी रह गयी थी। पता चला कि दो वर्ष पूर्व गिर जाने के कारण उनकी कूल्हे की हड्डी टूट गयी थी। अधिक उम्र होने के कारण हालत में बहुत धीरे धीरे सुधार हो रहा था। हम समझ सकते थे कि जो व्यक्ति कुर्सी मेज पर बैठ कर नित आठ घंटे लिखता पढ़ता हो उसके लिए यह स्थिति कितनी यातनादायक थी। पर उनके साथ एक और त्रासदी हमारे वहाँ पहुँचने के कुछ समय पूर्व हुई थी। उनके बेटे कैलाश कबीर ने बताया कि कुछ महीने पूर्व वह स्नानघर में फिर गिर गये थे जिससे उनके सर में चोट लग गयी थी। उन्होने बताया कि कूल्हे की हड़डी टूटने के बाद भी कुर्सी मेज पर बैठ कर थोड़ा बहुत लिखना पढ़ना हो जाता था। पर सर में चोट लगने से लिखना बिल्कुल बंद हो गया था। बिज्जी ने स्वंय मद्धम स्वर में बताया कि लिखने के लिए दिम़ाग पर जोर देना या कुछ कल्पना करना बिल्कुल असंभव हो गया था।
 
 

 
 
मैंने बिज्जी को देखा। इतना कुछ लिख लेने के बाद भी कुछ और लिखने का अतृप्त भाव उनके चेहरे पर पढ़ा जा सकता था। ’लोक’ के लिए समर्पित लेखक कभी नहीं चुकता, इस बात के मिसाल थे बिज्जी। अस्सी बरस की उम्र में उनका महत्तम कार्य ‘दासी की दास्तान’ के रूप में आया। इसमें राजस्थान एवं आसपास के लोक में व्याप्त सात प्रेमाख्यान शामिल है। जिनमें राजस्थान गुजरात में प्रचलित लोक कथा जसमा-ओडण (अनदेखा अंतस), राजस्थान सिंध की प्राचीन लोक कथा जलाल-बूबना (उपाय) तथा राजस्थान का लोकप्रिय प्रेमाख्यान मूमल-महेन्द्र (भरम) शामिल हैं। स्त्री पुरुष संबंधों को रेखांकित करती हुई इन लोक कथाओं में प्रेम संबंधी मामलों में स्त्रियों के अंतर्द्वंद, आत्मविश्लेषण तथा पवित्र प्रेम के प्रति उनकी प्रबल इच्छा को ख़ूबसूरती से उकेरा गया है। चार सौ नौ पृष्ठों की यह किताब वर्ष 2010 में भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई थी और एक वर्ष बाद इसका दूसरा संस्करण आ गया था।
शारीरिक आघातों के साथ ही साथ निज से बिछुड़ने का भी आघात उन्हें लगा था। उनकी जीवन संगिनी भी नहीं रहीं थीं और उनके अंतरंग मित्र और रचनाकर्म में सहयोगी कोमल कोठारी भी कुछ माह पहले निधन हो गया था। यदि कोमल कोठारी का साथ नहीं रहता तो उनके लिए लोक कला का संचयन और संरक्षण संबंधी कार्य काफी मुश्किल होता। महाविद्यालय स्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद बिज्जी को जोधपुर दरबार में नौकरी मिल रही थी पर लोक कथायें उन्हें अपने पास बुला रही थीं और वह उधर ही बढ़ चले। तब कोमल कोठारी का आर्थिक सहयोग बिन मांगे हाज़िर था। कोमल कोठारी वणिक वर्ग से आते थे और लोक कलाओं के प्रति अगााध प्रेम रखते थे। राजस्थान में रहते हुए मैंने यह जाना कि वहाँ वणिक वर्ग का लोक कल्याणकारी पक्ष अधिक उभर कर आता है। महाराणा प्रताप और भामाशाह का प्रसंग तो सभी जानतें हैं। यहाँ कोमल कोठारी की भूमिका भामाशाह जैसी ही थी। कोमल कोठारी ने ही बोरुन्दा में रूपायन संस्थान की स्थापना की और विजयदान देथा को वहाँ का सचिव नियुक्त किया था।
बिज्जी ने बताया कि आजादी के आस पास के दौर में राजस्थानी लेखन में दो प्रमुख धाराएं थीं। कुछ लोग वेद, पुराण आदि धर्मग्रन्थों को आधार बना कर रचनाकर्म कर रहे थे तो दूसरा वर्ग वह था जो राजे रजवाड़ों की महिमा मंडन में लगा था। उन्होने इनसे अलग हटकर राजस्थान में यत्र तत्र फैले लोक कथाओं को अपना सृजनात्मक आधार बनाया। जब उन्होने लोक कथाओं पर अपना काम आरंभ किया तो उनके सामने राजस्थान, भारत यहाँ तक कि पूरी दुनिया में इसका उदाहरण नहीं था। यह तथाकथित मौलिक लेखन से भी अधिक कठिन या मौलिक कार्य था। इस तरह से कोई और मिसाल न होने के कारण उन्होने एक नई परंपरा की नींव डाली- लोक कथाओं को पुनः सृजित करने की परंपरा। जब उन्होने लोक कथाओं को बटोरने का कार्य आरंभ किया तो वह आजादी के तुरंत बाद का दौर था। जन सामान्य से संबंधित आधारभूत सुविधाएं जब शहरों में नहीं थीं तो गाँवों में होने का कोई सवाल ही न था। तब रास्ते के नाम पर यत्र तत्र रेत के ढूहें ही दिखते थे। वाहनों के नाम पर बस ऊँट गाड़ियां ही थीं। बहुत से स्थानों पर तो ऊँट गाड़ियां भी नहीं जा सकती थीं। वहाँ वह गिरते पड़ते पैदल ही बढ़ चलते और गाँव के बड़ों बुजुर्गांे की खोजबीन में लग जाते थे। उनसे स्मृतियों पर जोर डलवा कर लोक कथाएं सुनते और लिपिबद्ध करते। सुनाने वाले को उचित पारिश्रामिक भी देते और उसका नाम लोक कथा के साथ प्रकाशित करते।
  

 
 
 
लोक कथाओं का संचयन उनकी रचना प्रक्रिया का प्रथम सोपान था। उसके बाद आरंभ होता था इन लोक कथाओं के सृजन का महती कार्य। बिज्जी अपनी दृष्टि, संवेदना और रचनात्मक कौशल से लोे कथा के उस बीज से कहानी का ऐसा वटवृक्ष तैयार करते जिसमें लोक की गन्ध तो होती परंतु उसमें रूढ़िवादिता, जातीय या सामंती मुग्धता की दुर्गन्ध बिल्कुल नहीं। बिज्जी ने बताया कि बहुत सी लोक कथाओं में सामंती अहंकार की झलक आती है। उदाहरणर्थ, ’चाौधराइन की चतुराई’ संग्रह में सम्मिलित कहानियों की बीज लोक कथाओं में असमतावादी भाव रहता है। इसके अतिरिक्त बहुत सी लोक कथाओं में स्त्रियों, दलितों या विकलांगों की स्थिति उपहासजनक रहती है। यही स्थिति मुहावरों और लोकोक्तियों के बारे में भी है, उदाहरणार्थ- अंधा बाटे रेवड़ी, अंधों में काना राजा आदि। बिज्जी की कहानियों को ध्यानपूर्वक पढ़े ंतो उनकी अंतर्वस्तु में प्रगतिशील चेतना का आभास हो जाता है। उन्होने लोक कथाओं के विभिन्न अभिप्रायों को व्यापक जन समाज में प्रसारित करने के उद्देश्य से अपनी प्रगतिशील और वैज्ञानिक दृष्टि से पुनः सृजित किया। उनकी लोकरूचिपूर्ण भाषा तथा किस्सागोई की विशिष्ट शैली में पुनः सृजित होकर ये लोक कथाएं नए कलेवर में नए लाक्षणिक अर्थों में परिपूर्ण हैं। बिज्जी द्वारा सृजित लोक कथाएं मूल बीज कथाओं से इतनी अलग होतीं कि जब कभी इन कथाओं को उन लोगों को सुनाया जाता था जिनसे ये बीज कथाएं प्राप्त होती थी, तो वे लोग अचंभित हो जाते थे कि ये तो वे कथाएं नहीं हैं जो उन्होने बिज्जी को सुनायी थी।
उनकी कहानियों में स्त्री अपने देह का निर्णय स्वंय लेती है, दलित या श्रमिक तर्क करते हैं और राजा या अन्य प्रभावशाली वर्ग को निरुत्तर या निरुपाय रह जाना पड़ता है। इनकी एक कहानी ‘ रास्ते की तलाश’ में खेतिहर बुढ़िया बहस मुबाहिसों में राजा भोज को भी पीछे छोड़ देती है। ‘फितरती चोर’ का चोर अपने भोलेपन में इस दुनिया के असली चोरों को बेनकाब करता हुआ राजमहल के अंतःपुर में पहुँच जाता है और रानी का दिल चुरा बैठता है। पर अनजाने में ही किसी साधु द्वारा वचनबद्व हो जाने के कारण किसी भी सुख सुविधा का उपयोग नहीं कर पाता। इस कथा में निहित तमाम अर्थो में यदि यह अर्थ सर्वाधिक उभर कर आता है कि वंचितों, शोषितों के उन्नयन में ब्राह्मणवाद एक बहुत बड़ा रोड़ा है तो यह अनायस नहीं है।
अगर बिज्जी की सृजन यात्रा की बात करें तो लोक कथाओं का संचयन उस यात्रा का प्रथम पड़ाव और लोक कथाओं का पुनर्सृजन दूसरा पड़ाव है। लेकिन बिज्जी यहीं पर शांत नहीं हो जाते। उनकी सृजन यात्रा का तीसरा पड़ाव होता था उनकी किताबों की छपाई। बिज्जी अपनी किताबों का अपने आँखों के सामने छपते देखना पसंद करते थे। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि उनके द्वारा तैयार 5500 पृष्ठों की ‘ राजस्थानी हिंन्दी कहावत कोश’ की छपाई जब दिल्ली में हो रही थी तो वह वहाँ मौजूद थे। बिज्जी की मूल रूप से राजस्थानी में लिखी गयी लोककथाएं ं उनके सामने ही छप कर ‘बातां री फुलवारी’ नाम से 14 खण्डों में संकलित है और रूपायन संस्थान से प्रकाशित हैं। प्रकाशन के पश्चात इन पुस्तकों के वितरण और विक्रय का सवाल खड़ा हुआ। रूपायन संस्था के दो ही कर्ता धर्ता थे- बिज्जी और कोमल कोठारी। बिज्जी लोक कथाओं के संचयन कार्य में लगे रहते और कोमल कोठारी लोक कथाओं पर शोधपरक कार्य में व्यस्त रहते। उस समय वितरण का आज जैसा नेटवर्क नहीं था। फलतः दोनों को एड़ी चोटी का ज़ोर लगा कर इन पुस्तकों को पुस्तकालयों और संस्थानों में खपाना पड़ा था। जिसका नुकसान यह हुआ कि बिज्जी के कार्य का जितना प्रचार प्रसार होना था वह नहीं हो पाया। राजस्थान में व्यापकता में तब जाने गए जब राजस्थान से बाहर ख्याति मिली। यह तब हुआ जब राजकमल से 1979 में हिंदी में ‘दुविधा और अन्य कहानियाँ’ प्रकाशित हुई। इन कहानियों का राजस्थानी से हिन्दी में अनुवाद कैलाश कबीर ने किया है। उस समय हिंदी कहानियों में भाषा एवं शिल्प के स्तर पर नए नए प्रयोग हो रहे थे पर कथ्य पर कम ध्यान दिया जा रहा था। कथ्य से भरपूर बिज्जी की इन कहानियों ने हिंदी के बड़े पाठक वर्ग को आकर्षित किया। क़िस्सागोई और नाटकीयता से भरी इन कहानियों ने बहुत से नाटककारों, फ़िल्मकारों, धारावाहिक निर्माताओं आदि विभिन्न माध्यम के लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा। उनकी कई कहानियाँ नाट्य रूपान्तरित हो कर मंचित हुई और कई पर टेलीफ़िल्में बनीं।
 
 
 
 

 
 ‘दुविधा‘ पर प्रसिद्ध फ़िल्मकार मणिकौल ने उसी समय इस नाम से फ़िल्म बनायी जो फ़िल्म समीक्षकों द्वारा बहुत सराही गयी थी। सन 1983 में ही उनका दूसरा अनूदित संग्रह ‘ उलझन और अन्य कहानियाँ प्रकाशित हुआ। जिसमें ‘उलझन’ और ‘ फितरती चोर’ सहित कहानियों के साथ साथ एक लघु उपन्यास ‘आदमजाद’ भी है। प्रसिद्ध नाटककार हबीब तनवीर ने ‘फितरती चोर’ का ‘ चरणदास चोर’ के नाम से नाट्य रूपान्तरण किया और देश विदेश में इनका मंचन किया। इस नाटक में ‘लोक’ जीवन की समझ रखने वाले अपने समय के दो बड़े कलाकारों (विजयदान देथा और हबीब तनवीर) का कलात्मक कौशल देखने लायक है। दूरदर्शन ने उनकी एक प्रसिद्ध कहानी ‘परिणिति‘ पर पर टेलीफ़िल्म बनाकर उस दौर में प्रसारण किया जब दूरदर्शन घर घर में लोकप्रिय हो रहा था। यह कहा जा सकता है कि अस्सी नब्बे के दशक में बिज्जी राष्ट्रीय क्षितिज पर आए। वर्ष 2005 में अमोल पालेकर ने ‘दुविधा’ पर ही ‘पहेली’ नाम से फ़िल्म का निर्देशन किया। इस फ़िल्म ने थोड़ी बहुत व्यवसायिक सफलता हासिल की थी।
एक ही कहानी पर दो समर्थ फ़िल्मकारों द्वारा फ़िल्म बनाना महत्वपूर्ण घटना थी। मैंने इस बाबत बिज्जी से पूछा कि वह किन के कार्य से अधिक संतुष्ट हैं तो उन्होंने कहा कि ‘दुविधा‘ (मणिकौल) कलात्मक रूप से उत्कृष्ट फ़िल्म है और फ़िल्म समीक्षकों ने इसे सराहा है। पर वह दर्शकों के बड़े वर्ग तक पहुँचने में नाकामयाब रही। इसके बनिस्बत ‘पहेली’ (अमोल पालेकर) ज्यादा सफल रही है। भले ही इसमें मुंबइया फिल्मी मसालों की छौंक लगी हो पर यह आवश्यक था। माध्यम बदलने पर कुछ न कुछ बदलाव करना पड़ता है। साहित्य के पाठक से कई गुना फ़िल्म देखने वाले दर्शक होते हैं। अधिकांश दर्शकों का मानस मुंबइया फ़िल्मों के हिसाब से ट्यून्ड रहता है।
भूमिकाओं को बिज्जी कृतियों का अनिवार्य हिस्सा मानते थे। उनका मानना था कि कोई कृति तब तक अपूर्ण है जब तक कि उसमें भूमिका को समावेशित न किया गया हो। उनकी अधिकांश कृतियां लंबी चौड़ी भूमिकाओं से युक्त है।
 
उनके द्वारा तैयार वृहत ग्रन्थ ’रूंख’ में तो इक्तीस पृष्ठों की भूमिका है। अपनी भूमिकाओं की शुरुआत किसी को संबोधित करते हुए करते हैं। उदाहरणार्थ ’रूंख’ में कर्मेन्दु शिशिर को, ‘लजवन्ती’ में प्रकाशक दीप चन्द सांखला को और ’ महामिलन’ में अपने मित्र शिव प्रसाद पालीवाल को संबोधित किया है। लेकिन जैसे जैसे पाठक आगे बढ़ता है उसे ऐसी अनुभूति होती जाती है मानों बिज्जी उसी से संवाद कर रहे हों। यह संवाद काफी आत्मीय भरा होता है। बिज्जी अपने कष्टों का बयान तो करते ही हैं, अपनी कमियों को भी पाठकों से साझा करने से नहीं हिचकते। मजे की बात यह है कि इन भूमिकाओं में पुस्तक के विषयवस्तु के बारे में कम और इधर उधर की बातें अधिक होती हैं। उदाहरण के लिए, उपन्यास ‘ महामिलन’ में टैगोर की ‘ काबुलीवाला’ कहानी और इसके माध्यम से रवीन्द्र साहित्य की विस्तारपूर्वक चर्चा है। रूसी साहित्य की भी चर्चा है। दस बारह पृष्ठों के बाद जैसे उन्हे विषयागत कृति का ध्यान आता है और आनन फानन में एक डेढ़ पृष्ठों में इस उपन्यास का परिचय दे देते हैं। ‘लजवन्ती’ में तो गजब ही कर दिया है। प्रकाशक दीप चंद सांखला को संबोधित करते हुए पूरी भूमिका में वह स्टीफन हाकिन्स और उनकी पुस्तक ‘ ए ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ की बातें करते हैं। प्रकाशन व्यवसाय होने वाली परेशानियों की चर्चा करते हैं और अंत में ’ पुनश्च’ लिख कर थोड़े ही शब्दों में पुस्तक की अन्तर्वस्तु को व्यक्त कर देते हैं। ‘रूंख’ की भूमिका अत्यंत विविधतापूर्ण हैं। उसमें कार्ल मार्क्स का भी उल्लेख है। विजयदान देथा की गिनती मार्क्सवादियों में नहीं होती परन्तु ‘ रूंख’ की भूमिका में मार्क्सवाद के प्रति आशापूर्ण दृष्टि उजागर होती है। कुछ भूमिकायें इन से हट कर भी हैं जैसे ’ चौधराइन की चतुराई’ की भूमिका जिसमें वह पुस्तक में शामिल कहानियों की रचना प्रक्रिया की चर्चा करते हैं। उनकी ‘ त्रिवेणी’ किताब की भूमिका प्रभाकर श्रोत्रिय ने लिखी है। 
 

 
 
 
उनकी सब कृतियों में ’रूंख‘ सबसे अलग है। पूरे भारतीय साहित्य में ऐसी कोई दूसरी कृति न होगी। उनकी शोधपरक और अन्वेषी दृष्टि के कारण ही यह पुस्तक तैयार हो पायी होगी। ऐसी दृष्टि वाला व्यक्ति एक अभियान से ही संतुष्ट नहीं रह पाता। वह एक अभियान पूरा होते ही दूसरे अभियान के लिए बेचैन हो जाता है। बिज्जी का जब लोक कथाओं के संग्रहण और संरक्षण का काम पूरा हो गया तो वह एक ख़ास तरह की पत्रिका के प्रकाशन की तैयारी में लग गए। इसमें उनके व्यापारी मित्र दामोदर थानवी की भी रुचि थी। दोनों ने मिलकर पत्रिका का नाम ‘रूंख‘ तय किया, जिसका राजस्थानी भाषा में अर्थ होता है- वृक्ष। इस पत्रिका में वृक्ष, जीव जन्तु, विज्ञान, संगीत आदि विविध विषयों को शामिल किया जाना था। दामोदर थानवी से आर्थिक सहयोग का आश्वासन मिलते ही बिज्जी काम पर लग गए। बिज्जी के साथ और लोग भी इस काम में लगे थे जिनमें उनके दो पुत्र कैलाश कबीर और महेन्द्र देथा भी थे। जब विपुल सामग्री एकत्रित हो गयी तो पत्रिका के स्थान पर ‘रूंख’ नाम से ही सात सौ पृष्ठों की सम्यक रचनावली प्रकाशित हुई। इसमें विजयदान देथा की भूमिका परिवेशक की है। जिसमें उनकी रचनाएं कम और अन्य साहित्यकारों जैसे रवीन्द्र नाथ टैगोर, टालस्टाय आदि की अनूदित रचनाएं अधिक हैं। इस वृहत ग्रन्थ पर ‘प्रथम संभार’ लिख कर पाठकों के अंदर अगले संभार की उम्मीद तो जगा दी थी पर अगला संभार फिर कभी नहीं निकल पाया। क्योंकि अनुवादकों की ऐसी टीम को बार बार जुटा पाना आसान नहीं होता। पहले संभार के प्रकाशन में मारवाड़ी व्यापारी दमोदर थानवी का सहयोग मिला था। बार बार आर्थिक सहयोग भी मिलना मुश्किल होता है। फिर भी यह अकेला ग्रन्थ ही भारतीय साहित्य में अलग स्थान रखता है। इसमें पहली बार हिंदी के पाठकों को जगदीश चंद्र बसु क विविध वैज्ञानिक लेख को पढ़ने का अवसर मिला था। इस ग्रन्थ में जगदीश चंद्र बसु और रवीन्द्र नाथ टैगोर के बीच हुए पत्र व्यवहार को भी संकलित किया गया है। इसमें बिज्जी की दो ही कहानियां हैं - प्रिय मृणाल और अदीठ। जो क्रमशः रवीन्द्र नाथ टैगोर और टालस्टाय की रचनाओं से प्रेरित होकर लिखी गयीं हैं और ‘गुरु दक्षिणा’ के रूप में इन्हीं साहित्यकारों को समर्पित हैं। इस किताब में बिज्जी के कुछ आलोचनात्मक लेख, पत्र, उनकी रचनाओं पर पाठकों के पत्र और समीक्षाएं आदि समावेशित हैं। पुस्तक देख कर प्रमाणित होता है कि बिज्जी ने ‘रूंख’ नाम से मरुभूमि में साहित्य का वट वृक्ष उगाने की पूरी कोशिश की थी।
 

 
 
विजयदान देथा ने मूल रूप से हिंदी में भी साहित्य सृजन किया है। ’ सपनप्रिया’ संग्रह की कहानियाँ मूल रूप से हिंदी में ही लिखी गयाीं हैं। लोक में व्याप्त सात प्रेमाख्यान ‘ अनदेखा अन्तस्’, ‘ भरम’, ‘ हिम समाधि’, ‘मरवण’, ‘ दासी की दास्तान’, ‘ संजोग’ तथा ‘ उपाय’ को उन्होने हिंदी लिखा है। ’रूंख’ में उनकी सारी रचनाएं हिंदी साहित्य की मौलिक रचनाएं हैं। उनका एक मात्र उपन्यास ‘ महामिलन’ भी हिंदी में ही लिखा गया है। यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि जो कहानियां उन्होने राजस्थानी में लिखीं और जो कैलाश कबीर द्वारा हिंदी में अनूदित होकर हम तक पहुँची, उनमें जो कथारस का आनंद है, वह हिंदी की मौलिक रचनाओं में नहीं हैं। परन्तु मेरा यह भी दावा है कि जिन पाठकों ने उनकी राजस्थनी लोक कथाओं को नहीं पढ़ा है, उन्हें बिज्जी की मूल रूप से हिंदी में लिखी कथाओं को पढ़ने में न कोई परेशानी होगी न कोई शिकायत होगी।
यह पूछने पर कि वर्तमान में हिंदी के कौन से रचनाकार उन्हें पसंद है, उन्होंने बताया कि हिंदी कहानियांँ तो वह पढ़ते ही रहते हैं, पर चूंकि उनकी सोचने समझने की शक्ति क्षीण हो चुकी थी, इसलिए कुछ भी बता पाना मुश्किल था, फिर भी उदय प्रकाश का नाम तो याद था ही। फिर बिज्जी के चेहरे पर चमक आयी और बोले कि साहित्य अकादमी वाले उन पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाना चाहते थे। कई नाम उन्होंने प्रस्तावित किया था पर उनमें से उन्हें कोई जँचा नहीं, पर जब उदय प्रकाश का नाम आया तो उन्होने सहर्ष स्वीकृति प्रदान कर दी, क्योंकि उदय प्रकाश से उनका पहले से ही संवाद था। उदय प्रकाश उनके घर जा चुके थे और उनके साहित्य को समग्रता में पढ़ा भी था। उदय प्रकाश के निर्देशन में बनी डॉक्यूूमेंट्री फ़िल्म से वह काफी संतुष्ट थे।
विजयदान देथा ने केवल लोक कथाओं का ही संचयन नहीं किया है बल्कि लोकगीतों को भी एकत्र करके संरक्षित किया है। लोकगीतों के संचयन का विचार तब आया जब वह कोमल कोठारी के साथ मिल कर राजस्थानी लोक साहित्य की पत्रिका ‘प्रेरणा’ का संपादन करते थे। दोनों ने ‘ प्रेरणा’ के हर अंक में एक राजस्थानी लोकगीत प्रकाशित करने का निर्णय लिया। उनमें से भी केवल उन्हीं लोकगीतों को प्रकाशित करने का निश्चय किया जो तब तक अप्रकाशित और अलिखित थे। यह लोक कथाओं के संचयन से अधिक कठिन कार्य था। यह 1952-53 की बात थी। उन दिनों टेप रिकार्डर आदि का निजी उपयोग कम होता था। इनका उपयोग केवल सरकारी उपक्रमों जैसे आकाशवाणी आदि में होता था। लोकगीतों के संकलन के लिए सबसे ज़रूरी शर्तें थीं, राजस्थानी में लिखने की काबिलियत और सुनाने वाले को विश्वास में लेकर उसकी स्मृतियों को कुरेदवाने का हुनर। लोकगीत अभिलेखित करने वाले को उन स्थितियों और माहौल से वाक़िफ़ होना चाहिए जब उन लोकगीतों को गाया जाता था। बिज्जी ने बताया कि उन्होंने लोकगीतों को पुनः सृजित न करके ज्यों का त्यों अभिलेखित किया था जो ‘गीतों की फुलवारी’ में संकलित है। इस तरह से बिज्जी ने पूरे के पूरे लोक जीवन को संरक्षित किया।
लोक जीवन को समर्पित विजयदान देथा के संपूर्ण व्यक्तित्व में ‘लोक मानुष’ झलकता था। सफेद धोती-कुर्ता और गांधी टोपी उनका पहनावा था। जब रहन-सहन, सोच-विचार आदि सबमें लोक झलकता था तो अतिथि सत्कार की राजस्थानी परंपरा का निर्वाह तो करना ही था। उनकी मेहमानवाजी का बहुतों ने लुत्फ़ उठाया। इसका मुख्य कारण तो यह था कि बिज्जी बोरुन्दा छोड़ कर बहुत कम बाहर जाते थे। पर उनकी कहानियों पर उनका कोई लगाम न था। ये कहानियां गाँव, शहर, राज्य आदि सभी की हदें तोड़ती जा रहीं थीं। बहुत से नाटककार, फ़िल्मकार, धारावाहिक निर्माता- निर्देशक आदि उनकी कहानियों के इस्तेमाल हेतु उनसे मिलने को बेताब रहते थे। वे बोरुन्दा आते थे तो बिज्जी के घर में ही कुछ दिन रुकते थे। जब हबीब तनवीर ‘चरणदास चोर’ का मंचन कर रहे थे तो एक बार पूरा नाट्य दल लेकर बोरुन्दा आए थे। यह नाट्य दल कई दिनों तक बोरुन्दा में टिक कर नाटक का रिहर्सल करता रहा। बोरुन्दा के लोगों ने भरपूर आत्मीयता से पूरे नाटक दल की खातिरदारी की। मुझे कहने में कोई संकोच नहीं कि उनकी इस आतिथ्य सत्कार का मैं भी साक्षी रहा हूँ। वह शराब नहीं पीते थे लेकिन मेहमानों के लिए उम्दा किस्म की शराब की एक बोतल अवश्य उनकी अल्मारी में रहती थी। उन्होंने अपने पुत्र कैलाश कबीर से कहा कि अगर मैं पीना चाहूँ तो वह (कैलाश कबीर) मेंरा साथ दे दें। मेहमाननवाजी की ऐसी मिसाल शायद ही कहीं मिले। वैसे बिज्जी का संपूर्ण व्यक्तिव और कृतित्व ऐसा था कि इसकी दूसरी मिसाल शायद ही दुनिया में हो। वर्ष 2011 में साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कर के संभावितों की अंतिम सूची में उनका नाम था। रवीन्द्र नाथ टैगोर के बाद पहली बार कोई भारतीय साहित्यकार नोबेल पुरस्कार के इतने करीब पहुँचा था। यद्यपि कि नोबेल पुरस्कार स्वीडिश साहित्यकार टामस ट्रांसट्रोमर को मिला लेकिन इससे विजयदान देथा कि महत्ता कम नहीं हो गयी। लोक कथाओं के अद्भुत किस्सागो के रूप में दुनिया उन्हें सदैव याद रखेगी।

 

 

                            

 

Sunday, August 23, 2026

 

क्या पत्रकारिता में विचारधारा ’ 

महत्वपूर्ण है

पत्रकारिता में निष्पक्षता के भ्रम की चीरफाड़ करता विचारोत्तेजक व्याख्यान


वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार भारत भूषण (बेंजवाल) 'कैच न्यूज' के संपादक, 'मेल टुडे' के संस्थापक संपादक, 'हिंदुस्तान टाइम्स' के कार्यकारी संपादक (एग्जीक्यूटिव एडिटर) और दिल्ली में 'द टेलीग्राफ' के संपादक रहे हैं। वह 'एक्सप्रेस-न्यूज सर्विस' के संपादक, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के वाशिंगटन संवाददाता (कॉरस्पॉन्डेंट) और 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में सहायक संपादक (असिस्टेंट एडिटर) भी रहे हैं। वह अभी एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी और वैश्विक समाचार-एजेंसी मॉडल पर आधारित पत्रकारिता मंच '360 इनफो' के एसोसिएट एडिटर (सह-संपादक) और साउथ एशिया एडिटर (दक्षिण एशिया संपादक) हैं। प्रस्तुत है चतुर्थ पं. भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में उनका व्याख्यान।

भारत में पत्रकारिता का जन्म ही विचारधारा के साथ हुआ था। जहाँ अंग्रेज़ी भाषा के समाचार पत्र औपनिवेशिक हितों और अपने यूरोपीय पाठकों की सेवा करते थे, वहीं भाषायी प्रेस ने भारतीयों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम किया। तब पत्रकारिता में तटस्थता का कोई ढोंग नहीं था। शुरुआती राष्ट्रवादी प्रेस किसी तटस्थ जनता को केवल सूचना देने की कोशिश नहीं रही थी बल्कि वे एक राष्ट्रवादी जनता का निर्माण के लिए प्रयासरत थे, एक अखिल भारतीय, उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना को आकार दे रहे थे। यह पत्रकारिता राष्ट्र-निर्माण का एक अभ्यास थी और खुलकर वैचारिक थी।

उपनिवेशवाद-विरोधी समाचार पत्र न केवल दुनिया की रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे थे बल्कि उसे बदलने की कोशिश कर रहे थे। बाल गंगाधर तिलक के 'केसरी' ने अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक विरोध को बढ़ावा दिया और हिंदू पुनरुत्थानवाद को आगे बढ़ाया; गांधी के 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' ने सविनय अवज्ञा को बढ़ावा दिया और पत्रकारिता को नैतिक सुधार के साधन के रूप में देखा; मौलाना आज़ाद के 'अल-हिलाल' ने पैन-इस्लामिज्म (इस्लामवाद) में रची-बसी उपनिवेशवाद-विरोधी भावना को बढ़ावा दिया। हर अखबार एक अलग और प्रतिस्पर्धी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था। किसी ने भी तटस्थ होने का दावा नहीं किया। वे सभी वैचारिक थे और उन्हें इस पर गर्व था।

पंडित भैरव दत्त धूलिया का 'कर्मभूमि' उसी परंपरा का हिस्सा था। भक्तदर्शन जी के साथ मिलकर, धूलिया जी ने गढ़वाल के अपने पाठकों के बीच एक राष्ट्रवादी जनता को आकार देने के लिए लगातार लिखा, वे कंपनी के निदेशक के उस दबाव के खिलाफ भी डटे रहे जिसने उन्हें ब्रिटिश अधिकारी को नाराज करने वाले अनाम संपादकीय छापने पर इस्तीफा देने की धमकी दी थी।

आज के भारत में पत्रकारिता और विचारधारा पर बात से पहले, एक बुनियादी सवाल है। जब हम पत्रकारिता में विचारधारा की बात करते हैं, तो हमारा क्या मतलब होता है?

मार्क्स ने विचारधारा को "प्रभुत्वशाली विचारधारा" के रूप में परिभाषित किया यानी शासक वर्ग के विचार जो व्यापक रूप से समाज की सामान्य समझ के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं, जिससे उत्पीड़ित समूह उन मूल्यों पर विश्वास करने लगते हैं जो वास्तव में उनके उत्पीड़कों के हितों का समर्थन करते हैं। उन्होंने इसे "मिथ्या चेतना" कहा।

एंतोनियो ग्राम्शी ने इसका विस्तार किया कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों को स्कूलों, मीडिया और चर्च के माध्यम से तब तक फैलाया जाता है जब तक कि वे तटस्थ न लगने लगें। इसे  उन्होंने "सांस्कृतिक वर्चस्व"  कहा।

अल्थूजर ने स्पष्ट किया कि क्यों सामाजिक संस्थाओं परिवार, शिक्षा, मीडिया के माध्यम से विचारधारा को व्यवस्थित रूप से पुनरुत्पादित किया जाता है, जिन्हें उन्होंने "वैचारिक राज्य उपकरण" कहा। कार्ल मैनहेम विचारधारा को पूरी तरह से नकारात्मक रूप में देखने से पीछे हटे और उन्होंने उन विचारधाराओं के बीच अंतर किया जो यथास्थिति को बनाए रखती हैं और जो दुनिया को बदलना चाहती हैं।

देखिए, ये सभी परिभाषाएँ पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए कैसे प्रासंगिक हो जाती हैं।

विचारधारा पत्रकारिता में कई स्तरों पर काम करती है। संरचनात्मक, संस्थागत, व्यावसायिक, संज्ञानात्मक और भाषायी, जो सभी आपस में जुड़े हुए हैं। समाचार संगठन का स्वामित्व यह तय करता है कि क्या प्रकाशित होने योग्य है और क्या नहीं। मालिक ऐसे संपादकों को रखते हैं जो उनके विश्वदृष्टिकोण को साझा करते हैं; संपादक ऐसे पत्रकारों को रखते हैं जो उस सांचे में फिट बैठते हैं। समय के साथ, संगठन एक ऐसी संस्कृति विकसित कर लेता है जो उसमें काम करने वाले हर व्यक्ति को स्वाभाविक लगती है, क्योंकि असहमत होने वालों को बाहर कर दिया जाता है। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के बारे में यह कहावत है कि उसने बहादुर शाह जफर को छोड़कर दिल्ली के सभी शासनों का समर्थन किया। वहां काम कर चुके हम सभी को यह सच्चाई पता है।

फंडिंग भी पत्रकारिता को वैचारिक रूप से आकार देती है। यदि किसी समाचार पत्र के विज्ञापन राजस्व का 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से आता है, तो उसके पत्रकार अनजाने में उन खबरों से बचते हैं जिनसे वह राजस्व छिन सकता है। किसी भी संपादक को यह कहते हुए मेमो जारी करने की जरूरत नहीं होती कि "सरकार के विरुद्ध पड़ताल मत करो।" पत्रकार संगठनात्मक संस्कृति को देखकर और उसे अपनाकर सीखते हैं। 'बीट' (कार्यक्षेत्र) की संरचना इसे और मजबूत करती है: जिस क्षण आपके पास एक "बिजनेस बीट" होती है और कोई "लेबर बीट" (मजदूर बीट) नहीं होती, यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्थव्यवस्था को पूंजी के दृष्टिकोण से समझा जाना है।

विचारधारा न्यूज़रूम संस्कृति के माध्यम से भी काम करती है। संपादकीय प्रक्रिया के हर चरण में 'गेटकीपिंग' (खबरों की छंटनी) होती है।  संवाददाताओं से लेकर उप-संपादकों और संपादक तक लगातार यह निर्णय लिया जाता है कि कौन सी चीज़ खबर बनने के योग्य है। हर गेटकीपर का मानना होता है कि वह व्यावसायिक रूप से तटस्थ है, लेकिन वे वैचारिक धारणाओं से पूरी तरह सराबोर होते हैं। "हमें और अधिक संतुलन की आवश्यकता है" का अर्थ अक्सर यह होता है कि "हमें इस असहज करने वाले निष्कर्ष का मुकाबला करने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से एक आवाज़ की आवश्यकता है।" स्रोतों का पदानुक्रम इसे और जटिल बना देता है: सत्ता के स्रोतों, कॉर्पोरेट हस्तियों और विशिष्ट संस्थानों के विशेषज्ञों को विस्थापन का दावा करने वाले आदिवासियों, शोषण का दावा करने वाले श्रमिकों या भेदभाव का दावा करने वाले अल्पसंख्यकों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

व्यावसायिक मानदंड भी विचारधारा के रूप में कार्य करते हैं। निष्पक्षता को अक्सर तटस्थ मानकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है लेकिन वास्तव में ये वैचारिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं।

जब दोनों पक्ष समान न हों, तो "संतुलन" व्यवस्थित रूप से वास्तविकता को विकृत कर देता है। जब मैंने 1997 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लिए थाईलैंड में नागा विद्रोही नेता थुइन्गालेंग मुइवा का साक्षात्कार लिया, तो मुझे भारत सरकार के मुख्य नागा वार्ताकार का फोन आया, जिन्होंने पूछा कि मैंने सरकार का दृष्टिकोण क्यों शामिल नहीं किया। मैंने उनसे कहा: "50 से अधिक वर्षों से समाचार पत्रों में केवल भारत सरकार का दृष्टिकोण ही दिखाई दिया है। क्या नागाओं को तुरंत उनका खंडन किए बिना अपना दृष्टिकोण रखने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?" जलवायु वैज्ञानिकों और जलवायु परिवर्तन को नकारने वालों को समान स्थान देने से संतुलन पैदा नहीं होता  बल्कि यह यह संकेत देता है कि एक वैज्ञानिक रूप से सुलझा हुआ प्रश्न अब भी खुला है। कभी-कभी आपको दो विरोधाभासी स्रोतों को उद्धृत करने के बजाय खुद खिड़की से बाहर देखने की ज़रूरत होती है।

कोई घटना बयान आदि समाचार है या नहीं यह न्यूजवर्दीनेस भी उतनी ही वैचारिक है। संभ्रांत वर्ग के कार्यों को आम लोगों के कार्यों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक समाचार-योग्य माना जाता है। गरीबी की धीमी हिंसा, भूख, बीमारी, विस्थापन शायद ही कभी खबर बनती है क्योंकि इसमें नाटक और नयापन नहीं होता। जब मैं 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में था, तो मालिक कहा करते थे: "यमुना पुश्ता की झुग्गियों में लगी आग में किसी की दिलचस्पी नहीं है। वे हमारे पाठक नहीं हैं।" जब मैंने 'मेल टुडे' शुरू किया, तो मुझे पाठक की कल्पना एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने के लिए कहा गया जो तीस के दशक के मध्य में है, जिसकी जीवनसाथी कामकाजी है, जिसके दो बच्चे हैं, एक कुत्ता है, और घर तथा कार पर ईएमआई है। समाचार-योग्यता उस कल्पित पाठक के मूल्यों और इसलिए उसकी विचारधारा  को संहिताबद्ध करती है।

विचारधारा संज्ञानात्मक  स्तर पर भी काम करती है। 'फ्रेमिंग' (खबर को एक खास नजरिए से पेश करना) वह जगह है जहाँ विचारधारा पत्रकारों के ध्यान में आए बिना ही खबर में प्रवेश कर जाती है। उन्हीं तथ्यों को आर्थिक विकास, असमानता, राष्ट्रीय सुरक्षा या मानवाधिकारों की कहानी के रूप में पेश किया जा सकता है। विचार करें कि मीडिया 'ग्रेट निकोबार द्वीप' पर प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को कैसे फ्रेम करता है, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप सरकार का दृष्टिकोण अपनाते हैं, कॉर्पोरेट का दृष्टिकोण, पर्यावरण का दृष्टिकोण, या अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे लगभग 200 शोम्पेन आदिवासियों का दृष्टिकोण अपनाते हैं।

पुष्टि पूर्वाग्रह तब काम करता है जब पत्रकार एक मजबूत धारणा के साथ जांच शुरू करते हैं: इसका समर्थन करने वाले साक्ष्य विश्वसनीय लगते हैं; विरोधाभासी साक्ष्य किसी एजेंडे से प्रेरित लगते हैं। सामान्यीकरण रोज़मर्रा की परिचितता के माध्यम से मौजूदा सत्ता संरचनाओं को अदृश्य बना देता है यही आंशिक कारण है कि अधिकांश पत्रकार तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की टीवीके पार्टी के उदय की भविष्यवाणी नहीं कर सके। लोग वह नहीं देखते जिसे देखने के लिए उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया गया है।

विचारधारा भाषा में भी काम करती है। लेबलिंग (नाम देना) विवरण में ही विचारधारा को समाहित कर देती है। "आतंकवादी" बनाम "उग्रवादी" बनाम "स्वतंत्रता सेनानी" वैधता और उद्देश्य के बारे में एक राजनीतिक निर्णय का प्रतिनिधित्व करता है। किसी को "शहरी नक्सल" या "देशद्रोही" कहना, गो-रक्षण से जुड़ी हिंसा को "मॉब-लिंचिंग" बनाम "सांप्रदायिक घटना" के रूप में वर्णित करना, आरक्षण को "योग्यता बनाम कोटा" के रूप में फ्रेम करना ये बेहद वैचारिक भाषाई विकल्प हैं। कर्मवाच्य सक्रिय कर्ता को गायब कर देता है: "पांच प्रदर्शनकारी मारे गए" हमें यह नहीं बताता कि उन्हें किसने मारा। "हिंसा भड़क उठी" संगठित कार्रवाई के बजाय स्वतःस्फूर्त स्वतः-प्रज्वलन का सुझाव देती है।

रूपक समाचार रिपोर्ट के तर्कों के भीतर ही समझ को आकार देते हैं। बांग्लादेश से आने वाले प्रवासियों को "लहर" या "बाढ़" के रूप में वर्णित करना आपदा की छवियों को सक्रिय करता है। कॉर्पोरेट ऋणों को बट्टे खाते में डालने को "प्रोत्साहन" कहना उन्हें सकारात्मक रूप में फ्रेम करता है, जबकि गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी को "मुफ्त की रेवड़ियां" कहना यह दर्शाता है कि वे इसके हकदार नहीं हैं। रूपक अपने भीतर इस बात की विचारधारा समेटे होते हैं कि राजनीतिक रूप से क्या सोचना संभव है।

ऐसे दौर भी आए हैं जब पत्रकारिता में विचारधारा घातक हो गई है। विभाजन के आस-पास के वर्षों ने दिखाया कि क्या होता है जब हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों का सांप्रदायिक प्रेस अपने-अपने समुदायों को भड़काने की भूमिका निभाता है ऐसी पत्रकारिता जिसने सक्रिय रूप से नरसंहार की परिस्थितियाँ तैयार कीं।

यदि नेहरूवादी युग ने यह धारणा बनाई कि भारत के नए-नवेले प्रेस में मजबूत उदारवादी विचार रचे-बसे थे, तो इंदिरा गांधी ने हमें उस विश्वास से मुक्त कर दिया। आपातकाल  ने सेंसरशिप, संपादकों की गिरफ्तारी और समाचार पत्रों को बंद होते देखा। मुख्यधारा के अधिकांश प्रेस ने बिना किसी विरोध के आत्मसमर्पण कर दिया, सरकारी प्रचार चलाया और असुविधाजनक सच्चाइयों को दफन कर दिया। आपातकाल ने यह उजागर कर दिया कि भारतीय प्रेस हमेशा से सत्ता-परस्त था। जब सत्ता उदार थी, तो प्रेस उदार था; जब वह अधिनायकवादी हो गई, तो प्रेस ने बड़े पैमाने पर उसी का अनुसरण किया।

उदारीकरण के बाद के दौर ने भारतीय पत्रकारिता को इस कदर बदल दिया कि उसे पहचानना मुश्किल हो गया। टीवी चैनलों की बाढ़, 24 घंटे की खबरों और अंततः डिजिटल मीडिया ने एक जटिल वैचारिक परिदृश्य तैयार किया। हमारे पास किराए के लिए विचारधारा थी: 1990 और 2000 के दशक में 'पेड न्यूज' (पैसे लेकर खबर छापना)  यह तिलक, गांधी या भैरव दत्त धूलिया की सैद्धांतिक पक्षधरता नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता को उसके हाथों बेच दिया गया जो भुगतान कर सकता था। 2000 के दशक में हिंदी टीवी समाचारों के विस्फोट ने लोकलुभावन, राष्ट्रवादी और अक्सर सांप्रदायिक रंग से रंगी विचारधारा को लाखों भारतीय ड्राइंग रूम्स में पहुँचा दिया, जहाँ दर्शकों की संख्या (टीआरपी) बढ़ाने के लिए गो-रक्षण, लव जिहाद और पाकिस्तान-विरोधी भावनाएँ रोज़मर्रा की खुराक बन गईं। बाजार और विचारधारा ने एक-दूसरे को मजबूत किया।

हालाँकि, 2014 के बाद से जो उभरा है वह गुणात्मक रूप से बिल्कुल अलग है। पिछले युग में, स्वतंत्रता आंदोलन सहित, पत्रकारिता वैचारिक थी लेकिन वैचारिक युद्धक्षेत्र बहुलवादी था। तिलक और गोखले ने अपने अखबारों के जरिए एक-दूसरे से लड़ाई लड़ी; समाजवादी प्रेस ने कांग्रेस प्रेस से मुकाबला किया। आज कुछ अनोखा हुआ है चार कारकों के संयोजन ने एक ऐसे वैचारिक मीडिया तंत्र का निर्माण किया है जो भारतीय लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ही नया आकार दे रहा है। मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण हो रहा है है वह सत्ताधारी दल के साथ संरेखित हो रहा है। '

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने इसे "मोदी की भाजपा और मीडिया पर हावी बड़े घरानों के बीच एक दुःरभिसंधि " के रूप में व्याख्यायित किया है। मुकेश अंबानी के पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट हैं जो कम से कम 80 करोड़ भारतीयों तक पहुँचते हैं। गौतम अडानी द्वारा एनडीटीवी, क्विंट ब्लूमबर्ग और इंडो-एशियन न्यूज सर्विस का अधिग्रहण मुख्यधारा के मीडिया में बहुलवाद के अंत का संकेत देता है। इसका वैचारिक प्रभाव मुख्य रूप से स्पष्ट संपादकीय आदेशों का नहीं, यह संरचनात्मक है। स्वामित्व, समय के साथ संपादकीय संस्कृति को आकार देता है; किसी को फोन करने की जरूरत नहीं पड़ती। यही पैटर्न क्षेत्रीय मीडिया में भी फैला हुआ है, जहाँ राजनीतिक संबंध अक्सर और अधिक नग्न रूप में दिखाई देते हैं।  ओडिशा में, पांडा परिवार की मीडिया हिस्सेदारी भाजपा के एक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से जुड़ी हुई है; असम में, एक प्रमुख टीवी चैनल का स्वामित्व भाजपा के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास है।

अब सरकारी विज्ञापन का उपयोग वित्तीय हथियार के रूप में होने लगा है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों के विज्ञापन राजस्व का लगभग 45 फीसद हिस्सा सरकार से आता है। अकेले केंद्र सरकार विज्ञापनों पर रोजाना लगभग 1.95 करोड़ रुपये खर्च करती थी। भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में अलग से देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता भी है। वैचारिक नियंत्रण का तंत्र सीधा है अनुकूल कवरेज को विज्ञापन अनुबंधों से पुरस्कृत किया जाता है; आलोचनात्मक कवरेज विज्ञापनों की वापसी को ट्रिगर करती है। यह विशेष रूप से दमनकारी है क्योंकि यह सेंसरशिप का कोई लिखित दस्तावेज़ या सबूत नहीं छोड़ता। मीडिया मालिक और पत्रकार खुद ही सेंसरशिप लागू कर लेते हैं क्योंकि वे स्वतंत्रता के परिणामों को जानते हैं।

आलोचनात्मक रुख रखने वाले पत्रकारों का कानूनी उत्पीड़न भी शुरु हो गया है। आतंकवाद-विरोधी कानूनों, राजद्रोह और आपराधिक मानहानि को मीडिया दमन के हथियारों के रूप में नया रूप दिया गया है। पत्रकारों को तबाह करने के लिए उन्हें दोषी ठहराने की आवश्यकता नहीं है। गिरफ्तारी, हिरासत और फिर से गिरफ्तारी की लगातार बनी रहने वाली धमकी ही उन्हें व्यावसायिक रूप से बर्बाद करने के लिए काफी है। 2014 के बाद से, सरकार ने कम से कम 15 पत्रकारों पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए हैं और 36 अन्य को जेल भेजा है; यह कानून बिना किसी मुकदमे के 180 दिनों तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है। 2019 में भाजपा ने यूएपीए में संशोधन किया ताकि अधिकारियों को अदालत में कोई अपराध साबित होने से पहले ही किसी व्यक्ति को "आतंकवादी" घोषित करने की अनुमति मिल सके। अप्रैल के अंत से मई 2025 की शुरुआत तक, 'ऑपरेशन सिंदूर' के आसपास, देश भर में कम से कम 125 मीडियाकर्मियों और कंटेंट क्रिएटर्स को "देशद्रोही" या "पाकिस्तान-समर्थक" माने जाने के कारण हिरासत में लिया गया। अकेले असम में 94 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं। इस खौफनाक माहौल में, आत्म-सेंसिरशिप इस दमन का, सह-उत्पाद नहीं है बल्कि यह इसका मुख्य उत्पाद है।

हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा और अल्पसंख्यक-विरोधी बयानों को व्यक्त करने और फैलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का लाभ उठाया गया है, और इन प्लेटफॉर्मों के एल्गोरिदम ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हैं। भाजपा ने व्हाट्सएप के उपयोग को व्यवस्थित किया है, जिसका बंद ढांचा सार्वजनिक एल्गोरिदमिक जांच से बाहर काम करता है, जिससे विश्वसनीय सामाजिक नेटवर्क पारिवारिक समूह, धार्मिक संघ, पड़ोस के समूह के माध्यम से भड़काऊ सामग्री का प्रसार संभव होता है, जो दुष्प्रचार को एक झूठी विश्वसनीयता प्रदान करता है।

ये चार कारक एक-दूसरे को बल देते हैं। कॉर्पोरेट स्वामित्व वाला मीडिया घटनाओं को इस तरह से फ्रेम करता है जो हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के अनुकूल हो, जिससे काल्पनिक शिकायतें भी आम समझ जैसी लगने लगती हैं। राज्य के विज्ञापन ऐसी फ्रेमिंग को वित्तीय रूप से पुरस्कृत करते हैं। कानूनी उत्पीड़न वैकल्पिक विमर्श प्रदान करने वालों को खत्म कर देता है या डरा देता है। एल्गोरिदमिक प्रवर्धन सोशल मीडिया को सबसे चरम भावनात्मक सामग्री से भर देता है, जिससे अन्य विकल्प बाहर हो जाते हैं। भारत के पास पत्रकारिता की पश्चिमी तटस्थता की कल्पना का विलास कभी नहीं था। दांव हमेशा ऊंचे थे उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन, सांप्रदायिक सह-अस्तित्व, जातिगत न्याय, क्षेत्रीय पहचान और लोकतांत्रिक जवाबदेही ने हमेशा भारतीय पत्रकारिता को आकार दिया है। भारत में पत्रकारिता ने हमेशा किसी न किसी चीज़ के लिए लड़ाई लड़ी है। सवाल यह है कि: किसके लिए लड़ रहे हैं, किसके खिलाफ लड़ रहे हैं और क्या यह लड़ाई ईमानदारी से लड़ी जा रही है।

ऐसे में पत्रकारों को क्या करना चाहिए? पत्रकार विचारधारा से छुटकारा नहीं पा सकते। हालाँकि, वे इसे प्रबंधित कर सकते हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि व्यक्तिगत विश्वास कभी भी किसी पत्रकार को ऐसे तथ्य की रिपोर्ट करने से न रोकें जो उनके विश्वदृष्टिकोण के विपरीत हो। चूंकि पारंपरिक निष्पक्षता का अस्तित्व नहीं है, इसलिए एकमात्र समाधान पारदर्शिता है। इसके लिए पहले  अपने पूर्वाग्रह को स्वीकार करें: कोई राय न होने का ढोंग करने के बजाय, अपने विश्लेषण के ढांचे को लेकर खुले रहें ताकि पाठकों को पता चले कि आप किस दृष्टिकोण से बात कर रहे हैं। दूसरा, अपने स्रोतों, दस्तावेजों और डेटा को साझा करें; डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों और वैचारिक लेखों में उनके संदर्भों को शामिल कर सकते हैं। इसका अर्थ तटस्थता के बजाय सटीकता को प्राथमिकता देना भी है। तथ्य 50 प्रतिशत गलत और 50 फीसद सही नहीं होते। "दोनों पक्षों" को दिखाने के झूठे संतुलन से बचें आप एक तथ्यात्मक सत्य और एक सिद्ध झूठ को समान वजन नहीं दे सकते। यदि एक स्रोत कहता है कि बारिश हो रही है और दूसरा कहता है कि मौसम सूखा है, तो खिड़की से बाहर देखें।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों को उस चीज़ का पालन करना चाहिए जिसे "व्यावसायिक विचारधारा" या लोकतांत्रिक कर्तव्य कहा जा सकता है: एक प्रहरी की भूमिका निभाना और राजनीतिक दल की परवाह किए बिना शक्तिशाली लोगों को जवाबदेह ठहराना; कॉर्पोरेट या सरकारी हितों पर जनसेवा को प्राथमिकता देना; वित्तीय या सामाजिक संबंधों से बचना जो हितों का टकराव पैदा करते हैं; समाचार को विश्लेषण से अलग करना और उसी के अनुसार उन्हें चिह्नित करना; और समाचार रिपोर्टों में तटस्थ, वर्णनात्मक भाषा का उपयोग करना जबकि मजबूत बयानबाजी को वैचारिक लेखों के लिए सुरक्षित रखना।

उत्तराखंड के पत्रकारों के लिए कुछ विशिष्ट प्रश्न हैं। क्या आप स्थानीय मुद्दों को फ्रेम करते समय 'देवभूमि बनाम बाहरी' के आख्यान पर सवाल उठाते हैं? जब मीडिया ने पुरोला मामले को "लव जिहाद" का लेबल दिया, तो कौन से वैचारिक मुद्दे शामिल थे, भले ही अपहरण का मामला बाद में अदालत में खारिज हो गया? क्या आपने यूसीसी (को समानता की दिशा में एक कदम के रूप में रिपोर्ट किया या राजनीतिक ध्रुवीकरण के एक उपकरण के रूप में? क्या आपने हल्द्वानी में हुए ध्वस्तीकरण को अवैध अतिक्रमणों की आवश्यक "सफाई" के रूप में रिपोर्ट किया या अल्पसंख्यक आजीविका पर एक असंगत हमले के रूप में? क्या इस तथ्य को पर्याप्त रूप से रिपोर्ट किया गया था कि सरकार ने चार धाम सड़क परियोजना को विशेष रूप से अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से बचने के लिए 53 हिस्सों में तोड़ दिया था? इन घटनाओं को जिस भी तरीके से रिपोर्ट किया गया हो, उनके उत्तर आपको बताएंगे कि इसमें कौन सा वैचारिक दृष्टिकोण शामिल था।

इस तरह पत्रकारिता में विचारधारा का समाधान विचारधारा को खत्म करना नहीं है, क्योंकि ऐसा किया ही नहीं जा सकता। इसका समाधान यह जानना है कि सभी पत्रकारों की एक विचारधारा होती है और उसके बारे में पारदर्शी होना। यही पत्रकारिता को दुष्प्रचार से अलग करता है, और यही आत्म-जागरूकता आज सबसे अधिक दबाव में है।

(प्रस्तुतिः अरविंद शेखर) 

उत्तराखंड की प्रमुख मासिक पत्रिका 'युगवाणी' से साभार