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| मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति |
सामाजिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक हलचलों के साथ
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| मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति |
बेगाना शहर
मशहूर शायर हसरत मोहानी की पंक्तियां अक्सर जेहन में घुमड़ती रहती हैं,
'भुलायी न जा सकेगी कभी
हसरत इसकी तल्खी
वो लखनऊ की शामें वो मुलाकातें।'
और भी
'कशिश ए लखनऊ अरे तौबा!
फिर वही हम,वही अमीनाबाद।'
'यगाना चंगेजी'
इस बार मैने खुद अपने अशआर कहे,लगभग पचास साल पहले के अपनी किशोरावस्था व युवावस्था के दिनों में अजीज रहे शहर लखनऊ के बारे में।
'मैने क्या छोड़ा तुझे लखनऊ
तू इस कदर बेगाना हुआ कि
मुझे अब पहचानता नहीं।'
सचमुच लखनऊ ने इस बार मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। या कि उसकी शक्ल इस कदर बदल गई थी कि मैं ही उसके पुरानी सड़कों, गलियों दरो दीवारों को ढूंढने की असफल कोशिश करता झुंझलाता व खींजता रहा था।
पहले तो बेगानापन वहीं से शुरू हो गया जब ट्रेन के रुट में बदलाव के कारण हमारी ट्रेन चिरपरिचित चारबाग स्टेशन न रुक कर आलमनगर स्टेशन पर रूकी और लखनऊ की सारी सवारियों को वहीं उतरना पड़ा।
आलमनगर से मेरा ज्यादा वास्ता पचास साल पहले भी नहीं रहा,जब मैं लखनऊ में पढ़ता था,किशोर और जवान वहीं हुआ। हां, नाम जरुर सुना था,आलमनगर का। जानकीपुरम, तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र में तब शुरुआती बसाहट निर्मित होने लगी थी। बेरोजगारी के दिनों में तालकटोरा में नौकरी ढूंढने की सलाह मिलने लगी थी।
मेरा वास्ता अपने रिहाइशी इलाके गोमती पार के निशातगंज,महानगर, बादशाह नगर,अलीगंज चांदगंज,निरालानगर,बाबूगंज डालीगंज से अधिक था।
ट्रेन से उतरने के बाद ओटो वाले ने जिस रुट से हमें आधे घंटे में अपने गंतव्य अलीगंज के चर्च रोड की देवलोक कालोनी में पंहुचा दिया उसका शुरुआती हिस्सा स्टेशन के बाद जानकीपुरम मुहल्ले से गुजरता हुआ लंबे फ्लाई ओवर ब्रिज को पार कर एक पतली ऊबड़खाबड़ गली थी,जो घनी मुस्लिम बस्ती प्रतीत हो रही थी, उसका शार्ट कट लेकर ओटो वाले ने हमें मेन रोड पर पंहुचा दिया,जो मेरी परिचित थी,मेडिकल कॉलेज से डालीगंज पुल को जाने वाली सड़क। मुस्लिम बस्ती वाली गली के बारे में पूछने पर आटो वाले ने सिर्फ इतना बताया,ये इमामबाड़े के पीछे वाला इलाका है,आप चिंता मत करो मैं अभी लिए चलता हूं आपको डालीगंज बाबूगंज होते हुए अलीगंज।
बचपन में मैं इमामबाड़ा तो कई बार आया था,साइकिल से दोस्तों के साथ। लेकिन उसके पिछवाड़े की इस गली को नहीं पहचान पा रहा था। शहर अपने मुख्य चेहरे के पीछे कितने और चेहरे छिपाये रखता है,इसका अह्सास आज वरिष्ठ नागरिक हो जाने के बाद वर्षों पहले के अपने रिहाइशी शहर की धमनियों को तलाशने की जिज्ञासा और उत्साहवश हो रहा था।
डालीगंज पुल के बाद तो मैं,साथ बैठी पत्नी को गाइड की तरह बताने लगा, ये देखो पुराना डालीगंज बजार है,इसी रास्ते से हम लोग साइकिल
चलाते हुए जुबली इंटर कालेज में पढ़ने आते थे,महानगर से। कम से कम आठ दस किलोमीटर तो होगा ही सिटी स्टेशन के पास स्थित तब के लखनऊ का प्रसिद्ध राजकीय इंटर कालेज।
पत्नी लखनऊ से ज्यादा परिचित नहीं थी,उसका मायका इलाहाबाद था। वह बड़े गर्व से इलाहाबाद के अपने क्रास्थवेट स्कूल के किस्से सुनाया करती थी। आज मैं उसे साक्षात अपने स्कूल की छवि व वहां के रास्तों की सैर करा रहा था।
मैं उसे बता रहा था ये देखो बायें हाथ में रामाधीन सिंह कालेज है,यहां हमारा हाईस्कूल बोर्ड का सेंटर पड़ा था। इससे आगे आई.टी कालेज का चौराहा है।
वहां से बायें निरालानगर होते हुए चांदगंज रेलवे फाटक को पार कर हम अलीगंज के हनुमान मंदिर होते हुए महानगर के सेक्टर सी में स्थित अपने घर पंहुच जाते थे,सरपट साइकिल चलाते हुए।
लेकिन इस बार आटो वाला हमें आई.टी चौराहे से न लाकर पहले ही बाबूगंज वाली सड़क से बायां टर्न लेकर विवेकानंद हास्पिटल के ऊपर बन गये फ्लाई ओवर से सीधे कपूरथला अलीगंज में ले आया। मैं देखता ही रह गया। मेरा पुराना रूट तो अनदिखा ही रह गया। संभवत: 'वन वे' कर देने से ऐसा हुआ था। फ्लाई ओवर के कारण मेरा पुराना चिरपरिचित चांदगंज का रेलवे फाटक भी नजर नहीं आया,और हम सीधे अलीगंज हनुमान मंदिर होते हुए अलीगंज की संकरी बजार से गुजर कर कुर्सी रोड पर आ गये थे।
मेरा गंतव्य वहीं कहीं था। चर्च रोड पर स्थित देवलोक कालोनी। गूगल लोकेशन डालने से ओटो वाले को सुविधा हो गयी। थोड़ी ही देर में उसने कालोनी के गेट पर पंहुचा दिया था। मैने घड़ी देखी, ठीक छत्तीस मिनट में उसने हमें आलमनगर से कुर्सी रोड पहुंचा दिया था। मैं सोच रहा था अगर ट्रेन हमें सामान्प दिनों की तरह चारबाग मेन स्टेशन भी उतारती तो हुसैनगंज, विधान सभा, सिकन्दर बाग,गोमती ब्रिज,निशातगंज वाले मुख्य मार्ग से इससे ज्यादा वक्त लग जाता।
आलमनगर वाले स्टेशन के डायवर्जन के कारण पैदा हुई दुश्चिंता काफूर हो गयी थी,उल्टा मुझे इमामबाङे के पीछे की गली वाला शार्ट कट भी पता चल गया था।
पैंतालीस पचास साल बाद शहर का हुलिया कितना अधिक बदल जाता है। वे मेरे छात्र जीवन के किशोरावस्था और युवावस्था की दहलीज के दिन थे। सन पचहत्तर में इमरजैन्सी के दिनों में मैं जुबली इंटर कालेज में ग्यारहवीं का छात्र था। बगल में सिटी स्टेशन था,उसके उल्टी तरफ के बजार में लारी खानदान की बड़ी सी कोठी थी। ये लखनऊ का बड़ा राजनीतिक खानदान है,यह बात बहुत बाद में पता चली। तब तो सिर्फ बड़ी सी कोठी और 'लारी' जैसा विशेष टाइटिल देखकर ही हम लड़के आकर्षित होते थे। जुबली कालेज की चढ़ाई पर हम साइकिल से उतरते थे,और 'डयोड़ी आगामीर','ड्योड़ी आगामीर' हमको भी बना दे वजीर' रटते हुए चढ़ाई चढ़ते हुए अपनी थकान भगाते थे।
दरअसल उस सारे इलाके का नाम नवाब के वजीर आगामीर के नाम पर रक्खा हुआ था।
यह तथ्य हमें बहुत बाद में पता चला। हम नासमझ तब डयोड़ी आगामीर शब्द का महत्व नहीं जानते थे और पहले से चले आ रहे मुहावरे को रटते जाते थे।इमरजैंसी के प्रभाव की तब ज्यादा अकल तो नहीं थी,हां इतना जरुर हमें अह्सास हो गया था कि कोई धारा लग गई है एक साथ पांच जने इकट्ठा खड़े नहीं हो सकते। हम स्कूली बच्चों ने झुंड में सिटी स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाना छोड़ दिया था। हाई स्कूल की परीक्षा मैने निशातगंज के माध्यमिक विद्यालय से पास की थी। गोमती पुल के ऐन किनारे स्थित यह विद्यालय पहले जे.बी.टी.सी के नाम से जाना जाता था।
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कुर्सी रोड का यह इलाका चर्च रोड तब नया नया विकसित हो रहा था। पुराने हनुमान मंदिर से आगे कुछ नहीं था,खेत व झाड़ियां थी। मंदिर तक हम आते थे बस,उससे आगे नहीं। कुर्सी रोड आगे गुड़म्बां तक जाती है, बस इतना पता था। बगल की विष्णुपुरी कालोनी में इक्का दुक्का बसाहट शुरू हो चुकी थी।सन अस्सी के बाद फिर तेजी से विस्तार हुआ होगा। सन बयासी में नौकरी लग जाने के बाद मेरा लखनऊ से नाता टूट गया। उसके बाद तीन चार बार आना जाना हुआ लेकिन दो तीन दिन के वास्ते संक्षिप्त दौरा निजी व्यस्तता के साथ,सो शहर के बदलाव को तसल्ली से जानने समझने का मौका नहीं मिल पाया। इस बार अवकाशप्राप्त बुजुर्ग होकर अपने बचपन के शहर में थोड़ा तसल्ली के साथ आया हूं। हलांकि जून माह की गर्मी के दिन हैं,ज्यादा सैर सपाटे की गुंजाइश नहीं है,फिर भी बाहरी बाहर टैक्सी और ओटो में घूमता हुआ नजारा ले रहा हूं बदलाव का। बड़ा अच्छा लग रहा है,आधुनिकता और अथाह निर्माण से भीड़ और वाहनों के कोलाहल से खीझ भी पैदा हो रही है। हालांकि शहर की शक्ल का कायापलट हो चुका है,फिर भी जो पुराने घर बजार हू बहू बचे हैं,उन्हें देखकर भावुकता से मन भींग जा रहा है।
समय का इतना लंबा वक्फा हमें कितना बदल देता है, हमारी तब की मासूम शक्ल और सुगठित शरीर भी कितना जीर्ण शीर्ण हो जाता है,आंखों में वह उत्साह व चमक नहीं रहती, पैरों में साइकिल से सरपट भागने की जान नहीं होती। अब साधन सम्पन्नता है,तब फाके मस्ती थी। चलो कुछ नहीं तो टैक्सी या ओटो हायर कर शहर की पुरानी देखी भाली जगहों की बाहरी बाहर सैर तो की ही जा सकती है। इस बार की यात्रा में इतना तो किया और उमंग उत्साह वाली अपनी 'टीन एज' उम्र में जिये शहर की भरपूर यादें ताजा की।
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इतने सालों बाद लखनऊ आकर अपने लड़कपन के प्रिय आशियाने में जाना मुझे बड़ा सकूंन दे गया।
देर रात गये हम दोनों पति पत्नी इस बार के मेजबान के घर चर्चरोड अलीगंज लौट आये।
अगली सुबह सुबह हमने अयोध्या जाने का प्लान बनाया। इसे संयोग कहें या दुर्योग कि ऐन इन दिनों अयोध्या में दान चोरी प्रकरण की एस.आइ.टी जांच चल रही थी। जनता के मन में भ्रम व आशंका के बादल छाये थे। लेकिन इतने पास आकर फिर दुबारा आने का अवसर नहीं मिलेगा,यह सोच कर मंदिर की बनावट,भव्यता व अपने पुराने परिचित बाराबंकी फैजाबाद रोड में हुए बदलाव को जानने देखने का उत्साह मुझे अयोध्या दर्शन करा ही लाया।
अलीगंज के इस इलाके से फैजाबाद रोड का लिंक अब कई नये मुहल्लों से गुजारता हुआ हमें हाई वे पर ले आया था। मैं इन्द्रानगर,लक्ष्मणपुरी,भूतनाथ मंदिर,एच.ए.एल वाली सन सत्तर अस्सी के दशक की सड़क व बाजार ढूंढ रहा था,पर वो कहां मिलते। टैक्सी से गुजरते हुए वे इलाके ओवर ब्रिज के नीचे लुप्त हो गये थे।
पालीटेक्निक चौराहे पर तो हमारा इंस्टीट्यूट ही था।
आगे चिनहट गांव में हमारे सहपाठी किराये में रहते थे। कुकरैल पिकनिक स्पाट उन्हीं दिनों बन रहा था।
तेज रफ्तार टैक्सी की खिड़की से कुछ पुरानी जगहों की झलकी मिली,कुछ अजनबी नजर आई।
बाबू बनारसी दास इंस्टीट्यूट व हाईकोर्ट की इमारत मेरे लिए नई थी।
बहरहाल फैजाबाद रोड अथवा अयोध्या हाई वे का दर्शनीय बदलाव सुरुचिपूर्ण लग रहा था। हम सवा दो घंटे में अयोध्या पंहुच गये थे। जून माह की गर्मी व एस.आई.टी जांच प्रकरण के बावजूद सन्नाटा नहीं था,ठीक ठाक संख्या में श्रद्धालु आ जा रहे थे।
बंबई से आये कुछ यात्रियों से मैने दान पात्र व चंदा चोरी प्रसंग पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। वे निर्लिप्त थे।बोले इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है,दर्शन करने के लिए लोग पूर्ववत आते रहेंगे। हां दान या चढ़ावे में थोड़ा-बहुत कमी पेशी हो सकती है।सबकी अपनी इच्छा है,कोई जोर जबरदस्ती तो नहीं हो रही है।' उनका जवाब था।
मंदिर के बाहरी परिसर में अभी निर्माण,लान फुलवारी आदि का काम चल ही रहा था। सुरक्षाकर्मी जगह जगह तैनात थे। एक मायूसी कर्मचारियों के चेहरे पर अवश्य तिर रही थी।
इतनी प्रतिष्ठित आस्था की जगह की छवि पर लगे दाग की जांच के माहौल में मंदिर प्रांगण में खुशपुसाहट,शंका,मायूसी का होना लाजमी था।
सरयू स्नान करने के पश्चात हनुमानगढ़ी के दर्शन कर हम लोग लौट आये।
अयोध्या से लौटते हुए अधिक उत्सुकता मुझे फिर अपने बाराबंकी चिनहट लखनऊ वाली सड़क के इर्दगिर्द की पुरानी जगहों के मोह से बांधे हुए थी।
वापसी में डेड़ घंटे बाद मेरी नजरें खिड़की से बाहर
गौर से अपनी परिचित जगहों को तलाशने लगी थी। इस बार अपेक्षाकृत सड़क के दाहिनी ओर की काफी पुरानी इमारतों को देखकर मैं पुलकित हुआ। मेरा शिक्षण संस्थान,पालीटेक्निक साफ नजर आया। हमारे इसी संस्थान के बगल से एक सड़क कुकरैल पिकनिक स्पाट के लिए जाती थी,उन दिनों वहां सिर्फ जंगल था। पिकनिक स्पाट नया नया विकसित हो रहा था। केन्द्रीय सरकार के 'सुंगध पादप संस्थान' का भवन भी निर्मित हो चुका था।
हम लोग संस्थान से फर्लो मार कर कर झुंड में पिकनिक स्पाट जाने लगे थे। एक लड़कियों से भरी बस उस तरफ जाती दिखी,हम लड़के तो सहमे सहमे उसे ताक रहे थे,जब लड़कियों ने हंसते हुए खिड़की से हाथ हिला कर हमारी हिम्मत बंधाई तो हमने भी प्रत्युत्तर में उनका अभिवादन किया। लड़कियों को हाथ हिलाकर 'हैलो -हाय' कहने का वह हमारी जिंदगी का पहला रोमांचक और पुलकित करने वाला अनुभव था। वे संभवत: किसी आधुनिक कालेज की लग रहीं थी। लालबाग गर्ल्स कालेज,महिला कालेज या आई.टी.कालेज की ही न हों,कौन जाने।
एच.ए.एल का तब का बड़ा सा गेट मैं नहीं देख पाया,न जाते हुए,न आते हुए। हमारे सामने ही तो
उस जमाने के लखनऊ की शान इस रक्षा उत्पादन फैक्ट्री की नीव रक्खी गई थी। इस संस्थान में नौकरी पाने के लिए मैने बहुत प्रयास किये,लेकिन मुझे देहरादून के रक्षा संस्थान में नौकरी करनी लिखी थी,सो एच.ए.एल में नौकरी नहीं मिली। सब डेस्टिनी की बात है। मैं सोच रहा था काश,टैक्सी वाला कुकरैल पुल,बादशाह नगर,निशातगंज से गोल मार्केट होते हुए वायरलेस चौराहा रहीमनगर से ले जाकर हमें अलीगंज के गंतव्य पर छोड़े, ताकि मैं अपने बचपन के प्रिय सड़क बजार मुहल्लों की एक झलक देख सकूं,लेकिन यह संभव नहीं हुआ,पहले ही उसने खुर्रम नगर से मोड़ते हुए कुर्सी रोड वाली दिशा पकड़ ली और दोपहर के दो बजे हमें वहीं छोड़ दिया जहां से सुबह पांच बजे 'पिक' किया था।
इस प्रकार कुल सात घंटे में हम लोग अयोध्या दर्शन व फैजाबाद राजमार्ग की सैर करके लखनऊ लौट आये थे।
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जिस दिन हम लौटे,यानी 22 जून 2026 को उस रोज लखनऊ में दो अवांछित व अरुचिकर घटनायें घटी,एक तो एस.आई.टी ने अयोध्या चंदा चोरी प्रकरण की जांच सरकार को सौंपी और उसी दोपहर में अलीगंज क्षेत्र के ही पुरनियां इलाके के एक कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड की खबर आई। मन काफी व्यथित हुआ। नियमों की अनदेखी कर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया निर्माण कार्य कितना घातक हो सकता है,जिसने 15 युवाओं की जान ले ली। ऐसे अंधाधुंध निर्माण व विकास की बाढ़ ने महानगरों का जीवन कितना मृत्युभक्षी बना दिया है,यह देख कर व सोचकर दिल दहल जाता है।
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लखनऊ में इस बार निशातगंज गोमतीपुल सिकन्दरबाग,नरही,विधानसभा,हजरतगंज,हुसैनगंज,वाले मुख्य मार्ग की तरफ जाने का मौका नहीं मिला वर्ना अतीत में यह रुट तो अपना बहुत लंगोटिया यार था। गोमती तट पर स्थित निशातगंज के राजकीय इंटर कालेज से मैने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। जुबली इंटर कालेज,सिटी स्टेशन से इंटर पास किया था। उसके पश्चात इंजीनियरिंग डिप्लोमा जी.टी.आई फैजाबाद रोड से पास करने के पश्चात दो तीन साल बेरोजगारी का अनुभव व छुटपुट नौकरियां की थी। इन्हीं फाकेमस्ती के दिनों में साहित्य की अभिरुचि ज्यादा उछाल मारने लगी थी। पढ़ने लिखने का खूब मन करता था।
हजरतगंज काफी हाउस के बाहर बरामदे में मैग्जीन व किताबों के स्टाल में खड़े खड़े घंटों हम लोग उनको चाट जाते थे। उस जमाने की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकायें वहां रक्खी रहती थी। सारिका की तो दो तीन कहांनियां तक पढ़ लेते थे। काफी हाउस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी,लेकिन बाहर से ही अंदर गोल मेज के इर्दगिर्द बैठे साहित्यकारों की झलक मिल जाती थी। मुद्रा जी,भगवती बाबू,के पी सक्सेना, राम लाल जी आदि को तब मैं पहचानने लगा था। अन्य लोग राजनीतिज्ञ,पत्रकार,वकील आदि बुद्धिजीवियों की चहलपहल व गर्मागर्म बहस वहां चलती रहती थी।
बारह तेरह साल पहले सूक्ष्म दौरे पर लखनऊ गया तो थोड़ी देर को काफी हाउस में जाना हुआ। वहां पर वीरेन्द्र यादव, मुद्रा जी,अखिलेश,डा.रूपरेखा वर्मा आदि से मुलाकात की। वे लोग देहरादून के साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि के बारे में जानने को काफी उत्सुक थे। मैने बताया वाल्मीकि जी हमारे अनन्य मित्र थे। हम लोग साथ ही रक्षा संस्थान में काम करते थे।अतुल अंजान एक अलग मेज पर कुछ मित्रों के साथ बैठे थे। मैने उन्हें पुरानी याद दिलाई,नेशनल इंटर कालेज वाली। वे खुश हुए। उन्होंने देहरादून के कामरेड समर भंडारी के बारे में पूछताछ की।
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सन अस्सी के साल में ही अमीनाबाद के कंचना रेस्टोरेंट से भी मेरा परिचय हो गया था। वह भी साहित्यकारों का चर्चित अड्डा था। रेस्टोरेंट के मालिक मिश्र जी स्वयं साहित्यकार थे। वहां पर लगभग नियमित बैठने वाले कवि राजेश विद्रोही,राजहंस मिश्र दीपक,अजय प्रसून,अगीत वाले रंगनाथ मिश्र आदि से बातचीत होती थी।
कंचना के बारे में हम सुनते थे कि किसी जमाने में वहां निराला,पंत,महादेवी,बच्चन,नरेंद्र मिश्र आदि साहित्यकार भी लखनऊ आने पर मिलते बैठते बतियाते थे।अमीनाबाद जाने पर कंचना में बैठ कर चाय पीना व साहित्यकारों की संगत करने का चश्का मुझे भी लग गया था।
लीलाधर जगूड़ी भी तब पहाड़ से आकर लखनऊ के सूचना केंद्र हजरतगंज में नौकरी करने लगे थे। उनसे तब मुलाकात नहीं हुई। मंगलेश डबराल से अमृत प्रभात कार्यालय में मिलना हुआ था। हिंदी संस्थान में ठाकुर प्रसाद सिंह अध्यक्ष थे। 'वंशी और मांदल' नवगीत संग्रह के लिए चर्चित थे।
मंगलेश जी की का संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' चर्चित होने लगा था। हिंदी संस्थान के दो मंजिले के हाल में मुझे भी कुछ युवाओं के साथ सोहन लाल द्विवेदी जी के सान्निध्य में काव्य पाठ का अवसर मिला।आकाशवाणी के उत्तरायण कार्यक्रम विभाग में मैठाणी जी,वंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' व जीत सिंह जड़धारी जी थे। जिज्ञासु जी ने कुमाउंनी 'कथा किस्सों' के वाचन व प्रसारण हेतु मुझे भी बुलाया था। 'कमल जी' उन दिनों आकाशवाणी के लोकप्रिय कार्यक्रम संयोजक थे। शिवानी का स्तंभ 'वातायन',के.पी सक्सेना के व्यंग्य,उर्मिल कुमार थपलियाल की 'सप्ताह की नौटंकी',स्वतन्त्र भारत अखबार में खूब पढ़ी जाती थी।
'स्वतंत्र भारत' के रविवारीय परिशिष्ट में मेरी भी कहानियां नवगीत आदि छपने लगे थे।
लखनऊ में पुनर्गमन के बहाने इतनी पुरानी संचित स्मृतियां छन छन कर बाहर आ रही हैं। जो संभवत: वहां लगातार निवास करते रहने पर न खुलती शायद। लंबा बहिर्गमन भी हमारे प्रिय स्थानों की यादों को संभाले संजोये रखता है। यह अनुभव शिद्दत से हो रहा है।
रवीन्द्रालय में हुए कुछ कार्यक्रमों में दर्शक के तौर पर शिरकत करने की याद अभी ताजा है। इन्हीं कार्यक्रमों के दौरान कथाकार शिवानी,चित्रकार रणबीर सिंह बिष्ट, बिरजू महाराज,अवधी कवि रमई काका को पास से देखने का अवसर मिला था।
केशरबाग की 'बारादरी' में हुए एकाध मुशायरों में देर रात तक बैठे रहने की धूमिल स्मृति भी है।
अवध जिमखाना क्लब में टेनिस का एक विश्व स्तरीय मैच सन 1975-76 में हुआ था। हम स्कूली लड़के क्लब के बाहर सामने बने ऊंचे मकबरे में चढ़ कर मैच देखने लगे थे। इस मैच में न्यूजीलैंड के खिलाड़ी ओनी पारून व अमृतराज बंधुओं का मुकाबला हुआ था,इतना याद है।
गोमती के किनारे बना लखनऊ का पहला पांच सितारा होटल क्लार्क अवध उन्हीं दिनों बन कर तैयार हुआ था। हम लड़के गोमती के दूसरे पाट पर देर शाम तक तैरते फांदते थे और मद्दिम रौशनी में नदी में बन रही होटल की छाया के ऊपरी हाल को इंगित कर आपस में हंसी ठिठोली करते एक दूसरे से कहते थे,देखो वहां कैबरे डांस शुरू हो गया है। क्लार्क अवध के बगल में ही स्थित
अपने वास्तु के लि प्रसिद्ध छतर मंजिल (सी.डी.आर.आई ) की छाया भी गोमती नदी में बड़ी मनोरम नजर आती थी। छतर मंजिल का निर्माण अवध के नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने करवाया था सन 1820 के आसपास।
निशातगंज चौराहे से जुड़े तो बहुत किस्से हैं। तब ओवर ब्रिज नहीं बना था। पालीटेक्निक के पहले साल में खूब रैगिंग हुई थी। कालेज जाने वाली बस पकड़ने के वास्ते हम नये लड़के डरे सहमे हनुमान मंदिर के पास खड़े रहते थे। सीनियरों के आदेशानुसार उनको हाथ जोड़ कर नमस्कार करने के पश्चात नजर तीसरे बटन पर झुकानी होती थी।
एक रोज एक सीनियर ने बड़े पशोपेश में डाल दिया।
'बोला वो देखो सामने तुम्हारी बहिनें खड़ी हैं,उनके पांव छू कर आओ। अपरिचित लड़कियों के पास जाकर उनके पांव छूने की बदतमीजी कैसे करते। हाथ जोड़कर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा,'सर
यह सजा मत दिजिए चाहे उठक बैठक करा लीजिए सौ। 'चलो अच्छा,कान पकड़ कर उठकर बैठक लगाओ।' फर्स्ट इयर के हम दो तीन लड़कों ने वहां पर सबके सामने कान पकड़ कर उठक बैठक लगाई। जनता के लिए वहां रोज कोई न कोई रोचक तमाशा होता था। एवज में सीनियर बस का टिकट स्वयं लेते थे। कैंटीन में ले जाकर कहते थे 'तीन गर्म समोसे एक साथ खाओ।'
निशातगंज के ओवर ब्रिज के विरोध में व्यापारियों ने खून से चिट्ठी लिखकर विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को पकड़ाई थी। हालांकि बाद में ब्रिज बना
और उनका व्यवसाय यथावत चलता रहा।
निशातगंज का 'उमराव' पिक्चर हाल भी तभी दो एक साल बाद बना। गोमती के पार बना वह लखनऊ का पहला पिक्चर हाल था। 'शोले' हम लोगों ने उसी हाल में देखी थी।
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लखनऊ में हफ्ते भर के निवास के पश्चात लौटने की तिथि आ गई थी। ट्रेन के रूट डायवर्जन के कारण हमें ट्रेन चारबाग से न पकड़ कर आलम नगर से पकड़नी थी। आते समय भी हम आलमनगर ही उतरे थे। अलीगंज से आलमनगर ले जाने के वास्ते टैक्सी वाले ने वही रुट पकड़ा, डालीगंज चौक इमामबाड़ा वाला। कपूरथला बाग के बाद पहले चांदगंज आता था, फिर रेलवे फाटक और उसके बाद बायें हाथ में विवेकानंद हास्पिटल।
इस बार ओवर ब्रिज बन जाने से आधा चांदगंज नजर ही नहीं आया। विवेकानंद अस्पताल ऊपर से दिखा। इस अस्पताल से जुड़ी मेरी बड़ी दुखद स्मृतियां हैं।
सन 1973 में मैं कक्षा नौ का विद्यार्थी था। बड़े भाई, ईजा (मां) को भी गांव से इलाज के वास्ते लखनऊ ले आये थे। उनकी कमर में साल छह महीने से असहनीय दर्द रहता था। लखनऊ में लाकर कई डाक्टरों को दिखाने के बाद विवेकानंद हास्पिटल में भर्ती किया। उनके गहन टैस्ट हुए। उन दिनों वहां के सर्जन डाक्टर भट्टाचार्य का बड़ा नाम था। उन्हें भी दिखाया। मां,वहां एक माह से ज्यादा भर्ती रही। वहां के बड़े स्वामी जी सहित उनके सहयोगी नियमित मरीजों से मिलने एक चक्कर लगाते थे। अक्सर मां के साथ बैड पर मैं बैठा मिलता था। मां को हाथ जोड़ कर उनसे हालचाल पूछने के बाद स्वामी जी मेरे सिर में भी हाथ फेर कर सांत्वना देते थे। मां को गले का कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उन्हें नहीं बचाया जा सका। जनवरी 1974 में लखनऊ में ही उनका देहांत हो गया था। नया नया बना रामकृष्ण मिशन का यह अस्पताल उन दिनों लखनऊ में अपने विशाल आधुनिक भवन,साज सज्जा,सुविधाओं व सस्ते उपचार के लिए प्रसिद्ध था। इसके बाहर प्रवेश द्वार पर फौब्बारे लगे थे तथा स्वच्छ पानी के विस्तृत ताल में रंगबिरंगी मछलियां तैरती थी। सफेद चिकने संगमरमर की सीढियां चढ़ने के बाद विशालकाय ऊंचा हाल व गलियारे बने थे। सरकारी अस्पतालों के मुकाबले यह लाख गुना दर्शनीय व सुविधाजनक था। एक बार इच्छा हुई देखें अब इतने सालों बाद क्या परिवर्तन हुआ है अस्पताल में, लेकिन यह संभव नहीं था। यूं अब तो बड़े बड़े सुपर स्पेशियलिटी मंहगे प्राइवेट अस्पतालों के जमाने में रामकृष्ण मिशन के इस अस्पताल की पहचान धूमिल सी हो गई होगी,ऐसा आभास जरुर हो रहा था।
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आगे चल कर टैक्सी वाला आई.टी चौराहे से डालीगंज को मुड़ गया था। आई.टी कालेज तो आजादी के पहले से ही उत्तर भारत का लड़कियों का जाना माना कालेज था। बड़े आधुनिक संभ्रांत घरों की लड़कियां वहां पड़ती थी। उसके गेट के बाहर एक ओर को खुला कैफे था,जहां झुंड में फैशनेबल लड़कियां रंगबिरगी छतरी वाली मेजों से सटी कुर्सियों में बैठ कर चाय काफी आदि पीती थी। वहां से फैजाबाद रोड की ओर जाते हुए साइकिल धीमी कर हम लड़के आपस में खुसुर-पुसुर करते थे,'यार सुना है यहां बैठ कर लड़कियां सिगरेट भी पीती हैं।'
लड़कियों को सिगरेट पीना देखना हमारे लिये असंभव दृश्य को देखने जैसा रोमांचक कारनामा था। खैर, इस बार मैने टैक्सी से उस ओर नजर घुमाई तो वहां सन्नाटा नजर आया,अलबत्ता ब्रिटिश कालीन वास्तु से बनी उस भव्य इमारत के आलीशान स्तम्भ व बड़ा सा पोर्च अभी भी शान से प्रसिद्ध आई.टी कालेज का हुस्न नुमाया कर रहे थे। उर्दू की मशहूर लेखिकाओं इस्मत चुगताई,कर्तुरलैन हैदर,आयरीन पंत सहित कई जानी मानी महिलायें किसी जमाने में इस कालेज में पढ़ती थी।
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हमारी यात्रा में आते वक्त तो सुबह का समय था,और ओटो वाहन था,इसलिए उसने हमें नये नये गलियों वाले शार्टकट दिखाये और आधे घंटे में ही आलमनगर स्टेशन से चर्च रोड अलीगंज पहुंचा दिया। इस बार लौटते हुए दोपहर का वक्त था और टैक्सी,गलियों से नहीं जा सकती थी,इसलिए डालीगंज ब्रिज के बाद चौक की ओर मुड़ने के बाद उसने हमें भव्य एतिहासिक रूमी दरवाजे से प्रवेश करा कर बड़े इमामबाड़े के सामने से होते हुए छोटे इमामबाड़े व घंटाघर से ले जाकर खुनखुन जी रोड अमृतलाल नागर चौक के आगे पुराने लखनऊ की ऐसी विस्तृत सैर करा दी जो मैने अपने विद्यार्थी जीवन में भी नहीं की थी। शिया मुस्लिमों की रिहाइश के लिए विख्यात चौक की पुरानी इमारतें अभी भी उस पुराने अतीत की जीवंत यादगार हैं जब यहां पर अवध के नवाबों का कला संस्कृति,वास्तु,अदब के उन्नत कार्यों व संस्कारों से समृद्ध शासन था।
जून की गर्मी के कारण बजार में जगह जगह मुस्लिम भाइयों ने प्याऊ के स्टाल लगा रक्खे थे।
पिछले दिनों ईरान में अयातुल्ला खुमैनी की हत्या के पश्चात लखनऊ के इस इलाके के बहुसंख्य शिया समुदाय में शोक की लहर फैल गई थी। उनकी अकीदत में लगे खुमैनी के पोस्टर जगह जगह नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मुस्लिम देश की घनी बस्ती में आ गये हों,लेकिन हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की तस्वीर व तहरीरें साझा करते पोस्टर भी लगे थे। रस्तोगी व्यापारियों के लिए प्रसिद्ध हिंदू समुदाय के घर दुकानें स्कूल मंदिर दर्शा रहे थे कि लखनऊ की साझा संस्कृति व गंगाजमनी तहजीब अपने आप में एक मिसाल है।
पराजित नायक
कई बार हम सच बोलते हुए हार जाते हैं
और हारी हुई लड़ाई को फिर से शुरू करते हैं
हो सकता है इस लड़ाई में हम शहीद भी हो जाएं
( इसकी संभावना अधिक होती है)
इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि
हम छुप जाए सुरक्षित बंकर में
इसका मतलब यह भी नहीं हो सकता कि
हम सच बोलना ही छोड़ दें
ऐसे समय में जब सच को सच कहने की तादाद
लगातार घट रही है
सच बोलना एक युद्ध जीतने के बराबर है
जब लोगों का हुजूम अगल - बगल झांकने लगे
कैमरे पर आकर बिना लड़खड़ाए सच कहना
(बशर्ते कि वह सच हो)
झूठ पर पहला आक्रमण है
हम उस क्रिकेट खिलाड़ी के लिए ताली कतई नहीं बजाते
जो क्रीच पर आने के पहले ही डर जाता है
हो सकता है कोई खिलाड़ी बना न पाए विश्व रिकॉर्ड
लेकिन उसकी आतिशी पारी कोई भूल सकता है ?
कई बार खलनायक जीतकर भी हार जाता है
और पराजित नायक सदियों तक पूजा जाता है।
एक और तस्वीर
एक और तस्वीर है
जो कभी किसी कैमरे से कैद नहीं की जा सकी
उसके रंग अलग-अलग थे
कभी - कभी तो यह इन्द्रधनुषी होकर उतरती थी
आखिर, क्या हो सकती है इसकी वज़ह
ध्यान आंखों की ओर गया
जिसके कैमरे से वह तस्वीर ली गई है
और उसकी जेपीजी इमेज फीड कर दी गई
मस्तिष्क के हार्ड डिस्क में
वह इस तरह सेव हो गई कि उसे डिलीट करने का कोई ऑप्शन नहीं था
अब इसे मिटाने के लिए क्यों किया जाए किसी से विफल अनुरोध
सबके अपने कैमरे हैं
जिसे वे हरदम गरदन में लटकाए घूमते रहते हैं
और पलक झपकते ली गई एक क्लिक को
बना देते हैं प्रोफाइल पिक्चर
जबकि दूसरे कोने से ली जा सकती थी एक मुक्कमल स्पष्ट तस्वीर
विडंबना यह रही है कि एक को दिखती थी जो ब्लैक
वही दूसरे को दिखती थी ह्वाइट ।
टर्मिनस
शालीनता का तकाजा यह है कि
हम अंधे को अंधा नहीं कहते
दुश्मन के सामने उसे दुश्मन नहीं बोलते
दुःख को इतना पोशीदा रखते हैं
कि दूर से किसी को आते देख
पोंछ लेते हैं रूमाल से आंसू
लाख गम पीछे धकेल कर
होंठों पर ओढ़ लेते हैं मुस्कान
अपने वश में तो इतना ही है कि
नेत्रों में धवल ज्योति के बावजूद
स्वयं को अंधा कहे जाने पर भी
नहीं दर्ज करते कोई आपत्ति
कुछ अनर्गल प्रश्नों का जवाब होता है मौन
और उससे भी अधिक कड़वे सवालों को
हल किया जा सकता है मुस्कान से
सह-अस्तित्व को स्नेहोपहार समझ लिया जाए
कुछ कम है क्या साथ - साथ चलना भी
सफर भले ही रेल- पटरियों का हो
समझ के अभाव में लंबा लगता है सफर
जबकि दूरियां ही दूरियों को कम करती हैं
जरूरी नहीं कि हर यात्रा की हो कोई मंजिल
हर अगले क़दम के लिए उत्साह भरता है
एक सुनिश्चित टर्मिनस
पथिक के लिए यही है बड़ा संबल
और इस तरह असुविधाजनक स्टेशनों से गुजरते हुए वह मुस्कुरा उठता है।
सफ़ेद दाग
तमाम हीनताओं से भरती जा रही है
अब तो सांस लेना भी दुभर हो गया है
जिनके जिगर का टुकड़ा कहलाती थी
वे भी चिंताओं के बोझ तले दबते जा रहे हैं
इतना कि उनका सिर उठाकर चलना
हो गया है मुश्किल
एक छोटे से बिन्दु से शुरु होकर
यह चांद को ग्रसता जा रहा है राहु की तरह
आकाश के चांद को तो मिल जाएगा मोक्ष
अंधेरे में भटकते धरती के इस चांद की मुक्ति के
लिए
कौन बढा़एगा हाथ ?
आखिर क्या करे वह
जिए या ज़हर - माहुर खा ले
या लगा दे कुएं में छलांग
मौन हो जाते हैं सारे पुरुष - प्रवर
किसी के पास नहीं है इसका जवाब
असंख्य काले धब्बे छुप जाते हैं श्वेत वसन में
इन्हें धारण कर लोग पूजे जाते हैं देवता की तरह
पर यह बददिमाग सफेद दाग
हो जाता है सार्वजनिक
और सबसे पहले उठती है अंगुली इसी की ओर
जैसे शो-केस में रखी वस्तु
खींचती रहती है सबका ध्यान
यह स्याह दौर है
जब अलंकृत हो रही हैं श्यामताएं
और श्वेत को अस्पृश्य मानकर
ठेल दिया जा रहा है किनारे।
मिट्ठू
अनगिनत बार हो चुके हैं उसके पंख लहूलुहान
स्वामी भी कई बार पिंजरे को खोल चुका है
ऐसा नहीं कि वह बिल्कुल भूल गया है उड़ान
कभी- कभी वह सामने के पेड़ पर बैठकर
मारे खुशी के चहचहाता है
इसी बीच मालिक मिट्ठू कहकर उसे बुलाता है
कटा हुआ बासी अमरूद कटोरी में परोस देता है
थोड़ा सा पानी भी उसे उपलब्ध कराता है
वह दौड़ा - दौड़ा आता है
अपनी ही चोंच से
पिंजरे में ताला लगाता है
जब - जब यह दृश्य आता है मेरी आंखों के सामने
मैं खुद से करता हूं सवाल -
आखिर यह मिट्ठू पिंजरे से निकल क्यों नहीं जाता है?
संपर्क: lalancsb@gmail.com
( कान्तिमोहन जी पर कथाकार अरुण कुमार‘असफल’ का यह आलेख प्रकाशित करते हुए हम उनके काम और मिशन को याद करते हैं)
पर कथा है शेष
अरुण कुमार ‘असफल’