पराजित नायक
कई बार हम सच बोलते हुए हार जाते हैं
और हारी हुई लड़ाई को फिर से शुरू करते हैं
हो सकता है इस लड़ाई में हम शहीद भी हो जाएं
( इसकी संभावना अधिक होती है)
इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि
हम छुप जाए सुरक्षित बंकर में
इसका मतलब यह भी नहीं हो सकता कि
हम सच बोलना ही छोड़ दें
ऐसे समय में जब सच को सच कहने की तादाद
लगातार घट रही है
सच बोलना एक युद्ध जीतने के बराबर है
जब लोगों का हुजूम अगल - बगल झांकने लगे
कैमरे पर आकर बिना लड़खड़ाए सच कहना
(बशर्ते कि वह सच हो)
झूठ पर पहला आक्रमण है
हम उस क्रिकेट खिलाड़ी के लिए ताली कतई नहीं बजाते
जो क्रीच पर आने के पहले ही डर जाता है
हो सकता है कोई खिलाड़ी बना न पाए विश्व रिकॉर्ड
लेकिन उसकी आतिशी पारी कोई भूल सकता है ?
कई बार खलनायक जीतकर भी हार जाता है
और पराजित नायक सदियों तक पूजा जाता है।
एक और तस्वीर
एक और तस्वीर है
जो कभी किसी कैमरे से कैद नहीं की जा सकी
उसके रंग अलग-अलग थे
कभी - कभी तो यह इन्द्रधनुषी होकर उतरती थी
आखिर, क्या हो सकती है इसकी वज़ह
ध्यान आंखों की ओर गया
जिसके कैमरे से वह तस्वीर ली गई है
और उसकी जेपीजी इमेज फीड कर दी गई
मस्तिष्क के हार्ड डिस्क में
वह इस तरह सेव हो गई कि उसे डिलीट करने का कोई ऑप्शन नहीं था
अब इसे मिटाने के लिए क्यों किया जाए किसी से विफल अनुरोध
सबके अपने कैमरे हैं
जिसे वे हरदम गरदन में लटकाए घूमते रहते हैं
और पलक झपकते ली गई एक क्लिक को
बना देते हैं प्रोफाइल पिक्चर
जबकि दूसरे कोने से ली जा सकती थी एक मुक्कमल स्पष्ट तस्वीर
विडंबना यह रही है कि एक को दिखती थी जो ब्लैक
वही दूसरे को दिखती थी ह्वाइट ।
टर्मिनस
शालीनता का तकाजा यह है कि
हम अंधे को अंधा नहीं कहते
दुश्मन के सामने उसे दुश्मन नहीं बोलते
दुःख को इतना पोशीदा रखते हैं
कि दूर से किसी को आते देख
पोंछ लेते हैं रूमाल से आंसू
लाख गम पीछे धकेल कर
होंठों पर ओढ़ लेते हैं मुस्कान
अपने वश में तो इतना ही है कि
नेत्रों में धवल ज्योति के बावजूद
स्वयं को अंधा कहे जाने पर भी
नहीं दर्ज करते कोई आपत्ति
कुछ अनर्गल प्रश्नों का जवाब होता है मौन
और उससे भी अधिक कड़वे सवालों को
हल किया जा सकता है मुस्कान से
सह-अस्तित्व को स्नेहोपहार समझ लिया जाए
कुछ कम है क्या साथ - साथ चलना भी
सफर भले ही रेल- पटरियों का हो
समझ के अभाव में लंबा लगता है सफर
जबकि दूरियां ही दूरियों को कम करती हैं
जरूरी नहीं कि हर यात्रा की हो कोई मंजिल
हर अगले क़दम के लिए उत्साह भरता है
एक सुनिश्चित टर्मिनस
पथिक के लिए यही है बड़ा संबल
और इस तरह असुविधाजनक स्टेशनों से गुजरते हुए वह मुस्कुरा उठता है।
सफ़ेद दाग
तमाम हीनताओं से भरती जा रही है
अब तो सांस लेना भी दुभर हो गया है
जिनके जिगर का टुकड़ा कहलाती थी
वे भी चिंताओं के बोझ तले दबते जा रहे हैं
इतना कि उनका सिर उठाकर चलना
हो गया है मुश्किल
एक छोटे से बिन्दु से शुरु होकर
यह चांद को ग्रसता जा रहा है राहु की तरह
आकाश के चांद को तो मिल जाएगा मोक्ष
अंधेरे में भटकते धरती के इस चांद की मुक्ति के
लिए
कौन बढा़एगा हाथ ?
आखिर क्या करे वह
जिए या ज़हर - माहुर खा ले
या लगा दे कुएं में छलांग
मौन हो जाते हैं सारे पुरुष - प्रवर
किसी के पास नहीं है इसका जवाब
असंख्य काले धब्बे छुप जाते हैं श्वेत वसन में
इन्हें धारण कर लोग पूजे जाते हैं देवता की तरह
पर यह बददिमाग सफेद दाग
हो जाता है सार्वजनिक
और सबसे पहले उठती है अंगुली इसी की ओर
जैसे शो-केस में रखी वस्तु
खींचती रहती है सबका ध्यान
यह स्याह दौर है
जब अलंकृत हो रही हैं श्यामताएं
और श्वेत को अस्पृश्य मानकर
ठेल दिया जा रहा है किनारे।
मिट्ठू
अनगिनत बार हो चुके हैं उसके पंख लहूलुहान
स्वामी भी कई बार पिंजरे को खोल चुका है
ऐसा नहीं कि वह बिल्कुल भूल गया है उड़ान
कभी- कभी वह सामने के पेड़ पर बैठकर
मारे खुशी के चहचहाता है
इसी बीच मालिक मिट्ठू कहकर उसे बुलाता है
कटा हुआ बासी अमरूद कटोरी में परोस देता है
थोड़ा सा पानी भी उसे उपलब्ध कराता है
वह दौड़ा - दौड़ा आता है
अपनी ही चोंच से
पिंजरे में ताला लगाता है
जब - जब यह दृश्य आता है मेरी आंखों के सामने
मैं खुद से करता हूं सवाल -
आखिर यह मिट्ठू पिंजरे से निकल क्यों नहीं जाता है?
संपर्क: lalancsb@gmail.com






