Sunday, August 23, 2026

 

क्या पत्रकारिता में विचारधारा ’ 

महत्वपूर्ण है

पत्रकारिता में निष्पक्षता के भ्रम की चीरफाड़ करता विचारोत्तेजक व्याख्यान


वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार भारत भूषण (बेंजवाल) 'कैच न्यूज' के संपादक, 'मेल टुडे' के संस्थापक संपादक, 'हिंदुस्तान टाइम्स' के कार्यकारी संपादक (एग्जीक्यूटिव एडिटर) और दिल्ली में 'द टेलीग्राफ' के संपादक रहे हैं। वह 'एक्सप्रेस-न्यूज सर्विस' के संपादक, 'द इंडियन एक्सप्रेस' के वाशिंगटन संवाददाता (कॉरस्पॉन्डेंट) और 'द टाइम्स ऑफ इंडिया' में सहायक संपादक (असिस्टेंट एडिटर) भी रहे हैं। वह अभी एक स्वतंत्र, गैर-लाभकारी और वैश्विक समाचार-एजेंसी मॉडल पर आधारित पत्रकारिता मंच '360 इनफो' के एसोसिएट एडिटर (सह-संपादक) और साउथ एशिया एडिटर (दक्षिण एशिया संपादक) हैं। प्रस्तुत है चतुर्थ पं. भैरव दत्त धूलिया पत्रकारिता पुरस्कार समारोह में उनका व्याख्यान।

भारत में पत्रकारिता का जन्म ही विचारधारा के साथ हुआ था। जहाँ अंग्रेज़ी भाषा के समाचार पत्र औपनिवेशिक हितों और अपने यूरोपीय पाठकों की सेवा करते थे, वहीं भाषायी प्रेस ने भारतीयों की राजनीतिक चेतना को जगाने का काम किया। तब पत्रकारिता में तटस्थता का कोई ढोंग नहीं था। शुरुआती राष्ट्रवादी प्रेस किसी तटस्थ जनता को केवल सूचना देने की कोशिश नहीं रही थी बल्कि वे एक राष्ट्रवादी जनता का निर्माण के लिए प्रयासरत थे, एक अखिल भारतीय, उपनिवेशवाद-विरोधी चेतना को आकार दे रहे थे। यह पत्रकारिता राष्ट्र-निर्माण का एक अभ्यास थी और खुलकर वैचारिक थी।

उपनिवेशवाद-विरोधी समाचार पत्र न केवल दुनिया की रिपोर्टिंग करने की कोशिश कर रहे थे बल्कि उसे बदलने की कोशिश कर रहे थे। बाल गंगाधर तिलक के 'केसरी' ने अंग्रेजों के खिलाफ हिंसक विरोध को बढ़ावा दिया और हिंदू पुनरुत्थानवाद को आगे बढ़ाया; गांधी के 'यंग इंडिया' और 'हरिजन' ने सविनय अवज्ञा को बढ़ावा दिया और पत्रकारिता को नैतिक सुधार के साधन के रूप में देखा; मौलाना आज़ाद के 'अल-हिलाल' ने पैन-इस्लामिज्म (इस्लामवाद) में रची-बसी उपनिवेशवाद-विरोधी भावना को बढ़ावा दिया। हर अखबार एक अलग और प्रतिस्पर्धी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था। किसी ने भी तटस्थ होने का दावा नहीं किया। वे सभी वैचारिक थे और उन्हें इस पर गर्व था।

पंडित भैरव दत्त धूलिया का 'कर्मभूमि' उसी परंपरा का हिस्सा था। भक्तदर्शन जी के साथ मिलकर, धूलिया जी ने गढ़वाल के अपने पाठकों के बीच एक राष्ट्रवादी जनता को आकार देने के लिए लगातार लिखा, वे कंपनी के निदेशक के उस दबाव के खिलाफ भी डटे रहे जिसने उन्हें ब्रिटिश अधिकारी को नाराज करने वाले अनाम संपादकीय छापने पर इस्तीफा देने की धमकी दी थी।

आज के भारत में पत्रकारिता और विचारधारा पर बात से पहले, एक बुनियादी सवाल है। जब हम पत्रकारिता में विचारधारा की बात करते हैं, तो हमारा क्या मतलब होता है?

मार्क्स ने विचारधारा को "प्रभुत्वशाली विचारधारा" के रूप में परिभाषित किया यानी शासक वर्ग के विचार जो व्यापक रूप से समाज की सामान्य समझ के रूप में स्वीकार कर लिए जाते हैं, जिससे उत्पीड़ित समूह उन मूल्यों पर विश्वास करने लगते हैं जो वास्तव में उनके उत्पीड़कों के हितों का समर्थन करते हैं। उन्होंने इसे "मिथ्या चेतना" कहा।

एंतोनियो ग्राम्शी ने इसका विस्तार किया कि कैसे प्रभुत्वशाली विचारों को स्कूलों, मीडिया और चर्च के माध्यम से तब तक फैलाया जाता है जब तक कि वे तटस्थ न लगने लगें। इसे  उन्होंने "सांस्कृतिक वर्चस्व"  कहा।

अल्थूजर ने स्पष्ट किया कि क्यों सामाजिक संस्थाओं परिवार, शिक्षा, मीडिया के माध्यम से विचारधारा को व्यवस्थित रूप से पुनरुत्पादित किया जाता है, जिन्हें उन्होंने "वैचारिक राज्य उपकरण" कहा। कार्ल मैनहेम विचारधारा को पूरी तरह से नकारात्मक रूप में देखने से पीछे हटे और उन्होंने उन विचारधाराओं के बीच अंतर किया जो यथास्थिति को बनाए रखती हैं और जो दुनिया को बदलना चाहती हैं।

देखिए, ये सभी परिभाषाएँ पत्रकारों और पत्रकारिता के लिए कैसे प्रासंगिक हो जाती हैं।

विचारधारा पत्रकारिता में कई स्तरों पर काम करती है। संरचनात्मक, संस्थागत, व्यावसायिक, संज्ञानात्मक और भाषायी, जो सभी आपस में जुड़े हुए हैं। समाचार संगठन का स्वामित्व यह तय करता है कि क्या प्रकाशित होने योग्य है और क्या नहीं। मालिक ऐसे संपादकों को रखते हैं जो उनके विश्वदृष्टिकोण को साझा करते हैं; संपादक ऐसे पत्रकारों को रखते हैं जो उस सांचे में फिट बैठते हैं। समय के साथ, संगठन एक ऐसी संस्कृति विकसित कर लेता है जो उसमें काम करने वाले हर व्यक्ति को स्वाभाविक लगती है, क्योंकि असहमत होने वालों को बाहर कर दिया जाता है। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' के बारे में यह कहावत है कि उसने बहादुर शाह जफर को छोड़कर दिल्ली के सभी शासनों का समर्थन किया। वहां काम कर चुके हम सभी को यह सच्चाई पता है।

फंडिंग भी पत्रकारिता को वैचारिक रूप से आकार देती है। यदि किसी समाचार पत्र के विज्ञापन राजस्व का 45 से 50 प्रतिशत हिस्सा सरकारी विज्ञापनों से आता है, तो उसके पत्रकार अनजाने में उन खबरों से बचते हैं जिनसे वह राजस्व छिन सकता है। किसी भी संपादक को यह कहते हुए मेमो जारी करने की जरूरत नहीं होती कि "सरकार के विरुद्ध पड़ताल मत करो।" पत्रकार संगठनात्मक संस्कृति को देखकर और उसे अपनाकर सीखते हैं। 'बीट' (कार्यक्षेत्र) की संरचना इसे और मजबूत करती है: जिस क्षण आपके पास एक "बिजनेस बीट" होती है और कोई "लेबर बीट" (मजदूर बीट) नहीं होती, यह स्पष्ट हो जाता है कि अर्थव्यवस्था को पूंजी के दृष्टिकोण से समझा जाना है।

विचारधारा न्यूज़रूम संस्कृति के माध्यम से भी काम करती है। संपादकीय प्रक्रिया के हर चरण में 'गेटकीपिंग' (खबरों की छंटनी) होती है।  संवाददाताओं से लेकर उप-संपादकों और संपादक तक लगातार यह निर्णय लिया जाता है कि कौन सी चीज़ खबर बनने के योग्य है। हर गेटकीपर का मानना होता है कि वह व्यावसायिक रूप से तटस्थ है, लेकिन वे वैचारिक धारणाओं से पूरी तरह सराबोर होते हैं। "हमें और अधिक संतुलन की आवश्यकता है" का अर्थ अक्सर यह होता है कि "हमें इस असहज करने वाले निष्कर्ष का मुकाबला करने के लिए सत्ता प्रतिष्ठान की ओर से एक आवाज़ की आवश्यकता है।" स्रोतों का पदानुक्रम इसे और जटिल बना देता है: सत्ता के स्रोतों, कॉर्पोरेट हस्तियों और विशिष्ट संस्थानों के विशेषज्ञों को विस्थापन का दावा करने वाले आदिवासियों, शोषण का दावा करने वाले श्रमिकों या भेदभाव का दावा करने वाले अल्पसंख्यकों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक विश्वसनीय माना जाता है।

व्यावसायिक मानदंड भी विचारधारा के रूप में कार्य करते हैं। निष्पक्षता को अक्सर तटस्थ मानकों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है लेकिन वास्तव में ये वैचारिक फिल्टर के रूप में कार्य करते हैं।

जब दोनों पक्ष समान न हों, तो "संतुलन" व्यवस्थित रूप से वास्तविकता को विकृत कर देता है। जब मैंने 1997 में 'हिंदुस्तान टाइम्स' के लिए थाईलैंड में नागा विद्रोही नेता थुइन्गालेंग मुइवा का साक्षात्कार लिया, तो मुझे भारत सरकार के मुख्य नागा वार्ताकार का फोन आया, जिन्होंने पूछा कि मैंने सरकार का दृष्टिकोण क्यों शामिल नहीं किया। मैंने उनसे कहा: "50 से अधिक वर्षों से समाचार पत्रों में केवल भारत सरकार का दृष्टिकोण ही दिखाई दिया है। क्या नागाओं को तुरंत उनका खंडन किए बिना अपना दृष्टिकोण रखने का अवसर नहीं मिलना चाहिए?" जलवायु वैज्ञानिकों और जलवायु परिवर्तन को नकारने वालों को समान स्थान देने से संतुलन पैदा नहीं होता  बल्कि यह यह संकेत देता है कि एक वैज्ञानिक रूप से सुलझा हुआ प्रश्न अब भी खुला है। कभी-कभी आपको दो विरोधाभासी स्रोतों को उद्धृत करने के बजाय खुद खिड़की से बाहर देखने की ज़रूरत होती है।

कोई घटना बयान आदि समाचार है या नहीं यह न्यूजवर्दीनेस भी उतनी ही वैचारिक है। संभ्रांत वर्ग के कार्यों को आम लोगों के कार्यों की तुलना में स्वाभाविक रूप से अधिक समाचार-योग्य माना जाता है। गरीबी की धीमी हिंसा, भूख, बीमारी, विस्थापन शायद ही कभी खबर बनती है क्योंकि इसमें नाटक और नयापन नहीं होता। जब मैं 'टाइम्स ऑफ इंडिया' में था, तो मालिक कहा करते थे: "यमुना पुश्ता की झुग्गियों में लगी आग में किसी की दिलचस्पी नहीं है। वे हमारे पाठक नहीं हैं।" जब मैंने 'मेल टुडे' शुरू किया, तो मुझे पाठक की कल्पना एक ऐसे व्यक्ति के रूप में करने के लिए कहा गया जो तीस के दशक के मध्य में है, जिसकी जीवनसाथी कामकाजी है, जिसके दो बच्चे हैं, एक कुत्ता है, और घर तथा कार पर ईएमआई है। समाचार-योग्यता उस कल्पित पाठक के मूल्यों और इसलिए उसकी विचारधारा  को संहिताबद्ध करती है।

विचारधारा संज्ञानात्मक  स्तर पर भी काम करती है। 'फ्रेमिंग' (खबर को एक खास नजरिए से पेश करना) वह जगह है जहाँ विचारधारा पत्रकारों के ध्यान में आए बिना ही खबर में प्रवेश कर जाती है। उन्हीं तथ्यों को आर्थिक विकास, असमानता, राष्ट्रीय सुरक्षा या मानवाधिकारों की कहानी के रूप में पेश किया जा सकता है। विचार करें कि मीडिया 'ग्रेट निकोबार द्वीप' पर प्रस्तावित ट्रांसशिपमेंट पोर्ट को कैसे फ्रेम करता है, सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि आप सरकार का दृष्टिकोण अपनाते हैं, कॉर्पोरेट का दृष्टिकोण, पर्यावरण का दृष्टिकोण, या अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे लगभग 200 शोम्पेन आदिवासियों का दृष्टिकोण अपनाते हैं।

पुष्टि पूर्वाग्रह तब काम करता है जब पत्रकार एक मजबूत धारणा के साथ जांच शुरू करते हैं: इसका समर्थन करने वाले साक्ष्य विश्वसनीय लगते हैं; विरोधाभासी साक्ष्य किसी एजेंडे से प्रेरित लगते हैं। सामान्यीकरण रोज़मर्रा की परिचितता के माध्यम से मौजूदा सत्ता संरचनाओं को अदृश्य बना देता है यही आंशिक कारण है कि अधिकांश पत्रकार तमिलनाडु में सी. जोसेफ विजय की टीवीके पार्टी के उदय की भविष्यवाणी नहीं कर सके। लोग वह नहीं देखते जिसे देखने के लिए उन्हें प्रशिक्षित नहीं किया गया है।

विचारधारा भाषा में भी काम करती है। लेबलिंग (नाम देना) विवरण में ही विचारधारा को समाहित कर देती है। "आतंकवादी" बनाम "उग्रवादी" बनाम "स्वतंत्रता सेनानी" वैधता और उद्देश्य के बारे में एक राजनीतिक निर्णय का प्रतिनिधित्व करता है। किसी को "शहरी नक्सल" या "देशद्रोही" कहना, गो-रक्षण से जुड़ी हिंसा को "मॉब-लिंचिंग" बनाम "सांप्रदायिक घटना" के रूप में वर्णित करना, आरक्षण को "योग्यता बनाम कोटा" के रूप में फ्रेम करना ये बेहद वैचारिक भाषाई विकल्प हैं। कर्मवाच्य सक्रिय कर्ता को गायब कर देता है: "पांच प्रदर्शनकारी मारे गए" हमें यह नहीं बताता कि उन्हें किसने मारा। "हिंसा भड़क उठी" संगठित कार्रवाई के बजाय स्वतःस्फूर्त स्वतः-प्रज्वलन का सुझाव देती है।

रूपक समाचार रिपोर्ट के तर्कों के भीतर ही समझ को आकार देते हैं। बांग्लादेश से आने वाले प्रवासियों को "लहर" या "बाढ़" के रूप में वर्णित करना आपदा की छवियों को सक्रिय करता है। कॉर्पोरेट ऋणों को बट्टे खाते में डालने को "प्रोत्साहन" कहना उन्हें सकारात्मक रूप में फ्रेम करता है, जबकि गरीबों को मिलने वाली सब्सिडी को "मुफ्त की रेवड़ियां" कहना यह दर्शाता है कि वे इसके हकदार नहीं हैं। रूपक अपने भीतर इस बात की विचारधारा समेटे होते हैं कि राजनीतिक रूप से क्या सोचना संभव है।

ऐसे दौर भी आए हैं जब पत्रकारिता में विचारधारा घातक हो गई है। विभाजन के आस-पास के वर्षों ने दिखाया कि क्या होता है जब हिंदुओं, मुसलमानों और सिखों का सांप्रदायिक प्रेस अपने-अपने समुदायों को भड़काने की भूमिका निभाता है ऐसी पत्रकारिता जिसने सक्रिय रूप से नरसंहार की परिस्थितियाँ तैयार कीं।

यदि नेहरूवादी युग ने यह धारणा बनाई कि भारत के नए-नवेले प्रेस में मजबूत उदारवादी विचार रचे-बसे थे, तो इंदिरा गांधी ने हमें उस विश्वास से मुक्त कर दिया। आपातकाल  ने सेंसरशिप, संपादकों की गिरफ्तारी और समाचार पत्रों को बंद होते देखा। मुख्यधारा के अधिकांश प्रेस ने बिना किसी विरोध के आत्मसमर्पण कर दिया, सरकारी प्रचार चलाया और असुविधाजनक सच्चाइयों को दफन कर दिया। आपातकाल ने यह उजागर कर दिया कि भारतीय प्रेस हमेशा से सत्ता-परस्त था। जब सत्ता उदार थी, तो प्रेस उदार था; जब वह अधिनायकवादी हो गई, तो प्रेस ने बड़े पैमाने पर उसी का अनुसरण किया।

उदारीकरण के बाद के दौर ने भारतीय पत्रकारिता को इस कदर बदल दिया कि उसे पहचानना मुश्किल हो गया। टीवी चैनलों की बाढ़, 24 घंटे की खबरों और अंततः डिजिटल मीडिया ने एक जटिल वैचारिक परिदृश्य तैयार किया। हमारे पास किराए के लिए विचारधारा थी: 1990 और 2000 के दशक में 'पेड न्यूज' (पैसे लेकर खबर छापना)  यह तिलक, गांधी या भैरव दत्त धूलिया की सैद्धांतिक पक्षधरता नहीं थी, बल्कि पत्रकारिता को उसके हाथों बेच दिया गया जो भुगतान कर सकता था। 2000 के दशक में हिंदी टीवी समाचारों के विस्फोट ने लोकलुभावन, राष्ट्रवादी और अक्सर सांप्रदायिक रंग से रंगी विचारधारा को लाखों भारतीय ड्राइंग रूम्स में पहुँचा दिया, जहाँ दर्शकों की संख्या (टीआरपी) बढ़ाने के लिए गो-रक्षण, लव जिहाद और पाकिस्तान-विरोधी भावनाएँ रोज़मर्रा की खुराक बन गईं। बाजार और विचारधारा ने एक-दूसरे को मजबूत किया।

हालाँकि, 2014 के बाद से जो उभरा है वह गुणात्मक रूप से बिल्कुल अलग है। पिछले युग में, स्वतंत्रता आंदोलन सहित, पत्रकारिता वैचारिक थी लेकिन वैचारिक युद्धक्षेत्र बहुलवादी था। तिलक और गोखले ने अपने अखबारों के जरिए एक-दूसरे से लड़ाई लड़ी; समाजवादी प्रेस ने कांग्रेस प्रेस से मुकाबला किया। आज कुछ अनोखा हुआ है चार कारकों के संयोजन ने एक ऐसे वैचारिक मीडिया तंत्र का निर्माण किया है जो भारतीय लोकतंत्र के मूल स्वरूप को ही नया आकार दे रहा है। मीडिया स्वामित्व का केंद्रीकरण हो रहा है है वह सत्ताधारी दल के साथ संरेखित हो रहा है। '

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' ने इसे "मोदी की भाजपा और मीडिया पर हावी बड़े घरानों के बीच एक दुःरभिसंधि " के रूप में व्याख्यायित किया है। मुकेश अंबानी के पास 70 से अधिक मीडिया आउटलेट हैं जो कम से कम 80 करोड़ भारतीयों तक पहुँचते हैं। गौतम अडानी द्वारा एनडीटीवी, क्विंट ब्लूमबर्ग और इंडो-एशियन न्यूज सर्विस का अधिग्रहण मुख्यधारा के मीडिया में बहुलवाद के अंत का संकेत देता है। इसका वैचारिक प्रभाव मुख्य रूप से स्पष्ट संपादकीय आदेशों का नहीं, यह संरचनात्मक है। स्वामित्व, समय के साथ संपादकीय संस्कृति को आकार देता है; किसी को फोन करने की जरूरत नहीं पड़ती। यही पैटर्न क्षेत्रीय मीडिया में भी फैला हुआ है, जहाँ राजनीतिक संबंध अक्सर और अधिक नग्न रूप में दिखाई देते हैं।  ओडिशा में, पांडा परिवार की मीडिया हिस्सेदारी भाजपा के एक राष्ट्रीय उपाध्यक्ष से जुड़ी हुई है; असम में, एक प्रमुख टीवी चैनल का स्वामित्व भाजपा के मुख्यमंत्री की पत्नी के पास है।

अब सरकारी विज्ञापन का उपयोग वित्तीय हथियार के रूप में होने लगा है। यहाँ तक कि राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्रों के विज्ञापन राजस्व का लगभग 45 फीसद हिस्सा सरकार से आता है। अकेले केंद्र सरकार विज्ञापनों पर रोजाना लगभग 1.95 करोड़ रुपये खर्च करती थी। भाजपा एक राजनीतिक दल के रूप में अलग से देश की सबसे बड़ी विज्ञापनदाता भी है। वैचारिक नियंत्रण का तंत्र सीधा है अनुकूल कवरेज को विज्ञापन अनुबंधों से पुरस्कृत किया जाता है; आलोचनात्मक कवरेज विज्ञापनों की वापसी को ट्रिगर करती है। यह विशेष रूप से दमनकारी है क्योंकि यह सेंसरशिप का कोई लिखित दस्तावेज़ या सबूत नहीं छोड़ता। मीडिया मालिक और पत्रकार खुद ही सेंसरशिप लागू कर लेते हैं क्योंकि वे स्वतंत्रता के परिणामों को जानते हैं।

आलोचनात्मक रुख रखने वाले पत्रकारों का कानूनी उत्पीड़न भी शुरु हो गया है। आतंकवाद-विरोधी कानूनों, राजद्रोह और आपराधिक मानहानि को मीडिया दमन के हथियारों के रूप में नया रूप दिया गया है। पत्रकारों को तबाह करने के लिए उन्हें दोषी ठहराने की आवश्यकता नहीं है। गिरफ्तारी, हिरासत और फिर से गिरफ्तारी की लगातार बनी रहने वाली धमकी ही उन्हें व्यावसायिक रूप से बर्बाद करने के लिए काफी है। 2014 के बाद से, सरकार ने कम से कम 15 पत्रकारों पर यूएपीए के तहत आरोप लगाए हैं और 36 अन्य को जेल भेजा है; यह कानून बिना किसी मुकदमे के 180 दिनों तक हिरासत में रखने की अनुमति देता है। 2019 में भाजपा ने यूएपीए में संशोधन किया ताकि अधिकारियों को अदालत में कोई अपराध साबित होने से पहले ही किसी व्यक्ति को "आतंकवादी" घोषित करने की अनुमति मिल सके। अप्रैल के अंत से मई 2025 की शुरुआत तक, 'ऑपरेशन सिंदूर' के आसपास, देश भर में कम से कम 125 मीडियाकर्मियों और कंटेंट क्रिएटर्स को "देशद्रोही" या "पाकिस्तान-समर्थक" माने जाने के कारण हिरासत में लिया गया। अकेले असम में 94 गिरफ्तारियां दर्ज की गईं। इस खौफनाक माहौल में, आत्म-सेंसिरशिप इस दमन का, सह-उत्पाद नहीं है बल्कि यह इसका मुख्य उत्पाद है।

हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा और अल्पसंख्यक-विरोधी बयानों को व्यक्त करने और फैलाने के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों का लाभ उठाया गया है, और इन प्लेटफॉर्मों के एल्गोरिदम ऐसी सामग्री को बढ़ावा देते हैं। भाजपा ने व्हाट्सएप के उपयोग को व्यवस्थित किया है, जिसका बंद ढांचा सार्वजनिक एल्गोरिदमिक जांच से बाहर काम करता है, जिससे विश्वसनीय सामाजिक नेटवर्क पारिवारिक समूह, धार्मिक संघ, पड़ोस के समूह के माध्यम से भड़काऊ सामग्री का प्रसार संभव होता है, जो दुष्प्रचार को एक झूठी विश्वसनीयता प्रदान करता है।

ये चार कारक एक-दूसरे को बल देते हैं। कॉर्पोरेट स्वामित्व वाला मीडिया घटनाओं को इस तरह से फ्रेम करता है जो हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के अनुकूल हो, जिससे काल्पनिक शिकायतें भी आम समझ जैसी लगने लगती हैं। राज्य के विज्ञापन ऐसी फ्रेमिंग को वित्तीय रूप से पुरस्कृत करते हैं। कानूनी उत्पीड़न वैकल्पिक विमर्श प्रदान करने वालों को खत्म कर देता है या डरा देता है। एल्गोरिदमिक प्रवर्धन सोशल मीडिया को सबसे चरम भावनात्मक सामग्री से भर देता है, जिससे अन्य विकल्प बाहर हो जाते हैं। भारत के पास पत्रकारिता की पश्चिमी तटस्थता की कल्पना का विलास कभी नहीं था। दांव हमेशा ऊंचे थे उपनिवेशवाद-विरोधी आंदोलन, सांप्रदायिक सह-अस्तित्व, जातिगत न्याय, क्षेत्रीय पहचान और लोकतांत्रिक जवाबदेही ने हमेशा भारतीय पत्रकारिता को आकार दिया है। भारत में पत्रकारिता ने हमेशा किसी न किसी चीज़ के लिए लड़ाई लड़ी है। सवाल यह है कि: किसके लिए लड़ रहे हैं, किसके खिलाफ लड़ रहे हैं और क्या यह लड़ाई ईमानदारी से लड़ी जा रही है।

ऐसे में पत्रकारों को क्या करना चाहिए? पत्रकार विचारधारा से छुटकारा नहीं पा सकते। हालाँकि, वे इसे प्रबंधित कर सकते हैं। लक्ष्य यह होना चाहिए कि व्यक्तिगत विश्वास कभी भी किसी पत्रकार को ऐसे तथ्य की रिपोर्ट करने से न रोकें जो उनके विश्वदृष्टिकोण के विपरीत हो। चूंकि पारंपरिक निष्पक्षता का अस्तित्व नहीं है, इसलिए एकमात्र समाधान पारदर्शिता है। इसके लिए पहले  अपने पूर्वाग्रह को स्वीकार करें: कोई राय न होने का ढोंग करने के बजाय, अपने विश्लेषण के ढांचे को लेकर खुले रहें ताकि पाठकों को पता चले कि आप किस दृष्टिकोण से बात कर रहे हैं। दूसरा, अपने स्रोतों, दस्तावेजों और डेटा को साझा करें; डिजिटल प्लेटफॉर्म खबरों और वैचारिक लेखों में उनके संदर्भों को शामिल कर सकते हैं। इसका अर्थ तटस्थता के बजाय सटीकता को प्राथमिकता देना भी है। तथ्य 50 प्रतिशत गलत और 50 फीसद सही नहीं होते। "दोनों पक्षों" को दिखाने के झूठे संतुलन से बचें आप एक तथ्यात्मक सत्य और एक सिद्ध झूठ को समान वजन नहीं दे सकते। यदि एक स्रोत कहता है कि बारिश हो रही है और दूसरा कहता है कि मौसम सूखा है, तो खिड़की से बाहर देखें।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि पत्रकारों को उस चीज़ का पालन करना चाहिए जिसे "व्यावसायिक विचारधारा" या लोकतांत्रिक कर्तव्य कहा जा सकता है: एक प्रहरी की भूमिका निभाना और राजनीतिक दल की परवाह किए बिना शक्तिशाली लोगों को जवाबदेह ठहराना; कॉर्पोरेट या सरकारी हितों पर जनसेवा को प्राथमिकता देना; वित्तीय या सामाजिक संबंधों से बचना जो हितों का टकराव पैदा करते हैं; समाचार को विश्लेषण से अलग करना और उसी के अनुसार उन्हें चिह्नित करना; और समाचार रिपोर्टों में तटस्थ, वर्णनात्मक भाषा का उपयोग करना जबकि मजबूत बयानबाजी को वैचारिक लेखों के लिए सुरक्षित रखना।

उत्तराखंड के पत्रकारों के लिए कुछ विशिष्ट प्रश्न हैं। क्या आप स्थानीय मुद्दों को फ्रेम करते समय 'देवभूमि बनाम बाहरी' के आख्यान पर सवाल उठाते हैं? जब मीडिया ने पुरोला मामले को "लव जिहाद" का लेबल दिया, तो कौन से वैचारिक मुद्दे शामिल थे, भले ही अपहरण का मामला बाद में अदालत में खारिज हो गया? क्या आपने यूसीसी (को समानता की दिशा में एक कदम के रूप में रिपोर्ट किया या राजनीतिक ध्रुवीकरण के एक उपकरण के रूप में? क्या आपने हल्द्वानी में हुए ध्वस्तीकरण को अवैध अतिक्रमणों की आवश्यक "सफाई" के रूप में रिपोर्ट किया या अल्पसंख्यक आजीविका पर एक असंगत हमले के रूप में? क्या इस तथ्य को पर्याप्त रूप से रिपोर्ट किया गया था कि सरकार ने चार धाम सड़क परियोजना को विशेष रूप से अनिवार्य पर्यावरणीय प्रभाव आकलन से बचने के लिए 53 हिस्सों में तोड़ दिया था? इन घटनाओं को जिस भी तरीके से रिपोर्ट किया गया हो, उनके उत्तर आपको बताएंगे कि इसमें कौन सा वैचारिक दृष्टिकोण शामिल था।

इस तरह पत्रकारिता में विचारधारा का समाधान विचारधारा को खत्म करना नहीं है, क्योंकि ऐसा किया ही नहीं जा सकता। इसका समाधान यह जानना है कि सभी पत्रकारों की एक विचारधारा होती है और उसके बारे में पारदर्शी होना। यही पत्रकारिता को दुष्प्रचार से अलग करता है, और यही आत्म-जागरूकता आज सबसे अधिक दबाव में है।

(प्रस्तुतिः अरविंद शेखर) 

उत्तराखंड की प्रमुख मासिक पत्रिका 'युगवाणी' से साभार

Monday, August 17, 2026

राजेश सकलानी की लघुकथाएं

 
 

 


 

 ( कवियों का गद्य पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव है। आज हम पाठकों के लिये विशेष रुप से राजेश सकलानी की कुछ लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं । लिखे जाने के चार दशक बाद भी इनकी आभा मन्द नहीं पड़ी है।)

 

 

 

 

चिड़िया 

उस आदमी को मैं एकदम पहचान गया। मैंने उसे आवाज दी। यह सरासर फिजूल था। वह मुझे भूल चुका था। कीमती कपडों में वह शानदार लग रहा था। मैंने उसे एक सफेद कागज और पैन दिया और उससे कहा कि वह एक चिड़िया इस पर बना दे।

"चिड़िया!" वह चौंककर बोला। उसका चेहरा क्रूर लगने लगा। कुछ क्षण पहले वह बहुत ही विनम्र लग रहा था।

"मैं चिड़िया नहीं बना सकता।" अपनी क्रूरता को कम करने की कोशिश करते हुए उसने कहा।

"मेरा मतलब यह नहीं कि तुम हू-ब-हू चिड़िया बनाओ। चिड़िया जैसा कुछ भी बना सकते हो। आखिर बच्चे भी चिड़िया बना लेते हैं। तुम क्यों नहीं बना सकते?" मैंने उसे प्रेरित करने का प्रयास किया।

"मैं चिड़िया नहीं बनाऊँगा!" परेशानी और क्रोध में उसने अपना निर्णय सुनाया। वह अपने कोट के बटन खोलने लगा। अंदर की एक जेब में पिस्तौल झाँक रही थी। दूसरी जेब में छोटे आकार की एक बोतल थी।

"वह डिब्बे. जैसा क्या है?" मैंने उसके कोट के बाहरी जेब की ओर इशारा करते हुए पूछा।

"यह ब्लू फिल्म है।" उसने डिब्बे को बाहर से छूते हुए कहा। उसका आत्म-विश्वास फिर लौट आया था।

"तुम गोली चलाने का साहस रखते हो?" मैंने पूछा। वह समझ गया कि मैंने उसे जाल में फंसा लिया है।

``देखो, ये सब बातें तुम नहीं समझ सकते।" यह उसने ऐसे कहा जैसे किसी बच्चे पर तरस खा रहा हो। कुछ ही क्षणों में समीकरण बदल गया था। वह अपनी संपन्नता की ओर इशारा करना चाह रहा था। यह उसका नहीं हथियार भी था।

ढाल ही "अच्छा तो बताओ, तुम चिडिया क्यों नहीं बना सकते?" मेरे यह कहते ही उसका चेहरा तन गया।

"नहीं बनाता... जाओ।" वह लगभग चीखने लगा। कोई सही कारण नहीं बता पाने पर उसे चुप हो जाना पडा जबकि वह और चीखना चाहता वा धमकाने की असफल कोशिश के बाद वह दूसरा रास्ता ढूँढना चाहता था। लेकिन रास्ते में चिड़िया दाना चुग रही थी।

“देखो, चिड़िया तो तुम्हें बनानी ही होगी। तुम बना सकते हो। सचमना।" मैंने उसे पुचकारते हुए कहा।

"देखो, ऐसा है..." उसने अपना स्वर धीमा कर दिया, जैसे कोई रहस्य खोल रहा हो।

"मुझे डर है!” यह कहते हुए उसकी आँखों में प्रस्तुत भेट को छिपाए रखने का आग्रह करने लगा- "कि मैं चिड़िया बनाने की कोशिश करूंगा कोई खतरनाक चीज़ बन जाएगी।" भयभीत आवाज़ में वह यह सब कह गया।

"कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा और एक दूसरा कागज दिया जिसम चिड़िया बनी हुई थी- "यह चिड़िया बचपन में तुमने ही बनाई है।

वह आश्चर्य से उस कागज़ को देखे जा रहा था। वह मिर एकक जमीन पर बैठ गया और बोला- "हे भगवान!"

चित्र: राजेश सकलानी


 

 

जूते


वे शानदार किस्म के जूते थे। इस तरह के जूते शहर मैं अभी कुछ ही लोगों के पास थे। सब लोगों का कहना था कि कुछ ही दिनों में बहुत सारे लोगों के पास इस तरह के जूते हो जायेंगे। उनके दाम के बारे में अभी लोग इतना ही जानते थे कि वे बहुत ही मंहगे हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब अपनी ही दृष्टि से कहते थे कि इन जूतों की चाल बहुत ही शानदार है।

उन जूतों में वास्तव में गजब की चमक थी। उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वे शक्ल तक ढांप लेते थे और उनको पहनने वाला कोई दूसरों के समझ न आने वाली चाल चल सकता था। उनके बारे में कई तरह की अफवाहें सुनाई पड़ रही थीं। लोग अरुमंजस में थे। अक्सर अफवाहें सच सिद्ध होती थीं और सच अफवाह की तरह लगता था ।

ताजातरीन अफवाह या सच यह था कि सड़क पर चलता हुआा हर जूता उठनी हुई बहस को अपनी ओर खींच लेता है। कुछ लोगों का कहना था कि फुसलाये में आकर बहस खुद ही उनकी गोद में चली जाती है। लोग यह तो अनुभव करते थे कि हर मुद्दा  कील की तरह चुभता है। वे अपनी तकलीफ में व्यस्त रहते हैं और बहस गायव हो जाती है। कुछ बहसें गायब होने के बाद दुबारा दिखलाई देनी शुरू हुई, लेकिन वे बिल्कुल बदली हुई थीं। बहुत सारे भले लोग अपने परिचितों को इन बहसों में नहीं पड़ने देने की सलाह देने लगे। सचमुच बहसों की बन आई थी। उनके चेहरों पर मनमानी करने का भाव था। उन्होंने लोगों के भय को पहचान लिया था। लोग कहने लगे जिसका जूता उसकी बहस ।

वे जूते चलते हुए अपनी आवाज से भी पहचाने जाने लगे। उनको आते देख सूखे पत्ते जमीन के कान में फुस-फुसाने लगते। वे आपस में टकराते तो सारा शहर उसकी झंकार को सुनने के लिए अपने काम काज छोड़कर बैठ जाता। नंगे पैर लोग तो जूते की चमक से इतने प्रभावित थे कि जो भी जूता सामने मिलता उसके पीछे हो लेते थे। जूतों की अपनी-अपनी प्रतिष्ठा थी । अपने पीछे की भीड़ देखकर वे गर्व करते थे।

और शानदार चाल चलते थे।

 

 

चित्र : राजेश सकलानी

 

 पुराना कोट

जाड़े का मौसम शुरू हुआ तो उसे पिछले जाड़ों की याद आई। हमेशा ऐसा ही होता है कि किसी विशेष दिन अचानक पता लगता है कि मौसम बदल गया है और उसे पिछले वर्ष के इन्हीं दिनों की याद आती है। लड़की गुनगुनाने लगी । हल्का जाड़ा उसके बदन में उंगलियाँ चुभा रहा था। पिछले जाड़ों की याद में बह उजली धूप में स्वेटर बुनती हुई अपने को देख रही थी। यह एक सम्पूर्ण घटना थी- स्वेटर बुनती हुई लड़की पर धूप झुकी हुई और लड़की धूप को पाते हुए बदन को गर्म होता हुआ अनुभव कर रही थी।

यह स्वप्न आदमी ने तोड़ा। वह नल के पास बैठा कुल्ला कर रहा था । ठंडा पानी उसके दाँतो में लग रहा था। उसने सोचा कल से वह गुनगुने पानी से कुल्ला करेगा। तौलिये से मुँह पोंछते हुए उसने आवाज दी। लड़की भागकर आई। आदमी ने कहा उसका कोट निकाल देना । सुबह साईकिल से काम पर जाते समय ठंड लगती है।

कोट सबसे नीचे वाले लकड़ी के बक्से में था। उसके ऊपर तीन बक्से और एक टोकरी रखी थी। लड़की बारी-बारी से सबको उतारने लगी । दूसरा बक्सा अभी हाथ में ही था कि सब्जी जलने की गन्ध रसोई से आने लगी। लड़की ने हल्के से चीख कर बक्सा पटक दिया। वह रसोई की तरफ भागी। गुसलखाने से औरत की आवाज आ रही थी। सब्जी जलने की गन्ध उस तक पहुंच गई थी। उसने नल बन्द कर दिया था। लड़की ने चूल्हे से सब्जी उतारते हुए जोर से कहा कि सब्जी अधिक नहीं जली है।

 कल से नहाने के लिए पानी गर्म किया करेगी। औरत ने सोचा ।

 लड़की बड़ी उत्सुकता से बक्से में झाँक रही थी। वह बक्सा महीनों बाद खुल रहा था। उसे आशा थी कि बक्से में कुछ ऐसी चीज मिल जायेगीे जिसे वह भूल चुकी है और जिसे पाकर उसे  सुखद आश्वर्यं होगा। उसने हल्की सर्दी भी अनुभव की और उत्तेजना भी। अचानक उसके हाथ एक पुराना स्कार्फ पड़ गया । वह बिल्कुल गुजमुज हो गया था। उसने उसे फैलाकर थोड़ा तान  दिया। आसमानी स्कार्फ में मुर्झाया हुआ लाल फून अचानक खिल गया। सलवटों के बावजूद पत्तियां हरी और चमकदार लग रही थी। वह एक पुराना स्कार्फ था। उसे देखकर वह अपना  बचपन याद करने लगी ।

आदमी का कोट सबसे नीचे दबा हुआ था, नीम की पुरानी पत्तियों की तह के ऊपर। लड़की ने उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। सूखी हुई पत्तियाँ जो कोट से चिपकी हुई थी बाहर बिखर गई। लड़की ने कोट को फैलाकर देखा । कोट का कॉलर और जेवें फिर फटे हुए नजर आने लगे। पिछले वर्ष उसने बड़ी बारीकी से उन्हें सिला था। अगले जाड़ों तक वह यहां नहीं होगी। कुछ ही दिनों में उसका विवाह होने वाला है। अगले वर्ष इस कोट को वह ठीक नहीं कर पायेगी। उसे भक से रोना फूटने लगा ।

उसको गले में कुछ अनुभव हुआ । कोट कमरे की मैली दीवार पर छाया की तरह लटका हुम्रा था। लड़की ने अलमारी से सूई धागा का डिब्बा निकाला और सुई में धागा पिरोने लगी ।

 

 

 

विरोध का  एक दिन



मैं प्रार्थना में शामिल नहीं हुआ। ईश्वर कोई थानेदार तो नहीं है जो मेरे घर की छत पर लट्ठ बजायेगा। इतना अधिकार तो मैं रखता है कि चाहूं तो अपने इरादों को छिपा कर रखूं। अपने इरादों को सामने रखने का मेरा कोई इरादा नहीं है।


शहर के बीच चहल-पहल के इलाके में आज एक शक्तिशाली बम विस्फोट हुआ । लोग डरे हुए हैं और कुछ न समझ पाने की उलझन में हैं। हवा में ऐसी  अफवाह है कि कभी भी कुछ अप्रिय घटित हो सकता है। मैं डबल रोटी खरीदने मौहल्ले की दुकान में गया। चौराहे पर पुलिस वाला खड़ा था। मैंने पूछा," भाई साहब, आप बता सकते हैं कि क्या हो रहा है?"  घबराहट में उसने मेरे ही सवाल को दोहराया  "क्या हो रहा है?" उसको परेशानी से बचाने के लिए मैंने उससे अपना ध्यान हटा लिया। दुकान पर एक आदमी दूसरे से पूछ रहा है कि कुल कितनेआदमी मरे ? आप जानते हैं ?

मेरे इरादों की हद के अन्दर जो साँस भर रहा है वह बम नहीं है। वह बम से कहीं अधिक शक्तिशाली है। आदमी से बदला लेने के लिए उसे जान से मार देना सबसे घटिया तरीका है। यह उस बीमार आदमी का तरीका है जो जल्दी-जल्दी लगने वाली अपनी पेशाब को नहीं रोक सकता।

आज सभी लोग प्रार्थना में गए, सिर्फ मुझे छोड़कर। वे सिर्फ उसे ढूँढते हैं जो प्रार्थना में शरीक नहीं होते । वे शिकारियों की तरह निकल पड़ते हैं। लोग या तो डर रहे हैं  या हत्याएं कर रहे हैं।लोग इस तरह दो तरह के लोगों में बंट गये हैं। जो हत्याएं कर रहे हैं ,क्या वे भी डरे हुए है? लोगअपनी-अपनी जगहों पर अपने-अपने तरीके से हत्या कर रहे हैं। 

Thursday, August 6, 2026

संतरों के उजाले - फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि : यादवेन्द्र

 

 

  

 

 

 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति


 
 (  निर्वासन , विस्थापन और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति के विभिन्न कलात्मक रूपों से गुजरते हुए यादवेन्द्र ने इस आलेख में   फिलिस्तीन के सांस्कृतिक परिद्र्श्य पर एक लग दृष्टिकोण से नज़र डाली है।  हम इस आलेख के लिये यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं)
 
 
संतरों के उजाले : फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि 

 

हममें से कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जो भूगोल के बाहर या उस से परे हो, न ही भूगोल को लेकर छिड़े संघर्ष से हम कभी पूरी तरह से मुक्त या असंबद्ध और निरपेक्ष हो सकते हैं। संघर्ष निहायत संश्लिष्ट  और दिलचस्प होता है क्योंकि यह न सिर्फ़ सैनिकों और तोपों की बात करता है बल्कि इसको निर्मित करने में शामिल होते हैं विचार, संरचना, बिंब और कल्पना भी।
निर्वासन चीजों को दो स्तरों पर देखता है - हम पीछे क्या छोड़ आए हैं और काल और स्थान की वर्तमान स्थिति में नई जगह पर क्या है? इसलिए किसी बात या घटना को अपने एकांगीपन में नहीं देखा जा सकता बल्कि संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा।
                                                                                -     एडवर्ड सईद
 

तरबूज, संतरे, जैतून और बैंगन इन सबको एक सूत्र में बांधने वाला सामान्य कारक क्या है?

वैसे तकनीकी तौर पर तो यह सभी फल हैं। हो सकता है आपको यह सभी स्वादिष्ट भी लगते हों लेकिन फिलिस्तीनियों के लिए वे उनकी संस्कृति और जातीय पहचान के प्रतीक हैं। फिलिस्तीनी इन सबको अपनी राष्ट्रीय पहचान और अपनी धरती से जुड़ाव के तौर पर देखते हैं जहां एक दिन लौट कर जाने का उनका संकल्प उनके मन मस्तिष्क  में पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी बसा हुआ है। यही कारण है कि यह सब मामूली लगने वाली चीजें  फिलिस्तीनी प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में भी देखी जाती  हैं। यहाँ इस आलेख में हम फिलिस्तीनी संतरों की बात करेंगे। 

फिलिस्तीन में संतरों की बागवानी का इतिहास लिखने वाले प्रो मुस्तफ़ा काभा  ने लिखा है कि 1920 के दशक में फिलिस्तीनी प्रेस ने अपने नागरिकों के सामने यह सवाल बड़ी प्रमुखता के साथ रखा था कि आज़ादी मिलने पर वे अपना राष्ट्रीय ध्वज किस तरह का बनाना चाहते हैं ? सबसे ज्यादा लोगों ने संतरे के रंग का झंडा सुझाया हालाँकि इतिहास ने अपनी तरह से करवटें बदलीं और स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना का स्वप्न धूमिल पड़ गया .लेकिन आज भी दुनिया भर में रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए संतरे उनकी मातृभूमि के सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतीक हैं। 

फिलिस्तीन के राष्ट्र कवि माने जाने वाले महमूद दरवेश ने अपनी एक कविता में लिखा है :

सूरज तुम्हारे दिल को 
संतरे के उजाले से 
भर देता है।
              
 
 
 
 
मैं जाफा के संतरों और शरणार्थियो की स्मृतियों की सौगंध खाकर ऐलान करता हूं कि हम न उन्हें बख्शेंगे जिन्होंने हमारी धरती का सौदा किया है, न उन्हें चैन से रहने देंगे जिन्होंने उसे खरीदा।
               जॉर्ज हबाश 
(पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ़ फिलिस्तीन  के संस्थापक)


विस्थापित होने के बाद पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी फिलिस्तीनी शरणार्थी यह कभी नहीं भूले कि इजराइलियों ने उनके गांव कस्बों पर कब्जा करते ही सबसे पहले जो काम किया वह था जैतून और संतरे के बागों को तहस नहस कर देना जिससे वे यह दावा कभी न कर सके कि संतरे वे इस धरती पर सदियों से उगाते आए हैं और इजराइली तो बहुत बाद में दूसरे देशों से वहां पहुंचे हैं - यह धरती मूलतः फिलिस्तीनियों की ही है।संतरे के बागों को उजाड़ना इजराइलियों का एक सैद्धांतिक जेहाद था - कि न इस धरती पर फिलिस्तीनी रहते थे न उनके बाग बगीचों का कोई अस्तित्व है।

फिलिस्तीनी मूल की कवि,कलाकार,फ़िल्म  निर्देशक  एनीमेरी ज़ाकिर की फ़िल्म साल्ट ऑफ दिस सी में अमेरिका में पली बढ़ी और रह रही सोरैया अमेरिका से फिलिस्तीन लौटती है पिता की मृत्यु के बाद , 1948 में दादा को सबकुछ छोड़ छाड़ कर भागना पड़ा था। रामल्ला में रहने वाले नए बने अपने दोस्त इमाद के साथ बात करते हुए अमेरिका छोड़कर फिलिस्तीन आकर रहने का इरादा करने वाली सुरैया कहती है कि  उसके दादा हमेशा फिलिस्तीन की धरती की बातें किया करते थे। उनकी सुनाई ढेर सारी कहानियों में इतना फिलिस्तीन था कि मुझे लगा कि मैं एक दिन यहां आकर जरूर रहूंगी। उसे दादा की सुनाई यहां पैदा होने वाले संतरे की कहानियां याद हैं। इमाद को भी याद आता है कि उसने जीवन में जितने भी संतरे खाए हैं उनमें फिलिस्तीन के संतरों का स्वाद सबसे अलग था। सुरैया के लिए फिलिस्तीन जाकर नया  जीवन शुरू करना उसका आदर्श था... इस तरह वह अपने दादा की स्मृतियों के भी ज्यादा करीब बनी रहेगी।और  संतरा उसके लिए फिलिस्तीन की संस्कृति का प्रतीक है।
यही कारण है कि वह अपने जन्म स्थान पर पहुंचकर पुराने घर को देखती है तो सबसे पहला  काम वहां के बाग में जाकर प्यार से संतरे निहारने और तोड़ने का  करती है। यह काम सुरैया को उसके पारंपरिक जीवन के साथ जोड़ता है। उसे लगता है कि वह जब यहां आकर  रहने लगेगी तो अपने लोगों के बीच रह कर धीरे-धीरे अपनी जड़ों के साथ उसका रिश्ता ज्यादा सार्थक और सघन रूप में जुड़ जाएगा।

उसके दादा को 1948 में जब जाफा छोड़कर भागने की नौबत आई थी तो ब्रिटिश पेलिस्टीनियन बैंक में उनके पैसे जमा थे। सुरैया अपने दादा के उन पैसों को वापस लेना चाहती है जो राशि अब बढ़ कर 15000 डॉलर तक पहुंच गई है। जब बैंक  पैसे इस आधार पर वापस देने से मना कर देता है कि उनके रिकॉर्ड में उसके दादा के नाम का अब कोई ग्राहक नहीं है तो सुरैया उस बैंक को लूटने की योजना (निर्देशक का काल्पनिक हस्तक्षेप ) बनाती है। वह अपने फिलिस्तीनी  दोस्त इमाद के साथ मिलकर बैंक लूट भी लेती है (जब इजराइलियों ने फिलिस्तीनियों के माल असबाब बाग घर और जमीन जायदाद सब लूट लिए तो बदले में उनका बैंक लूटना कोई गुनाह नहीं है ,यह प्रतिरोध है)

इमाद - तुम यह बताओ यहां ऐसा क्या रखा है जो तुम्हें खींच लाया?
सुरैया - हमारा यहां कुछ था जो पीछे छूट गया... यहां हमारी जिंदगी थी। हमारा जो कुछ भी था वह इन्होंने लूट लिया।

सुरैया के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि उसके दादा का बनवाया अपना घर अभी एक इजराइली स्त्री के हवाले है जिसने रहम  करके उन्हें रात भर रुकने का नेता दिया है। 
सुरैया - मैं यह तय करुंगी कि तुम यहां इस घर में रहोगी या नहीं। ये खिड़कियां, ये दीवारें यह सब हमारे घरों की हैं... हमारे घरों से चुराई हुई हैं।
               
 सुरैया इमाद के साथ मिलकर अपने लिए अल दवाइमा में अपने सपने का घर बनाना चाहती  है ... 1948 के कत्लेआम में पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया अल दवाइमा अब भी उजाड़ पड़ा हुआ है। निर्देशन में बड़ी वैचारिक कल्पनाशीलता के साथ यहां अतीत और भविष्य को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

फिल्म में संतरों का उपयोग कई स्तरों पर कुछ कहने की कोशिश करता है - सबसे पहले तो यह कि अपने नए घर और देश को सुरैया उम्मीद भरी नज़रों से देखती है। दूसरे स्तर पर देखें तो संतरे फिलिस्तीन पर इजराइल के कब्जे के विरुद्ध एक रूपक के तौर पर दिखाई देते हैं। फिलिस्तीन सहित अनेक अरबी फिल्मकार अपनी फिल्मों में संतरों को प्रतिरोध के उस प्रतीक के तौर पर देखते और दिखाते हैं जिस पर राजनैतिक एजेंडा का प्रचार कह कर प्रतिबंध लगाना मुश्किल है।

यह फ़िल्म सामूहिक इतिहास के पुनर्लेखन आंदोलन का एक हिस्सा है। यह फिलिस्तीनी इतिहास के उस पक्ष को उजागर करने की कोशिश करती है जिसपर दुनिया भर का मेनस्ट्रीम मीडिया आमतौर पर चुप्पी साधे रहता है।
यह निरा संयोग नहीं है कि फ़िल्म अक्टूबर 1948 के अल दवाइमा कत्लेआम की स्मृति को समर्पित है।

फिलिस्तीन के संतरों पर मुस्तफा काभा और नहुम कार्लिंस्की की बेहद चार्चित किताब है द लॉस्ट ऑर्चर्ड: द पेलेस्टीनियन अरब साइट्रस इंडस्ट्री,1850-1949 जिसमें वे दिलचस्प बात उद्घाटित करते हैं कि  फिलिस्तीन के सर्वाधिक चर्चित और प्रतिनिधि कवि महमूद दरवेश की कविताओं में संतरों का ज़िक्र 67 बार आता है। 
अपनी शोध आधारित खिताब में काभा और कार्लिंस्की बताते हैं कि 1948 के पहले फिलिस्तीन में संतरे के ज्यादातर बगीचे फिलिस्तीनियों के थे लेकिन यहूदियों की आवक के कारण दोनों के बीच व्यावसायिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती चली गई। 1948 के बाद जब बड़ी संख्या में यहूदियों ने फिलिस्तीनियों को उनके धरती से खदेड़ कर निर्वासन में भेज दिया तो बड़े जोर शोर से यह नैरेटिव चलाया गया कि यहां की धरती पर फिलिस्तीनी कभी थे ही नहीं, जो कुछ भी हरा भरा इस पर दिख रहा है वह बाहर से आकर बस गए यहूदी सेटलर के पराक्रम के कारण है। देखते-देखते जिन संतरों को दुनिया भर में फिलिस्तीनी संतरा कहा जाता था उसे इजराइली संतरा कह के बेचा जाने लगा।

किताब में काभा लिखते हैं: मैं अपने पिता के साथ पहली बार जाफा 8 साल की उम्र में गया था, उस यात्रा में मुझे बहुत निराशा हुई थी क्योंकि उस जगह को लेकर मेरे मन में जो कल्पनाएं थीं चित्र थे वास्तविकता उससे बहुत मिलती-जुलती नहीं लगी। इस बारे में जब मैंने अपने पिता से पूछा तो उनके जवाब भी बहुत संतुष्ट करने वाले नहीं थे, वह बहुत कम शब्दों में और अस्पष्ट ढंग से उनका जवाब दे देते थे जैसे मेरे सवालों को टाल रहे हों।इसके 11 साल बाद हम फिर से जाफ़ा गए। इस बार मुझे पिता ज्यादा खुले हुए और साफ-साफ बातें करते हुए दिखाई दिए ,इससे पहले मैंने उनको कभी इस तरह की स्पष्टवादिता  के साथ नहीं देखा था। मुझे मई 1948 के उस दिन के उनके बताए विवरण ने बहुत छुआ जो यहूदियों के आक्रमण के बाद वहां उनका अंतिम दिन था। उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत दुख निराशा और पीड़ा हुई। उसके बाद में जब कभी भी जाफ़ा जाता हूं मेरा मन तरल भावनाओं के कारण बहुत भारी हो जाता है और मन ही मन में उन दिनों की तस्वीर बनाने लगता हूं जब मेरे परिवार को अचानक सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा होगा - अपनों की लाशों को, अपने बागों को, बाजार और यहां वहां की हवा में तैरते संतरों के फूलों की खुशबू को भी।

वे आगे लिखते हैं कि आज के दौर में जाफ़ा और फिलिस्तीनी के अन्य इलाकों के पुराने संतरे के बागानों के बारे में जानकारी एकत्र कर पाना बहुत कठिन है - आधी अधूरी स्मृतियां, अभिलेखागारों के अंदर धूल भरे दस्तावेज, पुराने उखड़े हुए पेड़ ही मिलेंगे और मिलेंगे भी तो नए मालिकों के बागानों में लगे नई नई नस्लों के नए पेड़। जो इलाका पहले अपनी उर्वर भूमि, कुओं और तालाबों के लिए जाना जाता था उस पर बुलडोजर चला कर सारे बागान नष्ट कर डाले गए और सीमेंट की नई बुनियाद डाल कर ऊंचे अपार्टमेंट निर्मित कर पूरा नक्शा बदल डाला गया। ऐसे में पुरानी खुशबू को फिर से प्राप्त कर लेने की क्या ही उम्मीद की जा सकती है।

मशहूर फिलिस्तीनी पत्रकार लेखक कवि घसन कनाफानी की बहुचर्चित कहानी है ' द लैंड ऑफ़ सैड ऑरेंजेज़' जिसमें  संतरों को फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद का रूपक बना कर प्रस्तुत किया गया है।कनाफानी मानते थे कि यह संतरे उन्हें उनकी धरती, स्मृति, उनके छोड़े हुए घर परिवार के साथ जोड़े रखते  हैं जिसमें एक दिन अपने गांव घर देश लौट कर जाने का अधिकार और संकल्प निहित है।

कहानी 1948 के नक्बा के दौरान दो बच्चों  के बीच की बातचीत से शुरू होती है। वे देखते हैं कि आस पड़ोस के परिवार के लोगों को अपने बहुत जतन से पाले पोसे और बड़े किए गए संतरे के पेड़ों को छोड़कर आनन फ़ानन में कहीं  दूर जाना पड़ रहा है। सब लोग बड़ी सी फौजी गाड़ी  में ठूँस ठूँस कर लादे  जा रहे हैं , बच्चों को उसमें बैठते हुए यह लगता है कि वे सब घर परिवार और पड़ोसियों के साथ कहीं सैर सपाटे पर  जा रहे हैं। अपनी  इस यात्रा में वे देखते हैं कि सड़क के किनारे किनारे उनके साथ संतरे के पेड़ भी चल रहे हैं - दर असल जहाँ जहाँ वे जाते हैं हर जगह संतरे के पेड़ नज़र  आते हैं तो उनके बाल मन को  लगता है कि वे भी सबके साथ साथ चल रहे हैं। 

इस संवाद के बाद यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि जहां कहीं भी फिलिस्तीनी जाते हैं वहां उनके साथ-साथ चलते हुए संतरे के पेड़ क्यों पहुंच जाते हैं।यह भी समझ में आता है कि जब फिलिस्तीनी औरतें बाहर के इलाकों में पहुँच कर  संतरे  खरीदती हैं तो इतनी कातर क्यों हो जाती हैं कि उन्हें रुलाई  आने लगती है? और पिता की नजर जैसे ही किसी संतरे पर पड़ती है तो वे बच्चों की तरह फफक फफक कर  रोने क्यों लगते हैं? 
कहानी में जब पूरा परिवार अपने संतरों के पेड़ों से आच्छादित जगह को छोड़कर जान बचाने को भागने लगता है तो कहानी का वाचक बच्चा अचानक सयाना  और समझदार हो जाता है और स्वयं दहाड़ें मार कर रोने लगता है। वह कोई मामूली जगह नहीं थी बल्कि सभी फिलिस्तीनियों की सामूहिक विरासत थी जिसे छोड़कर उन्हें भागना पड़ा।
लेखक इस कहानी में कहता है कि वह सभी संतरे के पेड़ जो दुनिया भर से आकर उनकी धरती पर बस गए यहूदियों   को सौंप कर पिता को भागना पड़ा उन पेड़ों की छवि उनकी दो आंखों में साफ-साफ अंकित है। अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से हर एक पौधा जो उन्होंने खरीदा, रोपा और उसे पाल पोस कर बड़ा किया उनकी छवि उनके चेहरे पर चस्पां हैं... जब पुलिस पोस्ट पर तैनात ऑफिसर के सामने उनके सब्र का बांध टूट गया तो आंसुओं की धार में एक एक पेड़ का प्रतिबिंब साफ़ साफ़ दिख रहा था।
 
मश्हूर  फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति
 
 
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(अपनी धरती से उजाड़ कर जब पूरे गांव को इजराइली अपनी फौजी गाड़ियों से लेबनान के शरणार्थी कैंपों में छोड़ने जा रहे थे तो गाड़ियों का यह काफिला बीच रास्ते में थोड़ी देर के लिए रुका।)
"सामानों के बीच किसी तरह दुबक कर बैठी औरतें गाड़ी से उतरीं और सड़क किनारे बैठ कर एक संतरा बेचने वाले के पास पहुंचीं। जब वे संतरे लेकर लौट रही थीं तो हमें दूर बैठे भी उनके सुबकने की आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थी। मुझे तब पहली बार एहसास हुआ कि संतरे कितने प्यारे और दिल के करीब हैं और ये खूब बड़े सुंदर चमकते हुए संतरे कोई मामूली और कहीं भी मिल जाने वाली आम फ़हम चीज़ नहीं बल्कि मन और स्मृति में  खूब संजो कर रखने की चीज़ हैं। तुम्हारे पिता ड्राइवर के पीछे-पीछे गाड़ी से नीचे उतरे, एक संतरे को बहुत प्यार से अपने हाथ में लिया और देर तक किसी अनमोल असबाब की तरह ख़ामोशी से निहारते रहे... और देखते-देखते किसी बच्चे की तरह फफक फफक कर रो पड़े जैसे उनका अपने ऊपर कोई वश रहा ही नहीं।"

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फिलिस्तीनी लेखक उपन्यासकार हुजामा हबायेब अपने एक इंटरव्यू में स्मृतियों को लेकर दिलचस्प और भावुक कर देने वाली चर्चा करती हैं:

मेरे किए लेखन सामूहिक स्मृतियों की पुनर्रचना कर के फिलिस्तीनी वृत्तांत/आख्यान (नैरेटिव) को सुरक्षित बचाए रखने का एक जरिया है - इसमें छवियों, ध्वनियों, गंधों, बहुरंगी जीवन और आख्यानों को नॉस्टल्जिक भाव से साकार रूप देना शामिल है। यह प्यार और तड़प के अनवरत चलते चक्र का विस्तारित रूप है। अपनी बात समझाने के लिए मैं एक नितांत निजी अनुभव आपके साथ साझा कर रही हूँ ::

जब कभी भी मैं कोई संतरा छीलती हूँ  मुझे अपने पिता की याद आती है, वैसे उन को गुजरे हुए 5 साल से ज्यादा हो गए ।उन्हें संतरे बहुत प्रिय थे - उनका जीवन बगैर रोटी के चल सकता था लेकिन संतरे के बगैर चल जाए यह बिल्कुल मुमकिन नहीं। जब कभी मैं उनसे मिलने जाती थी वह मेरे लिए संतरे की कोई न कोई नई डिश बनाकर जरूर खिलाते थे। अब जब  कभी संतरे की सुगंध मेरी नाक में जाती है तो मुझे एकदम से सबसे पहले पिता के बचपन की याद आती है हालांकि मुझे उस समय का कुछ भी पता नहीं - न तो मैंने उस उम्र में उन्हें देखा था न उस समय की कोई फोटो मेरे पास है। सच्चाई तो यह है कि मैंने उन्हें बड़ी उम्र में ही पहली और अंतिम बार देखा था ।
1948 के नक्बा के दौरान मेरे पिता के परिवार को जाफ़ा के दक्षिण पूर्व के गांव से बेदखल कर भगा दिया गया था,तब उनकी उम्र मुश्किल से 7 साल की थी। लेकिन बचपन में जिस हादसे से उनका सामना हुआ था वह जीवन के अंतिम समय तक उनकी स्मृति में पूरी तरह से जिंदा रहा। जब वह घर छोड़कर भागे तो चलते चलते हाथ में अपने बगीचे के पेड़ का एक संतरा ले जाना नहीं भूले- एक हाथ में खूब कसकर पकड़ा  हुआ संतरा और दूसरे हाथ से अपनी मां के कपड़े ।
वे फिलिस्तीनी शरणार्थियों की पहली खेप में शामिल थे।यह कैसा विचित्र संयोग है कि घर बार से उजड़ कर विस्थापन की अनिश्चित दुनिया में दर-दर भटकने वाले मेरे पिता की नाक में इस सुस्वादु फल की मादक गंध जीवन भर बसी रही। वह फिलिस्तीन की आखिरी गंध थी जो उनके साथ साथ चलती रही। वे जीवन भर उस गंध को सजीव साकार करने और अपने साथ जोड़े रखने के लिए हर संभव यत्न करते रहे। जब भी किसी संतरे की गंध मेरे आस पास तैरती हुई आती है, उसके साथ ही मैं मन की आंखों से उस छोटे बच्चे को देखने लगती हूँ  जो  घर बार छोड़ कर भागते हुए भी अपने बाग का संतरा साथ ले जाना नहीं भूला। संतरे की उस गंध में मुझे फिलिस्तीन की गंध आती है। मेरे मन में प्यार और तड़प का यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
किसी कृति के लिखने के दौरान सिर्फ़ शब्द मेरे दिमाग़ में नहीं होते। मैं घटनाओं को देखती हूँ , मैं संवादों को सुनती हूँ। मैं  उनकी धड़कनों को महसूस करती हूँ ।
newarab.com (05082020) से साभार

1948 के हादसे में आनन फानन में अपना घर बार छोड़कर शरणार्थी बनने को मजबूर नुहा बैटशॉ फिलिस्तीन की एक प्रतिष्ठित कलाकार और ऐतिहासिक कला संग्रहकर्ता मानी जाती हैं। 12 साल की उम्र में पेश आए हादसे ने उनके ऊपर इतना असर डाला कि उनकी याददाश्त खो गई। उनसे उनके लिखे विवरणों और बातचीत के आधार पर तैयार की गई सामग्री का जब वास्तविक संदर्भों से मिलान किया गया तो आश्चर्यजनक रूप से दोनों में पर्याप्त समानता पाई गई। उन्होंने अम्मान में रहते हुए अपने जीवन के ब्योरों को एकत्र कर एक किताब में संकलित किया जिसका शीर्षक है: "ए नन विदाउट ए मोनेस्ट्री"
यहाँ प्रस्तुत है उनका एक संस्मरण :
"एक बार की बात है मैं रोम से सोरंटो की यात्रा कर रही थी। पूर्व दिशा से समुद्री हवा आ रही थी जिसमें मेडिटरेनियन सागर , जाफा पोर्ट और संतरों की गंध समाई हुई थी। मैंने गाड़ी का शीशा खोला तो मेरी नाक में संतरों के फूलों की मादक गंध भर गई। उसके बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ- बस इतना जानती हूँ  कि मैंने  खुद को आपे से बाहर होकर सुबकता हुआ पाया। मुझे ऐसा लगा कि अपने गांव घर को छोड़कर आते समय दहशत की जिन अनुभूतियों से मैं रू ब रू हुई थी वह अचानक फिर से जीवित हो गईं । सबसे ज्यादा ताज़्जुब की बात तो यह है कि इस गंध ने मेरी मरणासन्न स्मृतियों को फिर से जिंदा कर दिया.....
जो हमारा बाग था उसमें मेरे पिता ने एक बड़ी सी टेबल रखी हुई थी। वह गिनती से संतरे और तरबूज खरीदते थे उसके बाद थैलों में भरकर गधे की पीठ पर दोनों तरफ लटका कर बेचने ले जाते थे। तरबूजों को हम अपनी खाट के नीचे ठंडा होने के लिए रखते थे और संतरों को बाहर ही टेबल पर छोड़ देते थे। स्कूल से लौटने के बाद हम संतरों को निचोड़ कर अपने पीने के लिए रस निकालते।
संतरे की एक प्रजाति लंबी होती थी जिससे हम लैंप बनाया करते। पहले उसको ऊपर से काटते, उसके बाद अंदर से गूदा निकाल कर फेंक देते ...उसकी धड़ पर छोटे-छोटे छेद बनाते और अंदर मोमबत्ती रखकर जला देते। उन छेदों से छन कर बाहर आती हुई रोशनी कमरे को रोशन कर  पढ़ाई में हमारी मदद करती।"
वे अपनी बातचीत में जाफ़ा में बिताए दिनों  को बहुत शिद्दत से याद करतीं और उनमें बार-बार संतरों का ज़िक्र होता - ऐसा लगता जैसे संतरों की गंध उनके शरीर में अंतरात्मा तक समाई हुई है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों के फोटोग्राफ बहुत संभाल कर रखे थे जिसमें संतरे प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
रोम से सोरंटो की यात्रा के दौरान जब उनकी स्मृति धीरे-धीरे लौटने लगी तो अपनी पीड़ा को दर्ज़ करने की गरज़ से उन्होंने उन्हें डायरी के पन्नों में लिखना शुरू किया जो बाद में किताब के रूप में छपकर सामने आया।बाद में उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और बीबीसी और जॉर्डन टीवी सहित अनेक मीडिया समूहों में काम किया और बाद में अम्मान जाकर बस गईं।
फिलिस्तीनी म्यूजियम में उनके उपलब्ध दस्तावेज और संग्रह प्रमुखता से प्रदर्शित  है।
(http://raseef22.net/english/  में प्रस्तुत सामग्री के आधार पर)

संतरे का उपयोग अपनी पेंटिंग में जब कोई बड़ा कलाकार करता है तो वह राष्ट्रीय और राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर होता है और इस बारे में बात करते हुए लोग मानते हैं कि जाफा के संतरे जो ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी संतरों के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर थे, 1948 के कब्जों के बाद से इजराइल ने बड़े जोर शोर से उन संतरों को इजराइली उत्पाद  कह के बेचना शुरू किया। विजुअल आर्ट में संतरों  की उपस्थिति ऐसे इजराइली नैरेटिव का प्रतिकार है और बडे़ नामचीन कलाकार इन कृतियों के माध्यम से अपने फिलिस्तीन देश पर फिर से दावा ठोंकते हैं, उसके साथ अपना रिश्ता दर्ज करते हैं। 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर ने जाफा के संतरों को लेकर अनेक पेंटिंग बनाई है लेकिन उनकी "जाफ़ा" (1979) इस विषय पर बनाई गई सर्वाधिक चर्चित कलाकृति है जिसमें पारंपरिक परिधान पहने एक सुंदर फिलिस्तीनी स्त्री संतरों से भरी टोकरी लिए हुए है, पृष्ठभूमि में अनेक अन्य स्त्रियां बाग के पेड़ों से संतरे तोड़ रही हैं। मंसूर अपने बचपन के दिनों में देखे संतरे के बगीचों को याद करते हैं और इन कलाकृतियों के माध्यम से दर्शकों को अपने प्यारे समृद्ध फिलिस्तीन के खूबसूरत और शांतिप्रिय लोगों को दिखाना चाहते हैं।

वॉशिंगटन में फिलिस्तीन म्यूज़ियम शुरू करने वाले अहमद हमीदत ने ' री इमेजिनिंग ए फ्यूचर' श्रृंखला में जाफ़ा के संतरों को केन्द्र में रख कर अनेक पेंटिंग बनाई है। इन कलाकृतियों में वे उन सुनहरे दिनों को याद कर रहे हैं जब भविष्य में एक बार फिर से फिलिस्तीन की धरती पर फिलिस्तीनी काबिज़ होंगे और अपने संतरों के निर्यात से पूरी दुनिया को लुभाएंगे। उनका मानना है कि उनके माध्यम से वे फिलिस्तीनियों के अपनी धरती पर लौटने की संकल्प रेखांकित कर रहे हैं और उन्होने संतरे को फिलिस्तीनी पहचान और स्मृतिलोक के रूपक के तौर पर देखा है।

यादवेन्द्र 
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक
सीएसआईआर - सीबीआरआई , रूड़की

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