जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) का हिमालय खोज अभियान
आज हिमालय को हम जैसे जानते, देखते हैं। क्या वह 170 साल पहले वैसा ही था ? डेढ़ सदी से ज्यादा के वक्त में हिंदूकुश से लेकर सिक्किम तक उसमें क्या बदलाव आए ? भारत में म्यूनिख के 'अल्पाइन्स म्यूजियम' की दुर्लभ पेंटिंग्स यही कह रही हैं। जब कैमरा नहीं था, तब जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) ने हिमालय की अपने यात्रा अभियान के दौरान उसे कैसे रंगों में उतारा?
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के सुझाव पर, इन भाइयों को भारत और मध्य एशिया के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए भेजा गया था। उन्होंने हिमालय, काराकोरम और कुनलुन पर्वत श्रृंखलाओं का व्यापक दौरा किया।
इनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों का नक्शा तैयार करना था। अभियान के दौरान एडोल्फ श्लागिंटवाईट अकेले काशगर (वर्तमान चीन) चले गए थे। वहां के स्थानीय शासक 'वली खान' ने उन पर जासूसी का संदेह किया और अगस्त 1857 में उनकी हत्या कर दी गई। काफी समय बाद उनके अवशेष और डायरी बरामद हुई थी। ये वैज्ञानिक होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार भी थे। उनके द्वारा बनाए गए वाटरकलर पेंटिंग्स आज भी 19वीं सदी के हिमालय और तिब्बत के सबसे सटीक दृश्य दस्तावेजों में से एक माने जाते हैं।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में शुक्रवार, 1 मई, 2026 से शुरू प्रदर्शनी उनके इसी काम के दौरान बनाए हिमालय पर्वत,पहाड़ों,पुल,रास्तों व मंदिरों के चित्रों को दिखाती है। दून पुस्तकालय के तृतीय तल की दीर्घा में यह चित्र प्रदर्शनी 8 मई शाम साढ़े छह बजे तक चलेगी।
करीब पौने दो सौ साल पहले के तीनों जर्मन भाईयों के ये चित्र जम्मू कश्मीर से लेकर बदरीनाथ, केदार नाथ ,मिलम,सुन्दरढूंगा, नैनीताल और पूरब में दार्जिलिंग तक के तत्कालीन इतिहास से सीधे साक्षात्कार कराते हैं । हर्मन और रॉबर्ट को कुनलुन पर्वतमाला को पार करने वाले पहले यूरोपीय खोजकर्ता माना जाता है।
इसके पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में इनका प्रदर्शन हो चुका है। दूसरे चरण में 1-8 मई, 2026 तक दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, देहरादून के बाद यह प्रदर्शनी सीआरएसटी कॉलेज व उत्तराखंड एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के सहयोग से नैनीताल में लगेगी। प्रो. शेखर पाठक की खास पहल से हिमालय के यह चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकल कर आम लोगों के बीच अवलोकन के लिए पहुंचे हैं। इसमें इसे म्यूनिख संग्रहालय सहित श्लांगिटवाइट के पारिवारिक सदस्यों के साथ-साथ प्रो. हरमन क्रुत्जमैन , मैडम स्टेफनी क्लेइट, स्टीफन रिट्टर आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा
हिमालय के इन दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी की विचार पहाड़ संस्था के प्रो. शेखर पाठक को सितंबर 2015 में तब आया जब उन्होंने म्यूनिख में पहली बार कला इतिहासकार स्टेफ़नी क्लेइट के सौजन्य से म्यूनिख स्थित 'स्टैटलिचे ग्राफ़िशे सैम्लुंग' में उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के नैनीताल और कुमाऊं के आसपास के क्षेत्रों के उच्च गुणवत्ता और विस्तृत रेखाचित्र देखे। ये चित्र श्लागिंटवेट परिवार के वारिसों ने म्यूनिख के अल्पाइन संग्रहालय को दान किए थे। प्रो. पाठक एक सेमिनार के वास्ते म्यूनिख पहुंचे थे। सेमिनार में श्लागिंटवेट के अभियानों के दौरान उनके द्वारा एकत्रित कलाकृतियों, मुखौटों, नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तुओं, मानचित्रों, मापों और अभिलेखों की एक बड़ी प्रदर्शनी भी शामिल थी।
दून लाइब्रेरी में इस मौके पर प्रो. हरमन क्रुत्जमैन ने इन चित्रों से जुड़ी पूरी कहानी बताई और बताया कि किस तरह ये चित्र आज के जलवायु परिवर्तन, भू विज्ञान व समाज के अध्ययन के काम आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत से लौटने के बाद, हर्मन और रॉबर्ट ने अपने शोध को "रिजल्ट्स ऑफ एक साइंटिफिक मिशन टू इंडिया एंड हाई एशिया " नामक विशाल ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया। इस कार्य में एटलस, पैनोरमिक चित्र और विभिन्न जनजातियों के शारीरिक माप (नृवंशीय डाटा) शामिल थे।
कार्यक्रम में प्रो. शेखर पाठक ने यूरोपीय़ देशों के तिब्बत व हिमालय से जुड़े अभियानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हालांकि ये खोज अभियान जासूसी अभियान भी थे पर श्लागिंटवाईट भाइयों ने उस दौर में वैज्ञानिक खोज की नींव रखी जब संचार और यात्रा के साधन बेहद सीमित और खतरनाक थे। उनके द्वारा किया गया कार्य आज भी दक्षिण एशियाई भूगोल और नृविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ है
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के संस्थापक प्रो.बी.के जोशी ने कार्यक्रम में अतिथि वक्ताओं और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। कार्यक्रम के पूर्व में केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने प्रदर्शनी के चित्रों पर संक्षिप्त प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक व सांस्कृतिक अध्येता डॉ. लोकेश ओहरी ने किया। प्रदर्शनी के शुभारंभ में लोक कलाकार रामचरण जुयाल ने मोंछंग बजाकर किया।
इस अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड, नृप सिंह नपलच्याल, सुरेन्द्र सिंह पांगती, सर्वे ऑफ इण्डिया के एडिशनल सर्वैयर संदीप श्रीवास्तव, डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. डीके पांडे , डॉ. लालता प्रसाद, राजेश, सकलानी, सुंदर सिंह बिष्ट, चन्दन सिंह डांगी, उषा नौडियाल जयदीप रावत, अर्पणा वर्धन, डॉ. मालविका चौहान, डॉ.बीपी मैठाणी, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ.संजय चोपड़ा, डॉ. रवि चोपड़ा. निकोलस हॉफलैण्ड, योगेश धस्माना, चन्द्रशेखर तिवारी, नवीन नैथानी, बसन्ती पाठक, जेपी मैठाणी साहित कई, सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक,इतिहास विद, संस्कृतिकर्मी, लेखक,साहित्यकार सहित कई प्रबुद्घ जन शामिल रहे।
(अरविंद शेखर की रपट)
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