Thursday, April 23, 2026

उषा नौडियाल के कविता अनुवाद 
 
उषा नौडियाल ने विश्व की कुछ शानदार कविताओं का अनुवाद किया है। इसे हम पहली बार यहां पेश कर रहे हैं।

बीते कुछ वर्षों में उषा नौडियाल ने कई महत्वपूर्ण विश्वकृतियों को अनुवाद के जरिए हिंदी समाज के सामने रखा है। हाल में अमेरिकी रेड इंडियनों के आजादी के संघर्ष पर हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास लास्ट फ्रंटियर 'आखिरी मोर्चा' शीर्षक से गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके खाते में हॉवर्ड फास्ट का अमेरिका के मैकार्थीवाद के आतंक पर आधारित उपन्यास 'सिलास टिम्बरमैन', प्रसिद्ध गायक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता पॉल रॉबसन के एक संगीत कार्यक्रम के दौरान नस्लवादी व फासीवादियों द्वारा भड़काए गए दंगों पर आधारित हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास 'पीकस्किल अमरीका' ,नाजी जर्मनी के हालात पर हॉवर्ड फास्ट के उपन्यास 'द ब्रिज बिल्डर्स स्टोरी' 'पुल बनाने वाले की कहानी' शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। गुरिल्ला फिल्म निर्देशक मिगेल लिटिन पर गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की पुस्तक 'चिली में गुप्तवास' (क्लैंडस्टाइन इन चिली)  और चीनी कथात्मक लेख संग्रह 'बीज और अन्य कहानियाँ' का भी उन्होंने अनुवाद किया है। उषा नौडियाल ने विश्व के चार क्लासिक उपन्यासों को किशोरों के लिए पुनर्प्रस्तुत किया है। एचजी वेल्स  का 'दुनिया की जंग' (The War of The Worlds) , विक्टर ह्यूगो का 'नात्रेदम का कुबड़ा' (The Hunchback of Notre Dame), चार्ल्स डिकेन्स का उपन्यास 'डेविड कॉपर फील्ड' और मिगुएल डी सर्वांतीस का उपन्यास, 'डॉन क्विकजोट' (Don Quixote)। कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर से गढ़वाल विवि से उन्होंने अंग्रेजी में परास्नातक व गढ़वाल विवि से हिंदी में एमए व बीएड किया है।  







बंदी (असीर)

-फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद


फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद (1934-1967) :  ईरान की एक नारीवादी सबसे प्रभावशाली आधुनिक कवयित्री और फ़िल्म निर्देशक, जिन्हें उनकी विद्रोही और बेबाक तेवरों के लिए जाना जाता है।

 

मैं तुम्हें चाहती हूँ, पर जानती हूँ कि कभी भी

तुम्हें दिल भर कर गले नहीं लगा सकूँगी

तुम हो चमकते उजले आसमान

और मैं, पिंजरे के एक कोने में कैद एक चिड़िया।


ठंडी और काली सलाख़ों के पीछे से

देखती हूँ तुम्हें, पछतावे भरी उदास नजरों से

सोचती हूँ, काश कोई हाथ बढ़े मेरी ओर

और अचानक मैं पंख फैला दूँ

आने को तुम्हारी ओर


सोचती हूँ, कभी तो कोई पल होगा

लापरवाही का,

जब नजर बचाकर उड़ जाऊँ मैं इस सुनसान जेल से

हँसू अपने जेलर की आँखों में देखते हुए और

एक नया जीवन शुरू करूँ तुम्हारे साथ

ये सब सोचती हूँ मैं, पर जानती हूँ

कि नहीं कर सकती हिम्मत

छोड़ने की इस कैदखाने को

जेलर अगर चाहे भी मुझे आजाद करना

पर अब न साँसे बची हैं, न ताजी हवा,

मेरे उड़ने के लिए।


सलाख़ों के पीछे से हर उजली सुबह

मेरे चेहरे पर पड़ती है एक बच्चे कि मुस्कान

ख़ुशी का गीत गुनगुनाती हूँ मैं, जब

उसके होंठ आते हैं चुम्बन के लिए मेरी ओर

ओ आसमान, अगर एक दिन मैं चाहूँ उड़ना

इस ख़ामोश कैदखाने से

तो रोते हुए बच्चे की आँखों से क्या कहूँ?

मुझे भूल जाओ,

क्योंकि मैं एक कैदी चिड़िया हूँ।


मैं वो चिराग हूँ जो अपने दिल की

जलती हुई लौ से, रोशन करता है खंडहरों को।

अगर मैं खामोश अँधेरा चुनना चाहूँ

तो बरबाद कर दूँगी घरौंदें को।

 

 

मेरी फिक्र

— मैरी ओलिवर


बहुत फिक्रमंद थी मैं, क्या फलेगा-फूलेगा बगीचा,

क्या नदी बहेगी सही छोर में

क्या धरती उसी तरह घूमेगी,

जैसा पढ़ाया गया था हमें,

और अगर नहीं तो

मैं इसे कैसे ठीक करूंगी?

क्या मैं सही थी, या गलत थी मैं,

क्या माफ़ किया जाएगा मुझे?

क्या बेहतर कर कर सकती हूँ, मैं?

क्या कभी गा पाऊँगी मैं?

गौरैया तक भी गा सकती हैं,

और मैं तो ख़ैर, बिल्कुल ही बेकार हूँ।

क्या कम हो रही है मेरी नजर।

या यह बस सोचना है मेरा?

या कहीं गठिया तो नहीं हो जाएगा मुझे,

या शायद अटक जाए जबड़ा,

कहीं स्मृतिलोप तो नहीं होने वाला मुझे?


आख़िरकार,  सोचा मैंने

फायदा कोई नहीं, इस तरह बिसूरने से।

छोड़ ही दिया फिर,

और अपने इस बूढ़े होते शरीर को

लेकर, निकली बाहर, सुबह के उजाले में

 गाने लगी गीत।

           

उसका सिर

            

जो मरे

(अगस्त-1945) अमेरिकी कवि ,लेखक,नाटककार और संपादक


इकुबुकेनी के पास नताल दक्षिणी अफ़्रीका में,

एक औरत ढो रही है पानी अपने सिर पर

एक साल के सूखे के बाद,

जब उसके तीन बच्चों में से

एक है मौत के पंजे में,

वह दूर के किसी कुएँ से

पानी लेकर लौट रही है, अपने सिर पर।

सूख चुकी हैं कद्दू की बेलें,

मुरझा चुके हैं टमाटर

फिर भी वह औरत

ढो रही है पानी अपने सिर पर..


ख़ाल हैं बाड़े मवेशियों के,

भुखमरी की शिकार हैं बकरियाँ,

बच्चों के लिए दूध नहीं

लेकिन वह ढो रही है पानी, अपने सिर पर।

इंजीनियरों ने रुख़ मोड़ कर नदी का

बाँध दिया है नदी को

ताकि ताकतवर, सत्ताधारी लोग

कर सकें उपभोग, बिजली की शक्ति का।

लेकिन वह औरत ढो रही है पानी

अपने सिर पर।

होमलैंड में जहाँ धूल से लथपथ भीड़

ख़ाली सड़क पर,

करती है इन्तज़ार पानी के टैंकरों का,

लेकिन वह औरत करती है विश्वास तो बस खुद पर,

और उस खजाने पर, जिसे ढोती है वह

अपने सिर पर।

सूरज भी उसे नहीं रोक पाता,

न ही तोड़ सकती, सूखी और तपती हुई धरती,

वह ढोती है पानी अपने सिर पर

मैली सी एक टूटे हैंडल वाली बाल्टी

जो टिकी है एक पतले से पतरे पर।

ढो रही है पानी वह औरत, अपने सिर पर।

 वह औरत, जिसके गले में है, सेफ़्टी पिनों की एक माला

ढोती है पानी अपने सिर पर

अपने परिवार, अपने लोगों के लिए

ज़िन्दगी और मौत के बीच  जो भी ज़रूरी है

उसे लाने के लिए

करती है भरोसा, सिर्फ़ अपने सिर पर।

ढो रही है पानी उनके लिए

वह अपने सिर पर।

 


चेतावनी 


- सिल्विया पाथ

सिल्विया पाथ (1932-1963) : बीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली अमेरिकी कवियत्रियों में, उनकी रचनाएँ उनकी गहरी भावनाओं और व्यक्तिगत जीवन के मानसिक संघर्षों को दर्शाती हैं।

 

अगर तुम काट कर किसी चिड़िया को

अलग-अलग हिस्सों में,

 बनाते हो उसकी जीभ का आरेख

तो काट दोगे उसके स्वर यंत्र को भी

जहाँ से निसृत होते हैं गीत

अगर खाल उतार कर किसी

किसी जानवर की

मुग्ध होते रहोगे उसके अयाल पर


तो परवाह क्या करोगे तुम, उसके पूरे वजूद की

जहाँ से वह फर शुरू हुआ था,


अगर यह जानने के लिए

कि धड़कता है कैसे, आख़िर दिल,

निकाल दोगे इस दिल को ही तो

तुम रोक दोगे उस घड़ी को

जिससे मिलती है लय हमारे प्रेम को।

 

 

 

एल्म

-सिल्विया पाथ

 

मैं जानती हूँ उसकी गहराई को, कहती है वह,

अपनी लम्बी जड़ों से उसे  छूकर जाना है मैंने,

जिससे डरते हो तुम, मुझे इससे डर नहीं लगता,

क्योंकि मैं वहाँ रह चुकी हूँ।


क्या सुनाई दे रहा है तुम्हें,

समंदर का शोर मेरे अन्दर

 उसकी अतृप्त लहरों की बेचैनी?

या फिर उस शून्य की गूँज,

जो तुम्हारा पागलपन थी?


प्रेम एक छाया है,

जिसके पीछे तुम भागते हो,

झूठ बोलते हो और रोते हो,

सुनो, ये इसके खुर हैं, वह तो

घोड़े कि तरह की भाग चुका है।


सूर्यास्तों के अत्याचार सहे हैं मैंने,

जड़ों तक झुलस चुकी हूँ

जल कर लाल हो चुकी हैं मेरी तनी हुई नसें,

किसी तारों के गुच्छे की तरह।


अब मैं बिखर चुकी हूँ टुकड़ों में, उड़ते हैं जो

लाठियों की तरह चारों ओर,

ऐसी हिंसक हवा

नहीं सहूँगी मैं, कोई भी और तमाशा

मुझे चीखना ही होगा।


मेरे भीतर गूँजती है एक चीख, हर रात

वो फड़फड़ाती है, अपने काँटों से तलाशती है किसी ऐसी चीज को

जिसे वह प्यार कर सके।


 मैं डरती हूँ

अपने भीतर सो रही इस अंधेरी चीज से-

दिनभर महसूस होती है मुझे  पंखों सी कोमल हलचल

मानो पाला हो कोई बैर।

बादल आते-जाते बिखर जाते हैं

क्या ये प्रेम के चेहरे हैं, वे धुंधले अधूरे से भाव?

क्या  इन्हीं के लिये करती हूँ व्याकुल मैं अपने दिल को?


इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं जानती

क्या है यह, यह चेहरा

जकड़ा हुआ है जो शाखाओं से, इतना घातक…


 

फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी


-माया एंजेलो


माया एंजेलो ( 4 अप्रैल 1928–28 मई  2014 )- एक अमेरिकी लेखिका, कवि संस्मरणकार, निबंधकार, कलाकार, निर्माता, निर्देशक और एक्टिविस्ट थीं। वे अपनी अनूठी नवोन्मेषी आत्मकथात्मक लेखन शैली के लिए जानी जाती थीं।)

 

तुम मुझे अपने कड़वे, घिनौने झूठों से

इतिहास में मिटा सकते हो,

तुम मुझे धूल में रौंद सकते हो,

लेकिन फिर भी, धूल की तरह

मैं उठ खड़ी होऊँगी।


क्या मेरी अकड़ परेशान करती है तुम्हें,

इतने उदास क्यों हो तुम? क्योंकि

मैं ऐसे चलती हूँ, जैसे मेरे लिविंग रूम में तेल के कुँवे निकल रहे हों।


चाँद और सूरज की तरह,

ज्वार-भाटे की अनवरत लय के साथ,

उम्मीदों की बुलंदियों की तरह, मैं

फिर भी उठूँगी।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?

सिर झुका हुआ, नजरें नीची किए हुए

मेरी कराहों से होकर कमजोर

आँसुओं की बूँदो की तरह ढलकते हुए कंधे।

क्या मेरे अहंकार ने पहुँचाई है ठेस तुम्हें ?

इसे इतना भी दिल पर मत लो, क्योंकि मैं

ऐसे हँसती हूँ जैसे सोने की खान हो मेरे पास

और अपने पिछवाड़े में खुदाई कर रही हूँ मैं।

तुम मुझे अपने शब्दों से घायल कर सकते हो

मुझे चोट पहुँचा सकते हो अपनी नज़रों से

तुम अपनी नफ़रत से मार सकते हो मुझे

लेकिन, फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी।

क्या मेरी कामुकता तुम्हें परेशान करती है?

क्या यह कोई हैरत वाली बात है?

मैं तो ऐसे नाचती हूँ जैसे मुझ पर जड़े हों हीरे,

ठीक मेरी जाँघों के मिलन बिंदु पर।


इतिहास की शर्मनाक झोपड़ियों से

मैं उठी

एक बेपनाह दर्द भरे अतीत से निकलकर,

मैं उठी

मैं एक काला सागर हूँ, उछलता-कूदता, उमड़ता-घुमड़ता

उसकी बढ़ती लहरों में समाहित हूँ मैं।

 डर और वहशत की रातों के पीछे

एक हैरतज़दा शफ़्फ़ाक़ सवेरा लेकर

मैं उठती हूँ

अपने पुरखों के दिए हुए उन उपहारों को लेकर

मैं गुलामों की उम्मीद और उनका सपना हूँ।

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ


Friday, April 17, 2026

परिवार को बीच से काटने वाली दीवार - गादा कारमी



डा. गादा कारमी

 

(1939 में फिलिस्तीन में जन्मीं डॉक्टर, शोधकर्ता और लेखक गादा कारमी ने दुनिया के बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशनों में फिलिस्तीन का पक्ष रखने के लिए प्रचुर लेखन किया है। फिलिस्तीन पर उन्होंने आधा दर्जन संस्मरणात्मक किताबें लिखी हैं। उनके एक संमरण का अंश   यादवेन्द्र ने विशेष रूप से ‘लिखो यहां वहां’ के  लिये प्रस्तुत किया है. यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं  )


दीवार कम से कम 8 मीटर या 26 फीट ऊँची थी और मुझे यह देखकर अचरज हो रहा था कि सलेटी रंग के कंक्रीट के स्लैब्स से बनी हुई दीवार को कोई पार कैसे करता होगा। यह बिल्कुल असंभव है। जहाँ तक निगाह जाती दूर तक फैली हुई इस दीवार पर जगह-जगह कुछ नारे लिखे हुए थे या फिलिस्तीनियों के समर्थन में कुछ रेखाचित्र बनाए हुए थे। ये चित्र इतने सजीव और यथार्थपूर्ण थे कि मैं आश्चर्य में पड़ गई। ऐसे चित्र मुझे कलंदिया चेक पॉइंट पर भी देख कर महसूस हुआ कि उनके पीछे कितनी यथार्थवादी सोच और कलात्मकता है। मुझे याद आया कि एक चित्र किसी गोल छिद्र सरीखा था जिसे देखकर दीवार को बेधते हुए वास्तविक छिद्र बने होने की अनुभूति होती थी - जिसके पीछे नीला आसमान और हरे-भरे खेत दिखाई दे रहे थे। किसी के लिए भी इसे देखकर वास्तविक मान लेना एकदम स्वाभाविक था।

मैं दीवार से हटकर खड़ी हो गई और अपनी हथेलियों से उसे छूकर, दबा कर देखा, कंक्रीट एकदम ठंडा था और अपनी हथेलियों के फिसलने से एहसास हुआ कि इसकी ऊपरी सतह ख़ासी समतल और चिकनी है। दीवार का शिखर इतना ऊँचा था कि वहाँ तक देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन पीछे ले जाकर नीचे झुकानी पड़ी। देख कर साफ़ लगता था कि बेहद मज़बूत और गहरी नींव वाली अडिग दीवार है। तभी मुझे लगा कोई मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया है।

‘इस दीवार के उस पार मेरे पति रहते हैं।’ वह लंबी छरहरी शरीर वाली फिलिस्तीनी स्त्री नायला थी। मैंने उसे पहली बार देखा था। 

‘मैं दीवार के इस पार और वे दीवार के उस पार इस वजह से रहते हैं क्योंकि उन्होंने हमें एक साथ रहने की इजाज़त नहीं दी।’ उसने मुझे बताया। मेरे साथ जो स्थानीय लोग थे, हो सकता है उनको पहले से इस बारे में मालूम हो लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल नई और हैरत में डालने वाली बात थी।

अबू दिस में उनका अपना घर था, लेकिन जब यह दीवार बनाई गई तो वह घर इजराइल की तरफ़ चला गया। ऐसा होने पर उन दोनों के पास अलग-अलग रहने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह स्त्री अन्य अरब नागरिकों की तरह पूर्वी यरुशलम की नीला पहचान पत्र धारी 'नागरिक' मानी गई। लेकिन उसके पति को वेस्ट बैंक की नागरिकता वाला नारंगी पहचान पत्र दिया गया - इसका प्रशासनिक मतलब यह हुआ कि वह इजराइल की भूमि पर (जहाँ उसकी पत्नी रहती है) क़दम नहीं रख सकता और यदि उधर जाना ही है तो उसे हर बार स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देना होगा और इजाज़त मिली तो निर्धारित अवधि के लिए जाना संभव होगा। जब भी उसे अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की इच्छा होती है, वह स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देता है और इजाज़त मिलने पर दिन भर के लिए दीवार के उस पार जाता है, पर अँधेरा होते-होते वापसी की शर्त के साथ। उसकी यह कथित आज़ादी भी मनमर्जी नहीं, इजराइली शासन जब चाहता है यह सुविधा छीन लेता है।

मैंने यह कहानी जानकर अफ़सोस जाहिर किया और पूछा कि तुम यहाँ से जाकर अपने पति के साथ क्यों नहीं रहतीं?

‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? यदि मैं यहाँ से चली भी गई तो वे मेरा यरुशलम का नीला पहचान पत्र ज़ब्त कर लेंगे और मैं कभी इधर चाहने पर भी आ नहीं पाऊँगी।’

उसने आगे बताया कि यह पहचान पत्र न रहने पर वह ज़रूरत पड़ने पर न तो इजराइल के किसी हवाई अड्डे तक पहुँच सकती है न अपने बच्चों को यरुशलम के स्कूलों में पढ़ा सकती है, न ही वहाँ के किसी अस्पताल में इलाज के लिए जा सकती है। वेस्ट बैंक और ग़ज़ा के फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ यही तो बंदिश है कि उन्हें चारों ओर से घेर कर इस तरह क़ैद कर दिया गया है कि वे किसी काम के लिए बाहर नहीं निकल सकते, चाहे संकट में उनकी जान ही क्यों न निकल जाए।

ऐसी विकट प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पति-पत्नी अपना जीवनयापन किसी तरह से कर रहे हैं हालाँकि यह कहना मुश्किल है कि उनके आपसी संबंधों पर इसका कितना असर हुआ है।

मेरी असहजता देखकर नायला ने कहा, ‘जो है सो ठीक है। ऐसा नहीं है कि इस दीवार के कारण सिर्फ़ हमारी जिंदगी बिखर गई है। यक़ीन मानो, हमारी तरह बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अलग-अलग रहने को अभिशप्त हैं। अलग रहना बार-बार आने वाली दूसरी भयानक मुसीबतों के आगे बहुत छोटी बात लगने लगती है। लेकिन हम पहले की मुश्किलों की तरह इसको भी निभा लेंगे।’


(‘रिटर्न: ए पैलेस्टीनियन मेमॉयर’ से साभार)

 

प्रस्तुति : यादवेन्द्र 

Friday, April 10, 2026

ऋतु डिमरी नौटियाल की कुछ कविताएं

 

 

 

 



 (  ऋतु डिमरी नौटियाल की रचनाओं में अपने समकाल की मुश्किलों, विडंबनाओं और प्रतिगामी प्रवृतिओं  के विरुद्ध हस्तक्षेप करने की विकलता गौर करने लायक है। इसी  कारण उनमें राजनैतिक नैराश्य से जूझने का संकल्प दिखता है।और थोड़ी ज़ल्दबाजी भी । लेकिन यह तय है कि उनके संघर्ष की जगह रचना की दुनिया है।वे शोषण की प्रवृतियों और उसकी व्याप्ति को ख़ूब पहचानतीं हैं। पित्रसत्तात्मकता और सामाजिक  वंचना का प्रतिकार
उनकी मूल प्रतिज्ञा है। - राजेश सकलानी  )

 

 

1. हारे हुए लोग

 

 

वो पीले पत्ते की तरह झड़ते हैं 

और पेड़ को देख रो पड़ते हैं 


वो बन रहे होते हैं 

और रास्ते में ही बिगड़ पड़ते हैं 


इतने अस्थिर

कि ढकेल दिए जाते हैं

और लक्ष्य तक 

पहुंचने से पहले 

कहीं और निकल पड़ते हैं 



वे बेल की तरह 

चलते हुए में रुके होते हैं 

और रुके हुए में चलते हैं 



शब्द से नि: शब्द तक

नि: शब्द से शब्द तक


एक गति में , 

स्व क्षति में हमेशा 



हारे हुए लोग

 मुझे कवि लगते हैं .



2. फरवरी 


जनवरी तक ये 

संतरे का पेड़ नहीं था,

यहां एक लम्बी सूखी टहनी थी,


ग्वाला इससे गाय हंकाता 

या किसी चूल्हे की भेंट चढ़ जाता 


फरवरी 

तुमने इसे नई टहनियों और 

पत्तियों से भर दिया है 


तुमने इसका अर्थ बदल दिया है 

इंद्रियों को प्रिय 

अब ये दृश्य और गंध है ,

 उम्मीद है इनके हृदय में 

और फल की कामना है



फरवरी 

में उभरती है

गाजा की याद.



3. कुर्सी - दृश्य 


पहले किताबों से भरी होती थी

लाइब्रेरी की अलमारियों की ताकें 


फिर बैठने की वजहें बदलने लगीं 

तदनुसार बैठने की प्रक्रियायें


एक दिन 

लाइब्रेरी की अलमारी की एक ताक के कोने से 

एक कुर्सी निकली


 और एक आदमी किताब पे बैठकर 

 कुर्सी पढ़ रहा था


  कुर्सी एक महामारी की तरह 

  फैल रही थी


   एक आदमी और उसके बाद कई आदमी 

    न्याय पे बैठकर 

    कुर्सी लिखने लगे 


     एक बच्चा कागज पे लिख रहा था

     "एक कुर्सी के मुंह के भीतर 

      शेर के दांत थे "

     


 4. मुलाक़ात. 


वो बस अड्डे में मिलते या

रेलवे स्टेशन में ,

जब एक दूसरे के शहर से गुजरते 


किसी पार्क में 

नजदीक बैठकर 

बातें करते 



किसी धूप में खुल जाते

लोकतांत्रिक संवाद ,

 मेटाफर की तरह लिखे जाते

  उपन्यास के चैप्टर या

 अप्रकाशित कविताओं से 

  होती मुलाक़ात 



   दोनों एक दूसरे को 

   घर में आने का

   निमंत्रण नहीं देते कभी,

   स्त्री और पुरुष 

    परवश.

   

  

   5. भूख की लिपि 


वियतनाम से सीरिया तक

सोमालिया से गजा तक

बन रही एक वैश्विक भाषा


हमारे समय का प्रतिनिधित्व करती

 बन रही एक लिपि.

Monday, April 6, 2026

बोर्खेस और मैं : अनुवाद - योगेन्द्र आहूजा



 

 

इस रचना (दार्शनिक गद्य) में बोर्खेस अपने दो रूपों—एक “सार्वजनिक लेखक बोर्गेस” और दूसरा “निजी ‘मैं’”—के बीच के संबंध और तनाव पर विचार करते हैं। इसमें कोई कथानक या घटनाक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, एक लेखक के ‘स्व’ और सार्वजनिक पहचान पर, उनके आपसी रिश्ते पर दार्शनिक विमर्श है।-  योगेन्द्र आहूजा 

 

 बोर्खेस और मैं

(बोर्खेस)

वह जो ‘दूसरा’ है, बोर्खेस, वह है जिसके साथ चीज़ें घटती हैं। मैं ब्यूनस आयर्स की गलियों में यूँ ही भटकता रहता हूँ; आजकल कभी-कभी बेख़याली में ठहरकर किसी दरवाज़े की मेहराब और उसके लोहे के फाटक को देख लेता हूँ। बोर्खेस के बारे में मुझे ख़तों में ख़बर मिलती है; उसका नाम प्रोफ़ेसरों की सूची में दिखता है, और बायोग्राफिकल गजट्स में भी। मुझे रेत-घड़ियाँ पसंद हैं, नक़्शे, अठारहवीं सदी के फ़ॉन्ट, कॉफ़ी का ज़ायका, और स्टीवेंसन की गद्य-शैली। दूसरे को भी यही सब भाता है, मगर उसकी ख़ुदपरस्ती इन्हें एक तरह की नाटकीय सजावट बना देती है। यह कहना कि हमारा रिश्ता दुश्मनी का है, कुछ ज़्यादा हो जाएगा। मैं जीता हूँ, ज़िंदा रहता हूँ, ताकि बोर्खेस अपना साहित्य रच सके — और वही साहित्य मेरे होने का औचित्य भी है। मैं आसानी से मान लेता हूँ कि उसकी कुछ पंक्तियाँ सार्थक हैं, लेकिन वे पंक्तियाँ मेरी मुक्ति नहीं हैं। शायद इसलिए कि अच्छा लेखन किसी एक व्यक्ति का नहीं होता — उस दूसरे का भी नहीं — बल्कि भाषा और परंपरा का होता है। बाक़ी जो कुछ है, मेरी तक़दीर में तो पूरी तरह गुम हो जाना लिखा है; मुमकिन है मेरा बस एक छोटा-सा हिस्सा उस दूसरे में ज़िंदा रह जाए। मैं धीरे-धीरे सब कुछ उसके हवाले करता जा रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि उसमें चीज़ों को विकृत करने और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की एक खराब आदत है। स्पिनोजा जानता था कि हर वस्तु अपने वजूद का स्थायित्व चाहती है — पत्थर पत्थर बने रहना चाहता है और बाघ बाघ, सदा के लिए। मुझे बोर्खेस में बने रहना है, ख़ुद अपने भीतर नहीं (अगर सचमुच मेरा कोई “मैं” है भी), फिर भी मैं अपने आपको उसकी किताबों में उतना नहीं पहचानता जितना कई अन्य किताबों में, या फिर गिटार की गहरी झंकार में। कुछ बरस पहले मैंने उससे बच निकलने की कोशिश की थी — उपनगरों की कथाओं से निकलकर काल और अनंत के खेलों में जा पहुँचा था। मगर अब वे खेल भी बोर्खेस के हो चुके हैं — मुझे कुछ और सोचना होगा। इस तरह मेरा जीवन एक पलायन है। मैं सब कुछ खो दूँगा, और सब कुछ या तो विस्मृति में चला जाएगा, या उस दूसरे के पास।

मुझे नहीं मालूम कि हम दोनों में से किसने यह लिखा है।

Friday, April 3, 2026

उपन्यास अंश: मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी (दो)

 

 


(आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर  हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरिचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं।  विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’  के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरीचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन  प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया  गया है।प्रकाशन के  एक वर्ष बाद  पहले  संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें  बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती है।पिछली पोस्ट में हमने  इस उपन्यास का एक अंश प्रकाशित किया था। इस बार प्रस्तुत हैं  इस उपन्यास के कुछ और अंश ।)

 

 

 


सत्तर का उथल पुथल भरा साल

बादल को अपना गाँव बहुत याद आ रहा है। कोरानखाली के तट पर पसीने से तरबतर वह अपने लड़कपन के दिनों की स्मृतियों में खोया है। बीत गए दिनों की यादें दृश्य रूप में सामने उभरने लगती हैं। स्मृतियों में दूर तक चला जाता है बादल ।

खुलना के बटियाघाटा क्षेत्र के नारायणपुर गाँव में कोई स्कूल नहीं। बादल को तीन कोस दूर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता है। पाँव में चप्पल नहीं। लाल सालू कपड़े के टुकड़े में बाँध कर रखी कुछ किताबें, कलम, दावात लेकर वह स्कूल जाता है। स्कूल दूर तो अवश्य है किन्तु स्कूल का पथ बड़ा ही मनोरम है। दूरी का एहसास कभी नहीं हुआ। कितना कुछ है देखने के लिए। दृष्टि को विस्तार देते धान खेत यहाँ से वहाँ तक फैले हुए। धान खेतों के बीच से नर्म घास वाले आल यानि मेंड़। कई बार मेंड़ पर घोंघे अपनी गति से चलते हुए मिलते तो वह ठहर कर देखने लगता। घोंघा कितना विचित्र प्राणी है। धान खेत से निकल कर वह आल के किनारे किनारे अपनी मस्ती में चलता तो उसकी सूंड़ दिखाई देती। ज़रा सी आहट पाते ही वह अपनी खोल में छुप जाता। इतने सख्त खोल में कैसी मुलायम जान बसती है। वह आश्चर्य करता। धान की हरी पत्तियों पर शिशिर की बूंदें बादल  को अपनी तरफ खींचती हैं। वह अपनी अंगुलियों से शिशिर की हर बूंद को स्पर्श कर लेना चाहता। कभी कोई छोटी सी चिड़िया कुछ गाती हुई ऊपर से उड़कर निकल जाया करती। खेतों से निकलते ही एक बागान उसे मिलता जिसमें आम, जामुन, कटहल और न जाने कितने पेड़ हैं। जामुन के मौसम में वह मीठे जामुन के लोभ में अक्सर स्कूल का ध्यान ही भूल जाता है।

यह गिरींद्र किशोर चैधरी का बागान है। बागान के भीतर एक कुआँ है। बरसात के दिनों में कुआँ कैसे मुँह तक भर आया करता है। मेंढक की टर्राहट खेतों से ही सुनाई देने लगती। बागान से निकल कर वह कुछ दूर चलता है कि फिर एक बड़ा माठ आ जाता है। एकदम खुला हुआ बड़ा सा माठ। इस माठ में लेकिन गाँव के लड़के खेलने नहीं आते हैं क्योंकि यहाँ एक पीर की मजार है। माठ के आगे फिर धान खेत दूर दूर तक दिखाई देते। धान खेतों के आल से होता हुआ वह सीधे अगले गाँव में आ जाता। यह कुम्हारों का गाँव है। वे आँव में मिट्टी के बर्तन पकाते हैं। उनके बनाए बर्तन अच्छे मौसम में अक्सर ही धूप में सूखते रहते हैं। इस गाँव के घरों में मुर्गियाँ और बकरियाँ पालते हैं सभी लोग। बकरी के नन्हें पोना फुदकते हुए बादल  के रास्ते में आ जाते तो वह उन्हें सहला कर आगे बढ़ जाता। इस गाँव के बाद उसका स्कूल दिखाई देने लगता। स्कूल जाते हुए कई बार धान खेतों में उसे मछलियों की सरसराहट सुनाई देती। ऐसा तब होता जब धान खेतों का पानी कम हो जाता और खेत में बीच-बीच में गड्ढों में पानी एकत्रित हो जाता। ऐसा भी हुआ कई बार कि सामने मछली दिख गई तो बादल से आगे चला नहीं गया। वह खेत में उतर कर बड़ी चतुराई से मछली को पकड़ लेता और वहीं किसी गड्ढे को पहचान कर उसमें उन्हें छोड़ देता ताकि स्कूल से लौटते हुए वह इन मछलियों को वहीं से फिर पकड़ सके। माँ उसकी इस छेलेमानुषी के लिए बहुत डांटती है। 

जिन लड़कों के पास साइकिलें हैं वे दूसरे रास्ते से आते हैं। बादल  को स्कूल के दिनों में दो चीज़ों का बड़ा शौक रहा है। एक तो साइकिल और दूसरा रेडियो। दोनों ही उसके पास नहीं हैं। बादल  कभी-कभी दोस्तों से उनकी साइकिल माँग कर चलाने का अभ्यास किया करता। उसे साइकिल चलाने में बहुत मज़ा आता है। रेडियो का शौक तो ऐसा कि उसे अक्सर रेडियो के सपने आते। एकदिन जब वह पढ़ लिख कर चाकरी करेगा, पैसे कमाने लगेगा तब अपने लिए एक साइकिल और एक रेडियो ज़रूर खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता। स्कूल काफी बड़ा है। उससे भी बड़ा है स्कूल से लगा खेला का माठ। स्कूल के अंदर एक कृष्णचूड़ा का पेड़ है। गर्मियों के दिन में वह चटक लाल रंग वाले फूलों से भर जाता। माठ के एक कोने में तेंतुल यानि इमली का पेड़ है। इमली पर फल लगते ही बच्चों की शरारतें बढ़नी शुरू हो जातीं। आते जाते वे ढेला फेंकते। कच्ची और खट्टी इमली का स्वाद बच्चों को बहुत भाता है। और जब इमली पक जाती तब तो कहना ही क्या। पकी इमली के लिए तो कई बार बच्चे माठ में देर तक पड़े रहते। वे इमली के बीज इकट्ठा करते और उससे खेलते। स्कूल के बाहर एक मिष्टि दुकान है। वहाँ की मिठाइयाँ बादल  को बहुत लुभाती हैं लेकिन उसके पास मिठाइयों के लिए पैसे नहीं होते हैं। एकदिन जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा तब खूब मिठाइयाँ खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता है।

बहुत थोड़े से खेत हैं बादल के पिता के हिस्से में। धान के लिए बीज डाले जाते खेत में। खेत के इस छोटे हिस्से को बीजतला कहते हैं। बीजतला की तैयारी बड़े जतन से की जाती। खेत को जोतकर उसमें पानी भर दिया जाता। माटी नर्म और मुलायम हो जाती तो उसे बराबर किया जाता। पानी जब बहुत कम रह जाता तब बीजतला में धान के बीज डाले जाते। बीज का धान अलग से बचा कर रखा जाता है। कुछ हफ्तों में बीजतला में माटी की सतह पर हरीतिमा उगने लगती। वर्षा आते-आते ये बीज पूरी तरह तैयार होते। तब तक बाकी के खेत तैयार हो चुके होते। बीजतला से धान के ताज़े उगे बीज की आँटी यानि बंडल बना कर उन्हें बड़े खेतों में रोपने के लिए ले जाया जाता। धान के चार छह पौधों का एक गुच्छा एक जगह रोप दिया जाता और इसी तरह छोटे छोटे गुच्छे थोड़ी थोड़ी दूर पर रोप देने के बाद पूरे खेत हरे हरे दिखाई देने लगते। कुछ ही दिनों में ये बीज नई जमीन में अपनी जड़ें जमा लेते और झूमने लहराने लगते। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती। धान के पौधे जैसे जैसे बढ़ते चासी की आशाएँ वैसे वैसे बड़ी होतीं। समय बीतता और फिर धान के पौधे में शीश यानि बालियाँ आने लगतीं। ऐसे समय में खेतों में निराई का काम होता जिसमें खर पतवार जैसे पौधों को खेत से चुनकर निकाल दिया जाता। जब धान की बालियों में दूध आने लगता तब खेतों से एक मादक गंध चारों दिशाओं में फैल जाती।

धान के पकने की आस धीरे धीरे सबकी आँखों में दिखाई देने लगती। धान की बालियों का रंग सुनहरा हो उठता। धान के पौधे भी सुनहरे पीले हो जाते। खेत का पानी सूखने लगता। यह धान की कटाई का समय होता। सारा परिवार हँसिया लेकर खेतों में चला जाता और

धान की कटाई होती। धान के गट्ठर बनते और सब उसे उठाकर घर ले आते। घर की लक्ष्मी घर आती। धान की झड़ाई में बादल को भी लगना पड़ता। घर के बाहर एक तरफ बाँस गाड़ कर ज़मीन से चार फुट ऊंचा एक डेस्क जैसा बना लिया जाता। ऊपर काठ का कोई पटरा हो तो और अच्छा। धान जितना दोनों हाथों में समा सके उठाकर उसे इस बेंच के पटरे पर पीछे से घुमाकर सिर के ऊपर से सामने की तरफ पीटा जाता। इससे धान पौधे से अलग होकर नीचे जमा हो जाता और बिचाली अलग कर ली जाती। धान को अभी

धूप में सुखाने की जरूरत है। धान में अभी नमी है। अभी चावल निकाले जाएंगे तो टूट जाएंगे। सूखे हुए धान को ढेकी में कूट कर चावल निकाल लिया जाता। नए धान से कितना कुछ पकवान घर घर में बनाया जाता है। वह एक युग है बादल के जीवन का। सबसे सुनहरा युग। अनवर बादल का बढ़िया दोस्त है। उसके घर वाले परम्परा से ही पाट का चास करते हैं। पाट से जूट तैयार होता जिसका अच्छा बाजार है । पाट की फसल के लिए पानी की आवश्यकता होती है और नारायणपुर में पानी की कोई कमी नहीं है। नदी नालों का विस्तीर्ण जाल है। पाट की फसल जब तैयार हो जाती तो उसे काट कर खाल में सड़ने के लिए छोड़ देते। पाट जब सड़ने लगता तब उससे एक अजीब सी गंध फैलती । इसे दुर्गंध कहना ज्यादा सही होगा। पाट की पत्तियाँ सड़ जातीं। पाट के तनों की छाल जब सड़ कर अलग होने की स्थिति में आती ऐसे समय में अनवर के परिवार के सारे पुरुष खाल में जाते। खाल में उतरकर वे पाट को पीटते हैं। पीटने से पाट के तने से रेशे अलग हो जाते और बच जाती पाटकाठी। रेशों को बड़े कायदे से लपेटकर अलग कर लिया जाता और पाटकाठी के बंडल अलग बांध लिए जाते। पाट का बाकी हिस्सा खाल में ही छोड़ दिया जाता। पाटकाठी से वे खेलते हैं। अनवर के घर इसे चूल्हे में भी जलाती है उसकी माँ। पाट के रेशे बाज़ार में बिकने के लिए जाते हैं। जूट के सामान तैयार करने वाली फैक्टरियाँ जिनकी हैं वे इसे खरीद लिया करते। इन रेशों से खाट बुनने की मज़बूत रस्सियाँ भी बनाई जातीं।

अनवर के पिता रसूलपुर के मदरसे में पढ़ाते हैं। पाँच वक़्त के नमाज़ी हैं और हज भी कर आए हैं। नियम कायदे के मामले में कट्टर। घर में औरतें पर्दा करती हैं और हिज़ाब पहनती हैं। ईद के त्यौहार पर इनके यहाँ बड़ी रौनक होती। सबके लिए नए नए कपड़े बनते। बड़ी मस्ज़िद के पास ईद का मेला लगता। अनवर सिर पर टोपी पहनता। अनवर खेल कूद में अव्वल है। खेलने कूदने में रुचि के कारण ही अनवर से बादल की दोस्ती बनी हुई है। अनवर मदरसा में पढ़ने जाया करता। उसे हर खेल में महारत हासिल है। लम्बी छलाँग हो या ऊँची छलाँग, दौड़ हो या कुश्ती, अनवर के आगे कोई टिकता न था। कबड्डी में वह बादल को अपने दल में रखता है क्योंकि बादल  लम्बा और फुर्तीला है। अनवर के साथ ही बादल ने तैराकी सीखी। वे केले के तने लेकर नदी पोखर में उतर जाया करते तो बाहर निकलने का होश नहीं रहता। अक्सर घर से जब कोई बुलाने आ जाता और बहुत गुस्सा करने लगता तब वे पोखर से निकल कर चुपचाप लौट जाते। आरंभ में तो एकदिन बादल डूबते डूबते बचा। केले के तने के सहारे तैरते हुए वह पोखर के बीच तक चला गया। जाने क्या हुआ कि केला गाछ उससे छूट गया और बहकर दूर चला गया। वह डूबने उतराने लगा। उससे अब साँस नहीं लिया जाता है। ढेर सारा पोखर का पानी इसबीच वह पी चुका। तभी अनवर का

ध्यान उसकी तरफ गया तो वह तेज़ी से उस तक पहुंचा और बीच पोखर से उसे किनारे ले आया।

नारायणपुर में बाँस वन की कमी नहीं है। बाँस की झड़ियों में तरह तरह के पक्षी छुपे होते। बाँस की जब नई पत्तियाँ आतीं तो उनमें हरापन उतना नहीं होता। वे हल्का पीलापन लिए बिलकुल लिपटी हुई सी और बेहद नर्म और मुलायम होतीं तब। ये पत्तियाँ बादल  को बेहद प्रिय हैं। बाँस वन में पत्तियों से ज्यादा रुचि बादल की इस बात में रहती कि इनमें से कौन लाठी के लिए सबसे उपयुक्त है। उसे लाठियाँ बहुत पसंद हैं। लाठी खेला उसे पसंद है। बरसात के दिनों में जब नावें चलने लगती हैं तब लाठी के बिना वह घर से बाहर नहीं निकलता है। यहाँ वहाँ साँप निकलते हैं । लाठी से साहस रहता है। साँप के काटने से गाँव में कितने ही लोगों की मौत हो जाती है। उसने देखा है कि साँप के काटने से उसके दोस्त अनवर की एक बहन कैसे प्राण खो बैठी थी। वह कनेर के पेड़ से फूल तोड़ रही थी जब उसे साँप ने डस लिया। पूरे गाँव में खबर फैल गई। वह भी देखने गया। उसके मुँह से सफेद झाग आ रहा है। उसका चेहरा कैसा तो नीला पड़ता जा रहा है। ओझा और गुनी उसको बचा नहीं सके। कोई साँप का मंत्र काम न आया। बेहद ज़हरीला साँप था वह। साँप को पकड़ा नहीं जा सका।

सत्तर का उथल पुथल भरा साल। एक तरफ मुक्ति का संघर्ष तो दूसरी तरफ धार्मिक उन्माद की दिल दहला देने वाली खबरें। एक तरफ मुक्ति योद्धाओं की सक्रियता बढ़ रही है तो दूसरी और पूर्वी पाकिस्तान की खान सेना के वफादार रजाकार मुक्ति की चाह रखने वालों के दमन पीड़न में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैशाख की ऐसी ही एक उदास शाम आई उस दिन। सूरज अभी अभी डूबा है पश्चिम में। रोज़ की तरह बाबा ने बादल को आवाज़ लगाई -ओरे खोका, दरवाजा ठीक से बंद करके तुमसब सो जाओ अब। मैं पहरा देने जा रहा हूँ ।

पिछले कुछ महीनों से यह रोज़मर्रा का काम हो गया है। रात के खाने के बाद पाड़ा-प्रतिवेशी सारे पुरुष मानुष नियम से मोहल्ले की हिफाज़त के लिए रातभर जागकर पहरा देते। लूटपाट और आगजनी की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। बादल  के लिए यह सब एक पहेली जैसा है। वह सोच नहीं पाता कि अपने ही लोगों से आखिर हमें खतरा क्यों है। वे हमें क्यों मार देना चाहते हैं। क्या बिगाड़ा है हमने उनका।

नारायणपुर के माहौल में तनाव बढ़ता ही जाता है। बादल देख रहा है कि लम्बे समय से अनवर उसके साथ खेलने नहीं आता। ठीक से बात भी नहीं करता है वह बादल से। उसदिन बादल उसे खाने के लिए कुछ देने लगा तो उसने बड़े रूखेपन से जवाब देते हुए कहा -मुझे भूख नहीं है रे बादल, तू खा ले।

बादल ने निश्चय किया कि आज संध्या वह फुटबाल खेलने के लिए अनवर को बुलाने उसके घर जायेगा। गोधूलि वेला में जब वह उसके घर पहुँचा तो दरवाज़े पर ही ढेर सारे लोगों को देखकर ठिठक गया। एक मौलवी के साथ पंद्रह बीस लोग आँगन के बाहर आमगाछ के नीचे खाट पर बैठे हैं। वह केले के मोटे तने की ओट में छुप गया । अनवर कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है।

मौलवी ने अपनी टोपी ठीक करते हुए कहा -बेशी मेलजोल की एकदम ज़रूरत नहीं है। जैसा मैंने समझाया वैसा ही करना है सबको, समझे न ? सबने आज्ञाकारी बालक की तरह अपने सिर हिलाए। मौलवी ने उठते हुए कहा -तो फिर चलता हूँ। सब उठ खड़े हुए। अनवर के पिता मौलवी के पीछे पीछे घर के बाहर तक आये। वह इन लोगों को देखकर थोड़ा घबरा गया और घबराहट में केले के झोंप से बाहर निकलने को हुआ। अनवर के पिता ने केले के झोंप की तरफ से पत्तों की सरसराहट की आवाज़ सुनी तो उधर नजर घुमाते हुए पुकारा -कौन है, कौन है वहाँ झोंप के पीछे छुपा हुआ! बादल  तबतक बाहर आ चुका है।  वह सकुचाते हुए बोला -चाचा, मैं बादल, अनवर घर पर नहीं है ?

दौड़ता हुआ बादल आँगन की तरफ गया। तब तक वे लोग घर से बाहर की ओर निकल चुके हैं। अनवर भीतर कमरे में लेटा कोई किताब पढ़ रहा है।

-क्या रे, क्या हुआ है तुझे ? इतने दिन खेलने क्यों नहीं आया ?

-मेरी तबीयत ठीक नहीं रे, बुखार-बुखार जैसा है।

बादल ने अनवर के माथे पर हाथ रखकर देखा। कपाल एकदम ठंडा है। उसे आश्चर्य हुआ कि वह इस तरह झूठ क्यों बोल रहा है।

-कहाँ है बुखार, कुछ भी तो नहीं। बहाना क्यों करता है रे पगले!

-अच्छा, अभी तू घर जा, कल आता हूँ माठ में खेलने, अनवर ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा। बादल उछल कर दालान से बाहर निकल आया । जाते जाते ज़ोर की आवाज लगाई उसने, कल आना जरूर!

अँधेरा घिर रहा है। अब खेलने का समय भी निकल चुका। माठ पार कर वह खाल के किनारे किनारे ऊँचे बाँध को पकड़कर चलने लगा। सहसा आसमान में धुंए का गुबार देखकर वह आश्चर्य से भर उठा। इतना बड़ा गुबार चूल्हों के धुंए से संभव नहीं है। धुँआ मंडलपाड़ा की ओर से उठ रहा है। कहीं आग लगी हो जैसे। वह तेज़ी से धुँए की दिशा में भागा।

पूरा मंडलपाड़ा धू-धू कर जल रहा है। उसका घर भी आग की चपेट में है। सबलोग बाहर से आग बुझाने में लगे हुए हैं। एक अजीब सी चीख पुकार का शोर चतुर्दिक व्याप्त है। सबकुछ जल रहा है। सारे लोग मिलकर भी आग पर काबू नहीं पा रहे हैं। पोखर से दौड़-दौड़ कर वे पानी लाते हैं और जलते घरों पर उलीच देते हैं। बाँस, मिट्टी और फूस के घर दहक रहे हैं। जबतक आग कुछ मद्धम पड़ती सबकुछ नष्ट हो चुका था। अगली सुबह वे राख के ढेर के बीच से अपने बचे खुचे सामान निकाल रहे हैं। उनके सिर पर कोई छत नहीं है।

अकेले मंडलपाड़ा ही नहीं खुलना ज़िले के इस अंचल के गाँवों में इस तरह की वारदातें अब आम होने लगी हैं। देखते देखते पलायन आरंभ हो गया है। बचे खुचे माल असबाब को लेकर ये लोग अपनी जान की हिफाज़त के लिए सीमांत की तरफ निकलने लगे हैं, सीमा पार जाने के लक्ष्य से। यह ज्येष्ठ मास है।

नारायणपुर में पिछले कई महीनों से तनाव की स्थिति है। नदी पर

बाँध की मरम्मत का काम चल रहा है जिसमें मंडलपाड़ा से काफी लोग काम पर लगे हुए हैं। ठेकेदार बड़ी मस्जिद के मौलवी का निकट संबंधी है। ठेकेदार नशे में था। एक लड़के के ऊपर साइकिल समेत गिर पड़ा। थोड़ी कहा सुनी हुई। वह गालियाँ देने लगा। लड़का भी अड़ियल स्वभाव का। और गलती तो ठेकेदार की ही है। वह क्योंकर दबता उससे। आवेश में हाथ का फरसा चला दिया ठेकेदार पर। ठेकेदार वहीं ढेर हो गया। नशे में तो वह है ही। उठकर घर जाने लायक भी उसकी स्थिति नहीं है। अगले दिन मस्ज़िदपाड़ा से एकदल लोग पंचायत के लिए बैठे गाँव में।

मस्ज़िदपाड़ा की पंचायत का मानना है कि यह आक्रमण छोटी जात वाले नमःशूद्र हिन्दुओं की तरफ से है और उन्हें इस देश में ही रहने का कोई हक नहीं। तनाव देखते देखते दंगे में बदल गया। बादल   के परिवार में माँ बाबा के आलावा एक बहन है। थोड़ी सी ज़मीन है उनके पास जिससे किसी तरह गुज़ारा हो जाया करता है। अब वह भी उनसे छिन रहा है। अपने बचे खुचे माल असबाब के साथ वे कालीबाड़ी के मंडप में शरण लेने को बाध्य हैं। बाबा अपनी जान पहचान के लोगों से संपर्क में हैं जो उनको इस मुसीबत से बाहर निकाल सकें। लेकिन कहीं से कोई मदद भी नहीं आती है। घर में अनाज के दाने तक नहीं हैं।

बादल का स्कूल जाना बंद हो गया। वह इसी साल नवीं क्लास में गया है। पढ़ाई लिखाई की कौन कहे अब तो जान के लाले पड़े हैं। शाक के पत्ते उबालकर पेट जिलाते हुए जैसे तैसे ज़िंदा होने का एहसास है। वह भी कितने दिनतक चलता जब अपने आस पास के लोग उनका देश छुड़ाने पर ही आमादा हों। पूर्णिमा की रात है यह जब वे, अपने समय के शरणार्थी, कालीबाड़ी मंडप में रात के बीत जाने की प्रतीक्षा में हैं और नींद है कि आँखों में समाती नहीं है। बाबा ने बादल की माँ को धीमे स्वर में बताया, एक दलाल के साथ बात हुई है मेरी। वह हमें उसपार ले जाने का बंदोबस्त कर देगा। टाका माँग रहा है। कलशी बाटी बिक्री करके हो या जैसे भी हो, कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस तरह कितने दिन बच सकते हैं हम। देश छोड़ कर जाना ही होगा अब, यहाँ गुज़ारा संभव नहीं दिखता।

कलशी बाटी बेचकर भला कितने पैसे आते। माँ के कुछ गहने हैं जिन्हें अब बेचने की नौबत आन पड़ी है। स्त्री धन ऐसे ही दुस्समय में पुरुषों को बचाता आया है। माँ के गहने इस तरह जाते देखकर बादल को भारी कष्ट हो रहा है। वह सोचता है एकदिन वह माँ के लिए ढेर सारे गहने बनवायेगा। जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा। बाबा का चेहरा इनदिनों कैसा तो कठोर सा हो गया है। कम बोलते हैं। कम खाते हैं। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।

दलाल के कहे अनुसार वे मय सामान घाट पर एकदम काकभोर में ही जा पहुँचे। दलाल का कहीं अता पता नहीं है। घाट पर उस

अँधेरे में भी निरुपाय असहाय असंख्य मानुषजन अलग अलग दिशाओं से आ रहे हैं। मुँहमाँगी कीमत देकर डिंगी लेना जिनके बस में है वे उसपार जाने के लिए निकल जा रहे हैं। किसिम-किसिम के दलालों को घेरे लोग अपनी अपनी गुहार लगाते हैं। बादल ने अधीर होकर पूछा, बाबा, वो आदमी कब आएगा ? बाबा ने आश्वस्त करते हुए कहा, आयेगा, आयेगा, ज़बान दी है उसने हमें। दलाल ने अपना नाम गुलाम मोहम्मद बताया है और आश्वस्त किया है कि वह उनके लिए डिंगी का इंतजाम तो करेगा ही, वह उनके साथ साथ भी चलेगा और सीमांत पार करा देगा।

गुलाम मोहम्मद जब घाट पर पहुँचा तबतक काफी देर हो चुकी है। एक ही डिंगी घाट के किनारे लगी हुई है, वह भी लगभग लोगों से भरी हुई। बादल का किशोर मन उस डिंगी की प्रतीक्षा करते करते ऊब चुका है जो उन्हें लेकर जाने वाली है। वह एक क्षण के लिए बाबा के चेहरे को देखता तो दूसरे ही क्षण नदी घाट की ओर। इस संकट के आगे उन्हें भूख प्यास का अनुभव भी नहीं हो रहा है। गुलाम मोहम्मद को दूर से आता हुआ देख बाबा की आँखों में चमक आ गई। वे उठ खड़े हुए और लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, आ गया देखो। अब कुछ न कुछ बंदोबस्त ज़रूर हो जायेगा।

-अच्छा, हमारे लिए कौन सी नौका की व्यवस्था है ?

-आज तो नहीं हो पायेगा। आज मेरे घर में रह जाइए कष्ट करके। आज की रात ही आप सबको पार करा दूँगा। चिंता न करें।

गुलाम मोहम्मद उन्हें तफसील से समझाता रहा कि डिंगी के लिए भारी छीना झपटी चल रही है। एक माझी उन्हें आज की रात ही पार करा देगा। तब तक वे उसके घर पर आराम कर सकते हैं। गुलाम मोहम्मद सातक्षीरा का रहने वाला है। एक नाव से वे गुलाम मोहम्मद के गाँव तक आए। यहाँ से आगे सीमांत पार कराने का जिम्मा गुलाम मोहम्मद का है। लेकिन उससे पहले आज रात इन्हें एक और नदी को पार करना है। गुलाम मोहम्मद इन्हें अपनी नाव में पार करायेगा जहाँ से आगे इच्छामती तक फिर पैदल चलना होगा।

गुलाम मोहम्मद का घर साधारण सा एक कच्चा मकान है। साग भात का इंतजाम गुलाम मोहम्मद की बीवी ने कर दिया। भूख से बेहाल चार जन का यह परिवार आज गुलाम मोहम्मद के घर शरणार्थी है। रात जब थोड़ी गहराने लगी तब एकबार फिर वे घाट पर आये। गुलाम मोहम्मद आगे आगे चल रहा है। एक डिंगी घाट पर लगी है जिसमें कुछ परिवार पहले से ही अपनी गठरियाँ और अन्य सामान लेकर बैठे हुए हैं। गुलाम मोहम्मद ने उनसे डिंगी में बैठ जाने को कहा। उसने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि कुछ देर बाद एक दूसरी डिंगी में वह भी उस पार आ जायेगा और उनसे मिलेगा। रूपए पैसे वह पहले ही ले चुका है। उसके कहे पर विश्वास करने के अलावा इन लोगों के पास कोई उपाय भी नहीं है। वे उसपार उतरने के बाद घंटों गुलाम मोहम्मद की प्रतीक्षा करते रहे।

गुलाम मोहम्मद नहीं आया।