Tuesday, September 22, 2026

ओमप्रकाश वाल्मीकि पर मदन शर्मा का संस्मरण

 

 

 


 ( उम्र के नौ दशक पूर्ण कर चुके मदन शर्मा बहुत शांत भाव से लेखन कर्म में डूबे रहे हैं। उनका मानना है कि जितना लिखा जाये , उससे कम छपने के लिये दिया जाना चाहिए और किताब की शक्ल में तो छपे हुए में से कुछ चुनिंदा रचनाएं ही आनी चाहिए। इस बार साहित्य के लिये दिया जाने वाला प्रतिष्ठित ‘विद्यासागर सम्मान -साहित्य’ गुरुदीप खुराना के साथ मदन शर्मा को देने की घोषणा हुई है। उनकी रचनाएं पहले भी इस ब्लॉग में प्रकाशित हुई हैं।  उन्हें बधाई देते हुए हम यहां ओमकाश वाल्मीकि पर लिखा संस्मरण प्रकाशित कर रहे हैं। }

  

 दलित साहित्य के अलमबरदार ओमप्रकाश वाल्मीकि के अंतिम तीन वर्ष

                                     मदन शर्मा

 

 

कवि, कथालेखक, नाटककार एवं दलित-चिंतक ओमप्रकाश वाल्मीकि के साथ मेरे लगभग पैंतीस वर्ष तक सम्बंध रहे। ये सम्बध उनके संसार से विदा हो जाने के बाद भी समाप्त नहीं हुए हैं। आज भी, अकस्मात लगने लगता है, टेलीफोन की घंटी बजेगी और उधर से आता स्वर कान में पड़ेगा, "शर्मा जी, कैसे है?.... कोई ज़रुरी काम तो नहीं कर रहे थे ?.... थोड़ी देर के लिये इधर आ सकेंगे?"

 

पहले, जब वह अस्वस्थ नहीं थे, मुझे आने के लिये नहीं कहते थे। बल्कि फोन करके, खुद ही चले आते थे।

उनका नया ख़रीदा शानदार डबल-स्टोरी मकान मेरे निवास से चंद मीटर के फासले पर है। केवल दो मिनट का फासला।

हम दोनों एक ही रक्षा संस्थान में कार्यरत थे। वाल्मीकि उम्र में मुझ से चौदह वर्ष छोटे थे। अतः वह मुझ से सोलह वर्ष बाद सेवा-निवृत हुए (मैं अठावन का होने पर सेवा निवृत हुआ था। वह साठ के हो जाने पर)

सेवा-निवृति के अवसर पर ओमप्रकाश वाल्मीकि ने आर्डनेंस फैक्टरी के सीनियर क्लब में भव्य पार्टी का आयोजन किया था। इस पार्टी में लेखक वर्ग में से, केवल मैं और विजय गौड़ ही आमंत्रित थे। शायद इस लिये, कि यह पार्टी अपने संस्थान के चुनीदा स्टाफ के लिये ही आयोजित की गई थी।

वाल्मीकि प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी होने के बावजूद अब तक टाइप 3 क्र्वाटर में ही रहते आये थे। मैंने दो तीन बार टोका भी था, "अन्य सभी अफसरो की तरह बंगले में क्यों नही चले जाते?"

उनका उत्तर होता, "यहाँ पर जो अपनापन है, वह बैंगलो-एरिया में जाकर मुझे नहीं मिल पायेगा। मैं क्वार्टर में रह कर ही सतुष्ट हैं।"

मगर सेवानिवृति के बाद उन्हें यह क्वार्टर खाली करना था। हालांकि उन्होंने शहर में तीन छोटे कमरों वाला एम०डी०डी० का एक फ्लैट खरीद रखा था। मगर चंदा जी (मिसेज वाल्मीकि) को अपने रहने के लिये फ्लैट नहीं, एक अच्छा सा मकान चाहिये था। वाल्मीकि की हार्दिक इच्छा थी। कि कोई जगह यदि मेरे निवास के निकट मिल सके तो बेहतर हो। थोड़ी कोशिश करके, ऐसा मकान मिल भी गया। एक आलीशान मकान जिसे कुछ रक्म खर्च करके वाल्मीकि ने बेहतर बना लिया। रंगरोगन के बाद मकान खूब चमकने लगा।

ओमप्रकाश वाल्मीकि ईश्वर को बिल्कुल नहीं मानते थे और कर्म-काण्ड के तो सख्त विरोधी थे। इसके बावजूद उन्होंने चंदा जी को कभी पूजा पाठ करने या व्रत वगैरा रखने के लिये मना नहीं किया था। बल्कि वह चंदा जी को स्वयं साथ लेकर मंदिर तक जाते थे। खुद बाहर खड़े रहते। चंदा जी भगवान के दर्शन करके लौटती तो उन्हे साथ ले लेते। इसी प्रकार नये मकान के गृह प्रवेश के अवसर पर सभी रिश्तेदार और मित्रों की मौजूदगी में भी पूजापाठ, कालीमाता मंदिर से पधारे पंडित जी ने विधिपूर्वक सम्पन्न कराया, जिसे वाल्मीकि स्वयं कभी पसंद न करते थे। पूजा हवन के बाद भोज की व्यवस्था थी। जिसमें दो-ढाई सौ लोग अतिथि आमंत्रित थे। किंतु इस भव्य आयोजन में भी देहरादून नगर के तीन चार साहित्यकार ही नज़र आये। हाँ बाहर से पधारे दलित लेखक कई एक दिखाई पड़ रहे थे।

नया मकान खरीदने, उसे ठीकठाक कराने और गृह प्रवेश आदि के आयोजन पर वाल्मीकि का काफी रुपया खर्च हो गया था। मगर यह सभी कुछ करके वह प्रसन्न और संतुष्ट थे। इन सबसे निबट कर उन्होंने अपना पूरा ध्यान पढ़ाई लिखाई पर केन्द्रित कर दिया।

बहुत पहले वाल्मीकि का प्रथम काव्य संग्रह 'सदियों का संताप' प्रकाशित हुआ था। चालीस से भी कम पृष्ठों की उस पतली सी पुस्तिका को देख, कई एक ने मज़ाक सा उड़ाया था। मैंने तब वैनगार्ड साप्ताहिक के सम्पादक स्व० सुखवीर विश्वकर्मा के आग्रह पर इस काव्य संग्रह की पहली समीक्षा लिखी थी।

मगर उस पतली सी पुस्तिका ने कुछ ही दिन में साहित्य के क्षेत्र में धूम मचा दी थी और देखते ही देखते ओमप्रकाश वाल्मीकि  का नाम देश के उच्च कोटि के कवियों में गिना जाने लगा था।

ओम प्रकाश वाल्मीकि मूलतः कवि थे। कहानी वगैरा लिखना उन्होंने काफी बाद में शुरू किया। मगर कविता कहानी या नाटकों के माध्यम से उन्होंने जो कुछ भी लिखा, उससे कहीं बढ़कर उन्हें अपने विचारोत्तेजक और जोशीले भाषणों के द्वारा ख्याति हुई। इन्ही तर्कपूर्ण भाषणों या लेखों के कारण ही वह दलित चिंतक कहलाये। 

'सदियों का संताप' वाल्मीकि ने स्वयं रूपये खर्च करके छपवाया था। मगर उस पुस्तिका के प्रकाशन के कुछ अर्सा बाद ही, जब जूठन आत्मकथा एक बड़े प्रकाशक द्वारा बाज़ार में आई, तो उसके बाद देश का कोई भी बड़ा प्रकाशक उनकी कोई भी किताब छापने के लिये तैयार था और शीघ्र ही वह समय भी आया, जब बड़े प्रकाशकों के स्वामी स्वयं वाल्मीकि से कोई पुस्तक देने के लिये निवेदन करने लगे। 

उनके पास हर रोज़ भारी डाक आती थी। सम्पादक रचनाएं आमंत्रित करते। कविता, कहानी कुछ भी... विशेषांक निकलने वाला है, आपकी रचना अभी तक नहीं मिली। 'कृपया शीघ्र भेजिये....।

भेंट स्वरुप मिली पुस्तकें इतनी अधिक हो गई थीं, जिन्हें रखने के लिये वाल्मीकि को विशेष अलमारियां और रैंक बनवाने पड़ गये। 

कविता, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, इन सभी के साथ-साथ वाल्मीकि ने 'जूठन' का द्वितीय भाग लिखना भी शुरु कर दिया। एक उपन्यास की रुप रेखा भी तैयार की, जिसके तीस-पैंतीस पृष्ठ लिख भी डाले थे। एक दिन, वाल्मीकि मेरे यहाँ बैठे थे। बोले, "एक सलाह दीजिये। मुझे दो जगह से फेलोशिप मिल सकती है। वर्धा विश्वविद्यालय से और इंस्टीच्यूट ऑफ एडवांस स्टडीस शिमला से। निर्णय नहीं ले पा रहा हूँ। कहाँ जाँऊ या रहने हूँ। इससे मेरे लेखन में बाधा पड़ जायेगी। यही शंका है।" 

मैंने हंस कर कहा ऐसा अवसर गंवाना नहीं चाहिये। पचास हजार रुपये महीना कम नहीं होते। शिमला अधिक दूर भी नहीं है यहाँ से और फिर बाया कैसी। वहीं भी तो लिखने पड़ने का काम है। यह सत्र करके एक महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न होगा। बड़ी डिग्री भी मिलेगी।" 

काफी सोच विचार के बाद वाल्मीकि ने निर्णय ले लिया और एक सुबह घर की जरुरत का सामान कार में लाद चंदा जी के साथ वह शिमला के लिये निकल पड़े। 

शिमला से दूसरे-तीसरे दिन उनका फोन आ जाता था। या इधर सेड कर देता था। उन्होंने बताया यहाँ पर काम शुरु कर दिया है। यहाँ मर्थ अच्छे लोग हैं। सभी से सहयोग मिल रहा है। रहने के लिए मकान जो मिल है, काफी बड़ा है। हर तरह की सुविधा भी उपलब्ध है। उम्दा फर्नीचा गद्दे और पर्दे, नौकर, कार, ड्राइवर भी मिल जाता है। स्थान भी पर्यान्न मनोरम है। मगर यहाँ आपकी बहुत याद आती है। आप भाभी जी को लेकर यहाँ कुछ दिन के लिए आ कर रहें। आप और भाभी जी को यह जगह बहुत पसंद आयेगी.....। 

फिर एक दिन पूछने लगे, आपके लघुकथा संग्रह के प्रकाशन का क्या रहा

मैंने बताया उपने के लिये भेज रखा है। डेढ़ दो महीने शायद और लग जायेंगे। यह उन्ही का सुझाव था। एक दिन मेरे यहाँ बैठे थे। अचानक पूछा, आपके अब तक कितने उपन्यास छप चुके ?" 

मैंने कहा, "सात।" 

बोले, "आपकी लघु कथाएं मज़ेदार होती हैं। उनका एक संग्रह अवश्य निकलना चाहिये। कुल कितनी होंगी ये लघुकथाएं?" 

"सवा सौ के आस-पास। मैंने बताया। 

"तो उनमें से सौ लघुकथाएं दे दीजिये छांटकर।" मगर हां भूमिका लिखकर मुझे ज़रूर दिखा दीजियेगा।" मैंने चार पांच दिन बाद भूमिका लिखकर उन्हें दिखाई तो पढ़कर मुस्कराये और बोले "इतनी अच्छो लघुकथाओं की इतनी सी भूमिका ! 

"खैर, यह भूमिका में लिख कर दूँगा।" 

एक दिन, शिमला से उनका फोन आया, "अगले हफ्ते हम देहरादून आ रहे हैं। तीन चार छुटिटयां पड़ रही हैं। मगर वहाँ एक सप्ताह रहकर वापिस लौटेंगे।" 

मगर दो दिन बाद ही उनका फोन आया, "शर्मा जी, हम आज हो पहुँच रहे हैं। नाहन पार कर चुके हैं। दो ड्राई घंटे में आपके पास पहुँच चुकेंगे।

थे। मैं चक्कर में पड़ गया। आज ही क्यों? वे तो अगले हफ्ते आने वाले थे। 

वे दोपहर एक बजे के करीब आ पहुँचे। कार से बाहर निकल, हाथ आगे बढ़ाया, तो मैं हैरान ही रह गया। शरीर इतना कमज़ोर ! चेहरे पर कष्ट के चिन्ह। चन्दा जी भी काफी परेशान नज़र आ रही थीं। 

"क्या हुआ ? यहाँ से तो आप अच्छे भले गये थे?" वह बड़ी धीमी आवाज में बोले "थोड़ी पेट में तकलीफ़ है। दिल्ली जाना पड़ेगा।" 

"दिल्ली क्यों"? मैं आशंकित हुआ। "ऑप्रेशन होना ज़रुरी है। शिमला में तो डाक्टर वहीं आप्रेशन करने को तैयार थे। मगर सोचा, शिमला में चन्दा कैसे सब सम्भालेंगी। दिल्ली में तो कई रिश्तेदार हैं। मित्रों की भी वहाँ कमी नहीं।" 

"आप्रेशन क्या ज़रुरी है?" मैंने पूछा। "जल्दी कराना ज़रुरी है। वैसे तो हमें शिमला से सीधे दिल्ली के लिये निकल पड़ना चाहिये था। मगर इधर दो-एक ज़रुरी काम थे। रुपयों की भी व्यवस्था यहीं से करनी थी।" 

"लगभग कितना ख़र्च आ जायेगा वहाँ पर ?" मैने पूछा। "दो-ढाई लाख तो लग ही जायेंगे।" 

मुझे घबराया हुआ देख, वह बोले, "ऐसी कोई खास बात नहीं। आंत का छोटा-सा टुकड़ा वे लोग काट कर अलग कर देंगे और फिर आंत को जोड़ देंगे। उन लोगों के लिये तो यह बहुत मामूली ऑप्रेशन है।" मगर क्या डाक्टरों ने तब उन्हें बीमारी की सही जानकारी नहीं दी होगी। चंदा जी को भी, इस बारे में कुछ पता न होगा? या वे सिर्फ मुझे, इस सम्बध में कुछ बताना उचित नहीं समझते होंगे। 

मेरी चिंता में लगातार इजाफा हो रहा था। वहाँ पर चंदा जी कैसे संभाल पा रही होंगी। वह स्वयं ही काफी अस्वस्थ हैं। एक्यूट डायबेटीज़, हाई ब्लडप्रैशर डिप्रेशन, के दौरे ! हालांकि चंदा जी ने बताया था कि वहाँ बहुत अपने मौजूद हैं। मगर फिर भी.....।

 

चंदा जी से फोन पर बराबर बातचीत हो रही थी। दो दिन में सभी वगैरा हो चुके थे और आप्रेशन की तारीख भी निश्चित हो चुकी थी।

 

सरोज बार-बार चंदा जी से फोन पर बातचीत कर रही थी..... अभी नंबर नहीं लगा है.....अब साढ़े पांच बजे उन्हे लेकर गये है आप्रेशन थियेटर में..... आप्रेशन अभी शुरु हुआ है..... कई घंटे हो गये। आप्रेशन अभी चल ही रहा है.....।

 

बाद में पता चला था कि ऑप्रेशन के समय चंदा जी वहाँ अकेली नहीं थीं। उनकी भान्जी गुड्‌डी और दामाद के अलावा कई रिश्तेदार थे और कितने ही साहित्यकार और प्रकाशक मौजूद थे। जे० एन० यू० के विद्यार्थियों का तो जमघट ही लग गया था। खून देने वालों की भी कमी न थी। ये सभी वाल्मीकि के चाहने वाले थे।

 

ऑप्रेशन के बाद वाल्मीकि को होश आया, तब मेरी और उनसे मामूली बात हो पाई। उस दशा में भी वह काफी आशाव की तरह बात कर रहे थे।

 

यहाँ से चलते समय उन्होंने यही बताया था, कि दिल्ली में दिन लग जायेंगे। मगर यह अवधि बढ़ती ही चली जा रही थी फोन करता, यही उत्तर मिलता.... पांच-सात दिन और लग जायें

 

अखबारों में टी० वी० पर वाल्मीकि के स्वास्थ्य के बारे समाचार आ रहे थे। उन्हें कैंसर जैसी गम्भीर बीमारी है. यह उन सर

 

ही मालूम पड़ा। फिर यह समाचार भी पढ़ने में आया कि वाल्म चिकित्सा के दौरान, भारी धनराशि खर्च हो चुकी है और वह घो संकट का सामना कर रहे हैं। किसी पत्र ने यह भी लिख दिया वाल्मीकि ने लोगों से धन प्राप्ति के लिये अपील की है। मैंने इस विजय गौड़ से बात की। यह बात सुनकर उन्हें भी आश्चर्य हुआ लगे यह कैसे हो सकता है। कि ओम प्रकाश वाल्मीकि जैसा स्व साहित्यकार किसी के आगे हाथ फैलाये!

 

बाद में वाल्मीकि से मिलने पर यह बात स्पष्ट हो पाई थी कि के गंगाराम अस्पताल में जब उनका ऑप्रेशन हुआ था, उसके च 'दिन बाद कवि लीलाधर जगूड़ी और मंगलेश डबराल ने उन्हें सरा और से वितीय सहायता दिलाने की कोई पेशकश की थी। तब उन्हें अपनी ओर से यही कहा था, "यदि सरकार की ओर से इस सब साहित्यकार होने के नाते कोई सहायता मिलती है. तो मुझे कोई आपत्ति नहीं। मगर किसी व्यक्ति से कुछ लेना मुझे स्वीकार नहीं।"

 

बहरहाल लगभग डेढ़ महीने बाद उनके दिल्ली से वापसी की सूचना मिली। उन्होंने रास्ते में से ही मुझे फोन कर दिया था.... तीन घंटे तक आपके पास पहुँच जायेंगे।

 

उस समय मैं क्या, कोई भी उन्हें देखकर आसानी से नहीं पहचान सकता था.... क्या यह वही ओमप्रकाश वाल्मीकि हैं! महज हड्डियां ही हड्डियां दिखाई पड़ रही थीं। उनकी ऐसी हालत देख मेरी आंखे नम होने लीं, तो बोले, "ऐसा कुछ नहीं, मै अब काफी ठीक हूँ। बीमारी तो उन्होंने काट कर अलग फेंक दी। कमज़ोरी जो है, वह भी धीरे-धीरे जाती रहेगी।"

 

देहरादून आकर वह सचमुच ठीक होने लगे थे। एक-दो-दो दिन के अन्तर पर महसूस होता, वह स्वस्थ हो रहे हैं। चंदा जी जिस तरह दिन रात उनकी सेवा में लगी थीं। वह साधारण बात न थी। असाधारण इसलिये कि वह स्वयं कहाँ स्वस्थ्य थीं। मगर अपनी सब तकलीफों को भूलकर उन्हें एक ही धुन सवार थी कि उनके पति किसी तरह स्वस्थ हो जायें।

 

उन दिनों, मैं अकसर उनके पास बैठा रहता। काफी काफी देर तक बातें होती रहती। उन्हें थका देख मैं उठ खड़ा होता और कहता "आप थक गये हैं आराम कीजिये।" मगर चंदा जी मुझे रोक लेती। कहती "आपके पास बैठे रहना इन्हे अच्छा लगता है। आप थोड़ी देर और बैठिये।" मैंने पूछा दिल्ली में लगभग कितना खर्च हो गया ? बोले, "अब तक बारह लाख से ऊपर लग चुका है। चार-पांच लाख और लग जाने का अनुमान है। क्योंकि हर-पंन्द्रह दिन बाद जाकर कीम्यूथ्रापी करानी होगी। दिल्ली जाने-लौटने के एक चक्कर में चालीस हजार खर्च आयेगा.... फिलहाल तो खोखल सा हो चुका हूँ.... मगर कोई बात नहीं। डिफेंस कालोनी वाला फ्लैट तो पड़ा ही है, उसे बेच कर कुछ रकम हाथ में आ जायेगी। "मैंने कहा," सी० जी० एच० एस० आप ने ऑप्ट कर ली होती, तो यह हानि न उठानी पडती।"

 

उन्होंने कहा, "हाँ वह तो बच सकता था। मगर मैं उधर शिमला वालों से मेडिकल एड ले रहा था। दो जगह से एक साथ सम्भव न था... मगर अब आप के साथ किसी दिन सी० जी० एच० एस० के दफ्तर जाकर मेम्बर फ़ॉर्म ले आऊंगा। उनकी सेहत अब पर्याप्त अच्छी नज़र आने लगी थी। एक दिन कहने लगे, “ राजेश सकलानी की बिटिया की शादी है, मैं यह शादी एटेड करने का बहुत इच्छुक हूँ। आप और भाभी जो तो वहाँ जा ही रहे होंगे। हम दोनों भी आप के साथ चलेंगे।" मैंने ‘ठीक है' तो कह दिया मगर डर भी लगा कहीं यहाँ पर भीड़ भड़ाके में तबीयत बिगड़ न जाये। मगर वे हमारे साथ गये और वहाँ की रौनक देख काफी प्रसन्न हुए। मिर्जी से भी मिले और बातचीत की।

 

एक दिन, कपड़े बदले और स्वयं गैरेज से कार बाहर निकाली। बोले, चलिये शर्मा जी, आज दून लाइब्रेरी हो आयें। दो-तीन किताबें एक रेफ्रेंस के लिये चाहियें। लाइब्रेरी से किताबे लीं। थोड़ी देर वहाँ डॉक्टर मनोज पंजानी और सी० एस० तिवारी जी के साथ बातचीत की। हिन्दी भवन में एक पुस्तक प्रदर्शनी लगी थी। वहाँ भी गये।

 

फिर एक दिन पल्टन बाज़ार भी मेरे साथ ही गये। भोजा ब्रदर्स से कुरते पाजामे का गरम कपड़ा खरीदना था। वहाँ शैलेन्द्र चांदना जी के साथ खूब बातचीत की।

 

एक सुबह फिर कार निकाली और मुझे साथ लेकर मिलन विहार में सी० जी० एच० एस के दफ्तर पूछताछ करने और मेम्बरशिप का फार्म लेने पहुँचे।

 

मुझे लगने लगा, वह अब मुकम्मल तौर पर स्वस्थ हो गये हैं। उन्होंने लिखने पढ़ने का काम भी पुनः आरम्भ कर दिया था। हालांकि चंदा जी और मैं स्वयं, उन्हें बार-बार इतना परिश्रम करने से मना कर रहे थे। मगर उनमें इच्छा शक्ति कमाल की थी। बोले, "नहीं, मैं यह बड़े आराम-आराम से कर रहा हूँ। आपका कहना भी ठीक है। मगर क्या करूं, इतने काम अधूरे पड़े हैं। कितनों से वायदा कर रखा है।"

 

- किसी को कविता चाहिये, किसी को कहानी, तो किसी को लेख। कहीं से सेमिनार में भाग लेने के लिये हवाई जहाज के दो टिकट आये हैं। (चंदा जी हमेशा उनके साथ ही आमंत्रित होती रही थीं) शिमला वालों का शोध कार्य भी तो निश्चित अवधि तक पूरा करना है और उधर कितने ही प्रकाशकों

के अनुरोध... आप कुछ तो भेजिये, हम आपकी नई किताब बुकफेयर' में रखने के बहुत इच्छुक हैं। उनका स्वास्थ्य अब बेहतर तो था, मगर ऐसा बेहतर नहीं, कि इतनी मेहनत करें।

 

इसी दौरान उनकी दो-तीन नई पुस्तकें छप कर आईं। पत्र पत्रिकाओं में कुछ रचनाएं छपीं। उनकी हर रोज पहुँचने वाली डाक अच्छी खासी होती थी। हर रोज एक पुलिंदा। विभिन्न पत्रिकाएं, पत्र, भेंटस्वरूप भेजी पुस्तकें।

 

दिन में कम से कम एक बार मेरी भेंट उनसे हो ही जाती थी। बातें भी खूब होतीं। साहित्य के बारे में और व्यक्तिगत भी। एक दिन बातचीत के दौरान मैंने पूछा, "जिस न बदलने वाली मानसिकता की शिकायत आप अपनी कहानियों के माध्यम से अकसर किया करते हैं, वह मानसिकता क्या कभी बदल सकेगी ?"

 

वह सोचने लगे। फिर बोले, "मुझे मालूम है, वह कभी नहीं बदलेगी। मगर मुझे अपनी यह लड़ाई जारी रखनी ही है। यह मेरा कमिटमेंट है।"

 

एक सुबह उन्होंने पुनः शिमला जाने का निर्णय ले लिया। हालांकि चंदा जी मन से वहाँ जाने के पक्ष में न थीं। मगर वाल्मीकि का कहना था.

 

'.."कुल छः महीने का तो मामला है और उसमें भी नवम्बर से लम्बी छुटिटयां शुरु हो जायेंगी। मेरे लिये यह शोधकार्य निबटाना अनिवार्य है......

 

उन लोगों ने मेरे ऊपर भारी रकम खर्च कर रखी है। मुझे काम पूरा करके देना ही चाहिये।"

 

हालांकि इंस्टीयूट के निदेशक ने उन्हें यह छूट तो दे रखी थी। कि वाल्मीकि चाहें तो वह अपना कार्य दिल्ली या देहरादून में रहकर भी पूरा कर सकते हैं। मगर कुछ कार्य तो शिमला में होना ही अपेक्षित था।

 

इस बार भी दूसरे या तीसरे दिन उनसे फोन पर बातचीत हो जाती। स्वास्थ्य के बारे में पूछता तो कहते, बस चल रहा है.....। मगर आप भाभी जी के साथ यहाँ एक बार तो आइये.....।

 

एक दिन अचानक उन्होंने फ़ोन कर कहा, "मेरी तबीयत फिर बिगड़ गई है। कल दोपहर तक हम देहरादून पहुँच रहे है और वहाँ से तुरन्त दिल्ली के लिये निकलना होगा।"

 

इस बार तो वे शिमला से काफी सामान भी अपने साथ उठा लाये थे। जैसे फिर वहां लौट जाने का इरादा न हो।देहरादून एक दिन रुककर वे दिल्ली गंगाराम हॉस्पिटल के लिये निकल गये। पहले की तरह ही हुआ। चार-पांच दिन के लिये कहकर गये थे। मगर उन्होंने फोन पर सूचना दी मेरी प्राब्लम बढ़ गई है। एक और आप्रेशन होगा। लगभग एक हफ्ता और लग जायेगा।

 

वे दिल्ली से लौटे तो वाल्मीकि को देख मेरा माथा ठनका। इतनी कमज़ोरी ! पता चला होम्यूग्लोबिन काफी कम हो गया है। वज़न में और अधिक गिरावट हो गई थी। बताया, अठारह लाख खर्च हो चुके है। चंदा जी के भारी भारी गहने, सभी इस बीमारी की भेंट चढ़ गये।

 

शरीर में हड्डियां ही हड्डियां दिखाई पड़ रही थीं। कंधे से जरा नीचे एक टूटी सी शरीर के भीतर घुसी थी। पेशाब के लिये लम्बी सी प्लास्टिक ट्यूब और थैली। जिसमें लगातार पेशाब जमा होता रहता। यह थैली, उन्हें हर जगह साथ उठा कर ले जानी पड़ती। वह कभी देर तक लेटे रहते। तो कभी उठकर बैठ जाते और कभी बिल्कुल सामान्य से होकर बातें करने लगते।

 

अचानक बोले, "आप काफी कमज़ोर हो गये लगते हैं। सेहत का थोड़ा ध्यान रखा करें।"

 

मैनें हंसकर कहा, अब क्या ध्यान रखना सेहत का ! सत्तत्तर पार कर चुका हूँ। देर सवेर अब विदा ही तो हो जाना है!"

 

वह चौंक कर बोले, "यह आप क्या कह रहे हैं! ऐसा मत सोंचे। आपकी तो अभी बहुत ज़रुरत है।"

 

उनकी भूख लगातार घटती और कमज़ोरी बढ़ती चली जा रही थी। उल्टी किसी भी वक्त होने लगती। चंदा जी अपनी बीमारियों और शारीरिक कष्टों को भूलाकर दिनरात तीमारदारी में लगी थीं। उन्हें न अपने खाने पीने की सुध, न नहाने धोने या सोने की। कभी समय निकाल, अपने लिये प्लेट में दो चपतियां और सब्ज़ी धरी। निवाला मुँह तक भी नहीं गया। कि वाल्मीकि को उल्टी हो गई या पाजामे में दस्त हो गया।

 

अठारह लाख खर्च हो गये या सभी गहने बिक गये। कोई बात नही। चंदा जी को एक ही धुन सवार थी..... बस, किसी तरह यह ठीक हो जायें।

 

मैं सोच रहा था.... क्या इन्हें अब भी वाल्मीकि की बीमारी का सही जानकारी नहीं होगी ? मगर एक सामान्य भारतीय नारी कैसे अपने पति के बारे में अनुमान लगा सकती है? एक दिन चंदा जी के गंगाराम अस्पताल में चिकित्सा के दौरान हुई घटनाओं के बारे में बताने लगीं। कितने लोग हर रोज़ वहाँ इन्हे देखने आते थे। कवि, लेखक, प्रशंसक, पाठक, सम्पादक और प्रकाशक। कितनों को तो ये जानते तक न थे। उन्हीं में से कितने ही, पूरा सहयोग देने को तैयार। मुझे आराम करने के लिये घर भिजवा कर स्वयं रात रात भर वहाँ रहकर उन्होंने वाल्मीकि जी की सेवा की। वहाँ पर तो खून देने वालों की भी कतार लग गई थी। मगर..... इधर देहरादून में तो तीन चार को छोड़, कोई इन्हे देखने तक भी नहीं आया।

 

मगर तब देहरादून में मौजूद एक ही व्यक्ति उनका पूरा ध्यान रखने को काफी थे। प्रसिद्ध साहित्य-समीक्षक और आर्डनेंस फैक्टरी के संयुक्त महाप्रबंधक श्री शिव बाबू मिश्र ।

 

उन्होंने इस दौरान वाल्मीकि के लिये जितना किया, वह एक मिसाल है। हर तरह की सहायता। भाग दौड़ डाक्टरों से संपर्क। गाड़ी की व्यवस्था । वित्त समस्या का समाधान भी। वह भी एक नहीं, अनेक बार। उन्हें भी वही धुन समाई थी..... भैया जी किसी तरह स्वस्थ्य हो जायें। ऐसे मित्र इस युग में बहुत ही कम देखने में आते हैं।

 

चंदा जी का कभी फोन मुझे आ जाता.... भाई साहब, मुझे थोड़ी देर के लिये बाज़ार जाना है। कई काम अटके पड़े है। आप उतनी देर इनके पास बैठ जायें तो मैं बेफिक्र होकर जा सकूंगी....।

 

मैं उनके पास बैठा रहता और बातें करते रहते। वह कभी बैठे रहते, तो कभी लेट जाते। थोड़ी देर बाद फिर उठ बैठते। उन्हें इस हालत में भी अपने काम की चिंता लगी थी..... अभी कितने काम अधूरे पड़े हैं।

 

इन्हें कौन पूरा करेगा ? मगर इन कामों से भी बढकर मुझे चंदा की चिंता है।

 

समझ में नहीं आता, मेरे बाद इसका क्या होगा! अकेली कैसे यह सम्भाल पायेगी खुद को। इसे तो मैंने कभी एक दिन के लिये भी अलग नहीं किया। जहाँ भी गया, साथ लेकर ही गया।

 

उस समय वाल्मीकि की आंखों से आंसू टपक रहे थे। मैंने सांत्वना देनी चाही। कहा, "आप क्यों उल्टा सीधा सोच रहे हैं? डाक्टरों ने आपकी बीम यह तब मेरी ओर अजीब सी दृष्टि से देख रहे थे। जैसे उन्हें मेह नासमझी पर आश्चर्य हो रहा हो।

 

28 अक्टूबर की सुबह, वह बहुत ही सुस्त और गम्भीर नज़र आये। चेहरे पर पीड़ा का भाव और आंखों में नीं। मैने चिंतित होकर पूछा, "क्या फिर तबीयत खराब है?"

 

बोले "राजेन्द्र यादव चले गये।"

 

"कहाँ चले गये? मेरे मुँह से निकला।

 

"वहीं, जहाँ सभी जाते हैं, हमेशा के लिये।"

 

मुझे भी धक्का लगा। मालूम था, राजेन्द्र यादव किस कद्र चाहते थे ओमप्रकाश वाल्मीकि को। साहित्य की इन बुलंदियों तक उन्हे पहुँचाने वाले राजेन्द्र यादव ही तो थे। मैंने अपने शब्दों में अफ‌सोस ज़ाहिर किया और उनसे हुई दो छोटी छोटी मुलाकातों का भी जिक्र किया। उस दिन हमारे बीच राजेन्द्र यादव के बारे में ही बातें होती रहीं। वह बताने लगे..... मैं जब गंगाराम अस्पताल में भरती था। ऑप्रेशन के तीन चार दिन की बात है। एक दिन यादव जी का फोन आया। पूछा,

 

"ओमप्रकाश, कैसे हो?"

 

"बस, ठीक ही हूँ।"

 

"सुनो, एक बात का ध्यान रहे... मुझ से पहले नहीं जाना।"

 

"ठीक है।"

 

उससे थोड़े दिन बाद वाल्मीकि ने यादव जी को फोन किया। कहा,

 

" मैं आप से मिलना चाहता है"

 

उत्तर मिला, "फिर कभी मिल लेंगे। अभी न मैं कहीं जाने वाला हूँ

 

और न तुम। कभी भी मिल लेंगे।"

 

"नहीं मेरा बहुत मन हो रहा है मिलने के लिये।"

 

"तो ठीक है। मैं राजकमल वालों की गाड़ी भिजवा देता हूँ,

 

अस्पताल में अनुमति लेकर वाल्मीकि कार में बैठ, यादव जी से मिलने चल दिये।

 

अस्वस्थता के बावजूद, यादव जी यारों और कद्रदानों से घिरे बैठे थे। वाल्मीकि भी हाथ मिलाकर बैठ गये। यादव जी उन्हें पहचान नहीं पाये थे। कुछ देर बाद बोले,“ ओमप्रकाश वाल्मीकि को आना या पता नहीं अभी तक।" तब वाल्मीकि ने कहा "मैं यहीं बैठा है आपके पास”

 

दो नवम्बर 2013 की सुबह मुझे हल्का बुखार था। नाश्ता भी ठीक से वहीं ले पाया था। तब भी मैंने सरोज से कहा, "मैं दस मिनट के लिये उपर जा रहा हूँ। जरा वाल्मीकि का पता ले आऊं।"

 

बंदा जी आंगन में, चारपाई पर बैठे वाल्मीकि की बाहों और टांगों पर तेल की मालिश कर रही थीं। गौर किया उनका पूरा शरीर सूख कर कांटा हो चला है। टांगें बाहें सूखी टहनियों सी लटक रही है। चेहरा बुरी तरह विचक कर रह गया है। सांवलापन और अधिक गहरा गया है....।

 

चंदा जो ने बताया, "भूख बिल्कुल नहीं लग रही इन्हें, नींद भी नहीं आती। चिडचिड़ापन बहुत ही बढ़ गया है...."।

 

उनके बचपन के मित्र रामसिंह भी आ पहुँचे।

 

उस दिन वह लगभग एक घंटा लगातार बातें करते रहे। चंदा जी बार-बार उनसे कुछ खा लेने का आग्रह कर रही थीं। मगर वह मना करते जा रहे थे।

 

"थोड़ा सा तो ले लो न."। चंदा जी ने फिर ज़ोर डाला, तो झुंझला कर बोले, "जब एक बार कह दिया, भूख नहीं है, तो क्यों परेशान किये जा रही हो ?"

 

उस दिन हमारी क्या बातें हुई, ठीक से याद नहीं, मगर उनका कहा

 

अंतिम वाक्य था.... लगता है, मेरा अंतिम समय आ गया।

 

मुझे अपना बुखार बढ़ता हुआ महसूस हुआ। मैं उठ खड़ा हुआ और चंदा जी से कहा, "मैं घर पर ही हूँ, कोई जरूरत पड़े, तो मुझे फोन कर दें।"

 

चंदा जी ने बताया कि थोड़ी देर में, मिश्रा जी की गाड़ी आने वाली है। आज इन्देश अस्पताल उन्हें चेकअप के लिये ले जाना है।

 

मगर एक घंटा बाद ही, चंदा जी फोन पर कह रही थीं, "भाई साहब, मैं मैक्स अस्पताल से बोल रही हूँ। इनकी तबीयत काफी बिगड़ गई है। फौरन यहाँ  आ जायें। मैं इस वक्त अकेली हूँ।" 

मुझे तब तक तेज बुखार चड़ चुका था। फोन करके बड़े बेटे पक् उसके दफ्तर से बुलाया और कहा तुम फोरव अपनी मां को लेकर मैक्स पहुँच जाओ।"

 'मैक्स' देहरादून का सबसे महंगा अस्पताल हैं। मगर मिश्र जी काफी भाग दौड़ करके वाल्मीकि को सी० जी० एच० एस० की सदस्यता का कार्ड तैयार करा दिया था और अब यहाँ पर कैशलेस चिकित्सा हो सकती थी।

 पवन और सरोज से पहले मिश्रा जी वहाँ पहुँच चुके थे। वहाँ के एक दो डाक्टर उनके परिचित थे, जिन्होंने तुरन्त वाल्मीकि को सम्भाल लिया।

 लगभग एक घंटा बाद सरोज ने फ़ोन करके मुझे सूचित किया कि वाल्मीकि की हालत में अब काफी सुधार है और अस्पताल में उनके लिये कमरा भी मिल गया है। उसके बाद मुझे बराबर यही सूचना मिलती रही कि वाल्मीकि अब पहले से काफी ठीक हैं। मगर बुखार उतर जाने पर मैं जब अस्पताल पहुंचा, तो बिस्तर में बेसुध पड़े वाल्मीकि को देख, मैं कांप कर रह गया।

 बंद आंखें, मुँह पूरा खुला, चेहरे पर पीलापन। लगातार लम्बी सांसे। गुलकोज़ और शरीर में खुराक पहुँचाने वाली नलियां लगी हुई।

 चंदा जी की बड़ी बहन स्वर्णलता बताने लगीं.... अब हालत में काफी सुधार है। अभी नींद में हैं।

 थोड़ी देर रुक कर मैं और सरोज कमरे से बाहर आये। लिफ्ट से नीचे उतरे। मगर अस्पताल की इमारत से बाहर निकलते ही मुझे बुरी तरह चक्कर आ गया।

 

सरोज घबरा गई। बोली "क्या हुआ आपको ? ठीक तो हैं न ? मैं तब तक थोड़ा सम्भल चुका था। कहा, "मैं तो ठीक हूँ। मगर यहाँ लक्ष्ण कुछ ठीक नहीं मालूम पड़ते। कभी, कुछ भी हो सकता है।"

 सरोज ने मुझे तसल्ली देना चाही। बोली "शुभ-शुभ बोलिये।"

 मेरी तबीयत फिर बिगड़ने लगी थी। बुखार तो फिर नहीं चढ़ा था। मगर शरीर को क्या होता जा रहा था, कुछ समझ में नहीं आ रहा था।

 अस्पताल फोन करने पर हर बार यही उत्तर मिलता, कि वाल्मीकि की हालत में धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। मगर हकीकत यह थी, कि उनकी हालत दिन प्रतिदिन बिगड़ती ही चली जा रही थी। मुझे यह बाद में पता चला कि चंदा जी ने सभी से कह रखा था..... शर्मा भाई साहब को इस बारे में कुछ न बताया जा सकता।

उनकी बड़ी बहन स्वर्णलता और उनके बच्चे, सभी लोग बारी बारी से अस्पताल में ड्यूटी दे रहे थे। वाल्मीकि को कभी आई० सी० में ले जाया जाता तो कभी उन्हें कमरे में शिफ्ट कर दिया जाता।

 

17 नवम्बर 2013 की सुबह डाक्टर ने चंदा जी के भानजे राजीव को अलग बुलाया और कहा, "आप ऐसा कीजिये कि मिसेज वाल्मीकि को महाने धोने या थोड़ा आराम करने के लिये कहकर बिना कुछ बताये घर भेज दीजिये। उनकी अपनी सेहत कुछ ठीक नहीं, इसलिये...."

 राजीव ने चौंक कर डाक्टर की ओर देखा। डॉक्टर ने सिर हिला कर कहा, आई एम सौरी, ही इज़ नो मोर..... मैं पेपर तैयार करा देता हूँ। आप तब तक उन्हें घर भिजवा दें।"

 मैं उस दिन अस्पताल जाने के लिये तैयार हो ही रहा था, बाहर से किसी ने घंटी का बटन दबाया। जाकर देखा। कोई अपरिचित नज़र आये।

 "आप को सूचना देनी थी...... ओमप्रकाश वाल्मीकि नहीं रहे।"

 सामाचार अधिक अनापेक्षित न था, तब भी धक्का बड़े जोर का लगा। आवाज़ मेरे मुँह से न निकल पाई। फिर बड़ी कठिनाई से पूछा,

 "सुबह साढ़े आठ बजे।"

 "मिश्र जी को सूचित करना होगा।"

 "उन्होंने ही मुझे आप को सूचित करने के लिये कहा है। वे लोग बाँडो लेकर वहाँ से चल चुके हैं। इधर पहुँचने हो वाले

 मैं ने सरोज को सूचित किया और वाल्मीकि के घर को और भाग खड़ा हुआ। मैं और एम्बूलेंस, विपरीत दिशा से, एक साथ ही घर के गेट

 पहुँचे। चंदा जी को शायद तब तक भी यह सब मालूम था। मगर एम्बुलैस से जब बोडी निकाल आंगन गईो उन्हें जैसे आंख पर विश्वास न हो पा रहा था। जब विश्वास हुआ तो उन्हें सपना अभय हो रहा था। उनकी दिल दहला दे सिंश्र जी ने मेरी ओर देखा।

र्णलता जी ने बताया.... जाने से दो दिन पहले, मैंने उनसे कहा था "उम्र भर कभी ईश्वर को नहीं माना। मेरे कहने से एक बार तो उसका नाम ले ही लो। उससे शायद..

 वाल्मीकि ज़रा सा मुस्करा दिये। कहा कुछ भी नहीं।

 

अंतिम बार अस्पताल में भरती होने से तीन चार दिन पहले वाल्मीकि मुझ से कह रहे थे....इस बीमारी के दौरान मुझे जो अनुभव हुए, उन्होंने मेरी अब तक की धारणाओं को बदल डाला। इसी पर आधारित मेरा एक लम्बा संस्मरण 'शुक्रवार' के वार्षिकी में छप कर आने वाला है। आप उसे जरुर पढ़ियेगा.....।

 'शुक्रवार' में प्रकाशित उसी संस्मरण की चंद पंक्तियां यहाँ प्रस्तुत करना जरुरी लग रहा है।-

 "इस त्रासद घड़ी ने जहाँ मुझ से बहुत कुछ छीना है, वहीं मुझे बहुत कुछ ऐसा भी दिया है, जिसने मेरे भीतर जीने की एक गहरी ललक पैदा कर दी है। एक बहुत बड़े परिवार से मुझे जोड़ दिया है, जहाँ न जाति की दीवारें हैं, न धर्म की...

 दलित साहित्य के अलमबरदार ओमप्रकाश वाल्मीकि की शुरु से ही यह आदत रही, कि प्रत्येक कार्य के लिये सख़्त मेहनत करो और दौड़ में शामिल अन्य सभी को सुपर सीड करते हुए, आगे बढ़ जाओ और फिर पीछे मुड़कर न देखो..... आर्डनैस फैक्टरी में वह साधारण ट्रेड अप्रेटिंस भरती हुए और देखते ही देखते, सहायक महाप्रबंधक (प्रथम श्रेणी राजपत्रित अधिकारी) के पद तक जा पहुँचे। साहित्य के क्षेत्र में भी, कितने ही भारी दिग्गजों को पछाड़ कर वह शीर्ष स्थान पर पहुँचने में सफल हुए और अब मेरे जैसे कितने ही उम्र दराज़ लोगों को एक ओर धकेल कर वह केवल 63 वर्ष की आयु में वहाँ जा पहुँचे, जहाँ से पीछे मुड़कर देखने का प्रश्न ही नहीं उठता।