Tuesday, June 16, 2026

अवधेश कुमार की कहानी: पानी में तैरता शलगम

 

 

 
 
(अवधेश कुमार पर केन्द्रित इस सीरीज में आज उनकी कहानी ‘पानी में तैरता शलगम ’ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं ) 

इस कहानी के मूल में दुनिया भर में चल रहे कला-विषयक भावोत्तेजक प्रयोग हैं। औद्योगिकीकरण के प्रभाव से सामाजिक व्यवहार में बड़े बदलाव आए हैं। नए किस्म के दृश्य और ध्वनियों से सामना हुआ। वैश्विक राजनीति ने व्यक्ति को असहज और अस्थिर कर दिया। अच्छे जीवन के स्वप्न की तुलना में आत्मिक सुख कम होता गया। बाज़ार को लुभावने विज्ञापनों की ज़रूरत पड़ी।

इस कहानी में Henri Matisse एक पात्र है, जो सफ़ेद काग़ज़ की कतरनों के साथ सफ़ेद हाथी का दुःस्वप्न चित्रित करेगा। कोलाज विधा ने पेंटिंग की विधा को समूचा बदल दिया। कैनवस की सपाट सतह पर अब कतरनें आदि वास्तविक वस्तुएँ चिपकाई जा सकती थीं। कुछ समय पहले से चली आ रही परंपरा को अब कला-सिद्धांत के तर्क हासिल हो चुके थे। एक अन्य पात्र Pablo Picasso (1881-1973) ने स्वीकारते हुए कहा कि सिर्फ़ रंग लगाना ही नहीं, बल्कि वास्तविक चीज़ों को कैनवस पर चिपकाना भी कला है।इसे papier collé नाम दिया गया। अवधेश स्वयं एक बेहतरीन कोलाज कलाकार थे।

इस कथानक के अनुसार Jim Dine “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार”  शीर्षक चित्र में सेब की जगह शलजम चिपका कर  उसके नीचे बड़ी शान से हस्ताक्षर दे मारता है। सेब को अपूर्व ख्याति दिलाने वाले चित्रकारों में Paul Cézanne (France, 1839-1906) प्रमुख हैं। उन्होंने सेब का प्रयोग रंग, रोशनी और स्पेस की अवस्थिति को जानने के लिए किया। इसी तरह बेल्जियम के कलाकारों ने शलजम का खूब प्रयोग किया है। Vincent van Gogh  (Dutch, 1853-1890) की पेंटिंग Still Life of Turnips को याद करते हैं।वे भी कथा-पात्र हैं।

अवधेश दिल्ली की प्रदर्शनियाँ देखते थे और कला-विषयक पुस्तकें पढ़ते थे। उनका काम रेखाचित्र और कोलाज पर आधारित रहा। उन्होंने किसी कला संस्थान से विधिवत शिक्षा नहीं ली।यह कहानी उन्होंने एक पेंटिंग की तरह रची है। यह अपने आप  में जिम डाइन की चर्चित पेंटिंग “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार” की विवेचना है। साहित्य के पाठकों को यह बताना इसका उद्देश्य है कि चित्रकला, कला-संवेदन के आधार पर प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों का विवेकसंगत उद्घाटन करती है। इसकी

संभावनाएँ असीमित हैं। अपनी ज्ञानात्मक संवेदना, कला-संवेदना, भावप्रवणता और अन्वेषणात्मक ऊर्जा को घनीभूत करते हुए नई राहें खोजी जा सकती हैं। एक चित्रकार किसी लिखित पाठ के अंतस में प्रवेश कर सकता है। कवयित्री Anne Waldman के रचनात्मक व्यक्तित्व को रूपाकारों में व्यक्त कर देना एक बड़ी बौद्धिक घटना है। अवधेश इस कहानी में यही कह रहे हैं। आधुनिक कला-आविष्कारों से अनुप्रेरित अवधेश रोशनी और स्पेस को दृश्य रूप में जान पाते हैं।इन पंक्तियों पर ध्यान देना रोचक होगा—

“जिम डाइन, एन को ढूँढ़ने एक बार अतीत में गया, दूसरी बार भविष्य में और तीसरी बार वर्तमान में। किन्तु एन फिर कभी उसकी पकड़ में नहीं आई। वह फिसल जाती थी—कभी अतीत में, कभी भविष्य में।”

यानि कला-अनुभव कौंध की तरह अनुभूत होते हैं। उन्हें कठिन साधना और धैर्य से पाया जाता है। आकस्मिकता का पल तभी संभवहोता है।

अवधेश की यह व्याख्या (interpretation) आगे जाकर तभी पूर्ण  होती है, जब वे स्वयं अतियथार्थवादी शैली में अपनी रचना तक  पहुँचने में क़ामयाब होते हैं। Salvador Dalí भी कथानक का पात्र है।

अंत तक पहुँचते हुए पेंटिंग-सदृश यह गद्य एक पेंटिंग की तरह  दृश्यमान होता है—


 ''कहते हैं कि जिम डाइन, टेस्ट ट्यूब की शक्ल के एक पॉलीथीन बैग में पानी भरता है और एन को उसके ऊपर स्टीकर की तरह चिपका देता है।

फिर—

कला की अभिव्यक्ति में परिवर्तन और विकास के ख़ातिर, संशोधित रूप में, उस लुंजपुंज पहलवान की जाँघ के बीच उसे लटका आता है।”


यहाँ पुरुष-लिंग का संदर्भ भी संभवतः किसी महान चित्रकार की पेंटिंग से जुड़ा है। कला की स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है। महान कला प्रकृति का अन्वेषण करती है। उसकी विराटता का स्पर्श करती

है। केंद्र में मनुष्य की उपस्थिति हर सूरत में अनिवार्य है। महान कला या साहित्य अपने लोक से गहराई से जुड़कर आत्म के विस्तार पर संभव होता है। कलाकार दुनिया के लिए यह ज़िम्मेदारी लेता है।

सच्चाई यह है कि वही प्राकृतिक सौंदर्य को सच्चाई के साथ अनुभव करता है। हिमालय के सौंदर्य की अनुभूति चरवाहों और घसियारियों से ज़्यादा गहन कोई नहीं कर सकता। बस, वे इस अनुभूति के बदले में कोई खास पहचान पाने को उत्सुक नहीं होते।

उच्च हिमालय की एक अधेड़ किसान महिला को अपने एकांत में गाते सुना। किसी श्रोता के लिए नहीं, बल्कि निर्जन जंगल में अपनी उदासी और पीड़ा को व्यक्त करने के लिए। किसी अदृश्य शक्ति को संबोधित करते हुए उसका आलाप किसी भी दक्ष गायक से ज़्यादा मार्मिक और परिपक्व लगा। सामने बर्फ़ से आच्छादित चोटियाँ, विशालकाय चट्टानें और घने जंगल दृश्य में उभरने लगे।

आत्म के विस्तार से कला सामान्य जनों की अनुभूति तक पहुँचसकती है।

अवधेश की यह कहानी ऐसी संभावनाओं की रचना है।

-राजेश सकलानी 

(इस आलेख के साथ यहां प्रदर्शित दो चित्र चित्रकार जिम डाइन के कला शिल्प और अवधेश कुमार की कहानी के आधार पर AI द्वारा तैयार किए गए  हैं।) 

 

 



Thursday, June 11, 2026

अवधेश कुमार स्मरण

 

 

 


 

 (अवधेश कुमार पर केन्द्रित  विशेष शृँखला के क्रम में    कथाकार अरुण कुमार ‘असफल’ अवधेश को याद करते हुए उस वक्त के देहरादून को भी जी  रहे हैं )

 

                                     मैं अब भी उनके निशान ढूढ़ता हूँ                      

                                         अरुण कुमार  ‘असफल’ 

 

अपने शहर देहरादून में कला और संस्कृति से जुड़ी युवा पीढ़ी को शायद ही यह बात मालूम हो कि उनके शहर में कभी ऐसी बहुमुखी  प्रतिभा रहा करती थी, जिसकी कविताएं सन 1979 में अज्ञेय द्वारा संपादित ’ चौथा सप्तक’ में संकलित हो चुकी थी, जिसकी कहानियां सारिका, हँस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होतीं थीं, जिसके बनाए चित्रों से उस दौर के प्रायः सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के बाहरी और भीतरी भाग सुसज्जित हुआ करते थे और जिसके लिखे नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ को लोगों ने मुक्त कंठ से सराहा था। कहानी, कविता, नाटक और कला के बाद बचता ही क्या था, गीत और संगीत ही न! इस विधा में यह प्रतिभा कितनी समृद्ध थी, यह तो नहीं मालूम, लेकिन मैं ने इस प्रतिभा को गीत संगीत की बारीकियां बखान करते सुना था। इतना कुछ बता देने के पश्चात भी मुझे शंका है कि कुछ लोगों की ज़ेहन में उस प्रतिभा का नाम कौंधा होगा। लीजिए मैं ही बता देता हूँ कि उस प्रतिभा का नाम था, अवधेश कुमार, जो कि मात्र सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में कला से विमुख होते जाते इस समाज को अलविदा कह गया। मुझे इस बात का आज तक मलाल है कि उस जीनियस के साथ मुझे बहुत कम समय तक रहने का अवसर मिल पाया था। तारीख़ तो मुझे याद नही, पर वर्ष 1995 और मौसम बरसात का था जब देहरादून के हिन्दी भवन में कथाकार जितेन ठाकुर के कथा संकलन ‘अजनबी शहर में’ का लोकार्पण हुआ था और मुझे देहरादून में और इसके आसपास रहकर सृजनरत कई रचनाकरों से एक साथ मिलने का पहला अवसर मिला था। इनमें ’ टिहरी की कहानियां’ के लेखक विद्यासागर नौटियाल, ‘चढाई’ के कहानीकार नवीन कुमार नैथानी, ‘जबड़े’ और ‘वैक्यूम’ जैसी सशक्त कहानियों के रचनाकार विजय प्रताप आदि से मिलने का सौभाग्य मिला था। अवधेश जी से पहली मुलाकात  भी उसी गोष्ठी में हुई थी। छोटा कद, मासूम चेहरा और उस पर बाल सुलभ मुस्कान। ये सारी खूबियां उनकी उम्र को कम कर देती थी। उनका जन्म 7 जून 1951 को हुआ था। उस हिसाब से उस वक्त उनकी वास्तविक उम्र 44 वर्ष थी लेकिन वे तीस बत्तीस के ऊपर शायद ही लगते थे। उनकी इस कुदरती गुण की वजह से मुझ जैसे अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों को उनसे दोस्ती गांठने की पहल करने में संकोच नहीं होता था। उस दिन मैंने उन्हें पहली बार देखा था, संपर्क भले ही न कर सका था लेकिन आगे इस बात की पहल करने की इच्छा तो जाग्रत हो गई थी। जब जनवरी 1996 में संवेदना संस्था की वार्षिक गोष्ठी हुई तो यह इच्छा पूर्ण होने का अवसर आ ही गया । वह गोष्ठी दून स्कूल के कैम्पस में संपन्न हुई थी। इस गोष्ठी में अवधेश जी द्वारा तैयार किए गए कुछ कविता पोस्टर तथा कोलॉज भी प्रदर्शित थे। मैं उन चित्रों को देखते हुए उनमें निहितार्थ समझने की कोशिश करने लगा। एक तो उनका निश्चल व्यक्तित्व, दूसरा संवेदना का अनौपचारिक माहौल, मुझे उनके नजदीक जाने में कोई संकोच न हुआ। पास जाकर मैंने उनसे चित्रकारी के गुर सिखाने का अनुरोध किया था। मुझे याद है कि उन्होने मेरे अनुरोध के पश्चात मुस्कराया भर नहीं था, अपितु वे ठठाकार हँस दिए थे। यह उनके इंकार करने का तरीका था जो किसी का दिल नहीं दुखाता था। उन्होने उसके बाद मुझे बताया कि उन्होने स्वयं इस कला का कहीं से प्रशिक्षण नही लिया था। यह सत्य था कि अवधेश जी अपनी लगन और कला के प्रति लगाव के चलते ही इसमें इतनी दक्षता प्राप्त कर ली थी कि उनके बनाए चित्र और कोलॉज लोगों का ध्यान खींचने में सफल होते थे। कोलॉज तो उस वक्त भारत में अपने आंरभिक दौर में था और अभी इतना प्रचलित नहीं हुआ था। इसकी नींव ही बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में पेरिस में दो महान चित्रकारों पाब्लो पिकासो और जार्ज ब्रेक द्वारा हुई थी और भारत के कला महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इसे शामिल हुए काफी समय नहीं हुआ था। ऐसे वक्त में अवधेश जी इस कला में स्व प्रशिक्षण द्वारा पारंगत हो गए थे और शायद यही अपेक्षा औरों से करतें थे। वास्तव में दृश्य और सौन्दर्य के विभिन्न टुकड़ो को मिलाकर बनाए हुए उनके कोलॉज काफी आकर्षक और अर्थपूर्ण होतें थें। यही कारण था कि उस दौर की कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं के मुख्यपृष्ठ उनके कोलॉज द्वारा सुसज्जित होते थे। जिंदगी की दुश्वारियों, असमानताओं और शोषण को व्यक्त करने के लिए उन्हें  कोलॉज ही सबसे मुफीद माध्यम लगता था और उनकी रचनाओं विशेषकर कविताओं में भी उसके निशान दिख जातें हैं। उदाहरणर्थ उनकी  ‘ फूल, काँच, मुर्गा वगैरह’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां हैं - 

  

       

चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक


रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।


इन चार पंक्तियों में पूरी कविता का भाव तो है ही साथ ही इस में यह भी संकेत है कि प्रकृति के विभिन्न अवयव मिल कर  एक नया जीवन्त और अर्थपूर्ण दृश्य की रचना करतें हैं, और कोलॉज कला का यही मूल तत्व होता है। कोलॉज में माहिर इस कलाकर ने संवेदना की उस गोष्ठी में मेरे आग्रह को इसलिए भी ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी जिन्दगी में गुरू शिष्य जैसे गैर बराबरी के रिश्ते का कोई महत्व नहीं था। वास्तव में मैंने उन्हे कई लोगों को मजाक के तौर पर ‘गुरू जी’ कह कर संबोधित करते सुना था। उनके लिए दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं था और इसी रिश्ते की डोरी से मुझे बाँध लिया था। एक तरह से, संवेदना की उस गोष्ठी में उन्होने शिष्य के लिए ‘न’ कहा था पर दोस्ती के लिए हाँ कहा था । भले ही अंतरंगता के स्तर पर न हो, पर यह भी मेरे लिए कम गौरव की बात नहीं थी कि ‘ चौथा सप्तक ’ का कवि और दून घाटी का सांस्कृतिक नायक मेरा मित्र बन गया था। वे अक्सर शाम को, दफ्तर छूटने के समय दफ्तर के बाहर आ जाते थे और मेरे साथ स्कूटर पर मेरे घर आ जाते थे। तब मैं सहस्त्रधारा क्रासिंग के पास किराए पर एक कमरा लेकर रहा करता था। शादी हुई नही थी, सो साहित्यिक गपशप के लिए वह जगह बहुत मुफीद थी। थोड़ी ही देर में वहाँ कोई तीसरा जैसे नवीन नैथानी, हरजीत या राजेंश सकलानी या एक एक करके सभी आ जाते थे। योगेन्द्र आहूजा की उस समय ‘ गलत ’ कहानी पहल पत्रिका में छप कर चर्चित हुई थी। उनकी उपस्थिति भी कभी कभी उस कमरे में हो जाती थी। जब कमरे में केवल अवधेश जी ही रहते थे तो वे मेरी तुरन्त लिखी हुई कहानी जरूर पढ़ने को मांगते थे। इस तरह से मेरी कहानियों के पहले पाठक अवधेश जी थे। वे हर रचना पर  ईमानदारीपूर्वक प्रतिक्रिया देते थे और यदि उस विषय पर किसी अन्य की रचना उनके ज़ेहन में होती तो ज़रूर उसे पढ़ने की सलाह देते। जब तीन या उससे ज्यादा लोग होते थे तो मेरे लिए मानों उत्सव का अवसर होता था। तब साहित्य और कला की विविध विषयों पर खूब चर्चाएं हुआ करतीं थीं। एक रचनाकार के लिए इन बहस मुबाहिसों का बहुत महत्व होता हैं। इनसे साहित्य को जांचने परखने की दृष्टि विकसित होती है। साहित्यिक गपशप करते हुए, मिलजुल कर सभी खाना बनाते थे। कोई सब्ज़ियां काटता था, कोई आटा गूँथता था तो कोई रोटी बनाने की ज़िम्मेदारी लेता था। गोश्त मछली भी खूब बनता था। सभी के घरों की रसोईयां निरामिषी थीं, अतः मेरा घर कई अतृप्त आत्माओं को तुष्टि प्रदान करता था। सचमुच वह मेरी रचनात्मक यात्रा का अविस्मरणीय पड़ाव था। भोजन बनानेे से लेकर भोजन करने तक बतकही होती रहती।  अक्सर, देर रात होते होते, सकलानी, आहूजा और हरजीत चले जाते थे। लेकिन अवधेश एवं नैथानी जी टिके रहते थे। बारह बाई बारह के उस कमरे में चार बाई छः का दीवान सदैव बिछा रहता था जिस पर मैं सोता था। लेकिन जब नैथानी और अवधेश जी को रुकना होता था तो यह दीवान उनके लिए ’ रिज़र्व’ हो जाता था और मैं उनके बगल में फोल्डिंग चारपाई डाल कर पसर जाता था। खा पीकर लेटने के पश्चात विमर्श का दूसरा चरण आरम्भ होता था। इसमें सर्वाधिक भूमिका अवधेश जी की ही होती थी। उनके पास बताने को बहुत कुछ होता था जिसे हम दोनों सुनने को व्याकुल रहते थे। हमारे लिए सुकून की बात यह थी कि घर का मकान मालिक उस मकान में नही रहता था और उसने घर के मुख्य भाग को भी किराए पर चढ़ा दिया था जिसमें एक ईसाई परिवार रहता था जो मेरी फ़िक्र तो करता था पर मेरे मामले में दखल नही देता था। एक और बात थी, अवधेश जी, बड़बोले प्रवृत्ति के न थे। वे बहुत मद्धिम स्वर में बड़ी बड़ी बातें करते थे। कहीं गोष्ठी वगैरह में शान्तिपूर्वक बैठे रहते और बोलने की बारी आने पर थोड़ा बोल कर ज्यादा बोलने वालों पर भारी पड़ जाते थे। मुझे संवेदना की एक और गोष्ठी भी याद है जो सन 1997 में पीडब्ल्यू गेस्ट हाउस में हुई थी। यह एक विशेष गोष्ठी थी जिसमें चर्चा का विषय था ‘ वर्चस्व की राजनीति’ और मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार - विष्णु चंद्र शर्मा। उस गोष्ठी में अधिकांश ने  अपनी बात रखी थी, लेकिन अवधेश जी शान्तिपूर्वक बैठे रहे थे। तब विष्णु चन्द्र शर्मा का ध्यान उन पर गया और उन्होने उनसे भी कुछ बोलने का अनुरोध किया। तब अवधेश जी ने विषयानुकूल एक कविता सुनाकर सबको लाजवाब कर दिया था। अवधेश जी की तुलना किसी साहित्यकार से की जा सकती है तो वे थे, भुवनेश्वर। भुवनेश्वर भी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे और उनकी मृत्यु भी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में कम उम्र में ही हो गई थी। भुवनेश्वर की जो एक मात्र तस्वीर साहित्य की दुनिया में उपलब्ध है, उसे अगर सरसरी तौर पर देखें तो अवधेश जी के होने का भ्रम हो जाता है। भुवनेश्वर के बारे में भी कहा जाता था कि साहित्यिक आयोजनों में वे चुपचाप बैठे रहतें थे फिर कुछ ऐसा सारगर्भित व्यक्त करते थे कि लोग अवाक रह जाते थे। परन्तु अंतरंग मित्रों में काफी वाचाल हो जाते थे, मानो जो कुछ भीतर दबा था उसे अपने घनिष्ठों के बीच ही उद्घाटित करना चाहतें हों। अवधेश जी के साथ भी ऐसी ही स्थिति थी। जहाँ तक उनके घनिष्ठ मित्रों की बात थी, तो यह उनकी बातचीत से ही ज़ाहिर होता था कि देहरादून में एक समय चर्चित रहे कवि देशबन्धु उनके घनिष्ठतम मित्र थे। लेकिन उनकी मृत्यु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में युवावस्था में ही अस्सी के दशक में हो गई थी। उसके बाद गजलकार हरजीत उनके सबसे करीबी दोस्त बन गए थे। देहरादून में एक समय यह जोड़ी काफी प्रसिद्ध हो गई थी। मयख़ाना से लेकर छापाख़ाना तक दोनो साथ ही साथ दिखते। फिर नब्बे का दशक बीतते बीतते इस जोड़ी में नवीन नैथानी ने प्रवेश करके तिकड़ी का रूप दे दिया। जब भी यह तिकड़ी मेरे घर होती, मेरा दिल बल्लियों उछला हुआ होता। वास्तव में इस तिकड़ी के गपशप में मुझे अपनी बात रखने का अवसर कम मिलता था। सच बात तो यह थी कि मुझे इस बात की इच्छा ही नही होती थी। मैं तो जिज्ञासु भाव से उनकी, विशेषकर अवधेश जी के बातों का आनन्द लेता था। क्योंकि यही दुर्लभ अवसर होता था जब कोई उन्हे दिल खोल कर बोलते हुए सुन सकता था। मानों एनसाइक्लोपीडिया उनकी वाणी में घुल कर बहती थी। साहित्य सिनेमा, संगीत, चित्रकला आदि कोई ऐसा विषय नहीं था जिनमे उनकी पकड़ न हो। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सब उनके स्वाध्याय का प्रतिफलन था। इसलिए उनका अन्दाजे बयां, अलग और रोचक हुआ करता था। एक बार यह तिकड़ी मेरे घर पर जमी हुई थी। भोजनोपरांत हरजीत चले गए और उसके बाद अवधेश जी और नवीन नैथानी दीवान पर पसर गए। मैं भी बगल में चारपाई डालकर लेट गया था। मुझे याद नही कि कौन सा प्रसंग आया था कि अवधेश जी साहित्य और कला से विषयांतर करके मुद्रण तकनीक की बारीकियां बखान करने में लग गए थे। अवधेश जी रात भर बताते रहे कि किस प्रकार से एक एक अक्षर जोड़ कर शब्द बनाए जाते थे, उसके बाद पंक्तियां बनतीं थी, किस प्रकार से रंगों का संयोजन होता था आदि आदि। मुद्रण और प्रकाशन से संबंधित जितनी बारीकियां थीं उनका इतना यथार्थपरक वर्णन, मानों कोई डाक्यूमेंटरी फिल्म चल रही हो। दरअसल, अवधेश जी पूर्णकालिक सांस्कृतिककर्मी थे। साहित्य और कला उनके शौक भी थे और रोजी रोटी का साधन भी। अब तो देहरादून में मुद्रण-प्रकाशन की बहुत सारी संस्थाएं हैं, लेकिन आज से पच्चीस तीस साल पहले देहरादून इस लिहाज से विपन्न था। तब हिंदी क्षेत्र में मुद्रण और प्रकाशन के लिए तीन शहर सर्वाधिक प्रसिद्ध थे- दिल्ली, मेरठ और इलाहाबाद। मेरठ में ज्यादातर पाठ्य पुस्तकों का काम होता था। वहाँ अवधेश जी जैसे कल्पनाशील कलाकार के लिए कोई जगह नही थी। अन्ततः उन्हे काम के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। वे संपादकों और प्रकाशकों से काम इकठ्ठा करके देहरादून आ जाते थे और घर पर इत्मीनान से डिज़ाइन बनाया करते थे। क्योंकि दिल्ली में लंबे समय तक रुकने का मतलब था होटल या मकान किराए का अतिरिक्त व्यय। लेकिन कभी कभी काम के सिलसिले में उन्हे दिल्ली रुकना आवश्यक हो जाता था तो वे उन्ही मुद्रण या प्रकाशन संस्थानों में रुक जाते थे। उन्होने मुद्रण सबंधी बारीकियां अपने इन्हीं पड़ावों के दौरान जानी थी। यह उनका जीवन के हर क्षण और आयाम में इनवाल्वमेंट का प्रमाण था। उनकी यह इनवाल्वमेंट या रम जाने की प्रवृत्ति हर रचनात्मक कर्म में दिखती थी। जिसका एक उदाहरण उनका लिख नाटक ‘ सूखी धरती, प्यासा मन’ है। उन्होने यह नाटक सन 1987 में लिखा था। यह नाटक उनकी कल्पना की उपज मात्र न था। इसके लिए उन्होने अच्छा खासा होमवर्क किया था। काफी समय तो उन्होनेे अपने रंगकर्मी दोस्तों के साथ ‘सूखा’ पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों और आंकडों का संकलन किया था। उसके बाद सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर स्थिति की भयावहता को करीब से देखा था। तब जाकर इतना उम्दा नाटक लिखा कि देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में इस पर प्रंशसात्मक टिप्पणियां प्रकाशित हुईं थीं। अपने काम में रमना उनका स्वाभाव हो सकता था लेकिन यह बात उनके आर्थिक हितों के विरुद्ध जाती थी। वे अपने काम का वर्गीकरण पेशेवर ढंग से नही कर पाते थे। जिन कामों में कम पैसे मिलने होते थे उसमें भी वे खूब मन लगाकर काम करते थे। जिससे बहुत से काम समय पर पूरा नही हो पाते थे। एक बार घोसी गली स्थित जब मैं उनके घर गया तो उनके एक पुराने ग्राहक को बैठा पाया था। उससे मैं भी थोड़ा थोड़ा परिचित हो गया था। उसनेे अवधेश जी को एक सेमिनार हेतु पोस्टर बनाने को दिया था। सेमिनार होने में दो एक दिन ही रह गए थे और पोस्टर अभी तैयार नही हुआ था। इसीलिए वह वहीं बैठकर ( दूसरे शब्दों में, सर पर सवार होकर) काम करवा रहा था और अवधेश जी पास में हीं बैठकर, एक जेनुइन कलाकार की तरह, रंग और ब्रुश से तल्लीनता से काम किए जा रहे थे। मानो किसी प्रतिष्ठित कलादीर्घा में लटकाने हेतु कोई मास्टरपीस तैयार कर रहें हों। उनका वह परिचित ग्राहक मेरे कान में फुसफुसाते हुए दुखड़ा रोने लगा था कि अवधेश जी उसके साथ हर बार ऐसा ही करते थे और उसेे हर बार धरना देकर काम कराना पड़ता था। दुख की बात यह थी कि हर ग्राहक उनका दोस्त या परिचित नही होता था। फलतः उन्हे काम मिलना बन्द हो गया। धीरे धीरे एक बोहेमियन प्रवृत्ति उनके अन्दर पनपने लगी थी, अर्थात दीन दुनिया से बेख़बर रहना, काम पर ध्यान न देना, अपनी बात पर पक्के न रहना आदि आदि। हम यार दोस्त उनकी इस प्रवृत्ति से कम, उनके पीने की लत से ज्यादा चिंतित थे। यूँ तो शौकिया तौर पर वे तो पीते ही थे। दिल्ली में जब रहते थे तो साहित्यिक महफ़िलों में बेगिलास तो वे बैठतें न होगें। लेकिन तब यह उनका शौक था, ज़रूरत नहीं। जो उनके पुराने दोस्त थे वे बताते थे कि अवधेश जी  पीने के लिए इस कदर पहले कभी बेचैन नही होते थे। सन 1996 के बाद से उनके अन्दर आश्चर्यजनक बदलाव देखा जा रहा था। उन्हे कोई गम न था न ही कोई हताशा थी, लेकिन उनका उच्छृंृंखल स्वाभाव जरूर था, जो किसी भी चीज को गंभीरता से नही ले रहा था, पीने को भी नही। अपने इसी उच्छृंखल स्वाभाव के कारण वे किसी नौकरी से नहीं बंध पाए थे। अगर कोई नौकरी कर रहे होते तो उनकी एक अनुशाषनबद्ध जिन्दगी होती और पीने पिलाने की ओर ध्यान कम जा पाता। नौकरी  नही थी और काम मिलना भी बन्द हो गया था। उनके पास समय ही समय था। जबकि यार दोस्त काम धन्धें में फंसे रहते थे और अवधेशजी को अक्सर दिन का समय अकेले में व्यतीत करना होता था। उन्हे इस समय को काटने के लिए मद्यपान ही सर्वाधिक उपयुक्त लगा होगा। फिर ऐसी स्थिति आ गई कि सारे यार दोस्तों पर शराब ही सबसे भारी पड़ गई और फिर उनका भी वही हाल हुआ जो भुवनेश्वर का हुआ था। उसके बाद यह शहर एक बहुमुखी प्रतिभा की पतन का गवाह बना। लंबे समय तक अवधेश जी को किसी ने न कुछ रंगते देखा न लिखते। एक लंबे अन्तराल के बाद सन 1998 की सर्दियों में उन्होने एक लंबी कहानी ‘ टाँड़’ आरंभ की थी। उन्होने उसके प्रारिंभक अंश मुझे सुनाए थे और मुझे यह एक अच्छी कहानी की शुरूआत लगी थी। देहरादून के सभी रचनाकारों को खुशी हुई थी कि उनका दोस्त रचनात्मक रूप से फिर से सक्रिय हो रहा था। हालांकि अनियंत्रित रूप से पीने के कारण उनका शरीर काफी कमजोर हो गया था लेकिन इस लंबी रचना को रचते हुए, एक जिजीविषापूर्ण चमक उनके चेहरे पर ज़रूर आ गई थी।  वर्ष 1998 के समाप्त होते होते मैं अल्प समय के लिए देहरादून से बाहर चला गया था। मुझे जरा भी अंदेशा नही था कि जब वापस लौटूंगा तो अवधेश जी को नहीं पाऊंगा। दरअसल अत्याधिक मद्यपान से उनकी आंतों का इतना नुकसान हो गया था कि बिल्कुल छोड़े बिना बचना मुश्किल था। अवधेशजी ने पीना कम तो कर दिया था, लेकिन छोड़ा नही था। अब वे सगे संबंधियों और यार दोस्तों से छुपा कर पीने लगे थे। लेकिन मृत्यु चोरी छुपे नही आई। 19 जनवरी 1999 के दिन में ही देहरादून शहर ने एक प्रतिभाशाली और संभावनाशील कलाकार को खो दिया। सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में ही उनका एक कहानी संग्रह ‘ उसकी भूमिका’, एक कविता संग्रह ‘ जिप्सी लड़की’ तथा एक चर्चित नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ प्रकाशित हो चुके थे। उनकी और भी रचनाएं रही होंगी जो संकलित और प्रकाशित होने से रह गईं होगीं। लेकिन वे प्राप्त नही हो सके। मुझे किसी से पता चला था कि अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होन बहुत सारे कागज पत्रों को जला दिया था। शायद उसमें उनकी कहानी ‘ टाँड़ ’ भी रही हो, अपूर्ण ही सही। अवधेश जी को दुनिया छोड़े बीस वर्ष हो गए हैं। आज भी जब मैं घोसी गली के पास से गुजरता हूँ तो उनकी कविता ‘ चीते का प्यार’ की निम्न पंक्तियां ध्यान में आतीं हैं -

 

तुम्हारे भीगे हुए शरीर की उनींदीं पगडंडियों पर

एक किशोर की तरह चलता हुआ मैं छोड़ता हूँ

अपने पंजों की छाप , बादलों से भरी इस चाँदनी रात में ’

 

और मैं अब भी ढूढ़ता हूँ उनके निशान, जो मिटने से रह गए हों।

 

 

Saturday, June 6, 2026

अवधेश कुमार की कविताएँ

 

 

 


 

अवधेश कुमार(7     - 

 

(सात जून अवधेश कुमार का जन्मदिन है।उन्होंने सृजन के लिये  बहुत सारे कला-रुपों को अपनाया ।  आज से  हम उन्हें याद करते हुए एक विशेष श्रृंखला शुरु करने जा रहे हैं। पहली कड़ी मे  1980 मे प्रकाशित उनके एकमात्र कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ से कुछ  कविताएँ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं।)

 

अवधेश का पहला और अकेला काव्य संग्रह " जिप्सी लड़की " वर्ष 1980 में प्रकाशित हुआ। तब वे मात्र 29 वर्ष के थे और अज्ञेय के चौथा सप्तक का हिस्सा बन चुके थे। देहरादून जैसे छोटे शहर के युवा रचनाकार के लिए यह बड़ी बात थी। दिल्ली के मशहूर साहित्यकारों के बीच उनकी अच्छी पहचान बन चुकी थी। धीर गंभीर संपादक अज्ञेय से वे बेझिझक मिलते थे। संग्रह की भूमिका में विष्णु खरे लिखते हैं कि हिन्दी का युवा कवि देश की सामाजिक राजनीतिक स्थितियों के कारण प्रौढ़ कविता लिखने को बाध्य होता है। छटे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ ?
यह अवधेश की  विशिष्टता है कि युवा सुलभ स्वतन्त्रता, चंचलता, जीवंतता, निश्चिंतता, आत्म निर्भरता और जोख़िम उठाने की साहसिकता जैसी प्रवृतियां  साहित्य में अपनी जगह बनातीं हैं। 
 पहली कविता " फूल, कांच, मुर्गे वगैरह " में मृत्यु सामान्य घटना बन जाती है। वे कामना करते हैं कि
 

‘ कोई मरी हुई चीज़, ताजी;
आज़ाद रहे बहुत देर तक 

रहे बहुत देर तक ज़िन्दा, 
मरने के बाद भी. ’

              यह मानवीय आकांक्षा और यह शिल्प एक जीवंत युवा ही ले कर आ सकता है। भौतिक और भावनात्मक दुनिया के बीच संतुलन , ऐंद्रिकता और सौन्दर्य दृष्टि हिन्दी कविता को एक आधुनिक और नया अनुभव देती है। इनमें किसी बड़े बदलाव की घोषणा नहीं है लेकिन  संयत उल्लास और सामाजिक लगाव का बर्ताव है। फूल, कांच और मुर्गा, ये संज्ञाएं एक जगह पर आधुनिक कला के संवेदन से रचना में मौज़ूद हैं। यह चित्रकला सदृश काव्य सौन्दर्य है।अपने दौर की कविताओं से यह भिन्नता सुखद है।
         जिप्सी लड़की काव्य संग्रह में तत्कालीन राजनीतिक आंदोलनों का सीधा प्रभाव नहीं दिखता है लेकिन ये कविताएं अपने  समाज के चरित्र और उसकी असफलताओं - निराशाओं से स्वाभाविक और गतिशील संबंध बनाए रखतीं हैं। ‘ चिरे हुए आदमी की गंध ’ या ‘चिंता की जमुहाई ’ जैसी रचनाएं इसका उदाहरण हैं। ‘चौथा सप्तक’ में प्रकाशित अपनी कविताओं से वे आगे बढ़ चुके थे। कई बार कहने के बावज़ूद उन्होने पुस्तक नहीं दिखाई जो तब बाज़ार में भी उपलब्ध नहीं थी। ( अभी हाल ही  में उसका पुन: प्रकाशन हुआ है। )

          एक कलाकार की तरह अवधेश अपने कथ्य को शान्त और सौम्य तरह से रखते हैं। वे सपना देखते हैं ('कुछ नहीं तो ')


 कुछ नहीं तो बस यही कि उस सपने में सबको 
सबके सब दिखाई दिये हों 

अपने अपने एक जैसे सपनों के साथ। 
 

‘भूख की सीमा से बाहर ’  कविता लघु फ़िल्म की तरह लगती है। इसकी गतिशील चित्रात्मकता और नाटकीयता की पृष्ठभूमि में सामाजिक विट का कलात्मक संयोजन  है। इस तरह की कविताएं (और लघु कथाएं) लिखने वाले अवधेश संभवत हिन्दी के अकेले रचनाकार हैं। उनकी लघु कथाएं और कविताएं अपनी बनावट और आंतरिक अनुशासन में एक समान लगतीं हैं। चित्रकला जैसी दृश्यात्मकता और प्रभाव अंतरधारा में महसूस होता है।
           ‘ बैलाडीला (बस्तर) : 5 अप्रेल 1978 ’ शीर्षक  कविता चौथा सप्तक के पूर्व लिखी गई थी। पहली पंक्ति ‘ तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए ’ से शुरू हो कर यहां समाप्त होती है 

  तेरी ताक़त तेरे बेइन्तिहा जुनून में है, 
तेरा बदला तेरे दुश्मन के ख़ून में है  


          संग्रह की   शीर्षक कविता ‘ जिप्सी लड़की ’ और  अन्य कई कविताएं युवोचित उत्साह और सौन्दर्यपरकता के  बेहतरीन उदाहरण हैं जिनमें उन्होंने नए मोटिफ और मानवीय प्रयोजन सलीके से पिरोए हैं। ‘जिप्सी’ शब्द भारतीय नहीं है। लेकिन कवि इस भेद के आधीन नहीं है। यह रूमानियत और सार्वजनीनता का विस्तार करता है ।यह दिलचस्प रचना है।‘ मैने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की ’ से शुरू होती रचना नाटकीय तरह से एक सान्द्र और ऐन्द्रिक अनुभव पर ख़त्म होती है -


   खुशनसीब है तू  
   ओ जिप्सी लड़की 
   तुझे मिला प्यार 
   दोनों तरह के जंगलीपन का 
              
इस एकमात्र संकलन की सभी कविताएं भाषा और शिल्प के  नएपन के कारण उल्लेखनीय हैं। आधुनिक कला का प्रभाव लिए ये कविताएं संभवत भविष्य में भी याद की जाएंगी।‘ जिप्सी लड़की’ अवधेश कुमार का एकमात्र प्रकाशित काव्य संग्रह है।दूसरे संग्रह के लिए तैयार की गई पांडुलिपि को उन्होने किन्ही निराश क्षणों में आग के हवाले कर दिया था ।यह हादसा चौदह जनवरी 1999 को उनके निधन से कुछ माह पूर्व  हुआ । उनकी बहुत सारी रचनाएं और रेखाचित्र  नष्ट हो गए। अन्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएं फ़िलहाल उपलब्ध नहीं हैं।  ‘जनसत्ता’ के साहित्यिक परिशिष्ट में दिल्ली पर लिखी गज़ल शायद किसी शायर दोस्त को जबाव देने के लिए लिखी थी।
       इस संकलन में प्रकाशित 51 कविताएं संयत आवेग ,लयात्मक भाषा और अन्वेषणात्मक शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करतीं हैं। एक युवा कलाकार का  धैर्य ,स्पष्टता  और परिवेश से रागात्मक लगाव कविता के तत्व के रूप में इनमें मौज़ूद है। 
      ' फूल, कांच ,मुर्गा वगैरह ' के साथ चाकू, टेबल क्लाथ ,छुरी, पेड़, आदि भी सजीव पात्र हैं। अपने सजीव व्यवहार के साथ।मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करने के लिए। - राजेश सकलानी  

 

 

  • मुक्ति एक आद्योपांत 

 

जिस तरह नदी किनारे उगी घास झुक कर 

देखती है अपना चेहरा बहते जल में।



जिस तरह यह नन्हा पक्षी अपने

 पंखों पर आसमान को तौलता है।



जिस तरह कोई फूल पंखड़ियों के ओठों से

 अपना मुंह खोलता है।



और जिस तरह इन्द्रधनुष का बोझ उतारने

 के लिए वह बदहवास तितली 

इधर उधर डोलती अपने पंख फड़फड़ाती है।



कालधारा में कौंधते हर संभव स्मृति-क्षण के भीतर

 आद्योपांत, जहां तक पहुंच सकता हूं मैं 

लौकिक-अलौकिक संदर्भों में और तब तक

 प्रयत्नपूर्वक भी कि जब तक प्रेम का यह अनुभव

 संस्कार नहीं बन जाता ।



उन सब की तरह मैं भी जल में, आकाश में

 सुगंध में और रंग में तुम्हारी स्वतन्त्रता के प्रति

 अपनी मुक्ति को खोजता हूं । 

 

 

 

 

बैलाडीला (बस्तर) : ५ अप्रैल १९७८



तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए 

तू था अशक्त पर नहीं था अत्याचार के लिए

               अखबारों में जैसी तेरी ख़बर है 

            नहीं मानता वो ही असली खबर है



तू हुई लोकसभा के लिए, तू हुआ विधानसभा के लिए

 तुम्हारी मौत की संवेदना हुई सिर्फ आमसभा के लिए 

            हर सभा में हरेक कोई तेरी तरफ है 

           असल क्या पता किसकी मंशा किधर है



तू था बदले के लिए, तू थी वासना के लिए 

तुम दोनों थे किसी की हित-साधना के लिए

           उसकी मुट्ठी में पैसा है सारी पुलिस है 

          उसकी नजरों में तू असहाय मुफलिस है

उठ कि तू है मर्द, है हथियार के लिए 

उठ कि तू है औरत, नये संसार के लिए

       तेरी ताकत तेरे बेइन्तिहा जुनून में है

       तेरा बदला तेरे दुश्मन के खून में है 

 

 

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 

 

सुबह-एक हल्की-सी चीख की तरह

 बहुत पीली और उदास  धरती की करवट में

 पूरब की तरफ एक जमुहाई की तरह 

मनहूस दिन की शुरुआत में खिल पड़ी।



मैं गरीब, मेरी जेब गरीब पर इरादे गरम 

लू के थपेड़ों से झुलसती हुई आंखों में

 दावानल की तरह सुलगती उम्मीद ।



गुमशुदा होकर इस शहर की भीड़ को 

ठेंगा दिखाते हुए न जाने कितने नौजवान 

कब कहां चड़े बसों में और कहां उतरे

 जाकर : यह कोई नहीं जानता।



कल मेरे पास कुछ पैसे होंगे 

बसों में भीड़ कम होगी 

संसद की छुट्टी रहेगी

 सप्ताह भर के हादसों का निपटारा हो चुकेगा 

हो चुकेगा सुबह-सुबह 

अखबारों की भगोड़ी पीठ पर लिखा हुआ।



सड़कें खाली होने की हद तक बहुत कम

 भरी होंगी: पूरी तरह भरी होगी दोपहर

 जलाती हुई इस शहर का कलेजा।



और किस-किस का कलेजा नहीं जलाती हुई।

 यह दोपहर आदमी को नाकामयाब करने की

 हद तक डराती हुई उसके शरीर के चारों तरफ।



मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 मैं गरीब, तुम गरीब

 पर हमारे इरादे गरम । 

 

 

 प्यार

 

बहुत बार न जाने कितनी बार 

टूट कर चीत्कार के होने से पहले ही 

बिना किसी प्रार्थना के बिना किसी मूकता और

 बिना किसी संवाद के

 बिना किसी सरलता बिना किसी अवसाद के

 उड़ते हुए आकाश में ठहरते हुए अपनी उड़ान में

 एकाएक सोच में ठिठकते हुए बार-बार ।



बहुत बार : न जाने कितनी बार 

जब-जब ठहरा मैं अपनी उड़ान में 

मुझे थामे रहा शून्य आकाश में - वही प्यार ।



जब-जब अटका मैं अपनी चीत्कार में 

दम साधे खड़ा रहा वह मेरे रोने के क़रीब-करीब । 

 

 

 

जिप्सी लड़की : एक

 

मैंने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की

 पेड़ों के जंगल में 

और आदमियों के जंगल में भी !



लेकिन तू बनी रही हम सब की इच्छा ही 

और उलझ पड़ी यह इच्छा

 आदमियों के जंगल से कभी और कभी 

पेड़ों के जंगल से ।



तूने फेंका अपना लाल रुमाल 

दूसरे जंगल में जब कभी : मैंने लोक लिया 

उसे अपने जंगलीपन में।



मैंने देखा तुझे कभी दूसरे के जंगल में 

और अपने जंगल में कभी ।



खुशनसीब है तू 

ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की 

तुझे मिला प्यार

 दोनों तरह के जंगलीपन का । 

 

 

असंभव वापसी

चीन से लौट कर कहा विदेश मंत्री ने 

अपने देश में: कि-

 'जल्दी से जल्दी लौटे चीन वापस बीएतनाम से ।'



गांव से घबरा कर शहर भागे 

गिरधर गोपाल से गांव की माटी ने

 कहा पुकार के-कि वह एकदम से लौट आए अपने गांव ।



फूल की टूटी हुई पंखुरियों से कहा

 बचे हुए फूल ने तड़प कर 

कि लौट आएं वे उसके पास उड़कर सुदूर से ।



लेकिन पंखुरियां नहीं लौटीं वीएतनाम से

 शहर से चीन 

पतझर से गिरधर गोपाल । 

 

 

भूख की सीमा से बाहर



जब तक लोहा काम करता रहता है उसमें जंग नहीं लगता।

 जब तक मछली पानी में है उसे कोई नहीं खरीद सकता।

दिल-टेबल-क्लॉथ नहीं है-

जो तुम उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।



यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने 

खाने की मेज पर छुरी के साथ

 एक बहुत बड़ी मछली ला कर रख दी और बोला- कि 

आइए, इसे खाते हैं और भूल जाते हैं 

थोड़ी देर के लिए उन शब्दों को 

जो भूख की सीमा में नहीं आते । 

 

 

चिरे हुए आदमी की गंध

 

एक दुःस्वप्न आरे की तरह चीर गया मुझे 

चिरे हुए आदमी की गंध फैल गई गली में 

अनदिखे बसन्त की तरह।



चीर गया एक पूरा दिन मेरी गली को

 चिरी हुई गली की शक्ल का हुलिया

 कल फिर दुरस्त होगा दुनियादारी में। 

सवारी में, तिजोरी में, बोरी में, व्यापार में 

भावताव में, बचाव में, वार में।

नोट कर लेने लायक नहीं थे : इतने बड़े नहीं

 थे दुःस्वप्न-लिख लेने लायक नहीं थे। 

छोटे-छोटे ही थे याद रहने लायक 

दो पैसे-चार पैसे के लाला के उधार की तरह।



बड़े व्यापार की तरह छोटे-छोटे दुःस्वप्नों की चिंता

 नहीं करनी चाहिए थी मुझे 

जब कि गली में अनदिखा बसन्त आया हो ।



पर जो एक चिरी हुई गंध 

गली के पूरे हुलिये पर छाई है 

बच पाना मुश्किल है उससे-

दिखते हुए बसत में भी पहुंचकर ।

 

 

फूल, कांच, मुर्गा वगैरह

 
डाली से टूटने के बाद यह फूल 

इतने दिन तक खिला रहा।



टूटने के बाद जरा भी नहीं खिला मैं।



कांच के ऊपर इतनी धूल जमने के बाद भी 

चमक ज्यों की त्यों बनी रही कांच पर



अपनी धूल झाड़ने के बाद भी मैं रद्दी हो गया।



गरदन कट जाने के बाद भी मुर्गा दौड़ता रहा 

अकड़ के साथ - खून के फौव्वारे छोड़ता हुआ

 इस बंद कमरे में।



लिखे जाने से पहले शब्द कितने स्वतंत्र थे

 लिखे जाने के तुरंत बाद वे मेरी बाती मृत्यु हो गए।



चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक



रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।