Monday, May 4, 2026

170 साल पहले जर्मन आंखों से हिमालय

 

 

 

   

 

   जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) का हिमालय खोज अभियान

 

   आज हिमालय को हम जैसे जानते, देखते हैं। क्या वह 170 साल पहले वैसा ही था ? डेढ़ सदी से ज्यादा के वक्त में हिंदूकुश से लेकर सिक्किम तक उसमें क्या बदलाव आए ? भारत में म्यूनिख के 'अल्पाइन्स म्यूजियम' की दुर्लभ पेंटिंग्स यही कह रही हैं। जब कैमरा नहीं था, तब जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं (हर्मन, रॉबर्ट और एडोल्फ) ने हिमालय की अपने यात्रा अभियान के दौरान उसे कैसे रंगों में उतारा? 
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ट के सुझाव पर, इन भाइयों को भारत और मध्य एशिया के वैज्ञानिक सर्वेक्षण के लिए भेजा गया था। उन्होंने हिमालय, काराकोरम और कुनलुन पर्वत श्रृंखलाओं का व्यापक दौरा किया।



इनका मुख्य उद्देश्य पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का अध्ययन करना और ऊंचे हिमालयी क्षेत्रों का नक्शा तैयार करना था। अभियान के दौरान एडोल्फ श्लागिंटवाईट अकेले काशगर (वर्तमान चीन) चले गए थे। वहां के स्थानीय शासक 'वली खान' ने उन पर जासूसी का संदेह किया और अगस्त 1857 में उनकी हत्या कर दी गई। काफी समय बाद उनके अवशेष और डायरी बरामद हुई थी। ये वैज्ञानिक होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार भी थे। उनके द्वारा बनाए गए वाटरकलर पेंटिंग्स आज भी 19वीं सदी के हिमालय और तिब्बत के सबसे सटीक दृश्य दस्तावेजों में से एक माने जाते हैं।
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र में शुक्रवार, 1 मई, 2026 से शुरू प्रदर्शनी उनके इसी काम के दौरान बनाए हिमालय पर्वत,पहाड़ों,पुल,रास्तों व मंदिरों के चित्रों को दिखाती है।  दून पुस्तकालय के तृतीय तल की दीर्घा में यह चित्र प्रदर्शनी 8 मई शाम साढ़े छह बजे तक चलेगी।  
करीब पौने दो सौ साल पहले के तीनों जर्मन भाईयों के ये चित्र जम्मू कश्मीर से लेकर बदरीनाथ, केदार नाथ ,मिलम,सुन्दरढूंगा, नैनीताल और पूरब में दार्जिलिंग तक के तत्कालीन इतिहास से सीधे साक्षात्कार कराते हैं । हर्मन और रॉबर्ट को कुनलुन पर्वतमाला को पार करने वाले पहले यूरोपीय खोजकर्ता माना जाता है।





इसके पहले इंडिया इंटरनेशनल सेंटर, दिल्ली में इनका प्रदर्शन हो चुका है।  दूसरे चरण में 1-8 मई, 2026 तक दून लाइब्रेरी एंड रिसर्च सेंटर, देहरादून के बाद यह प्रदर्शनी सीआरएसटी कॉलेज व उत्तराखंड एकेडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन के सहयोग से नैनीताल में लगेगी। प्रो. शेखर पाठक की खास पहल से हिमालय के यह चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकल कर आम लोगों के बीच अवलोकन के लिए पहुंचे हैं। इसमें इसे म्यूनिख संग्रहालय सहित श्लांगिटवाइट के पारिवारिक सदस्यों के साथ-साथ प्रो. हरमन क्रुत्जमैन , मैडम स्टेफनी क्लेइट, स्टीफन रिट्टर आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा
हिमालय के इन दुर्लभ चित्रों की प्रदर्शनी की विचार पहाड़ संस्था के प्रो. शेखर पाठक को सितंबर 2015 में तब आया जब उन्होंने म्यूनिख में पहली बार कला इतिहासकार स्टेफ़नी क्लेइट के सौजन्य से म्यूनिख स्थित 'स्टैटलिचे ग्राफ़िशे सैम्लुंग' में उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य के नैनीताल और कुमाऊं के आसपास के क्षेत्रों के उच्च गुणवत्ता और विस्तृत रेखाचित्र देखे। ये चित्र श्लागिंटवेट परिवार के वारिसों ने म्यूनिख के अल्पाइन संग्रहालय को दान किए थे। प्रो. पाठक एक सेमिनार के वास्ते म्यूनिख पहुंचे थे। सेमिनार में श्लागिंटवेट के अभियानों के दौरान उनके द्वारा एकत्रित कलाकृतियों, मुखौटों, नृवंशविज्ञान संबंधी वस्तुओं, मानचित्रों, मापों और अभिलेखों की एक बड़ी प्रदर्शनी भी शामिल थी। 
दून लाइब्रेरी में इस मौके पर प्रो. हरमन क्रुत्जमैन ने इन चित्रों से जुड़ी पूरी कहानी बताई और बताया कि किस तरह ये चित्र आज के जलवायु परिवर्तन, भू विज्ञान व समाज के अध्ययन के काम आ सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत से लौटने के बाद, हर्मन और रॉबर्ट ने अपने शोध को "रिजल्ट्स ऑफ एक साइंटिफिक मिशन टू इंडिया एंड हाई एशिया " नामक विशाल ग्रंथ के रूप में प्रकाशित किया। इस कार्य में एटलस, पैनोरमिक चित्र और विभिन्न जनजातियों के शारीरिक माप (नृवंशीय डाटा) शामिल थे।

 



कार्यक्रम में प्रो. शेखर पाठक ने यूरोपीय़ देशों के तिब्बत व हिमालय से जुड़े अभियानों के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि हालांकि ये खोज अभियान जासूसी अभियान भी थे पर श्लागिंटवाईट भाइयों ने उस दौर में वैज्ञानिक खोज की नींव रखी जब संचार और यात्रा के साधन बेहद सीमित और खतरनाक थे। उनके द्वारा किया गया कार्य आज भी दक्षिण एशियाई भूगोल और नृविज्ञान के शोधकर्ताओं के लिए एक महत्वपूर्ण संदर्भ है
दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के संस्थापक प्रो.बी.के जोशी ने कार्यक्रम में अतिथि वक्ताओं और उपस्थित लोगों का स्वागत किया। कार्यक्रम के पूर्व में केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चन्द्रशेखर तिवारी ने प्रदर्शनी के चित्रों पर  संक्षिप्त प्रकाश डाला। कार्यक्रम का संचालन सामाजिक व सांस्कृतिक अध्येता डॉ. लोकेश ओहरी ने किया। प्रदर्शनी के शुभारंभ में लोक कलाकार रामचरण जुयाल ने मोंछंग बजाकर किया। 

 



 

इस अवसर पर पूर्व मुख्य सचिव उत्तराखण्ड,  नृप सिंह नपलच्याल, सुरेन्द्र सिंह पांगती, सर्वे ऑफ इण्डिया के एडिशनल सर्वैयर संदीप श्रीवास्तव, डॉ.पंकज नैथानी, डॉ. डीके पांडे , डॉ. लालता प्रसाद, राजेश, सकलानी, सुंदर सिंह बिष्ट, चन्दन सिंह डांगी, उषा नौडियाल जयदीप रावत, अर्पणा वर्धन, डॉ. मालविका चौहान, डॉ.बीपी मैठाणी, डॉ. कुसुम नौटियाल, डॉ.संजय चोपड़ा, डॉ. रवि चोपड़ा. निकोलस हॉफलैण्ड, योगेश धस्माना, चन्द्रशेखर तिवारी, नवीन नैथानी, बसन्ती पाठक, जेपी मैठाणी साहित कई, सामाजिक कार्यकर्ता, चिंतक,इतिहास विद, संस्कृतिकर्मी, लेखक,साहित्यकार सहित कई प्रबुद्घ जन शामिल रहे।
(अरविंद शेखर की रपट)



Wednesday, April 29, 2026

कारखाने की बात : विजय गौड़ की अप्रकाशित रचनाएं

 

 

 

 

 

(विजय गौड़ निरन्तर रचना-कर्म में तल्लीन रहते थे। वे एक साथ कई मोर्चों पर डटे रहते।सामाजिक-राजनैतिक गतिविधियों के अलावा साहित्य की बहुत सारी विधाओं में उनका दखल था। वे एक साथ बहुत सारी राचनाओं पर काम कर रहे होते।उनकी अप्रकाशित रचनाओं को सिलसिलेवार रखने में बहुत वक्त लगेगा। फिलहाल उनके द्वारा लिखे जा रहे उपन्यास के कुछ अंश प्राप्त हुए हैं जिन्हें यहाँ सिलसिलेवार प्रस्तुत किया जायेगा। प्रस्तुत है पहला अंश) 

एप्रैंटिस लड़का

 

एप्रैंटिस लड़का कैंटीन से चाय पीकर लौटा था। लेबर ने आकर सूचना दी, सुपरवाईजर थापा ने स्‍टॉफरूम में बुलाया है। सूचना पाकर एप्रैंटिस लड़का स्‍टॉफ की ओर जा रहा था कि सामने पड़ गए ‘गैंग लीडर’ लाहौरी ने एक कुटिल-सी मुस्‍कान फेंकी। एप्रैंटिस लड़के को गैंग लीडर का इस तरह पेश आना भीतर से छलनी कर गया। दो दिन पहले ही एप्रैंटिस लड़के ने गैंग लीडर को बोल दिया था कि यदि चाय पीने के लिए कैंटीन जाने से गैंगलीडर को एतराज है, तो चाहे जहां रिपोर्ट करनी है, कर दो, चाय पीने तो जाऊंगा ही कैंटीन। लाहौरी उस्‍ताद को लड़के से ऐसे जवाब की उम्‍मीद नहीं थी। गुस्से से दांत किटकिटा कर रह गया, लेकिन कुछ कर नहीं पाया। लड़के का तर्क था कि मैं एप्रैंटिस हूं, कोई वर्कर नहीं, जिसके लिए उसकी धौंस पट्टी सुनते हुए काम पर जुटे रहना मजबूरी हो। गैंग लीडर जिस तरह से गैंग के दूसरे कारीगरों पर धौंस पटटी जमाता था, लड़का उससे वाकिफ था।

 यह बात गैंगलीडर भी जानता था, इसीलिए उसने लड़के के जवाब पर कोई प्रतिक्रिया देना उचित नहीं समझा। एप्रैंटिस लड़का लाहौरी उस्‍ताद के गैंग में काम करना ही नहीं चाहता था। सुपरवाइजर थापा से याराना होने के कारण ही लाहौरी ने जबरदस्‍ती लड़के को अपने गैंग में पोस्‍ट करवा लिया था। उससे पहले लड़का उप्रेती उस्‍ताद के गैंग में काम करता था। उप्रेती उस्‍ताद भला आदमी था। उसे एप्रैंटिस के कहीं भी आने-जाने से कोई एतराज नहीं था। वह सच में उस्‍ताद ही था। रिफरेंस कैसे तैयार करना है और रिफरेंस से दूसरे एंगल्‍स को कैसे चैक करना है और कैसे एक मुकमिल प्रिज्‍म बनाना है, एप्रैंटिस लड़कों को वह सब कुछ सलीके से सिखाता था, उस वक्‍त बेशक उसके भीतर भी चाहे यही बात विशेष होती हो कि लड़का यदि सारे ऑपरेशन ठीक से करने सीख गया तो गैंग का काम खींचने में मददगार ही होगा। उसके सिखाये एप्रैंटिस एक कुशल कारीगर की तरह दिन में कम से कम पांच से सात प्रिज्‍म की रफिंग कर सकने में सक्षम हो जाते थे, वह भी बिना किसी टोकाटाकी के। उप्रेती उस्‍ताद को अपने गैंग के साथियों से ज्‍यादा एप्रैंटिस लड़के द्वारा बनाये गये प्रिज्‍मों पर ज्‍यादा भरोसा रहता था कि एक्‍जामिनर उन्‍हें पास करने में कोई हुज्‍जत नहीं करेगा।

लाहौरी पिछले कई दिनों से एप्रैंटिस लड़के को उप्रेती उस्‍ताद के गैग में काम करते देख रहा था। उसके मन में लड़के की मेहनत पर डाका डालने की नियत बलवती होती जा रही थी। एप्रैंटिस लड़कों को काम सिखाने के नाम पर उनसे गैंग का काम करवाने की प्रवृत्ति उसमें दूसरे लोगों से कुछ ज्‍यादा ही थी। ऐसे काम जिनमें मेहनत ज्‍यादा हो, या ऊबाऊ हो और गैंग का कोई भी वर्कर जिन्‍हे करने में अनाकानी करता हो, वैसे ही कामों में एप्रैंटिस लड़कों को जोत दिया जाता था। ऐसे कामों के लिए ही एप्रैंटिस लड़कों को गैंग में लेने की एक होड़ गैंगलीडरों के बीच चलती रहती थी। लेकिन उदंड लड़कों की डिमाण्‍ड कम रहती। गैंगलीडर ताक में रहते कि किस लड़के को अपने गैग में मांगे। सुपरवाइजर थापा काम करने में जुटे रहने वाले एप्रैंटिस को गैग में पोस्‍ट करने की एवज में गैग लीडर पर एहसान का बोझ लादे रहता था। लाहौरी तो हर वक्‍त ही सुपरवाइजर की चीरौरी करता रहता था ताकि अपनी पसंद के लड़के को वह अपने गैंग में पोस्‍ट करवा सके।

 

सुपरवाइजर थापा के बुलावे की सूचना पर एप्रैंटिस लड़का स्‍टॉफ रूम में पहुंच गया।  सुपरवाइजर अकेला ही था, लड़के को डांट पिलाने लगा, ‘’मिस्‍टर तुम दो दिन से कहां-कहां हो, तुम्‍हारी रिपोर्ट है कि दिन भर कैंटीन में अड्डेबाजी कर रहे हो। देखो, यह चलेगा नहीं, ऐसा न हो कि मुझे तुम्‍हारी रिपोर्ट ऊपर करनी पड़े। चायवाला शॉप में चाय लाता है, यदि चाय पीने का इतना ही शौक है तो आज शाम से तुम यहीं चाय पिओगे।‘’ एप्रैंटिस लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया, शांत ही खड़ा रहा। चाय तो लड़के ने पी नहीं थी फिर भी देर ही वापिस लौटा था, इस बात का उसे भान था। यदि अपराधबोध से घिरा न होता तो लड़का यह भी कह सकता था कि चाय के समय तो चाय पीने कैंटीन ही जायेगा। क्‍योंकि कैंटीन जाने की मनाही तो ट्रैनिंग-फोरमेन की ओर से भी नहीं थी। ट्रेनिंग सेक्‍शन में एप्रैंटिसों के लिए बोर्ड पर लगायी गयी सूचना में सुबह 9.30 से 10.00 बजे एवं दोपहर के भोजन के बाद 3.30 से 4.00 बजे का समय, दिन में दो वक्‍त, कैंटीन जाकर चाय पी सकने की छूट की तरह निर्धारित था। चाय का समय ही ऐसा होता जब ट्रेड के हिसाब से अलग-अलग शॉप में पोस्टिंग किये गये वे सभी एप्रैंटिस कैंटीन पहुंचते थे और दोस्‍तों के साथ होने का लुत्‍फ उठाते थे। जरूरी नहीं कि चाय पी ही जाए, लेकिन पहुंचते जरूर थे। चाय पीने-पिलाने के दौर तो महीने के शुरु में ही, स्‍टाइपेंड मिलने के कुछ दिन बाद, खत्‍म हो जाते थे, लेकिन कैंटीन तब भी उनकी गपबाजी का अड्डा बनी रहती थी। कैंटीन का समय उन्‍हें सामूहिक तरह से दिखने की वैधता प्रदान करता था। बिना चाय पीते हुए भी उनकी उपस्थिति से हो जाने वाली गहमागहमी, कैंटीन मैनेजर की आंखों भी चुभती थी। कुर्सियों को घेर कर बैठे हुए ग्रुप को वह घूम-घूम कर घूरता रहता था, लेकिन निर्धारित समय से पहले वह उन्‍हें उठ जाने को कह नहीं सकता था। उसका किलश्‍ना जारी रहता। ऊपर के अधिकारियों से रिपोर्ट करने के लिए वह तरह-तरह के झूठ बोलता। लेकिन सबूतों के अभाव में एप्रैंटिस लड़कों को कैंटीन आना जाने से रोक नहीं पाता था। उसकी रिपोर्ट का मान रखते हुए अधिकारी गण बीच-बीच में टैनिंग फोरमेन को आदेश देते रहते कि वह खुद देखे कि क्‍या मामला है कैंटीन में। फोरमेन को कुछ समझ नहीं आता तो वह सभी लड़कों को एकजुट करके डांट पिला देता, ‘’देखो यदि अब कोई रिपोर्ट मिली तो आप लोगों के लिए चाय की व्‍यवस्‍था कैंटीन की बजाय यहां ट्रेनिंग शॉप में ही करवा दी जाएगी। अभी सिर्फ सजा के तौर पर यह है कि जब तक कोई नया आदेश न दिया जाए, अस्‍थायी तौर पर आप लोगों के लिए कैंटीन फेसीलिटी बंद कर दी जा रही है। कोई भी कैंटीन नहीं जाएगा। आप लोगों के आगे के आचरण के बाद ही आर्डर को रिव्‍यू किया जाएगा।‘’ इस तरह से दो एक दिन के लिए एक अस्‍थायी सी रोक जरूर लग जाती थी। ट्रेनिंग-फोरमेन को बीच-बीच में खुद से भी हिदायत देनी पड़ती कि, ‘’कोई भी एप्रैटिंस तय समय के पहले या बाद में कांटीन में न दिखे, वरना मुझसे बुरा कोई नहीं।‘’ उसकी हिदायतें बार-बार सुन-सुन कर लड़के इस नतीजें पर पहुंच चुके थे कि अगले दो एक रोज कैंटीन जाते हुए इस बात की सावधानी बरती जाए कि एक तो समय से उठ लिया जाए और दूसरा यह भी कि कुछ कुर्सियां दूसरे लोगों के लिए भी खाली छोड़ दी जाए। ऐसे आपात समय में कैंटीन में बड़ी शान्ति नजर आने लगती थी। धीरे-धीरे फिर से आवाजों के शौर बढ़ने लगते और कैंटीन मैनेजर का किलशना भी। 

          सुपरवाइजर थापा की डांट खाकर एप्रैंटिस लड़का स्‍टॉफ रूम से बाहर आ गया और सीधे गैंग में ही लौटा। गैगलीडर के चेहरे पर शातिर मुस्‍कान थी। कुछ देर खामोशी में बिताने के बाद एप्रैंटिस लड़के ने ही सवाल किया, ‘’क्‍या काम करना है ।‘’

            सवाल उसने गैंगलीडर से ही किया था, लेकिन सीधे संबोधित नहीं किया। गैगलीडर ने इसे अपनी जीत ही समझा। वह माने बैठा था कि सुपरवाइजर से रिपोर्ट करके उसने कायदे का काम किया और अब यह लड़का रास्‍ते पर आ जायेगा। मशीन के पास मिलिंग किये जा चुके प्रिज्‍मों के मोल्‍ड से भरी ट्रे रखी थी। उन सेमी फिनिस्‍ड प्रिज्‍मों की ओर इशारा करते हुए गैगलीडर ने लड़के को आदेश दिया, ‘’लंच तक इन्‍हें घिस देना है।‘’ उसकी भाषा में प्रिज्‍म बनाना इतना मामूली काम था कि वह जब भी किसी दूसरे को काम सौंपता तो घिसना ही कहता था। जबकि घिसने का मतलब सिर्फ घिसना भर नहीं होता। रिफरेंस सरफेश से लेकर दूसरी और तीसरी तरफ के एंगल एवं पिरामिड को भी ड्राइंगि के मुताबिक दुरूस्‍त करने से ही प्रिज्‍म का रफिंग ऑपरेशन पूरा होता है। वहां कुल चार ट्रे रखी थी जिनमें मिलिंग आपरेशन के बाद रफिंग करने के लिए रखे गये टैंक के अपर प्रिज्‍म के मोल्‍ड थे। एक ट्रे में चार प्रिज्‍म, यानी बारह प्रिज्‍मों को वह लंच तक घिसने के लिए कह रहा था। जबकि वह खुद जानता था कि एक कुशल पीस वर्क वर्कर के लिए भी पूरे दिन लगकर काम करने पर दस-बारह से ज्‍यादा प्रिज्‍म बनाना आसान नहीं। एप्रैंटिस लड़के ने कोई जवाब नहीं दिया। प्रिज्‍म घिसने के वक्‍त छिटक कर कपड़ो पर चिपक जाने वाली गीली एम्‍ब्री से कपड़ों को बचाने के लिए पहने जाने वाले लॉग कोट को चढ़ाया, मशीन ऑन की और चक पर गीले एम्‍ब्री पाऊडर को लगाकर पानी के कुछ छींटे मारे। छींटों के साथ घूमते हुए चक से अतिरिक्‍त एम्‍ब्री बाहर को छिटकी और मशीन के ड्रम की अंदुरुनी सतह पर चिपक गयी। एप्रैंटिस लड़के ने सबसे पहले प्रिज्‍म की मिलिंग की जा चुकी सतह घिसकर रिफरेंस बनाया और अब दूसरी सतह को दुरुस्‍त करने लगा। एंगल प्रोटेक्‍टर से एंगल को चैक करता और फिर जिधर घिसने की जरूरत होती उधर से प्रिज्‍म को दबाकर घिसता रहा। एप्रैंटिस लड़के को समझ नहीं आया कि दबाव कभी जरूरत से ज्‍यादा और कभी कम क्‍यों हो जा रहा था, चैक करने पर उसे प्रिज्‍म दुबारा-दुबारा घिसना पड़ रहा था। बगल की मशीन पर काम कर रहा गैंगलीडर एप्रैंटिस लड़के को ताड़ता जा रहा था। वह टैंक के लोअर प्रिज्‍म घिस रहा था और दो प्रिज्‍म घिस चुका था। यह ठीक है कि एक लोअर प्रिज्‍म बनाने में मेहनत और कारीगरी का अनुपात अपर प्रिज्‍म की अपेक्षा कम होता है, लेकिन दो लोअर प्रिज्‍म बन जायें और अपर प्रिज्‍म की दूसरी सतह भी फिनिश न हुई हो तो साफ कहा जा सकता था कि या तो कारीगर अनजान है या उसने काम ही नहीं किया। लाहौरी उस्‍ताद ने एप्रैंटिस लड़के को उप्रेती उस्‍ताद के गैंग में काम करते हुए देखा हुआ था। उसे लड़के की क्षमताओं का मालूम था, इसलिए यह मान लेना स्‍वाभाविक था कि लड़का जानबूझ कर समय जाया कर रहा है। उसकी आंखे क्रोध से जलने लगी थी, लेकिन सीधे कुछ कहा नही। अबकी बार एप्रैंटिस लड़के ने प्रिज्‍म चैक किया तो पाया कि एंगल ‘ओ के’ है। गैंगलीडर के लगातार घूरते रहने से कम होता गया उसका आत्‍मविश्‍वास फिर से वापिस लौटने लगा। अब वह तीसरी सतह को ठीक करने में जुट गया। तीसरी सतह को फिनिश करना थोड़ा पेचीदा था। पहले की दो फिनिश सतह तीसरी सतह के लिए दो रिफरेंश हो गये थे। दोनों सतह से एंगल चैक करना फिर जरूरत के मुताबिक घिसना। प्रक्रिया की पुर्नावृत्तियों पर प्रिज्‍म तैयार हो सकता था। लेकिन, तीसरी सतह फिनिश होने से पहले ही एंगल प्रोटेक्‍टर न जाने कैसे उसके हाथ से झूटा कि प्रिज्‍म के कार्नर से टकराया और उस कौने पर इतना गहरा चिप उखड़ गया कि दुरुस्‍त करना संभव ही नहीं था। लाहौरी अब खामोश नहीं रह सकता था। फेफड़ो में भरी हुई हवा को पूरे दम से बाहर फेंकते हुए वह लड़के पर चिल्‍लाया। गलती के कारण लड़की की बोलती नहीं फूटी। गैगलीडर की आवाज सुनकर सुपरवाइजर भी स्‍टॉफ रूम से निकल आया था। लाहौरी के साथ वह भी लड़के को डॉंटने लगा, ‘’मिस्‍टर, नींद में काम कर रहे हो क्‍या ?  मालूम है-यह लापरवाही महंगी पड़ सकती है। ट्रेनिंग में हो अभी, इसका मतलब यह नहीं लापरवाही के साथ काम करते हुए मैटेरियल लॉस करो।‘’ सुपरवाइजर की डांट में प्रशासनिक अहंकार था।

‘’लापरवाही से नहीं, जानबूझकर तोड़ा है इसने ... घंटे भर से देख रहा मैं तो... एक ही प्रिज्‍म को कभी ऐसे और कभी वैसे घिस रहा... पूछो जरा थापा साहब इससे, एक प्रिज्‍म कितनी देर में फिनिश होना चाहिए।‘’

लाहौरी की शिकायत में मैटेरियल की चिंता उतनी नहीं थी जितनी काम न होने की।

‘’चलो छोड़ो लहोरी... चैक करो तो डाइमेंशन... लोअर प्रिजम निकल सकता है इससे या नहीं। ठीक से काम करो मिस्‍टर। और सुनो लंच में जाने से पहले मुझको रिपोर्ट करना कितने प्रिज्‍म फिनिश किये तुमने।‘’

गैंगलीडर किलशते हुए वर्नियर से प्रिज्‍म की माप चैक करने लगा। सुपरवाइजर चला गया। एप्रैंटिस लड़के ने दूसरा सेमी फिनिस्‍ड प्रिज्‍म उठाया और उसे तैयार करने लगा। मानो डांट खाकर उसका कौशल वापिस लौट आया था। कुछ ही मिनटों में प्रिज्‍म की तीनों सतह फिनिश हो गई। एप्रैंटिस लड़के ने तैयार हो चुके प्रिज्‍म को फिनिश ट्रे में रख दिया। अगला मोल्‍ड उठाता कि गैगलीडर ने पहले वाले प्रिज्‍म को चैक कर लेना चाहा। प्रिज्‍म गैंगलीडर की निगाह में ठीक से फिनिश नहीं हुआ था। पिरामिड मामुली-सा आऊट दिखा रहा था, लेकिन अंडर टालरेंस ही था। डांटने का बहाना ढूढ़ंते हुए उसने जलती हुई निगाहों के साथ प्रिज्‍म को दुरुस्‍त करने को कहा और साथ में हिदायत भी दी कि प्रिज्म फिनिश ट्रे में रखने से पहले उससे चैक करवाए।

एप्रैंटिस लड़के ने मशीन ऑन की। घूमते हुए चक पर एम्‍ब्री लगायी। पानी के छींटे मारे और प्रिज्म को चक पर रखने से पहले बगल की मशीन पर काम करते हुए गैगलीडर को घूरते हुए देखा। गैंगलीडर की निगाहें भी लड़के की हरकतों पर टिकी थीं। नजर मिलते ही एप्रैंटिस लड़का हड़बड़ा गया और हड़बड़ाहट के साथ ही लड़के ने प्रिज्‍म चक पर रख दिया। प्रिज्‍म उसके हाथों की पकड़ से निकल गया, घूमते हुए चक के साथ बाहर को छिटका और मशीन के ड्रम से टकराया। एक्‍सीडेंट के कारण आवाज इतनी ज्‍यादा तेज थी कि हॉल में दूर तक काम करने वाले कामगारों ने अपनी अपनी मशीन के स्विच ऑफ कर दिये। प्रिज्‍म दो तीन जगह से टूट चुका था। मशीनों का शौर थम जाने की वजह से वातावरण में गहरी खामोशी ठहर गयी थी।           

 

Thursday, April 23, 2026

उषा नौडियाल के कविता अनुवाद 
 
उषा नौडियाल ने विश्व की कुछ शानदार कविताओं का अनुवाद किया है। इसे हम पहली बार यहां पेश कर रहे हैं।

बीते कुछ वर्षों में उषा नौडियाल ने कई महत्वपूर्ण विश्वकृतियों को अनुवाद के जरिए हिंदी समाज के सामने रखा है। हाल में अमेरिकी रेड इंडियनों के आजादी के संघर्ष पर हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास लास्ट फ्रंटियर 'आखिरी मोर्चा' शीर्षक से गार्गी प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। उनके खाते में हॉवर्ड फास्ट का अमेरिका के मैकार्थीवाद के आतंक पर आधारित उपन्यास 'सिलास टिम्बरमैन', प्रसिद्ध गायक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ता पॉल रॉबसन के एक संगीत कार्यक्रम के दौरान नस्लवादी व फासीवादियों द्वारा भड़काए गए दंगों पर आधारित हॉवर्ड फास्ट का उपन्यास 'पीकस्किल अमरीका' ,नाजी जर्मनी के हालात पर हॉवर्ड फास्ट के उपन्यास 'द ब्रिज बिल्डर्स स्टोरी' 'पुल बनाने वाले की कहानी' शीर्षक से प्रकाशित हुए हैं। गुरिल्ला फिल्म निर्देशक मिगेल लिटिन पर गैब्रियल गार्सिया मार्खेज की पुस्तक 'चिली में गुप्तवास' (क्लैंडस्टाइन इन चिली)  और चीनी कथात्मक लेख संग्रह 'बीज और अन्य कहानियाँ' का भी उन्होंने अनुवाद किया है। उषा नौडियाल ने विश्व के चार क्लासिक उपन्यासों को किशोरों के लिए पुनर्प्रस्तुत किया है। एचजी वेल्स  का 'दुनिया की जंग' (The War of The Worlds) , विक्टर ह्यूगो का 'नात्रेदम का कुबड़ा' (The Hunchback of Notre Dame), चार्ल्स डिकेन्स का उपन्यास 'डेविड कॉपर फील्ड' और मिगुएल डी सर्वांतीस का उपन्यास, 'डॉन क्विकजोट' (Don Quixote)। कुमाऊं विवि के डीएसबी परिसर से गढ़वाल विवि से उन्होंने अंग्रेजी में परास्नातक व गढ़वाल विवि से हिंदी में एमए व बीएड किया है।  







बंदी (असीर)

-फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद


फ़रोग़ फ़रोख़ज़ाद (1934-1967) :  ईरान की एक नारीवादी सबसे प्रभावशाली आधुनिक कवयित्री और फ़िल्म निर्देशक, जिन्हें उनकी विद्रोही और बेबाक तेवरों के लिए जाना जाता है।

 

मैं तुम्हें चाहती हूँ, पर जानती हूँ कि कभी भी

तुम्हें दिल भर कर गले नहीं लगा सकूँगी

तुम हो चमकते उजले आसमान

और मैं, पिंजरे के एक कोने में कैद एक चिड़िया।


ठंडी और काली सलाख़ों के पीछे से

देखती हूँ तुम्हें, पछतावे भरी उदास नजरों से

सोचती हूँ, काश कोई हाथ बढ़े मेरी ओर

और अचानक मैं पंख फैला दूँ

आने को तुम्हारी ओर


सोचती हूँ, कभी तो कोई पल होगा

लापरवाही का,

जब नजर बचाकर उड़ जाऊँ मैं इस सुनसान जेल से

हँसू अपने जेलर की आँखों में देखते हुए और

एक नया जीवन शुरू करूँ तुम्हारे साथ

ये सब सोचती हूँ मैं, पर जानती हूँ

कि नहीं कर सकती हिम्मत

छोड़ने की इस कैदखाने को

जेलर अगर चाहे भी मुझे आजाद करना

पर अब न साँसे बची हैं, न ताजी हवा,

मेरे उड़ने के लिए।


सलाख़ों के पीछे से हर उजली सुबह

मेरे चेहरे पर पड़ती है एक बच्चे कि मुस्कान

ख़ुशी का गीत गुनगुनाती हूँ मैं, जब

उसके होंठ आते हैं चुम्बन के लिए मेरी ओर

ओ आसमान, अगर एक दिन मैं चाहूँ उड़ना

इस ख़ामोश कैदखाने से

तो रोते हुए बच्चे की आँखों से क्या कहूँ?

मुझे भूल जाओ,

क्योंकि मैं एक कैदी चिड़िया हूँ।


मैं वो चिराग हूँ जो अपने दिल की

जलती हुई लौ से, रोशन करता है खंडहरों को।

अगर मैं खामोश अँधेरा चुनना चाहूँ

तो बरबाद कर दूँगी घरौंदें को।

 

 

मेरी फिक्र

— मैरी ओलिवर


बहुत फिक्रमंद थी मैं, क्या फलेगा-फूलेगा बगीचा,

क्या नदी बहेगी सही छोर में

क्या धरती उसी तरह घूमेगी,

जैसा पढ़ाया गया था हमें,

और अगर नहीं तो

मैं इसे कैसे ठीक करूंगी?

क्या मैं सही थी, या गलत थी मैं,

क्या माफ़ किया जाएगा मुझे?

क्या बेहतर कर कर सकती हूँ, मैं?

क्या कभी गा पाऊँगी मैं?

गौरैया तक भी गा सकती हैं,

और मैं तो ख़ैर, बिल्कुल ही बेकार हूँ।

क्या कम हो रही है मेरी नजर।

या यह बस सोचना है मेरा?

या कहीं गठिया तो नहीं हो जाएगा मुझे,

या शायद अटक जाए जबड़ा,

कहीं स्मृतिलोप तो नहीं होने वाला मुझे?


आख़िरकार,  सोचा मैंने

फायदा कोई नहीं, इस तरह बिसूरने से।

छोड़ ही दिया फिर,

और अपने इस बूढ़े होते शरीर को

लेकर, निकली बाहर, सुबह के उजाले में

 गाने लगी गीत।

           

उसका सिर

            

जो मरे

(अगस्त-1945) अमेरिकी कवि ,लेखक,नाटककार और संपादक


इकुबुकेनी के पास नताल दक्षिणी अफ़्रीका में,

एक औरत ढो रही है पानी अपने सिर पर

एक साल के सूखे के बाद,

जब उसके तीन बच्चों में से

एक है मौत के पंजे में,

वह दूर के किसी कुएँ से

पानी लेकर लौट रही है, अपने सिर पर।

सूख चुकी हैं कद्दू की बेलें,

मुरझा चुके हैं टमाटर

फिर भी वह औरत

ढो रही है पानी अपने सिर पर..


ख़ाल हैं बाड़े मवेशियों के,

भुखमरी की शिकार हैं बकरियाँ,

बच्चों के लिए दूध नहीं

लेकिन वह ढो रही है पानी, अपने सिर पर।

इंजीनियरों ने रुख़ मोड़ कर नदी का

बाँध दिया है नदी को

ताकि ताकतवर, सत्ताधारी लोग

कर सकें उपभोग, बिजली की शक्ति का।

लेकिन वह औरत ढो रही है पानी

अपने सिर पर।

होमलैंड में जहाँ धूल से लथपथ भीड़

ख़ाली सड़क पर,

करती है इन्तज़ार पानी के टैंकरों का,

लेकिन वह औरत करती है विश्वास तो बस खुद पर,

और उस खजाने पर, जिसे ढोती है वह

अपने सिर पर।

सूरज भी उसे नहीं रोक पाता,

न ही तोड़ सकती, सूखी और तपती हुई धरती,

वह ढोती है पानी अपने सिर पर

मैली सी एक टूटे हैंडल वाली बाल्टी

जो टिकी है एक पतले से पतरे पर।

ढो रही है पानी वह औरत, अपने सिर पर।

 वह औरत, जिसके गले में है, सेफ़्टी पिनों की एक माला

ढोती है पानी अपने सिर पर

अपने परिवार, अपने लोगों के लिए

ज़िन्दगी और मौत के बीच  जो भी ज़रूरी है

उसे लाने के लिए

करती है भरोसा, सिर्फ़ अपने सिर पर।

ढो रही है पानी उनके लिए

वह अपने सिर पर।

 


चेतावनी 


- सिल्विया पाथ

सिल्विया पाथ (1932-1963) : बीसवीं सदी की सबसे प्रभावशाली अमेरिकी कवियत्रियों में, उनकी रचनाएँ उनकी गहरी भावनाओं और व्यक्तिगत जीवन के मानसिक संघर्षों को दर्शाती हैं।

 

अगर तुम काट कर किसी चिड़िया को

अलग-अलग हिस्सों में,

 बनाते हो उसकी जीभ का आरेख

तो काट दोगे उसके स्वर यंत्र को भी

जहाँ से निसृत होते हैं गीत

अगर खाल उतार कर किसी

किसी जानवर की

मुग्ध होते रहोगे उसके अयाल पर


तो परवाह क्या करोगे तुम, उसके पूरे वजूद की

जहाँ से वह फर शुरू हुआ था,


अगर यह जानने के लिए

कि धड़कता है कैसे, आख़िर दिल,

निकाल दोगे इस दिल को ही तो

तुम रोक दोगे उस घड़ी को

जिससे मिलती है लय हमारे प्रेम को।

 

 

 

एल्म

-सिल्विया पाथ

 

मैं जानती हूँ उसकी गहराई को, कहती है वह,

अपनी लम्बी जड़ों से उसे  छूकर जाना है मैंने,

जिससे डरते हो तुम, मुझे इससे डर नहीं लगता,

क्योंकि मैं वहाँ रह चुकी हूँ।


क्या सुनाई दे रहा है तुम्हें,

समंदर का शोर मेरे अन्दर

 उसकी अतृप्त लहरों की बेचैनी?

या फिर उस शून्य की गूँज,

जो तुम्हारा पागलपन थी?


प्रेम एक छाया है,

जिसके पीछे तुम भागते हो,

झूठ बोलते हो और रोते हो,

सुनो, ये इसके खुर हैं, वह तो

घोड़े कि तरह की भाग चुका है।


सूर्यास्तों के अत्याचार सहे हैं मैंने,

जड़ों तक झुलस चुकी हूँ

जल कर लाल हो चुकी हैं मेरी तनी हुई नसें,

किसी तारों के गुच्छे की तरह।


अब मैं बिखर चुकी हूँ टुकड़ों में, उड़ते हैं जो

लाठियों की तरह चारों ओर,

ऐसी हिंसक हवा

नहीं सहूँगी मैं, कोई भी और तमाशा

मुझे चीखना ही होगा।


मेरे भीतर गूँजती है एक चीख, हर रात

वो फड़फड़ाती है, अपने काँटों से तलाशती है किसी ऐसी चीज को

जिसे वह प्यार कर सके।


 मैं डरती हूँ

अपने भीतर सो रही इस अंधेरी चीज से-

दिनभर महसूस होती है मुझे  पंखों सी कोमल हलचल

मानो पाला हो कोई बैर।

बादल आते-जाते बिखर जाते हैं

क्या ये प्रेम के चेहरे हैं, वे धुंधले अधूरे से भाव?

क्या  इन्हीं के लिये करती हूँ व्याकुल मैं अपने दिल को?


इससे ज़्यादा मैं कुछ नहीं जानती

क्या है यह, यह चेहरा

जकड़ा हुआ है जो शाखाओं से, इतना घातक…


 

फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी


-माया एंजेलो


माया एंजेलो ( 4 अप्रैल 1928–28 मई  2014 )- एक अमेरिकी लेखिका, कवि संस्मरणकार, निबंधकार, कलाकार, निर्माता, निर्देशक और एक्टिविस्ट थीं। वे अपनी अनूठी नवोन्मेषी आत्मकथात्मक लेखन शैली के लिए जानी जाती थीं।)

 

तुम मुझे अपने कड़वे, घिनौने झूठों से

इतिहास में मिटा सकते हो,

तुम मुझे धूल में रौंद सकते हो,

लेकिन फिर भी, धूल की तरह

मैं उठ खड़ी होऊँगी।


क्या मेरी अकड़ परेशान करती है तुम्हें,

इतने उदास क्यों हो तुम? क्योंकि

मैं ऐसे चलती हूँ, जैसे मेरे लिविंग रूम में तेल के कुँवे निकल रहे हों।


चाँद और सूरज की तरह,

ज्वार-भाटे की अनवरत लय के साथ,

उम्मीदों की बुलंदियों की तरह, मैं

फिर भी उठूँगी।

क्या तुम मुझे टूटा हुआ देखना चाहते थे?

सिर झुका हुआ, नजरें नीची किए हुए

मेरी कराहों से होकर कमजोर

आँसुओं की बूँदो की तरह ढलकते हुए कंधे।

क्या मेरे अहंकार ने पहुँचाई है ठेस तुम्हें ?

इसे इतना भी दिल पर मत लो, क्योंकि मैं

ऐसे हँसती हूँ जैसे सोने की खान हो मेरे पास

और अपने पिछवाड़े में खुदाई कर रही हूँ मैं।

तुम मुझे अपने शब्दों से घायल कर सकते हो

मुझे चोट पहुँचा सकते हो अपनी नज़रों से

तुम अपनी नफ़रत से मार सकते हो मुझे

लेकिन, फिर भी मैं उठ खड़ी होऊँगी।

क्या मेरी कामुकता तुम्हें परेशान करती है?

क्या यह कोई हैरत वाली बात है?

मैं तो ऐसे नाचती हूँ जैसे मुझ पर जड़े हों हीरे,

ठीक मेरी जाँघों के मिलन बिंदु पर।


इतिहास की शर्मनाक झोपड़ियों से

मैं उठी

एक बेपनाह दर्द भरे अतीत से निकलकर,

मैं उठी

मैं एक काला सागर हूँ, उछलता-कूदता, उमड़ता-घुमड़ता

उसकी बढ़ती लहरों में समाहित हूँ मैं।

 डर और वहशत की रातों के पीछे

एक हैरतज़दा शफ़्फ़ाक़ सवेरा लेकर

मैं उठती हूँ

अपने पुरखों के दिए हुए उन उपहारों को लेकर

मैं गुलामों की उम्मीद और उनका सपना हूँ।

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ

मैं उठती हूँ


Friday, April 17, 2026

परिवार को बीच से काटने वाली दीवार - गादा कारमी



डा. गादा कारमी

 

(1939 में फिलिस्तीन में जन्मीं डॉक्टर, शोधकर्ता और लेखक गादा कारमी ने दुनिया के बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशनों में फिलिस्तीन का पक्ष रखने के लिए प्रचुर लेखन किया है। फिलिस्तीन पर उन्होंने आधा दर्जन संस्मरणात्मक किताबें लिखी हैं। उनके एक संमरण का अंश   यादवेन्द्र ने विशेष रूप से ‘लिखो यहां वहां’ के  लिये प्रस्तुत किया है. यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं  )


दीवार कम से कम 8 मीटर या 26 फीट ऊँची थी और मुझे यह देखकर अचरज हो रहा था कि सलेटी रंग के कंक्रीट के स्लैब्स से बनी हुई दीवार को कोई पार कैसे करता होगा। यह बिल्कुल असंभव है। जहाँ तक निगाह जाती दूर तक फैली हुई इस दीवार पर जगह-जगह कुछ नारे लिखे हुए थे या फिलिस्तीनियों के समर्थन में कुछ रेखाचित्र बनाए हुए थे। ये चित्र इतने सजीव और यथार्थपूर्ण थे कि मैं आश्चर्य में पड़ गई। ऐसे चित्र मुझे कलंदिया चेक पॉइंट पर भी देख कर महसूस हुआ कि उनके पीछे कितनी यथार्थवादी सोच और कलात्मकता है। मुझे याद आया कि एक चित्र किसी गोल छिद्र सरीखा था जिसे देखकर दीवार को बेधते हुए वास्तविक छिद्र बने होने की अनुभूति होती थी - जिसके पीछे नीला आसमान और हरे-भरे खेत दिखाई दे रहे थे। किसी के लिए भी इसे देखकर वास्तविक मान लेना एकदम स्वाभाविक था।

मैं दीवार से हटकर खड़ी हो गई और अपनी हथेलियों से उसे छूकर, दबा कर देखा, कंक्रीट एकदम ठंडा था और अपनी हथेलियों के फिसलने से एहसास हुआ कि इसकी ऊपरी सतह ख़ासी समतल और चिकनी है। दीवार का शिखर इतना ऊँचा था कि वहाँ तक देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन पीछे ले जाकर नीचे झुकानी पड़ी। देख कर साफ़ लगता था कि बेहद मज़बूत और गहरी नींव वाली अडिग दीवार है। तभी मुझे लगा कोई मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया है।

‘इस दीवार के उस पार मेरे पति रहते हैं।’ वह लंबी छरहरी शरीर वाली फिलिस्तीनी स्त्री नायला थी। मैंने उसे पहली बार देखा था। 

‘मैं दीवार के इस पार और वे दीवार के उस पार इस वजह से रहते हैं क्योंकि उन्होंने हमें एक साथ रहने की इजाज़त नहीं दी।’ उसने मुझे बताया। मेरे साथ जो स्थानीय लोग थे, हो सकता है उनको पहले से इस बारे में मालूम हो लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल नई और हैरत में डालने वाली बात थी।

अबू दिस में उनका अपना घर था, लेकिन जब यह दीवार बनाई गई तो वह घर इजराइल की तरफ़ चला गया। ऐसा होने पर उन दोनों के पास अलग-अलग रहने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह स्त्री अन्य अरब नागरिकों की तरह पूर्वी यरुशलम की नीला पहचान पत्र धारी 'नागरिक' मानी गई। लेकिन उसके पति को वेस्ट बैंक की नागरिकता वाला नारंगी पहचान पत्र दिया गया - इसका प्रशासनिक मतलब यह हुआ कि वह इजराइल की भूमि पर (जहाँ उसकी पत्नी रहती है) क़दम नहीं रख सकता और यदि उधर जाना ही है तो उसे हर बार स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देना होगा और इजाज़त मिली तो निर्धारित अवधि के लिए जाना संभव होगा। जब भी उसे अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की इच्छा होती है, वह स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देता है और इजाज़त मिलने पर दिन भर के लिए दीवार के उस पार जाता है, पर अँधेरा होते-होते वापसी की शर्त के साथ। उसकी यह कथित आज़ादी भी मनमर्जी नहीं, इजराइली शासन जब चाहता है यह सुविधा छीन लेता है।

मैंने यह कहानी जानकर अफ़सोस जाहिर किया और पूछा कि तुम यहाँ से जाकर अपने पति के साथ क्यों नहीं रहतीं?

‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? यदि मैं यहाँ से चली भी गई तो वे मेरा यरुशलम का नीला पहचान पत्र ज़ब्त कर लेंगे और मैं कभी इधर चाहने पर भी आ नहीं पाऊँगी।’

उसने आगे बताया कि यह पहचान पत्र न रहने पर वह ज़रूरत पड़ने पर न तो इजराइल के किसी हवाई अड्डे तक पहुँच सकती है न अपने बच्चों को यरुशलम के स्कूलों में पढ़ा सकती है, न ही वहाँ के किसी अस्पताल में इलाज के लिए जा सकती है। वेस्ट बैंक और ग़ज़ा के फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ यही तो बंदिश है कि उन्हें चारों ओर से घेर कर इस तरह क़ैद कर दिया गया है कि वे किसी काम के लिए बाहर नहीं निकल सकते, चाहे संकट में उनकी जान ही क्यों न निकल जाए।

ऐसी विकट प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पति-पत्नी अपना जीवनयापन किसी तरह से कर रहे हैं हालाँकि यह कहना मुश्किल है कि उनके आपसी संबंधों पर इसका कितना असर हुआ है।

मेरी असहजता देखकर नायला ने कहा, ‘जो है सो ठीक है। ऐसा नहीं है कि इस दीवार के कारण सिर्फ़ हमारी जिंदगी बिखर गई है। यक़ीन मानो, हमारी तरह बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अलग-अलग रहने को अभिशप्त हैं। अलग रहना बार-बार आने वाली दूसरी भयानक मुसीबतों के आगे बहुत छोटी बात लगने लगती है। लेकिन हम पहले की मुश्किलों की तरह इसको भी निभा लेंगे।’


(‘रिटर्न: ए पैलेस्टीनियन मेमॉयर’ से साभार)

 

प्रस्तुति : यादवेन्द्र 

Friday, April 10, 2026

ऋतु डिमरी नौटियाल की कुछ कविताएं

 

 

 

 



 (  ऋतु डिमरी नौटियाल की रचनाओं में अपने समकाल की मुश्किलों, विडंबनाओं और प्रतिगामी प्रवृतिओं  के विरुद्ध हस्तक्षेप करने की विकलता गौर करने लायक है। इसी  कारण उनमें राजनैतिक नैराश्य से जूझने का संकल्प दिखता है।और थोड़ी ज़ल्दबाजी भी । लेकिन यह तय है कि उनके संघर्ष की जगह रचना की दुनिया है।वे शोषण की प्रवृतियों और उसकी व्याप्ति को ख़ूब पहचानतीं हैं। पित्रसत्तात्मकता और सामाजिक  वंचना का प्रतिकार
उनकी मूल प्रतिज्ञा है। - राजेश सकलानी  )

 

 

1. हारे हुए लोग

 

 

वो पीले पत्ते की तरह झड़ते हैं 

और पेड़ को देख रो पड़ते हैं 


वो बन रहे होते हैं 

और रास्ते में ही बिगड़ पड़ते हैं 


इतने अस्थिर

कि ढकेल दिए जाते हैं

और लक्ष्य तक 

पहुंचने से पहले 

कहीं और निकल पड़ते हैं 



वे बेल की तरह 

चलते हुए में रुके होते हैं 

और रुके हुए में चलते हैं 



शब्द से नि: शब्द तक

नि: शब्द से शब्द तक


एक गति में , 

स्व क्षति में हमेशा 



हारे हुए लोग

 मुझे कवि लगते हैं .



2. फरवरी 


जनवरी तक ये 

संतरे का पेड़ नहीं था,

यहां एक लम्बी सूखी टहनी थी,


ग्वाला इससे गाय हंकाता 

या किसी चूल्हे की भेंट चढ़ जाता 


फरवरी 

तुमने इसे नई टहनियों और 

पत्तियों से भर दिया है 


तुमने इसका अर्थ बदल दिया है 

इंद्रियों को प्रिय 

अब ये दृश्य और गंध है ,

 उम्मीद है इनके हृदय में 

और फल की कामना है



फरवरी 

में उभरती है

गाजा की याद.



3. कुर्सी - दृश्य 


पहले किताबों से भरी होती थी

लाइब्रेरी की अलमारियों की ताकें 


फिर बैठने की वजहें बदलने लगीं 

तदनुसार बैठने की प्रक्रियायें


एक दिन 

लाइब्रेरी की अलमारी की एक ताक के कोने से 

एक कुर्सी निकली


 और एक आदमी किताब पे बैठकर 

 कुर्सी पढ़ रहा था


  कुर्सी एक महामारी की तरह 

  फैल रही थी


   एक आदमी और उसके बाद कई आदमी 

    न्याय पे बैठकर 

    कुर्सी लिखने लगे 


     एक बच्चा कागज पे लिख रहा था

     "एक कुर्सी के मुंह के भीतर 

      शेर के दांत थे "

     


 4. मुलाक़ात. 


वो बस अड्डे में मिलते या

रेलवे स्टेशन में ,

जब एक दूसरे के शहर से गुजरते 


किसी पार्क में 

नजदीक बैठकर 

बातें करते 



किसी धूप में खुल जाते

लोकतांत्रिक संवाद ,

 मेटाफर की तरह लिखे जाते

  उपन्यास के चैप्टर या

 अप्रकाशित कविताओं से 

  होती मुलाक़ात 



   दोनों एक दूसरे को 

   घर में आने का

   निमंत्रण नहीं देते कभी,

   स्त्री और पुरुष 

    परवश.

   

  

   5. भूख की लिपि 


वियतनाम से सीरिया तक

सोमालिया से गजा तक

बन रही एक वैश्विक भाषा


हमारे समय का प्रतिनिधित्व करती

 बन रही एक लिपि.