Friday, April 3, 2026

उपन्यास अंश: मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी (दो)

 

 


(आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर  हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरिचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं।  विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’  के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरीचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन  प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया  गया है।प्रकाशन के  एक वर्ष बाद  पहले  संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें  बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती है।पिछली पोस्ट में हमने  इस उपन्यास का एक अंश प्रकाशित किया था। इस बार प्रस्तुत हैं  इस उपन्यास के कुछ और अंश ।)

 

 

 


सत्तर का उथल पुथल भरा साल

बादल को अपना गाँव बहुत याद आ रहा है। कोरानखाली के तट पर पसीने से तरबतर वह अपने लड़कपन के दिनों की स्मृतियों में खोया है। बीत गए दिनों की यादें दृश्य रूप में सामने उभरने लगती हैं। स्मृतियों में दूर तक चला जाता है बादल ।

खुलना के बटियाघाटा क्षेत्र के नारायणपुर गाँव में कोई स्कूल नहीं। बादल को तीन कोस दूर पैदल चलकर स्कूल जाना पड़ता है। पाँव में चप्पल नहीं। लाल सालू कपड़े के टुकड़े में बाँध कर रखी कुछ किताबें, कलम, दावात लेकर वह स्कूल जाता है। स्कूल दूर तो अवश्य है किन्तु स्कूल का पथ बड़ा ही मनोरम है। दूरी का एहसास कभी नहीं हुआ। कितना कुछ है देखने के लिए। दृष्टि को विस्तार देते धान खेत यहाँ से वहाँ तक फैले हुए। धान खेतों के बीच से नर्म घास वाले आल यानि मेंड़। कई बार मेंड़ पर घोंघे अपनी गति से चलते हुए मिलते तो वह ठहर कर देखने लगता। घोंघा कितना विचित्र प्राणी है। धान खेत से निकल कर वह आल के किनारे किनारे अपनी मस्ती में चलता तो उसकी सूंड़ दिखाई देती। ज़रा सी आहट पाते ही वह अपनी खोल में छुप जाता। इतने सख्त खोल में कैसी मुलायम जान बसती है। वह आश्चर्य करता। धान की हरी पत्तियों पर शिशिर की बूंदें बादल  को अपनी तरफ खींचती हैं। वह अपनी अंगुलियों से शिशिर की हर बूंद को स्पर्श कर लेना चाहता। कभी कोई छोटी सी चिड़िया कुछ गाती हुई ऊपर से उड़कर निकल जाया करती। खेतों से निकलते ही एक बागान उसे मिलता जिसमें आम, जामुन, कटहल और न जाने कितने पेड़ हैं। जामुन के मौसम में वह मीठे जामुन के लोभ में अक्सर स्कूल का ध्यान ही भूल जाता है।

यह गिरींद्र किशोर चैधरी का बागान है। बागान के भीतर एक कुआँ है। बरसात के दिनों में कुआँ कैसे मुँह तक भर आया करता है। मेंढक की टर्राहट खेतों से ही सुनाई देने लगती। बागान से निकल कर वह कुछ दूर चलता है कि फिर एक बड़ा माठ आ जाता है। एकदम खुला हुआ बड़ा सा माठ। इस माठ में लेकिन गाँव के लड़के खेलने नहीं आते हैं क्योंकि यहाँ एक पीर की मजार है। माठ के आगे फिर धान खेत दूर दूर तक दिखाई देते। धान खेतों के आल से होता हुआ वह सीधे अगले गाँव में आ जाता। यह कुम्हारों का गाँव है। वे आँव में मिट्टी के बर्तन पकाते हैं। उनके बनाए बर्तन अच्छे मौसम में अक्सर ही धूप में सूखते रहते हैं। इस गाँव के घरों में मुर्गियाँ और बकरियाँ पालते हैं सभी लोग। बकरी के नन्हें पोना फुदकते हुए बादल  के रास्ते में आ जाते तो वह उन्हें सहला कर आगे बढ़ जाता। इस गाँव के बाद उसका स्कूल दिखाई देने लगता। स्कूल जाते हुए कई बार धान खेतों में उसे मछलियों की सरसराहट सुनाई देती। ऐसा तब होता जब धान खेतों का पानी कम हो जाता और खेत में बीच-बीच में गड्ढों में पानी एकत्रित हो जाता। ऐसा भी हुआ कई बार कि सामने मछली दिख गई तो बादल से आगे चला नहीं गया। वह खेत में उतर कर बड़ी चतुराई से मछली को पकड़ लेता और वहीं किसी गड्ढे को पहचान कर उसमें उन्हें छोड़ देता ताकि स्कूल से लौटते हुए वह इन मछलियों को वहीं से फिर पकड़ सके। माँ उसकी इस छेलेमानुषी के लिए बहुत डांटती है। 

जिन लड़कों के पास साइकिलें हैं वे दूसरे रास्ते से आते हैं। बादल  को स्कूल के दिनों में दो चीज़ों का बड़ा शौक रहा है। एक तो साइकिल और दूसरा रेडियो। दोनों ही उसके पास नहीं हैं। बादल  कभी-कभी दोस्तों से उनकी साइकिल माँग कर चलाने का अभ्यास किया करता। उसे साइकिल चलाने में बहुत मज़ा आता है। रेडियो का शौक तो ऐसा कि उसे अक्सर रेडियो के सपने आते। एकदिन जब वह पढ़ लिख कर चाकरी करेगा, पैसे कमाने लगेगा तब अपने लिए एक साइकिल और एक रेडियो ज़रूर खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता। स्कूल काफी बड़ा है। उससे भी बड़ा है स्कूल से लगा खेला का माठ। स्कूल के अंदर एक कृष्णचूड़ा का पेड़ है। गर्मियों के दिन में वह चटक लाल रंग वाले फूलों से भर जाता। माठ के एक कोने में तेंतुल यानि इमली का पेड़ है। इमली पर फल लगते ही बच्चों की शरारतें बढ़नी शुरू हो जातीं। आते जाते वे ढेला फेंकते। कच्ची और खट्टी इमली का स्वाद बच्चों को बहुत भाता है। और जब इमली पक जाती तब तो कहना ही क्या। पकी इमली के लिए तो कई बार बच्चे माठ में देर तक पड़े रहते। वे इमली के बीज इकट्ठा करते और उससे खेलते। स्कूल के बाहर एक मिष्टि दुकान है। वहाँ की मिठाइयाँ बादल  को बहुत लुभाती हैं लेकिन उसके पास मिठाइयों के लिए पैसे नहीं होते हैं। एकदिन जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा तब खूब मिठाइयाँ खरीदेगा, वह ऐसा सोचा करता है।

बहुत थोड़े से खेत हैं बादल के पिता के हिस्से में। धान के लिए बीज डाले जाते खेत में। खेत के इस छोटे हिस्से को बीजतला कहते हैं। बीजतला की तैयारी बड़े जतन से की जाती। खेत को जोतकर उसमें पानी भर दिया जाता। माटी नर्म और मुलायम हो जाती तो उसे बराबर किया जाता। पानी जब बहुत कम रह जाता तब बीजतला में धान के बीज डाले जाते। बीज का धान अलग से बचा कर रखा जाता है। कुछ हफ्तों में बीजतला में माटी की सतह पर हरीतिमा उगने लगती। वर्षा आते-आते ये बीज पूरी तरह तैयार होते। तब तक बाकी के खेत तैयार हो चुके होते। बीजतला से धान के ताज़े उगे बीज की आँटी यानि बंडल बना कर उन्हें बड़े खेतों में रोपने के लिए ले जाया जाता। धान के चार छह पौधों का एक गुच्छा एक जगह रोप दिया जाता और इसी तरह छोटे छोटे गुच्छे थोड़ी थोड़ी दूर पर रोप देने के बाद पूरे खेत हरे हरे दिखाई देने लगते। कुछ ही दिनों में ये बीज नई जमीन में अपनी जड़ें जमा लेते और झूमने लहराने लगते। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली होती। धान के पौधे जैसे जैसे बढ़ते चासी की आशाएँ वैसे वैसे बड़ी होतीं। समय बीतता और फिर धान के पौधे में शीश यानि बालियाँ आने लगतीं। ऐसे समय में खेतों में निराई का काम होता जिसमें खर पतवार जैसे पौधों को खेत से चुनकर निकाल दिया जाता। जब धान की बालियों में दूध आने लगता तब खेतों से एक मादक गंध चारों दिशाओं में फैल जाती।

धान के पकने की आस धीरे धीरे सबकी आँखों में दिखाई देने लगती। धान की बालियों का रंग सुनहरा हो उठता। धान के पौधे भी सुनहरे पीले हो जाते। खेत का पानी सूखने लगता। यह धान की कटाई का समय होता। सारा परिवार हँसिया लेकर खेतों में चला जाता और

धान की कटाई होती। धान के गट्ठर बनते और सब उसे उठाकर घर ले आते। घर की लक्ष्मी घर आती। धान की झड़ाई में बादल को भी लगना पड़ता। घर के बाहर एक तरफ बाँस गाड़ कर ज़मीन से चार फुट ऊंचा एक डेस्क जैसा बना लिया जाता। ऊपर काठ का कोई पटरा हो तो और अच्छा। धान जितना दोनों हाथों में समा सके उठाकर उसे इस बेंच के पटरे पर पीछे से घुमाकर सिर के ऊपर से सामने की तरफ पीटा जाता। इससे धान पौधे से अलग होकर नीचे जमा हो जाता और बिचाली अलग कर ली जाती। धान को अभी

धूप में सुखाने की जरूरत है। धान में अभी नमी है। अभी चावल निकाले जाएंगे तो टूट जाएंगे। सूखे हुए धान को ढेकी में कूट कर चावल निकाल लिया जाता। नए धान से कितना कुछ पकवान घर घर में बनाया जाता है। वह एक युग है बादल के जीवन का। सबसे सुनहरा युग। अनवर बादल का बढ़िया दोस्त है। उसके घर वाले परम्परा से ही पाट का चास करते हैं। पाट से जूट तैयार होता जिसका अच्छा बाजार है । पाट की फसल के लिए पानी की आवश्यकता होती है और नारायणपुर में पानी की कोई कमी नहीं है। नदी नालों का विस्तीर्ण जाल है। पाट की फसल जब तैयार हो जाती तो उसे काट कर खाल में सड़ने के लिए छोड़ देते। पाट जब सड़ने लगता तब उससे एक अजीब सी गंध फैलती । इसे दुर्गंध कहना ज्यादा सही होगा। पाट की पत्तियाँ सड़ जातीं। पाट के तनों की छाल जब सड़ कर अलग होने की स्थिति में आती ऐसे समय में अनवर के परिवार के सारे पुरुष खाल में जाते। खाल में उतरकर वे पाट को पीटते हैं। पीटने से पाट के तने से रेशे अलग हो जाते और बच जाती पाटकाठी। रेशों को बड़े कायदे से लपेटकर अलग कर लिया जाता और पाटकाठी के बंडल अलग बांध लिए जाते। पाट का बाकी हिस्सा खाल में ही छोड़ दिया जाता। पाटकाठी से वे खेलते हैं। अनवर के घर इसे चूल्हे में भी जलाती है उसकी माँ। पाट के रेशे बाज़ार में बिकने के लिए जाते हैं। जूट के सामान तैयार करने वाली फैक्टरियाँ जिनकी हैं वे इसे खरीद लिया करते। इन रेशों से खाट बुनने की मज़बूत रस्सियाँ भी बनाई जातीं।

अनवर के पिता रसूलपुर के मदरसे में पढ़ाते हैं। पाँच वक़्त के नमाज़ी हैं और हज भी कर आए हैं। नियम कायदे के मामले में कट्टर। घर में औरतें पर्दा करती हैं और हिज़ाब पहनती हैं। ईद के त्यौहार पर इनके यहाँ बड़ी रौनक होती। सबके लिए नए नए कपड़े बनते। बड़ी मस्ज़िद के पास ईद का मेला लगता। अनवर सिर पर टोपी पहनता। अनवर खेल कूद में अव्वल है। खेलने कूदने में रुचि के कारण ही अनवर से बादल की दोस्ती बनी हुई है। अनवर मदरसा में पढ़ने जाया करता। उसे हर खेल में महारत हासिल है। लम्बी छलाँग हो या ऊँची छलाँग, दौड़ हो या कुश्ती, अनवर के आगे कोई टिकता न था। कबड्डी में वह बादल को अपने दल में रखता है क्योंकि बादल  लम्बा और फुर्तीला है। अनवर के साथ ही बादल ने तैराकी सीखी। वे केले के तने लेकर नदी पोखर में उतर जाया करते तो बाहर निकलने का होश नहीं रहता। अक्सर घर से जब कोई बुलाने आ जाता और बहुत गुस्सा करने लगता तब वे पोखर से निकल कर चुपचाप लौट जाते। आरंभ में तो एकदिन बादल डूबते डूबते बचा। केले के तने के सहारे तैरते हुए वह पोखर के बीच तक चला गया। जाने क्या हुआ कि केला गाछ उससे छूट गया और बहकर दूर चला गया। वह डूबने उतराने लगा। उससे अब साँस नहीं लिया जाता है। ढेर सारा पोखर का पानी इसबीच वह पी चुका। तभी अनवर का

ध्यान उसकी तरफ गया तो वह तेज़ी से उस तक पहुंचा और बीच पोखर से उसे किनारे ले आया।

नारायणपुर में बाँस वन की कमी नहीं है। बाँस की झड़ियों में तरह तरह के पक्षी छुपे होते। बाँस की जब नई पत्तियाँ आतीं तो उनमें हरापन उतना नहीं होता। वे हल्का पीलापन लिए बिलकुल लिपटी हुई सी और बेहद नर्म और मुलायम होतीं तब। ये पत्तियाँ बादल  को बेहद प्रिय हैं। बाँस वन में पत्तियों से ज्यादा रुचि बादल की इस बात में रहती कि इनमें से कौन लाठी के लिए सबसे उपयुक्त है। उसे लाठियाँ बहुत पसंद हैं। लाठी खेला उसे पसंद है। बरसात के दिनों में जब नावें चलने लगती हैं तब लाठी के बिना वह घर से बाहर नहीं निकलता है। यहाँ वहाँ साँप निकलते हैं । लाठी से साहस रहता है। साँप के काटने से गाँव में कितने ही लोगों की मौत हो जाती है। उसने देखा है कि साँप के काटने से उसके दोस्त अनवर की एक बहन कैसे प्राण खो बैठी थी। वह कनेर के पेड़ से फूल तोड़ रही थी जब उसे साँप ने डस लिया। पूरे गाँव में खबर फैल गई। वह भी देखने गया। उसके मुँह से सफेद झाग आ रहा है। उसका चेहरा कैसा तो नीला पड़ता जा रहा है। ओझा और गुनी उसको बचा नहीं सके। कोई साँप का मंत्र काम न आया। बेहद ज़हरीला साँप था वह। साँप को पकड़ा नहीं जा सका।

सत्तर का उथल पुथल भरा साल। एक तरफ मुक्ति का संघर्ष तो दूसरी तरफ धार्मिक उन्माद की दिल दहला देने वाली खबरें। एक तरफ मुक्ति योद्धाओं की सक्रियता बढ़ रही है तो दूसरी और पूर्वी पाकिस्तान की खान सेना के वफादार रजाकार मुक्ति की चाह रखने वालों के दमन पीड़न में कोई कसर नहीं छोड़ रहे। वैशाख की ऐसी ही एक उदास शाम आई उस दिन। सूरज अभी अभी डूबा है पश्चिम में। रोज़ की तरह बाबा ने बादल को आवाज़ लगाई -ओरे खोका, दरवाजा ठीक से बंद करके तुमसब सो जाओ अब। मैं पहरा देने जा रहा हूँ ।

पिछले कुछ महीनों से यह रोज़मर्रा का काम हो गया है। रात के खाने के बाद पाड़ा-प्रतिवेशी सारे पुरुष मानुष नियम से मोहल्ले की हिफाज़त के लिए रातभर जागकर पहरा देते। लूटपाट और आगजनी की घटनायें बढ़ती जा रही हैं। बादल  के लिए यह सब एक पहेली जैसा है। वह सोच नहीं पाता कि अपने ही लोगों से आखिर हमें खतरा क्यों है। वे हमें क्यों मार देना चाहते हैं। क्या बिगाड़ा है हमने उनका।

नारायणपुर के माहौल में तनाव बढ़ता ही जाता है। बादल देख रहा है कि लम्बे समय से अनवर उसके साथ खेलने नहीं आता। ठीक से बात भी नहीं करता है वह बादल से। उसदिन बादल उसे खाने के लिए कुछ देने लगा तो उसने बड़े रूखेपन से जवाब देते हुए कहा -मुझे भूख नहीं है रे बादल, तू खा ले।

बादल ने निश्चय किया कि आज संध्या वह फुटबाल खेलने के लिए अनवर को बुलाने उसके घर जायेगा। गोधूलि वेला में जब वह उसके घर पहुँचा तो दरवाज़े पर ही ढेर सारे लोगों को देखकर ठिठक गया। एक मौलवी के साथ पंद्रह बीस लोग आँगन के बाहर आमगाछ के नीचे खाट पर बैठे हैं। वह केले के मोटे तने की ओट में छुप गया । अनवर कहीं दिखाई नहीं पड़ रहा है।

मौलवी ने अपनी टोपी ठीक करते हुए कहा -बेशी मेलजोल की एकदम ज़रूरत नहीं है। जैसा मैंने समझाया वैसा ही करना है सबको, समझे न ? सबने आज्ञाकारी बालक की तरह अपने सिर हिलाए। मौलवी ने उठते हुए कहा -तो फिर चलता हूँ। सब उठ खड़े हुए। अनवर के पिता मौलवी के पीछे पीछे घर के बाहर तक आये। वह इन लोगों को देखकर थोड़ा घबरा गया और घबराहट में केले के झोंप से बाहर निकलने को हुआ। अनवर के पिता ने केले के झोंप की तरफ से पत्तों की सरसराहट की आवाज़ सुनी तो उधर नजर घुमाते हुए पुकारा -कौन है, कौन है वहाँ झोंप के पीछे छुपा हुआ! बादल  तबतक बाहर आ चुका है।  वह सकुचाते हुए बोला -चाचा, मैं बादल, अनवर घर पर नहीं है ?

दौड़ता हुआ बादल आँगन की तरफ गया। तब तक वे लोग घर से बाहर की ओर निकल चुके हैं। अनवर भीतर कमरे में लेटा कोई किताब पढ़ रहा है।

-क्या रे, क्या हुआ है तुझे ? इतने दिन खेलने क्यों नहीं आया ?

-मेरी तबीयत ठीक नहीं रे, बुखार-बुखार जैसा है।

बादल ने अनवर के माथे पर हाथ रखकर देखा। कपाल एकदम ठंडा है। उसे आश्चर्य हुआ कि वह इस तरह झूठ क्यों बोल रहा है।

-कहाँ है बुखार, कुछ भी तो नहीं। बहाना क्यों करता है रे पगले!

-अच्छा, अभी तू घर जा, कल आता हूँ माठ में खेलने, अनवर ने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा। बादल उछल कर दालान से बाहर निकल आया । जाते जाते ज़ोर की आवाज लगाई उसने, कल आना जरूर!

अँधेरा घिर रहा है। अब खेलने का समय भी निकल चुका। माठ पार कर वह खाल के किनारे किनारे ऊँचे बाँध को पकड़कर चलने लगा। सहसा आसमान में धुंए का गुबार देखकर वह आश्चर्य से भर उठा। इतना बड़ा गुबार चूल्हों के धुंए से संभव नहीं है। धुँआ मंडलपाड़ा की ओर से उठ रहा है। कहीं आग लगी हो जैसे। वह तेज़ी से धुँए की दिशा में भागा।

पूरा मंडलपाड़ा धू-धू कर जल रहा है। उसका घर भी आग की चपेट में है। सबलोग बाहर से आग बुझाने में लगे हुए हैं। एक अजीब सी चीख पुकार का शोर चतुर्दिक व्याप्त है। सबकुछ जल रहा है। सारे लोग मिलकर भी आग पर काबू नहीं पा रहे हैं। पोखर से दौड़-दौड़ कर वे पानी लाते हैं और जलते घरों पर उलीच देते हैं। बाँस, मिट्टी और फूस के घर दहक रहे हैं। जबतक आग कुछ मद्धम पड़ती सबकुछ नष्ट हो चुका था। अगली सुबह वे राख के ढेर के बीच से अपने बचे खुचे सामान निकाल रहे हैं। उनके सिर पर कोई छत नहीं है।

अकेले मंडलपाड़ा ही नहीं खुलना ज़िले के इस अंचल के गाँवों में इस तरह की वारदातें अब आम होने लगी हैं। देखते देखते पलायन आरंभ हो गया है। बचे खुचे माल असबाब को लेकर ये लोग अपनी जान की हिफाज़त के लिए सीमांत की तरफ निकलने लगे हैं, सीमा पार जाने के लक्ष्य से। यह ज्येष्ठ मास है।

नारायणपुर में पिछले कई महीनों से तनाव की स्थिति है। नदी पर

बाँध की मरम्मत का काम चल रहा है जिसमें मंडलपाड़ा से काफी लोग काम पर लगे हुए हैं। ठेकेदार बड़ी मस्जिद के मौलवी का निकट संबंधी है। ठेकेदार नशे में था। एक लड़के के ऊपर साइकिल समेत गिर पड़ा। थोड़ी कहा सुनी हुई। वह गालियाँ देने लगा। लड़का भी अड़ियल स्वभाव का। और गलती तो ठेकेदार की ही है। वह क्योंकर दबता उससे। आवेश में हाथ का फरसा चला दिया ठेकेदार पर। ठेकेदार वहीं ढेर हो गया। नशे में तो वह है ही। उठकर घर जाने लायक भी उसकी स्थिति नहीं है। अगले दिन मस्ज़िदपाड़ा से एकदल लोग पंचायत के लिए बैठे गाँव में।

मस्ज़िदपाड़ा की पंचायत का मानना है कि यह आक्रमण छोटी जात वाले नमःशूद्र हिन्दुओं की तरफ से है और उन्हें इस देश में ही रहने का कोई हक नहीं। तनाव देखते देखते दंगे में बदल गया। बादल   के परिवार में माँ बाबा के आलावा एक बहन है। थोड़ी सी ज़मीन है उनके पास जिससे किसी तरह गुज़ारा हो जाया करता है। अब वह भी उनसे छिन रहा है। अपने बचे खुचे माल असबाब के साथ वे कालीबाड़ी के मंडप में शरण लेने को बाध्य हैं। बाबा अपनी जान पहचान के लोगों से संपर्क में हैं जो उनको इस मुसीबत से बाहर निकाल सकें। लेकिन कहीं से कोई मदद भी नहीं आती है। घर में अनाज के दाने तक नहीं हैं।

बादल का स्कूल जाना बंद हो गया। वह इसी साल नवीं क्लास में गया है। पढ़ाई लिखाई की कौन कहे अब तो जान के लाले पड़े हैं। शाक के पत्ते उबालकर पेट जिलाते हुए जैसे तैसे ज़िंदा होने का एहसास है। वह भी कितने दिनतक चलता जब अपने आस पास के लोग उनका देश छुड़ाने पर ही आमादा हों। पूर्णिमा की रात है यह जब वे, अपने समय के शरणार्थी, कालीबाड़ी मंडप में रात के बीत जाने की प्रतीक्षा में हैं और नींद है कि आँखों में समाती नहीं है। बाबा ने बादल की माँ को धीमे स्वर में बताया, एक दलाल के साथ बात हुई है मेरी। वह हमें उसपार ले जाने का बंदोबस्त कर देगा। टाका माँग रहा है। कलशी बाटी बिक्री करके हो या जैसे भी हो, कुछ न कुछ तो करना ही होगा। इस तरह कितने दिन बच सकते हैं हम। देश छोड़ कर जाना ही होगा अब, यहाँ गुज़ारा संभव नहीं दिखता।

कलशी बाटी बेचकर भला कितने पैसे आते। माँ के कुछ गहने हैं जिन्हें अब बेचने की नौबत आन पड़ी है। स्त्री धन ऐसे ही दुस्समय में पुरुषों को बचाता आया है। माँ के गहने इस तरह जाते देखकर बादल को भारी कष्ट हो रहा है। वह सोचता है एकदिन वह माँ के लिए ढेर सारे गहने बनवायेगा। जब वह बड़ा होकर कमाने लगेगा। बाबा का चेहरा इनदिनों कैसा तो कठोर सा हो गया है। कम बोलते हैं। कम खाते हैं। ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ।

दलाल के कहे अनुसार वे मय सामान घाट पर एकदम काकभोर में ही जा पहुँचे। दलाल का कहीं अता पता नहीं है। घाट पर उस

अँधेरे में भी निरुपाय असहाय असंख्य मानुषजन अलग अलग दिशाओं से आ रहे हैं। मुँहमाँगी कीमत देकर डिंगी लेना जिनके बस में है वे उसपार जाने के लिए निकल जा रहे हैं। किसिम-किसिम के दलालों को घेरे लोग अपनी अपनी गुहार लगाते हैं। बादल ने अधीर होकर पूछा, बाबा, वो आदमी कब आएगा ? बाबा ने आश्वस्त करते हुए कहा, आयेगा, आयेगा, ज़बान दी है उसने हमें। दलाल ने अपना नाम गुलाम मोहम्मद बताया है और आश्वस्त किया है कि वह उनके लिए डिंगी का इंतजाम तो करेगा ही, वह उनके साथ साथ भी चलेगा और सीमांत पार करा देगा।

गुलाम मोहम्मद जब घाट पर पहुँचा तबतक काफी देर हो चुकी है। एक ही डिंगी घाट के किनारे लगी हुई है, वह भी लगभग लोगों से भरी हुई। बादल का किशोर मन उस डिंगी की प्रतीक्षा करते करते ऊब चुका है जो उन्हें लेकर जाने वाली है। वह एक क्षण के लिए बाबा के चेहरे को देखता तो दूसरे ही क्षण नदी घाट की ओर। इस संकट के आगे उन्हें भूख प्यास का अनुभव भी नहीं हो रहा है। गुलाम मोहम्मद को दूर से आता हुआ देख बाबा की आँखों में चमक आ गई। वे उठ खड़े हुए और लम्बी साँस छोड़ते हुए बोले, आ गया देखो। अब कुछ न कुछ बंदोबस्त ज़रूर हो जायेगा।

-अच्छा, हमारे लिए कौन सी नौका की व्यवस्था है ?

-आज तो नहीं हो पायेगा। आज मेरे घर में रह जाइए कष्ट करके। आज की रात ही आप सबको पार करा दूँगा। चिंता न करें।

गुलाम मोहम्मद उन्हें तफसील से समझाता रहा कि डिंगी के लिए भारी छीना झपटी चल रही है। एक माझी उन्हें आज की रात ही पार करा देगा। तब तक वे उसके घर पर आराम कर सकते हैं। गुलाम मोहम्मद सातक्षीरा का रहने वाला है। एक नाव से वे गुलाम मोहम्मद के गाँव तक आए। यहाँ से आगे सीमांत पार कराने का जिम्मा गुलाम मोहम्मद का है। लेकिन उससे पहले आज रात इन्हें एक और नदी को पार करना है। गुलाम मोहम्मद इन्हें अपनी नाव में पार करायेगा जहाँ से आगे इच्छामती तक फिर पैदल चलना होगा।

गुलाम मोहम्मद का घर साधारण सा एक कच्चा मकान है। साग भात का इंतजाम गुलाम मोहम्मद की बीवी ने कर दिया। भूख से बेहाल चार जन का यह परिवार आज गुलाम मोहम्मद के घर शरणार्थी है। रात जब थोड़ी गहराने लगी तब एकबार फिर वे घाट पर आये। गुलाम मोहम्मद आगे आगे चल रहा है। एक डिंगी घाट पर लगी है जिसमें कुछ परिवार पहले से ही अपनी गठरियाँ और अन्य सामान लेकर बैठे हुए हैं। गुलाम मोहम्मद ने उनसे डिंगी में बैठ जाने को कहा। उसने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा कि कुछ देर बाद एक दूसरी डिंगी में वह भी उस पार आ जायेगा और उनसे मिलेगा। रूपए पैसे वह पहले ही ले चुका है। उसके कहे पर विश्वास करने के अलावा इन लोगों के पास कोई उपाय भी नहीं है। वे उसपार उतरने के बाद घंटों गुलाम मोहम्मद की प्रतीक्षा करते रहे।

गुलाम मोहम्मद नहीं आया।

 

 

 

 

 

 

Sunday, March 29, 2026

उपन्यास अंश: मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी

 


 (आजादी के साथ विभाजन की त्रासदी पर  हिंदी में लिखे गये कथा साहित्य में बंगाल के ऊपर बहुत कम लिखा गया है। पिछली सदी के आठवें दशक के उत्तरार्ध में सुंदरबन के द्वीप मरिचझाँपि में हुई घटनाओं को केन्द्र में रखकर इधर दो महत्वपूर्ण उपन्यास सामने आये हैं।  विजय गौड़ के उपन्यास ‘आलोकुठी’  के बाद नीलकमल का उपन्यास ‘मरिचझाँपि को छूकर बहती है जो नदी’ गत वर्ष ही प्रकाशित हुआ। यह उपन्यास किसी बड़े प्रकाशन से प्रकाशित नहीं है। इसके वितरण के लिये किसी ऑन-लाइन  प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल नहीं किया  गया है।प्रकाशन के  एक वर्ष बाद  पहले  संस्करण के बिक जाने की खबर यह बात भी साबित करती है कि अच्छी किताबें  बिना शोर-शराबे के भी पाठकों तक पहुँच जाती हैं.। इस उपन्यास के कुछ अंश साभार प्रकाशित कर रहे हैं)



 (एक)

देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है

दिन चढ़ रहा है। कोरानखाली के साँवले जल में मध्य आकाश का सूर्य अपनी स्वर्ण किरणें बिखेरता झिलमिल कर रहा है। कुमिरमारी के बुधवार बाज़ार वाले घाट की सीढ़ियों पर बैठा अमलेंदु उस पार के निर्जन द्वीप को निहार रहा है। मरिचझाँपि द्वीप, एक जनशून्य भूखण्ड जिसके एक छोर पर बशीरहाट फॉरेस्ट रेंज का निर्माणाधीन बीट ऑफिस ऐन बागना फॉरेस्ट ऑफिस के विपरीत है। देखने में कहीं से कुछ भी खास नहीं।

इसपार मध्यवय का एक आदमी जाल फेंकने की तैयारी कर रहा है। अभी वह अपने जाल को सुलझा रहा है। देखकर ऐसा लगता है कि जाल का वज़न कम नहीं है। यह मछलियाँ पकड़ने वाला जाल है। पेशेवर मछुआरों वाला जाल। आदमी ने कमर से लुंगी बाँधी हुई है। दोनों टांगों के बीच से लुंगी के छोर को पीछे की तरफ खींचकर उसने कमर के पीछे खोंस रखा है। जाल सुलझ जाने के बाद उसका कुछ भार कंधे पर लेते हुए और दोनों हाथों का इस्तेमाल करते हुए वह उसे घुमाकर नदी में फेंकता है। जाल हवा में लहराती हुई खुलती है और छल्ला बनाती हुई नदी की सतह पर गिरती है। हवा में जिस समय जाल लहराकर खुलती है उस समय दृश्य ऐसा उपस्थित होता है जैसे कोई अजाना फूल खिल उठा हो। जाल का फेंकना और उसका खुलना एक छंद में और लय में घटित होता है। जाल के निचले वृत्त में धातु के गुटके लगे हैं जिससे जाल क्रमशः जल में नीचे गहरे उतरने लगती है। अब आदमी धीरे धीरे जाल को समेट रहा है। कैसा अद्भुत कौशल है उसके जाल समेटने में। जाल समेटते हुए वह किसी जादूगर सा दिखता है। जाल के साथ अब वह थोड़ी सूखी जगह पर आ गया है और इस बात की तसदीक कर ले रहा है कि जाल में कोई मछली फँसी या नहीं। पहली बार में उसका प्रयास व्यर्थ हो गया है। लेकिन उसके उत्साह में तो कोई कमी नहीं है। वह नदी के उस हिस्से में है जहाँ से भाटा के बाद पानी उतर चुका है। यह दलदली ज़मीन है। उसके पाँव गहरे धँस रहे हैं। वह अपनी जगह बदल कर थोड़ा आगे जाता है। नई जगह से एक बार फिर वह उसी ढंग से जाल फेंकता है। उसी ढंग से इसबार भी जाल समेटता है। इस बार उसे कुछ मछलियाँ मिली हैं। बहुत ज़्यादा नहीं हैं मछलियाँ लेकिन उसके चेहरे पर ज़रा भी संताप नहीं है। असीम धैर्य चाहिए मछलियाँ पकड़ने के लिए। वह उसी उत्साह से अपने काम में एकबार फिर जुट जाता है। अमलेंदु उसे बड़े ध्यान से देख रहा है। उस आदमी ने मछलियों के लिए एक बड़ी सी देगची अपने साथ ली हुई है। उस बड़ी सी देगची में वह मछलियों को जिला कर रखेगा। खाने की ज़रूरत से ज़्यादा जो भी मछली उसे मिलेगी उसे वह बाज़ार में दे देगा। यह उसका रोज़ का संघर्ष है।

उसपार जो निर्जन द्वीप है, जिसे अमलेंदु बड़े ध्यान से निहार रहा है, इतिहास के पन्नों में वह देशच्युत शरणार्थियों के कभी न भुलाये जाने वाले संघर्ष की गाथा अपने भीतर छुपाये हुए है। कुल तेरह महीने का प्रवास रहा यहाँ छिन्नमूल अभागों का। मरिचझाँपि में फिर से जंगल उग आये हैं। लेकिन मरिचझाँपि के जंगलों में तेरह महीने अपना पसीना और खून बहाने वाले शरणार्थियों की आवाज़ें यहीं कहीं बिखरी हुई हैं। आज भी जब पूर्णिमा का चाँद आकाश पर खिलता है कुमिरमारी के बुजुर्गों के कानों में मरिचझाँपि के शरणार्थियों की चीखें सुनाई देती हैं। शिशुओं और स्त्रियों का करुण रुदन सुनाई देता है।

कथा बीसवीं सदी के आठवें दशक में घटित होती है। बीसवीं सदी के आठवें दशक का उत्तरार्द्ध। सन अठहत्तर का वैशाख मास है। दण्डकारण्य से हासनाबाद के रास्ते शरणार्थियों का मरिचझाँपि अभियान आरंभ हो गया है। वे पहले कुमिरमारी द्वीप आ पहुँचते हैं और वहाँ से कोरानखाली नदी पार करके मरिचझाँपि द्वीप पर कदम रखते हैं। वही कोरानखाली, जो मरिचझाँपि को छूकर बहती है। समवेत उलूध्वनि का स्वर आकाश में दूर तक गूँज रहा है। सातवाँ आसमान अगर कोई होता होगा तो स्त्रियों के कोमल कंठ से पृथ्वी के सबसे मधुर संगीत के उठान का यह स्वर वहाँ पहुँच रहा है और देवताओं की नींद वहाँ ज़रूर टूट गई है। सामने कोई दो सौ गज चैड़ी यह नदी है जिसे कोरानखाली कहते हैं। जैसे कोई सेना चढ़ाई के लिए तैयार खड़ी है और उसे इस नदी को पार करना है। यह किसी राम की सेना नहीं फिर भी चुनौती तो इसकी भी समुद्र पार करने जितनी ही है। इस सेना में हनुमान की कमी नहीं है, कमी है तो उसकी शक्ति के बारे में याद दिलाने वाले जाम्बवंत की जो इस कथा से कहीं फरार है। शंख बज रहे हैं। उलूध्वनि तीव्र से तीव्रतर हो रहा है। उसपार कोई सेना नहीं जिसपर विजय पाने की चुनौती आज सामने है। बल्कि सामने एक निर्जन वन प्रदेश है जहाँ सृष्टि के आदिम युग से लेकर आजतक किसी मानव के पाँव नहीं पड़े। कई हज़ार परिवार इस वन्य भूमि को अपना घर बनाने के इरादे से आज यहाँ जान की बाजी खेलने के लिए आ खड़े हुए हैं।

किराए पर नौका मिल गई है। पहला दल उस पार उतर रहा है। आह, यह कैसा ऐतिहासिक क्षण है। ईश्वर के बागान में आदम और हव्वा की संतानें पैर रख रही हैं। वे कृतज्ञ हैं इस माटी के और अपने कृतज्ञता ज्ञापन में कहीं से भी कृपण नहीं। वे नदीतट की माटी को माथे से लगा रहे हैं। एक अनिर्वचनीय सुख इस समय आँखों में नमी बनकर उन्हें सजल किये देता है। रोम रोम इनकी देह का इस समय कितना पुलकित है इसे सिर्फ वे ही बता सकते हैं। इस समय सूर्य अभी ऊपर चढ़ ही रहा है। आलोक से पृथ्वी का कण कण जगमग है। दूसरा दल इसी तरह नदी पार करता है और फिर तीसरा दल। दोपहर होने को आती है। जैसे कोई उत्सवलीला घटित हो रही है आँखों के सामने। कुमिरमारी के नागरिक इस उत्सवलीला के साक्षी बन रहे हैं।

इस पार जंगल है। कल तक बाघ, भालू, हिरण और न जाने कितने वन्य प्राणी इसमें विचरण करते थे। न जाने कितने प्रकार के पक्षियों का कलरव यहाँ गुंजरित होता रहता था। जिस नदीतट पर दोपहर की धूप सेंकने कभी घड़ियाल और मगरमच्छ आते थे वहाँ हमेशा हमेशा के लिए घर बाँधने के लिए असंख्य उद्बास्तुजन आये हैं। आज इस निर्जन प्रदेश में शिशु की हँसी की खिलखिल है। पाजेब की रुनझुन है, चूड़ियों की खनखन है यहाँ। यहाँ पुरूषों के कंठ से फूटते लोकगीत की स्वरलहरी है। आज प्रकृति का मातृरूप इतनी संततियों के आगमन से पुलकित है। नदी की लहरों में आने वाला बल आज पहले से ज्यादा है। यह वैशाख की एक चढ़ती हुई दोपहर है। दण्डकारण्य का दुख पीछे, बहुत पीछे छूट गया है। आज एक नई बस्ती का जन्म हो रहा है।

कहाँ से शुरू करें, यह एक बड़ा प्रश्न होता है जब आदमी को एक जंगल में उतार दिया जाये और कहा जाये कि अब उसे बाकी का जीवन यहीं बिताना है। यह सवाल तब दो चार दिन के साहसिक पर्यटन अभियान से भिन्न जीवन की एक बड़ी लड़ाई बन जाता है। समझदारी तो इसी में है कि सूर्यास्त से पूर्व कम से कम इतनी ज़मीन साफ कर ली जाए कि मानुषजन रात्रि विश्राम कर सकें। इसलिए तय होता है कि बनबीवी को प्रणाम करते हुए जंगल कटाई का काम सबसे पहले शुरू किया जाए। द्वीप के उत्तर दिशा में एक तरफ से काम शुरू होता है। दाँव, कुल्हाड़ी, साबल आदि लोहे के हथियार निकाले जा रहे हैं। शरीर से मज़बूत पुरुषों का एक दल इस काम में तैनात कर दिया जाता है। एक दल कटे हुए डाल, लकड़ी वगैरह को एक तरफ हटा रहा है। स्त्रियों का दल ज़मीन की सतह को समतल और साफ करने में लगाया गया है। एक दूसरा दल भोजन और पानी की व्यवस्था में लगा है। पहली बार इस भूमि पर आग जलाई जा रही है। यह पवित्र आग है जिसपर अन्न सींझ रहे हैं। धुआँ उठ रहा है। भाप निकल रही है। हाँड़ी में भात के खदबदाने का संगीत आज देवलोक के वाद्यों से होड़ ले रहा है।

कुमिरमारी, बुधवार बाज़ार के विपरीत मरिचझाँपि नदीतट पर जहाँ से शरणार्थी दल का प्रवेश हुआ है उसे अस्थायी घाट के रूप में तैयार किया जा रहा है। जगह को इस तरह से समतल किया जा रहा है कि नौका से उतर कर नदीतट पर जाने में दिक्कत न हो। ऐसा करना इसलिए भी आवश्यक है कि आने वालों में महिलाओं और वृद्धजन की अच्छी संख्या है। कई स्त्रियों की गोद में शिशु हैं जिनके साथ ही इन्हें नौका से उतरकर ऊपर चढ़ना है। समिति के पास मरिचझाँपि के भविष्य की इस कॉलोनी की योजनाएँ हैं और बहुत सारा काम कागज़ पर भी तैयार है। कहाँ समिति का कार्यालय होगा, कहाँ बनबीवी का थान (स्थान) होगा, कहाँ बाज़ार बनेगा, किस जगह पर स्कूल होगा, पोखर किस जगह पर काटा जाएगा, भेरी किस ओर बनाई जायेगी, घर किस माप के और किस क्रम में होंगे, घरों के बीच आने जाने का मार्ग कितना चैड़ा रहेगा, नौका निर्माण और बेकरी यूनिट के लिए जगह किस तरफ दी जाएगी इन सभी बातों की एक परिकल्पना समिति के पास तैयार है और उसी अनुरूप काम भी किया जा रहा है। काम की मज़दूरी किसी को नहीं दी जा रही है क्योंकि यह सबका साझा उपक्रम है।

वर्षा में अभी तीन चार महीने का समय है। उससे पहले रहने लायक तैयारी यदि न कर ली गई तो वर्षा के दिनों में रहना बहुत ही कष्टकर हो जाएगा इस बात का एहसास सभी को है। इसलिए काम में चपलता और तत्परता स्वतःस्फूर्त दिखाई देती है। आशा और आकांक्षा ने तात्कालिक दुखों को वैसे ही ढक लिया है जैसे आषाढ़ का मेघ सूर्य को ढक लेता है। हर तरफ एक अदम्य उत्साह है। भूख, प्यास, थकान, रोग-शोक सब अभी गौण हो गए हैं। सबसे ऊपर है बचने और बचाने का संघर्ष।

पहले दिन का सूर्य डूब गया। यह पहली रात है मरिचझाँपि की धरती पर। दिन भर कठोर परिश्रम के बाद देह पर वश नहीं रहा है। छोटे छोटे दल में परिवार के साथ विश्राम के लिए ज़मीन ही शय्या है। छत के नाम पर खुला आकाश है। पाश्र्व में है नदी की कलकल। तीन तरफ से नदियों से घिरे भूखण्ड के इस छोर के भीतर क्या ज़रा भी सिहरन नहीं हो रही होगी इतनी पीठों का स्पर्श पाकर ? कुछ लोगों को रात भर जागकर पहरा देना है। कहीं कहीं आग जल रही है जिससे कि वन्य पशु नज़दीक न आने पायें। समिति के नेताओं की आँखों में आज नींद नहीं है।

-एक अजाना भविष्य का पीछा करते हुए अंततः इतने मानुष आ गये (गहरी साँस छोड़ते हुए)।

-सच में सबकुछ एक स्वप्न के जैसा लगता है। कितनी आशा है सबके मन में (चेहरे पर सुख और संतोष की छाया स्पष्ट है)।

इनके संवादों में भविष्य की चिंता है और ढेरों आशंकाएँ भी हैं। बातचीत चल रही है। कहने सुनने का क्रम आगे बढ़ता है।

-सच कहता हूँ, दण्डकारण्य में कोई सुखी नहीं रह सकता था। वह भूमि कितनी अलग है। यहाँ कितनी शांति है। कैसी शीतलता है यहाँ की हवा में। मुझे भूखा रहना पड़े तब भी यहाँ से कहीं जाने का मन नहीं करेगा।

-यह तो सच है। नदी की गोद के लिए प्राण छटपट करता है हमारा (दृढ़ता है बात में, बोलने वाले के जबड़े सख्त हो जाते हैं)।

-नदी का कलकल स्वर सुन रहे हो, कान तरस गये थे। कितना

मधुर, कानों में जैसे मधु घुल रहा है। आहा, हृदय को कितनी ठंडक पहुँच रही है। तृप्ति का यह सुख अनिर्वचनीय है।

-कष्ट सहकर भी इस भूमि को स्वर्ग बनाना है। खून पसीना एक कर देंगे इसके लिए (बीड़ी सुलगाता है। दूसरे साथी को भी देता है। दोनों बीड़ी पीते हैं और नदी के किनारे टहलने लगते हैंै)। बच्चे के रोने की आवाज़ आती है। एक स्त्री उसे लोरी गाकर चुप कराने की कोशिश कर रही है। एक वृद्ध के खाँसने की आवाज़ आ रही है दूसरी ओर से। किसी को भरपेट खाना नहीं मिला है। कुछ तो खाली पेट पानी पीकर सो रहे हैं। उसपार बुधवार बाज़ार के पास एक झोपड़ी से क्षीण सी रोशनी आ रही है। शायद कोई जाग रहा है। उस पार इस जगह कुछ आदिवासी परिवार रहते हैं।

-कितने दिन में जंगल सफाई का काम हो जाने की आशा है ?

-मेरा मन कहता है एक महीना का समय लग जाएगा। वैसे उत्साह यदि ऐसा ही रहा तो कौन जानता है, बीस दिन में भी हो सकता है।

-उत्साह तो किसी भी तरह से कम नहीं था आज। उत्साह देते रहना होगा। कल कुछ राशन का इंतजाम करना होगा किसी भी प्रकार से। पेट में अन्न नहीं होगा तो उत्साह के जोर पर कहाँ तक शरीर चलेगा।

-काठ बेचकर कुछ टाका-पैसा का बंदोबस्त नहीं हो जाएगा ?

-काठ बाज़ार तक कैसे जाएगा, सब इतना आसान कहाँ है ? उसके लिए अपनी नौका चाहिए। अभी तो एक भी नौका नहीं है अपने पास। कुमिरमारी से सहायता मिल रही है अभी। जल्दी ही अपना कारखाना आरंभ करना होगा हमको।

-आज कितने परिवार हैं मरिचझाँपि में, कुछ अंदाज़ा है ?

-सौ से ऊपर परिवार हैं। अभी बहुत से परिवार उस पार कुमिरमारी में हैं जो आज आ नहीं पाये। बहुत से परिवार अभी रास्ते में हैं जो धीरे धीरे आयेंगे। हज़ार परिवार तो दंडक से साथ ही निकले थे, सभी आयेंगे आगे पीछे।

-कितना जम जमाट हो जायेगा जब सब आ जायेंगे।

-आज एक खाता में सबका नाम धाम लिखना शुरू हुआ है। कल से तुम खाता का दायित्व देखो। मैं एकबार पंचायत ऑफिस जाऊँगा। उन लोगों से सहायता की आशा है।

बातों में रात बीत रही है। नींद नाम की चिड़िया आज न जाने किस जंगल में गुम है। भोर होने को है। सारे लोग सो रहे हैं थोड़ी सी दूरी पर। दो जोड़ी आँखें इस भोर की प्रतीक्षा कितने वर्षों से करती रही हैं। आज वह भोर आई है। आकाश लाल है। धीरे धीरे उजाला बढ़ता है। रात की काली छाया पराजित योद्धा सी भागने की जल्दी में है। पक्षियों की डाक कानों को कितने दिन बाद सुनाई दे रही है। नदी का कलकल छलछल शब्द संगीत सा बजता है। क्या यही स्वाधीनता है ? क्या यह जो हृदय को इतना अच्छा लगता है वह स्वाधीनता का भाव है ? दण्डकारण्य के जंगल में यह सुख क्यों नहीं अनुभव हुआ कभी ? यह मरिचझाँपि की पहली सुबह है।

अलग अलग मार्ग से परिवारों के आने का क्रम इसी भाँति जारी है। यह क्रम अगले कई दिनों तक, कई सप्ताह तक चलता है। हज़ारों परिवार मरिचझाँपि पर अपने पैरों की छाप छोड़ रहे हैं। हज़ार बाहों वाली कोई शक्ति जैसे काम में जुट गई है। जंगल साफ हो रहे हैं। रास्ते तैयार हो रहे हैं। ज़मीन समतल की जा रही है। समिति के कार्यकर्ता दिन भर सबके हालचाल ले रहे हैं। खाता में सबके नाम धाम दर्ज हो रहे हैं। कितने स्त्री पुरुष, कितने शिशु, कितने वृद्ध सबकी गणना की जा रही है। समिति का दायित्व बढ़ता जा रहा है।

सबसे पहले बनबीवी का थान (स्थान) तैयार किया गया है। समिति का दफ्तर भी एक तरफ जैसे तैसे खड़ा हो गया है। कठिन संघर्ष का पहला महीना जैसे पंख लगा कर उड़ गया। बादल समिति से बार बार आग्रह कर रहा है कि स्कूल का काम जितना शीघ्र हो सके आरंभ कर देना चाहिए। बीस बाईस साल का उत्साही युवक बादल स्कूल के लिए कुर्सी, टेबल, बेंच आदि बनवाने में खुद नेतृत्व दे रहा है। उसने तो स्कूल का नाम भी सोच रखा है। समिति का अनुमोदन मिल जाए तो स्कूल का काम आरंभ किया जा सकता है। इस बीच वह घूम घूम कर लोगों से चंदा इकट्ठा करता रहा है। चार आना, आठ आना, रुपए दो रुपए भी जहाँ से मिले उसने हाथ फैला कर लिया है। बच्चों के लिए कुछ प्रारम्भिक शिक्षा की पुस्तकें खरीदनी होंगी।


(अगली पोस्ट में जारी)