Wednesday, June 24, 2026

अवधेश कुमार की कविताओं के बारे में: विष्णु खरे

 

 

विष्णु खरे
( अवधेश जी को याद करते हुए हम आज उनकी  कविता पर कवि-आलोचक विष्णु खरे के विचार दे रहे हैं। यह महत्वपूर्ण आलेख उन्होंने अवधेश के  कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये  भूमिका के रूप में लिखा था।)

  

पिछले कुछ वर्षों से ‘युवा’ और ‘युवा कविता'  शब्द हिन्दी  में सिर्फ युवकों और युवकों द्वारा लिखी जा रही कविता के पर्याय नहीं रहे। कभी वे नयी कविता के बाद वाली पीढ़ी के लिए इस्तेमाल किए गए और कभी वामपंथी तेवर वाली कविता के लिए या सामान्यतः आदमी से लगाव रखने वाली कविता के लिए, किंतु ‘युवा' शब्द कभी भी केवल उन लोगों का परिचायक नहीं रहा जिन पर यौवन आ चुका हो। देखा जाए तो आजादी के बाद जो दो पीढ़ियां जवान हुई है उनमें से सौभाग्यशाली कुछ को छोड़कर युवा होना क्या होता है. यह किसी ने जाना ही नहीं। युवा होने का अर्थ यदि स्वस्थ, चंचल, जोखिमपसंद, आत्मनिर्भर, निश्चिंत,स्वतंत्र होता है तो कहा जा सकता है कि पिछले तीस वर्षों में भारत में बहुत कम लोग ही युवा हो पाए होंगे। भारतीय हालात- सामाजिक, आर्थिक. राजनैतिक -किशोरों को सीधा अधेड़ बना देते हैं। युवा होना इस देश के महान परिवारों का ही हिस्सा है।

 

किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे बीस से तीस वर्ष के लोगों ने यौवन- उसके सारे या कुछ अर्थों में- देखा और पाया ही नहीं? हिन्दी कविता पर लगातार सैकड़ों वर्षों तक यौवन का राज्य रहा। बूढ़े कवि कुश्ते खाते और खिलाते रहे- किन्तु छठे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ? हालात बद से बदतर होते गए हैं इसमें कोई संदेह नहीं और युवकों  का चन्द बरस भी जवान रह पाना मुश्किल होता जा रहा है। देश और संसार की हालात कवियों से बहुत पेचीदा मांग कर रही है। लेकिन सारी भयावहता, संकट और लड़ाई के बावजू क्या यह मान लिया जाए कि गांभीर्य और जुझारु बुजुर्गियत ओढ़ने के सिवा युवकों के लिए हिन्दी कविता में कुछ बचा ही नहीं ?

 

आश्चर्य यह है कि जब आप हिन्दी के अधिकांश युवा कवियों से मिलेंगे तो आप पाएंगे कि वे बेहद जीवंत, खुश, पुरमज़ाक, हल्लेबाज, जीवन की अच्छी चीजों के पारखी, सौंदर्य में  गहरी रुचि रखने वाले,शरारती और नितांत 'अस्वप्निल', 'अगंभीर' है। किंतु कवि-कर्म की कुछ ऐसी दहशत उनमें से अधिकांश पर है कि उनकी कविताएं अधिकतर बेहद रस्मी और नकली और सेल्फ-कॉन्शस हो जाती हैं और जब वे 'निजी' होते हैं तो उनमें एक खासा लिरिकल तत्समी घटाटोप होता है ताकि कोई शक न रह जाए कि हमारा विद्रोही कवि प्रेमी होना भी जानता है। आक्रोश से आलिंगन के बीच के सारे पायदान गायव हैं।

 

इसीलिए अवधेश कुमार की इन कविताओं को जब मैंने पढ़ा तो मुझे एक खुशी हुई कि उनके लिरिकल लगावों में परिश्रम या सायासता बिलकुल नहीं है। पाठक देखेंगे कि उनके इस संकलन का शीर्षक और उस शीर्षक खंड की कविताएं उनके अलग तरह के कवि होने की सूचना देती हैं। 'जिप्सी' शब्द पर कुछ लोगों को एतराज हो सकता है लेकिन 'ईरानी', 'चाकू-छुरी वाली' या 'घुमन्तू' आदि पर्यायों से काम न चलता। 'जिप्सी' शब्द के अंग्रेजी में अनेक प्रतीकार्थ भी होते है- वह उन्मुक्तता, स्वच्छंदता, बेफ़िक्री, रूढ़िमुक्तता का भी पर्याय है। अवधेश कुमार देहरादून में जन्मे और प्रकृति के बहुत नजदीक रहे। इसलिए इसमें कुछ अजब नहीं है कि उनकी कुछ कविताओं में एक ऐसी जीवंतता, स्पंदन, खुलापन, ऐन्द्रिकता है- यहां तक कि कभी-कभी भावुकता भी- जो उनके समवयस्क अनेक कवियों में कम ही है। इधर की प्रेम कविताओं में आप पाएंगे कि कवि सबकुछ के बावजूद भी संयत है- उसने स्वयं को बह जाने नहीं दिया है, जब कि अवधेश कुमार की कविता में कवि कुछ दूर तक तो दिखता है किन्तु जब गति और लय तेज होते हैं तो वह खो जाता है- जिस तरह तेज नाचते हुए लोक-नर्तक एक हो जाते हैं या मेलों में झूलने वाले लोग रंगों और आह्लादित चीत्कारों की एक फिरकनी ही नजर आते हैं और उनमें अपने प्रियजनों को ढूंढना मुश्किल होता है। अपने युवा होने की इस अंतरंग दुनिया को अवधेश कुमार ने कभी बहुत कोमलता से छुआ है जैसे 'मुक्ति एक आद्योपांत' में या 'फड़फड़ाते हुए डूबना' में और कभी बहुत ऐन्द्रिकता से जैसे 'चीते का प्यार' में। 'वर्षा में एक प्रलाप' में और उससे कहीं ज्यादा 'दर्द इतना हल्का और चुपचाप में वे खतरनाक ढंग से भावुकता के नजदीक आ जाते है लेकिन आवेग की तीव्रता शब्दों और शिल्प के जागरूक चुनाव के साथ मिलकर कविता को कविता बनाए रहने में सहायक सिद्ध होती है।

पाठकों का ध्यान विशेष रूप से मैं अवधेश कुमार की कविता 'जिप्सी लड़की : दो' की ओर खींचना चाहूंगा। अव्वल तो किसी उत्सव का, किसी मेले का ऐसा स्पंदित चित्र हिन्दी में कभी देखा हो ऐसा याद नहीं आता। लेकिन यह सिर्फ एक नयनाभिराम चित्र नहीं है, इसमें अभावग्रस्त पूरा गांव भी खड़ा हुआ है। अत्याचार और दमन पहाड़ की ऊंचाइयों तक भी पहुंच गया है, नशे में धुत्त हवलदार के रूप में। पर्यटकों के लिबास में शहरी संस्कृति भी वहां पहुंच गयी है। वहां खलील जिब्रान भी है- जिब्रान का वहां होना जिस कॉमेडी-गांभीर्य ट्रेजडी का प्रतीक है यदि उस पर ही लिखने लगें तो बहुत हो जाएगा। बहरहाल, 'सांप', ‘डफली’ ,'खून' आदि के प्रयोग से कविता में खासी ऐन्द्रिकता और हिंसा का प्रवेश होता है किंतु अंत में खलील जिब्रान के साथ बर्फ़ में दबी जिप्सी लड़की आपको एक विरेचन-भाव में छोड़ती है। इस एक कविता में इतने अलग-अलग और लगभग विरोधी-से तत्व काम कर रहे हैं कि इसे लिखने जाना अवधेश कुमार की संभावनाओं के प्रति आश्वस्त और उत्सुक करता है।

 

अवधेश कुमार यदि जीवन के शुद्ध 'सेलेब्रेशन' के ही कवि होते तो अपर्याप्त नथा क्योंकि अपनी ऐसी कविताओं में यह अपनी पूरी शक्ति में मौजूद हैं और वह सर्जनात्मक ऊर्जा किसी भी तरह की कविता को सार्थक बना ही देती है किन्तु उन्होंने लिखा है: ‘ मेरी कविता एक साथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक संपूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा जगाव व आस्था ही है. जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।’ और चूंकि जीवन एक वैविध्यपूर्ण, संघर्षमय, पेचीदा और परिवर्तनशील विराट है इसलिए स्पष्ट है कि अवधेश कुमार की कविता जहां एक ओर शरीर, अभिलाषा, जय और पराजय के स्तर पर युवा होने की कविता है वहाँ वह एक छोटे रमणीय स्थान और घर को सुरक्षा-वह जैसी भी रही हो- से निकलकर एक दमनकारी, डरावनी, मानव-विरोधी दुनिया के सामने स्वयं को पाने की कविता भी है।

 

उनकी कविता का यह स्वरूप हमें उनकी ‘चिरे हुए आदमी की गंध'  चिंता को जमुहाई', 'रीढ़', 'जीवन की शुरुआत, 'भूख की सीमा से बाहर', 'छत पर धरी लालटेन', 'मां की याद', 'बाप रे इस इतने बड़े देश में’ आदि रचनाओं में मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं कि अवधेश कुमार की कविताओं में सीधा संघर्ष, आह्वान, बलवा, क्रांति आदि नहीं हैं। उनके यहां प्रतिबद्धता की आत्ममुग्ध शैली नहीं है। किन्तु 'साइकिल की घंटियों का यही मतलब होता था कि/ उन पर बैठा हुआ हर बाबू जिन्दगी भर अपने बीवी-बच्चों को/ अपने दिनभर के तहखानों के भय से /बचाए रखने का संकल्प लेते हुए लौटता था हर शाम ’(क्लर्क), 'चौतरफा खुली एक आँख / चीजों में खोजबीन करती हुई बारीक / दिमाग़ को जगाए रखने के लिए लगाती हुई हांक / बेहद जागी हुई चुनौतियों में होती शरीक' (चिता की जमुहाई); 'हमने आग जलायी थी सोयी हुई चीजों को जगाया था/और धीरे-धीरे महसूस किया था अपने जीवन की शुरुआत को' (जीवन की शुरुआत); 'वह मणिहीन सांप गर्वित है खुद पर अधिनायक की तरह / कि चिड़िया को मारता भी नहीं और उसे भयमुक्त भी नहीं करता' (छत पर घरी लालटेन); 'मिलो दोस्त, जल्दी मिलो/ मैं ग्ररीब, तुम गरीब / पर हमारे इरादे गरम' (मिलो दोस्त, जल्दी मिलो); 'संबिधान की दुनिया में बचाये रखना है अपने आप को / और एक श्रेष्ठ नागरिक कहलाते रहना है; जब तक / पूरे नहीं होते अद्भुत स्वप्न मुझ गरीब आदमी के' (बाप रे इस इतने बड़े देश में) आदि कविताओं में यह बिलकुल साफ़ है कि अवधेश कुमार कहां से आते हैं और उनकी सहानुभूतियां किस तरफ हैं। और ऐसा नहीं है कि इनमें एक श्रेष्ठतर व्यक्ति की उदारता भरी सहानुभूति है बल्कि आज के जमाने में जो भी कमजोर लोगों पर हो रहा है वह इनके लिखने वाले पर भी या तो हो रहा है या कभी भी हो सकता है।

 

यदि मुझसे पूछा जाए कि आज की कविता में क्या देखा जाना चाहिए तो मैं कहूंगा कि आदमी के अस्तित्व और उसके सामने खड़े सारे संकटों को लेकर चिंता और प्रतिबद्धता, मानव होने के रोमांचक मामले में गहरी दिलचस्पी, जीवन और रिश्तों के अनंत वैविध्य के प्रति उत्सुकता और इस सब को अपनी भाषा और शैली में कह पाने की क्षमता। अवधेश कुमार की ये कविताएं इन सारी शर्तों को पूरा-पूरा निभाती हों यह न तो जरूरी है और न संभव- किन्तु इसमें संदेह नहीं कि इन कविताओं में इन शर्तों का पूरा-पूरा अहसास है। यह नहीं भूलना है कि अवधेश कुमार एक युवा कवि है और उनके सामने देने के लिए एक पूरा काव्य-जीवन पड़ा हुआ है। उनकी प्रारंभिक कविताएं एक ऐसे संकलन में प्रकाशित हुई जिसके संपादक की चयन-शक्ति में हिन्दी साहित्य का भरोसा बहुत पहले उठ चुका था इसलिए उसका कोई नामलेवा न रहा। यह अवधेश कुमार की जीवंतता का ही प्रमाण है कि वह उस प्रारंभिक सदमे को न केवल पचा गए बल्कि उससे मुक्त होकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनमें अपनी मौलिक प्रतिभा है जो इस तरह की घातक दुर्घटना से भी बचकर उभर सकती है। अवधेश कुमार में इस जीवंतता के कई स्तर हैं। उनकी कविताओं को अपना घर, परिवार, मां, कस्बा, जंगल, शहर, दोस्त सब याद ही नहीं है, उनकी ओर वह बार-बार लौटते हैं और कुछ समृद्ध ही होते हैं। दोस्तों पर लिखी गयी उनकी दो कविताएं इस संग्रह में हैं- एक तो ऐसा मित्र है जो कई मंजिला इमारत में बैठा हुआ है और उनसे फोन कर लेने को कहता है। और दूसरा ऐसा है जो कवि की तरह ही है जिससे कवि तुरन्त मिलना चाहता है। कहने को ये बहुत सामान्य विषय लग सकते हैं लेकिन जो दोस्त और दोस्त में इतना प्रकं कर सकता है वह एक की प्रासदी और कामदी के रूप में मृत्यु भी जान सकता है और दूसरे की इंसानदोस्ती और दोस्तपरस्ती के जीवन को भी। चीजों और व्यक्तियों का यह अहसास अवधेश कुमार को कई कविताओं में मिलेगा- उनकी कविता की दुनिया एक धड़कती, बदलती, विकसती दुनिया है।

आज हिन्दी में जो भी युवा कवि और युवा कविताएं हैं उनमें से वही बचेंगे जिनके पास ऐसी दुनिया, ऐसे लोग और ऐसे अहसास हैं।जाहिर है कि वे युवा कवि अवधेश कुमार के उन्हीं दोस्तों में से होंगे जिनसे वह मिलना चाहते हैं- जिनमें वह मिल चुके हैं।

 

Tuesday, June 16, 2026

अवधेश कुमार की कहानी: पानी में तैरता शलगम

 

 

 
 
(अवधेश कुमार पर केन्द्रित इस सीरीज में आज उनकी कहानी ‘पानी में तैरता शलगम ’ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं ) 

इस कहानी के मूल में दुनिया भर में चल रहे कला-विषयक भावोत्तेजक प्रयोग हैं। औद्योगिकीकरण के प्रभाव से सामाजिक व्यवहार में बड़े बदलाव आए हैं। नए किस्म के दृश्य और ध्वनियों से सामना हुआ। वैश्विक राजनीति ने व्यक्ति को असहज और अस्थिर कर दिया। अच्छे जीवन के स्वप्न की तुलना में आत्मिक सुख कम होता गया। बाज़ार को लुभावने विज्ञापनों की ज़रूरत पड़ी।

इस कहानी में Henri Matisse एक पात्र है, जो सफ़ेद काग़ज़ की कतरनों के साथ सफ़ेद हाथी का दुःस्वप्न चित्रित करेगा। कोलाज विधा ने पेंटिंग की विधा को समूचा बदल दिया। कैनवस की सपाट सतह पर अब कतरनें आदि वास्तविक वस्तुएँ चिपकाई जा सकती थीं। कुछ समय पहले से चली आ रही परंपरा को अब कला-सिद्धांत के तर्क हासिल हो चुके थे। एक अन्य पात्र Pablo Picasso (1881-1973) ने स्वीकारते हुए कहा कि सिर्फ़ रंग लगाना ही नहीं, बल्कि वास्तविक चीज़ों को कैनवस पर चिपकाना भी कला है।इसे papier collé नाम दिया गया। अवधेश स्वयं एक बेहतरीन कोलाज कलाकार थे।

इस कथानक के अनुसार Jim Dine “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार”  शीर्षक चित्र में सेब की जगह शलजम चिपका कर  उसके नीचे बड़ी शान से हस्ताक्षर दे मारता है। सेब को अपूर्व ख्याति दिलाने वाले चित्रकारों में Paul Cézanne (France, 1839-1906) प्रमुख हैं। उन्होंने सेब का प्रयोग रंग, रोशनी और स्पेस की अवस्थिति को जानने के लिए किया। इसी तरह बेल्जियम के कलाकारों ने शलजम का खूब प्रयोग किया है। Vincent van Gogh  (Dutch, 1853-1890) की पेंटिंग Still Life of Turnips को याद करते हैं।वे भी कथा-पात्र हैं।

अवधेश दिल्ली की प्रदर्शनियाँ देखते थे और कला-विषयक पुस्तकें पढ़ते थे। उनका काम रेखाचित्र और कोलाज पर आधारित रहा। उन्होंने किसी कला संस्थान से विधिवत शिक्षा नहीं ली।यह कहानी उन्होंने एक पेंटिंग की तरह रची है। यह अपने आप  में जिम डाइन की चर्चित पेंटिंग “एन वाल्डमैन के लिए चित्रित संसार” की विवेचना है। साहित्य के पाठकों को यह बताना इसका उद्देश्य है कि चित्रकला, कला-संवेदन के आधार पर प्रकृति और मनुष्य के अंतर्संबंधों का विवेकसंगत उद्घाटन करती है। इसकी

संभावनाएँ असीमित हैं। अपनी ज्ञानात्मक संवेदना, कला-संवेदना, भावप्रवणता और अन्वेषणात्मक ऊर्जा को घनीभूत करते हुए नई राहें खोजी जा सकती हैं। एक चित्रकार किसी लिखित पाठ के अंतस में प्रवेश कर सकता है। कवयित्री Anne Waldman के रचनात्मक व्यक्तित्व को रूपाकारों में व्यक्त कर देना एक बड़ी बौद्धिक घटना है। अवधेश इस कहानी में यही कह रहे हैं। आधुनिक कला-आविष्कारों से अनुप्रेरित अवधेश रोशनी और स्पेस को दृश्य रूप में जान पाते हैं।इन पंक्तियों पर ध्यान देना रोचक होगा—

“जिम डाइन, एन को ढूँढ़ने एक बार अतीत में गया, दूसरी बार भविष्य में और तीसरी बार वर्तमान में। किन्तु एन फिर कभी उसकी पकड़ में नहीं आई। वह फिसल जाती थी—कभी अतीत में, कभी भविष्य में।”

यानि कला-अनुभव कौंध की तरह अनुभूत होते हैं। उन्हें कठिन साधना और धैर्य से पाया जाता है। आकस्मिकता का पल तभी संभवहोता है।

अवधेश की यह व्याख्या (interpretation) आगे जाकर तभी पूर्ण  होती है, जब वे स्वयं अतियथार्थवादी शैली में अपनी रचना तक  पहुँचने में क़ामयाब होते हैं। Salvador Dalí भी कथानक का पात्र है।

अंत तक पहुँचते हुए पेंटिंग-सदृश यह गद्य एक पेंटिंग की तरह  दृश्यमान होता है—


 ''कहते हैं कि जिम डाइन, टेस्ट ट्यूब की शक्ल के एक पॉलीथीन बैग में पानी भरता है और एन को उसके ऊपर स्टीकर की तरह चिपका देता है।

फिर—

कला की अभिव्यक्ति में परिवर्तन और विकास के ख़ातिर, संशोधित रूप में, उस लुंजपुंज पहलवान की जाँघ के बीच उसे लटका आता है।”


यहाँ पुरुष-लिंग का संदर्भ भी संभवतः किसी महान चित्रकार की पेंटिंग से जुड़ा है। कला की स्वायत्तता का कोई अर्थ नहीं है। महान कला प्रकृति का अन्वेषण करती है। उसकी विराटता का स्पर्श करती

है। केंद्र में मनुष्य की उपस्थिति हर सूरत में अनिवार्य है। महान कला या साहित्य अपने लोक से गहराई से जुड़कर आत्म के विस्तार पर संभव होता है। कलाकार दुनिया के लिए यह ज़िम्मेदारी लेता है।

सच्चाई यह है कि वही प्राकृतिक सौंदर्य को सच्चाई के साथ अनुभव करता है। हिमालय के सौंदर्य की अनुभूति चरवाहों और घसियारियों से ज़्यादा गहन कोई नहीं कर सकता। बस, वे इस अनुभूति के बदले में कोई खास पहचान पाने को उत्सुक नहीं होते।

उच्च हिमालय की एक अधेड़ किसान महिला को अपने एकांत में गाते सुना। किसी श्रोता के लिए नहीं, बल्कि निर्जन जंगल में अपनी उदासी और पीड़ा को व्यक्त करने के लिए। किसी अदृश्य शक्ति को संबोधित करते हुए उसका आलाप किसी भी दक्ष गायक से ज़्यादा मार्मिक और परिपक्व लगा। सामने बर्फ़ से आच्छादित चोटियाँ, विशालकाय चट्टानें और घने जंगल दृश्य में उभरने लगे।

आत्म के विस्तार से कला सामान्य जनों की अनुभूति तक पहुँचसकती है।

अवधेश की यह कहानी ऐसी संभावनाओं की रचना है।

-राजेश सकलानी 

(इस आलेख के साथ यहां प्रदर्शित दो चित्र चित्रकार जिम डाइन के कला शिल्प और अवधेश कुमार की कहानी के आधार पर AI द्वारा तैयार किए गए  हैं।) 

 

 



Thursday, June 11, 2026

अवधेश कुमार स्मरण

 

 

 


 

 (अवधेश कुमार पर केन्द्रित  विशेष शृँखला के क्रम में    कथाकार अरुण कुमार ‘असफल’ अवधेश को याद करते हुए उस वक्त के देहरादून को भी जी  रहे हैं )

 

                                     मैं अब भी उनके निशान ढूढ़ता हूँ                      

                                         अरुण कुमार  ‘असफल’ 

 

अपने शहर देहरादून में कला और संस्कृति से जुड़ी युवा पीढ़ी को शायद ही यह बात मालूम हो कि उनके शहर में कभी ऐसी बहुमुखी  प्रतिभा रहा करती थी, जिसकी कविताएं सन 1979 में अज्ञेय द्वारा संपादित ’ चौथा सप्तक’ में संकलित हो चुकी थी, जिसकी कहानियां सारिका, हँस जैसी प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रमुखता से प्रकाशित होतीं थीं, जिसके बनाए चित्रों से उस दौर के प्रायः सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकाओं के बाहरी और भीतरी भाग सुसज्जित हुआ करते थे और जिसके लिखे नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ को लोगों ने मुक्त कंठ से सराहा था। कहानी, कविता, नाटक और कला के बाद बचता ही क्या था, गीत और संगीत ही न! इस विधा में यह प्रतिभा कितनी समृद्ध थी, यह तो नहीं मालूम, लेकिन मैं ने इस प्रतिभा को गीत संगीत की बारीकियां बखान करते सुना था। इतना कुछ बता देने के पश्चात भी मुझे शंका है कि कुछ लोगों की ज़ेहन में उस प्रतिभा का नाम कौंधा होगा। लीजिए मैं ही बता देता हूँ कि उस प्रतिभा का नाम था, अवधेश कुमार, जो कि मात्र सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में कला से विमुख होते जाते इस समाज को अलविदा कह गया। मुझे इस बात का आज तक मलाल है कि उस जीनियस के साथ मुझे बहुत कम समय तक रहने का अवसर मिल पाया था। तारीख़ तो मुझे याद नही, पर वर्ष 1995 और मौसम बरसात का था जब देहरादून के हिन्दी भवन में कथाकार जितेन ठाकुर के कथा संकलन ‘अजनबी शहर में’ का लोकार्पण हुआ था और मुझे देहरादून में और इसके आसपास रहकर सृजनरत कई रचनाकरों से एक साथ मिलने का पहला अवसर मिला था। इनमें ’ टिहरी की कहानियां’ के लेखक विद्यासागर नौटियाल, ‘चढाई’ के कहानीकार नवीन कुमार नैथानी, ‘जबड़े’ और ‘वैक्यूम’ जैसी सशक्त कहानियों के रचनाकार विजय प्रताप आदि से मिलने का सौभाग्य मिला था। अवधेश जी से पहली मुलाकात  भी उसी गोष्ठी में हुई थी। छोटा कद, मासूम चेहरा और उस पर बाल सुलभ मुस्कान। ये सारी खूबियां उनकी उम्र को कम कर देती थी। उनका जन्म 7 जून 1951 को हुआ था। उस हिसाब से उस वक्त उनकी वास्तविक उम्र 44 वर्ष थी लेकिन वे तीस बत्तीस के ऊपर शायद ही लगते थे। उनकी इस कुदरती गुण की वजह से मुझ जैसे अपेक्षाकृत कम उम्र के लोगों को उनसे दोस्ती गांठने की पहल करने में संकोच नहीं होता था। उस दिन मैंने उन्हें पहली बार देखा था, संपर्क भले ही न कर सका था लेकिन आगे इस बात की पहल करने की इच्छा तो जाग्रत हो गई थी। जब जनवरी 1996 में संवेदना संस्था की वार्षिक गोष्ठी हुई तो यह इच्छा पूर्ण होने का अवसर आ ही गया । वह गोष्ठी दून स्कूल के कैम्पस में संपन्न हुई थी। इस गोष्ठी में अवधेश जी द्वारा तैयार किए गए कुछ कविता पोस्टर तथा कोलॉज भी प्रदर्शित थे। मैं उन चित्रों को देखते हुए उनमें निहितार्थ समझने की कोशिश करने लगा। एक तो उनका निश्चल व्यक्तित्व, दूसरा संवेदना का अनौपचारिक माहौल, मुझे उनके नजदीक जाने में कोई संकोच न हुआ। पास जाकर मैंने उनसे चित्रकारी के गुर सिखाने का अनुरोध किया था। मुझे याद है कि उन्होने मेरे अनुरोध के पश्चात मुस्कराया भर नहीं था, अपितु वे ठठाकार हँस दिए थे। यह उनके इंकार करने का तरीका था जो किसी का दिल नहीं दुखाता था। उन्होने उसके बाद मुझे बताया कि उन्होने स्वयं इस कला का कहीं से प्रशिक्षण नही लिया था। यह सत्य था कि अवधेश जी अपनी लगन और कला के प्रति लगाव के चलते ही इसमें इतनी दक्षता प्राप्त कर ली थी कि उनके बनाए चित्र और कोलॉज लोगों का ध्यान खींचने में सफल होते थे। कोलॉज तो उस वक्त भारत में अपने आंरभिक दौर में था और अभी इतना प्रचलित नहीं हुआ था। इसकी नींव ही बीसवीं शताब्दी की शुरूआत में पेरिस में दो महान चित्रकारों पाब्लो पिकासो और जार्ज ब्रेक द्वारा हुई थी और भारत के कला महाविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इसे शामिल हुए काफी समय नहीं हुआ था। ऐसे वक्त में अवधेश जी इस कला में स्व प्रशिक्षण द्वारा पारंगत हो गए थे और शायद यही अपेक्षा औरों से करतें थे। वास्तव में दृश्य और सौन्दर्य के विभिन्न टुकड़ो को मिलाकर बनाए हुए उनके कोलॉज काफी आकर्षक और अर्थपूर्ण होतें थें। यही कारण था कि उस दौर की कई प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं के मुख्यपृष्ठ उनके कोलॉज द्वारा सुसज्जित होते थे। जिंदगी की दुश्वारियों, असमानताओं और शोषण को व्यक्त करने के लिए उन्हें  कोलॉज ही सबसे मुफीद माध्यम लगता था और उनकी रचनाओं विशेषकर कविताओं में भी उसके निशान दिख जातें हैं। उदाहरणर्थ उनकी  ‘ फूल, काँच, मुर्गा वगैरह’ शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियां हैं - 

  

       

चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक


रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।


इन चार पंक्तियों में पूरी कविता का भाव तो है ही साथ ही इस में यह भी संकेत है कि प्रकृति के विभिन्न अवयव मिल कर  एक नया जीवन्त और अर्थपूर्ण दृश्य की रचना करतें हैं, और कोलॉज कला का यही मूल तत्व होता है। कोलॉज में माहिर इस कलाकर ने संवेदना की उस गोष्ठी में मेरे आग्रह को इसलिए भी ठुकरा दिया था क्योंकि उनकी जिन्दगी में गुरू शिष्य जैसे गैर बराबरी के रिश्ते का कोई महत्व नहीं था। वास्तव में मैंने उन्हे कई लोगों को मजाक के तौर पर ‘गुरू जी’ कह कर संबोधित करते सुना था। उनके लिए दोस्ती से बड़ा कोई रिश्ता नहीं था और इसी रिश्ते की डोरी से मुझे बाँध लिया था। एक तरह से, संवेदना की उस गोष्ठी में उन्होने शिष्य के लिए ‘न’ कहा था पर दोस्ती के लिए हाँ कहा था । भले ही अंतरंगता के स्तर पर न हो, पर यह भी मेरे लिए कम गौरव की बात नहीं थी कि ‘ चौथा सप्तक ’ का कवि और दून घाटी का सांस्कृतिक नायक मेरा मित्र बन गया था। वे अक्सर शाम को, दफ्तर छूटने के समय दफ्तर के बाहर आ जाते थे और मेरे साथ स्कूटर पर मेरे घर आ जाते थे। तब मैं सहस्त्रधारा क्रासिंग के पास किराए पर एक कमरा लेकर रहा करता था। शादी हुई नही थी, सो साहित्यिक गपशप के लिए वह जगह बहुत मुफीद थी। थोड़ी ही देर में वहाँ कोई तीसरा जैसे नवीन नैथानी, हरजीत या राजेंश सकलानी या एक एक करके सभी आ जाते थे। योगेन्द्र आहूजा की उस समय ‘ गलत ’ कहानी पहल पत्रिका में छप कर चर्चित हुई थी। उनकी उपस्थिति भी कभी कभी उस कमरे में हो जाती थी। जब कमरे में केवल अवधेश जी ही रहते थे तो वे मेरी तुरन्त लिखी हुई कहानी जरूर पढ़ने को मांगते थे। इस तरह से मेरी कहानियों के पहले पाठक अवधेश जी थे। वे हर रचना पर  ईमानदारीपूर्वक प्रतिक्रिया देते थे और यदि उस विषय पर किसी अन्य की रचना उनके ज़ेहन में होती तो ज़रूर उसे पढ़ने की सलाह देते। जब तीन या उससे ज्यादा लोग होते थे तो मेरे लिए मानों उत्सव का अवसर होता था। तब साहित्य और कला की विविध विषयों पर खूब चर्चाएं हुआ करतीं थीं। एक रचनाकार के लिए इन बहस मुबाहिसों का बहुत महत्व होता हैं। इनसे साहित्य को जांचने परखने की दृष्टि विकसित होती है। साहित्यिक गपशप करते हुए, मिलजुल कर सभी खाना बनाते थे। कोई सब्ज़ियां काटता था, कोई आटा गूँथता था तो कोई रोटी बनाने की ज़िम्मेदारी लेता था। गोश्त मछली भी खूब बनता था। सभी के घरों की रसोईयां निरामिषी थीं, अतः मेरा घर कई अतृप्त आत्माओं को तुष्टि प्रदान करता था। सचमुच वह मेरी रचनात्मक यात्रा का अविस्मरणीय पड़ाव था। भोजन बनानेे से लेकर भोजन करने तक बतकही होती रहती।  अक्सर, देर रात होते होते, सकलानी, आहूजा और हरजीत चले जाते थे। लेकिन अवधेश एवं नैथानी जी टिके रहते थे। बारह बाई बारह के उस कमरे में चार बाई छः का दीवान सदैव बिछा रहता था जिस पर मैं सोता था। लेकिन जब नैथानी और अवधेश जी को रुकना होता था तो यह दीवान उनके लिए ’ रिज़र्व’ हो जाता था और मैं उनके बगल में फोल्डिंग चारपाई डाल कर पसर जाता था। खा पीकर लेटने के पश्चात विमर्श का दूसरा चरण आरम्भ होता था। इसमें सर्वाधिक भूमिका अवधेश जी की ही होती थी। उनके पास बताने को बहुत कुछ होता था जिसे हम दोनों सुनने को व्याकुल रहते थे। हमारे लिए सुकून की बात यह थी कि घर का मकान मालिक उस मकान में नही रहता था और उसने घर के मुख्य भाग को भी किराए पर चढ़ा दिया था जिसमें एक ईसाई परिवार रहता था जो मेरी फ़िक्र तो करता था पर मेरे मामले में दखल नही देता था। एक और बात थी, अवधेश जी, बड़बोले प्रवृत्ति के न थे। वे बहुत मद्धिम स्वर में बड़ी बड़ी बातें करते थे। कहीं गोष्ठी वगैरह में शान्तिपूर्वक बैठे रहते और बोलने की बारी आने पर थोड़ा बोल कर ज्यादा बोलने वालों पर भारी पड़ जाते थे। मुझे संवेदना की एक और गोष्ठी भी याद है जो सन 1997 में पीडब्ल्यू गेस्ट हाउस में हुई थी। यह एक विशेष गोष्ठी थी जिसमें चर्चा का विषय था ‘ वर्चस्व की राजनीति’ और मुख्य अतिथि थे वरिष्ठ साहित्यकार - विष्णु चंद्र शर्मा। उस गोष्ठी में अधिकांश ने  अपनी बात रखी थी, लेकिन अवधेश जी शान्तिपूर्वक बैठे रहे थे। तब विष्णु चन्द्र शर्मा का ध्यान उन पर गया और उन्होने उनसे भी कुछ बोलने का अनुरोध किया। तब अवधेश जी ने विषयानुकूल एक कविता सुनाकर सबको लाजवाब कर दिया था। अवधेश जी की तुलना किसी साहित्यकार से की जा सकती है तो वे थे, भुवनेश्वर। भुवनेश्वर भी बहुमुखी प्रतिभा संपन्न व्यक्ति थे और उनकी मृत्यु भी दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में कम उम्र में ही हो गई थी। भुवनेश्वर की जो एक मात्र तस्वीर साहित्य की दुनिया में उपलब्ध है, उसे अगर सरसरी तौर पर देखें तो अवधेश जी के होने का भ्रम हो जाता है। भुवनेश्वर के बारे में भी कहा जाता था कि साहित्यिक आयोजनों में वे चुपचाप बैठे रहतें थे फिर कुछ ऐसा सारगर्भित व्यक्त करते थे कि लोग अवाक रह जाते थे। परन्तु अंतरंग मित्रों में काफी वाचाल हो जाते थे, मानो जो कुछ भीतर दबा था उसे अपने घनिष्ठों के बीच ही उद्घाटित करना चाहतें हों। अवधेश जी के साथ भी ऐसी ही स्थिति थी। जहाँ तक उनके घनिष्ठ मित्रों की बात थी, तो यह उनकी बातचीत से ही ज़ाहिर होता था कि देहरादून में एक समय चर्चित रहे कवि देशबन्धु उनके घनिष्ठतम मित्र थे। लेकिन उनकी मृत्यु अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों में युवावस्था में ही अस्सी के दशक में हो गई थी। उसके बाद गजलकार हरजीत उनके सबसे करीबी दोस्त बन गए थे। देहरादून में एक समय यह जोड़ी काफी प्रसिद्ध हो गई थी। मयख़ाना से लेकर छापाख़ाना तक दोनो साथ ही साथ दिखते। फिर नब्बे का दशक बीतते बीतते इस जोड़ी में नवीन नैथानी ने प्रवेश करके तिकड़ी का रूप दे दिया। जब भी यह तिकड़ी मेरे घर होती, मेरा दिल बल्लियों उछला हुआ होता। वास्तव में इस तिकड़ी के गपशप में मुझे अपनी बात रखने का अवसर कम मिलता था। सच बात तो यह थी कि मुझे इस बात की इच्छा ही नही होती थी। मैं तो जिज्ञासु भाव से उनकी, विशेषकर अवधेश जी के बातों का आनन्द लेता था। क्योंकि यही दुर्लभ अवसर होता था जब कोई उन्हे दिल खोल कर बोलते हुए सुन सकता था। मानों एनसाइक्लोपीडिया उनकी वाणी में घुल कर बहती थी। साहित्य सिनेमा, संगीत, चित्रकला आदि कोई ऐसा विषय नहीं था जिनमे उनकी पकड़ न हो। सबसे बड़ी बात यह थी कि यह सब उनके स्वाध्याय का प्रतिफलन था। इसलिए उनका अन्दाजे बयां, अलग और रोचक हुआ करता था। एक बार यह तिकड़ी मेरे घर पर जमी हुई थी। भोजनोपरांत हरजीत चले गए और उसके बाद अवधेश जी और नवीन नैथानी दीवान पर पसर गए। मैं भी बगल में चारपाई डालकर लेट गया था। मुझे याद नही कि कौन सा प्रसंग आया था कि अवधेश जी साहित्य और कला से विषयांतर करके मुद्रण तकनीक की बारीकियां बखान करने में लग गए थे। अवधेश जी रात भर बताते रहे कि किस प्रकार से एक एक अक्षर जोड़ कर शब्द बनाए जाते थे, उसके बाद पंक्तियां बनतीं थी, किस प्रकार से रंगों का संयोजन होता था आदि आदि। मुद्रण और प्रकाशन से संबंधित जितनी बारीकियां थीं उनका इतना यथार्थपरक वर्णन, मानों कोई डाक्यूमेंटरी फिल्म चल रही हो। दरअसल, अवधेश जी पूर्णकालिक सांस्कृतिककर्मी थे। साहित्य और कला उनके शौक भी थे और रोजी रोटी का साधन भी। अब तो देहरादून में मुद्रण-प्रकाशन की बहुत सारी संस्थाएं हैं, लेकिन आज से पच्चीस तीस साल पहले देहरादून इस लिहाज से विपन्न था। तब हिंदी क्षेत्र में मुद्रण और प्रकाशन के लिए तीन शहर सर्वाधिक प्रसिद्ध थे- दिल्ली, मेरठ और इलाहाबाद। मेरठ में ज्यादातर पाठ्य पुस्तकों का काम होता था। वहाँ अवधेश जी जैसे कल्पनाशील कलाकार के लिए कोई जगह नही थी। अन्ततः उन्हे काम के लिए दिल्ली जाना पड़ता था। वे संपादकों और प्रकाशकों से काम इकठ्ठा करके देहरादून आ जाते थे और घर पर इत्मीनान से डिज़ाइन बनाया करते थे। क्योंकि दिल्ली में लंबे समय तक रुकने का मतलब था होटल या मकान किराए का अतिरिक्त व्यय। लेकिन कभी कभी काम के सिलसिले में उन्हे दिल्ली रुकना आवश्यक हो जाता था तो वे उन्ही मुद्रण या प्रकाशन संस्थानों में रुक जाते थे। उन्होने मुद्रण सबंधी बारीकियां अपने इन्हीं पड़ावों के दौरान जानी थी। यह उनका जीवन के हर क्षण और आयाम में इनवाल्वमेंट का प्रमाण था। उनकी यह इनवाल्वमेंट या रम जाने की प्रवृत्ति हर रचनात्मक कर्म में दिखती थी। जिसका एक उदाहरण उनका लिख नाटक ‘ सूखी धरती, प्यासा मन’ है। उन्होने यह नाटक सन 1987 में लिखा था। यह नाटक उनकी कल्पना की उपज मात्र न था। इसके लिए उन्होने अच्छा खासा होमवर्क किया था। काफी समय तो उन्होनेे अपने रंगकर्मी दोस्तों के साथ ‘सूखा’ पर विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रिपोर्टों और आंकडों का संकलन किया था। उसके बाद सूखा प्रभावित क्षेत्रों में जाकर स्थिति की भयावहता को करीब से देखा था। तब जाकर इतना उम्दा नाटक लिखा कि देश की प्रतिष्ठित समाचार पत्रों में इस पर प्रंशसात्मक टिप्पणियां प्रकाशित हुईं थीं। अपने काम में रमना उनका स्वाभाव हो सकता था लेकिन यह बात उनके आर्थिक हितों के विरुद्ध जाती थी। वे अपने काम का वर्गीकरण पेशेवर ढंग से नही कर पाते थे। जिन कामों में कम पैसे मिलने होते थे उसमें भी वे खूब मन लगाकर काम करते थे। जिससे बहुत से काम समय पर पूरा नही हो पाते थे। एक बार घोसी गली स्थित जब मैं उनके घर गया तो उनके एक पुराने ग्राहक को बैठा पाया था। उससे मैं भी थोड़ा थोड़ा परिचित हो गया था। उसनेे अवधेश जी को एक सेमिनार हेतु पोस्टर बनाने को दिया था। सेमिनार होने में दो एक दिन ही रह गए थे और पोस्टर अभी तैयार नही हुआ था। इसीलिए वह वहीं बैठकर ( दूसरे शब्दों में, सर पर सवार होकर) काम करवा रहा था और अवधेश जी पास में हीं बैठकर, एक जेनुइन कलाकार की तरह, रंग और ब्रुश से तल्लीनता से काम किए जा रहे थे। मानो किसी प्रतिष्ठित कलादीर्घा में लटकाने हेतु कोई मास्टरपीस तैयार कर रहें हों। उनका वह परिचित ग्राहक मेरे कान में फुसफुसाते हुए दुखड़ा रोने लगा था कि अवधेश जी उसके साथ हर बार ऐसा ही करते थे और उसेे हर बार धरना देकर काम कराना पड़ता था। दुख की बात यह थी कि हर ग्राहक उनका दोस्त या परिचित नही होता था। फलतः उन्हे काम मिलना बन्द हो गया। धीरे धीरे एक बोहेमियन प्रवृत्ति उनके अन्दर पनपने लगी थी, अर्थात दीन दुनिया से बेख़बर रहना, काम पर ध्यान न देना, अपनी बात पर पक्के न रहना आदि आदि। हम यार दोस्त उनकी इस प्रवृत्ति से कम, उनके पीने की लत से ज्यादा चिंतित थे। यूँ तो शौकिया तौर पर वे तो पीते ही थे। दिल्ली में जब रहते थे तो साहित्यिक महफ़िलों में बेगिलास तो वे बैठतें न होगें। लेकिन तब यह उनका शौक था, ज़रूरत नहीं। जो उनके पुराने दोस्त थे वे बताते थे कि अवधेश जी  पीने के लिए इस कदर पहले कभी बेचैन नही होते थे। सन 1996 के बाद से उनके अन्दर आश्चर्यजनक बदलाव देखा जा रहा था। उन्हे कोई गम न था न ही कोई हताशा थी, लेकिन उनका उच्छृंृंखल स्वाभाव जरूर था, जो किसी भी चीज को गंभीरता से नही ले रहा था, पीने को भी नही। अपने इसी उच्छृंखल स्वाभाव के कारण वे किसी नौकरी से नहीं बंध पाए थे। अगर कोई नौकरी कर रहे होते तो उनकी एक अनुशाषनबद्ध जिन्दगी होती और पीने पिलाने की ओर ध्यान कम जा पाता। नौकरी  नही थी और काम मिलना भी बन्द हो गया था। उनके पास समय ही समय था। जबकि यार दोस्त काम धन्धें में फंसे रहते थे और अवधेशजी को अक्सर दिन का समय अकेले में व्यतीत करना होता था। उन्हे इस समय को काटने के लिए मद्यपान ही सर्वाधिक उपयुक्त लगा होगा। फिर ऐसी स्थिति आ गई कि सारे यार दोस्तों पर शराब ही सबसे भारी पड़ गई और फिर उनका भी वही हाल हुआ जो भुवनेश्वर का हुआ था। उसके बाद यह शहर एक बहुमुखी प्रतिभा की पतन का गवाह बना। लंबे समय तक अवधेश जी को किसी ने न कुछ रंगते देखा न लिखते। एक लंबे अन्तराल के बाद सन 1998 की सर्दियों में उन्होने एक लंबी कहानी ‘ टाँड़’ आरंभ की थी। उन्होने उसके प्रारिंभक अंश मुझे सुनाए थे और मुझे यह एक अच्छी कहानी की शुरूआत लगी थी। देहरादून के सभी रचनाकारों को खुशी हुई थी कि उनका दोस्त रचनात्मक रूप से फिर से सक्रिय हो रहा था। हालांकि अनियंत्रित रूप से पीने के कारण उनका शरीर काफी कमजोर हो गया था लेकिन इस लंबी रचना को रचते हुए, एक जिजीविषापूर्ण चमक उनके चेहरे पर ज़रूर आ गई थी।  वर्ष 1998 के समाप्त होते होते मैं अल्प समय के लिए देहरादून से बाहर चला गया था। मुझे जरा भी अंदेशा नही था कि जब वापस लौटूंगा तो अवधेश जी को नहीं पाऊंगा। दरअसल अत्याधिक मद्यपान से उनकी आंतों का इतना नुकसान हो गया था कि बिल्कुल छोड़े बिना बचना मुश्किल था। अवधेशजी ने पीना कम तो कर दिया था, लेकिन छोड़ा नही था। अब वे सगे संबंधियों और यार दोस्तों से छुपा कर पीने लगे थे। लेकिन मृत्यु चोरी छुपे नही आई। 19 जनवरी 1999 के दिन में ही देहरादून शहर ने एक प्रतिभाशाली और संभावनाशील कलाकार को खो दिया। सैंतालिस वर्ष की अल्पायु में ही उनका एक कहानी संग्रह ‘ उसकी भूमिका’, एक कविता संग्रह ‘ जिप्सी लड़की’ तथा एक चर्चित नाटक ’ सूखी धरती, प्यासा मन’ प्रकाशित हो चुके थे। उनकी और भी रचनाएं रही होंगी जो संकलित और प्रकाशित होने से रह गईं होगीं। लेकिन वे प्राप्त नही हो सके। मुझे किसी से पता चला था कि अपनी मृत्यु से कुछ दिन पूर्व उन्होन बहुत सारे कागज पत्रों को जला दिया था। शायद उसमें उनकी कहानी ‘ टाँड़ ’ भी रही हो, अपूर्ण ही सही। अवधेश जी को दुनिया छोड़े बीस वर्ष हो गए हैं। आज भी जब मैं घोसी गली के पास से गुजरता हूँ तो उनकी कविता ‘ चीते का प्यार’ की निम्न पंक्तियां ध्यान में आतीं हैं -

 

तुम्हारे भीगे हुए शरीर की उनींदीं पगडंडियों पर

एक किशोर की तरह चलता हुआ मैं छोड़ता हूँ

अपने पंजों की छाप , बादलों से भरी इस चाँदनी रात में ’

 

और मैं अब भी ढूढ़ता हूँ उनके निशान, जो मिटने से रह गए हों।