Tuesday, July 14, 2026

स्मृति : कांतिमोहन

 

 

 


 


(  कान्तिमोहन जी पर कथाकार अरुण कुमार‘असफल’ का  यह आलेख प्रकाशित करते हुए  हम उनके काम और मिशन को याद करते हैं)

 

 पर कथा है शेष

अरुण कुमार ‘असफल’ 



                      मुझे कांतिमोहन जी की जन्मतिथि 14 जुलाई हमेशा याद रहती है क्योंकि चार दिन बाद ही मेरा जन्मदिन पड़ता है। इस कारण से पिछले चार पांच सालो ंसे फेसबुक पर अपने टाइमलाइन पर उनके जन्मदिन के अवसर पर एक पोस्ट लगाना याद रहता था। 14 जुलाई वर्ष 2024 में वह 88 वर्ष के हो गए थे और कुछ दिन पहले मुझे उनके अस्पताल में भर्ती होने की भी सूचना थी। मैंने उस दिन सुबह सुबह फेसबुक पर जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके शीघ्र स्वथ होने की कामना की थी। लेकिन पोस्ट डालने के आधे घंटे बाद ही उनके न रहने की ख़बर मिली। इस तरह से जन्म की तारीख़ में ही उनका देहावसान हुआ।

                     कांतिमोहन मूलतः हलद्वानी के थे। उनकी स्नातक तक की पढ़ाई रामनगर और मुरादाबाद के विभिन्न स्कूलों और कालेजों में हुई थी। आगे की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली आ गए थे। सन 1958 में एम ए की थीसिस के रूप में उन्होने दिनकर की ‘कुरुक्षेत्र’ पर ‘ कुरुक्षेत्र मीमांसा’ लिखी जो कई सालों तक कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल रही। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए करते ही वह नौकरी की तलाश में लग गए थे।  हिंदी और उर्दू साहित्य के वह गंभीर अध्येयता थे। दोनों ही भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसलिए संपादन और लेखन का छुटपुट काम मिलने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई थी। उस दौरान पत्रकारिता और अनुवाद का काम किया था। कुछ समय तक राजपाल एंड संस में बतौर संपादक नौकरी की। बेरांेजगारी के दिनों में वह इंदिरा गांधी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका ’वुमैन आन मार्च’ के हिंदी संस्करण ’ महिला प्रगति के पथ पर’ के कार्यकारी संपादक के रूप में काम किया जबकि मुख्य संपादक इंदिरा गांधी ही थीं। उनके संपादक कौशल को देखते हुए कई पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने वहां नौकरी का प्रस्ताव दिया पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था।

                   दर असल वह दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कालेज में बतौर प्राध्यापक काम करना चाहते थे और उनकी तमाम कोशिशों और योग्यताओं के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय का एक प्रभावशाली व्यक्ति उनकी राह में रोड़ा बन रहा था। उस व्यक्ति ने हिंदी भाषा, साहित्य और आलोचना पर बहुत सारी किताबें लिखीं थीं। परन्तु दिल्ली शिक्षण अकादमी के दायरे में उसके कुकृत्यों की भी खूब चर्चे हुआ करते थे। खीझ कर कांतिमोहन ने उनके उन्हीं कुकृत्यों को आधार बना कर एक लघु उपन्यास लिखा ’ पर कथा है शेष...’, और दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक को छपने को दे दिया। परंतु उस प्रकाशक के माध्यम से उस व्यक्ति तक यह ख़बर पहुंच गयी। उसने तत्काल कांतिमोहन को अपने पास बुलवाया और वह उपन्यास उस प्रकाशक से वापस लेने का अनुरोध किया। कांतिमोहन ने ऐसा करने मना कर दिया। तब दिल्ली विश्वविद्यालय के उस प्रोफेसर ने कांतिमोहन से उक्त पांडुलिपि अपने मरणोपरांत छपवाने का अनुरोध किया। कांतिमोहन मान गए और कुछ दिनों बाद सन 1963 में दिल्ली के सत्यवती कालेज में उनकी नौकरी लग गयी।

                   कांतिमोहन को गीत और गज़ल लिखने का बहुत शौक था। वह ’सोज़’ उपनाम से गज़ल लिखा करते थे। सन 1970 में प्राध्यापक की नौकरी अस्थायी रूप से छोड़ कर फि़ल्मी गीतकार बनने बंबई चले गये थे। जब वहां सफलता नहीं मिली तो वापस पुरानी नौकरी पर आ गए। पर गीत और गज़ल लिखना जीवनपर्यन्त जारी रहा था और और सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी गज़लें डाला करते थे। उनके गीत और गज़ल  ’कदम मिला कर चलो’, ’गुनाहे सुख़न’ और ’रात गए’ किताबों में संकलित हैं। ’ गुनाहे सुख़न’ उर्दू में लिखी गयी है और सन सन 1990 में यह उर्दू अकादमी दिल्ली से पुरस्कृत हुई थी। इसके अतिरिक्त फि़ल्मों के प्रति उनके मोह को प्रमाणित करती हुई ’ आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत’ शीर्षक से एक किताब है।

                        कांतिमोहन  की रुचि खेलों में भी थी। सन 1963 से 1972 तक धर्मयुग पत्रिका में इनके छद्म नाम से ’ श्रीदामा की चिठ़ठी’ स्तंभ नियमित छपता था। जिसमें खेल संबंधी जानकारियां और सूचनाएं रहतीं थीं। इसी दौरान साप्ताहिक हिंदुस्तान में खेल विषयक इनका स्तंभ ’ खिलाड़ी की डायरी’ छपता था। मजे की बात यह थी कि उन दिनों शंकर वीकली-हिंदी में भी ’ खेल देखो खेल की धार देखो’ नाम से इनका स्तंभ छपता था। एक ही समय देश के तीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन! वास्तव में केवल प्रतिभा और जागरुकता के बल पर नहीं, बल्कि सामयिक विषयों पर सदैव जागरुक रहने के कारण ही संभव हो सकता था।

                   कांतिमोहन ने सत्रह वर्षों तक माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ’लोक लहर’ का संपादन किया था। वह इस मुखपत्र के संस्थापक सदस्यों में से थे।  वह जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच के भी संस्थापक सदस्यों में से एक थे। मुरली प्रसाद सिंह, चंचल चैहान और सुधीश पचैरी के साथ मिल कर चार वर्षों तक ’उत्तरगाथा’ पत्रिका निकाली। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानियां ‘ दद्दू तिवारी जनगणनाधिकारी’, ’ हीरालाल का भूत’ तथा ’ रामसजीवन की प्रेमकथा’ सबसे पहले उत्तरगाथा पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी। परन्तु इस पत्रिका का प्रसार सीमित होने के कारण ये कहानियां विशाल पाठक वर्ग का ध्यान खींचने में विफल रहीं थीं। बाद में यही कहानियां हंस में पुनप्र्रकाशित हुई थीं और उदय प्रकाश बड़े कथाकार के रूप में स्थापित हुए।

                 कांतिमोहन वाम विचार की संवाहक पत्रिकाएं जैसे नया पथ, उत्तरार्द्ध आदि के संपादन, प्रकाशन और प्रसार में सहयोग करते थे। वह प्रसिद्ध माक्र्सवादी चिंतकों सव्यसाची, कुंवरपाल सिंह, रेखा अवस्थी, मुरली बाबू आदि के करीबी लोगों में रहे। कई जन आंदोलनों में इनकी सक्रिय भूमिका रही और उन्होने कई जन आंदोलनों के लिए गीत भी लिखे थे। जिनमें से एक जनगीत हल्ला बोल बहुत लोकप्रिय हुआ था।  इस गीत की कुछ पंक्तियां हैं-

 

             बोल मजूरे हल्ला बोल

             बोल मजूरे हल्ला बोल

             कांप रही सरमायेदारी

             खुल के रहेगी इसकी पोल

             बोल मजूरे हल्ला बोल

 

            कंतिमोहन बहुत संवाद प्रेमी थे, जिन्हें मिलना जुलना बहुत पसंद था। वह साहित्यिक अड्डेबाजी के शौकीन थे और अपनी इच्छापूर्ति के लिए वह दिल्ली के रीगल टी हाउस और मोहन सिंह काफी हाउस में नियमित जाते थे। उनकी कहानी ’ दूसरा पहलू’ में इस काफी हाउस का उल्लेख हुआ है। एम ए करने के लगभग पच्चीस साल बाद सन 1982 में उन्होने ’प्रेमचंद और अछूत समस्या’ पर डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वास्तव में यह एक विद्यार्थी द्वारा अपनी कच्ची या अपरिपक्व दृष्टि द्वारा तैयार एक औपचारिक शोध न होकर एक अनुभवी माक्र्सचादी प्राध्यापक द्वारा किया गया वास्तविक शोध है। इसलिए लंबे समय तक इसका अकादमिक महत्व बना रहा था। उनके शोध के केन्द्र में प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियां तो हैं ही, साथ ही साथ इस विषय पर गांधी जी के विचारों और व्यक्तव्यों की पड़ताल की गयी है।  प्रेमचंद की दलित चेतना को लेकर दलित साहित्यकारों द्वारा जो सवाल उठाये जाते रहे हैं उनका स्पष्टीकरण इस शोधग्रंथ में मिल जाता है। उनका मानना था कि यद्यपि कि प्रेमचंद की दृष्टि माक्र्सवादी थी पर राष्ट्रीय आंदोलनों के मद्देनज़र उनका झुकाव गांधी जी की ओर हो गया था। उदाहरणार्थ, अंग्रेज़ों द्वारा पृथक निर्वाचन लागू करने के विरोध में गांधी जी ने इसे हिंदू धर्म के लिए घातक बताते हुए यरवदा जेल में अनशन आंरभ कर दिया था। तब प्रेमचंद ने ‘ जागरण’ के अपने संपादकीय में गांधी जी के पक्ष में खूब तो लिखा था लेकिन उनके ’हिंदू’ शब्द को ‘राष्ट्र’ से प्रतिस्थापित कर दिया था।  उनकी (कांतिमोहन) धारणा थी कि ऐसा लिखते समय प्रेमचंद भारत की मुक्तिगामी जनता की संघर्षशील भावना का ही प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसलिए उनकी दलित विषयक कहानियों में अंबेडकरवादी दृष्टि कम, गांधीवादी दृष्टि अधिक स्पष्ट होती है। इस तरह से आज के दलित साहित्यकारों की शंकाओं का जवाब  कांतिमोहन की सन 1982 में प्रकाशित शोध पुस्तक में मिल जाती है। यह पुस्तक कुछ संशोधनों एवं संपादन के पश्चात सन 2010 में ‘ प्रेमचंद और दलित विमर्श’ शीर्षक से पुनप्र्रकाशित हुई थी।

          कांतिमोहन की पहली कहानी सन 1961 में प्रकाशित हुई थी। उससे पहले उन्होने लघु उपन्यास पर कथा है शेष भी लिख लिया था। लेकिन फिर लंबे समय तक कथा लेखन से दूर रहे थे। क्योंकि अध्यापन और राजनैतिक सक्रियता के साथ साथ वह गीत, गज़ल और स्तंभ लेखन कर रहे थे। इन व्यस्तताओं के बीच में वह किसी तरह का कथा लेखन करते भी तो शायद वह इनकी संपादकीय दृष्टि को पसंद नहीं आती। सन 1996 में जब वह अध्यापन सेवा से स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हुए तब उन्होने दुबारा कथा लेखन करने का निर्णय लिया। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होने देहरादून में रहने का निर्णय लिया था। देहरादून के रचनाकारों से उनका प्रथम परिचय ’संवेदना’ की गोष्ठी में हुआ था। यह गोष्ठी जनवरी 1997 में शहँशाही आश्रम में हुई थी। उस गोष्ठी में मैं भी था। उस गोष्ठी में बड़े उत्साहपूर्वक उन्होने कहा था कि वह अब कहानियां भी लिखना चाहते हैं। उसके बाद वह लगातार कहानियां लिखने लगे थे। इसके लिए उन्होने एक कंप्यूटर और प्रिंटर ले लिया था। मैं जब भी दून विहार वाले उनके घर जाता तो उन्हें हमेंशा कहानियां टाइप करते पाता। ’ संवेदना’ की गोष्ठी में वह उन कहानियों का पाठ करते थे। वह अन्य की कहानियों को गंभीरतापूर्वक सुनते और उस पर अपनी बेबाक टिप्पणियां करते।

 

मैं एक गोष्ठी की स्मृति साझा करना चाहता हूं।

उस गोष्ठी में कांतिमोहन ने एक कहानी का पाठ किया था। उस कहानी में एक व्यक्ति द्वारा मरणोपरांत नेत्रदान की गयी दोनों आंखें  एक ही व्यक्ति को लगाए जाने का उल्लेख था। उस गोष्ठी में कथाकार योगेन्द्र आहूजा भी उपस्थित थे। उन्होने फौरन हस्तक्षेप किया और बताया कि नेत्रदान में मिली दो आंखें दो अलग अलग नेत्रहीन व्यक्तियों को लगायी जाती हैं ताकि दो अलग अलग व्यक्ति इस दुनिया को देख सके। कांतिमोहन ने योगेन्द्र आहूजा का विनम्रतापूर्वक आभर व्यक्त किया और बाद में अपनी कहानी का पुनर्लेखन किया।  

 

              लेकिन यह एक तथ्यात्मक त्रुटि थी। किसी की क्या मजाल कि उनकी रचनाओं में कोई व्याकरण या भाषाई दोष निकाल सके। उनकी गज़लों का स्तर बहुत ऊंचा है- काफि़या, रदीफ आदि के हिसाब से बिल्कुल परफ़ेक्ट। गज़ल में उन्होने दुष्यंत कुमार की हिंदी गज़ल की परंपरा का अनुसरण नहीं किया है। बल्कि उनकी गज़लें विशुद्व उर्दू की क्लासिक गज़लों के समकक्ष हैं।

 

             भाषा के मामले में वह मास्टर थे ही और संपादन का भी अच्छा ख़ासा अनुभव था। एक बार मैंने अपनी एक कहानी उन्हें पढ़ने को दी। उन्होने शुरुआत में ही एक भाषाई त्रुटि पकड़ ली और आगे पढ़े बगैर वह कहानी मुझे लौटा दी। मुझे याद है कि उन्होने कहा था कि खाने के पहले कौर में ही कंकड़ आ जाए तो खाने का मजा ही किरकिरा हो जाता है। इसके बाद से मैं भाषा के मामले में सजग हो गया था। ‘संवेदना’ की गोष्ठियों में वह वरिष्ठ कथाकारों विद्यासागर नौटियाल और सुभाष पंत की रचनाओं की बेबाकी से आलोचना करते थे और वे दोनों कथाकार उनकी आलोचना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते थे।  

 

           कांतिमोहन ने अपनी ओर से पहल करते हुए देहरादून में भी मिलने जुलने का एक ठिकाना बनाने का प्रयास किया था। मसूरी के रास्ते में इस उद्देश्य से एक कमरा भी किराये पर लिया था और एक कर्मचारी को नौकरी पर भी लगाया था। वहाँ वह रोज़ शाम को बैठा करते थे और दूसरे से भी आने की अपेक्षा करते थे। परंतु उन्हे बहुत जल्द ही दिल्ली और एक छोटे शहर के मिज़ाज में फ़र्क का पता चल गया। उन्होने एक कहानी लिखी ‘कुत्ते’, जिसमें इस शहर के मिज़ाज का कटाक्ष किया है।

 

          कांतिमोहन घोषित तौर पर वामपंथी थे। जीवन पर्यन्त उनकी इस विचारधारा पर आस्था बनी रही। उनकी रचनाओं में वामपंथी और सेकुलर दृष्टि दिखती है। उनकी एक कहानी  बेअंत का अंत 1984 के दंगे पर एक महत्वपूर्ण रचना है। लेकिन गूंगी गुडि़या अपनी मासूमियत कम कर लो’,‘दूसरा पहलू’, ‘कुत्ते’ आदि कुछ कहानियों में उनकी यौन शुचितावादी दृष्टि ही अधिक उजागर होती है। कहानी कुत्ते में देहरादून के किसी रेस्तरां का जि़क्र है जिसमें एक युवा जोड़ा प्रेम में डूबा है।  अपनी इस कहानी में उनके इस कृत्य का वह माॅरल पुलिस की दृष्टि से वर्णन करते हैं। बेरोजगारी के दिनों में जो उन्होने लघु उपन्यास  पर कथा है शेष लिखा था वह सन 2010 में प्रकाशित हुआ। अपने इस उपन्यास में भी उन्होने प्रोफेसर के अन्य कुकृत्यों के बजाए उसे यौन शोषण के कारनामों को ही केन्द्र में रखा था।

                  उनकी भाषा इतनी सुगठित है कि कोई भी वाक्य या शब्द अतिरिक्त नहीं लगता। कभी कभी भाषा की इस कसाव से अन्तर्वस्तु की जीवन्तता प्रभावित होती है। फिर भी उनका गद्य पढ़ कर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होने कम समयान्तराल में बहुत कहानियां लिख दीं। इसलिए एक साथ पढ़ने पर वे किसी महागाथा या उपन्यास का हिस्सा होने का आभास देती हैं। लघु उपन्यास पर कथा है शेष के अलावा दो कथा संग्रह दूसरा पहलू, बे अंत का अंत, गज़ल एवं गीत संग्रह  कदम मिला कर चलो, रात गए, गुनाहे सुखन तथा आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत प्रकाशित हैं। कांतिमोहन ने बहुत अधिक नहीं लिखा तो बहुत कम भी नहीं लिखा। अभी उनके साहित्य का मूल्यांकन होना शेष है। उन पर बहुत सारी स्मृति कथाएं आनी शेष हैं।

 

  और अंत में उनकी एक गज़ल-

 

यां तलक जान पर बन आई बहुत रात गए।

हमने जीने की कसम खायी बहुत रात गए।।

 

कैसे कह दूँ कि मेरे कान में रस घोल गई।

दूर बजती थी जो शहनाई बहुत रात गए।।

 

हम थे नादां हंसे तो इक बार हंसते ही गए।

दिन की करनी पड़ी भरपाई बहुत रात गए।।

 

कल समुंदर में मचा होगा घमासान बहुत

दर्द लेता रहा अंगड़ाई बहुत रात गए।।

 

चीख निकली ही नहीं लाख जतन कर देखे

‘सोज़’ को डस गई तनहाई बहुत रात गए।।

 

 


 

      

 

          

 

                  

 

Wednesday, July 8, 2026

अवधेश कुमार की दो प्रेम कविताएं

  

  

 

( अवधेश कुमार पर केन्द्रित इस विशेष सीरीज का समापन हम उनकी दो प्रेम कविताओं के साथ कर रहे हैं। ये कविताएं 1980 में प्रकाशित उनके कविता संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ से ली गयी हैं)

 

 

 

 

 

 चीते का प्यार

 

 

 तुम्हारे भीगे हुए शरीर की उनींदी पगडंडी पर

 एक किशोर चीते की तरह चलता हुआ : मैं छोड़ता हूं 

अपने पंजों की छाप बादलों से भरी इस चांदनी रात में ।



बिजली-सी चमकती हुई तुम्हारी इस क्वांरी मांग में दीप्त 

तारों की एक मद्धम लौ से 

सुलगाता हूं मैं अपने भीतर की एक महीन आग ।

 

कि तुम्हारे चेहरे के सूरज से सुनहरा मीठा शहद

 टपकता है और तुम्हारे समुचे शरीर में

 एक सुबह जागती है।



मै भालू के बच्चे की तरह मुग्ध-भाव ताकता हूं उधर 

जहां तुम्हारा चेहरा शहद के छत्ते में बदल गया है।



मेरी नन्ही दोस्त, मैं इतना प्यार करता हूं तुम्हें कि

 तुम्हारी तरफ ताकते-ताकते किसी नैसर्गिक फुर्ती में आते हुए

 गोल-मोल कुलांच भरता हूं और ऊन के गोले की तरह 

झट-से तुम्हारी गोद में जा गिरता हूं।


शरद की इस चांदनी रात में

 तुम्हारे शरीर के अलाव की आंच तापते हुए धीरे-धीरे

 बादल घिर रहे हैं किशोर चीते के गद्दीदार पंजों की तरह ।


और तुम : उन पंजों को अपनी हथेलियों से गर्माते हुए 

उस ऊन के गोले को खोलती हो, 

और मुझे अपने बदन की नाप में बुनने लगती हो। 

 

 

रेखांकन: अवधेश कुमार

 

 

एक शब्द

 

कुछ शब्द हैं जो सबके लिए हैं 

कुछ शब्द हैं जो दो के लिए हैं

 एक शब्द है जो कि है केवल एक ही कंठ के लिए

 प्यार - अपनी तरह का प्यार !


कुछ शब्द हैं जो कंठ को मूक करते हैं और उसके नीचे

उस मौन के अंधेरे में जुगनू की तरह उतर जाते हैं।

प्यार - अपनी तरह के प्यार !


 ये ही शब्द देता हूं मैं तुम्हें दिन के उजाले में

 तुम्हारी व्यस्तता को, तुम्हारी सम्पन्नता और तुम्हारे

 उत्साह को । तुम्हारे साथी को, तुम्हारे उत्सव को

 तुम्हारे स्वप्नों और तुम्हारे संकल्पों को ।



देखो, कभी दिखे दुःख कहीं और अनुभव हो दर्द

 पीड़ा उठे सूखी आंखों में । एकदम खाली-सा दिखे अन्तर 

  और लगे कि समय गुजर गया अनचिन्हा ; और

 बहुत कुछ अब नहीं लौटाया जा सकता ।


तो किसी एक जुगनू को पकड़ना और उसके सहारे

 मेरे मौन के अंधेरे में उतर आना ।


तुम मिलोगी सुरक्षित अपने आप से 

पाओगी अपने आप को वहां शब्दों की रूपांतरित काया में।


कुछ शब्द हैं जो केवल तुम हो सकती हो

 पर तुम नहीं हो अभी कोई एक शब्द

 

अपनी यातना में पुनः  घडूंगा मैं तुम्हें दर्द की चट्टान से 

 

 

Friday, July 3, 2026

दस्तावेज: समकालीन कला पर अवधेश कुमार

 

 

 ( अवधेश कुमार के लेखन और वैचारिक पहलुओं के बारे में जानने के लिये उनके पत्र-पत्रिकाओं  में बिखरे हुए लेखों से महत्वपूर्ण जानकारी मिल सकती है.  ‘हंस’में उन्होंने कई कलाकारों के कला-कर्म पर टिप्पणियाँ की हैं. यहाँ हम ‘हंस’के अगस्त 1995 अंक में कलाकार आशीष स्वामी पर लिखी गयी टिप्पणी को साभार दे रहे हैं) 

 

 



 

 आशीष स्वामी : स्याही से रंगों का काम 

अवधेश कुमार  

 

 

भारत में रेखांकन अब तक स्वतंत्र विधा है. उसे व्यावसायिक स्वीकृति और बाजार भी उपलब्ध है. हालाकि अभी भी कला जगत में तैलीय माध्यम से रचे गए कैनवस का प्रभुत्व एवं एकाधिकार निर्विवाद है किंतु पूरे परिदृश्य में अब मिश्रित कला सामग्रियों से निर्मित कलाकृतियां भी छाती जा रही हैं.

मिली-जुली कला सामग्रियों से निर्मित म्यूरल और इंस्टालेशन्स भी सामाजिक स्वीकृति पा  चुके हैं. दिल्ली स्थित ब्रिटिश उच्चायोग के भवन में गुलाबी और काले संगमरमर का अद्भुत संयोजन अब एक कलाकृति का दर्जा पा चुका है. यहां यह जानना दिलचस्प होगा कि पश्चिम के प्रभाव से आई ये नई कलाविधाएं सदियों से हमारे जनजीवन का हिस्सा रही है.  वेदों ,उपनिषदों, पुराणों और महाकाव्यों में पाये जानेवाले 'जादुई यथार्थवाद’ की तरह आज की उत्तरआधु‌निकतावादी कलासंरचनाएं तो हमारी भारतीय संस्कृति और सभ्यता के शैशवकाल से ही हमारी कलात्मक अभिरुचियों और संस्कारों का एक अटूट हिस्सा रही है. भारतीय जीवन में सभी पारिवारिक, वैवाहिक और धार्मिक अनुष्ठान आदि इसी तरह के कला आयोजन हैं- विवाह मंडप और माँदरों की साज-सज्जा आदि. यहां तक कि मृत्यु के समय सजाई जानेवाली चिता भी एक तरह का इंस्टालेशन ही है. होली दहन के अवसर पर जिस प्रकार पीली या लाल ध्वजावाले बांस के बारों ओर लकड़ियां चिनी जाती है ,उन्हें उपलों, फलों, मिठाइयों आदि से सजाया जाता है; वह सब क्या है?
बात रेखांकन की हो रही थी पश्चिम में तो रेखाकन विधा की तकरीबन तीन सौ साल परानी परंपरा रही है हमारे यहां प्रागैतिहासिक कालखंड में बनाए गए गुफा रेखाजता के बाद की फा और उसके एक लंबे अंतराल चातु मनल और राजपूत शैली के चित्रों में ही रेखा जी एक अलग पहचान की जा सकती है दरअसल रेखा किसी वस्तु,व्यक्ति, दृश्य, वनस्पति, वृक्ष, पशु-पक्षी आदि की आकृतियों के अध्ययन के लिए किए जाते रहे हैं और किसी भी चित्र का आधार बनाते रहे हैं उसके पश्चात् रंगों के भर जाने से जैसे चित्र में वे 'छप' जाते हैं.

मुगल और राजपूत काल तक यदि कछ रेखांकन स्वंतत्र रूप से बच पाए हैं तो इस कारण कि वे चित्रांकित नहीं हो पाए, अधूरे छूट गए या किन्हीं कारणों से उन्हें पूरा नहीं किया गया. उसके बाद देखें तो बंगाल स्कूल से ही रेखांकन विधा की एक अटूट श्रृंखला हमें दिखलाई पड़ती है.

इसका कारण शायद यह रहा कि बंगाल स्कूल पर चीनी और जापानी चित्रकला का गहरा प्रभाव रहा. ब्रश और इंक से रेखांकन करना चीनी और जापानी चित्रकला का सर्वोपरि अंग रहा है. यह जानना दिलचस्प होगा कि चीनी जापानी शैली में भारतीय कलाकारों ने अथवा चीन-जापान से आए कलाकारों ने हमारे प्रमुख राजनेताओं, लेखको, बुद्धिजीवियों तथा कलाकारों के इसी शैली में व्यक्ति रेखांकन (स्केच) बनाए हैं-रवीन्द्रनाथ ठाकर और प्रेमचंद की ये शबीहें (पोर्ट्रेट्स) पुस्तकों आदि में प्रकाशित भी हुई हैं. जामिनी राय के रेखांकन भी उनकी कलाकृतियों में अपना एक अलग स्थान रखते हैं. इसलिए भी कि जामिती राय ने लोककला की जिस कालीघाट शैली से प्रेरणा प्राप्त की उसमें शक्तिशाली, सुनिश्चित और सक्षिप्त रेखांकनों की एक सुदृढ़ आधारभूमि रहती है. इसके बाद तो धीरे-धीरे जैसे रेखांकन की स्वायत्तता का मार्ग पुष्ट होता चला गया.
इस अंक में प्रकाशित आशीष स्वामी के रेखांकनों में आप पाएंगे कि वह पेंसिल, स्केच पेन, पेन आदि का इस्तेमाल न करके सीधे ब्रश से ही स्याही द्वारा रेखांकन करते हैं. किंतु इन रेखांकनों का झुकाव जरा पेंटिंग की तरफ ही दिखाई पड़ता है. इसका कारण है ब्रश इस्तेमाल करने के कारण उसके बालों के फैलाव के कारण कागज पर पड़नेवाली स्याही का छितराव और एक तरह का अधूरापन जोकि निश्चित रेखाओं के खींचने से प्राप्त नहीं किया जा सकता. आशीष स्वामी अपने रेखांकन में आकृक्तियां भी अधूरी छोड़ देते हैं जिससे देखनेवाले को उन्हें स्वयं ही पूरा करने की कल्पना कर सकने की छूट भी मिल जाती है. रंगों द्वारा बनाए गए चित्रों में भी आशीष स्वामी अपनी इसी परिचित तकनीक और शैली का इस्तेमाल करते हैं. ब्रश को एक खास तरह से बरतने के कारण आशीष स्वामी काली स्याही से भी रंग का काम लेना जानते हैं.

 




 
( ‘हंस’ अगस्त 1995 )

 

 

Monday, June 29, 2026

संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है : अवधेश कुमार


 

 

   ( अवधेश कुमार को याद करते हुए आज चौथा सप्तक में कविताओं के साथ दिये गये उनके वक्तव्य को प्रस्तुत कर रहे हैं। पिछली पोस्ट में विष्णु खरे उनके कविता संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये लिखी गयी भूमिका दी गयी थी। अवधेश का यह वक्तव्य  उनके वैचारिक पर्यावरण के बारे में बहुत कुछ कहता है )

  

जब कभी मैं अपनी कविताएँ इस तरह से पढ़ता हूँ कि जैसे वे किसी दूसरे आदमी की लिखी हुई हों, तो वे मुझे इस तरह से प्रभावित करती हैं कि उन से भी बेहतर कविताएँ लिखने की इच्छा बढ़ जाती है। अपनी किसी चीज़ को दूसरे की मान लेना; या ऐसा अनुभव कर लेना अव्यावहारिक व कठिन है, किन्तु मेरा इस का अभ्यास है। शब्द के अलावा रंग, शिल्प, अभिनय, पूरे रंगकर्म और उतना ही खामोश रहने में भी मेरा पूरा विश्वास है; क्यों कि मैं मानता हूँ कि सभी अभिव्यक्ति-रूपों में परस्पर सामंजस्य के साथ यदि उन की एक पूर्ण आन्तरिक इकाई किसी एक व्यक्ति में बन जाती है तो उसे कुछ कहने के अवसर स्वतः ही मिलते रहते हैं। इसी लिए कविता लिखना अब तक मेरे लिए बड़ा सहज रहा है।

 

जब मैं लाख चाहते हुए भी बड़े-बड़े कैनवस पेंट नहीं कर पाता, थियेटर नहीं कर पाता, दूर-दूर के देशों की पहाड़ों, जंगलों और समुद्र की यात्रा नहीं कर पाता; लोगों को और उन से अपने रिश्तों को समझने की कोशिश करता हूँ, प्यार या तनाव में होता हूँ तो कविता करता हूँ।

 

इंटरमीडिएट में एक पेपर देते हुए जब मैं बोर हो गया तो मेरे पास कविता करने के सिवा और कोई चारा नहीं था। आँखों के सामने पसरी सुबह, जाड़े की ताजी धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगितताज्ञा धूप और परीक्षा-भवन के उस एकान्त घुन्नेपन में परीक्षा के तनाव को स्थगित करते हुए कविता रचने का वह अब तक का मेरा सब से विचित्र अनुभव है। उसी दौरान मुझे लगा कि परीक्षा देने से ज़रूरी कविता करना है; क्योंकि वह स्वतःस्फूर्त  हैं: और मैं ने तीन छन्दों का न केवल एक गीत लिख डाला, बल्कि बाहर निकलने तक मैं उस की धुन भी बना चुका था, और यह कहने की ज़रूरत नहीं कि उस साल उसी पर्चे में मैं फेल हो गया; जिस का मुझे कोई अफ़सोस नहीं था।

 

मैं पेड़, चिड़िया, पहाड़, नदी, समुद्र, सूरज, आदमी, समय और अपने पर लाखों कविताएँ लिख सकता हूँ, और यह भी कि मुझे बहुत सारे पाठक भी नहीं चाहिए। यह इस तरह से है कि मैं तो दूसरों की लिखी हुई सभी कविताएँ खोज-खोज कर पढ़ता हूँ किन्तु मेरी कविता भी उसी रुचि और लगाव के साथ पढ़ी जाये, ऐसा कोई आग्रह या प्रश्न मन में कभी नहीं रहा।

 

मेरी कविता एकसाथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक सम्पूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा लगाव व आस्था ही है, जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।

मैं इस शताब्दी के मध्य में पैदा हुआ और देहरादून जैसे शान्त, निर्द्वन्द्व और खूबसूरत शहर में; तो इस देश और काल में जीते हुए जैसी कविता मुझसे सम्भव हो सकी, मैं ने की है।

 

अपनी कविता का आधुनिक होना भी मैं उतना ही महत्त्वपूर्ण मानता हूँ, जितना कि उस का भारतीय भी होना: उस की संवेदनशीलता के आयाम भी बहुत मुखर, सचेत और सामयिक होने चाहिए ताकि उस की निरन्तरता और स्थानीयता एकसाथ बनी रहे-वह एक-एक व्यक्ति से होती हुई पूरे समाज से जुड़े और कई शिल्प-रूपों और माध्यमों को अपनाये; क्यों कि ऐसा है कि शब्द में संवेदना के विकास या अवरोध को एक क्रम में लक्ष्य कर पाना कठिन होता है जब कि पेंटिंग, मूर्तिकला, स्थापत्य और फ़िल्म जैसे माध्यमों में उस की चाक्षुष उपस्थिति रहती है। मैं कोशिश करता हूँ कि मेरी कविता पेंटिंग की तरह रंगों और उन की रंगतों जैसी कोई शाब्दिक संरचना हो और फ़िल्म की तरह सवाक् और गतिशील हो। आधुनिक और भारतीय होने की यह रचनात्मक सोच मुझे साहित्य से बाहर पेंटिंग-स्कल्पचर और फ़िल्म जैसे कला-माध्यमों में ज़्यादा सक्रिय और सार्थक महसूस होती है। इस लिए मैं कविता को उन माध्यमों में से गुज़रते हुए सोचता हूँ; यह कि मैं अपनी कविताओं को उन के लिखे जाने के तुरन्त बाद और साथ ही साथ पेंटिंग व फ़िल्म माध्यमों में रुपान्तरित कर सकता हूँ।

शब्द को साहित्य में यथासम्भव चुप तथा अनुशासित और अन्य माध्यमों  में वाचाल और उद्दंड होना चाहिए; ऐसा इस लिए कि संवेदना साहित्य में हमेशा साहित्य के बाहर से आती है। साहित्य शब्द के जड़ हो जाने, मर जाने की जगह है; इस लिए साहित्य में आने से पहले उसे साहित्य से बाहर जीवन में इधर-उधर ज़िम्मेदाराना ढंग से आवारागर्दी कर लेना चाहिए ताकि न केवल वह अर्थवान हो सके, बल्कि उस के पास अर्थ के ऐसे सामाजिक और सांस्कृति आयाम भी हों जो दो भिन्न मानसिकता, स्थान और समय में रहने वाले आदमियों के बीच के अपरिचय को समाप्त कर सकें। I

 

और अन्त में यही कि मैं रंगों और कविताओं से लदा हुआ एक वृक्ष हूँ जिसकी की जड़ें अपनी जमीन में बहुत गहरी गडी हैं, पर वह सचमुच के पेड़ की तरह एक जगह जड़ नहीं हैं ,चल सकता है, बोल सकता है। उस के दो वास्तविक हाथ है विरोध के लिए कि कोई जंगल में आरा ले कर घुसने की हिम्मत न कर सके, इसी तरह से मैं समझता हूँ कि मेरी कविता मेरे साथ एक संघर्षशील सामाजिक यात्रा में शामिल है। जीवन में एक ऐसे परिवर्तन के लिए जिस के लिए अपनी-अपनी तरह से हम सब प्रयत्नशील हैं।

 

 ( ‘ चौथा सप्तक ’ में प्रकाशित कवि का वक्तव्य)

 

Wednesday, June 24, 2026

अवधेश कुमार की कविताओं के बारे में: विष्णु खरे

 

 

विष्णु खरे
( अवधेश जी को याद करते हुए हम आज उनकी  कविता पर कवि-आलोचक विष्णु खरे के विचार दे रहे हैं। यह महत्वपूर्ण आलेख उन्होंने अवधेश के  कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ के लिये  भूमिका के रूप में लिखा था।)

  

पिछले कुछ वर्षों से ‘युवा’ और ‘युवा कविता'  शब्द हिन्दी  में सिर्फ युवकों और युवकों द्वारा लिखी जा रही कविता के पर्याय नहीं रहे। कभी वे नयी कविता के बाद वाली पीढ़ी के लिए इस्तेमाल किए गए और कभी वामपंथी तेवर वाली कविता के लिए या सामान्यतः आदमी से लगाव रखने वाली कविता के लिए, किंतु ‘युवा' शब्द कभी भी केवल उन लोगों का परिचायक नहीं रहा जिन पर यौवन आ चुका हो। देखा जाए तो आजादी के बाद जो दो पीढ़ियां जवान हुई है उनमें से सौभाग्यशाली कुछ को छोड़कर युवा होना क्या होता है. यह किसी ने जाना ही नहीं। युवा होने का अर्थ यदि स्वस्थ, चंचल, जोखिमपसंद, आत्मनिर्भर, निश्चिंत,स्वतंत्र होता है तो कहा जा सकता है कि पिछले तीस वर्षों में भारत में बहुत कम लोग ही युवा हो पाए होंगे। भारतीय हालात- सामाजिक, आर्थिक. राजनैतिक -किशोरों को सीधा अधेड़ बना देते हैं। युवा होना इस देश के महान परिवारों का ही हिस्सा है।

 

किन्तु क्या इसका अर्थ यह है कि हमारे बीस से तीस वर्ष के लोगों ने यौवन- उसके सारे या कुछ अर्थों में- देखा और पाया ही नहीं? हिन्दी कविता पर लगातार सैकड़ों वर्षों तक यौवन का राज्य रहा। बूढ़े कवि कुश्ते खाते और खिलाते रहे- किन्तु छठे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ? हालात बद से बदतर होते गए हैं इसमें कोई संदेह नहीं और युवकों  का चन्द बरस भी जवान रह पाना मुश्किल होता जा रहा है। देश और संसार की हालात कवियों से बहुत पेचीदा मांग कर रही है। लेकिन सारी भयावहता, संकट और लड़ाई के बावजू क्या यह मान लिया जाए कि गांभीर्य और जुझारु बुजुर्गियत ओढ़ने के सिवा युवकों के लिए हिन्दी कविता में कुछ बचा ही नहीं ?

 

आश्चर्य यह है कि जब आप हिन्दी के अधिकांश युवा कवियों से मिलेंगे तो आप पाएंगे कि वे बेहद जीवंत, खुश, पुरमज़ाक, हल्लेबाज, जीवन की अच्छी चीजों के पारखी, सौंदर्य में  गहरी रुचि रखने वाले,शरारती और नितांत 'अस्वप्निल', 'अगंभीर' है। किंतु कवि-कर्म की कुछ ऐसी दहशत उनमें से अधिकांश पर है कि उनकी कविताएं अधिकतर बेहद रस्मी और नकली और सेल्फ-कॉन्शस हो जाती हैं और जब वे 'निजी' होते हैं तो उनमें एक खासा लिरिकल तत्समी घटाटोप होता है ताकि कोई शक न रह जाए कि हमारा विद्रोही कवि प्रेमी होना भी जानता है। आक्रोश से आलिंगन के बीच के सारे पायदान गायव हैं।

 

इसीलिए अवधेश कुमार की इन कविताओं को जब मैंने पढ़ा तो मुझे एक खुशी हुई कि उनके लिरिकल लगावों में परिश्रम या सायासता बिलकुल नहीं है। पाठक देखेंगे कि उनके इस संकलन का शीर्षक और उस शीर्षक खंड की कविताएं उनके अलग तरह के कवि होने की सूचना देती हैं। 'जिप्सी' शब्द पर कुछ लोगों को एतराज हो सकता है लेकिन 'ईरानी', 'चाकू-छुरी वाली' या 'घुमन्तू' आदि पर्यायों से काम न चलता। 'जिप्सी' शब्द के अंग्रेजी में अनेक प्रतीकार्थ भी होते है- वह उन्मुक्तता, स्वच्छंदता, बेफ़िक्री, रूढ़िमुक्तता का भी पर्याय है। अवधेश कुमार देहरादून में जन्मे और प्रकृति के बहुत नजदीक रहे। इसलिए इसमें कुछ अजब नहीं है कि उनकी कुछ कविताओं में एक ऐसी जीवंतता, स्पंदन, खुलापन, ऐन्द्रिकता है- यहां तक कि कभी-कभी भावुकता भी- जो उनके समवयस्क अनेक कवियों में कम ही है। इधर की प्रेम कविताओं में आप पाएंगे कि कवि सबकुछ के बावजूद भी संयत है- उसने स्वयं को बह जाने नहीं दिया है, जब कि अवधेश कुमार की कविता में कवि कुछ दूर तक तो दिखता है किन्तु जब गति और लय तेज होते हैं तो वह खो जाता है- जिस तरह तेज नाचते हुए लोक-नर्तक एक हो जाते हैं या मेलों में झूलने वाले लोग रंगों और आह्लादित चीत्कारों की एक फिरकनी ही नजर आते हैं और उनमें अपने प्रियजनों को ढूंढना मुश्किल होता है। अपने युवा होने की इस अंतरंग दुनिया को अवधेश कुमार ने कभी बहुत कोमलता से छुआ है जैसे 'मुक्ति एक आद्योपांत' में या 'फड़फड़ाते हुए डूबना' में और कभी बहुत ऐन्द्रिकता से जैसे 'चीते का प्यार' में। 'वर्षा में एक प्रलाप' में और उससे कहीं ज्यादा 'दर्द इतना हल्का और चुपचाप में वे खतरनाक ढंग से भावुकता के नजदीक आ जाते है लेकिन आवेग की तीव्रता शब्दों और शिल्प के जागरूक चुनाव के साथ मिलकर कविता को कविता बनाए रहने में सहायक सिद्ध होती है।

पाठकों का ध्यान विशेष रूप से मैं अवधेश कुमार की कविता 'जिप्सी लड़की : दो' की ओर खींचना चाहूंगा। अव्वल तो किसी उत्सव का, किसी मेले का ऐसा स्पंदित चित्र हिन्दी में कभी देखा हो ऐसा याद नहीं आता। लेकिन यह सिर्फ एक नयनाभिराम चित्र नहीं है, इसमें अभावग्रस्त पूरा गांव भी खड़ा हुआ है। अत्याचार और दमन पहाड़ की ऊंचाइयों तक भी पहुंच गया है, नशे में धुत्त हवलदार के रूप में। पर्यटकों के लिबास में शहरी संस्कृति भी वहां पहुंच गयी है। वहां खलील जिब्रान भी है- जिब्रान का वहां होना जिस कॉमेडी-गांभीर्य ट्रेजडी का प्रतीक है यदि उस पर ही लिखने लगें तो बहुत हो जाएगा। बहरहाल, 'सांप', ‘डफली’ ,'खून' आदि के प्रयोग से कविता में खासी ऐन्द्रिकता और हिंसा का प्रवेश होता है किंतु अंत में खलील जिब्रान के साथ बर्फ़ में दबी जिप्सी लड़की आपको एक विरेचन-भाव में छोड़ती है। इस एक कविता में इतने अलग-अलग और लगभग विरोधी-से तत्व काम कर रहे हैं कि इसे लिखने जाना अवधेश कुमार की संभावनाओं के प्रति आश्वस्त और उत्सुक करता है।

 

अवधेश कुमार यदि जीवन के शुद्ध 'सेलेब्रेशन' के ही कवि होते तो अपर्याप्त नथा क्योंकि अपनी ऐसी कविताओं में यह अपनी पूरी शक्ति में मौजूद हैं और वह सर्जनात्मक ऊर्जा किसी भी तरह की कविता को सार्थक बना ही देती है किन्तु उन्होंने लिखा है: ‘ मेरी कविता एक साथ बहुत सारी चीजों से प्रभावित है और एक संपूर्ण शब्द में वह जीवन है। शायद जीवन के प्रति मेरा गहरा जगाव व आस्था ही है. जिसे मैं अपनी कविता के माध्यम से व्यक्त करता हूँ।’ और चूंकि जीवन एक वैविध्यपूर्ण, संघर्षमय, पेचीदा और परिवर्तनशील विराट है इसलिए स्पष्ट है कि अवधेश कुमार की कविता जहां एक ओर शरीर, अभिलाषा, जय और पराजय के स्तर पर युवा होने की कविता है वहाँ वह एक छोटे रमणीय स्थान और घर को सुरक्षा-वह जैसी भी रही हो- से निकलकर एक दमनकारी, डरावनी, मानव-विरोधी दुनिया के सामने स्वयं को पाने की कविता भी है।

 

उनकी कविता का यह स्वरूप हमें उनकी ‘चिरे हुए आदमी की गंध'  चिंता को जमुहाई', 'रीढ़', 'जीवन की शुरुआत, 'भूख की सीमा से बाहर', 'छत पर धरी लालटेन', 'मां की याद', 'बाप रे इस इतने बड़े देश में’ आदि रचनाओं में मिलेगा। इसमें कोई शक नहीं कि अवधेश कुमार की कविताओं में सीधा संघर्ष, आह्वान, बलवा, क्रांति आदि नहीं हैं। उनके यहां प्रतिबद्धता की आत्ममुग्ध शैली नहीं है। किन्तु 'साइकिल की घंटियों का यही मतलब होता था कि/ उन पर बैठा हुआ हर बाबू जिन्दगी भर अपने बीवी-बच्चों को/ अपने दिनभर के तहखानों के भय से /बचाए रखने का संकल्प लेते हुए लौटता था हर शाम ’(क्लर्क), 'चौतरफा खुली एक आँख / चीजों में खोजबीन करती हुई बारीक / दिमाग़ को जगाए रखने के लिए लगाती हुई हांक / बेहद जागी हुई चुनौतियों में होती शरीक' (चिता की जमुहाई); 'हमने आग जलायी थी सोयी हुई चीजों को जगाया था/और धीरे-धीरे महसूस किया था अपने जीवन की शुरुआत को' (जीवन की शुरुआत); 'वह मणिहीन सांप गर्वित है खुद पर अधिनायक की तरह / कि चिड़िया को मारता भी नहीं और उसे भयमुक्त भी नहीं करता' (छत पर घरी लालटेन); 'मिलो दोस्त, जल्दी मिलो/ मैं ग्ररीब, तुम गरीब / पर हमारे इरादे गरम' (मिलो दोस्त, जल्दी मिलो); 'संबिधान की दुनिया में बचाये रखना है अपने आप को / और एक श्रेष्ठ नागरिक कहलाते रहना है; जब तक / पूरे नहीं होते अद्भुत स्वप्न मुझ गरीब आदमी के' (बाप रे इस इतने बड़े देश में) आदि कविताओं में यह बिलकुल साफ़ है कि अवधेश कुमार कहां से आते हैं और उनकी सहानुभूतियां किस तरफ हैं। और ऐसा नहीं है कि इनमें एक श्रेष्ठतर व्यक्ति की उदारता भरी सहानुभूति है बल्कि आज के जमाने में जो भी कमजोर लोगों पर हो रहा है वह इनके लिखने वाले पर भी या तो हो रहा है या कभी भी हो सकता है।

 

यदि मुझसे पूछा जाए कि आज की कविता में क्या देखा जाना चाहिए तो मैं कहूंगा कि आदमी के अस्तित्व और उसके सामने खड़े सारे संकटों को लेकर चिंता और प्रतिबद्धता, मानव होने के रोमांचक मामले में गहरी दिलचस्पी, जीवन और रिश्तों के अनंत वैविध्य के प्रति उत्सुकता और इस सब को अपनी भाषा और शैली में कह पाने की क्षमता। अवधेश कुमार की ये कविताएं इन सारी शर्तों को पूरा-पूरा निभाती हों यह न तो जरूरी है और न संभव- किन्तु इसमें संदेह नहीं कि इन कविताओं में इन शर्तों का पूरा-पूरा अहसास है। यह नहीं भूलना है कि अवधेश कुमार एक युवा कवि है और उनके सामने देने के लिए एक पूरा काव्य-जीवन पड़ा हुआ है। उनकी प्रारंभिक कविताएं एक ऐसे संकलन में प्रकाशित हुई जिसके संपादक की चयन-शक्ति में हिन्दी साहित्य का भरोसा बहुत पहले उठ चुका था इसलिए उसका कोई नामलेवा न रहा। यह अवधेश कुमार की जीवंतता का ही प्रमाण है कि वह उस प्रारंभिक सदमे को न केवल पचा गए बल्कि उससे मुक्त होकर उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि उनमें अपनी मौलिक प्रतिभा है जो इस तरह की घातक दुर्घटना से भी बचकर उभर सकती है। अवधेश कुमार में इस जीवंतता के कई स्तर हैं। उनकी कविताओं को अपना घर, परिवार, मां, कस्बा, जंगल, शहर, दोस्त सब याद ही नहीं है, उनकी ओर वह बार-बार लौटते हैं और कुछ समृद्ध ही होते हैं। दोस्तों पर लिखी गयी उनकी दो कविताएं इस संग्रह में हैं- एक तो ऐसा मित्र है जो कई मंजिला इमारत में बैठा हुआ है और उनसे फोन कर लेने को कहता है। और दूसरा ऐसा है जो कवि की तरह ही है जिससे कवि तुरन्त मिलना चाहता है। कहने को ये बहुत सामान्य विषय लग सकते हैं लेकिन जो दोस्त और दोस्त में इतना प्रकं कर सकता है वह एक की प्रासदी और कामदी के रूप में मृत्यु भी जान सकता है और दूसरे की इंसानदोस्ती और दोस्तपरस्ती के जीवन को भी। चीजों और व्यक्तियों का यह अहसास अवधेश कुमार को कई कविताओं में मिलेगा- उनकी कविता की दुनिया एक धड़कती, बदलती, विकसती दुनिया है।

आज हिन्दी में जो भी युवा कवि और युवा कविताएं हैं उनमें से वही बचेंगे जिनके पास ऐसी दुनिया, ऐसे लोग और ऐसे अहसास हैं।जाहिर है कि वे युवा कवि अवधेश कुमार के उन्हीं दोस्तों में से होंगे जिनसे वह मिलना चाहते हैं- जिनमें वह मिल चुके हैं।