Thursday, August 6, 2026

संतरों के उजाले - फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि : यादवेन्द्र

 

 

  

 

 

 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति


 
 (  निर्वासन , विस्थापन और प्रतिरोध की अभिव्यक्ति के विभिन्न कलात्मक रूपों से गुजरते हुए यादवेन्द्र ने इस आलेख में   फिलिस्तीन के सांस्कृतिक परिद्र्श्य पर एक लग दृष्टिकोण से नज़र डाली है।  हम इस आलेख के लिये यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हैं)
 
 
संतरों के उजाले : फिलिस्तीनियों की स्मृति में बसी मातृभूमि 

 

हममें से कोई भी इंसान ऐसा नहीं है जो भूगोल के बाहर या उस से परे हो, न ही भूगोल को लेकर छिड़े संघर्ष से हम कभी पूरी तरह से मुक्त या असंबद्ध और निरपेक्ष हो सकते हैं। संघर्ष निहायत संश्लिष्ट  और दिलचस्प होता है क्योंकि यह न सिर्फ़ सैनिकों और तोपों की बात करता है बल्कि इसको निर्मित करने में शामिल होते हैं विचार, संरचना, बिंब और कल्पना भी।
निर्वासन चीजों को दो स्तरों पर देखता है - हम पीछे क्या छोड़ आए हैं और काल और स्थान की वर्तमान स्थिति में नई जगह पर क्या है? इसलिए किसी बात या घटना को अपने एकांगीपन में नहीं देखा जा सकता बल्कि संपूर्ण परिप्रेक्ष्य में ही देखना होगा।
                                                                                -     एडवर्ड सईद
 

तरबूज, संतरे, जैतून और बैंगन इन सबको एक सूत्र में बांधने वाला सामान्य कारक क्या है?

वैसे तकनीकी तौर पर तो यह सभी फल हैं। हो सकता है आपको यह सभी स्वादिष्ट भी लगते हों लेकिन फिलिस्तीनियों के लिए वे उनकी संस्कृति और जातीय पहचान के प्रतीक हैं। फिलिस्तीनी इन सबको अपनी राष्ट्रीय पहचान और अपनी धरती से जुड़ाव के तौर पर देखते हैं जहां एक दिन लौट कर जाने का उनका संकल्प उनके मन मस्तिष्क  में पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी बसा हुआ है। यही कारण है कि यह सब मामूली लगने वाली चीजें  फिलिस्तीनी प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में भी देखी जाती  हैं। यहाँ इस आलेख में हम फिलिस्तीनी संतरों की बात करेंगे। 

फिलिस्तीन में संतरों की बागवानी का इतिहास लिखने वाले प्रो मुस्तफ़ा काभा  ने लिखा है कि 1920 के दशक में फिलिस्तीनी प्रेस ने अपने नागरिकों के सामने यह सवाल बड़ी प्रमुखता के साथ रखा था कि आज़ादी मिलने पर वे अपना राष्ट्रीय ध्वज किस तरह का बनाना चाहते हैं ? सबसे ज्यादा लोगों ने संतरे के रंग का झंडा सुझाया हालाँकि इतिहास ने अपनी तरह से करवटें बदलीं और स्वतंत्र फिलिस्तीन की स्थापना का स्वप्न धूमिल पड़ गया .लेकिन आज भी दुनिया भर में रहने वाले फिलिस्तीनियों के लिए संतरे उनकी मातृभूमि के सांस्कृतिक और भावनात्मक प्रतीक हैं। 

फिलिस्तीन के राष्ट्र कवि माने जाने वाले महमूद दरवेश ने अपनी एक कविता में लिखा है :

सूरज तुम्हारे दिल को 
संतरे के उजाले से 
भर देता है।
              
 
 
 
 
मैं जाफा के संतरों और शरणार्थियो की स्मृतियों की सौगंध खाकर ऐलान करता हूं कि हम न उन्हें बख्शेंगे जिन्होंने हमारी धरती का सौदा किया है, न उन्हें चैन से रहने देंगे जिन्होंने उसे खरीदा।
               जॉर्ज हबाश 
(पॉपुलर फ्रंट फॉर द लिबरेशन ऑफ़ फिलिस्तीन  के संस्थापक)


विस्थापित होने के बाद पीढ़ियां बीत जाने के बाद भी फिलिस्तीनी शरणार्थी यह कभी नहीं भूले कि इजराइलियों ने उनके गांव कस्बों पर कब्जा करते ही सबसे पहले जो काम किया वह था जैतून और संतरे के बागों को तहस नहस कर देना जिससे वे यह दावा कभी न कर सके कि संतरे वे इस धरती पर सदियों से उगाते आए हैं और इजराइली तो बहुत बाद में दूसरे देशों से वहां पहुंचे हैं - यह धरती मूलतः फिलिस्तीनियों की ही है।संतरे के बागों को उजाड़ना इजराइलियों का एक सैद्धांतिक जेहाद था - कि न इस धरती पर फिलिस्तीनी रहते थे न उनके बाग बगीचों का कोई अस्तित्व है।

फिलिस्तीनी मूल की कवि,कलाकार,फ़िल्म  निर्देशक  एनीमेरी ज़ाकिर की फ़िल्म साल्ट ऑफ दिस सी में अमेरिका में पली बढ़ी और रह रही सोरैया अमेरिका से फिलिस्तीन लौटती है पिता की मृत्यु के बाद , 1948 में दादा को सबकुछ छोड़ छाड़ कर भागना पड़ा था। रामल्ला में रहने वाले नए बने अपने दोस्त इमाद के साथ बात करते हुए अमेरिका छोड़कर फिलिस्तीन आकर रहने का इरादा करने वाली सुरैया कहती है कि  उसके दादा हमेशा फिलिस्तीन की धरती की बातें किया करते थे। उनकी सुनाई ढेर सारी कहानियों में इतना फिलिस्तीन था कि मुझे लगा कि मैं एक दिन यहां आकर जरूर रहूंगी। उसे दादा की सुनाई यहां पैदा होने वाले संतरे की कहानियां याद हैं। इमाद को भी याद आता है कि उसने जीवन में जितने भी संतरे खाए हैं उनमें फिलिस्तीन के संतरों का स्वाद सबसे अलग था। सुरैया के लिए फिलिस्तीन जाकर नया  जीवन शुरू करना उसका आदर्श था... इस तरह वह अपने दादा की स्मृतियों के भी ज्यादा करीब बनी रहेगी।और  संतरा उसके लिए फिलिस्तीन की संस्कृति का प्रतीक है।
यही कारण है कि वह अपने जन्म स्थान पर पहुंचकर पुराने घर को देखती है तो सबसे पहला  काम वहां के बाग में जाकर प्यार से संतरे निहारने और तोड़ने का  करती है। यह काम सुरैया को उसके पारंपरिक जीवन के साथ जोड़ता है। उसे लगता है कि वह जब यहां आकर  रहने लगेगी तो अपने लोगों के बीच रह कर धीरे-धीरे अपनी जड़ों के साथ उसका रिश्ता ज्यादा सार्थक और सघन रूप में जुड़ जाएगा।

उसके दादा को 1948 में जब जाफा छोड़कर भागने की नौबत आई थी तो ब्रिटिश पेलिस्टीनियन बैंक में उनके पैसे जमा थे। सुरैया अपने दादा के उन पैसों को वापस लेना चाहती है जो राशि अब बढ़ कर 15000 डॉलर तक पहुंच गई है। जब बैंक  पैसे इस आधार पर वापस देने से मना कर देता है कि उनके रिकॉर्ड में उसके दादा के नाम का अब कोई ग्राहक नहीं है तो सुरैया उस बैंक को लूटने की योजना (निर्देशक का काल्पनिक हस्तक्षेप ) बनाती है। वह अपने फिलिस्तीनी  दोस्त इमाद के साथ मिलकर बैंक लूट भी लेती है (जब इजराइलियों ने फिलिस्तीनियों के माल असबाब बाग घर और जमीन जायदाद सब लूट लिए तो बदले में उनका बैंक लूटना कोई गुनाह नहीं है ,यह प्रतिरोध है)

इमाद - तुम यह बताओ यहां ऐसा क्या रखा है जो तुम्हें खींच लाया?
सुरैया - हमारा यहां कुछ था जो पीछे छूट गया... यहां हमारी जिंदगी थी। हमारा जो कुछ भी था वह इन्होंने लूट लिया।

सुरैया के लिए यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल था कि उसके दादा का बनवाया अपना घर अभी एक इजराइली स्त्री के हवाले है जिसने रहम  करके उन्हें रात भर रुकने का नेता दिया है। 
सुरैया - मैं यह तय करुंगी कि तुम यहां इस घर में रहोगी या नहीं। ये खिड़कियां, ये दीवारें यह सब हमारे घरों की हैं... हमारे घरों से चुराई हुई हैं।
               
 सुरैया इमाद के साथ मिलकर अपने लिए अल दवाइमा में अपने सपने का घर बनाना चाहती  है ... 1948 के कत्लेआम में पूरी तरह से नष्ट कर दिया गया अल दवाइमा अब भी उजाड़ पड़ा हुआ है। निर्देशन में बड़ी वैचारिक कल्पनाशीलता के साथ यहां अतीत और भविष्य को आमने-सामने खड़ा कर दिया है।

फिल्म में संतरों का उपयोग कई स्तरों पर कुछ कहने की कोशिश करता है - सबसे पहले तो यह कि अपने नए घर और देश को सुरैया उम्मीद भरी नज़रों से देखती है। दूसरे स्तर पर देखें तो संतरे फिलिस्तीन पर इजराइल के कब्जे के विरुद्ध एक रूपक के तौर पर दिखाई देते हैं। फिलिस्तीन सहित अनेक अरबी फिल्मकार अपनी फिल्मों में संतरों को प्रतिरोध के उस प्रतीक के तौर पर देखते और दिखाते हैं जिस पर राजनैतिक एजेंडा का प्रचार कह कर प्रतिबंध लगाना मुश्किल है।

यह फ़िल्म सामूहिक इतिहास के पुनर्लेखन आंदोलन का एक हिस्सा है। यह फिलिस्तीनी इतिहास के उस पक्ष को उजागर करने की कोशिश करती है जिसपर दुनिया भर का मेनस्ट्रीम मीडिया आमतौर पर चुप्पी साधे रहता है।
यह निरा संयोग नहीं है कि फ़िल्म अक्टूबर 1948 के अल दवाइमा कत्लेआम की स्मृति को समर्पित है।

फिलिस्तीन के संतरों पर मुस्तफा काभा और नहुम कार्लिंस्की की बेहद चार्चित किताब है द लॉस्ट ऑर्चर्ड: द पेलेस्टीनियन अरब साइट्रस इंडस्ट्री,1850-1949 जिसमें वे दिलचस्प बात उद्घाटित करते हैं कि  फिलिस्तीन के सर्वाधिक चर्चित और प्रतिनिधि कवि महमूद दरवेश की कविताओं में संतरों का ज़िक्र 67 बार आता है। 
अपनी शोध आधारित खिताब में काभा और कार्लिंस्की बताते हैं कि 1948 के पहले फिलिस्तीन में संतरे के ज्यादातर बगीचे फिलिस्तीनियों के थे लेकिन यहूदियों की आवक के कारण दोनों के बीच व्यावसायिक और आर्थिक प्रतिद्वंद्विता बढ़ती चली गई। 1948 के बाद जब बड़ी संख्या में यहूदियों ने फिलिस्तीनियों को उनके धरती से खदेड़ कर निर्वासन में भेज दिया तो बड़े जोर शोर से यह नैरेटिव चलाया गया कि यहां की धरती पर फिलिस्तीनी कभी थे ही नहीं, जो कुछ भी हरा भरा इस पर दिख रहा है वह बाहर से आकर बस गए यहूदी सेटलर के पराक्रम के कारण है। देखते-देखते जिन संतरों को दुनिया भर में फिलिस्तीनी संतरा कहा जाता था उसे इजराइली संतरा कह के बेचा जाने लगा।

किताब में काभा लिखते हैं: मैं अपने पिता के साथ पहली बार जाफा 8 साल की उम्र में गया था, उस यात्रा में मुझे बहुत निराशा हुई थी क्योंकि उस जगह को लेकर मेरे मन में जो कल्पनाएं थीं चित्र थे वास्तविकता उससे बहुत मिलती-जुलती नहीं लगी। इस बारे में जब मैंने अपने पिता से पूछा तो उनके जवाब भी बहुत संतुष्ट करने वाले नहीं थे, वह बहुत कम शब्दों में और अस्पष्ट ढंग से उनका जवाब दे देते थे जैसे मेरे सवालों को टाल रहे हों।इसके 11 साल बाद हम फिर से जाफ़ा गए। इस बार मुझे पिता ज्यादा खुले हुए और साफ-साफ बातें करते हुए दिखाई दिए ,इससे पहले मैंने उनको कभी इस तरह की स्पष्टवादिता  के साथ नहीं देखा था। मुझे मई 1948 के उस दिन के उनके बताए विवरण ने बहुत छुआ जो यहूदियों के आक्रमण के बाद वहां उनका अंतिम दिन था। उनकी बातें सुनकर मुझे बहुत दुख निराशा और पीड़ा हुई। उसके बाद में जब कभी भी जाफ़ा जाता हूं मेरा मन तरल भावनाओं के कारण बहुत भारी हो जाता है और मन ही मन में उन दिनों की तस्वीर बनाने लगता हूं जब मेरे परिवार को अचानक सब कुछ छोड़कर भागना पड़ा होगा - अपनों की लाशों को, अपने बागों को, बाजार और यहां वहां की हवा में तैरते संतरों के फूलों की खुशबू को भी।

वे आगे लिखते हैं कि आज के दौर में जाफ़ा और फिलिस्तीनी के अन्य इलाकों के पुराने संतरे के बागानों के बारे में जानकारी एकत्र कर पाना बहुत कठिन है - आधी अधूरी स्मृतियां, अभिलेखागारों के अंदर धूल भरे दस्तावेज, पुराने उखड़े हुए पेड़ ही मिलेंगे और मिलेंगे भी तो नए मालिकों के बागानों में लगे नई नई नस्लों के नए पेड़। जो इलाका पहले अपनी उर्वर भूमि, कुओं और तालाबों के लिए जाना जाता था उस पर बुलडोजर चला कर सारे बागान नष्ट कर डाले गए और सीमेंट की नई बुनियाद डाल कर ऊंचे अपार्टमेंट निर्मित कर पूरा नक्शा बदल डाला गया। ऐसे में पुरानी खुशबू को फिर से प्राप्त कर लेने की क्या ही उम्मीद की जा सकती है।

मशहूर फिलिस्तीनी पत्रकार लेखक कवि घसन कनाफानी की बहुचर्चित कहानी है ' द लैंड ऑफ़ सैड ऑरेंजेज़' जिसमें  संतरों को फिलिस्तीनी राष्ट्रवाद का रूपक बना कर प्रस्तुत किया गया है।कनाफानी मानते थे कि यह संतरे उन्हें उनकी धरती, स्मृति, उनके छोड़े हुए घर परिवार के साथ जोड़े रखते  हैं जिसमें एक दिन अपने गांव घर देश लौट कर जाने का अधिकार और संकल्प निहित है।

कहानी 1948 के नक्बा के दौरान दो बच्चों  के बीच की बातचीत से शुरू होती है। वे देखते हैं कि आस पड़ोस के परिवार के लोगों को अपने बहुत जतन से पाले पोसे और बड़े किए गए संतरे के पेड़ों को छोड़कर आनन फ़ानन में कहीं  दूर जाना पड़ रहा है। सब लोग बड़ी सी फौजी गाड़ी  में ठूँस ठूँस कर लादे  जा रहे हैं , बच्चों को उसमें बैठते हुए यह लगता है कि वे सब घर परिवार और पड़ोसियों के साथ कहीं सैर सपाटे पर  जा रहे हैं। अपनी  इस यात्रा में वे देखते हैं कि सड़क के किनारे किनारे उनके साथ संतरे के पेड़ भी चल रहे हैं - दर असल जहाँ जहाँ वे जाते हैं हर जगह संतरे के पेड़ नज़र  आते हैं तो उनके बाल मन को  लगता है कि वे भी सबके साथ साथ चल रहे हैं। 

इस संवाद के बाद यह एकदम स्पष्ट हो जाता है कि जहां कहीं भी फिलिस्तीनी जाते हैं वहां उनके साथ-साथ चलते हुए संतरे के पेड़ क्यों पहुंच जाते हैं।यह भी समझ में आता है कि जब फिलिस्तीनी औरतें बाहर के इलाकों में पहुँच कर  संतरे  खरीदती हैं तो इतनी कातर क्यों हो जाती हैं कि उन्हें रुलाई  आने लगती है? और पिता की नजर जैसे ही किसी संतरे पर पड़ती है तो वे बच्चों की तरह फफक फफक कर  रोने क्यों लगते हैं? 
कहानी में जब पूरा परिवार अपने संतरों के पेड़ों से आच्छादित जगह को छोड़कर जान बचाने को भागने लगता है तो कहानी का वाचक बच्चा अचानक सयाना  और समझदार हो जाता है और स्वयं दहाड़ें मार कर रोने लगता है। वह कोई मामूली जगह नहीं थी बल्कि सभी फिलिस्तीनियों की सामूहिक विरासत थी जिसे छोड़कर उन्हें भागना पड़ा।
लेखक इस कहानी में कहता है कि वह सभी संतरे के पेड़ जो दुनिया भर से आकर उनकी धरती पर बस गए यहूदियों   को सौंप कर पिता को भागना पड़ा उन पेड़ों की छवि उनकी दो आंखों में साफ-साफ अंकित है। अपने जीवन की गाढ़ी कमाई से हर एक पौधा जो उन्होंने खरीदा, रोपा और उसे पाल पोस कर बड़ा किया उनकी छवि उनके चेहरे पर चस्पां हैं... जब पुलिस पोस्ट पर तैनात ऑफिसर के सामने उनके सब्र का बांध टूट गया तो आंसुओं की धार में एक एक पेड़ का प्रतिबिंब साफ़ साफ़ दिख रहा था।
 
मश्हूर  फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर की कलाकृति
 
 
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(अपनी धरती से उजाड़ कर जब पूरे गांव को इजराइली अपनी फौजी गाड़ियों से लेबनान के शरणार्थी कैंपों में छोड़ने जा रहे थे तो गाड़ियों का यह काफिला बीच रास्ते में थोड़ी देर के लिए रुका।)
"सामानों के बीच किसी तरह दुबक कर बैठी औरतें गाड़ी से उतरीं और सड़क किनारे बैठ कर एक संतरा बेचने वाले के पास पहुंचीं। जब वे संतरे लेकर लौट रही थीं तो हमें दूर बैठे भी उनके सुबकने की आवाज़ बिल्कुल साफ़ सुनाई दे रही थी। मुझे तब पहली बार एहसास हुआ कि संतरे कितने प्यारे और दिल के करीब हैं और ये खूब बड़े सुंदर चमकते हुए संतरे कोई मामूली और कहीं भी मिल जाने वाली आम फ़हम चीज़ नहीं बल्कि मन और स्मृति में  खूब संजो कर रखने की चीज़ हैं। तुम्हारे पिता ड्राइवर के पीछे-पीछे गाड़ी से नीचे उतरे, एक संतरे को बहुत प्यार से अपने हाथ में लिया और देर तक किसी अनमोल असबाब की तरह ख़ामोशी से निहारते रहे... और देखते-देखते किसी बच्चे की तरह फफक फफक कर रो पड़े जैसे उनका अपने ऊपर कोई वश रहा ही नहीं।"

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फिलिस्तीनी लेखक उपन्यासकार हुजामा हबायेब अपने एक इंटरव्यू में स्मृतियों को लेकर दिलचस्प और भावुक कर देने वाली चर्चा करती हैं:

मेरे किए लेखन सामूहिक स्मृतियों की पुनर्रचना कर के फिलिस्तीनी वृत्तांत/आख्यान (नैरेटिव) को सुरक्षित बचाए रखने का एक जरिया है - इसमें छवियों, ध्वनियों, गंधों, बहुरंगी जीवन और आख्यानों को नॉस्टल्जिक भाव से साकार रूप देना शामिल है। यह प्यार और तड़प के अनवरत चलते चक्र का विस्तारित रूप है। अपनी बात समझाने के लिए मैं एक नितांत निजी अनुभव आपके साथ साझा कर रही हूँ ::

जब कभी भी मैं कोई संतरा छीलती हूँ  मुझे अपने पिता की याद आती है, वैसे उन को गुजरे हुए 5 साल से ज्यादा हो गए ।उन्हें संतरे बहुत प्रिय थे - उनका जीवन बगैर रोटी के चल सकता था लेकिन संतरे के बगैर चल जाए यह बिल्कुल मुमकिन नहीं। जब कभी मैं उनसे मिलने जाती थी वह मेरे लिए संतरे की कोई न कोई नई डिश बनाकर जरूर खिलाते थे। अब जब  कभी संतरे की सुगंध मेरी नाक में जाती है तो मुझे एकदम से सबसे पहले पिता के बचपन की याद आती है हालांकि मुझे उस समय का कुछ भी पता नहीं - न तो मैंने उस उम्र में उन्हें देखा था न उस समय की कोई फोटो मेरे पास है। सच्चाई तो यह है कि मैंने उन्हें बड़ी उम्र में ही पहली और अंतिम बार देखा था ।
1948 के नक्बा के दौरान मेरे पिता के परिवार को जाफ़ा के दक्षिण पूर्व के गांव से बेदखल कर भगा दिया गया था,तब उनकी उम्र मुश्किल से 7 साल की थी। लेकिन बचपन में जिस हादसे से उनका सामना हुआ था वह जीवन के अंतिम समय तक उनकी स्मृति में पूरी तरह से जिंदा रहा। जब वह घर छोड़कर भागे तो चलते चलते हाथ में अपने बगीचे के पेड़ का एक संतरा ले जाना नहीं भूले- एक हाथ में खूब कसकर पकड़ा  हुआ संतरा और दूसरे हाथ से अपनी मां के कपड़े ।
वे फिलिस्तीनी शरणार्थियों की पहली खेप में शामिल थे।यह कैसा विचित्र संयोग है कि घर बार से उजड़ कर विस्थापन की अनिश्चित दुनिया में दर-दर भटकने वाले मेरे पिता की नाक में इस सुस्वादु फल की मादक गंध जीवन भर बसी रही। वह फिलिस्तीन की आखिरी गंध थी जो उनके साथ साथ चलती रही। वे जीवन भर उस गंध को सजीव साकार करने और अपने साथ जोड़े रखने के लिए हर संभव यत्न करते रहे। जब भी किसी संतरे की गंध मेरे आस पास तैरती हुई आती है, उसके साथ ही मैं मन की आंखों से उस छोटे बच्चे को देखने लगती हूँ  जो  घर बार छोड़ कर भागते हुए भी अपने बाग का संतरा साथ ले जाना नहीं भूला। संतरे की उस गंध में मुझे फिलिस्तीन की गंध आती है। मेरे मन में प्यार और तड़प का यह चक्र निरंतर चलता रहता है।
किसी कृति के लिखने के दौरान सिर्फ़ शब्द मेरे दिमाग़ में नहीं होते। मैं घटनाओं को देखती हूँ , मैं संवादों को सुनती हूँ। मैं  उनकी धड़कनों को महसूस करती हूँ ।
newarab.com (05082020) से साभार

1948 के हादसे में आनन फानन में अपना घर बार छोड़कर शरणार्थी बनने को मजबूर नुहा बैटशॉ फिलिस्तीन की एक प्रतिष्ठित कलाकार और ऐतिहासिक कला संग्रहकर्ता मानी जाती हैं। 12 साल की उम्र में पेश आए हादसे ने उनके ऊपर इतना असर डाला कि उनकी याददाश्त खो गई। उनसे उनके लिखे विवरणों और बातचीत के आधार पर तैयार की गई सामग्री का जब वास्तविक संदर्भों से मिलान किया गया तो आश्चर्यजनक रूप से दोनों में पर्याप्त समानता पाई गई। उन्होंने अम्मान में रहते हुए अपने जीवन के ब्योरों को एकत्र कर एक किताब में संकलित किया जिसका शीर्षक है: "ए नन विदाउट ए मोनेस्ट्री"
यहाँ प्रस्तुत है उनका एक संस्मरण :
"एक बार की बात है मैं रोम से सोरंटो की यात्रा कर रही थी। पूर्व दिशा से समुद्री हवा आ रही थी जिसमें मेडिटरेनियन सागर , जाफा पोर्ट और संतरों की गंध समाई हुई थी। मैंने गाड़ी का शीशा खोला तो मेरी नाक में संतरों के फूलों की मादक गंध भर गई। उसके बाद मुझे पता नहीं क्या हुआ- बस इतना जानती हूँ  कि मैंने  खुद को आपे से बाहर होकर सुबकता हुआ पाया। मुझे ऐसा लगा कि अपने गांव घर को छोड़कर आते समय दहशत की जिन अनुभूतियों से मैं रू ब रू हुई थी वह अचानक फिर से जीवित हो गईं । सबसे ज्यादा ताज़्जुब की बात तो यह है कि इस गंध ने मेरी मरणासन्न स्मृतियों को फिर से जिंदा कर दिया.....
जो हमारा बाग था उसमें मेरे पिता ने एक बड़ी सी टेबल रखी हुई थी। वह गिनती से संतरे और तरबूज खरीदते थे उसके बाद थैलों में भरकर गधे की पीठ पर दोनों तरफ लटका कर बेचने ले जाते थे। तरबूजों को हम अपनी खाट के नीचे ठंडा होने के लिए रखते थे और संतरों को बाहर ही टेबल पर छोड़ देते थे। स्कूल से लौटने के बाद हम संतरों को निचोड़ कर अपने पीने के लिए रस निकालते।
संतरे की एक प्रजाति लंबी होती थी जिससे हम लैंप बनाया करते। पहले उसको ऊपर से काटते, उसके बाद अंदर से गूदा निकाल कर फेंक देते ...उसकी धड़ पर छोटे-छोटे छेद बनाते और अंदर मोमबत्ती रखकर जला देते। उन छेदों से छन कर बाहर आती हुई रोशनी कमरे को रोशन कर  पढ़ाई में हमारी मदद करती।"
वे अपनी बातचीत में जाफ़ा में बिताए दिनों  को बहुत शिद्दत से याद करतीं और उनमें बार-बार संतरों का ज़िक्र होता - ऐसा लगता जैसे संतरों की गंध उनके शरीर में अंतरात्मा तक समाई हुई है। उन्होंने अपने बचपन के दिनों के फोटोग्राफ बहुत संभाल कर रखे थे जिसमें संतरे प्रमुखता से दिखाई देते हैं।
रोम से सोरंटो की यात्रा के दौरान जब उनकी स्मृति धीरे-धीरे लौटने लगी तो अपनी पीड़ा को दर्ज़ करने की गरज़ से उन्होंने उन्हें डायरी के पन्नों में लिखना शुरू किया जो बाद में किताब के रूप में छपकर सामने आया।बाद में उन्होंने पत्रकारिता की पढ़ाई की और बीबीसी और जॉर्डन टीवी सहित अनेक मीडिया समूहों में काम किया और बाद में अम्मान जाकर बस गईं।
फिलिस्तीनी म्यूजियम में उनके उपलब्ध दस्तावेज और संग्रह प्रमुखता से प्रदर्शित  है।
(http://raseef22.net/english/  में प्रस्तुत सामग्री के आधार पर)

संतरे का उपयोग अपनी पेंटिंग में जब कोई बड़ा कलाकार करता है तो वह राष्ट्रीय और राजनीतिक प्रतिरोध के तौर पर होता है और इस बारे में बात करते हुए लोग मानते हैं कि जाफा के संतरे जो ऐतिहासिक रूप से फिलिस्तीनी संतरों के रूप में पूरी दुनिया में मशहूर थे, 1948 के कब्जों के बाद से इजराइल ने बड़े जोर शोर से उन संतरों को इजराइली उत्पाद  कह के बेचना शुरू किया। विजुअल आर्ट में संतरों  की उपस्थिति ऐसे इजराइली नैरेटिव का प्रतिकार है और बडे़ नामचीन कलाकार इन कृतियों के माध्यम से अपने फिलिस्तीन देश पर फिर से दावा ठोंकते हैं, उसके साथ अपना रिश्ता दर्ज करते हैं। 

मशहूर फिलिस्तीनी कलाकार स्लीमन मंसूर ने जाफा के संतरों को लेकर अनेक पेंटिंग बनाई है लेकिन उनकी "जाफ़ा" (1979) इस विषय पर बनाई गई सर्वाधिक चर्चित कलाकृति है जिसमें पारंपरिक परिधान पहने एक सुंदर फिलिस्तीनी स्त्री संतरों से भरी टोकरी लिए हुए है, पृष्ठभूमि में अनेक अन्य स्त्रियां बाग के पेड़ों से संतरे तोड़ रही हैं। मंसूर अपने बचपन के दिनों में देखे संतरे के बगीचों को याद करते हैं और इन कलाकृतियों के माध्यम से दर्शकों को अपने प्यारे समृद्ध फिलिस्तीन के खूबसूरत और शांतिप्रिय लोगों को दिखाना चाहते हैं।

वॉशिंगटन में फिलिस्तीन म्यूज़ियम शुरू करने वाले अहमद हमीदत ने ' री इमेजिनिंग ए फ्यूचर' श्रृंखला में जाफ़ा के संतरों को केन्द्र में रख कर अनेक पेंटिंग बनाई है। इन कलाकृतियों में वे उन सुनहरे दिनों को याद कर रहे हैं जब भविष्य में एक बार फिर से फिलिस्तीन की धरती पर फिलिस्तीनी काबिज़ होंगे और अपने संतरों के निर्यात से पूरी दुनिया को लुभाएंगे। उनका मानना है कि उनके माध्यम से वे फिलिस्तीनियों के अपनी धरती पर लौटने की संकल्प रेखांकित कर रहे हैं और उन्होने संतरे को फिलिस्तीनी पहचान और स्मृतिलोक के रूपक के तौर पर देखा है।

यादवेन्द्र 
पूर्व मुख्य वैज्ञानिक
सीएसआईआर - सीबीआरआई , रूड़की

पता : 72, आदित्य नगर कॉलोनी,
जगदेव पथ, बेली रोड,
पटना - 800014 
मोबाइल - +91 9411100294 




 

Friday, July 24, 2026

यात्रा संस्मरण : दिनेश चंद्र जोशी



 

 


 

 
(दिनेश चन्द्र जोशी का एक संस्मरण ‘सिडनी से केनबरा’ इस ब्लॉग में प्रकाशित हो चुका है। इस बार वे लखनऊ को  एक नये अन्दाज में याद कर रहे हैं. इसमें उनका व्यंग्यकार भी यात्रा के बीच कभी कभी अपनी झलक दिखा जाता है ) 
 

            बेगाना शहर

 

          
मशहूर शायर हसरत मोहानी की पंक्तियां अक्सर जेहन में घुमड़ती रहती हैं,

'भुलायी न जा सकेगी कभी 
हसरत इसकी तल्खी
वो लखनऊ की शामें वो मुलाकातें।'

और भी

'कशिश ए लखनऊ अरे तौबा!
फिर वही हम,वही अमीनाबाद।'
'यगाना चंगेजी'

इस बार मैने खुद अपने अशआर कहे,लगभग पचास साल पहले के अपनी किशोरावस्था व युवावस्था के दिनों में अजीज रहे शहर लखनऊ के बारे में।

'मैने क्या छोड़ा तुझे लखनऊ 
तू इस कदर बेगाना हुआ कि 
मुझे अब पहचानता नहीं।'

सचमुच लखनऊ ने इस बार मुझे पहचानने से इंकार कर दिया। या कि उसकी शक्ल इस कदर बदल गई थी कि मैं ही उसके पुरानी सड़कों, गलियों दरो दीवारों को ढूंढने की असफल कोशिश करता झुंझलाता व खींजता रहा था।
पहले तो बेगानापन वहीं से शुरू हो गया जब ट्रेन के रुट में बदलाव के कारण हमारी ट्रेन चिरपरिचित चारबाग स्टेशन न रुक कर आलमनगर स्टेशन पर रूकी और लखनऊ की सारी  सवारियों को वहीं उतरना पड़ा।
आलमनगर से मेरा ज्यादा वास्ता पचास साल पहले भी नहीं रहा,जब मैं लखनऊ में पढ़ता था,किशोर और जवान वहीं हुआ। हां, नाम जरुर सुना था,आलमनगर का। जानकीपुरम, तालकटोरा औद्योगिक क्षेत्र में तब शुरुआती बसाहट निर्मित होने लगी थी। बेरोजगारी के दिनों में तालकटोरा में नौकरी ढूंढने की सलाह मिलने लगी थी।
मेरा वास्ता अपने रिहाइशी इलाके गोमती पार के  निशातगंज,महानगर, बादशाह नगर,अलीगंज चांदगंज,निरालानगर,बाबूगंज डालीगंज से अधिक था।
ट्रेन से उतरने के बाद ओटो वाले ने जिस रुट से हमें आधे घंटे में अपने गंतव्य अलीगंज के चर्च रोड की देवलोक कालोनी में पंहुचा दिया उसका शुरुआती  हिस्सा स्टेशन के बाद जानकीपुरम मुहल्ले से गुजरता हुआ लंबे फ्लाई ओवर ब्रिज को पार कर एक पतली ऊबड़खाबड़ गली थी,जो घनी मुस्लिम बस्ती प्रतीत हो रही थी, उसका शार्ट कट लेकर ओटो वाले ने हमें मेन रोड पर पंहुचा दिया,जो मेरी परिचित थी,मेडिकल कॉलेज से डालीगंज पुल को जाने वाली सड़क। मुस्लिम बस्ती वाली गली के बारे में पूछने पर आटो वाले ने सिर्फ इतना बताया,ये इमामबाड़े के पीछे वाला इलाका है,आप चिंता मत करो मैं अभी लिए चलता हूं आपको डालीगंज बाबूगंज होते हुए अलीगंज।
बचपन में मैं इमामबाड़ा तो कई बार आया था,साइकिल से दोस्तों के साथ। लेकिन उसके पिछवाड़े की इस गली को नहीं पहचान पा रहा था। शहर अपने मुख्य चेहरे के पीछे कितने और चेहरे छिपाये रखता है,इसका अह्सास आज वरिष्ठ नागरिक हो जाने के बाद वर्षों पहले के अपने रिहाइशी शहर की धमनियों को तलाशने की जिज्ञासा और उत्साहवश हो रहा था।
डालीगंज पुल के बाद तो मैं,साथ बैठी पत्नी को गाइड की तरह बताने लगा, ये देखो पुराना डालीगंज बजार है,इसी रास्ते से हम लोग साइकिल
चलाते हुए जुबली इंटर कालेज में पढ़ने आते थे,महानगर से। कम से कम आठ दस किलोमीटर तो होगा ही सिटी स्टेशन के पास स्थित तब के लखनऊ का प्रसिद्ध राजकीय इंटर कालेज।
पत्नी लखनऊ से ज्यादा परिचित नहीं थी,उसका मायका इलाहाबाद था। वह बड़े गर्व से इलाहाबाद के अपने क्रास्थवेट स्कूल के किस्से सुनाया करती थी। आज मैं उसे साक्षात अपने स्कूल की छवि व वहां के रास्तों की सैर करा रहा था।
मैं उसे बता रहा था ये देखो बायें हाथ में रामाधीन सिंह कालेज है,यहां हमारा हाईस्कूल बोर्ड का सेंटर पड़ा था। इससे आगे आई.टी कालेज का चौराहा है।
वहां से बायें निरालानगर होते हुए चांदगंज रेलवे फाटक को पार कर हम अलीगंज के हनुमान मंदिर होते हुए महानगर के सेक्टर सी में स्थित अपने घर पंहुच जाते थे,सरपट साइकिल चलाते हुए। 
लेकिन इस बार आटो वाला हमें आई.टी चौराहे से न लाकर पहले ही बाबूगंज वाली सड़क से बायां टर्न लेकर विवेकानंद हास्पिटल के ऊपर बन गये फ्लाई ओवर से सीधे कपूरथला अलीगंज में ले आया। मैं देखता ही रह गया। मेरा पुराना रूट तो अनदिखा ही रह गया। संभवत: 'वन वे' कर देने से ऐसा हुआ था। फ्लाई ओवर के कारण मेरा पुराना चिरपरिचित चांदगंज का रेलवे फाटक भी नजर नहीं आया,और हम सीधे अलीगंज हनुमान मंदिर होते हुए अलीगंज की संकरी बजार से गुजर कर कुर्सी रोड पर आ गये थे। 
मेरा गंतव्य वहीं कहीं था। चर्च रोड पर स्थित देवलोक कालोनी। गूगल लोकेशन डालने से ओटो वाले को सुविधा हो गयी। थोड़ी ही देर में उसने कालोनी के गेट पर पंहुचा दिया था। मैने घड़ी देखी, ठीक छत्तीस मिनट में उसने हमें आलमनगर से कुर्सी रोड पहुंचा दिया था। मैं सोच रहा था अगर ट्रेन हमें सामान्प दिनों की तरह चारबाग मेन स्टेशन भी उतारती तो हुसैनगंज, विधान सभा, सिकन्दर बाग,गोमती ब्रिज,निशातगंज वाले मुख्य मार्ग से इससे ज्यादा वक्त लग जाता।


आलमनगर वाले स्टेशन के डायवर्जन के कारण पैदा हुई दुश्चिंता काफूर हो गयी थी,उल्टा मुझे इमामबाङे के पीछे की गली वाला शार्ट कट भी पता चल गया था।
पैंतालीस पचास साल बाद शहर का हुलिया कितना अधिक बदल जाता है। वे मेरे छात्र जीवन के किशोरावस्था और युवावस्था की दहलीज के दिन थे। सन पचहत्तर में  इमरजैन्सी के दिनों में मैं जुबली इंटर कालेज में ग्यारहवीं का छात्र था।  बगल में सिटी स्टेशन था,उसके उल्टी तरफ के बजार में लारी खानदान की बड़ी सी कोठी थी। ये लखनऊ का बड़ा राजनीतिक खानदान है,यह बात बहुत बाद में पता चली। तब तो सिर्फ  बड़ी सी कोठी और 'लारी' जैसा विशेष टाइटिल देखकर ही हम लड़के आकर्षित होते थे। जुबली कालेज की चढ़ाई पर हम साइकिल से उतरते थे,और 'डयोड़ी आगामीर','ड्योड़ी आगामीर' हमको भी बना दे वजीर' रटते हुए चढ़ाई चढ़ते हुए अपनी थकान भगाते थे। 
दरअसल उस सारे इलाके का नाम नवाब के वजीर आगामीर के नाम पर रक्खा हुआ  था।
यह तथ्य हमें बहुत  बाद में पता चला। हम नासमझ तब डयोड़ी आगामीर शब्द का महत्व नहीं जानते थे और पहले से चले आ रहे मुहावरे को रटते जाते थे।इमरजैंसी के प्रभाव की तब ज्यादा अकल तो नहीं थी,हां इतना जरुर हमें अह्सास  हो गया था कि कोई  धारा लग गई है एक साथ पांच जने इकट्ठा खड़े नहीं हो सकते। हम स्कूली बच्चों ने झुंड में सिटी स्टेशन के प्लेटफार्म पर जाना छोड़ दिया था। हाई स्कूल की परीक्षा मैने निशातगंज के माध्यमिक विद्यालय से पास की थी। गोमती पुल के ऐन किनारे स्थित यह विद्यालय पहले जे.बी.टी.सी के नाम से जाना जाता था। 
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कुर्सी रोड का यह इलाका चर्च रोड तब नया नया विकसित हो रहा था। पुराने हनुमान मंदिर से आगे कुछ नहीं था,खेत व झाड़ियां थी। मंदिर तक हम आते थे बस,उससे आगे नहीं। कुर्सी रोड आगे गुड़म्बां तक जाती है, बस इतना पता था। बगल की विष्णुपुरी कालोनी में इक्का दुक्का बसाहट शुरू हो चुकी थी।सन अस्सी के बाद फिर तेजी से विस्तार हुआ होगा। सन बयासी में नौकरी लग जाने के बाद मेरा लखनऊ से नाता टूट गया। उसके बाद तीन चार बार आना जाना हुआ लेकिन दो तीन दिन के वास्ते संक्षिप्त दौरा निजी व्यस्तता के साथ,सो शहर के बदलाव को तसल्ली से जानने समझने का मौका नहीं मिल पाया। इस बार अवकाशप्राप्त बुजुर्ग होकर अपने बचपन के शहर में थोड़ा तसल्ली के साथ आया हूं। हलांकि जून माह की गर्मी के दिन हैं,ज्यादा सैर सपाटे की गुंजाइश नहीं है,फिर भी बाहरी बाहर टैक्सी और ओटो में घूमता हुआ नजारा ले रहा हूं बदलाव का। बड़ा अच्छा लग रहा है,आधुनिकता और अथाह निर्माण से भीड़ और वाहनों के कोलाहल से खीझ भी पैदा हो रही है। हालांकि शहर की  शक्ल का कायापलट हो चुका है,फिर भी जो पुराने घर बजार हू बहू बचे हैं,उन्हें देखकर भावुकता से मन भींग जा रहा है।
समय का इतना लंबा वक्फा हमें कितना बदल देता है, हमारी तब की मासूम शक्ल और सुगठित शरीर भी कितना जीर्ण शीर्ण हो जाता है,आंखों में वह उत्साह व चमक नहीं रहती, पैरों में साइकिल से सरपट भागने की जान नहीं होती। अब साधन सम्पन्नता है,तब फाके मस्ती थी। चलो कुछ नहीं तो टैक्सी या ओटो हायर कर शहर की पुरानी देखी भाली जगहों की बाहरी बाहर सैर तो की ही जा सकती है। इस बार की यात्रा में इतना तो किया और  उमंग उत्साह वाली अपनी 'टीन एज' उम्र में जिये शहर की भरपूर यादें ताजा की।
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अलीगंज के चर्च रोड की जिस कालोनी मैं इस बार मेहमान बन कर  सपत्नीक आया था,वहां हफ्ते भर का पारिवारिक आयोजन था। 
आयोजन से समय निकाल कर शहर में घूमने हेतु पर्याप्त समय था, हां जून माह की गर्मी जरूर बाधा थी। पहले दिन देर शाम को अकेले पैदल निकल गया। पास में ही डंडैया मार्केट थी। सत्तर के दशक में डंडैया मार्केट को हम लोग डंडैया बजार कहते थे वह उस इलाके की सब्जी मंडी थी। बजार में सड़क के इर्दगिर्द आज की तरह असंख्य दुकानें व भीड़भाड़ नहीं थी। दूर दूर कुछ मकान जरुर थे। आस पास गांवों के लोग सड़क के किनारे जमीन पर ताजी सब्जियों की ढेरी लगाते थे। महानगर के सेक्टर सी से यह बजार बहुत पास थी,हम लोग अक्सर घर के लिए सब्जी लेने डंडैया बजार आते थे साइकिल में।
इस बार मेंहदी टोला वाली गली से पूछते हुए डंडैया मार्केट पंहुचा। 
‘भैय्या,डंडैया बजार निकल जायेगा ये रास्ता?’
 ‘कहां जाना है डंडैया में’ 
'कोई खास जगह नहीं,वहां जहां बहुत पहले सब्जी मंडी लगती थी।'
'हां,हां सीधे चलते जाइये आ जायेगा बजार।'
मेंहदी टोला से चलते हुए मैं डंडैया बजार पंहुच गया था। वहां वो,जमीन पर बैठने वाले सब्जी वाले कतई नहीं दिखे,बल्कि घने व्यवसायिक बजार की भीड़भाड़ व चहलपहल नजर आई। पुरानी पहचान का कोई भी घर दुकान नहीं थे,सब कुछ नया बिल्कुल अजनबी माहौल था। होता भी क्यों नहीं,चालीस साल में क्या कुछ नहीं बदल जाता।
डंडैया बजार पर मैने कवितानुमा पंक्तियां रच दी।

'पचास साल बाद
मैं उस डंडैया बजार
को ढूंढ रहा हूं
जहां पर ऊबड़ खाबड़
अधकच्ची रोड पर गांव 
के लोग ताजी सब्जियों
के ढेर सजा कर रखते थे।
कुछ नहीं था, वहां
न दुकानें,न होटल न माल
इक्का दुक्का कुछ घर थे
सड़क के इर्द गिर्द ।
अब नहीं है वो सब्जी मंडी
दुकानें ही दुकानें हैं,भीड़ है
ठेलियां हैं। मैं पूछता हूं
एक युवक से 
'भैय्या पुराना डंडैया बजार 
यहीं था,कहां गया होगा'
'किसी बुजुर्ग से पूछो अकंल
मैं तो तब पैदा ही नहीं हुआ था
मुझे नहीं मालूम कैसा था
पुराना डंडैया बजार
अब तो यह डंडिया मार्केट है।'
सचमुच अब वहां मार्केट था
मैं ही बजार ढूंढने वाला
जईफ पगलट था।'
         
  
बहरहाल अपने जमाने की जगहों की  शिनाख्त के लिए मैं आगे बढता हुआ अलीगंज की मुख्य बजार से होते हुए आई.टी.आई तिराहे की ओर चल पड़ा। इस बजार का हुलिया अमूमन वैसा ही था, दुकानें पहचान में आ रही थी। वर्मा ज्वैलर वालों एक लड़का हमारा सहपाठी था,उसकी दुकान में हम लड़कपन में आ जाते थे। वो दुकान वैसी ही थी। थोड़ी राहत मिली परिचित जगहों को पाकर अच्छा लगा।
आई.टी.आई तिराहे पर बन गया नीरा गुप्ता क्लिनिक शायद तब के उस इलाके के एकमात्र होम्योपैथिक डाक्टर गुप्ता के परिवार व बहू बेटों का था। डा. गुप्ता बड़े लोकप्रिय,सौम्य सुदर्शन सज्जन थे। उनकी छवि अभी भी हू बहू मनो-मस्तिष्क में संचित है,वे लाल मैरुन रंग के लम्ब्रेटा स्कूटर से चलते थे। निशातगंज में भी उनकी क्लिनिक थी। चलते चलते मैं अलीगंज के प्रसिद्ध हनुमान मंदिर के गेट तक चला आया। उसके समाने की पुरानी इमारत जर्जर खंडहर हो चुकी थी,उसके अवशेष अभी मौजूद थे।
इस मंदिर के दर्शन व शरारत भरे लड़कपन की बातें याद आते ही मेरे चहरे पर भावुकता भरी मुस्कान तिर आई। मंगल के दिन दर्शनार्थियों की बहुत भीड़ रहती थी,और बड़े मंगल की तो पूछिये ही मत। दूर दूर बाराबंकी,फैजाबाद, सीतापुर हरदोई, उन्नाव से भक्त गण जमीन में लेट कर सड़क नापते हुए आते थे और जेठ के महीने के बड़े मंगल में मंदिर में पंहुच कर दर्शन करते थे।
हम तीन चार लड़के मंदिर के दर्शन के बहाने घर से पुरानी चप्पल पहन कर निकलते थे और मंदिर के बाहर लगे जूते चप्पलों के ढेर से बढ़िया नयी चप्पल या सेंडिल पहन कर लौट आते थे। हमारे लिए यह बड़ा एडवेंचर भरा खेल व शरारत जैसा था।
आज उस शैतानी की याद आते ही नादानी पर पश्चात भी हो रहा था,हंसी भी आ रही थी।
इस चप्पल चोरी प्रसंग के साथ हाल ही में पढ़ी काजी नजरूल इस्लाम की वह प्रसिद्ध रूबाई याद आने लगी, जिसका अर्थ था,
'हम बहुत श्रद्धा से मस्जिद में आये हैं
लेकिन खुदा की कसम नमाज पढ़ने नहीं
जो चटाई  यहां से चुराई थी,
वह पुरानी हो गयी है
अब नयी चटाई  चुराने आये हैं।'
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कहां की हरकतें स्मृति के किन संदर्भों से तार जोड़ देती हैं। हनुमान मंदिर में शांति थी,रात के उस वक्त भक्तों की भीड़ नहीं थी,मैने प्रसाद के लड्डू लिये और दर्शन किये। मंदिर की तब की व्यवस्था और साफ-सफाई में जमीन आसमान का अंतर था। लंबे गलियारे में कार्पेट बिछा था, मूर्ति के पास भी सजावट सुरुचिपूर्ण थी। संभवत: भीड़ के न होने से माहौल बहुत शांत व आनन्ददायक लग रहा था।
पहले लड़कपन में हम लोग हनुमान चालीसा की चौपाई पढ़ते हुए सेकिंड या अधिक से अधिक गुड सेकिंड डिविजन पास होने की कामना करते थे।
इस बार बुजुर्ग होने के कारण मैं खुद के अच्छे स्वास्थ्य,परिवार व बच्चों के भले की कामना कर रहा था। अपनी बचपन की शरारतों हेतु बजरंगबली से माफी मांग रहा था।                
उस शाम चर्च रोड के देवलोक कालोनी से अपने पुराने डंडैया बजार को ढूंढने की जिज्ञासा मुझे हनुमान मंदिर तक ले आई,यह बड़ी बात थी।मैने मंदिर सहित उसके सामने के प्राचीन खंडहरों के फोटो लिए, मंदिर से अधिक वे पुराने घर खंडहर मुझे सम्मोहित कर रहे थे,जिनके सामने मैने बचपन में सैकड़ों बार दौड़ लगाई थी,कभी पैदल कभी साइकिल से। रात हो जाने से सूरज की रोशनी के अभाव में फोटो धुंधले आये,लेकिन इतने सालों बाद पुराने दरो दीवारों,घरों,खंडहरों से मेरी मुलाकात की तस्दीक तो कर ही रहे हैं।  मंदिर के दर्शन कर मैं  पैदल चलते चलते अलीगंज बजार डंडैया होते हुए मेजबान के घर लौट आया।
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अगले दिन शाम को मैं पत्नी के साथ महानगर के सेक्टर सी में स्थित उस घर में गया जहां मेरी किशोरावस्था के  बाद की स्कूली शिक्षा से लेकर इन्जीनियरिंग डिप्लोमा तक की शिक्षा दीक्षा हुई।
मेरे बड़े भाई के ससुराल वालों का वह घर उसके गृहस्वामी लोहनी जी ने सन 1958 में बना लिया था। महानगर जैसे संभ्रांत इलाके में उस जमाने में जमीन खरीद कर घर बनाने वाले लोहनी जी कितने पुरूषार्थी व दूरदर्शी व्यक्ति रहे होंगे,यह बात अब मुझे समझ आ रही है।
आठ भाई बहिनों के उस परिवार में मैं भी उसी परिवार के सदस्य की तरह रहने लगा था। अब बुजुर्गों व तीन भाइयों के गुजर जाने के बाद व बच्चों के बंगलोर,नोएडा,विदेशों आदि में बस जाने के बाद भी उस घर में ताला नहीं लगा था। लोहनी जी की दो बहुएं उन दिनों उस घर में मौजूद थी,मेरे घर के अंदर जाने व स्वागत की गुंजाइश थी।
पत्नी के साथ अपने उस पुराने आशियाने में जाने पर वे आत्मीय व खुशमिजाज व स्नेहिल महिलायें बहुत खुश हुई। 
काफी देर तक घर परिवार की बातें हुई। मैने उस घर के एक एक कमरे,बरामदे,स्टोर,कोठरी,रशोई में जाकर अपने बचपन की यादों को दोहराया। उस घर में मेरे प्रवेश के  सात आठ साल बाद ब्याह कर आई उन जेठानी देवरानियों को बताया कि यहां पर पहले पारिजात का पेड़ था,यहां पर तीन डाली वाले फूल का पेड़ था,जो संभवत: उन्होंने ने भी नहीं देखा था।
सौभाग्य की बात थी कि वह घर अभी तक बिका नहीं था,उसी परिवार के पास था,वर्ना उसके अगल बगल वाले ज्यादातर घर बिक कर उनमें मल्टी स्टोरी काम्प्लेक्स बन गये थे।
घर के सामने की साठ फिट चौड़ी सड़क को देख कर मैं चकित था,हम लोगों को बाद में इतनी चौड़ी सड़क वाले मुहल्लों में रहने का अवसर नहीं मिला।मुश्किल से बीस तीस फिट चौड़ी सड़क वाले घरों में हम रह रहे थे।
यह मेरा परम सौभाग्य थी कि महानगर लखनऊ के  'पास' इलाके में  आत्मीय रिश्तेदारी के उस सांस्कृतिक व सुशिक्षित घर में बचपन के बाद किशोरावस्था व यवावस्था के मेरे जीवन के निर्माणकर्ता दस बारह साल बीते। जीवन में साहित्य के प्रति अभिरुचि व संस्कार भी उसी घर के कारण पड़े। घर में साप्ताहिक हिंदुस्तान, धर्मयुग,नवनीत जैसी पत्रिकायें आती थी। स्वयं गृहस्वामी लोहनी जी की आकाशवाणी से वार्ताएं प्रसारित होती थी। पढ़ने लिखने गायन वादन ,नृत्य नाटक का माहौल था। इस कारण मुझे भरपूर सुविधायें प्राप्त हुई। उस घर की दुछत्ती में रक्खे एक वृहद हिंदी शब्द कोश व दो बड़े विशाल 'वर्ल्ड एटलसों के पन्ने पलटने की स्मृति अभी भी मेरे मस्तिष्क में संचित है। अपनी शब्द सामर्थ्य व दुनिया के भूगोल की जानकारी में रुचि का श्रेय मैं उन्हीं ग्रन्थनुमा पुस्तकों को देता हूं।
सन तिरासी के बाद दो तीन बार सूक्ष्म समय के लिए मैं इस घर में आया था,आज लगभग बीस साल बाद फिर पुन: गया हूं।
जीवन का चक्र हमें कहां कहां घुमाता है, हम कहां जन्म लेते हैं, कहां बचपन बीतता हैं,कहां शिक्षा दीक्षा होती है,कहां नौकरी लगती है,यह सब हमारे हाथों में नहीं रहता। हां,जीवन के पच्चीस तीस साल के बाद का समय हमारा मुकम्मल निवास, हमारी नौकरी या व्यवसाय का क्षेत्र तय कर देता है।
सन तिरासी मैं देहरादून में स्थाई  केंद्र  सरकार की  नौकरी लग जाने के बाद वहीं बस जाने व वहीं से अवकाश प्राप्ति हो जाने के कारण मुझे चालीस से अधिक वर्षों तक लगातार रहते हुए देहरादून का निवासी कहलाने का अधिकार प्राप्त हो गया है। 
मैं अब साधिकार खुद को देहरादून वासी कहता हूं,
लेकिन अपने पुराने जिये शहरों को खुद से अलगाने का अधिकार भी मुझे क्यों मिलना चाहिए। 

                      


तब के महानगर की अनगिनत यादें स्मृति में दर्ज है।
इसी सेक्टर सी के पीछे उन्हीं दिनों विज्ञान पुरी कालोनी निर्मित हो चुकी थी। हाकी के सुप्रसिद्ध खिलाड़ी के.डी सिंह बाबू वहीं रहते थे। उन्हीं सालों में उन्होंने विज्ञान लोक के निवास में दुखद आत्महत्या की थी। इस घटना से हम सब स्तब्ध थे।
ब्रिगेडियर यू.सी पंत का बंगला रहीमनगर रोड पर था। सुदर्शन काया के वह सेनाधिकारी हाथ में स्टिक लेकर प्रात: काल घूमते हुए आमजन से बातें भी करते थे। वायरलेस चौराहा से संत मार्केट की ओर आने पर साहित्यकार भगवतीचरण वर्मा का घर 'चित्रलेखा' था। उनके घर के बगल वाले खाली प्लाट में हम लोग खेलते थे और अमरूद तोड़ कर खाते थे।भगवती बाबू  सफेद कुर्ता पाजामा पहने वायरलैस चौराहे पर चार न. के गणेश टैंम्पू से उतर कर पैदल 'चित्रलेखा की ओर आते थे। साथियों के साथ मैने भी कई बार उनको चरण स्पर्श किया है।
वायरलेस चौराहा से गोल मार्केट की जाने पर 'मोहन मेकिन्स' वालों का बड़ा सा बंगला 'मोहन्स'
नाम से था। और आगे जाने पर यशपाल जी का घर था। बाहर नेम प्लेट पर बड़े से अक्षरों में 'यशपाल' लिखा था। यशपाल जी को भी लाठी टेक कर चलते हुए देखे की याद है। महानगर पोस्ट आफिस के बगल में ही साहित्यकार कुंवर नारायण रहते थे,यह बात मुझे बहुत बाद में पता चली।
इसी रोड में बायें हाथ में अंदर जाकर 'सेक्टर बी' में मुख्यमंत्री एन.डी तिवारी रहते थे। उनके घर के बगल वाले प्लाट में पुलिस का टैंट गड़ा था,जिसमें सुरक्षाकर्मी तैनात रहते थे। वह दुमंजिला घर असल में उनके ससुर गंगा दत्त सनवाल जी का था,डा.सुशीला तिवारी के पिता। मैं बुजुर्ग सनवाल जी से मिला हूं। होली के दिन महानगर के पर्वतीय लोगों की साथ जाकर तिवारी जी को गुलाल लगाने व गले मिलने की याद है। उनकी तोंद के टकराने के कारण गले मिलने में आई बाधा का ध्यान भी है। शायद तब वह पद पर नहीं थे। 1976 में पहली बार उनके मुख्यमंत्री बनने पर बड़े से खाली प्लाट में महानगर वासियों ने उनका सम्मान किया था, मैदान में तब बहुत भीड़ थी। उनके पी.ए चमोली क्षेत्र के मूल निवास मेहता जी काफी लोकप्रिय थे। मेहता जी के  तीन चार पुत्र गण सामाजिक कार्य में काफी सक्रिय रहते थे। बहुत बाद में तिवारी जी का अपना निजी घर महानगर में कहीं और बना,वह घर मैने नहीं देखा है।
सन 1972 में, मैं मुरादाबाद के हरथला से सातवी कक्षा पास करने के बाद भाई साहब के साथ लखनऊ आया था। लखनऊ आने के बाद स्मृतियों से न मिटने वाली दो घटनायें अभी भी विचलित करती हैं। एक तो भयंकर बाढ़ की याद है। गोमती नदी का पानी निशातगंज,पेपरमिल कालोनी,बादशाह नगर होते हुए महानगर तक आ गया था। नावें चलने लगी थी,फूड पैकिट बंटने लगे थे। कुकरैल का पानी भी सचिवालय कालोनी व पी.ए.सी लाइन की ओर आ गया था। बादशाह नगर कालोनी के भूतल में रहने वाला एक परिवार शरण लेने हमारे घर में आया था। 
कुकरैल नाले में तब गंदगी नहीं थी। यह एक निर्जन नदी की भांति शांत बहती थी। पानी जरुर रेतीला बलुई था। गर्मी के दिनों में हम बच्चे कुकरैल में तैरना सीखने जाते थे,और उस पार के फाट जहां अब कूर्माचल नगर बस गया है,से कुकरैल में छलांग लगाया करते थे। कुकरैल के उद्गम स्थल को मगरमच्छ कहते थे। वह सुदूर पश्चिम की तरफ घने पेड़ों और झुरमुटों के मध्य स्थित जगह थी।
कुकरैल के बारे में एक किवदंती यह थी कि कुत्ते के काटे हुए किसी व्यक्ति को इसमें नहलाने से वह रोगमुक्त हो जाता है। कहते थे दूर दूर से लोग कुकरैल में इस निवारण हेतु मरीजों को लाकर नहलाते थे।
सन तेहत्तर में लखनऊ का कुचर्चित पी.ए.सी विद्रोह हुआ था। इस विद्रोह के दौरान पी.ए.सी.के जवानों व राज्य पुलिस के बीच भीषण युद्धनुमा संघर्ष छिड़ गया था। गोलियों की आवाज महानगर से सटे पी.ए.सी लाइन से हमें भी सुनाई देने लगी थी। बड़ा दहशत का वातावरण छा गया था। पी.ए सी. के जवानों ने तनख्वाह बढ़ाने व अन्य मांगों को लेकर विश्वविद्यालय के छात्रों की मदद से सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह शुरू कर दिया था। यह घटना आजादी के बाद भारत के इतिहास में पहली असाधारण घटना थी।
इस विद्रोह को कुचलने के लिए सेना व अर्ध सैनिकों को बुला लिया गया था। सरकार के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी हो गयी थी। कमलापति त्रिपाठी  मुख्यमंत्री थे। उनकी सरकार भंग करके राष्ट्र पति शासन लागू कर दिया गया था। 
इस विद्रोह के कारण हुई असुरक्षा के कारण पी.ए.सी क्वार्टरों में रह रहा एक परिचित परिवार भी महानगर में मेरे रिश्तेदार लोहनी जी के यहां रहने आया था।
राष्ट्रपति शासन के पश्चात हेमवती नंदन बहुगुणा मुख्यमंत्री बने थे।1975 में इमरजेन्सी के दौरान  संजय गांधी की नीतियों के कारण इन्द्रा गांधी से मतभेद होने के कारण उन्होने इस्तीफा दे दिया था।
बहुगुणा जी इतने तेज तर्रार व लोकप्रिय नेता थे कि लोग कहने लगे थे,उनकी वजह से इंद्रा गांधी को अपनी गद्दी खतरे में नजर आने लगी है।
बहुगुणा जी ने सन 1977 में जगजीवन राम के साथ  मिलकर 'कांग्रेस फार डेमोक्रेसी' नाम की पार्टी बनाई थी। जिसका विलय जनता पार्टी में हो गया था।
इन घटनाओं का मैं साक्षात गवाह रहा हूं,लेकिन तब उम्र कम होने के कारण उनके परिप्रेक्ष्य व कारणों की समझ नहीं थी,आज अब तत्कालीन घटनाओं
का इतिहास पढ़ता हूं तो अपने अनुभवों के कारण उनका वास्तविक विश्लेषण अच्छी तरह कर पाता हूं। तब के महानगर में कई गणमान्य व्यक्तियों के घर थे,जिनकी महत्ता बचपने के कारण मैं नहीं समझ पाते थे। बाटेनिकल गार्डन के निदेशक 'खुशू साहब' का छोटा लेकिन नये डिजायन का घर बना था। सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक छत्रपति जोशी का 'ध्रुव' नाम का घर भी आकर्षक था। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एम.डी जोशी के घर में ब्रह्मकुमारी आश्रम की गतिविधियां होती थी।
राजनैतिक व्यक्तियों में डी.पी बोरा का नाम चर्चित रहता था। वे इस क्षेत्र के विधायक थे। विश्वविद्यालय के नेता अतुल अंजान,रविदास मल्होत्रा के अतिरिक्त सी.बी.सिंह,भगवती सिंह आदि महानगर क्षेत्र में आते रहते थे। आर.डी शुक्ला,मनोज तिवारी उन दिनों महानगर मुहल्ले के हमारे अग्रज युवा थे,जो पत्रकारिता में चले गये थे।
अल्मोड़ा क्षेत्र की विधायक रमा पंत हमारे घर के सामने स्थित अपने भाई के निवास पर आती रहती थी। हरीश रावत लखनऊ विश्वविद्यालय से परास्नातक होकर सन सत्तर के बाद अपने क्षेत्र भिकियासेन अल्मोड़ा में राजनीति करने लगे थे। वहां से ब्लाक प्रमुख चुने गये थे। हिंदी के प्रसिद्ध आलोचक स्व.वीरेंद्र यादव उनके सहपाठी थे। सन सतहत्तर में मैं,जुबली इंटर कालेज से इंटरमीडिएट पास कर जी.टी.आई चिनहट से इंजीनियरिंग डिप्लोमा करने लगा था। लेकिन लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनावों में कामरेड अतुल अंजान के प्रचार हेतु हम बाहरी संस्थानों के छात्र भी संख्या बल बढ़ाने हेतु जाते थे। उन दिनों चुनाव प्रचार में कुछ छात्र हाथी में चढ़ कर विश्वविद्यालय के अंदर आते थे,उसमें बैठ कर प्रचार करते थे। बड़ा चहल पहलभरा,रोचक माहौल होता था।
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इतने सालों बाद लखनऊ आकर अपने लड़कपन के प्रिय आशियाने में जाना मुझे बड़ा सकूंन दे गया।
देर रात गये हम दोनों पति पत्नी इस बार के मेजबान के घर चर्चरोड अलीगंज लौट आये।
अगली सुबह सुबह हमने अयोध्या जाने का प्लान बनाया। इसे संयोग कहें या दुर्योग कि ऐन इन दिनों अयोध्या में दान चोरी प्रकरण की एस.आइ.टी जांच चल रही थी। जनता के मन में भ्रम व आशंका के बादल छाये थे। लेकिन इतने पास आकर फिर दुबारा आने का अवसर नहीं मिलेगा,यह सोच कर मंदिर की बनावट,भव्यता व अपने पुराने परिचित बाराबंकी फैजाबाद रोड में हुए बदलाव को जानने देखने का उत्साह मुझे अयोध्या दर्शन करा ही लाया।
अलीगंज के इस इलाके से फैजाबाद रोड का लिंक अब कई नये मुहल्लों से गुजारता हुआ हमें हाई वे पर ले आया था। मैं इन्द्रानगर,लक्ष्मणपुरी,भूतनाथ मंदिर,एच.ए.एल वाली सन सत्तर अस्सी के दशक की सड़क व बाजार ढूंढ रहा था,पर वो कहां मिलते। टैक्सी से गुजरते हुए वे इलाके ओवर ब्रिज के नीचे लुप्त हो गये थे।
पालीटेक्निक चौराहे पर तो हमारा इंस्टीट्यूट ही था।
आगे चिनहट गांव में हमारे सहपाठी किराये में रहते थे। कुकरैल पिकनिक स्पाट उन्हीं दिनों बन रहा था।
तेज रफ्तार टैक्सी की खिड़की से कुछ पुरानी जगहों की झलकी मिली,कुछ अजनबी नजर आई। 
बाबू बनारसी दास इंस्टीट्यूट व हाईकोर्ट की इमारत मेरे लिए नई थी।
बहरहाल फैजाबाद रोड अथवा अयोध्या हाई वे का दर्शनीय बदलाव सुरुचिपूर्ण लग रहा था। हम सवा दो घंटे में अयोध्या पंहुच गये थे। जून माह की गर्मी व एस.आई.टी जांच प्रकरण के बावजूद सन्नाटा नहीं था,ठीक ठाक संख्या में श्रद्धालु आ जा रहे थे।
बंबई से आये कुछ यात्रियों से मैने दान पात्र व चंदा चोरी प्रसंग पर प्रतिक्रिया लेनी चाही। वे निर्लिप्त थे।बोले इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है,दर्शन करने के लिए लोग पूर्ववत आते रहेंगे। हां दान या चढ़ावे में थोड़ा-बहुत कमी पेशी हो सकती है।सबकी अपनी इच्छा है,कोई जोर जबरदस्ती तो नहीं हो रही है।' उनका जवाब था।
मंदिर के बाहरी परिसर में अभी निर्माण,लान फुलवारी आदि का काम चल ही रहा था। सुरक्षाकर्मी जगह जगह तैनात थे। एक मायूसी कर्मचारियों के चेहरे पर अवश्य तिर रही थी।
इतनी प्रतिष्ठित आस्था की जगह की छवि पर लगे दाग की जांच के माहौल में मंदिर प्रांगण में खुशपुसाहट,शंका,मायूसी का होना लाजमी था।
सरयू स्नान करने के पश्चात हनुमानगढ़ी के दर्शन कर हम लोग लौट आये।
अयोध्या से लौटते हुए अधिक उत्सुकता मुझे फिर अपने बाराबंकी चिनहट लखनऊ वाली सड़क के इर्दगिर्द की पुरानी जगहों के मोह से बांधे हुए थी।
वापसी में डेड़ घंटे बाद मेरी नजरें खिड़की से बाहर
गौर से अपनी परिचित जगहों को तलाशने लगी थी। इस बार अपेक्षाकृत सड़क के दाहिनी ओर की काफी पुरानी इमारतों को देखकर मैं पुलकित हुआ। मेरा शिक्षण संस्थान,पालीटेक्निक साफ नजर आया। हमारे इसी संस्थान के बगल से एक सड़क कुकरैल पिकनिक स्पाट के लिए जाती थी,उन दिनों वहां सिर्फ जंगल था। पिकनिक स्पाट नया नया विकसित हो रहा था। केन्द्रीय सरकार के 'सुंगध पादप संस्थान' का भवन भी निर्मित हो चुका था।
हम लोग संस्थान से फर्लो मार कर कर झुंड में पिकनिक स्पाट जाने लगे थे। एक लड़कियों से भरी बस उस तरफ जाती दिखी,हम लड़के तो सहमे सहमे उसे ताक रहे थे,जब लड़कियों ने हंसते हुए खिड़की से हाथ हिला कर हमारी हिम्मत बंधाई तो हमने भी प्रत्युत्तर में उनका अभिवादन किया। लड़कियों को हाथ हिलाकर 'हैलो -हाय' कहने का वह हमारी जिंदगी का पहला रोमांचक और पुलकित करने वाला अनुभव था। वे संभवत: किसी आधुनिक कालेज की लग रहीं थी। लालबाग गर्ल्स कालेज,महिला कालेज या आई.टी.कालेज की ही न हों,कौन जाने।
एच.ए.एल का तब का बड़ा सा गेट मैं नहीं देख पाया,न जाते हुए,न आते हुए। हमारे सामने ही तो 
उस जमाने के लखनऊ की शान इस रक्षा उत्पादन फैक्ट्री की नीव रक्खी गई थी। इस संस्थान में नौकरी पाने के लिए मैने बहुत प्रयास किये,लेकिन मुझे देहरादून के रक्षा संस्थान में नौकरी करनी लिखी थी,सो एच.ए.एल में नौकरी नहीं मिली। सब डेस्टिनी की बात है। मैं सोच रहा था काश,टैक्सी वाला कुकरैल पुल,बादशाह नगर,निशातगंज से गोल मार्केट होते हुए वायरलेस चौराहा रहीमनगर से ले जाकर हमें अलीगंज के गंतव्य पर छोड़े, ताकि मैं अपने बचपन के प्रिय सड़क बजार मुहल्लों की एक झलक देख सकूं,लेकिन यह संभव नहीं हुआ,पहले ही उसने खुर्रम नगर से मोड़ते हुए कुर्सी रोड वाली दिशा पकड़ ली और दोपहर के दो बजे हमें वहीं छोड़ दिया जहां से सुबह पांच बजे 'पिक' किया था।
इस प्रकार कुल सात घंटे में हम लोग अयोध्या दर्शन व फैजाबाद राजमार्ग की सैर करके लखनऊ लौट आये थे।
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जिस दिन हम लौटे,यानी 22 जून 2026 को उस रोज लखनऊ में दो अवांछित व अरुचिकर घटनायें घटी,एक तो एस.आई.टी ने अयोध्या चंदा चोरी प्रकरण की जांच सरकार को सौंपी और उसी दोपहर में अलीगंज क्षेत्र के ही पुरनियां इलाके के एक कोचिंग सेंटर में हुए भीषण अग्निकांड की खबर आई। मन काफी व्यथित हुआ। नियमों की अनदेखी कर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया निर्माण कार्य कितना घातक हो सकता है,जिसने 15 युवाओं की जान ले ली। ऐसे अंधाधुंध निर्माण व विकास की बाढ़ ने महानगरों का जीवन कितना मृत्युभक्षी बना दिया है,यह देख कर व सोचकर दिल दहल जाता है।

              

            
                                                                                                       लखनऊ में इस बार निशातगंज गोमतीपुल सिकन्दरबाग,नरही,विधानसभा,हजरतगंज,हुसैनगंज,वाले मुख्य मार्ग की तरफ जाने का मौका नहीं मिला वर्ना अतीत में यह रुट तो अपना बहुत लंगोटिया यार था। गोमती तट पर स्थित निशातगंज के राजकीय इंटर कालेज से मैने मैट्रिक की परीक्षा पास की थी। जुबली इंटर कालेज,सिटी स्टेशन से इंटर पास किया था। उसके पश्चात इंजीनियरिंग डिप्लोमा जी.टी.आई फैजाबाद रोड से पास करने के पश्चात दो तीन साल बेरोजगारी का अनुभव व छुटपुट नौकरियां की थी। इन्हीं फाकेमस्ती के दिनों में साहित्य की अभिरुचि ज्यादा उछाल मारने लगी थी। पढ़ने लिखने का खूब मन करता था।
हजरतगंज काफी हाउस के बाहर बरामदे में मैग्जीन व किताबों के स्टाल में खड़े खड़े घंटों हम लोग उनको चाट जाते थे। उस जमाने की सभी प्रमुख साहित्यिक पत्रिकायें वहां रक्खी रहती थी। सारिका की तो दो तीन कहांनियां तक पढ़ लेते थे। काफी हाउस के अंदर जाने की हिम्मत नहीं पड़ती थी,लेकिन बाहर से ही अंदर गोल मेज के इर्दगिर्द बैठे साहित्यकारों की झलक मिल जाती थी। मुद्रा जी,भगवती बाबू,के पी सक्सेना, राम लाल जी आदि को तब मैं पहचानने लगा था। अन्य लोग राजनीतिज्ञ,पत्रकार,वकील आदि बुद्धिजीवियों की चहलपहल व गर्मागर्म बहस वहां चलती रहती थी।
बारह तेरह साल पहले सूक्ष्म दौरे पर लखनऊ गया तो थोड़ी देर को काफी हाउस में जाना हुआ। वहां पर वीरेन्द्र यादव, मुद्रा जी,अखिलेश,डा.रूपरेखा वर्मा आदि से मुलाकात की। वे लोग देहरादून के साहित्यकार ओम प्रकाश वाल्मीकि के बारे में जानने को काफी उत्सुक थे। मैने बताया वाल्मीकि जी हमारे अनन्य मित्र थे। हम लोग साथ ही रक्षा संस्थान में काम करते थे।अतुल अंजान एक अलग मेज पर कुछ मित्रों के साथ  बैठे थे। मैने उन्हें पुरानी याद दिलाई,नेशनल इंटर कालेज वाली। वे खुश हुए। उन्होंने देहरादून के कामरेड समर भंडारी के बारे में पूछताछ की।
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सन अस्सी के साल में ही अमीनाबाद के कंचना रेस्टोरेंट से भी मेरा परिचय हो गया था। वह भी साहित्यकारों का चर्चित अड्डा था। रेस्टोरेंट के मालिक मिश्र जी स्वयं साहित्यकार थे। वहां पर लगभग नियमित बैठने वाले कवि राजेश विद्रोही,राजहंस मिश्र दीपक,अजय प्रसून,अगीत वाले रंगनाथ मिश्र आदि से बातचीत होती थी। 
कंचना के बारे में हम सुनते थे कि किसी जमाने में वहां निराला,पंत,महादेवी,बच्चन,नरेंद्र मिश्र आदि साहित्यकार भी लखनऊ आने पर मिलते बैठते बतियाते थे।अमीनाबाद जाने पर कंचना में बैठ कर चाय पीना व साहित्यकारों की संगत करने का चश्का मुझे भी लग गया था।
लीलाधर जगूड़ी भी तब पहाड़ से आकर लखनऊ के सूचना केंद्र हजरतगंज में नौकरी करने लगे थे। उनसे तब मुलाकात नहीं हुई। मंगलेश डबराल से अमृत प्रभात कार्यालय में मिलना हुआ था। हिंदी संस्थान में ठाकुर प्रसाद सिंह अध्यक्ष थे। 'वंशी और मांदल' नवगीत संग्रह के लिए चर्चित थे।
मंगलेश जी की का संग्रह 'पहाड़ पर लालटेन' चर्चित  होने लगा था। हिंदी संस्थान के दो मंजिले के हाल में मुझे भी कुछ युवाओं के साथ सोहन लाल द्विवेदी जी के सान्निध्य में काव्य पाठ का अवसर मिला।आकाशवाणी के उत्तरायण कार्यक्रम विभाग में मैठाणी जी,वंशीधर पाठक 'जिज्ञासु' व जीत सिंह जड़धारी जी थे। जिज्ञासु जी ने कुमाउंनी 'कथा किस्सों' के वाचन  व प्रसारण हेतु मुझे भी बुलाया था। 'कमल जी' उन दिनों आकाशवाणी के लोकप्रिय कार्यक्रम संयोजक थे। शिवानी का स्तंभ 'वातायन',के.पी सक्सेना के व्यंग्य,उर्मिल कुमार थपलियाल की 'सप्ताह की नौटंकी',स्वतन्त्र भारत अखबार में खूब पढ़ी जाती थी।
'स्वतंत्र भारत' के रविवारीय परिशिष्ट में मेरी भी कहानियां नवगीत आदि छपने लगे थे।                    



लखनऊ में पुनर्गमन के बहाने इतनी पुरानी संचित स्मृतियां छन छन कर बाहर आ रही हैं। जो संभवत: वहां लगातार निवास करते रहने पर न खुलती शायद। लंबा बहिर्गमन भी हमारे प्रिय स्थानों की यादों को संभाले संजोये रखता है। यह अनुभव शिद्दत से हो रहा है।
रवीन्द्रालय में हुए कुछ कार्यक्रमों में दर्शक के तौर पर शिरकत करने की याद अभी ताजा है। इन्हीं कार्यक्रमों के दौरान कथाकार शिवानी,चित्रकार रणबीर सिंह बिष्ट, बिरजू महाराज,अवधी कवि रमई काका को पास से देखने का अवसर मिला था।
केशरबाग की 'बारादरी' में हुए एकाध मुशायरों में देर रात तक बैठे रहने की धूमिल स्मृति भी है।
अवध जिमखाना क्लब में टेनिस का एक विश्व स्तरीय मैच सन 1975-76 में हुआ था। हम स्कूली लड़के क्लब के बाहर सामने बने ऊंचे मकबरे में चढ़ कर मैच देखने लगे थे। इस मैच में न्यूजीलैंड के खिलाड़ी ओनी पारून व अमृतराज बंधुओं का मुकाबला हुआ था,इतना याद है।
गोमती के किनारे बना लखनऊ का पहला पांच सितारा होटल क्लार्क अवध उन्हीं दिनों बन कर तैयार हुआ था। हम लड़के गोमती के दूसरे पाट पर देर शाम तक तैरते फांदते थे और मद्दिम रौशनी में नदी में बन रही होटल की छाया के ऊपरी हाल को इंगित कर आपस में हंसी ठिठोली करते एक दूसरे से कहते थे,देखो वहां कैबरे डांस शुरू हो गया है। क्लार्क अवध के बगल में ही स्थित 
अपने वास्तु के लि प्रसिद्ध छतर मंजिल  (सी.डी.आर.आई ) की छाया भी गोमती नदी में बड़ी मनोरम नजर आती थी। छतर मंजिल का निर्माण अवध के नवाब गाजीउद्दीन हैदर ने करवाया था सन 1820 के आसपास। 
निशातगंज चौराहे से जुड़े तो बहुत किस्से हैं। तब ओवर ब्रिज नहीं बना था। पालीटेक्निक के पहले साल में खूब रैगिंग हुई थी। कालेज जाने वाली बस पकड़ने के वास्ते हम नये लड़के डरे सहमे हनुमान मंदिर के पास खड़े रहते थे। सीनियरों के आदेशानुसार उनको हाथ जोड़ कर नमस्कार करने के पश्चात नजर तीसरे बटन पर झुकानी होती थी।
एक रोज एक सीनियर ने बड़े पशोपेश में डाल दिया।
'बोला वो देखो सामने तुम्हारी बहिनें खड़ी हैं,उनके पांव छू कर आओ। अपरिचित लड़कियों के पास जाकर उनके पांव छूने की बदतमीजी कैसे करते। हाथ जोड़कर कर गिड़गिड़ाते हुए कहा,'सर
यह सजा मत दिजिए चाहे उठक बैठक करा लीजिए सौ। 'चलो अच्छा,कान पकड़ कर उठकर बैठक लगाओ।' फर्स्ट इयर के हम दो तीन लड़कों ने वहां पर सबके सामने कान पकड़ कर उठक बैठक लगाई। जनता के लिए वहां रोज कोई  न कोई रोचक तमाशा होता था। एवज में सीनियर बस का टिकट स्वयं लेते थे। कैंटीन में ले जाकर कहते थे 'तीन गर्म समोसे एक साथ खाओ।'
निशातगंज के ओवर ब्रिज के विरोध में व्यापारियों ने खून से चिट्ठी लिखकर विपक्षी नेता अटल बिहारी बाजपेई को पकड़ाई थी। हालांकि बाद में ब्रिज बना
और उनका व्यवसाय यथावत चलता रहा।
निशातगंज का 'उमराव' पिक्चर हाल भी तभी दो एक साल बाद बना। गोमती के पार बना वह लखनऊ का पहला पिक्चर हाल था। 'शोले' हम लोगों ने उसी हाल में देखी थी। 



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लखनऊ में हफ्ते भर के निवास के पश्चात लौटने की तिथि आ गई थी। ट्रेन के रूट डायवर्जन के कारण हमें ट्रेन चारबाग से न पकड़ कर आलम नगर से पकड़नी थी। आते समय भी हम आलमनगर ही उतरे थे। अलीगंज से आलमनगर ले जाने के वास्ते टैक्सी वाले ने वही रुट पकड़ा, डालीगंज चौक इमामबाड़ा वाला। कपूरथला बाग के बाद  पहले चांदगंज आता था, फिर रेलवे फाटक और उसके बाद बायें हाथ में विवेकानंद हास्पिटल।
इस बार ओवर ब्रिज बन जाने से आधा चांदगंज नजर ही नहीं आया। विवेकानंद अस्पताल ऊपर से दिखा। इस अस्पताल से जुड़ी मेरी  बड़ी दुखद स्मृतियां हैं। 


सन 1973 में मैं कक्षा नौ का विद्यार्थी था। बड़े भाई, ईजा (मां) को भी गांव से इलाज के वास्ते लखनऊ ले आये थे। उनकी कमर में साल  छह महीने से असहनीय दर्द रहता था। लखनऊ में लाकर कई डाक्टरों को दिखाने के बाद विवेकानंद हास्पिटल में भर्ती किया। उनके गहन टैस्ट हुए। उन दिनों वहां के सर्जन डाक्टर भट्टाचार्य का बड़ा नाम था। उन्हें भी दिखाया। मां,वहां एक माह से ज्यादा भर्ती रही। वहां के बड़े स्वामी जी सहित उनके सहयोगी नियमित मरीजों से मिलने एक चक्कर लगाते थे। अक्सर मां के साथ बैड पर मैं बैठा मिलता था। मां को हाथ जोड़ कर  उनसे हालचाल पूछने के बाद स्वामी जी मेरे सिर में भी हाथ फेर कर सांत्वना देते थे। मां को गले का कैंसर डिटेक्ट हुआ था। उन्हें नहीं बचाया जा सका। जनवरी 1974 में लखनऊ में ही उनका देहांत हो गया था। नया नया बना रामकृष्ण मिशन का यह अस्पताल उन दिनों लखनऊ में अपने विशाल आधुनिक भवन,साज सज्जा,सुविधाओं व सस्ते उपचार के लिए प्रसिद्ध था। इसके बाहर प्रवेश द्वार पर फौब्बारे लगे थे तथा स्वच्छ पानी के विस्तृत ताल में रंगबिरंगी मछलियां तैरती थी। सफेद चिकने संगमरमर की सीढियां चढ़ने के बाद विशालकाय ऊंचा हाल व गलियारे बने थे। सरकारी अस्पतालों के मुकाबले यह लाख गुना दर्शनीय व सुविधाजनक था। एक बार इच्छा हुई देखें अब इतने सालों बाद क्या परिवर्तन हुआ है अस्पताल में, लेकिन यह संभव नहीं था। यूं अब तो बड़े बड़े सुपर स्पेशियलिटी मंहगे प्राइवेट अस्पतालों के जमाने में रामकृष्ण मिशन के इस अस्पताल की पहचान धूमिल सी हो गई होगी,ऐसा आभास जरुर हो रहा था।
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आगे चल कर टैक्सी वाला आई.टी चौराहे से डालीगंज को मुड़ गया था। आई.टी कालेज तो आजादी के पहले से ही उत्तर भारत का लड़कियों का जाना माना कालेज था। बड़े आधुनिक संभ्रांत घरों की लड़कियां वहां पड़ती थी। उसके गेट के बाहर एक ओर को खुला कैफे था,जहां झुंड में  फैशनेबल लड़कियां रंगबिरगी छतरी वाली मेजों से सटी कुर्सियों में बैठ कर चाय काफी आदि पीती थी। वहां से फैजाबाद रोड की ओर जाते हुए साइकिल धीमी कर हम लड़के आपस में खुसुर-पुसुर करते थे,'यार सुना है यहां बैठ कर लड़कियां सिगरेट भी पीती हैं।'
लड़कियों को सिगरेट पीना देखना हमारे लिये असंभव दृश्य को देखने जैसा रोमांचक कारनामा था। खैर, इस बार मैने  टैक्सी से उस ओर नजर घुमाई तो वहां सन्नाटा नजर आया,अलबत्ता ब्रिटिश कालीन वास्तु से बनी उस भव्य इमारत के आलीशान स्तम्भ व बड़ा सा पोर्च अभी भी शान से प्रसिद्ध आई.टी कालेज का हुस्न नुमाया कर रहे थे। उर्दू की मशहूर लेखिकाओं इस्मत चुगताई,कर्तुरलैन हैदर,आयरीन पंत सहित कई जानी मानी महिलायें किसी जमाने में इस कालेज में पढ़ती थी।
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हमारी यात्रा में आते वक्त तो सुबह का समय था,और ओटो वाहन था,इसलिए उसने हमें नये नये गलियों वाले शार्टकट दिखाये और आधे घंटे में ही आलमनगर स्टेशन से चर्च रोड अलीगंज पहुंचा दिया। इस बार  लौटते हुए दोपहर का वक्त था और टैक्सी,गलियों से नहीं जा सकती थी,इसलिए  डालीगंज ब्रिज के बाद चौक की ओर मुड़ने के बाद उसने हमें भव्य एतिहासिक रूमी दरवाजे से प्रवेश करा कर बड़े इमामबाड़े के सामने से होते हुए छोटे इमामबाड़े व घंटाघर से ले जाकर खुनखुन जी रोड अमृतलाल नागर चौक के आगे पुराने लखनऊ की ऐसी विस्तृत सैर करा दी जो मैने अपने विद्यार्थी जीवन में भी नहीं की थी। शिया मुस्लिमों की रिहाइश के लिए विख्यात चौक की पुरानी इमारतें अभी भी उस पुराने अतीत की जीवंत यादगार हैं जब यहां पर अवध के नवाबों का कला संस्कृति,वास्तु,अदब के उन्नत कार्यों व संस्कारों से समृद्ध शासन था। 
जून की गर्मी के कारण बजार में जगह जगह मुस्लिम भाइयों ने प्याऊ के स्टाल लगा रक्खे थे।
पिछले दिनों ईरान में अयातुल्ला खुमैनी की हत्या के पश्चात लखनऊ के इस इलाके के बहुसंख्य शिया समुदाय में शोक की लहर फैल गई थी। उनकी अकीदत में लगे खुमैनी के पोस्टर  जगह जगह नजर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे हम किसी मुस्लिम देश की घनी बस्ती में आ गये हों,लेकिन हिन्दू मुस्लिम भाईचारे की तस्वीर व तहरीरें साझा करते पोस्टर भी लगे थे। रस्तोगी व्यापारियों के लिए प्रसिद्ध हिंदू समुदाय के घर दुकानें स्कूल मंदिर दर्शा रहे थे कि लखनऊ की साझा संस्कृति व गंगाजमनी तहजीब अपने आप में एक मिसाल है।





टूरियागंज आयुर्वेदिक अस्पताल से मैं पहले से परिचित था,उसके गेट के सामने से आलमनगर की ओर टैक्सी वाला ले जा रहा था। शायद वह इस रुट से बहुत वाकिफ नहीं था,और उसका मोबाइल एप भी घपला रहा था,इसीलिए आलमनगर पहुंचने में उसे लगभग एक घंटा लग गया।
खैर देर आयद, दुरुस्त आयद। हमारी ट्रेन के प्रस्थान में अभी पर्याप्त वक्त बचा था। हमने तसल्ली पूर्वक अपना सामान उतारा। और पुराने लखनऊ की तफसील से सैर कराने के वास्ते टैक्सी वाले को धन्यवाद के साथ अलग से मेहनताना भी दिया। उसकी झुंझलाहट कम हुई,उसके चेहरे पर चमक आई उसने सलाम कर हमें विदा किया।
ट्रेन के आने के पश्चात अपनी सीटों पर बैठ जाने व 
ट्रेन के चल देने पर हमने भी खिड़की से प्लेटफार्म पर पीछे छूटते जाते लखनऊ को भावुक होकर विदा किया और हाथ हिलाये।

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@दिनेश चंद्र जोशी
मो.9411382560 

Sunday, July 19, 2026

ललन चतुर्वेदी की कविताएँ

 

 

  

 

ललन चतुर्वेदी 
जन्म:  10म‌ई 1966 को नारायणी नदी के तट पर स्थित मुजफ्फरपुर (बिहार) के बैजलपुर ग्राम में 


प्रकाशित कृतियां:  प्रश्नकाल का दौर , बुद्धिजीवी और गधे(दो व्यंग्य संग्रह)
ईश्वर की डायरी,यह देवताओं के सोने का समय है और आवाज घर( तीन कविता संग्रह) के साथ- साथ 
स्तरीय पत्र - पत्रिकाओं एवं प्रमुख वेब पोर्टलों पर कविताएं , आलोचना एवं व्यंग्य प्रकाशित।



  



पराजित नायक

 

क‌ई बार हम सच बोलते हुए हार जाते हैं
और हारी हुई लड़ाई को फिर से शुरू करते हैं
हो सकता है इस लड़ाई में हम शहीद भी हो जाएं
( इसकी संभावना अधिक होती है)
इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि
हम छुप जाए सुरक्षित बंकर में
इसका मतलब यह भी नहीं हो सकता कि
हम सच बोलना ही छोड़ दें

ऐसे समय में जब सच को सच कहने की तादाद
लगातार घट रही है
सच बोलना  एक युद्ध जीतने के बराबर है
जब लोगों का हुजूम अगल - बगल झांकने लगे
कैमरे पर आकर बिना लड़खड़ाए सच कहना
(बशर्ते कि वह सच हो)
झूठ पर पहला आक्रमण है

हम उस क्रिकेट खिलाड़ी के लिए ताली कत‌ई नहीं बजाते 
जो क्रीच पर आने के पहले ही डर जाता है
हो सकता है कोई खिलाड़ी बना न पाए विश्व रिकॉर्ड
लेकिन उसकी आतिशी पारी कोई भूल‌ सकता है ?

क‌ई बार खलनायक जीतकर भी हार जाता है
और पराजित नायक सदियों तक पूजा जाता है।


एक और तस्वीर

एक और तस्वीर है
जो कभी किसी कैमरे से कैद नहीं की जा सकी
उसके रंग अलग-अलग थे
कभी - कभी तो यह इन्द्रधनुषी होकर उतरती थी

आखिर, क्या हो सकती है इसकी वज़ह
ध्यान आंखों की ओर गया
जिसके कैमरे से वह तस्वीर ली गई है
और उसकी जेपीजी इमेज फीड कर दी गई  
मस्तिष्क के हार्ड डिस्क में
वह इस तरह सेव हो गई कि उसे  डिलीट करने का कोई ऑप्शन नहीं था
अब इसे मिटाने के लिए क्यों किया  जाए किसी से विफल अनुरोध

सबके अपने कैमरे हैं
जिसे वे हरदम गरदन में लटकाए घूमते रहते हैं
और पलक झपकते ली गई एक क्लिक को 
बना देते हैं प्रोफाइल पिक्चर
जबकि दूसरे कोने से ली जा सकती थी एक मुक्कमल स्पष्ट तस्वीर

विडंबना यह रही है कि  एक  को दिखती थी जो ब्लैक
वही दूसरे को दिखती थी ह्वाइट ।




टर्मिनस

शालीनता का तकाजा यह है कि
हम अंधे को अंधा नहीं कहते
दुश्मन के सामने उसे दुश्मन नहीं बोलते

दुःख को इतना पोशीदा रखते हैं
कि दूर से किसी को आते देख
पोंछ लेते हैं रूमाल से आंसू
लाख गम  पीछे  धकेल कर
होंठों पर ओढ़ लेते हैं मुस्कान

अपने वश में तो इतना ही है कि
नेत्रों में धवल ज्योति के बावजूद
स्वयं को अंधा कहे जाने पर भी
नहीं दर्ज करते कोई आपत्ति
कुछ अनर्गल प्रश्नों का जवाब होता है मौन
और उससे भी अधिक कड़वे सवालों को
हल किया जा सकता है मुस्कान से

सह‌-अस्तित्व को स्नेहोपहार समझ लिया जाए
कुछ कम है क्या साथ - साथ चलना भी
सफर भले ही  रेल- पटरियों का हो

समझ  के अभाव में  लंबा लगता है सफर
जबकि दूरियां ही दूरियों को कम करती हैं
जरूरी नहीं कि हर यात्रा की हो कोई मंजिल
हर अगले क़दम के लिए उत्साह भरता है
एक सुनिश्चित टर्मिनस
पथिक के लिए यही है बड़ा संबल
और इस तरह असुविधाजनक स्टेशनों से गुजरते हुए वह मुस्कुरा उठता है।


सफ़ेद दाग

तमाम हीनताओं से भरती जा रही है
अब तो सांस लेना भी दुभर हो गया है
जिनके जिगर का टुकड़ा कहलाती थी
वे भी चिंताओं के बोझ तले दबते जा रहे हैं
इतना कि उनका सिर उठाकर चलना
हो गया है मुश्किल

एक छोटे से बिन्दु से शुरु होकर
यह चांद को ग्रसता जा रहा है राहु की तरह
आकाश के चांद को तो मिल जाएगा मोक्ष
अंधेरे में भटकते धरती के इस चांद की मुक्ति के
लिए
कौन बढा़एगा हाथ ?

आखिर क्या करे वह
जिए या ज़हर - माहुर खा ले
या लगा दे कुएं में छलांग
मौन हो जाते हैं सारे पुरुष - प्रवर
किसी के पास नहीं है इसका जवाब

असंख्य काले धब्बे छुप जाते हैं श्वेत वसन में
इन्हें धारण कर लोग पूजे जाते हैं देवता की तरह
पर यह बददिमाग  सफेद दाग
हो जाता है सार्वजनिक
और‌ सबसे पहले उठती है अंगुली इसी की ओर
जैसे शो-केस में रखी वस्तु
खींचती रहती है सबका ध्यान

यह स्याह दौर है
जब अलंकृत हो रही हैं श्यामताएं
और श्वेत को अस्पृश्य मानकर
ठेल दिया जा रहा है किनारे।
 

 

      
मिट्ठू

अनगिनत बार हो चुके हैं उसके पंख लहूलुहान
स्वामी भी क‌ई बार पिंजरे को खोल चुका है
ऐसा नहीं कि वह बिल्कुल भूल गया है उड़ान
कभी- कभी वह सामने के पेड़ पर बैठकर
मारे खुशी के चहचहाता है
इसी बीच मालिक मिट्ठू कहकर उसे बुलाता है
कटा हुआ बासी अमरूद कटोरी में परोस देता है
थोड़ा सा पानी भी उसे उपलब्ध कराता है

वह दौड़ा - दौड़ा आता है
अपनी ही चोंच से
पिंजरे में ताला लगाता है
जब - जब यह दृश्य आता है मेरी आंखों के सामने
मैं खुद से करता हूं सवाल -
आखिर यह मिट्ठू पिंजरे से निकल क्यों नहीं जाता है? 


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Tuesday, July 14, 2026

स्मृति : कांतिमोहन

 

 

 


 


(  कान्तिमोहन जी पर कथाकार अरुण कुमार‘असफल’ का  यह आलेख प्रकाशित करते हुए  हम उनके काम और मिशन को याद करते हैं)

 

 पर कथा है शेष

अरुण कुमार ‘असफल’ 


मुझे कांतिमोहन जी की जन्मतिथि 14 जुलाई हमेशा याद रहती है क्योंकि चार दिन बाद ही मेरा जन्मदिन पड़ता है। इस कारण से पिछले चार पांच सालों से फेसबुक पर अपन टाइमलाइन पर उनके जन्मदिन के अवसर पर एक पोस्ट लगाना याद रहता था। 14 जुलाई वर्ष 2024 में वह 88 वर्ष के हो गए थे और कुछ दिन पहले मुझे उनके अस्पताल में भर्ती होने की भी सूचना थी। मैंने उस दिन सुबह सुबह फेसबुक पर जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके शीघ्र स्वथ होने की कामना की थी। लेकिन पोस्ट डालने के आधे घंटे बाद ही उनके न रहने की ख़बर मिली। इस तरह से जन्म की तारीख़ में ही उनका देहावसान हुआ।

कांतिमोहन मूलतः हलद्वानी के थे। उनकी स्नातक तक की पढ़ाई रामनगर और मुरादाबाद के विभिन्न स्कूलों और कालेजों में हुई थी। आगे की पढ़ाई के लिए वह दिल्ली आ गए थे। सन 1958 में एम ए की थीसिस के रूप में उन्होने दिनकर की कुरुक्षेत्र पर ‘कुरुक्षेत्र मीमांसा’ लिखी जो कई सालों तक कई विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में शामिल रही। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए करते ही वह नौकरी की तलाश में लग गए थे। हिंदी और उर्दू साहित्य के वह गंभीर अध्येयता थे। दोनों ही भाषाओं का उन्हें अच्छा ज्ञान था। इसलिए संपादन और लेखन का छुटपुट काम मिलने में उन्हें कोई समस्या नहीं हुई थी। उस दौरान पत्रकारिता और अनुवाद का काम किया था। कुछ समय तक राजपाल एंड संस में बतौर संपादक नौकरी की। बेरोजगारी के दिनों में वह इंदिरा गांधी के संपादन में निकलने वाली पत्रिका वुमैन आन मार्च के हिंदी संस्करण महिला प्रगति के पथ पर के कार्यकारी संपादक के रूप में काम किया जबकि मुख्य संपादक इंदिरा गांधी ही थीं। उनके संपादक कौशल को देखते हुए कई पत्र पत्रिकाओं के संपादकों ने अपने वहां नौकरी का प्रस्ताव दिया पर उन्होने अस्वीकार कर दिया था।

दरअसल वह दिल्ली विश्वविद्यालय के किसी कालेज में बतौर प्राध्यापक काम करना चाहते थे और उनकी तमाम कोशिशों और योग्यताओं के बावजूद दिल्ली विश्वविद्यालय का एक प्रभावशाली व्यक्ति उनकी राह में रोड़ा बन रहा था। उस व्यक्ति ने हिंदी भाषा, साहित्य और आलोचना पर बहुत सारी किताबें लिखीं थीं। परन्तु दिल्ली शिक्षण अकादमी के दायरे में उसके कुकृत्यों की भी खूब चर्चे हुआ करते थे। खीझ कर कांतिमोहन ने उनके उन्हीं कुकृत्यों को आधार बना कर एक लघु उपन्यास लिखा पर कथा है शेष और दिल्ली के एक बड़े प्रकाशक को छपने को दे दिया। परंतु उस प्रकाशक के माध्यम से उस व्यक्ति तक यह ख़बर पहुंच गयी। उसने तत्काल कांतिमोहन को अपने पास बुलवाया और वह उपन्यास उस प्रकाशक से वापस लेने का अनुरोध किया। कांतिमोहन ने ऐसा करने मना कर दिया। तब दिल्ली विश्वविद्यालय के उस प्रोफेसर ने कांतिमोहन से उक्त पांडुलिपि अपने मरणोपरांत छपवाने का अनुरोध किया। कांतिमोहन मान गए और कुछ दिनों बाद सन 1963 में दिल्ली के सत्यवती कालेज में उनकी नौकरी लग गयी।

कांतिमोहन को गीत और गज़ल लिखने का बहुत शौक था। वह ’सोज़’ उपनाम से गज़ल लिखा करते थे। सन 1970 में प्राध्यापक की नौकरी अस्थायी रूप से छोड़ कर फि़ल्मी गीतकार बनने बंबई चले गये थे। जब वहां सफलता नहीं मिली तो वापस पुरानी नौकरी पर आ गए। पर गीत और गज़ल लिखना जीवनपर्यन्त जारी रहा था और और सोशल मीडिया पर अक्सर अपनी गज़लें डाला करते थे। उनके गीत और गज़ल ’कदम मिला कर चलो’, ’गुनाहे सुख़न’ और ’रात गए’ किताबों में संकलित हैं। ’ गुनाहे सुख़न’ उर्दू में लिखी गयी है और सन सन 1990 में यह उर्दू अकादमी दिल्ली से पुरस्कृत हुई थी। इसके अतिरिक्त फि़ल्मों के प्रति उनके मोह को प्रमाणित करती हुई ’ आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत’ शीर्षक से एक किताब है।

कांतिमोहन की रुचि खेलों में भी थी। सन 1963 से 1972 तक धर्मयुग पत्रिका में इनके छद्म नाम से ’ श्रीदामा की चिठ़ठी’ स्तंभ नियमित छपता था। जिसमें खेल संबंधी जानकारियां और सूचनाएं रहतीं थीं। इसी दौरान साप्ताहिक हिंदुस्तान में खेल विषयक इनका स्तंभ ’ खिलाड़ी की डायरी’ छपता था। मजे की बात यह थी कि उन दिनों शंकर वीकली-हिंदी में भी ’ खेल देखो खेल की धार देखो’ नाम से इनका स्तंभ छपता था। एक ही समय देश के तीन प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में नियमित लेखन! वास्तव में केवल प्रतिभा और जागरुकता के बल पर नहीं, बल्कि सामयिक विषयों पर सदैव जागरुक रहने के कारण ही संभव हो सकता था।

कांतिमोहन ने सत्रह वर्षों तक माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ’लोक लहर’ का संपादन किया था। वह इस मुखपत्र के संस्थापक सदस्यों में से थे। वह जनवादी लेखक संघ और जन नाट्य मंच के भी संस्थापक सदस्यों में से एक थे। मुरली प्रसाद सिंह, चंचल चैहान और सुधीश पचैरी के साथ मिल कर चार वर्षों तक ’उत्तरगाथा’ पत्रिका निकाली। उदय प्रकाश की प्रसिद्ध कहानियां ‘ दद्दू तिवारी जनगणनाधिकारी’, ’ हीरालाल का भूत’ तथा ’ रामसजीवन की प्रेमकथा’ सबसे पहले उत्तरगाथा पत्रिका में ही प्रकाशित हुई थी। परन्तु इस पत्रिका का प्रसार सीमित होने के कारण ये कहानियां विशाल पाठक वर्ग का ध्यान खींचने में विफल रहीं थीं। बाद में यही कहानियां हंस में पुनप्र्रकाशित हुई थीं और उदय प्रकाश बड़े कथाकार के रूप में स्थापित हुए।

कांतिमोहन वाम विचार की संवाहक पत्रिकाएं जैसे नया पथ, उत्तरार्द्ध आदि के संपादन, प्रकाशन और प्रसार में सहयोग करते थे। वह प्रसिद्ध माक्र्सवादी चिंतकों सव्यसाची, कुंवरपाल सिंह, रेखा अवस्थी, मुरली बाबू आदि के करीबी लोगों में रहे। कई जन आंदोलनों में इनकी सक्रिय भूमिका रही और उन्होने कई जन आंदोलनों के लिए गीत भी लिखे थे। जिनमें से एक जनगीत हल्ला बोल बहुत लोकप्रिय हुआ था। इस गीत की कुछ पंक्तियां हैं-



बोल मजूरे हल्ला बोल

बोल मजूरे हल्ला बोल

कांप रही सरमायेदारी

खुल के रहेगी इसकी पोल

बोल मजूरे हल्ला बोल



कंतिमोहन बहुत संवाद प्रेमी थे, जिन्हें मिलना जुलना बहुत पसंद था। वह साहित्यिक अड्डेबाजी के शौकीन थे और अपनी इच्छापूर्ति के लिए वह दिल्ली के रीगल टी हाउस और मोहन सिंह काफी हाउस में नियमित जाते थे। उनकी कहानी ’ दूसरा पहलू’ में इस काफी हाउस का उल्लेख हुआ है। एम ए करने के लगभग पच्चीस साल बाद सन 1982 में उन्होने ’प्रेमचंद और अछूत समस्या’ पर डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। वास्तव में यह एक विद्यार्थी द्वारा अपनी कच्ची या अपरिपक्व दृष्टि द्वारा तैयार एक औपचारिक शोध न होकर एक अनुभवी माक्र्सचादी प्राध्यापक द्वारा किया गया वास्तविक शोध है। इसलिए लंबे समय तक इसका अकादमिक महत्व बना रहा था। उनके शोध के केन्द्र में प्रेमचंद की दलित विषयक कहानियां तो हैं ही, साथ ही साथ इस विषय पर गांधी जी के विचारों और व्यक्तव्यों की पड़ताल की गयी है। प्रेमचंद की दलित चेतना को लेकर दलित साहित्यकारों द्वारा जो सवाल उठाये जाते रहे हैं उनका स्पष्टीकरण इस शोधग्रंथ में मिल जाता है। उनका मानना था कि यद्यपि कि प्रेमचंद की दृष्टि माक्र्सवादी थी पर राष्ट्रीय आंदोलनों के मद्देनज़र उनका झुकाव गांधी जी की ओर हो गया था। उदाहरणार्थ, अंग्रेज़ों द्वारा पृथक निर्वाचन लागू करने के विरोध में गांधी जी ने इसे हिंदू धर्म के लिए घातक बताते हुए यरवदा जेल में अनशन आंरभ कर दिया था। तब प्रेमचंद ने ‘ जागरण’ के अपने संपादकीय में गांधी जी के पक्ष में खूब तो लिखा था लेकिन उनके ’हिंदू’ शब्द को ‘राष्ट्र’ से प्रतिस्थापित कर दिया था। उनकी (कांतिमोहन) धारणा थी कि ऐसा लिखते समय प्रेमचंद भारत की मुक्तिगामी जनता की संघर्षशील भावना का ही प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इसलिए उनकी दलित विषयक कहानियों में अंबेडकरवादी दृष्टि कम, गांधीवादी दृष्टि अधिक स्पष्ट होती है। इस तरह से आज के दलित साहित्यकारों की शंकाओं का जवाब कांतिमोहन की सन 1982 में प्रकाशित शोध पुस्तक में मिल जाती है। यह पुस्तक कुछ संशोधनों एवं संपादन के पश्चात सन 2010 में ‘ प्रेमचंद और दलित विमर्श’ शीर्षक से पुनप्र्रकाशित हुई थी।

कांतिमोहन की पहली कहानी सन 1961 में प्रकाशित हुई थी। उससे पहले उन्होने लघु उपन्यास पर कथा है शेष भी लिख लिया था। लेकिन फिर लंबे समय तक कथा लेखन से दूर रहे थे। क्योंकि अध्यापन और राजनैतिक सक्रियता के साथ साथ वह गीत, गज़ल और स्तंभ लेखन कर रहे थे। इन व्यस्तताओं के बीच में वह किसी तरह का कथा लेखन करते भी तो शायद वह इनकी संपादकीय दृष्टि को पसंद नहीं आती। सन 1996 में जब वह अध्यापन सेवा से स्वैच्छिक रूप से सेवानिवृत्त हुए तब उन्होने दुबारा कथा लेखन करने का निर्णय लिया। सेवानिवृत्ति के पश्चात उन्होने देहरादून में रहने का निर्णय लिया था। देहरादून के रचनाकारों से उनका प्रथम परिचय ’संवेदना’ की गोष्ठी में हुआ था। यह गोष्ठी जनवरी 1997 में शहँशाही आश्रम में हुई थी। उस गोष्ठी में मैं भी था। उस गोष्ठी में बड़े उत्साहपूर्वक उन्होने कहा था कि वह अब कहानियां भी लिखना चाहते हैं। उसके बाद वह लगातार कहानियां लिखने लगे थे। इसके लिए उन्होने एक कंप्यूटर और प्रिंटर ले लिया था। मैं जब भी दून विहार वाले उनके घर जाता तो उन्हें हमेंशा कहानियां टाइप करते पाता। ’ संवेदना’ की गोष्ठी में वह उन कहानियों का पाठ करते थे। वह अन्य की कहानियों को गंभीरतापूर्वक सुनते और उस पर अपनी बेबाक टिप्पणियां करते।



मैं एक गोष्ठी की स्मृति साझा करना चाहता हूं।

उस गोष्ठी में कांतिमोहन ने एक कहानी का पाठ किया था। उस कहानी में एक व्यक्ति द्वारा मरणोपरांत नेत्रदान की गयी दोनों आंखें एक ही व्यक्ति को लगाए जाने का उल्लेख था। उस गोष्ठी में कथाकार योगेन्द्र आहूजा भी उपस्थित थे। उन्होने फौरन हस्तक्षेप किया और बताया कि नेत्रदान में मिली दो आंखें दो अलग अलग नेत्रहीन व्यक्तियों को लगायी जाती हैं ताकि दो अलग अलग व्यक्ति इस दुनिया को देख सके। कांतिमोहन ने योगेन्द्र आहूजा का विनम्रतापूर्वक आभर व्यक्त किया और बाद में अपनी कहानी का पुनर्लेखन किया।



लेकिन यह एक तथ्यात्मक त्रुटि थी। किसी की क्या मजाल कि उनकी रचनाओं में कोई व्याकरण या भाषाई दोष निकाल सके। उनकी गज़लों का स्तर बहुत ऊंचा है- काफि़या, रदीफ आदि के हिसाब से बिल्कुल परफ़ेक्ट। गज़ल में उन्होने दुष्यंत कुमार की हिंदी गज़ल की परंपरा का अनुसरण नहीं किया है। बल्कि उनकी गज़लें विशुद्व उर्दू की क्लासिक गज़लों के समकक्ष हैं।



भाषा के मामले में वह मास्टर थे ही और संपादन का भी अच्छा ख़ासा अनुभव था। एक बार मैंने अपनी एक कहानी उन्हें पढ़ने को दी। उन्होने शुरुआत में ही एक भाषाई त्रुटि पकड़ ली और आगे पढ़े बगैर वह कहानी मुझे लौटा दी। मुझे याद है कि उन्होने कहा था कि खाने के पहले कौर में ही कंकड़ आ जाए तो खाने का मजा ही किरकिरा हो जाता है। इसके बाद से मैं भाषा के मामले में सजग हो गया था। ‘संवेदना’ की गोष्ठियों में वह वरिष्ठ कथाकारों विद्यासागर नौटियाल और सुभाष पंत की रचनाओं की बेबाकी से आलोचना करते थे और वे दोनों कथाकार उनकी आलोचना को विनम्रतापूर्वक स्वीकार करते थे।



कांतिमोहन ने अपनी ओर से पहल करते हुए देहरादून में भी मिलने जुलने का एक ठिकाना बनाने का प्रयास किया था। मसूरी के रास्ते में इस उद्देश्य से एक कमरा भी किराये पर लिया था और एक कर्मचारी को नौकरी पर भी लगाया था। वहाँ वह रोज़ शाम को बैठा करते थे और दूसरे से भी आने की अपेक्षा करते थे। परंतु उन्हे बहुत जल्द ही दिल्ली और एक छोटे शहर के मिज़ाज में फ़र्क का पता चल गया। उन्होने एक कहानी लिखी ‘कुत्ते’, जिसमें इस शहर के मिज़ाज का कटाक्ष किया है।



कांतिमोहन घोषित तौर पर वामपंथी थे। जीवन पर्यन्त उनकी इस विचारधारा पर आस्था बनी रही। उनकी रचनाओं में वामपंथी और सेकुलर दृष्टि दिखती है। उनकी एक कहानी बेअंत का अंत 1984 के दंगे पर एक महत्वपूर्ण रचना है। लेकिन गूंगी गुडि़या अपनी मासूमियत कम कर लो’,‘दूसरा पहलू’, ‘कुत्ते’ आदि कुछ कहानियों में उनकी यौन शुचितावादी दृष्टि ही अधिक उजागर होती है। कहानी कुत्ते में देहरादून के किसी रेस्तरां का जि़क्र है जिसमें एक युवा जोड़ा प्रेम में डूबा है। अपनी इस कहानी में उनके इस कृत्य का वह माॅरल पुलिस की दृष्टि से वर्णन करते हैं। बेरोजगारी के दिनों में जो उन्होने लघु उपन्यास पर कथा है शेष लिखा था वह सन 2010 में प्रकाशित हुआ। अपने इस उपन्यास में भी उन्होने प्रोफेसर के अन्य कुकृत्यों के बजाए उसे यौन शोषण के कारनामों को ही केन्द्र में रखा था।

उनकी भाषा इतनी सुगठित है कि कोई भी वाक्य या शब्द अतिरिक्त नहीं लगता। कभी कभी भाषा की इस कसाव से अन्तर्वस्तु की जीवन्तता प्रभावित होती है। फिर भी उनका गद्य पढ़ कर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। उन्होने कम समयान्तराल में बहुत कहानियां लिख दीं। इसलिए एक साथ पढ़ने पर वे किसी महागाथा या उपन्यास का हिस्सा होने का आभास देती हैं। लघु उपन्यास पर कथा है शेष के अलावा दो कथा संग्रह दूसरा पहलू, बे अंत का अंत, गज़ल एवं गीत संग्रह कदम मिला कर चलो, रात गए, गुनाहे सुखन तथा आजादी के पहले के गीतकार और फि़ल्मी गीत प्रकाशित हैं। कांतिमोहन ने बहुत अधिक नहीं लिखा तो बहुत कम भी नहीं लिखा। अभी उनके साहित्य का मूल्यांकन होना शेष है। उन पर बहुत सारी स्मृति कथाएं आनी शेष हैं।



और अंत में उनकी एक गज़ल-



यां तलक जान पर बन आई बहुत रात गए।

हमने जीने की कसम खायी बहुत रात गए।।



कैसे कह दूँ कि मेरे कान में रस घोल गई।

दूर बजती थी जो शहनाई बहुत रात गए।।



हम थे नादां हंसे तो इक बार हंसते ही गए।

दिन की करनी पड़ी भरपाई बहुत रात गए।।



कल समुंदर में मचा होगा घमासान बहुत

दर्द लेता रहा अंगड़ाई बहुत रात गए।।



चीख निकली ही नहीं लाख जतन कर देखे

‘सोज़’ को डस गई तनहाई बहुत रात गए।।