( कई बार बहुत महत्वपूर्ण साहित्यिक आयोजनों की रिपोर्ट उस वक्त किन्हीं कारणों से सही जगहों पर आने से रह जाती है, अथवा उनकी तरफ बहुत अधिक ध्यान नहीं जा पाता. कई बार पत्र-पत्रिकाओं में स्थान की सीमा के चलते भी विस्तृत रिपोर्ट नहीं जा पाती. हम ‘ लिखो यहाँ वहाँ ’ में कुछ इस तरह के आयोजनों की विस्तृत रिपोर्ट प्र्काशित करने के सिलसिले शुरुआत आलोचक रश्मि रावत द्वारा प्रस्तुत इस रिपोर्ट के साथ कर रहे हैं. हमें उम्मीद है कि इस रिपोर्ट में उल्लेखित कुछ महत्वपूर्ण आलेख भी यहाँ प्रस्तुत कर सकेंगे)

श्रीकांत वर्मा सृजनपीठ (छत्तीसगढ़), छत्तीसगढ़
पर्यटन मंडल एवं जिला प्रशासन-गौरेला-पेण्ड्रा-मरवाही (छत्तीसगढ़) के संयुक्त
तत्वावधान में कबीर चबूतरा, अमरकंटक में दिनांक 24 अगस्त 2023 से 28 अगस्त 2023 तक
पाँच दिवसीय रचना-शिविर का आयोजन किया गया । इस अभिनव प्रयोग में विभिन्न वय, विचारों और विधाओं के सुपरिचित रचनाकारों ने शिरकत की। चारों ओर
से सुरम्य जंगल से घिरा आयोजन-स्थल,
गोष्ठी-स्थल के ठीक सामने विशाल बरगद, सचमुच नीला आसमान, ‘हरे जैसे हरे’
पेड़-पौधों को झूमते देखते हुए कार्यक्रम-पूर्व के पलों में महसूस हुआ कि इंतजार
इतना खूबसूरत भी हो सकता है । स्वच्छ, शुद्ध वातावरण में हवा की सरसराहट और पंछियों की चहचहाहट सुनते हुए हल्की, मीठी
सी ठंड और बीच-बीच में होने वाली बारिश की फुहारों के बीच साहित्यिक विचार-विमर्श एक अनुपम अनुभव रहा।
24 अगस्त सुबह 10 बजे कार्यक्रम का आगाज़ रचना-शिविर के संयोजक और ख्यात लेखक रामकुमार तिवारी के उत्साहवर्धक
स्वागत वक्तव्य से हुआ। उन्होंने कहा कि विभिन्न विधाओं और विचारों के रचनाकारों के बीच आत्मीय और रचनात्मक संवाद स्थापित करने की मंशा इस आयोजन की प्रेरणा रही है । साहित्य और कलाएं दृष्टियों की विविधता से ही समृद्ध होती हैं और इनके बीच विचार-विमर्श जारी रहना चाहिए। प्रत्येक वक्तव्य के लिए 20 मिनट की समय-सीमा निर्धारित है । प्रत्येक सत्र के बाद प्रश्नोत्तर होंगे। सभी सहभागियों
से स्वतंत्र और अनौपचारिक संवाद की अपेक्षा है ।
उसके बाद वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल ने निर्मल वर्मा की
पुस्तक ‘धुंध से उठती धुँध’ से अमरकंटक
प्रवास के अनुभवों पर लिखे गए डायरी-अंश ‘माई का स्रोत’ का पाठ किया । “कोई भी शब्द इस विराटता को नहीं नाप सकता।...कोई मौका आता है जब प्रकृति हमारी
भाषा छीन लेती है, तब असली मौन आता है। भीतरी मौन…..” निर्मल वर्मा के इन शब्दों के राग
में समूचा आयोजन ढला रहा।
साढ़े दस बजे शुरु हुए पहले सत्र का विषय था ‘सृजन, समाज और साहित्य’ ।
इस सत्र के संचालक युवा कवि, संपादक अविनाश मिश्र थे । युवा कवि-आलोचक अच्युतानंद
मिश्र ने ‘साहित्य और समाज का आत्मबोध’ विषय पर अपने वक्तव्य में
सर्जक और समाज के बीच सभ्यता के इतिहास में हमेशा से चलती आयी बहस के निर्णायक
मोड़ों के हवाले से सृजन की यात्रा दिखाने की कोशिश की।
उन्होंने कहा – यह बहस हजारों सालों से चली आ रही है कि सृजन वैयक्तिक है या
सामाजिक । यह सवाल ही गलत है क्योंकि वैयक्तिकता और सामाजिकता विच्छिन्न नहीं, वे
एक दूसरे में शामिल होते हैं। दो हाथों का स्वतंत्र होना मानवीय इतिहास की सबसे
बड़ी परिघटना है । बिना संघर्ष के प्रकृति से कुछ पाना कला का पहला उदाहरण है ।
इससे प्रकृति के समानांतर एक नई प्रकृति बनी । प्रकृति से स्वतंत्रता ने एक तरह का
स्वतंत्रता-बोध दिया । जब बिना खुद मेहनत किए मनुष्य को दूसरे मनुष्य से फल मिला
होगा तो उसके भीतर जो संवेदना आई होगी वह पहली संवेदना कही जा सकती है। इससे
प्रकृति के समानांतर एक दुनिया को कतने-बुनने की शुरुआत हुई। जाने गए को परिभाषित
करने की कोशिश वैज्ञानिक चेतना है और जाने गए का अतिक्रमण करने की कोशिश सृजन है।
प्लेटो ‘रिपब्लिक’ में समानांतर संसार को समझने की कोशिश करता है। कला दुनिया के तमाम
‘रिपब्लिक्स’ से बाहर है। यही कला का संघर्ष है कि वह ‘रिपब्लिक’ के अतिक्रमण का
प्रयास करती है।

एक मिथक के उदाहरण से अच्युतानंद जी ने मनुष्य की आकांक्षा और कल्पना को
बेहतरीन ढंग से समझाया कि उड़ने की इच्छा से एक युवा ने मोम के पंख बनाए । उड़ान
शुरु करने पर पिता ने कहा कि सूरज जितना ऊँचा न उड़ना, वरना पंख जल जाएँगे । पंख
जलते हैं मगर उड़ान नहीं रुकती । यही कला का स्वप्न है - यथार्थ के अतिक्रमण का
ख्वाब जिंदा रखना। एक समय की कल्पना दूसरे समय का यथार्थ बन जाती है। उड़ने का
स्वप्न भी 17वीं, 18वीं सदी में यथार्थ बनता है । कला में तीनों काल एक साथ होना
संभव है। वह देश-काल दोनों का ही अतिक्रमण कर सकती है।
मनुष्य की सभ्यता-यात्रा में यंत्र का आगमन कला में बड़ा बदलाव लाता है । गति
प्रकृति के परे चली जाती है । गति का ऐसा सृजन हुआ कि हमारा आभ्यंतर बदल गया ।
यहाँ से प्रकृति के समानांतर कला को चुनौती मिलती है। सौंदर्यबोध अप्रतिम या अगाध
नहीं होता, वह मनुष्य की ऐंद्रिय क्षमता की सीमा में होता है। उदाहरण के लिए 800
मेगापिक्सल में खींची गयी तस्वीर का ऐंद्रिय संवेदन नहीं हो सकता। इस तरह की बहुत
सी चीजें हमारे जीवन में दाखिल हो गई हैं जिनका हमारी इंद्रियों से संबंध नहीं बन
पाता।
दुग्ध क्रांति के बाद क्रांति का पूरा अर्थ ही बदल गया। पी.टी. ऊषा एक सेकंड
के सौवें हिस्से से हार गई। यह दुनिया की पहली डिजिटल घड़ी है। यहाँ से तार्किकता
से सोचना हमने बंद कर दिया। सेकंड के सौवें हिस्से को हम कैसे समझें ? लिहाजा हमने
बिना समझे ‘मानना’ शुरु किया।
सृजनात्मकता की भूमिका यही है कि वह ताकत के विरोध में खड़ी हो । विडम्बना यह
है कि लेखक को ताकत का हिस्सा बना दिया जा रहा है। सोशल मीडिया में ‘लाइक’ आदि की
संख्या के फेर में बायनरी में सोचने की आदत पड़ती जा रही है। मनुष्य के भीतर जो
नकार की चेतना है, वह उसकी बहुत बड़ी ताकत है। मनुष्य इस चेतना का इस्तेमाल करके
नकारना शुरु कर दे तो ‘ग्रांड निगेशन’ जैसी कोई चीज आए। डिजिटल टेक्नोलॉजी
ने अपने भीतर कैद कर दिया जबकि लेखन की सबसे बड़ी ताकत थी कि वह कई समयों का
अतिक्रमण कर सकता था। हम सबको ‘ग्रांड निगेशन’ जैसी किसी दस्तक का इंतजार
है ।
हमारे समय की अत्यधिक गति और चीजों और सूचनाओं की अतिरेकी उपलब्धता की काट
मनुष्य की नकारने की क्षमता में देखने के आशावादी बिंदु पर पहले वक्ता ने अपना
वक्तव्य पूरा किया।
दूसरे वक्ता युवा कवि-कहानीकार अंबर पाण्डेय ने ‘सृजन, समाज और आलोचना’ विषय पर अपने वक्तव्य की शुरुआत अमरकंटक से जुड़े दिलचस्प मिथक से की। आदि-शंकराचार्य
ने अपने अल्पज्ञानी शिष्य टोटक को यहीं ज्ञान दिया था। अमरकंटक की भूमि जड़बुद्धि
को भी विद्वान बना देती है । शायद आप सब विद्वानों के बीच मुझ टोटक को भी
ज्ञानप्राप्ति हो जाए । विनोद भाव से कही गई इस बात से हॉल में गूँजे कहकहों के
बीच अंबर विषय में प्रविष्ट हुए-
पाश्चात्य और प्राच्य ज्ञान में सृजन, समाज और आलोचना एक साथ आए । तीनों का
एक-दूसरे के बदले प्रयोग कर सकते हैं । कैलकुलेटिव विचार हम प्रकृति, गणित आदि से
कर सकते हैं । मेडिटेटिव विचार की अलग फैकल्टी है। मेडिटेटिव विचार ओटोनिका समुदाय
में पाए जा सकते हैं। ओटोनिका समुदाय वह है जो वहीं की जमीन से निकले, कहीं बाहर
से नहीं आए। प्लेटो का कहना है कि सच को जाना और अभिव्यक्त नहीं किया जा सकता, सच
खुद प्रकट होता है। प्लेटोनिक थॉट के अनुसार ग्रीक लोगों ने रक्त-शुद्धता बचाने के
लिए जो नियम बनाए, वे कला के पहले नियम हैं । ऑक्टोनी शब्द का प्लेटो कई बार
प्रयोग करते हैं । ऊपर उठने की कोशिश ऑक्टोनी के खिलाफ है ।
सृजनात्मकता को लेकर इससे मिलता-जुलता विचार भारत में भी है । नैयायिक दर्शन
के अनुसार जो भी हम इंद्रियों से देखते हैं वह एंद्रिय है, जबकि मन अतींद्रिय है ।
सृजन हमारी स्वाभाविक वृत्ति है, क्योंकि वह कॉगनिटिव है। उसमें आत्मवीक्षा है। वह
मनुष्य के स्वभाव में, उसकी प्रकृति में है। ग्रीक और भारतीय विचार में आलोचना और
सृजन एक चीज है । सृजन के प्रकार हैं - अनुकरण, अनुकर्तन, कंपटीशन । अरस्तू ने
सृजन पर बहुत कुछ लिखा है। अनुकरण करो तो कला खुद आती है। कला अनुकृति है । कलाकार
मुंशी नहीं है जो दुनिया का बहीखाता बनाए । वह तो उसमें बदलाव लाना चाहता है।
संचालक अविनाश मिश्र की टिप्पणी थी कि अम्बर जी के पांडित्यपूर्ण वक्तव्य से
हमारा अनेक नए शब्दों, प्रत्ययों से परिचय हुआ, लेकिन समाज या समकालीनता उसमें
गैर-हाज़िर रहे ।
तीसरी और अंतिम वक्ता वरिष्ठ कवयित्री गगन गिल ने अच्युतानंद के गति वाले
उदाहरण से अपना वक्तव्य शुरू किया। इस दृष्टि से गति की तीव्रता को अभिव्यक्त करने
से उन्हें दिए गए विषय ‘उदासीन परिवेश
और सृजनात्मकता’ का मर्म
खुला । उन्होंने कहा कि अच्युतानंद ने कहा कि तकनीक ने हमें ऐसी घड़ी दे दी जिससे
हम सेकंड का सौवां हिस्सा नाप सकते हैं और किसी की हार-जीत तय कर सकते हैं। प्रश्न
घड़ी का नहीं। इतने परिश्रम के बाद भी आपके लिए एक हार खड़ी है। हम गति को
ट्रांसेंड करने की कोशिश करते हैं।
हम उदासीन क्यों हो जाते हैं?
उदासीन होना मरना नहीं है। मर रहे हैं - इसकी और इस बात की तकलीफ है कि अपने मनुष्य
होने के नाते क्या मैं कुछ भी नहीं कर सकता ? परिवेश, साहित्य, पॉलिटिकल करेक्टनेस
का दवाब तो है ही । भाषा भी हमारे अनुभवों को सरलीकृत करती रहती है । भाषा जब
अनुभवों का सरलीकरण करती है तो उसे भी हम resist करते हैं। कौन से ग्रंथ से पता चले कि अच्छी कविता क्या है ? कविताओं में
अमूर्तन बहुत होता है। अलग-अलग कवियों को उनकी दृष्टि से पढ़ा । कविता ह्यूमन
हार्ट के ऑथेंटिक एक्सपीरियंस के बारे में है। कविता में झूठ या ‘प्रेजेंटेशन’ हो
तो आसानी से पकड़ लिया जाता है । फिर भी हम पढ़ते रहते हैं। हम देखना चाहते हैं कि
यह हमारे साथ क्या खिलवाड़ करती है।
‘हार्ट ऑफ पोएट्री’ में ‘हार्ट ऑफ डार्कनेस’ भी है और यह बदलता
रहता है। कविता को ‘हार्ट ऑफ पोएट्री’ से निकल कर दूसरी ओर भी जाना चाहिए।
अगर न जाए तो बात नहीं बनेगी। पाठकीय प्रतिक्रियाओं पर क्या हमने ध्यान दिया? जहाँ दो सीमाएँ टूटती हैं या मिलती हैं - कोई बड़ा खेल वहाँ हो रहा होता है।
हम वहाँ उसे ढूँढते हैं। लिखने का दंभ करते हुए हमें यह पता होना चाहिए कि हमारे
वाक्य हमसे अधिक मरणशील हैं। एक संकेत जो सिर्फ हमारी भाषा में संभव है, वह हमारी
पकड़ में आ जाए कि कुछ तो बिंदु मिले कि यहाँ कुछ मिलेगा । यही कोशिश होनी चाहिए।
उदासीनता को रोकने का एक ही तरीका है कि आप बार-बार ‘साइलेंस’ की ओर
जाएँ। एक थरथराते हुए पत्ते को देखकर ‘मेरा दिल कितने दिनों से नहीं काँपा’ - ऐसा कुछ समझ आता है तो वहाँ से कोई यात्रा शुरू होती है । कविता is not about knowledge, it is looking for something. अच्छी कविता को सूत्रबद्ध करने का कोई नियम नहीं है । होता तो हमारे विजनरी ऋषि बता
गए होते। कविता संभव ही तब होती है जब सूत्रबद्ध होना संभव नहीं है। कवि को पढ़कर
सबके दिल में भाव आएंगे। ऐसा नहीं कि किसी को अच्छा लगे किसी को नहीं। यह जो हम
जन्म लेते ही आत्म-मुग्ध हो जाते हैं, आत्ममुग्ध होना किसे नहीं अच्छा लगता ?
‘उदासीनता और परिवेश’ को लेकर ये बातें फौरी तौर पर मुझे सूझीं । मैं पाठकों और प्रबुद्ध वर्ग की
आभारी हूँ कि वे मेरे काम को गंभीर समझते हैं। गंभीरता इसलिए है कि मैं कभी
अकादमिक सेमिनारों में नहीं बोली। कभी सीधी राह नहीं चली। मैंने अपनी कल्पना से
चीजों को तोड़कर देखा। इस शिविर की सार्थकता यही होगी कि हम अपने चश्मे यहीं
छोड़कर जाएँ। हम नई ऊर्जा, नई चुनौती लेकर जाएँ। शिविर का काम है कि हम नए रास्ते खोजें
। पुराने तो चलकर देखे । कोई तो नया रास्ता बनाना पड़ेगा। अपने को तोड़ना होगा।
अच्छा लेखक वही है जिसके पीछे बहुत सारा वेस्ट पेपर है। अगर किसी लेखक के पास रद्द
किए गए टेक्स्ट न हों तो वह अच्छा रचनाकार नहीं हो सकता।
सवाल-जवाब सत्र में युवा आलोचक रश्मि रावत ने अच्युतानंद जी से पूछा कि हर
चीज, हर काल अभी इसी पल उपलब्ध है। टेक्नोलॉजी ने देश-काल को सिकोड़ कर जैसे
मनुष्य की मुट्ठी में ला दिया हो। सूचना विस्फोट और प्रचंड उपभोक्तावाद के इस युग
में ‘ग्रांड निगेशन’ जिसे आपने समाधान बताया है, वह कैसे बनेगा- इस बात को
थोड़ा और खोल कर बताएँ ।
वरिष्ठ कथाकार योगेंद्र आहूजा ने अच्युतानंद से पूछा कि हम यन्त्रविधि को
मनुष्य की सामर्थ्य का और उसकी मदद से अनुभूत चीजों को अपने सौंदर्यबोध का विस्तार
क्यों न मानें ? बेशक इससे इनकार नहीं कि उसके उपयोग के लिए विवेक का इस्तेमाल या
कहें ‘नकारने का विवेक' जरूरी है । चेक कवि मिरोस्लाव होलुब, जो एक वैज्ञानिक भी
थे, ने कहा था कि माइक्रोस्कोप में देखना भी उनके लिए एक अनूठा काव्यात्मक अनुभव
रहा । उनकी एक कविता का शीर्षक ही है – “In the microscope”. आधुनिकतम
तकनीक के बिना हमें प्रकृति के अति-सूक्ष्म कणों की चकित करने वाली ‘क्वांटम’
दुनिया का, परमाणुओं में परिव्याप्त ‘बेचैनी’ और ‘अस्त-व्यस्तता’, उनकी ‘नटराज’ सरीखी
रचना और उनके भीतर उप-परमाणविक कणों के ‘तांडव’ जैसे नृत्य का बोध कैसे हो सकता ? अच्युतानंद
ने जवाब में कहा कि सौंदर्यबोध के जितने भी उदाहरण मिलते हैं, वे इंद्रियबोध के
समानांतर हैं। यह मेरी बात को पुष्ट करता है कि तमाम डिजिटल विकास के बाद भी हम
इंद्रियबोध के समानांतर कलाओं तक जाते हैं।
गगन गिल ने बातचीत में शिरकत करते हुए जोड़ा कि टेक्नोलॉजी नहीं, मनुष्य की
कल्पना उसे पकड़ रही है ।
दूसरे सत्र का विषय था – ‘अनुवाद : वैश्विक भूमिका’ । संचालन किया अच्युतानंद मिश्र ने । मधु बी. जोशी ने पेपर पढ़ा, जिसका शीर्षक
था- ‘अनुवाद सदा से मनुष्यों के बीच संप्रेषण का आधार
रहा है’। उसके कुछ अंश -
“भारत जैसे बहुभाषी देश में
औसत रूप से चैतन्य लोग एकाधिक भाषाओं में सामान्य संवाद करते रहे हैं। भारत में
भाषांतर, तर्जुमा, रूपांतर, विवर्तन, लिप्यंतरण आदि अनुवाद के अनेक रूपों का
प्रचलन और भारतीय भाषाओं का साझा सूत्र संस्कृत अनुवाद को ऐसा सहज कर्म बना देते
हैं कि कभी-कभी हम जान भी नहीं पाते कि कोई रचना या अवधारणा अनुवाद का परिणाम है।
हूण-शक-यवन-अरब-फारसी-यूरोपियन अपने साथ नए नज़रिए और भाषाएँ लाए । उन्होंने भारत
में प्रचलित विचारों को प्रभावित किया और औपचारिक अनुवाद की आवश्यकता तैयार की।
अनुवाद की दृष्टि से दो महत्वपूर्ण काल मुगलकाल और ब्रिटिशकाल थे। भारत में भाषा
विचार की संवाहक मानी जाती थी और संदर्भ के अनुसार नए शब्द गढ़ना और शब्दों के
अलग-अलग अर्थ लगाना आम चलन था। इस तरह अनुवाद एक व्यक्तिनिष्ठ प्रक्रिया थी जो
अनुवादक के व्यक्तित्व की परिचायक भी थी। मोटे तौर पर भारत में एक अच्छा अनुवाद
मूल पाठ के रस और ध्वनि को संप्रेषित करता था।
मूल पाठ की जस की तस प्रस्तुति पश्चिम से आई अवधारणा है । इसलिए अनुवादक के
लिए मूल और अनूदित पाठ से जुड़ी संस्कृतियों से भी परिचय जरूरी बना । यहाँ एक
समस्या आती है अलग-अलग भाषा-संस्कृति से जुड़े पाठकों के लिए अनूदित पाठ की
ग्रहणीयता । एक और समस्या सत्ता समीकरण के चलते आती है। अनुवादक अक्सर भारतीय
भाषाओं की रचना के साथ अतिरेकी किस्म की
छूटें लेने लगते हैं ।
अनुवाद को मूल लेखन से हीन मानने के पीछे औपनिवेशिक मानसिकता है। राजनीतिक
वर्चस्व स्थापित करना हो तो अनुवाद ही वैतरणी पार करवाता है। अनुवाद संस्कृतियों
और भाषाओं के बीच सेतु रचता है। अनुवाद के लिखित इतिहास की दृष्टि से मिस्र बहुत
महत्वपूर्ण है। ईसा से 3000 साल पहले स्थापित यह राज्य अनेक भाषाई और जातीय समूहों
का संगठन था। ईसा से पाँच सदी पहले मिस्र आए ग्रीक इतिहासकार हेरोडोटस ने वहाँ के
दुभाषियों और अनुवादकों को सम्मानित जाति बताया। सिकंदर की मिस्र-विजय के बाद
ग्रीक अनुवाद की जरूरत बढ़ी। बहुभाषी अंकनों का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण तीन लिपियों,
प्राचीन मिस्त्री चित्रलिपि, मिस्त्री लिपि और प्राचीन ग्रीक में जारी 196
ईस्वी-पूर्व का एक आदेश रोजेट्टा स्टोन है जो अपने आप में किंवदंती बन चुका है।
14वीं सदी में जब इतालवी लेखक ज्योवानी
बोकात्वियो ने मौखिक परंपरा और लैटिन और फ्रैंच स्रोतों से पाई कुछ कहानियों को अपने ढंग से डेकामेरॉन श्नाम की किताब के
रूप में प्रस्तुत किया तो यह जनसामान्य के दैनंदिन ज्ञान और नैतिकता पर चर्च के
एकाधिकार के मुखर प्रतिरोध का सूत्रपात करने वाली घटना बनी । जल्दी ही इसके
अंग्रेजी सहित यूरोप की सभी प्रमुख भाषाओं में अनुवाद और रूपांतरण प्रकाशित हुए,
यहाँ तक कि लोक ने उसे एक महत्वपूर्ण शैक्षिक उपकरण का दर्जा दे दिया। बोकात्वियो
को यह कहानियाँ भले ही यूरोप की परंपरा से मिलीं लेकिन इनका उत्स फारस, अरब और
भारत जैसे देश थे जहाँ ये सदियों से मौखिक और लिखित परंपराओं में प्रचलित थीं।
लगभग पूरे संसार में उपयोग हो रहे आधुनिक रोमन अंक, गणित, रेखागणित और खगोलशास्त्र
के महत्वपूर्ण सूत्र और ज्योतिष की कुछ अवधारणाएँ इस आदान-प्रदान के साक्ष्य हैं।
साहित्य और ज्ञान के प्रसार में, अपरिहार्य लेकिन अनदेखी सी कर दी गई, बहुत
महत्वपूर्ण भूमिका अनुवाद की रही। आधुनिक अध्येताओं ने पाया कि ईसप की कहानियों के
सूत्र प्राचीन सुमेर और अक्काद साहित्य में ईसा से तीन हजार बरस पहले मौजूद थे। इस
खोज ने नए प्रश्न को जन्म दिया है – ये कहानियाँ भारत से ग्रीस पहुँची या ग्रीस से
भारत?
समाजशास्त्री फूको के अनुसार शिक्षा निरपेक्ष गतिविधि नहीं
है । कोई भी समाज-व्यवस्था उन्हीं मूल्यों को समर्थन देती है जो उसकी
राजनीतिक-सामाजिक आकांक्षाओं की पूर्ति के साधन बनते हैं। अनुवाद के साथ भी ऐसा ही
है। सत्ता केवल अपने एजेंडे को बढ़ाने में सहायक अनुवाद और ज्ञान को प्रश्रय देती
है । पंचतंत्र की कथाएँ स्थिति के अनुसार चुनाव को आदर्श विकल्प के रूप में
प्रस्तुत करती हैं। वे खुद को केंद्र में रखते हुए हर हाल में खुद को बचा ले जाने
की सीख देती हैं। ये कहानियाँ राजपुत्रों को सफल-समर्थ शासक बनने को प्रेरित करने
के लिए चुनी गई थीं। इनकी चरम परिणति राजपुरुषों के आदर्श व्यवहार और आचरण के बारे
में राजनीतिक विचारक मैकियेविली के लेखन में होती दिखती है।
यूरोपीय उपनिवेशवादियों का शैक्षिक उद्यमों के ज़रिये ईसप की कहानियों को एशिया
और अफ्रीका में स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध करवाना ऐतिहासिक विडंबना थी क्योंकि
इनके कथासूत्र इन समाजों के लोकसाहित्य में पहले ही उपस्थित थे।
धर्म के चेहरे को बदलने और उसे अधिक
लोकोन्मुख और सर्वसुलभ बनाने में अनुवाद की भूमिका के दो बड़े उदाहरण हैं रामायण
और बाइबिल के 16वीं सदी में आए संस्करण। इन ग्रंथों ने अपनी भाषा और युग को नए
शब्द, मुहावरे और अवधारणाएँ तो दीं ही, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव की प्रक्रिया को
भी प्रभावित किया। दरअसल इस अनुवाद की शुरूआत पहले ही जर्मन बोलियों में लैटिन
स्रोतों के अनुवाद और भारतीय बोलियों में भक्ति और ज्ञान के पदों की रचना से हो
चुकी थी। यूरोप में बाइबिल के अनुवादों को यूरोप की राजसत्ताओं पर रोमन कैथोलिक
चर्च की कड़ी जकड़ तोड़ने वाली घटना माना जाता है जिसने आखिर अरब में ईसाई और
मुसलमान सेनाओं के बीच चलने वाले धर्मयुद्धों को लगभग खत्म कर दिया। भक्ति काव्य
ने हिंदू धर्म के मूलाधार, चातुर्वर्ण पर पुनर्विचार किए जाने की जरूरत को
रेखांकित किया और यह क्रम अब भी जारी है।
अनुवाद जैसा निरापद, निरीह लगने वाला कर्म अपने साधक के लिए खतरनाक क्यों और
कैसे बन जाता है ?
जवाब है : जव वह व्यवस्थित धर्म और
राजनीति के निशाने पर आता है।”
इस बात को अनेक उदाहरणों से पुष्ट करते हुए मधु जी ने अपना वक्तव्य समाप्त किया।
दूसरी वक्ता कवि-लेखक-फिल्मकार राजुला शाह ने विन्सेंट वैन गो के अपने भाई
थियो के नाम लिखे गए शताधिक पत्रों और ईरानी कवयित्री फरुग फरुखजाद की कविताओं का
अनुवाद किया है । अनुवाद के इन अनुभवों के हवाले से उन्होंने अनुवाद की भूमिका पर
अपना परिप्रेक्ष्य रखा-
घर में बालपन से ही अनेक भाषाएँ सुनी थीं। किसी शब्द को इस या उस भाषा में
क्या कहते हैं, ये चर्चाएँ सुनते हुए ही बड़ी हुई, इसलिए बचपन में ही अनुवाद के
संस्कार मेरे भीतर पैदा हो गए। माँ मालवा के शब्दों का, पिता कुमाऊँनी शब्दों का
प्रयोग करते और दोनों हिंदी में लिखते। इस तरह से देखें तो अनुवाद जीवन का हिस्सा
था। बचपन में ही मैंने एक नाटक का अनुवाद किया था और उसमें एक भूमिका भी निभाई थी।
इसे अनुवाद की शुरुआत कहा जा सकता है। फिर सिनेमा के क्षेत्र में अलग-अलग मिजाज की
विविध भाषाएँ सुनने को मिलती रहीं। श्रवण परंपरा का मेरी अनुवाद प्रक्रिया पर अधिक
असर है।
अनुवाद करने की प्रक्रिया में जिस तरह
से किताब पढ़ी जाती है, वैसे अन्यथा नहीं पढ़ी जाती। लगभग दस साल विन्सेंट के
पत्रों के अनुवाद में लगी रही। कला के लिए जो शब्द प्रयुक्त किए गए थे, उनके लिए
शब्द कहाँ से लाएँ ? ऐसी अनेक चुनौतियाँ थीं। जैसे कलर थ्योरी में कलर पैलेट पर
मिक्स नहीं किए जाते- वैन गो कहते हैं कि मैं हरेक रंग को उसके पास रख देना चाहता
हूँ जैसे लाल के पास पीला या हरा या कोई भी रंग। ऑप्टिकल मिक्सिंग आपकी आँखों में
होनी चाहिए - यह लक्ष्य भाषा में कहने से बात ही खो जा रही थी। इसके लिए
अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोष बिल्कुल काम नहीं आया। एक तो हिंदी को नीरस भाषा बना दिया
गया है। रवींद्रनाथ टैगोर की किताब ‘मेरा बचपन’ का जो अनुवाद हजारी प्रसाद द्विवेदी ने किया है, वैसी उछलती-कूदती हिंदी तो
दिखती ही नहीं । भाषा का सार्वभौमीकरण मुझे चुनौती लगा।
कविताओं का अनुवाद और विंसेट के पत्रों का अनुवाद, ये बहुत अलग अनुभव थे ।
उसमें भी बहुत समय लगा। अनुवाद को मैं धन्यवाद दूँगी, इसने मुझे मेरी भाषा लौटाई,
नयी चीजें सिखाईं। भाषा की मौखिक परंपरा से मैं अधिक सम्बद्ध महसूस करती हूँ।
लिखित में चीजें रूढ़ हो जाती हैं। मौखिक में रवानगी है, उन्मुक्तता है। भोपाल में
बचपन बीता इसलिए भारत-भवन में होने वाले तमाम वक्तव्यों और बातचीत को सुनने की
स्मृति है मेरे भीतर, छुटपन में वे गंभीर बातें कम समझ आती थीं। मगर शब्दों के बीज
भीतर पड़े रह जाते हैं।
‘तनाव’ पत्रिका में प्रकाशित अपने द्वारा अनूदित ईरानी कवि फरुग फरुखजाद की दो
कविताओं- ‘सालता है दुख कविता का’ और ‘ईश्वर से मुखामुखी’ का प्रभावी पाठ उन्होंने किया ।
दो प्रभावी वक्तव्यों के बाद हम तीसरे और सत्र के अंतिम वक्ता अम्बर पाण्डेय
से मुखातिब थे । अनुवाद की भूमिका को लेकर उनके विचार पूर्व-वक्ताओं से नितांत
भिन्न थे । इन पर खूब सवाल-जवाब भी सत्र के अंत में हुए। पहले ही वाक्य से अपनी
मान्यता को स्पष्ट करते हुए उन्होंने वक्तव्य को विस्तार दिया-
अनुवाद विरोधी हूँ मैं । अनुवाद एक तरह की घुसपैठ है। पुरानी भाषाएँ जैसे
संस्कृत, अनूदित तो होती थीं मगर हमें उनके अनुवाद नहीं मिलते। प्रकृति में भी ऐसे
बहुत से स्थल होते हैं जो सबके लिए उपलब्ध नहीं होते, संस्कृति में भी हो सकते
हैं। मगर हम जबरन उनमें प्रवेश करते हैं। दूसरी भाषा का ग्रंथ अपनी भाषा में लाकर
क्या हम समृद्ध होते हैं? टेक्सट को ज्यादा से ज्यादा
पढ़ने की भूख कंज्यूमरिज्म है । पुरानी संस्कृतियाँ याद करने पर जोर देती थीं।
अनुवाद एक तरह से मौखिक परंपरा के खिलाफ है। स्मृति में होना वहाँ संभव है जहाँ टेक्स्ट
की उतनी प्रचुरता न हो। अनुवाद से संस्कृति समृद्ध हो, जरूरी नहीं।अगर फ्रैंच
कविता का अनुवाद अंग्रेजी से करें तो यह ग्रैंडसन रिलेशन है। एक भाषा बीच में आती
है।
शब्दों की वजह से कुरान कुरान है। अनुवादक अभिशप्त है, वह सिर्फ अर्थ का
अनुवाद कर सकता है शब्द का नहीं। वाक्य संरचना अलग होने से फर्क पड़ता है। अनुवाद
का महिमामंडन आवश्यकता से अधिक है।
संस्कृतियों का अनुवाद नहीं हो सकता।
मधु बी. जोशी ने अपनी टिप्पणी में कहा कि मौखिक में भी बहुत विक्षेप होते हैं।
अच्युतानंद ने कहा कि मौखिक से लिखित टेक्सट में आना सभ्यता-विमर्श का हिस्सा है।
प्रिंट होने से जो विकल्प आए हैं, उसे रोक नहीं सकते। संस्कृतियों के आदान-प्रदान
से अनुवाद की जरूरत पैदा होती है।
अंबर - व्यक्ति de-alienate करने के लिए लिखता है। हम generic नहीं लिखते। विशिष्टता की खोज में हम लिखते हैं।
सुप्रसिद्ध कथाकार प्रत्यक्षा ने कहा कि सभ्यताओं के हजारों साल के इतिहास में
बहुत सी चीजें कॉमन भी होती हैं। इसके अलावा नई दुनिया में घुसने की खुशी भी
मनुष्य को होती है। पाठक का उस अनुभव से रेजोनेंस होता है तो उसे अच्छा लगता है।
अंबर के यह कहने पर कि अगर आपको कोई रचना पढ़नी हो तो वह भाषा सीखनी चाहिए
बजाय इसके कि अनुवाद पढ़ें। इस पर अच्युतानंद का सवाल था कि क्या कोई दूसरी भाषा
सीखना अनुवाद से इतर है?
रामकुमार तिवारी जी का कहना था कि अनुवाद की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण है कि
अनुवाद किस इंटेंसिटी से हो रहा है।
रचना शिविर के पहले दिन का अंतिम सत्र उपन्यास पाठ का था।
वरिष्ठ कथाकार आनंद हर्षुल ने राजकमल से शीघ्र प्रकाश्य उपन्यास ‘देखना’ से अध्याय ‘न देखने की जेल’ का पाठ किया।
वरिष्ठ कथाकार जया जादवानी ने अपने उपन्यास ‘देह कुठरिया’ से शैली नाम की ट्रांसजेंडर की कहानी पढ़ी जिसका
शीर्षक था- ‘वह जिससे मुलाकात नहीं हुई’। ख्यात कथाकार प्रत्यक्षा ने अपने
उपन्यास ‘पारा-पारा’ से अंश पाठ किया। उसमें सामूहिक स्त्री-मन की कहानी थी। उसका शीर्षक था ‘हमारा बहनापा’।
युवा कवि-कथाकार अविनाश मिश्र ने अपने उपन्यास ‘वर्षावास’ से कुछ अंशों का पाठ किया । उपन्यास में आए
प्रोटोगेनिस्ट की माँ का बयान और लेखक, प्रकाशक, आलोचक, किताब, भिक्षु, ज्योतिषी,
संपादक, प्रूफ-रीडर, पोएट, कथाकार, लेखक (लेखिका की ओर से) के बयान का दिलचस्प पाठ
उन्होंने किया।
दूसरा दिन – 25 अगस्त 2023
पाँचवा सत्र
प्रातः 10 बजे पहला सत्र ‘साहित्य का सार्वभौम’ पर चार वक्तव्य प्रस्तुत किए गए। सत्र का संचालन अंबर
पाण्डेय ने किया।
‘साहित्य का समकाल और सर्वकालिकता’ विषय पर वरिष्ठ कथाकार आनंद हर्षुल के वक्तव्य से सत्र की
शुरुआत हुई |
युवा आलोचक राहुल
सिंह ने ‘साहित्य : आंचलिक एवं सार्वभौमिक तत्व’ पर वक्तव्य दिया :
आंचलिकता और
सार्वभौमिकता के विभाजन का मैं हामी नहीं हूँ। फणीश्वरनाथ रेणु के ‘मैला आँचल’ को हिंदी में आँचलिक उपन्यास का
प्रस्थान बिंदु कहा जा सकता है। फिर शिवपूजन सहाय की ‘देहाती दुनिया’ भी
है। प्रचलित समझदारी से देखें तो आँचलिकता सार्वभौमिकता
का अनुषंग है, उसका एक हिस्सा है । रीति-रिवाजों और लोकवृत्त के सहारे आँचलिकता को परिभाषित करेंगे
तो सार्वभौमिक तत्व संज्ञान से बाहर होंगे ही। आँचलिकता को जितना और जिस रूप में
चिंतन और विमर्श के रूप में एक्सप्लोर किया जाना था वह मिसिंग है। रेणु की बात
करें तो हिंदी के दूसरे ही डिबेट सामने आएंगे।
नामवर सिंह ‘मैला आँचल’ के साथ न्याय नहीं कर पाए थे। बाद में उन्होंने माना था कि
समय पर मैं रचना नहीं पहचान पाया । न पहचानने की क्या कोई राजनीति है ? बिहार भी अँचल ही था । आँचलिकता की मुहर लगा कर उसे
मुख्यधारा में न शामिल करने की राजनीति ?
आँचलिकता को पाठ के
तौर पर विकसित करने की कोशिश करें तो वह सिर्फ आँचलिकता नहीं रह जाती। उसे परिधि
के तौर पर देखें। हाशिया मान लें तो पूरा पाठ बदल जाता है। सबऑल्टर्न की
पूर्वपीठिका आँचलिकता में मिलती है। आँचलिकता का सबऑल्टर्न पाठ विकसित किया जा
सकता है। कई बार हम जिस तरह से देख रहे होते हैं, उसमें बहुत गहरे अर्थों की संभावना होती है। आँचलिकता
को वृहद् परिप्रेक्ष्य में देखे जाने की जरूरत है। रेणु ‘मैला आँचल’ में गाँव को डिफाइन करने के लिए जो पैरामीटर लाते हैं, ऐसी रचनाएं तुक्के
से नहीं गहरे कन्विक्शन से आती हैं। मसलन- “मनुष्य तो मनुष्य यहाँ तो कौए को भी बुखार रहता है/ कमली गमकौए साबुन से
नहाती है।“
निर्मल वर्मा और
रेणु जी नई कहानी के दौर में आते हैं। मध्यवर्गीय बोध वाली कहानियों के बीच रेणु
आते हैं, जिन्हें हम देख नहीं पाते। आँचलिकता कहानियों का नया स्ट्रक्चर लाती है।
आँचलिकता के लिए दूसरे किस्म का रियाज चाहिए। किन छोटी-छोटी चीजों के साथ आँचलिकता साकार होगी, उन्हें
समग्रता में देखने की समूची तैयारी थी उनकी।
लुईस गोल्डमान संरचनाओं की समधर्मिता की बात
करते हैं। कथा में लोकेल को लेकर आते हैं तो एक नई संरचना लेकर आना होता है। गद्य
में वह लोकेल लाने के लिए रेणु ने बहुत मानसिक तैयारी की। आँचलिकता के मोर्चे पर
हिंदी में जो तैयारी होनी चाहिए थी, वह नहीं है। दिल्ली वालों के लिए जैसे ‘मैला आँचल’
कठिन हो जाती है वैसे ही बिहार वालों के लिए सोबती की ‘जिंदगीनामा’ कठिन
होती है। टेक्स्ट को ट्रांसफॉर्म करने का हर किसी का अपना प्रोसीजर होता है जिससे
वह कथा के ढाँचे में ढलता है। संजीव, महुआ माजी, रणेंद्र ने आदिवासी कथा साहित्य लिखा है। जिस अँचल को हम
देख रहे हैं वह कथा-साहित्य में मौजूद है मगर आँचलिकता नदारद है।
आँचलिकता और
सार्वभौमिकता का विभाजन ठीक है ही नहीं। इनके बीच स्पष्ट लकीर नहीं खींची जा सकती।
कला के वृहत्तर संदर्भों में आँचलिकता को उसकी खासियत के रूप में पहचाना जाता है।
ईरानी सिनेमा में उसकी स्थानीयता उसकी विशिष्टता, उसकी ताकत, उसका कैरेक्टर, उसका परिवेश है। भारत में भी उपन्यास लेखन को आँचलिकता-सार्वभौमिकता में नहीं बाँधा
जाना चाहिए। वैश्विक स्तर पर लोग इसे नेशनल एलिगरी के रुप में देखते हैं । उसमें
मेटाफर पैदा करने की क्षमता होनी चाहिए।
कवि-संपादक अविनाश मिश्र ने ‘वर्तमान और अभिव्यक्ति का संकट’ विषय
पर अपने विचार प्रस्तुत किए । उन्होंने कहा – जो
संकटों के बीच होते हैं वे संकटों पर कम बात
करते हैं। रचना का संकट, अभिव्यक्ति का संकट, इन विषयों पर केंद्रीय पक्ष की तरह
गोष्ठियों में खूब विचार होता रहा है । मुझे सबसे बड़ा संकट यह लगता है कि अभी तक
लेखक दूसरों के संकटों को रचनाओं में लाते रहे हैं। अब वे दूसरे खुद लिख रहे हैं
तो अब हम उन संकटों को नहीं ला पाएंगे। जैसे दलित कहते हैं कि अब हम कहेंगे अपनी
बात। दूसरे लोग उन पर लिखें तो उस लिखने में संकट है क्योंकि उन्हें वैधता नहीं मिलेगी।
नई अस्मिताएँ आ रही हैं। उन्हें एक्सप्रेस करने के लिए नए मीडियम मौजूद हैं। वही
साहित्य वैध होगा जो ‘अपनों’ अर्थात उसी अस्मिता के लेखकों द्वारा लिखा जाएगा
जिनकी रचना पर बात की जा रही है। केंद्रीय विमर्श अस्मितागत होंगे। अदर (अन्य)
उन्हें अभिव्यक्त करेगा तो उसे वैध नहीं माना जाएगा, वह कितना भी रचनात्मक हो। ऐसे
में हमारे पास विषयों का संकट होगा क्योंकि सैल्फ पर ज्यादा दिन नहीं लिखा जा
सकता। ऐसे में लेखक बाहर से भीतर की ओर मुड़ेगा तो अध्यात्म और दर्शन को विषय
बनाएगा।
छपने के उत्साह में कमी आई है। कोई पत्रिका ऐसी नहीं जहाँ छपना बड़ी उपलब्धि
लगे, कोई प्रकाशन ऐसा नहीं जहाँ से छपकर लगे कि कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धि हुई है ।
कोई पुरस्कार ऐसा नहीं जिसे पाने का उत्साह लेखक को हो। ऐसे में सार्थकता रचना के
भीतर से ही मिल सकती है। मगर लेखक रचना के बाहर सार्थकता खोज रहे हैं जो उन्हें
बेचैनी से भर रहा है।
बहुत सी चीजें हैं जिन्हें हमें समस्याग्रस्त करके देखना चाहिए। मगर उन्हें
समस्याग्रस्त करके देखना और अधिक समस्या पैदा करता है।
एक समय था जब पॉवर सेंटर की निंदा करना झटके से आपको वैलिड बना देता था। अब वो
शक्ति केंद्र ही ढह गए हैं । एक ‘रजा फाउंडेशन’ है वह भी हास्यापद सा रह गया है।
वे किसी को वैलिडेशन नहीं दे सकते। साहित्य अकादमी का क्षरण हुआ है । साहित्य
अकादमी ने प्रगतिशील लेखकों से खुद को काटा हुआ है तो उनके प्रतिरोध का क्या अर्थ
है ? मेरे विचार में पॉवर सेंटर होने चाहिए। ऐसी प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ, स्थापित
प्रकाशन होने चाहिए जहाँ छपने की हमें ललक हो। हम आत्ममुग्ध होते जा रहे हैं। हम
पर दूसरे कम बात करते हैं। हम खुद पर ज्यादा बात करते हैं।
कुमार अम्बुज की पंक्ति है-
“एक क्षय होते
समाज में सभ्यता चुपचाप अपना काम करती रहती है।”
नई-ऩई अस्मिताओं का, नए-नए क्षेत्रों से लोगों का आना आशाजनक है। साहित्य के
स्थापित माध्यम उनके लिए खास महत्व नहीं रखते। वे अभिव्यक्त करने के लिए अलग-अलग
तरीके अपनाते हैं। फेसबुक, अमेजन आदि मैनेज करके बेस्ट-सेलर बन जाते हैं। बाकी
चीजों की जरूरत उन्हें महसूस ही नहीं होती।
चौथे और सत्र के अंतिम वक्ता वरिष्ठ कथाकार जयशंकर ने ‘सृजन का विश्व’ विषय पर
वक्तव्य दिया-
मनुष्य के होने से सृजन की शुरुआत हुई थी और मनुष्य के होने तक सृजन की दुनिया बनी
रहेगी। हमारे पुरखों ने सृजन की दुनिया संभव बनाने में बड़े जोखिम उठाए तभी यह
संभव हो पाया कि कोई एक छवि, एक शब्द, एक वाक्य आनंदित कर पाता है। आनंदित करने को
मैं मानवीय और स्वाभाविक समझता हूँ। मनोरंजन भी साहित्य का जरूरी काम है।
सृजन की दुनिया दिलचस्प कैसे बनी। चेखव की ‘गिरगिट’ में कुत्ता रास्ता
भटक गया। घर ढूँढ नहीं पा रहा है। इसे लेकर इतनी दिलचस्प कहानी बुन ली गई। चार्ली
चैपलिन की आधे घंटे की फिल्म कितनी रोचक होती है। दिलचस्पी का तत्व डोमिनेटिंग
कंस्ट्रक्ट के रूप में रहा । अगर यह न होता तो साहित्य की दुनिया में यह आभा न
होती। साहित्य की दुनिया इतनी समृद्ध समर्पित संघर्ष और जोखिम लेने से ही हुई है।
पिकासो का कथन है कि ईश्वर भी एक कलाकार ही है। वह भी पर्सनल सिग्नेचर, अपनी शैली
की खोज करता रहता है। कलाकार के लिए भी जरूरी है कि वह अपनी निर्मित छवि पर न
रुके। बनी हुई छवि को प्रश्नांकित करके दूसरी छवि की ओर बढ़े। कलाकार एकाकी
घुमक्कड़ होता है। एक मंजिल के बाद दूसरी की तलाश शुरू हो जाती है, इसलिए वह एकाकी
होता है। मेरे विचार में साहित्य का नागरिक वही हो सकता है जिसे भाषा से प्रेम या
लगाव हो। खुद की प्रतिमा को नष्ट करना उसकी कल्पनाशीलता को ऐसा तत्व देता है जो
मानवीय जीवन के लिए जरूरी है। इसी जरूरी को खोजना मनुष्य का लक्ष्य होता है। रहता
कलाकार दूसरी दुनिया में है, मगर उसके सहारे वह दूसरी अलग दुनिया बनाता है।
गोयथे समर्पण और साधना का तत्व कला के लिए जरूरी मानते हैं। कलाकार वह है जो न
रुकता है, न थकता है।
कोई सच्चा लेखक है तो रचना के लिए समय काटने जैसी चीज उसके जीवन में नहीं हो
सकती । सृजन की दुनिया में कलाकार का पेशा पादरी जैसा है । सोने के अलावा सारा समय
काम को देना है। लेखक अंधे व्यक्ति की तरह होता है जिसे दिखता नहीं मगर दिखने को
महसूस करता है। दोस्तोव्येस्की भावना को वैसे ही महसूस करते थे जैसे कोई सर्दी या
दर्द को करता है। लेखक का संघर्ष है कि वह दुनिया को क्या देता है। कलाकार की पहचान, उसकी सांस्कृतिक अस्मिता कभी
नष्ट नहीं होती । यह पहचान उसी को मिलती है जो खुद को कला की दुनिया में डुबोता
है। वह सृष्टि संसार को इतना गहरा महसूस करता है कि उसके पास कहने को कोई तत्व
नहीं होता मगर वह काफी कुछ कह जाता है।
इलियट- अच्छी कविताएँ वे होती हैं जिसे आप समझते बाद में हैं, मगर संप्रेषित
पहले हो जाती हैं। ऐसा वे कर पाते हैं जो आंतरिक जरूरत से लिखते हैं। वे हमेशा
प्रश्न पूछते हैं यह जानते हुए कि उसके जवाब नहीं मिलेंगे। सवालों से इन्हें बडा़
प्रेम होता है। मानव जीवन सीमित है मगर कला हमेशा बनी रहेगी। यह असीमित है। सृजन
की दुनिया में एक तरह की निराशा आती है क्योंकि कलाकार सीमित है, जबकि कला
सीमाविहीन है। सीमा सिर्फ मृत्यु से नहीं बनती। जीवित रहते हुए भी आप ऐसी स्थिति
तक जा सकते हैं जैसे बीमारी या स्मृति दोष से। जार्ज सेफरिस के कथन से वक्तव्य
समाप्त करता हूँ- स्याही कम हो जाती है मगर सागर फूलता जाता है।
प्रश्नोत्तर सत्र में मधु बी. जोशी ने राहुल से सवाल किया कि रेणु ने खुद
‘आंचलिक’ शब्द का प्रयोग किया था। अपने खिलाफ औजार उन्होंने ही दिया। क्या वे
हिंदी समाज की किलेबंदी नहीं जानते थे ?
जवाब में राहुल ने कहा कि हमारा समाज लिहाजदारी का समाज है। संजीव की ‘दुनिया
की सबसे हसीन औरत’ कहानी आदिवासी समाज के जनजीवन की नजीर के तौर पर सराही जाती
है। वस्तुतः वह आदिवासी जीवन के विरुद्ध है। रेणु आंचलिकता शब्द का प्रयोग अलग
परिप्रेक्ष्य में कर रहे थे। उस परिवेश को रेखांकित करने के लिए उन्होंने यह शब्द
प्रयुक्त किया मगर हम अलग अर्थ में उस शब्द का पाठ करने लगते हैं। जयशंकर जी ने
इसमें आगे जोड़ा कि हिंदी की आलोचना बहुत गरीब है।
अच्युतानंद ने अविनाश जी के वक्तव्य पर अपने विचार व्यक्त किए : आप जीवनानुभव और लेखकीय अनुभव को समान मानने की
भूल कर रहे हैं। दूसरा, अगर साहित्य में पॉवर सेंटर चाहिए तो साहित्य के बाहर भी
पॉवर सेंटर होंगे। परिवार में भी। ये पेंच है। डिस्कोर्स ने यह गड़बड़ की कि अनुभव
को साहित्य मानना शुरु कर दिया ।
25 अगस्त का दूसरा और आयोजन का छठा सत्र कहानी पाठ का था । यह 11.45 पर शुरु हुआ और इसमें तीन कहानियाँ
पढ़ी गईं। संचालन योगेंद्र आहूजा ने किया । फिल्मकार, रचनाकार राजुला शाह ने ‘आईने में कोई बिंब नहीं था’ कहानी का पाठ किया। वरिष्ठ कथाकार जयशंकर ने ‘बचपन की सर्दियाँ’ कहानी का पाठ
किया। सुप्रसिद्ध कथाकार प्रत्यक्षा ने ‘बलमवा तुम क्या जानो’ कहानी का पाठ किया।
सभी ने मनोयोग से कहानियाँ सुनीं और उनका आस्वाद लिया । सत्र के बाद लोग दोपहर
के भोजन के लिए रोज सी तत्परता से नहीं उठे । कहानियों के भावबोध का असर उन पर साफ
दिख रहा था । राजुला जी के कहानी पाठ के बाद जयशंकर जी का परिचय देते हुए उन्हें
पाठ के लिए आमंत्रित करते हुए योगेंद्र जी ने कहा भी कि एक अच्छी कहानी सुनाने के
बाद पाठकों का उसकी अनुगूंजों के साथ कुछ देर रहने का मन होता है । संचालक को उसे
तोड़ कर तत्काल दूसरी पुकार लगाने की भूमिका निभाना मुश्किल लगता है।
25 अगस्त
सातवाँ सत्र - कहानी : भीतर और बाहर
सत्र की शुरुआत ‘कहानी के भीतर
और बाहर’ विषय पर
योगेंद्र आहूजा के वक्तव्य से हुई :
‘Time is the substance I am made of’
बोर्गेस का उद्धरण है । हम सभी सिर्फ अपने
समय की निर्मिति नहीं – हम ‘समय’ से ही निर्मित भी हैं । हमारे भीतर तमाम
समय जीवित हैं - कितने ही ‘विगत-काल’, समूचा अतीत, मध्य-युग और उसके
पहले का समय, ऐतिहासिक, मिथकीय, ‘प्राक-एतिहासिक’
। पिछली सदी के मनोवैज्ञानिक कार्ल युंग बता चुके हैं कि सभी मनुष्यों का एक साझा
सामूहिक अवचेतन है जो सभी इंसानों की, जीवित और मृत, स्मृतियों को संग्रहीत करता है ।
इस सवाल के दो
हिस्से हैं - ‘लेखक के भीतर और बाहर का समय’ और ‘कथा’ या ‘गाथा’ या
अफसानों के भीतर और बाहर का समय’ । पिछली सदी में जर्मन-आस्ट्रियाई कवि रिल्के
ने एक युवा कवि फ्रान्ज़ जेवियर काप्पुस को लिखा था : -
कोई भी आपको सलाह
नहीं दे सकता और आपकी मदद नहीं कर सकता, कोई नहीं । सिर्फ एक ही रास्ता है; अपने ‘भीतर’ जाइए
। ... मेरे दोस्त, अपने ‘अंतर’ में
जाओ और अपना अस्तित्व वहीं तलाशो जहां तुम्हारी जिन्दगी का स्रोत है। ... रचनात्मक
कलाकार की दुनिया अपनी ही होनी चाहिए और उसे सब कुछ अपने अन्दर ही प्राप्त होना
चाहिए ।"
लिखने का कारण, उद्वेग, उसकी अनिवार्यता
का बोध, उसकी प्रामाणिकता
के पैमाने और उसका पुरस्कार, सब कुछ लेखक को उसके अपने अंतर में ही प्राप्त हो सकता है ।
लेकिन ... क्या इस बात का अर्थ यह भी है कि उसे जिन चीज़ों के बारे में लिखना चाहिए, वे भी उसके भीतर
से ही आनी चाहिए ? रचना का कोई
सामाजिक उद्देश्य नहीं, उद्देश्य सिर्फ एक अपरिभाषित, अव्याख्यायित या अव्याख्येय भीतरी शून्य या खालीपन को
शब्दों से पाटना है – इसलिए रचना ‘भीतर’ जन्मनी चाहिए, और भीतरी शून्य से भीतरी भराव तक की यह यात्रा भीतर ही भीतर
पूरी हो जानी चाहिए ?
दुनिया अधिकाधिक
खून और कीचड़ में लिथड़ती जा रही है । उनके कुछ छींटे शब्दों की दुनिया में भी चले
आते हैं, क्योकि शब्दों की
दुनिया भी इसी दुनिया में स्थित है, इसके बाहर नहीं । लेखक चाहे तो उन्हें पोंछकर, निर्विकार
भाव से भीतर रमे रहकर, वहां की घनी
शान्ति में ‘अंदरूनी खालीपन’ को शब्दों से भरते रह सकता है । लेकिन कोई ‘बाहर’
आकर उन छींटों का स्रोत या उत्स जानने की कोशिश कर सकता है । इस रास्ते में जिंदगी
को, अनुभवों को, सच्चाई को उनके
नग्नतम, कुरूपतम रूप में, हर किस्म के धोखे और भ्रम का, प्रवंचना का पर्दा
हटाकर उनकी यथातथ्यता में खुली आँखों देखना होता
है ।
मारिओ वर्गास
ल्योसा के एक पत्र के हवाले से उन्होंने कहा
कि हर रचना अपने काल का निर्धारण खुद करती हैं । रचना के भीतर का समय बाहरी, भौतिक समय का
गुलाम नहीं होता । लेकिन क्या दोनों का आपस में कोई नाता नहीं होता ? निर्मल वर्मा के
एक निबंध के मुताबिक रचना जीवन से जन्मती है लेकिन जन्म लेकर वह ‘स्वायत्त’
हो जाती है, अपना ही जीवन जीने
लगती है । वे इस नतीजे पर पहुँचते हैं – “ कला की कोई सामाजिक
प्रासंगिकता नहीं है, इसका सच ‘अपने आप’ में है, ‘स्वायत्त’ और ‘आत्मतुष्ट’ है और जिसकी अहमियत उसके निज के
अस्तित्व की शर्तों पर ही आंकी जा सकती है ।”
इन धारणाओं से सहमति
संभव नहीं है । रचनाओं में मानव-द्रोह, दुर्भावना, पीड़ित और आहत दिल, चरम अकेलापन और एकाकी मृत्युएँ ... आते जाते हैं । उनमें
पाप, हत्याओं, हताशा और
नाउम्मीदी के सन्दर्भ होते हैं । बेबसी और बेइन्साफियाँ होती हैं । जब हम ये
रचनाएँ पढ़ते हैं तो क्या साथ ही यह भी नहीं पढ़ते, बेचैन नहीं होते – कि यह जिंदगी का, मनुष्य का, उसके भीतर जो अकूत सौन्दर्य, सृजनशीलता, संभावनाएं होती हैं – उनका भयानक अपमान है । और क्या इनमें
एक अनकही कामना या सपना शामिल नहीं है कि यह हमेशा न होता रहे ? यह उम्मीद या सपना
तिरोहित हो जाए तो ... देखते ही देखते रचनाओं के मायने उजड़ जायेंगे । जो बचेगा वह
महज खूबसूरत लफ़्ज़ों का एक जमावड़ा होगा, शब्दों का खेल – और रचना इंसान की पीड़ा से सिर्फ एक खिलवाड़
होगी । रचना जीवन नहीं, न ही उसका स्थानापन्न - वह एक स्वप्न है लेकिन एक अराजक या
स्वच्छंद स्वप्न नहीं, जीवन को ही बेहतर
बनाने का स्वप्न । यह स्वप्न ही वह धागा है जो ‘रचना’ को ‘जिंदगी’
से और कहानी के ‘भीतर’ को उसके ‘बाहर’ से जोड़ता है ।
दोस्तोयेव्स्की के
‘करामाजोव बंधु’ में मित्या पुलिस एंटेरोगेशन के दौरान सपना देखता है कि वह
एक किसान के साथ घोडागाड़ी में है, उस इलाके में जो उसने अपने बचपन में देखे थे । वे जली हुई
काली झोपड़ियों के बीच से गुज़रते हैं । वह एक औरत का रोना सुनता है, वह न जाने कब से
रोये चली जा रही है । सपने में ही चीखता है कि वह क्यों रो रही है, सूखी हुई क्यों है, किस दुःख से काली
पड़ गयी है ? वह अपने बच्चे को
दूध क्यों नहीं पिलाती ? यह रोना कैसे रुकेगा ? इस बहुत लम्बे
स्वप्न के बाद वह आंसुओं से तरबतर जागता है और अब जुर्म कबूल करने, किसी भी कागज़ पर
दस्तखत करने के लिए तैयार है । इंसान की पीड़ा को झटककर, दामन बचाकर निकल सकने का कोई रास्ता नहीं है – और कला में
तो बिलकुल ही नहीं । सभी महान रूसी लेखक अभिजात, भू-स्वामी, ज़मींदार वर्ग से सम्बंधित थे लेकिन वे सभी रूस के किसानों, भूदासों की जो मूक
मनुष्यता थी, उसके सामने विनत
भाव से सर झुका देते थे । उन सबका अपने समाज से, उसकी अवस्था से, नियति और भविष्य से, मनुष्य की पीड़ा से एक गहरा और पवित्र सरोकार था । उनके लिए
‘भीतर’ और ‘बाहर’ में चुनने का प्रश्न ही नहीं था, वे दोनों एक दूसरे
में शामिल थे, एकीकृत, एकाकार, अंतत: ‘एक’ ही थे
। एक सच्चा लेखक ‘अन्यत्व’ को मिटाकर, यानी दूसरे के दर्द को अपना बनाकर, उसे अपनी त्वचा पर अपने ही दर्द की तरह महसूस कर ही कुछ ऐसा
लिख सकना संभव है जिसका सचमुच मूल्य हो । एक लेखक या कलाकार, कला की ही ताकत से
- ‘आत्म’ या ‘स्व’ को विराट बनाता, बना सकता है, जिसकी पराकाष्ठा या चरम बिंदु हम टॉलस्टॉय या
दोस्तोयेव्स्की जैसे महान लेखकों में देख पाते हैं ... ऐसा विशाल, विराट ‘आत्म’
जिसमें समूचा विश्व, पूरी मानवजाति
शामिल महसूस होती है । समूचा ‘बाह्य’ कलाकार के ‘अंतर’ का अंश हो
जाता है ।
चर्चित कथाकार प्रत्यक्षा ने ‘कहानी और जीवन’ विषय पर वक्तव्य दिया-
हमारी भीतरी जद्दोजहद हमें जीवन से जोड़ती है। मेरा जीवन छोटे-छोटे शहरों में बीता।
वह दुनिया मेरे भीतर अब तक है । पिता छोटी सी जगह में पोस्टेड थे। बगल में छोटी सी
किराना की दुकान थी। वह टीन के कनस्तर में किताबें रखा करता था। वहाँ से माँग-माँग
कर हम किताबें पढ़ा करते थे। देशी विदेशी, क्लासिकल भी और गुलशन नंदा, कर्नल रंजीत
की किताबें भी। वाइड रेंज थी। मैं स्मृति की पैरासाइट हूँ। स्मृति में जाकर
सेंधमारी करके विषय निकालती हूँ। किसी चीज से कुछ ट्रिगर होता है और कोई स्मृति
जिंदा हो जाती है। सारी दुनिया जो मेरे भीतर है । मैं वही लिखना चाहती हूँ, जो मैं
अंतरतम में हूँ । वही होना मेरे लिए महत्वपूर्ण है। मेरे लिए बचपन और अब तक का
जीवन मेरी दुनिया है। लेखक के तौर पर हम इतने संवेदनशील होते हैं कि इस तार को
पकड़ते हैं हम । वह दुनिया कभी आपसे नहीं छूटती। उसे लिखना ही जीवन और साहित्य है।
दिमाग में तथ्य और कल्पना का समावेश कैसे करते हैं, कैसे उसमें जादू प्रकट करते
हैं ।
लिखते-लिखते राइटर पाठक में भी बदल जाता है। Exploration of new की journey है लेखन। कहानी और फीलिंग वही है लेकिन व्यूपॉइंट बदल जाता है। रचना लिखना
जन्म देने जैसा लगता है। किरदार आपके नियंत्रण से बाहर चले जाते हैं। पहले स्टेज
में intuitive
feeling आती है - फिर
किरदार आपसे आजाद होकर बिहेव करने लगते हैं। कलाकार होना जितनी बड़ी नियामत है,
उतना बड़ा curse भी है। खुद के भीतर अपनी चीजों को कनफ्रंट किए बिना हम उस पर
नहीं लिख सकते । अय्यार की तरह आप कमंद फेंकते हैं, कभी-कभी ही वह जादू जग पाता
है। कभी दूसरे की रचना पढ़ते हुए लगता है यही जादू तो मैं खोज रही थी जो दूसरे ने
लिख डाला। तो रेजोनेंस होता है।
रेणु की ‘जुलूस’ बंगाल के विस्थापित लोगों की कहानी है। उसकी किरदार पवित्रा से कोई कहता है
कि वहाँ से देखोगी तो अपने गाँव का पेड़ और तालाब दिखेगा। प्रोजेक्शन बदलने से
परिदृश्य बदल जाता है। लगता है यह मेरा टुकड़ा है, मेरी जमीन है।
तीसरा वक्तव्य आलोचक रश्मि रावत का था। विषय था ‘कहानी के पड़ाव’ :
चौथा वक्तव्य ‘कहानी और यथार्थ’ विषय पर राहुल सिंह का था-
‘यथार्थ’ कला आंदोलन से निकला हुआ शब्द है । यह साहित्य का शब्द नहीं है।
विचार की दुनिया में चीजें बहुत अलग ढंग से आती हैं । पूँजी को सबसे बड़ा खतरा
मार्क्सवादी विचारों से है। इसे काउंटर करने के लिए अमेरिका की पूँजी कलावाद को
खड़ा करती है। बाजार के हिसाब से रियलस्टिक कलाकार भी ढाले जाते हैं। यथार्थ से
अमूर्तन की ओर बढ़ता है । यथार्थवाद कैनन फॉर्मेशन के मजबूत टूल की तरह इस्तेमाल
होता है। ‘कलावाद’ विशेषण सम्मानजनक नहीं है। हिंदी की पूरी कंडीशनिंग यह है कि
‘कंटेंट’ पर फोकस करो, ‘क्राफ्ट’ पर नहीं। लिटरेचर की इकोलॉजी को समझना पड़ेगा कि
किस तरह की इजारेदारी है । आलोचक, प्रकाशक, संपादक सब नेक्सस था। अटेस्टेशन की
पद्धति। लघु-पत्रिकाओं ने इसे ध्वस्त किया। यथार्थ की ब्रांडिंग की। कैनन फॉरमेशन
किया। यथार्थवाद की ऑडिटिंग होनी चाहिए कि इसने कितना नफा या नुकसान किया।
यथार्थवाद एक ‘घराने’ की तरह मौजूद है। यथार्थ को आयत्त करने की सब लेखकों की अपनी
शैलियाँ हैं। यथार्थवाद का फायदा यह है कि आपके पास कहानी-लेखन की कई पद्धतियाँ
मौजूद हैं।
अरुण प्रकाश की कहानियाँ क्राफ्ट के स्तर पर निर्दोष हैं। उनकी रेंज अद्भुत
है। फिर भी वे उदय प्रकाश के सामने कहीं नहीं दिखते । जैसे क्राफ्ट कोई दोष हो।
नवीन सागर बैरियर को बहुत ऊँचा उठा देते हैं। शिवमूर्ति यथार्थ को हल्का करते हैं।
सबने अपने-अपने तरीके से यथार्थवाद का इस्तेमाल किया।
2010 के बाद बहुत सारी चीजें बदलती हैं। पूर्वप्रचलित ढाँचा ढहना शुरू होता
है। हिंदी क्षेत्र बड़ा डायवर्सिफाई हो गया। आलोचक कहानी के साथ न्याय नहीं कर
पाएँगे । विचारधारात्मक आग्रहों की पूरी खेप मौजूद है। यथार्थ हिंदी में माइनिंग
का एरिया रहा है। इतना इसे एक्सप्लोर किया गया है। सब इसमें अपने-अपने ढंग से उतरे
और अपने ढंग का कुछ निकाल लाए। ‘रेजीमेंटेशन’ से यह बड़ा नुकसान हुआ कि कथा कहने
की पुरानी पद्धतियाँ, शैलियाँ हाशिये में चली गईं। हिंदी जगत में पाठक के निर्माण
में गोपाल गहमरी के जासूसी उपन्यासों और देवकी नंदन खत्री के ‘चंद्रकांता’ की क्रांतिकारी
भूमिका रही, मगर यथार्थ के आग्रह के कारण इन शैलियों को हम भूलते गए । श्रव्यता
बाधित होती गई और पाठ्यता हावी होती चली गई। कहानियों ने समानांतर दुनिया रची थी।
यथार्थ ने उस काल्पनिक संसार का भी निषेध किया। कल्पनाशीलता के अभाव के कारण अच्छा
साहित्य नहीं रचा जा रहा है। मानवीयता को कहानी के रूप में लाना ज्यादा अच्छे से
संभव है । साहित्य की ऑटोनॉमी के लिए कल्पनाशीलता अनिवार्य है। प्रचलित आस्वादों
से तोड़ना जरूरी है। योगेंद्र आहूजा की कहानियों में प्रचलित आस्वाद भी नए
ट्रीटमेंट के कारण नए लगते हैं। यथार्थवाद आदत, रूप, स्वभाव, डिक्शन, नैरेशन,
क्राफ्ट, डिटेलिंग सबमें मौजूद है। यथार्थवाद की समृद्ध परंपरा के बावजूद दलित
यातनाओं के बारीक ब्यौरों को देख कर आपको लगता है कि कितनी गुँजाइशें बची हुई थीं
जिसे यथार्थवाद ने छोड़ दिया था। डिटेलिंग के बूते पर दलित साहित्य मजबूती से खड़ा
है । दलित सिर्फ इस आधार पर सारे साहित्यकारों को खारिज कर सकते हैं कि आपने कभी
गहरे उतर कर डिटेलिंग नहीं की। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने कहा कि यथार्थवाद का सबसे
ज्यादा कचरा हमने किया है। हरिभाऊ उपाध्याय ने यथार्थवाद की जगह ‘सत्यसृष्टि’ शब्द
का प्रयोग किया।
वरिष्ठ कथाकार जया जादवानी ने ‘कहानी का आंतरिक
परिवेश’ पर पेपर पढ़ा। आलेख के चुनिंदा अंश हैं:
“हम सबका जीवन एक
लंबी कहानी है, जो हमारे ही जिए-अनजिए विभिन्न टुकड़ों को जोड़कर बनती है। हर जीवन
की एक अलग कहानी है पर दरअसल कहानी एक ही है, वही बार-बार दुहरती है और नई भी लगती
है। कहानियों से मनुष्य का प्रेम पुराना है. कहानियों की मौखिक परंपरा से लेकर आज
तक दुनिया के हर भाषा के अलग-अलग लेखक, हर भाषा का अलग-अलग परिवेश, मनुष्य के
दुखों, पीड़ाओं, अतृप्त कामनाओं, अविश्वासों, संदेहों
और जीवन से भाग निकलने की छटपटाहट को लेकर न जाने कितनी-कितनी कहानियां आ चुकी
हैं। कहानी लिखने के नए-नए ढंग आ गए. तभी हमें हर युग, हर देश, प्रदेश की कहानियों का आंतरिक परिवेश अलग और विशिष्ट जान पड़ता है।
कहानी और जीवन का रिश्ता बड़ा गहरा है।
इतनी बड़ी दुनिया में कितना कुछ है, कितने अनुभव, कितने जन्म, कितनी ही मानवीय
सभ्यताओं का उत्थान और पतन, कितनी क्रांतियाँ, कितने युद्ध, कितने जीवन और जीवन
दृष्टिकोण, जिन्हें हम सिर्फ़ कहानियों के जरिए ही जान पाते हैं। जितने भी हमारे
मास्टर्स रहे हैं और जिन्हें पढ़-पढ़कर हम बड़े हुए हैं, चाहे वे प्रेमचंद हों, मुक्तिबोध हों या निर्मल वर्मा या चेखव और टालस्टाय - हर लेखक की कहानी का
आंतरिक जगत बिलकुल अलग है । तभी तो जितने लेखक हैं, उतने ही कथा-संसार हैं । और अगर हमारे पास इतने युगों, इतनी भाषाओँ, इतनी
भावनाओं की कहानियां न होतीं तो हम भीतर से कितने रिक्त होते। जिस तरह लेखक दूसरों
से है, उसी तरह दूसरे लेखक के भीतर रहते हैं। कहानी में इतना अवकाश होना ज़रूरी है
कि पाठक भी कल्पना की उड़ान भर सके । कुछ
लोग कहते हैं न, लिखते समय मैं नहीं था । कुछ रचनाएँ ऐसी होती हैं, जिन्हें लिखते
समय हम नहीं होते । पर लिखने के लिए ज़रूरी है कि हमारे पास एक रचना के लिए ज़रूरी
सारे अवयव हों और ये अवयव अवचेतन में कैसे आते हैं, आप नहीं जान पाते। आब्ज़र्वर
होना भी बेहद ज़रूरी है, दृष्टि भी महत्वपूर्ण है, जिसके आधार पर
हम सृष्टि की रचना करना चाहते हैं। लेखक का अपना आंतरिक संघर्ष जितना गहरा होगा,
रचना में उतनी ही गहराई होगी । जितने भी रचना के टूल्स हैं, उसमें तकनीक, सौन्दर्य, शैली, बिम्ब आदि सभी महत्वपूर्ण है । एक तनी हुई रस्सी पर हम भीतर
और बाहर के संसार में आवाजाही करते हैं, गिर जाने की तमाम
संभावनाओं और डर को दरकिनार करते और उसे जीते हुए।
हर कहानीकार की अपनी एक सीमा होती है तो जो उससे छूट जाता है, उसे कोई और पूरा
करता है। अभिव्यक्ति की आकांक्षा नई-नई कहानियों और कहानीकारों को भी जन्म देती
रहती है। जितने विभिन्न जीवन, उतनी विभिन्न कहानियाँ -
पर हर जीवन कहीं न कहीं एक जैसा है। लेखक हों या कहानियाँ, सबकी संभावनाएँ और
सीमाएं होती हैं । वक्त, जगह और मनुष्य के बदलने के साथ-साथ कहानी भी बदलती है और
यह बहुत ज़रूरी भी है। नई संवेदनाओं के लिए नई अभिव्यक्तियाँ, नए प्रयोग आवश्यक हैं
और हर सजग लेखक अपनी कहानी में नए प्रयोग करता ही है। कहानी लिखना असीम धैर्य की
मांग करता है, एक लंबी प्रतीक्षा की भी। क्योंकि जो जिया गया है और जिस तरह से
जिया गया है, उसी तरह से लिखने की लेखक लाचार और बार-बार कोशिश करता है। उसके लिए
कई चीजों को ध्यान में रखना आवश्यक है – तकनीक, सौन्दर्य,
भाषा, समाज की चेतना, परंपराओं से संबंध, कहानी का अपना इतिहास आदि-आदि । लिखने से
पहले लेखक उसे ‘सुनता’ है । जब तक कहानी खुद को न सुनाई देने लगे, तब तक वह उस तरह
लिखी भी नहीं जा सकती।
एक सनातन प्रश्न फ़िर भी बच जाता है कि
क्या कहानी किसी का भी जीवन बदलने का सामर्थ्य रखती है? कहानी खुद लेखक को जागरूक, जिम्मेवार और संवेदनशील बनाती है और यह कोई कम महत्वपूर्ण बात नहीं है। कलाएँ
हमें किसी बेहतर जीवन का स्वप्न दिखाती हैं और लेखक यह स्वप्न अपने लिए नहीं सबके
लिए देखता है। लेखक में कई तरह की भूख होती है, समानता की भूख, आधुनिकता की भूख,
सौन्दर्य की भूख । यह अकारण नहीं है कि दोस्तोवस्की कहते हैं – इस संसार को कोई
बचा सकता है तो वह है सिर्फ़ सौन्दर्य।
यही ‘कहानीपन’ है, जिसे अर्जित करना पड़ता है. जिस तरह मनुष्यता अर्जित की जाती है, उसी तरह कहानी भी अर्जित की जाती है। हमें अपनी रचना के लिए टूल्स चाहिए होते
हैं पर सिर्फ़ वही काफ़ी नहीं हैं। असल बात लेखक-कलाकार के भीतर है । कला वहां है ।
इसी चीज़ को हमें हमेशा याद रखने की ज़रूरत है और इसे समृद्ध करते रहने की भी।
हम आजकल बहुत ज़्यादा बोलने लगे हैं, जीवन में भी, कहानियों में भी । पर हर बात शब्दों से व्यक्त हो जाए, कतई ज़रूरी नहीं है। सब कुछ न कह दें, थोड़ा अनकहा छोड़
दें । एक अवकाश रहने दें। शब्द का अर्थ, एकांत, स्वप्न, सच और सत्ता को बचाए रखना भी बेहद ज़रूरी है।
अपने भीतर के जिस एकांत में लेखक अपनी रचना को जन्म देता है, पाठक के पास पढ़ते वक्त वह एकांत नहीं होगा तो भी रचना पहुंचेगी नहीं। एक
सच्चा साहित्य हमारे अंतरतम को रौशनी से भर देता है। हम सारे लेखक प्रकाश में जीना, प्रकाश में मरना चाहते हैं, अपने अंधेरों को धता बताते
हुए। ओडेन कहते हैं कि अच्छा लेखक वह होता है जो यह जानता है कि दूसरे से बात
करने से आर्ग्यूमेंट पैदा होता है, खुद से बात करने से कविता पैदा होती है।
एक व्यक्ति का बाहरी संसार उसके भीतरी संसार से बनता है। अगर भीतरी संसार उस
तरह से समृद्ध नहीं है तो बाहरी संसार समृद्ध होकर भी सतही होगा। हर कलाकृति में
एक ‘फिगर’ होता है, एक भाव होता है । हमें फिगर से भाव तक की लंबी
यात्रा करनी होती है। बिना यात्रा किए हम कहीं नहीं पहुँच सकते । कुछ अमूर्तन भी
आवश्यक है । कुछ कहने के बीच जब हम कुछ और कहते हैं तो वह वाक्य सुंदर हो जाता है,
बहुअर्थी भी।
यह सब लिखने की ही नहीं, जीने की भी
आवश्यक शर्तें हैं। किसी भी बात पर आख़िरी नुक्ता नहीं लगाया जा सकता। मेरे बाद आने
वाले इसे किसी और तरीके से भी देख सकते हैं। हम तो अपने इर्द-गिर्द के माहौल से
कुछ सोख कर आपके सामने लाते हैं। यह आप पर है कि आप इसे किस तरह लेते हैं।
26 अगस्त 2023 - तीसरा दिन
नौवां सत्र, कविता - सत्य और
स्वप्न
संचालन मधु बी जोशी ने किया। ‘कविता का आंतरिक
परिवेश’ विषय पर प्रख्यात कवि गगन गिल के वक्तव्य से इस सत्र का शुभारंभ हुआ-
कविता की तीन अवस्थाएँ हैं- निःशब्द, शब्द, शब्देतर । पंत जी ने भी कहा
है- ‘वियोगी होगा पहला कवि। आह से उपजा होगा गान’ ।
‘निशब्द’ अमूर्त है । वह कविता का बीज है । उसमें कोई शब्द, गूँज, स्मृति
नहीं, सिर्फ सेंसेशन है।
दूसरी अवस्था ‘शब्द’ है । सही शब्द, सही बिम्ब, सही व्याकरण पाने की प्रक्रिया
से गुजरता है। एक पंक्ति बनती है। सायास से निरायास, निरायास से सायास की ओर जाता
है। पंक्ति में छाँटना पड़ता है अनुगूँजें कितनी हैं । उन सबको छाँटना पड़ता है।
छिलके उतारते जाते हैं तो कोई अर्थ मिलता है जो उसका मौलिक होगा।
कवि भी इस अर्थ को एक ही बार लिख सकता है। जो पंक्ति लिखी गई वह पत्थर की लकीर
है। सूक्त की तरह लोगों के दिलों में रह जाएगी। इसलिए पूरी जिंदगी लगे रहिए अपनी
पंक्ति लिखने में।
तीसरी अवस्था ‘शब्देतर’ है। ‘शब्द’ के पड़ाव पर कविता रुक नहीं सकती। उसे शब्द
और अर्थ से मुक्त होकर अभिप्राय तक जाना है। ‘शब्द’ का पड़ाव ‘निःशब्द’ से गुजर कर
ही पहुँचा जा सकता है।
कबीर जब कहते हैं कि काँटे की नोक पर बसे तीन गाँव, दो तो उजाड़ और तीसरा बसा
ही नहीं – ‘उजाड़’ और ‘बसा ही नहीं’ में फर्क है। यह फर्क ‘शब्द’ और
‘निःशब्द’ और ‘मौन’ को समझने में उपयोगी हो सकता है।
सुप्रसिद्ध कवि आशुतोष दुबे ने ‘कविता में शब्द’ विषय पर वक्तव्य
में कहा-
बहुत सारी कविताएँ ऐसी हैं जो कविता के बारे में ही हैं । 60-70 के दशक में
भाषा को लेकर बहुत कविताएँ लिखी जाती थीं । जैसे लीलाधर जगूड़ी की कविताओं में
शब्द भी एक एंटिटी की तरह कविता में आता है। कविता बहुत आत्म-सजग विधा है। उसकी
संरचना या अंतःप्रकृति ही ऐसी है। कविता के भीतर आते ही शब्द का दूसरा-सा अर्थ
खुलने लगता है, खुल सकता है। शब्दों का एक अतिरिक्त अर्थ हो जाता है। जैसे गगन गिल
की कविता के इस संयोजन से जो अर्थ-वलय बन रहे हैं वे एक अलग ही प्लेन में ले जा
सकते हैं - “दिन के दुख अलग थे, रात के दुख अलग।” कविता के शब्दों को लेकर सबसे अधिक संदर्भ रघुवीर सहाय में मिलते हैं। ‘दो अर्थ का भय’ में कवि की
आकांक्षा है कि दो अर्थ न हों। शब्द से न टकराने के संदर्भ आते हैं। रमेशचंद्र शाह
की कविता में शब्दों से सीधा संवाद-
शब्द बताओ कहना क्यों है?
शब्द बताओ सहना क्यों है?
तुमने मुझको मैंने तुमको पहना क्यों है?
केदारनाथ सिंह - “ठंड से नहीं मरते शब्द/ वे मर जाते हैं नमी से/साहस की कमी से।”
यहाँ शब्दों का मानवीकरण है । शब्द कविता में निर्मित नहीं होते पर वहां
उन्हें जीवन मिलता है। शब्द कभी-कभी संगीत के कारण, ध्वनि या गूँज के कारण भीतर से
उछल कर भी आ जाते हैं। शब्द अर्थगर्भित हो जरूरी नहीं है।
अरुण कमल की कविता ‘इच्छा’ - “मैं जब उठूँ तो भादो हो / पूरा चंद्रमा उगा हो ताड़ के फल-सा / गंगा भरी हो धरती के बराबर / खेत धान से धधाए / और हवा में तीज
त्यौहार की गमक / इतना भरा हो
संसार / कि जब मैं उठूँ तो चींटी भर जगह भी / खाली न हो।” में विपुलता और संतृप्ति के कितने समृद्ध शब्द हैं।
लोक की संपदा सबके पास नहीं होती और अर्थ-संप्रेषण की भी सीमा होती है। त्रिलोचन
में जनपदीय भाषा, अज्ञेय की नागरी भाषा, विष्णु खरे की खुरदरी भाषा, गगन गिल में
पंजाबी स्पर्श, रघुवीर सहाय की पत्रकारीय भाषा है। शब्द संस्कृति की स्मृति भी है।
उनमें समय बोलता है, परिवेश की करवट बोलती है। अच्छा कवि अपने हस्ताक्षर अर्जित
करता है। निराला और वीरेन डंगवाल में साहसिक डिक्शन मिलता है। वीरेन ने ध्वनियों
का भी अच्छा इस्तेमाल किया है। डिक्शन की यायावरी है वहाँ।
उत्सुक, संकोची शब्द कवि दे रहा होता है। समकालीन समय में कम शब्द-संपदा में
कविता लिखी जा रही है। सीमित शब्दों से इतनी समस्या नहीं है जितनी अर्थ की सीमितता
से है। कविता में हर तरह के शब्दों की जगह है। पुराने शब्दों को नई अर्थवत्ता देने
की चुनौती है। कविता के भोज में बरते जा चुके शब्दों की जूठन से ही कविता बनाना
विवशता भी है। कविता के शब्द वही होते हैं मगर जीवन सबके अलग-अलग होते हैं।
राजुला शाह ने ‘कविता और अकविता’ विषय पर जीवनानुभव के आधार पर अपने विचार रखे :
हमारा जन्म ही एक तरह से कविता में है। छोटा बच्चा जो सिर्फ 10 शब्द जानता है,
उन्हीं से इतना कुछ काम ले लेता है कि उनमें कई बार चौंका देने वाले अर्थ होते हैं
। यह पहली कविता है। यहाँ से ही भाषा-संस्कार पड़ने लगते हैं। यह शुरुआती अवस्था वह
मैजिकल जगह है जहाँ शब्दों के चमत्कार होते हैं। कविता सुनी जाने वाली चीज है।
उसकी सांगीतिकता भी महत्वपूर्ण है। कॉलरिज ने ‘बेस्ट वर्ड्स इन बेस्ट ऑर्डर’
को कविता कहा है। कविता में एक शब्द भी इधर-उधर नहीं कर सकते। लोक के गानों में
कबीर पूरी परंपरा है सिर्फ व्यक्ति नहीं। अनेक लोकगीतों में अनेक कवि मिलते हैं
जिन्हें हम नहीं जानते। कबीर को गाते हुए कई बार मैंने पाया कि उसमें कबीर का एक
भी शब्द नहीं। पर क्या हम कह सकते हैं कि वह कबीर नहीं हैं ?
उदाहरण के लिए कबीर के शब्द ‘स्याही गई,
सफेदी आई’ को वे ऐसी भाषा में बदल कर बोलते हैं जो सबको
आसानी से समझ आ जाए - ‘जवानी गई
बुढ़ापा आया’
कविता को इस जगह पर कैसे ले जाया जा सकता है जहाँ आप उसका कुछ नहीं बिगाड़
सकते। कुछ डिजॉल्व नहीं कर सकते। मिस-इन्टरप्रेट नहीं कर सकते। भाषा का पोटेंशियल
जानने के लिए हमें कवि के पास जाना होगा। किसी भाषा का कोई गीत लेना उस भाषा को
सीखने का अच्छा तरीका है।
भाषा कम्यूनिकेशन के लिए बनी थी या भावाभिव्यक्ति के लिए । भाषा को जिस तरह
हमारी कविता ने बरता है, जो नहीं कहा जा सकता था, वह भी भाषा में कहा है । इसने
हमारी भाषा को बहुत एक्सपेंड किया है। ‘गीत’ का रिटर्न भी एक बड़ी घटना है। गीतकार
को नोबेल मिलना अच्छा साइन है। कविता-विमुख समय में कविता में जाने को लौटाने के
लिए जो भी संभव हो, किया जाना चाहिए। कविता में होना भी इन्वॉयरमेंट के बराबर
महत्त्वपूर्ण प्रश्न मुझे लगता है। हमें आत्म-परीक्षण भी करना चाहिए। कविता में
भाषा और संस्कृति के बीज बचे रहते हैं । 2006 में लंदन में लोग पूछ रहे थे कि क्या
भारत में अभी भी कविता छपती है । यूरोप में तो खत्म हो गई। भारत में कविता बचे
रहने का मुख्य कारण मौखिक परंपरा है। इस दृष्टि से भी देखना चाहिए कि हमारे पास
क्या-क्या बचा हुआ है। उस कड़ी से जुड़े रहना सौभाग्य है। इतने सारे समयों में एक
साथ रहना भारत में ही संभव है।
कविता जीवन में जरूरी है। उसे गैरजरूरी बताए जाने के षडयंत्र को तोड़ने के लिए
कविता लिखने के अलावा भी कुछ करना चाहिए। सिर्फ कविता लिखते हुए कवि होने के साथ
दिन के बचे समय में अनुभव, स्पंदन, भावन.... बहुत चैलेंज हैं। कविता एक एटिट्यूड
है, एक जेस्चर है, धीमा हो जाना है, इस क्षण में खुद को छोड़ देना है। इसके लिए
बहुत सा समर्पण चाहिए। कवि की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। जितना सहज और कठिन प्रेम
में होना है, उतना ही सहज और कठिन मेरे लिए कविता में होना है।
चौथा वक्तव्य ‘कविता की परंपरा’ विषय पर अम्बर पांडेय ने दिया-
कविता किसी परंपरा में लिखते हैं तो क्या हमारे पास कोई परंपरा है भी ? या कभी
थी भी ? कविता एक तरह की ‘ब्रह्मांडीय फिसलन’ ( ‘Cosmic slip’ ) है । मिलिंद के रथ के उदाहरण में जैसे घोड़े, रस्सी ... सब बता सकते हैं
जो रथ के हिस्से हैं मगर इनमें रथ कहाँ है, यह नहीं बता सकते। ऐसे ही परंपरा कहाँ
है, नहीं बताया जा सकता।
परंपरा बोझ भी है जो हमें ढोनी पड़ती है। समकालीनता की ऑथेंटिसिटी नई परंपरा
है। समकालीनता का इतना ऑब्शेसन जो आज दिखता है, वह कभी नहीं दिखता था। समकालीनता
की स्लिप्स मिलती थी।
कवि या लेखक तीन परंपराओं में काम करते हैं।
‘गोल्डन इंक’ जैसे टालस्टॉय । गोल्डन इंक वाले परंपरा का उपयोग करते हैं ।
परंपरा को रिराइट, रिफ्रेज करते हैं।
‘ब्लड इंक’ जैसे काफ्का और दोस्तोयेव्स्की - इनके पास विजन है, जो हर जगह
रिफलेक्ट होता है। जिसे ब्लड इंक से लिखना है उसे अपनी लाइफ को ही वर्क बनाना
पड़ता है। हिंदी में ऐसे कवि मुक्तिबोध हैं। पर ऐसा हर कोई नहीं होता ।
‘व्हाइट इंक’ – यह स्त्री-लेखन के बारे में है । स्त्रियाँ काफी समय से लिखती
रही हैं लेकिन वह व्हाइट पेपर पर व्हाइट इंक से लिखना था ... इसलिए दिखाई नहीं दे
रहा था।
अंबर जी का वक्तव्य संक्षिप्त लेकिन सारगर्भित रहा । इसका कारण उनकी कम में
अधिक कहने की क्षमता के अलावा संभवतः यह भी रहा हो कि आयोजन की रूपरेखा कुछ इस तरह
की थी कि कुछ वक्ताओं के समय का भरपूर उपयोग नहीं हो सका, उन्हे कम सत्रों में रखा गया और कुछ को चार-चार सत्र में रखा गया । विचारपरक
गंभीर बातों की अपनी भी एक गति हुआ करती है, जिसके लिए वक्ता को समुचित अंतराल की
दरकार होती है ।
नौवें सत्र की अंतिम वक्ता युवा कवि प्रिया वर्मा ने ‘कविता का संकट’ विषय पर वक्तव्य दिया :
संकट क्या है? और कविता क्या है? इन दो प्रश्नों को मिलाने पर एक नए प्रश्न की व्युत्पत्ति होती है - कविता का संकट क्या है? जो इस सभा के लिए पहले
दोनों प्रश्नों से कहीं अधिक गंभीर प्रश्न है ।
कहा गया है - वाक्यम् रसात्मकम् काव्यम्’ अर्थात - 'रसमय
वाक्य ही कविता है!' पर वह कहां है? क्या है?
क्या कविता वह साधन है जिसके द्वारा शेष सृष्टि के साथ मनुष्य के रागात्मक
संबंध की रक्षा और निर्वाह होता है अथवा छंद अलंकार आदि आभूषणों से पाठक की
अनुभूति को जो स्पंदित करती है, वह कविता है ? साहित्य की
वह विधा जिसमें व्यक्ति अपनी आंतरिक अनुभूतियों को शब्द-रूप देता है और अपने विचार-संसार के सत्यासत्य का आकार गढ़ता है।
क्या है वह तत्व जिसके स्पर्श के लिए कविता नए और, और भी नए आयामों- अंतरिक्ष, आकाश और पाताल तक के अनछुए
को छूने के लिए, अनभिव्यक्त की अभिव्यक्ति के हेतु लिखी जाती रही है ?
क्या पहचान का संकट केवल पृथ्वी के नागरिक एक आम मनुष्य से ही जुड़ा है ? या कविता में भी पहचान का संकट मौजूद है? वर्तमान कविता अपने कंधों पर मानव निर्मित पहचान-पत्र नहीं
लादती दिखती, जिसे भाषा में परिभाषा कहते हैं।
एक टुकड़ा पढ़ती हूं - पता नहीं कि आप इसे कितनी दूरी की कविता के रूप में
पहचानेंगे, पर इसे अस्मितामूलक कविता तो मानेंगे ही, आज की कवि 'रूपम मिश्र' की 'शर्म' कविता का यह अंश पद्य की तरह लिखे हुए गद्य की तरह पहचाना जा सकता है। वे
लिखती हैं कि
"मुझे
बारहा पूछा जाता है तुम्हें शर्म नहीं आती
तब मैं सोचने लगती हूं पिछली बार मुझे कब शर्म आई थी
हां याद तो है बहुत बार बहुत शर्म आई
जब मेरे ही घर में मेरे एक परिचित का कुछ ऐसा स्वागत होता है कि मेरे घर के
बर्तन में मेरे घर का कुत्ता पानी पी लेता है पर उसको अछूत बर्तन में पानी पिलाया
जाता है मुझे तब मनुष्य होने पर शर्म आती है जब वह कहता है हम लोग कुत्तों से बदतर
जात से हैं और ठठाकर हंस देता है"
एक पीढ़ी पहले की कविता से आज की बहुतायत कविता में प्रश्नाकुलता और विस्मय के
बीच स्मृति का डांवाडोल मिलता है । नज़ीर के तौर पर श्रीकान्त जी की 'समाधि लेख' से पढ़ती हूं:-
"कई साल
हुए
मैंने लिखी थीं कुछ कविताएं!
तृष्णाएं
साल ख़त्म होने पर
उठकर
अबाबीलों की तरह
टकराती, मंडराती,
चिल्लाती हैं।
स्त्रियां
पता नहीं जीवन में आती हैं
या जीवन से
जाती हैं!"
इन पंक्तियों में एकाधिक विस्मयादिबोधक चिह्न के प्रयोग से कुछ तो ज़ाहिर होता
है । थोड़ा सा आगे चलकर कुंवर नारायण के शब्दों में उत्तर खोजने का प्रयास करें तो
-
"बार-बार लौटता है/कोलंबस का
जहाज /खोज कर एक नई दुनिया.…"
किसी भी एक कविता से इस जिज्ञासा का उत्तर नहीं मिलता।
असद जैदी अपनी कविता "कविता का
जीवन" के अंत में कहते हैं :
"उनका /अपना जीवन था अपनी जर्जरता/ कला के
शौक ने उन्हें अभी बोदा/और
पिलपिला नहीं बनाया था/ मैं नहीं
जानता था उनकी/ क्यों कविता में ऐसी रूचि थी/ उनकी स्थिति को गले उतारने में ही/ मुझे कुछ देर लगी…"
अब एक नया संकट पैदा हुआ- संप्रेषणीयता का संकट और अच्छे गंभीर पाठक का
संकट। एक कविता का मंच से किया गया प्रभावशाली पाठ किसी रेशमी कविता को भी वाहवाही
दिलवा सकता है। यहां रेशमी से मेरा आशय कमज़ोर और क्षीण से है। कविता
पुनर्व्याख्या और पुनर्पाठ की मांग करती है। लिखित और मौखिक दोनों रूपों में कविता
के संप्रेषणीयता के संकट के निवारण की संभावना निरंतर बनी रहती है। अंधेरे का संकट- वह संकट है जो गहरे प्रसंगों में लिखी हुई कविता पर बात न होने से पैदा होता
है। कविताएं इस अनजानेपन और उपेक्षा का तिमिर छंटने तक प्रतीक्षा करती हैं।
कुछ कवि ऐसे भी हुए जो अपने जीते जी लिखी हुई कविता/ कहानी को प्रकाश में लाने से छुपाए रहे और उनके चले जाने के बाद उनकी कृतियां
न सिर्फ पढ़ी गईं, बल्कि संसार भर की बोलियों में अनुवादित होकर विश्व
मानचित्र पर अपना स्थान बनाती रहीं। मेरा आशय है कि प्रकाशन का संकट भी अच्छी
कविता के लिहाज़ से बड़ा महीन और पैना संकट तो है ही।
वाचलता और मौन के बीच संतुलन न साध सकना भी वर्तमान कविता का एक संकट है। मौन
जिस के आचार्य, 'टूटी हुई बिखरी हुई' जैसी पंक्ति के जादूगर कवियों के कवि ‘शमशेर’ रहे, वह चुप अब कहीं लोप हुआ जाता है। शोर में एक अतिरिक्त पंक्ति अथवा ढाँचे में
एक ज़रा सी चूक से, हड़बड़ी में मुंह से निकली हुई बात की तरह अर्थों में
कविता, कब अभिधा से लक्षणा/व्यंजना
तक बदलती चली जाती है, कविता खुद भी यह जान नहीं पाती!
कवि मंगलेश डबराल लिखते हैं – ‘एक सरल वाक्य बचाना मेरा उद्देश्य
है’, अर्थात जो बात कविता कह रही हो, पाठक द्वारा/आलोचक द्वारा भी वही समझी जा रही हो।
पिछली पीढ़ी और इस पीढ़ी के बीच खड़े कविश्रेष्ठ ‘देवी प्रसाद मिश्र’ ने किस तरह से अपनी ‘संकटद्वार’ जैसी कविता में अपने साथ-साथ पाठक के लिए भी मुक्ति का स्वप्न रचा होगा और कैसे ‘डब्ल्यू एच ऑडन’ ने ‘क्राइसिस’ नामक कविता में नाजियों द्वारा पोलैंड में सैनिक-प्रयाण (
march ) का दृश्य रचा होगा, जिसमें वे अनेक जगह जुल्म
की खिलाफत और आतताइयों की आम जनता से नफरत को दर्ज करते हुए अपनी तरह के लोगों के
विषय में लिखते हैं। कविता का एक और संकट मौलिकता का संकट है । मौलिक यूं तो कुछ
भी नहीं है पर हर किसी का अपना एक मौलिक है ठीक अपने फिंगरप्रिंट्स, अपने हस्ताक्षर, अपने हस्तलेख और अपनी परछाई की तरह। वह विधा जो संभवत
हृदय के सबसे प्रगाढ़ वेदना-स्थल में जन्म लेने वाले
अमीबा जैसी है, यदि वह अपना सिग्नेचर गढ़ नहीं पाती, तब वह एक या दो सूत के फासले से अकविता या कुकविता में बदल जाती है। कुपाठ का
संकट भी कविता के साथ लगातार बना रहता है कि जाने कौन-सा पाठ
कविता को उसकी वास्तविक भीत से उखाड़ कर/ उजाड़ कर नष्ट कर सकता है/ अकेला छोड़ सकता है!
समकाल में एक कवि के लिए अन्य कवियों से कल्पना और यथार्थ के साम्य से वैचारिक
बंध्यता के खतरे भी उठ खड़े होते हैं। फिर एक और संकट भी है जिसे प्रतिबद्धता का
संकट या शब्द और कर्म में भेद का संकट या फिर विश्वसनीयता का संकट कह सकते हैं।
विश्वसनीयता जैसी नागार्जुन की कविता में पाठक की बनती है, अब पाया जाना मुश्किल है।
सवाल उठाती हुई क्रांति चेतना की कविता पढ़कर यदि पढ़ने वाले ने अपना आत्म
टटोला और उसे अपने भीतर उस तरह से प्रश्नांकन होते नहीं पाया तब ऐसी कविता केवल
पढ़कर छोड़ दिए जाने के मनोरंजन अथवा समय बिताने के लिए किए गए किसी भी अनर्गल
कार्य जैसी लक्षणहीनता से घिरी हुई कविता कहाएगी । संस्कार और जीवनमूल्य विहीन
कविता क्या संभव भी है? वह कविता जो सामंती
आचार-विचार-व्यवहार को पोषित करने को खालीपन में बैठकर पकाई जाए, वह अधकचरी कविता
होगी, ऐसी कविता सभ्यता के लिए संकटकारी कविता है।
सूक्ष्मता का संकट -डिजिटल कविता के इस त्वरित
प्रतिक्रियावादी दौर में बहुतायत कविता अपनी कहन में अमूर्तन, बिंब और उपमा का सहारा लेते हुए भी ऐसी यथार्थपरक और सपाट हो जाती है कि
स्थूलता से लकदक, पढ़ने, सुनने, सुनाने और कविता के इतिहास में शामिल करने के योग्य नहीं रह जाती।
प्रकृति के संसर्ग की इच्छा और प्रेम की उत्कट कामना, वियोग को शब्द देने की अभिलाषा आदि कोमलांगी छायावादी प्रवृत्तियों में लिखी
जा रही आधुनिक कविता में ऐंद्रियता भी एक जादुई तत्व की तरह काम करती है। ऐसी
कविता चित्रमयी हो जाती है लेकिन एक्सेस ऑफ एवरीथिंग इज---- सो सो एंड सो!
तो कविता कहीं रसहीन, भावभीन, श्रृंगारहीन और प्रभावहीन न हो जाए, यह चेतना श्रृंगार कविता
लिखने की प्रथम अनिवार्यता है।
स्त्री, आदिवासी, दलित अस्मिता मूलक और
विमर्श-केंद्रित कविता, स्थानीयता आधारित कविता और
मध्यवर्गीय भोग-विलास की कविता के लिखे जाने के अपने खतरे हैं, और उनके मिट जाने के या अमिट हो जाने के अपने जोखिम हैं।
यह आज की कविता का एक नमूना है। यूं तो हर तरह की कविता लिखी जा रही है, किंतु सपाट कविता लिखने से कविता की नब्ज़ टटोलनी ज़रा- सी कठिन होती जा रही है।
आज की कविता में विषय बाहुल्य है और शब्द अतिरेक भी। मुझे तय करना मुश्किल हो
रहा है कि क्या इसे संकट कहना चाहिए अथवा यही कविता का सबसे चमकदार समय होने जा
रहा है!
जब कि वैश्विक मानचित्र पर आग और बारूद और खून और बंटवारा बिखरा पड़ा है, तब उपेक्षा, अपमान, अकेलेपन, उदासी और प्रेम की कविता, गिरने और संभलने की कविता, विस्थापन और युद्ध की त्रासदी पर अपना भंगुर जिस्म संभालने की कविता अपनी
अस्मिता को कैसे संकट से उबारेगी ?
भारतीय उपमहाद्वीप में अपार जन-समुदाय के बीच एक रोजगार और रोटी और एक छत के
अलावा खुली हवा में सांस लेना और अपने भीगने भर की बारिश की परेशानी क्या कम है, कि
भारतीय जनसंख्या का बहुसंख्यक वर्ग अर्थात मध्यवर्ग कविता की इयत्ता पर घिरे
बादलों के बारे में सोचे ?
"अंधेरे
में" से फिर "मुक्तिबोध" कुछ बोल रहे हैं
"कविता में
कहने की आदत नहीं, पर कह दूं
वर्तमान समाज चल नहीं सकता
पूंजी से जुड़ा हृदय बदल नहीं सकता
स्वातंत्र्य व्यक्तिवादी छल नहीं सकता
मुक्ति के मन को,
जन को"
आलोचना कविता के संदर्भ में एक जरूरी निकष है किंतु आलोचक यदि किसी पूर्वाग्रह
से ग्रसित परिभाषा से बंधा हुआ और अपनी बनाई धारणा के प्रति आस्तिक है तब तो यह
श्रेष्ठ कविता के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
अतः "अंधेरे में" से ही यह पंक्ति बार-बार कही
जाती रही है-
"अब
अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगे
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब"
रघुवीर सहाय की कविता 'लोकतंत्र का संकट' कविता पढ़ते हुए ‘पर्सनल इज पॉलिटिकल’ को कविता में लागू करने पर यह
कविता, कविता के अर्थ में संकट की ओर इशारा कर देती है।
"पुरुष जो
सोच नहीं पा रहे
किंतु अपने पदों पर आसीन है और चुप हैं
तानाशाह क्या तुम्हें इनकी भी जरूरत होगी
जैसे तुम्हें उनकी है जो कुछ न कुछ उटपटांग विरोध करते रहते हैं |
सब व्यवस्थाएं अपने को और अधिक संकट के लिए
तैयार करती रहती हैं
और लोगों को बताती रहती हैं
कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है |
तब जो लोग सचमुच जानते हैं कि यह व्यवस्था बिगड़ रही है
वे उन लोगों के शोर में छिप जाते हैं
जो इस व्यवस्था को और अधिक बिगाड़ते रहना चाहते हैं
क्योंकि
उसी में उनका हित है"
संकट से लड़ने वाला ही गाथा का नायक होता है। इसी तरह कविता के सामने आई तमाम
चुनौतियां और संकटों से लड़कर कविता की उन्मुक्त चिड़िया ‘फीनिक्स’ भी हो सकती है।
फीनिक्स : पौराणिक पक्षी जो अपनी ही राख से फिर-फिर जन्म लेता है। कविता भी ठीक इसी तरह से लगातार अपना ढब, रूप-आकार बदलती रहती है।
भोजनापरांत सहभागियों ने बरगद के पेड़ के नीचे बने चबूतरे में स्थानीय कलाकार दुर्गेश
मरावी द्वारा बनाई गई गौड़ी आर्ट की लगाई गई प्रदर्शनी के सौंदर्य का आस्वाद
लिया । कुछ लेखकों ने चित्र ख़रीदे । सबने उत्साह से चित्रों के विषय में दुर्गेश
जी से जानकारी ली और उनके साथ फोटो खिंचवाए । गौड़ी आर्ट गोड़ आदिवासी लोग बनाते
हैं। बैंक अधिकारी और संस्कृतिकर्मी स्मिता के सौजन्य से यह प्रदर्शनी संभव हुई।
शिविर-संयोजक रामकुमार तिवारी जी ने सबकी ओर से स्मिता जी और दुर्गेश जी का आभार
व्यक्त किया।
दसवाँ सत्र कविता पाठ का था । बरगद के विशाल वृक्ष के नीचे गोल घेरे में बैठ
कर कवितायेँ पढ़ी-सुनी गयीं । जंगल की शुद्ध हवा, सुहावने मौसम में सब तल्लीन होकर कविताओं
का आस्वाद ले रहे थे जब अविनाश मिश्र के फ़ोन पर देश के प्रतिष्ठित कवि, संपादक,
अनुवादक और ‘सदानीरा’ पत्रिका के संस्थापक-संपादक आग्नेय जी के देहांत की दुखद खबर आई। इस खबर के
साथ स्थिर होने में कुछ वक्त लगा। तदुपरांत सबने उन्हें याद किया और मौन
श्रंद्धाजलि अर्पित की। अविनाश जी ने शोकाकुल आवाज में आग्नेय जी के साथ उनके
संबंध और अनुभव शेयर किए। फिर आय़ोजक अविनाश जी की दिल्ली रवानगी की तैयारी में
जुटे और शेष ने कुछ देर आग्नेय जी के साथ की अपनी स्मृतियाँ और प्रसंग साझा किए ।
कविता पाठ दुबारा शुरु हुआ लेकिन पहले जैसी लय फिर जुड़ नहीं सकी ।
सत्र में गगन गिल, राजुला शाह, अबर पांडेय,
अच्युतानंद मिश्र, महिमा कुशवाहा, हर्ष तिवारी द्वारा कविताएँ पढ़ी गईं। सत्र का
संचालन अविनाश मिश्र कर रहे थे।
26 अगस्त का अंतिम और शिविर के 11वें सत्र का
विषय था : लेखक और पाठक - बदलते संदर्भ । संचालन राहुल सिंह ने किया।
पहली वक्ता प्रियंका दुबे ने इस विषय पर बड़े
जीवंत ढंग से अपने अनुभव साझा किए :
प्लेजर रीडिंग वक्त बिताने का साधन होता है।
जिसके पास एक्सेस हो उसके लिए किताब की सेंट्रल भूमिका होती थी। इसमें जेंडर परतें
भी हालांकि हैं। हमारे पास इनोसेंस होती थी। किताबों को आज कई चीजों से युद्ध
लड़ने पड़ रहे हैं। पहला युद्ध टेक्नोलॉजी से है। इफरात इंटरनेट डाटा और ओटीटी
जैसे प्लेटफॉर्म के कारण पढ़ने के एफर्ट के बिना कंटिन्युअस डोज मिल रही है।
लेखन-क्रिया में आए परिवर्तन - पूँजीवाद के
प्रभाव के कारण बिकने की संभावना के हिसाब से लिखे जाने के कारण लिखने में गिरावट
आई है। मैगी राइटिंग होने लगी है। हर साल 3,4 उपन्यास आ जाते हैं। त्वरित का
एलिमेंट साहित्य में आने से उसका क्षरण हो रहा है। लेखक अपने बजाय दूसरों के लिए
लिखने लगे हैं- मैं दूसरों की आवाज हूँ का भाव प्रसिद्धि के दवाब
में आता है। यह पूँजीवाद का दवाब भी है और कल्चर का भी । जबकि लिटरेचर तो सबसे
पहले सेल्फ-एक्ट है। बाय-प्रोडक्ट की तरह बाकी सबके लिए भी हो तो हो।
अगर 15 मिनट भी बैठकर पढ़ना पड़ जाए तो
इंटलेक्चुअल लोगों के अंदर भी आजकल ड्रेड उतर आता है। उन्हें बोरियत लगने लगती है।
ठहर कर पढ़ने की कैपेसिटी खत्म हो गई है। इस कारण शब्दों की चोट खत्म होती जा रही
है। लोगों की आत्मा में मूव ही नहीं होता।
सवाल है कि इस स्थिति से कैसे लड़ा जाए?
रास्ता ‘बैक टू बेसिक्स’ ही है। रीडिंग
और लेखक की ऑथेंटिसिटी खत्म हो गई है। उसे वापस लाना होगा। वर्जीनिया वुल्फ कहती
हैं कि हमें अपना विंटेज रखना होगा कि कोई नियम नहीं है। जैसे हमारे डीएनए अलग हैं,
वैसे ही रीडिंग राइटिंग एक्ट भी । इसलिए कोई नियम नहीं बना सकते।
ऑथेंटिक राइटिंग से शुरु करना होगा। ( आथेंटिक
राइटिंग का सेल्फ पर क्या असर होता है, यह उन्होंने सूसन सोंटाग, फॉस्टर और अपनी
जिंदगी के अनुभवों के सहारे साफ किया)
सूसन की डायरी पढ़ कर पता चलता है कि जब वह डूब
रही होती हैं, जब उनकी साँस टूटने लगे, तिनके की तरह किताब उन्हें बचा लेती है।
फॉस्टर अपनी पीढ़ी का इतना बड़ा उपन्यासकार है ।
जब वह बहुत अवसाद में था, लगता था कि जी नहीं पाएगा, उस समय किताब ने उसे बचाया।
मेरे साथ भी यही होता है। किताबों ने जिंदा रखने
में मेरी मदद की। मुझे स्टेबलाइज किया। पढ़ने से जब ऑर्गेनिक रिलेशन बनता है जिसे
फेक ऑफ नहीं किया जा सकता तो यह प्रेम की तरह ऑर्गेनिक रिलेशन होता है। जब राइटर
ट्रूथफुलनेस के साथ ऑथेंटिक सेल्फ से लिखेगा तभी उसे इम्बाइब करना पाठक के लिए
संभव है। जो भी आप रचते हैं, उसमें गहरी ट्रूथफुलनेस होनी चाहिए। और ट्रूथफुलनेश
या तो होती है या नहीं होती । आप उसे ओढ़ नहीं सकते । अनबायस्ड राइटिंग भी जरूरी है। हमने रीडिंग-राइटिंग
को यूटिलिटेरियन एसपेक्ट में कन्वर्ट कर दिया है। आपके अंदर से कुछ निकलता है तो
वह कम्यूनिकेट करता है और श्रोता की नंबनेस को तोड़ता है। हमारा पूरा टाइम नंबनेस का
है । सच्चाई और पहली सी मासूमियत ऑथेंटिक राइटिंग से ही संभव हो सकती है।
इसके बाद अच्युतानंद मिश्र ने अपने विचार व्यक्त
किए-
संस्कृति के सारे रूपाकार बहुआयामी होते हैं। आप
300 साल बाद के पाठक के बारे में आज बात नहीं कर सकते। आप ऊर्जा को नहीं जाँच
सकते। उसके बदलने को देख सकते हैं। 150 सालों के बदलते संदर्भों को देखें। हिंदी
की अच्छी किताब को भी लगभग 300 पाठक मिलते हैं। करोडों की आबादी में लगभग शून्य है
यह। इसके उलट केरल का साहित्यिक परिदृश्य है। वहाँ के युवा लेखक की किताब के 10
साल में 100 संस्करण आ गए। जिस हिंदी में हम बात कर रहे हैं, उसमें पाठकों की इतनी
कमी क्यों है ? जिस हिंदी को हमने बनाया, कहीं यह उसकी ही कमी
तो नहीं?
औपनिवेशिक काल में ब्रोकन माइंड से पैदा हुई है
खड़ी बोली। यह खास उद्देश्य से विकसित हुई भाषा है। अन्य भाषाओं की तरह समाज के
अंतर्विरोधों से स्वाभाविक रूप से विकसित नहीं हुई। उपन्यास ने दुनिया में स्वतः
पाठक पैदा किए। उपनिवेशवाद के समानांतर खड़े होने की कोशिश में हिंदी में उपन्यास
आए। उसने कृत्रिम पाठक गढ़े। विद्यापति और तुलसीदास के पाठकों जैसे
पाठक नहीं।
1850 से म्यूजिक और पोएट्री अलग होने लगी। संगीत
के रूप में कविता सुनने वाला पाठक मौजूद है। मगर छायावाद के दौर से सब लिखित होने
लगा। आजादी मिलने के बाद हमारे पास वे कारण-कार्य संबंध खत्म हो गए जो हमने आजादी
पूर्व बनाए थे।
पाठक निर्माण का दूसरा चरण आजादी के बाद का है।
आजादी के बाद जिन देशों ने संस्कृति के सवाल को गंभीरता से लिया, वहां बहुत पाठक
हैं। भारतीय विचारकों ने संस्कृति को गहराई से नहीं लिया। संस्कृति धर्म के खाते
में चली गई । बाबा लोगों के जो अनगिनत श्रोता हैं, उनमें से अनेक संभावित पाठक हो
सकते थे।
मार्क्सवादी संगठनों ने बड़े पैमाने पर पाठक
तैयार किए। मगर उनका उतना विकास नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था। सांस्कृतिक सवाल गौण
रहना किताबों के कम महत्व का कारण है। एम. टी. वासुदेवन अय्यर को पूरे केरल में न
जानने वाला कोई नहीं होगा। उनके उपन्यास के आधार पर वहाँ एक पार्क विकसित किया गया
है। यह संस्कृति हमने अपने समाज में विकसित नहीं की।
सूचना
माध्यमों ने लेखक-पाठक के संबंध को न केवल बदल बल्कि उलट दिया। पाठ की प्रक्रिया
अंतर्भूत होने के बजाय बाहर हो रही है। पहले टेक्सट छपने और पढ़ने की प्रतिक्रिया
के बीच के अंतराल में ही लेखक-पाठक के अंतर्संबंध विकसित होते थे।
दिल्ली विश्वविद्यालय के आई. पी. कॉलेज में
हिंदी विभाग वालों को भी अंग्रेजी में बोलने का दवाब था। जबकि केरल में सब मलयालम
में होता है।
भूलने-सीखने की प्रक्रिया में भी मेरे भीतर का
स्वतःस्फूर्त लेखक बाधित होता है। मेरी भाषा मैथिली है। उसे मुझे हिंदी लिखने के
लिए भूलना होता है।
हिंदी के पाठक कहाँ से आएँ? अभी भी इसकी
संभावना विश्वविद्यालयों में ही है।
इस सत्र के अगले वक्ता के तौर पर प्रत्यक्षा ने
अपने विचार प्रस्तुत किए-
विश्व प्रसिद्ध ग्राफिक नॉवलिस्ट रॉबर्ट वीराने
में रहते थे। उन्होंने अपना पता डिस्कलो़ज नहीं किया हुआ था क्योंकि उन्हें डर था
कि he could be mobbed. यह खतरा हिंदी लेखक को कभी नहीं हो सकता।
पाठक-लेखक के बीच अदृश्य तार कभी जोड़ता है, कभी
अलग करता है। जुड़ने पर ऐसा स्पेस बनता है जिसमें हम सहजीवन कर रहे थे। यानी उसकी
वेवलेंग्थ से चीजों को देखना। लेखक खुद पहला पाठक होता है। लिखने की प्रक्रिया
एकाकी रास्ता है। लिखना अकेले की जर्नी है। लिखते हुए पाठक दिमाग में नहीं होना
चाहिए। वर्ना वह ‘एजेंडा-राइटिंग’ होगी। पब्लिक डोमेन में जाने के बाद
वैरियस पाठ होते हैं। टिप्पणियों के कारण अपनी खिड़की खुलती है।
समस्या यह है कि पाठक कहाँ है? कौन है?
साहित्योत्सव से ऑडियंस गायब है। सोशल मीडिया
में लगता है बहुत पाठक हैं लेकिन वे लेखक बनने के आकांक्षी पाठक हैं। आप खुद उनके
लेखन पर टिप्पणी न करें तो वे पाठक की कैटेगरी से निकल जाएंगे। वे देखते ज्यादा
हैं पढ़ते कम। कंसंट्रेशन स्पैन दो मिनट है तो क्या पढ़ेंगे। सीरियस लेखन के पाठक
नहीं हैं ।
फिर से ऑरा क्रिएट करना होगा। लिटरेचर को मुकाम
देने के लिए उसे इम्पोर्टेंस देना पड़ेगा। पाठक भी लेखक के साथ ग्रो करता है।
ट्रेस पढ़ते हुए वे अच्छे साहित्य की तरफ बढ़ते हैं। ऐसी क्या किताब हो जिसे लोग
पढ़ना चाहें। यंगर जेरनेशन आएगी तो उम्मीद बनेगी- But eyes are blind, we should look
from heart.
इस सत्र के अंतिम
वक्ता अविनाश मिश्र ने भी पूर्व वक्ता प्रत्यक्षा का अनुसरण करते हुए संक्षिप्त
वक्तव्य दिया । 5 मिनट में निम्न बातें उन्होंने कहीं-
अस्मितावाद ने हमारे साहित्य में असंतुलन पैदा
किए हैं। जब-जब असंतुलन बढता है पाठक बढ़ते हैं। इलाचंद जोशी, यशपाल, जैनेंद्र
पहले बहुत पढ़े जाते थे, अब बहुत कम। कोई लेखक नहीं चाहेगा कि उसे एक ही विचार के
लोग पढ़ें। रुचि की तानाशाही नहीं रुचि का वैविध्य होना चाहिए। अब रीडर नहीं, ‘यूजर’
हैं।
पाठक हवा में रहता है । किताब के प्रभाव में।
पाठक अज्ञात होता है। ‘यूजर’ ज्ञात होता है। पाठक लेखक में बदलता है। प्राध्यपकों
के पाठक-यूजर सेम होते हैं ।
27
अगस्त 2023 तेरहवां सत्र का विषय था - ‘आलोचना : दशा और दिशा’ । संचालन मधु बी.
जोशी ने किया।
पहला वक्तव्य अच्युतानंद मिश्र का था। विषय था ‘आलोचना की भूमिका’ । उन्होंने कहा : आलोचक को
न्यायाधीश माना जाता रहा है। साहित्य समाज के अलग-अलग आयामों को समाहित करता है।
आलोचना पाठ के अलग-अलग आयामों को समाहित करती है।
अकबर द्वारा कृष्ण से संबंधित दोहे का अर्थ पूछे
जाने पर बीरबल, तानसेन, टोडरमल सब अलग-अलग अर्थ बताते हैं तो अकबर बोलते हैं कि सब
अपना-अपना अर्थ बता रहे हैं। किसी ने कविता का अर्थ नहीं बताया। आलोचना की भूमिका
यहीं से शुरू होती है कि वह रचना के समानांतर पाठ बताए। उसकी भूमिका अर्थनिर्धारण
की नहीं है। दोस्तोव्येस्की के उपन्यास ‘इडियट’ में एक प्रसंग
आता है। उसके एक पात्र को पीठ के पीछे
देखे जाने का एहसास होता तो उसे लगता है कुछ है जो सॉल्व नहीं हुआ और वह बेहोश
होकर गिर जाता है। मुक्तिबोध के ‘अंधेरे में’ के नायक का बाहर-भीतर का
अंतर्द्वंद्व भी कुछ ऐसा है। इस अंतर्द्वंद्व को आलोचना उभारती है। एक नए बनते
भारत की कशमकश को तीन पुस्तकों को मिलाकर दिखाने की कोशिश की गई। आजादी के बाद
पाठों को इस तरह मिलाकर देखने की कोशिश कम हुई है।
क्या 2023 के भारत में इसकी कल्पना कर सकते हैं
कि तीन मुस्लिम गायक मिलकर मंदिर में गाएँ ? भारत का नया पाठ बन रहा है। पाठ को
बदलने में एक बड़ी भूमिका टेक्नोलॉजी की रही । रामायण के 300 पाठ हैं। यह बताता है
कि भारत में रामायण को देखने की अलग-अलग दृष्टियां हैं । ये पाठ एक-दूसरे को काटते
नहीं हैं, बल्कि मिलकर समग्रता बोध बनाते हैं। मगर रामानंद सागर की ‘रामायण’ ने बाकी 299
पाठ खत्म कर दिए। चीजों को नष्ट होते देखना हमने बंद कर दिया है। लोकतंत्र के पाठ
खत्म हो रहे हैं। हमने बहुत सारी चीजों पर चुप रहना सीख लिया। आलोचनात्मक विवेक
समाज, साहित्य पाठ से जोड़ता है। उसके उत्तरोत्तर नष्ट होने की प्रक्रिया इस
उदाहरण से भी समझी जा सकती है। ‘टेलीफोन’ शब्द में टेली और फोन शब्द
हैं। शब्द से साफ समझ आता है कि सुन भी सकते हैं। ‘मोबाइल’ में ‘फोन’ शब्द नहीं है।
इसलिए इस शब्द से सुनने का बोध नहीं होता। यानि यह अपने मूल अर्थ से कोई संबंध
नहीं रखता। इसी तरह लेखक-पाठक ने अपनी केंद्रीयता खो दी। दोनों एक ही काम कर रहे
हैं। दोनों उपभोग की प्रक्रिया संपन्न कर रहे हैं। ऐसे में आलोचना के पास क्या
रास्ता है? निराला की पंक्ति है- ‘मार खा रोई नहीं’ इसमें यह जो ‘तीसरा’
देख रहा है, यह ‘तीसरी आँख’ आलोचना की आँख
है । संवेदना, करुणा, मानवता आलोचनात्मक विवेक का रास्ता है। यह ‘तीसरा’, जिसका
जिक्र श्रीकांत वर्मा में भी आता है । रघुवीर सहाय के रामदास को भी ‘तीसरे’ की
उम्मीद है । यही आलोचना का काम है कि वह पाठों की बहुलता और दृष्टियों की विविधता
को बचाए । वर्ना हम उस विवेक को खो देंगे जो सबसे मिलकर हम समाज में बनाते हैं,
जीते हैं।
दूसरे वक्ता आशुतोष
दुबे ने ‘आलोचना की सत्ता’ विषय पर पर्चा
पढ़ा और कुछ महत्वपूर्ण बातों की ओर ध्यान खींचा:
एक ऐसे समय में हम बात कर रहे हैं जब सत्ता
हमारे समय का केंद्रीय विमर्श बन गया है। सत्ता के अर्थ जिस तरह आज बदले हैं।
अधिकार, वर्चस्व ....यहाँ तक कि दमन से सत्ता का अर्थ ग्रहण किया जा रहा है। सत्ता
की ये तमाम चीजें आलोचना में भी आ रही हैं। क्या इसमें किया जाना चाहिए।
रचना में नाम तजने की कोशिश होती है तो आलोचना
में फिर से नाम देने की कोशिश। अवचेतन के कारोबार की कार्यवाही करने वाली चेतस
प्रणाली है आलोचना। आलोचना विवेक का रंग है। आलोचना खुले मैदान में आना है जहाँ
तुरंत देखा जा सकता है कि आलोचक कितने पानी में है।
मुक्तिबोध ने लिखा है कि शमशेर पर लगाया गया
दुरूहता का आरोप सामान्यीकरण की आदत के कारण है। वैचारिक आग्रह की यांत्रिक
विचारणा विशिष्टता की मौलिकता की उपेक्षा करती है। छिछला, यांत्रिक सामान्यीकरण
विशिष्टता के सर्वाधिकार का उल्लंघन है। साहित्य के लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता
है कि यहाँ कोई रद्द नहीं होता। भवभूति की तरह निरवधि प्रतीक्षा भी यहाँ की जाती
है।
सवाल है कि आलोचना की नजर कहाँ टिकती है?
आलोचना पुनर्परीक्षण की जगह पुनरावृत्ति नहीं।
आलोचक क्या अपनी आलोचना के लिए तैयार हो कर अप्रत्याशित जगह जाने के लिए तैयार है? आलोचना की अपनी
सत्ता होती ही है। पाठकविहीन समय में और ज्यादा होती है। मिलान कुंदेरा का कथन है
कि समझने का अर्थ है विलीन हो जाना।
आलोचना ‘समझने’ का ही नाम है। उसे रचना में जाकर
राख हो जाना होता है। राख में ही उसे जीवन मिलता है।
सत्र का तीसरा और अंतिम वक्तव्य राहुल सिंह ने ‘आलोचना की
सृजनात्मकता’ पर दिया-
आम राय है कि आलोचना सृजनात्मक नहीं होती। वह
पारिभाषिक शब्दावली की दुनिया है और अपरिचितों के लिए उसमें रुखापन होता है।
सृजनात्मकता में नमनीयता होती है। इसलिए सृजनात्मक आलोचना के उदाहरण कम हैं।
सृजनात्मकता का मामला व्यक्तिगत है, क्योंकि सबकी अपनी पढ़त है। आस्वादक सहृदय
होता है । व्यक्तिगत पढ़त व्यक्तिगत रुचि का विषय है। जरूरी नहीं कि हर आलोचक के
पास सृजनात्मकता हो । उदाहरण के तौर पर रामचंद्र शुक्ल की भाषा में खूब शास्त्रीय
शब्दावली है । हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषा को थोड़ा तरल करते हैं। रामविलास शर्मा
की आलोचना-भाषा में व्यक्ति संबंध भी दिखने लगते हैं। जरुरी नहीं है कि आलोचक की
सृजनात्मकता दिखे । सृजनात्मकता पाठ से सुदीर्घ संबंध में आती है । पाठ के साथ
लंबा जीवन गुजारने के साथ ही सृजनात्मकता संभव हो सकती है। इसमें भाषा की बड़ी
भूमिका होती है। सृजनात्मक आलोचना दुरूहता का आवरण उतार कर हम तक आती है। रचना के
सुनिश्चित पाठ के बाद भी ऐसे कोनों-अंतरों को उजागर करती है जिन पर हमारा ध्यान
नहीं गया है।
किसी एक आलोचक की एक कृति में सृजनात्मकता होती
है, किसी में नहीं। सृजनात्मकता को बार-बार उत्पन्न करना संभव नहीं हो पाता। जब
किसी रचना के साथ निजी संबंध जुड़ता है, तब सृजनात्मकता आती है और कृति का नया पाठ
उजागर होता है। नए स्वरों को जगह देने की क्षमता भी सृजनात्मक आलोचना में है।
सृजनात्मक आलोचना लिखते हुए आलोचक आनंदित होता है।
आलोचक के पास भी एक जेनुइन मौका होता है कि जिस
विषय से उसकी मोहब्बत होती है उसे सृजनात्मक आलोचना का आधार मिल जाए। अज्ञेय जिसे
इस तरह कहते हैं- जाने हुए, पहचाने हुए का हो जाना। यह हो जाना बुद्धत्व का
लक्षण है। फिल्म ‘अ वेडनसडे’ में नसीरूद्दीन शाह का एक वाक्य है – ‘साबुन
भी पोटेंशियल बम होता है।‘ इसी प्रकार
हर लेखक-पाठक एक पोटेंशियल क्रिटिक है। आलोचकों से ज्यादा रचनाकारों के गद्य ने
समृद्ध किया है, उसमें स्पार्क होता है। सृजनात्मक आलोचना दरअसल इश्क का मामला है।
किसी एक विषय के इश्क में पड़कर जीना शुरू कर दें तो आएगी सृजनात्मक आलोचना। नामवर
सिंह की कृति ‘छायावाद’ पढ़ कर मैं विस्मित हुआ था कि ऐसी भाषा भी हो
सकती है। उसमें शीर्षक अलग-अलग कविताओं की
पंक्तियों से लिए गए हैं। वे उस समय के युगबोध को अभिव्यक्त करते हैं। यह कितनी
अच्छी पढ़त है कि एक युग को परिभाषित करने के लिए काव्य-पंक्तियों का इस्तेमाल किया
गया है । विजयदेव नारायण साही ‘जायसी’ में प्रचलित समझदारी को नए ढंग से देखते हैं।
लोहिया के चिंतन का नया अनुप्रयोग । ‘कुजात मठी’ के आईने में हिंदी साहित्य को देखेंगे तो जानेंगे । यही
इसे जानने की समृद्ध परंपरा है।
कुछ आलोचना पुस्तकें जिनकी भाषा में सृजनात्मकता
है, उनके उदाहरण देता हूँ-
1. प्रभाकर
श्रोत्रिय- ‘मेघदूत- एक अंतर्यात्रा’ को पढ़कर कालिदास की खूबसूरती तक मैं पहुँचा था।
2. इरावती कर्वे की
‘युगांत’ पढ़कर महाभारत के स्थापत्य तक पहुँचा। हर पात्र उसके
केंद्र में है। हर किरदार महाभारत की संरचना को धारण किए हुए है। एक को उसकी जगह
से हिला नहीं सकते।
3. अखिलेश- वह
जो यथार्थ था
4. ज्ञानरंजन- कबाड़खाना
5. अज्ञेय के
दिक-काल से संबंधित निबंध। उन्होंने भारतीय दिक्काल-बोध को पश्चिम के संस्कार से
अलगाया था। पश्चिम में ‘ट्रेजडी’ है जबकि की हमारे यहाँ सुख के संस्कार हैं।
6. निर्मल वर्मा के
निबंध ।
7. राजेंद्र यादव -
‘नई दैनिक महानता की दिलचस्प दास्तान’ में देवकीनंदन खत्री की रचनाओं का दिलचस्प बयान करते हैं।
यह विलक्षण पाठ है।
8. कुमार अम्बुज की
डायरी ‘थलचर’
9. राजेश कुमार की ‘एक कवि की नोटबुक’ में बहुत
स्पार्क है।
10. राधाबल्लभ
त्रिपाठी की रचनाएँ
11. आशुतोष भारद्वाज
का ‘पितृवध’
12. पीयूष दईया
13. गंधर्व पर
पोद्दार की किताब
14. मलयज के निबंध
सृजनात्मक आलोचना का संबंध पाठ के साथ
प्रेमपूर्ण संबंध से है ।
रामकुमार तिवारी ने सुझाया- शंपा शाह का गगन गिल
पर लिखा गया लेख । योगेंद्र आहूजा ने दो कृतियां जोड़ीं - रमेशचंद्र शाह की ‘छायावाद की प्रासंगिकता’ और मुक्तिबोध की
‘कामायनी - एक पुनर्विचार’ ।
रश्मि रावत ने कहा - मेरी एक टिप्पणी और एक
जिज्ञासा है। मगर हम लोग सवाल पूछें, इससे पहले मैं संचालक मधु बी. जोशी से निवेदन
करना चाहूँगी कि यहाँ कविता, उपन्यास, फिल्म, आलोचना में सक्रिय अनेक स्त्री
सहभागी उपस्थित हैं तो इस विषय पर दो-चार वाक्यों में उनके भी विचार सुन लिए जाएँ
तो सत्र में आए विचारों का फलक व्यापक होगा। अभी यह एकांगी हो गया है। इस पर मधु
जी ने विनम्रता से कहा, मुझे तो इस विषय में जानकारी नहीं है। न यह मेरा क्षेत्र
है। मैं बतौर संचालक वक्ताओं के क्रम और समय का ही ध्यान रखने की भूमिका में हूँ।
अम्बर पाण्डेय ने कहा - सही बात है, आलोचना के इस सत्र में स्त्री आलोचक को भी
शामिल किया जाना चाहिए था।
मगर
सुनने वालों में ऐसा कोई धीरज नहीं दिखा तो स्त्री रचनाकारों ने अपनी बातें नहीं
रखीं ।
रश्मि रावत ने आशुतोष दुबे की इस बात को
रेखांकित करते हुए कि वह अवचेतन के कारोबार की कार्यवाही है - कहा कि आज के
समय में अवचेतन की इस कार्यवाही की प्रासंगिकता और अधिक हो गई है। हम जिस समय में
जी रहे हैं, बड़ी तेजी से पीढ़ियाँ बदल रही हैं। इतना कुछ इतने आयामों में इतनी
तेजी से हो रहा है कि हमारा समय बाहर-भीतर का हमारा पूरा रसायन बदल कर रख देता है
और हमें खबर भी नहीं होती। ऐसे में आलोचक को बहुज्ञ होने और सजग, सचेत होकर रचना में
उन प्रभावों को खोजने की जिम्मेदारी और अधिक दायित्वबोध के साथ निभानी चाहिए,
जिनका संज्ञान लेखक को भी न हो। राजनीति, समाज-शास्त्र, विज्ञान, मनोविज्ञान और
अन्य विषयों के अधुनातन शोधों से भिज्ञ रहकर नए रसायनों को चिन्हित करने में खुद
को सक्षम बनाने और प्रतिबद्धता से अपना काम करने के सिवा कोई चारा नहीं। इसके अभाव
में न्यूनतम कसौटियों पर भी अनुत्तीर्ण लेखन का अंबार लग रहा है। मार्केट के नए
हथकंडों के लिए समय भी उनके पास ज्यादा होता है जिनके लिए शब्द-साधना बेमानी है । ऐसे
में उनकी ही रचनाओं का चर्चा में अधिक रहना स्वाभाविक ही है । यह अव्यवस्था आलोचना
की ईमानदारी से ही नियंत्रित की जा सकती है।
मैं आलोचक को ‘सत्ता’ की तरह नहीं देखती। आलोचक
को तो हवा-पानी होकर शब्दों की भीतरी तहों से मायनों का उत्खनन कर सकना चाहिए ।
विनीत भाव से रचना में प्रवेश करना चाहिए। कभी-कभी रचनाकार-आलोचक के भीतर मायनों
की एकतार छिड़ जाती है तो जो राग पैदा होता है - वह आलोचना का सुख है। इस बात को
मैं विनोद कुमार शुक्ल के उपन्यास ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ के माध्यम से
स्पष्ट करती हूँ- वहाँ दो किरदारों की आपसी बात बड़े ही सरस और दिलचस्प ढंग से आती
है। कहने वाला जो कहता है, उसमें सुनने वाला अपनी इच्छित बात सुनता है। चंद
संवादों के बाद एक वाक्य जैसा कहा जाता है, वह वैसा का वैसा सुना जाता है।
कहे-सुने के एक होने की यह झंकार रिश्तों का नमक है । यही ‘नमक’ आलोचना को भी अर्थवान
बनाता है । रचना-आलोचना में यह झंकार बीच-बीच में पैदा होती है और उसके समांतर तने
तारों में दूसरे मायने भी बहते रहते हैं। पर उन इतर मायनों को अर्थ बीच में एक हो
जाने वाली टंकारों से मिलता है। अपनी-अपनी ढपली अपना-अपना राग अगर रचना-आलोचना में
हो तो आलोचना का क्या अर्थ रह जाएगा?
राहुल जी, मैं आपसे दो सवाल पूछना चाहती हूँ
पहला यह कि क्या किसी लेख को लिखते हुए आपका रचना या रचनाकार से प्रेमपूर्ण संबंध
बना-जिसे आपने सृजनात्मक आलोचना की जरूरत माना है, और आपको लगा कि आपका वह लेखन
सृजनात्मक आलोचना का उदाहरण है?
दूसरी जिज्ञासा मेरी है कि रामचंद्र शुक्ल से
लेकर एकदम युवा आलोचक की साल-दो साल पहले छपी किताब के उदाहरण आपने दिए मगर क्या
लगभग सौ साल की अवधि में हिंदी में किसी भी स्त्री का लेखन सृजनात्मक आलोचना का
उदाहरण नहीं है ?
राहुल जी के जवाब से पहले अच्युतानंद बोल पड़े -
क्यों नहीं, उन्होंने इरावती कर्वे का उदाहरण दिया तो है । यह स्पष्ट होने पर कि
हिंदी का उदाहरण पूछा जा रहा है, उन्होंने कहा - किसी भी भाषा से दिया गया हो।
भाषा की शर्त क्यों? रश्मि रावत ने कहा कि मेरे वक्तव्य के बाद आप स्त्रीवाद पर
10 किताबें पूछ रहे थे । मैं जो बताती तो आप कहते यह नहीं, मौलिक रूप से हिंदी में
और किताब के रूप में लिखी गई रचना बताओ । लेखों का संकलन और अनुवाद नहीं। तो फिर
हिंदी के इतने लंबे इतिहास में से सृजनात्मक आलोचना का एक स्त्री-लिखित उदाहरण
पूछना अनुचित कैसे है? खैर यह सवाल ही
वक्ता और अधिकांश भागीदारों को रास नहीं आया। उनका मानना था कि वह व्यक्ति की रुचि
का मामला है, वह किसे उठाए, किसे नहीं । इस पर सवाल उठाना उचित नहीं । पहले सवाल
के जवाब में उन्होंने कहानियों पर लेख लिखते हुए प्रेम संबंध स्थापित होने और
लिखने में आनंदानुभूति की बात बताई और रश्मि रावत के द्वारा उठाया गया दूसरा सवाल
अनुत्तरित रहा । बहरहाल, ऐसे ही सार्थक और स्वस्थ अनुभव रचना-शिविरों को प्रासंगिक
और महत्त्वपूर्ण बनाते हैं । गगन गिल ने अपने उदघाटन वक्तव्य में कहा था कि इस
शिविर की सार्थकता यही होगी कि हम अपने चश्मे छोड़ कर जाएँ । अपने को तोड़ें,
बदलें। शिविर में ऐसा कई बार हुआ भी । चश्मे को ही आँख समझने का भ्रम खत्म हो तो
देर-सवेर चश्मे छूट जाते हैं। बहसें, जो हिंदी साहित्य के जगत से लुप्त होती जा
रही हैं, चेतना के विकास के लिए जरूरी होती हैं । सवाल अनुत्तरित भी रहें तो भी
उनकी नोकें चेतना के रंध्र खोल देती हैं। आगे-पीछे सबने इस सवाल पर सोचा तो होगा
ही कि हमारी पढ़त में साहित्य का एक हिस्सा गायब या कम क्यों है । क्या इसे
व्यक्तिगत रुचि का मसला कहा जा सकता है?
27 अगस्त का दूसरा और शिविर का चौदहवाँ सत्र ’कहानी
पाठ’ का था। इसका संचालन प्रिया वर्मा ने किया। जया जादवानी ने अपनी कहानी ‘रोको वे तुम्हें
छोड़कर जा रहे हैं’ का प्रभावशाली पाठ किया।
कहानी सभी उपस्थित लोगों को पसंद आई।
आनंद हर्षुल ने
छोटी-छोटी 13 कहानियाँ पढ़ीं। इन्हें सुनने में सबने बहुत रस लिया। अलग-अलग मिजाज
की इन कहानियों के शीर्षक थे- ‘मनुष्य के बाद घर’, ‘दीवार के पार’, ‘प्रेम में लड़की’, ‘बेटी का कद’, ‘अंतिम पंक्ति के
आदमी का घेरा’, ‘ईश्वर की खाँसी’, ‘कोयले की इच्छा’, ‘बच्चों की आँखें’, ‘पति का सुनना,
पिता का सुनना’, ‘लापता परिवार’, ‘दुखी क्षण’, ‘झूठा आदमी’, ‘आतंक’।
योगेंद्र आहूजा ने अपनी कहानी ‘डा. जिवागो’ का पाठ किया। लंबी होने के कारण उन्होंने कहानी के चुनिंदा अंश पढ़े । कहानी पाठ से पहले कहानी के आशयों-अभिप्रायों-मर्म और उसके पीछे निहित अपने सरोकारों का संकेत देने वाली एक बेहतरीन पूर्वपीठिका वे लिखकर लाए थे । उसे पढ़ने के पश्चात कहानी-अंश पढ़ा गया तो कहानी की संवेदना सक्षम ढंग से संप्रेषित हुई।
भोजनापरांत दिन का तीसरा सत्र ‘कथेतर गद्य
-समझ और संवेदना के नए विन्यास’ दोपहर 3 बजे आरंभ हुआ। प्रियंका दुबे ने
संचालक की भूमिका से साहित्य में कथा साहित्य और कथेतर के बीच चले आए भेदभाव को
चिन्हित किया । बर्ट्रेंड रसेल अपने कथेतर गद्य के लिए चर्चित और पुरस्कृत हुए।
बाद में उपेक्षित कथेतर विधाओं को एक काइनेटिक पुश मिला। नॉन-फिक्शन बढ़ता हुआ
फॉर्म है।
पहली वक्ता गगन गिल ने ‘स्मृति और दंश’
आलेख पढ़ा जो उन्होंने 1984 के दंगों पर लिखा था।
मधु बी. जोशी ने ‘उच्च शिक्षा में अनुवाद
और भाषा की भूमिका’ आलेख का पाठ किया।
वरिष्ठ साहित्यकार सत्यनारायण ने ‘यायावर
की डायरी’ के अंश पढ़े। सभी को वे बेहद पसंद आए । लोगों ने उस किताब को
पढ़ने की जिज्ञासा दिखाई, जिसमें एक पंक्ति थी- पेड़ के नीचे बैठना ऐसा लगता है
कि जैसे अपने साथ बैठे हों।
जयशंकर जी ने 2004 में कथादेश में प्रकाशित
बुढ़ापे का एक स्केच और एक नया लिखा गया स्केच पढ़ा । इसमें एक वाक्य आया- जीवन
इतना बदल गया है कि जीवन की अनुपस्थिति ही ज्यादा महसूस होती है।
राजुला शाह ने दयाकृष्ण की प्रेरणा से सिनेमा के
बहाने लिखा हुआ आलेख पढ़ा जिसका शीर्षक था – ‘जब सिनेमा कथावाचक से बढ़कर
कुछ होगा’ । बहुत ही महत्वपूर्ण बिंदु उस आलेख में उठाए गये थे।
रचना शिविर का सोलहवाँ और दिन का अंतिम सत्र गगन
गिल से प्रियंका दुबे की बातचीत का था। गगन जी के प्रारंभिक जीवन और बौद्धिक
विकास, उनकी कविताओं की जमीन और उनके गद्य का मिजाज, निर्मल वर्मा से जुड़े उनके
अनुभव और उनकी साहित्येतर अनुरक्तियों से संबंधित आयाम इस बातचीत में दिलचस्प ढंग
से आए । दार्शनिक, तात्विक जिज्ञासाएँ भी बीच-बीच में आती रहीं। यह एक लंबी बातचीत
थी, जिसमें गगन जी की शख्सियत, कृतित्व और कविताओं और गद्य रचनाओं की भावभूमि की
अंतरंग झलक सहभागियों को मिली । इस अंतरंग संवाद में वरिष्ठ कवयित्री ने एक भीतर
तक कँपा देने वाले सरोकार को भी रेखांकित किया । हम सब इस समय की राजनीति से
बेचैनी महसूस करते हैं, आशंकाओं से घिरे हैं। हमारे जो भी रचनात्मक सरोकार और
जीवन-सौंदर्य की लय रही है, सामाजिक-सांस्कृतिक-बौद्धिक सृजन के जिस स्तर तक हम
पहुँचे थे, उससे आगे बढ़ने के रास्तों को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए एक हिंसक
राजनीति जैसे उमड़ी चली आ रही है। एक आम नागरिक जो सचेत ढंग से राजनीतिक-सामाजिक-आर्थिक-सांस्कृतिक
सवालों से न भी जुड़ा हो, सिर्फ एकांत में अपने ईश्वर के साथ प्राइवेट स्पेस में
जीना चाहता है – यह राजनीति व्यक्ति के उस बेहद निजी स्पेस को भी दूषित, मलिन करने
के लिए तत्पर दिखाई देती है। इन सरोकारों को प्रकट करते हुए गगन जी के शब्दों की
बानगी -
“मेरा फर्स्ट हैंड अनुभव मेरे समय की हिंसा है।
मेरे व्यक्तिगत स्पेस में हिंसा कैसे प्रवेश कर रही है। मैं एक ‘प्रैक्टिसिंग
बिलीवर’ की तरफ जा रही हूँ। जितना पब्लिक स्फेयर धर्म के नाम पर दूषित होता जाता
है, उतना वह मुझे नकारता जाता है। मुझे लगता है मुझे कोई आउटसाइडर नहीं बता सकता
कि मुझे पूजा-अर्चना कैसे करनी चाहिए । जिस स्पेस में हम शरण के लिए जाते हैं, वह
दूषित होता है तो उसका प्रतिकार कैसे करना चाहिए। मुझे समझ नहीं आता। मगर इन चीजों
से कभी न कभी मुठभेड़ करनी पड़ेगी। मेरे ‘सैल्फ’ को क्या कोई राजनीति प्रभावित कर
सकती है ? कल को जो हिंदू राष्ट्र बनेगा क्या वह मेरी कल्पना का हिंदू राष्ट्र
होगा ? जिसमें हमारी बाई जी ने हमें संभव किया । हमें धर्म के भेदभाव का कुछ पता
नहीं था।”
शब्दों में तो विविध बातें हुईं ही मगर अगाध
प्राकृतिक सौंदर्य की लुभावनी शाम की उस बातचीत का शब्देतर प्रभाव भी यादगार रहा ।
युवा ऊर्जा से लबरेज प्रियंका दुबे के शब्द झरने के पानी की तरह अबाध बहते जाते।
गगन गिल की शख्सियत से मंत्रमुग्ध बहती-बहती वह भूल सी जाती, क्या-क्या पूछूँ,
कहाँ ठिठकूँ। शब्दों से अधिक गगन जी का व्यक्तित्व मुखर जान पड़ा । उनके चेहरे और
मुद्राओं के उतार-चढ़ाव, मौन के लंबे अंतराल, बात को सुने जाने के भाव...उन सब से
पास बैठी प्रियंका को जवाब खुद-ब-खुद मिल रहे होंगे। उन दो के बीच स्थापित अनूठे संवाद
के बीच अचानक उसे याद आता कि अन्य उपस्थित जनों को भी सवाल-जवाब की दरकार है तो वे
अचकचा कर कोई भी प्रश्न पूछ बैठतीं। गगन गिल उतने ही ठहराव से धीमे-धीमे अंतराल
देकर बोलतीं । लगता जैसे झरने का जल उन तक आकर समतल जमीन को अपने फैलाव से सींच
रहा है। उसमें चुप्पी को ठेलते हुए शब्दों का धीमा संगीत था। वय के दो छोरों पर
स्थित दो व्यक्तियों का वह संवाद गति और ठहराव के बीच हुआ एक अभूतपूर्व संवाद था
जो सभी उपस्थित लोगों को अत्यंत भाया।
28 अगस्त पहला और शिविर का सत्रहवाँ सत्र -
विरासत - कहानी पाठ
सत्र-संचालन के साथ कहानियों और कहानीकारों पर टिप्पणी देने की भूमिका रश्मि
रावत ने निभाई-
श्रीकांत वर्मा की कविता की पंक्तियों से इस सत्र का
आगाज करते हैं, जिनके नाम पर बनी पीठ के तहत ही इस रचना-शिविर का आयोजन किया गया
है।
“हस्तिनापुर में सुनने का रिवाज नहीं
मैं फिर कहता हूँ
धर्म नहीं रहेगा, तो कुछ
नहीं रहेगा-
मगर मेरी
कोई नहीं सुनता
हस्तिनापुर में सुनने का
रिवाज नहीं.
जो सुनते हैं
बहरे हैं या
अनसुनी करने के लिए
नियुक्त किए गए हैं
मैं फिर कहता हूँ धर्म
नहीं रहेगा
मगर मेरी कोई नहीं सुनता
तब सुनो या मत सुनो
हस्तिनापुर के निवासियों।
होशियार।
हस्तिनापुर में तुम्हारा
शत्रु पल रहा है, विचार
और याद रखो
आजकल महामारी की तरह फैल
जाता है
विचार”
उनकी एक और कविता की पंक्ति है- “तीसरा रास्ता भी है मगर वह मगध, अवंती, कोसल या विदर्भ होकर नहीं जाता।”
साहित्य उस तीसरे रास्ते की तलाश भी तो है। वह
तीसरा रास्ता खुले और विचारों का सृजन-पल्लवन होता रहे- यह इस रचना-शिविर के मकसद
में शामिल है। श्रीकांत वर्मा की शख्सियत और रचनाशीलता से आप सब परिचित हैं कई
विधाओं में उन्होंने लिखा। हिंदी कहानी की दुनिया को समृद्ध करने वाले तीन लेखकों
की अलग-अलग मिजाज की जिन तीन कहानियों का पाठ यहाँ किया जा रहा है, उनसे गुजर कर
समझा जा सकता है कि
हिंदी कहानी की विरासत कितनी समृद्घ है और उसमें
कितना वैविध्य है। एक ही तरह का सौंदर्य हर कहानी में खोजना सांस्कृतिक विपन्नता
का सूचक है। भिन्न सौंदर्य-बोध से इन कहानियों के मर्म तक पहुँच कर उनका मुकम्मल
आस्वाद लिया जा सकता है। इस दृष्टि से भी इन तीन कहानीकारों और इन तीन कहानियों का
चयन मानीखेज है। वर्तमान में जब अनेक पीढ़ियाँ एक साथ कहानी-लेखन में सक्रिय हैं।
वर्तमान चुनौतियों का सामना करने की शक्ति बटोरने के लिए भी बार-बार अतीत का रूख
करना पड़ता है, जहाँ से होते हुए परंपरा हम तक आई है। हर बार के पाठ में हमारी
विरासत कुछ नया हमें दे जाती है।
श्रीकांत वर्मा की ‘शवयात्रा’ कहानी का ‘द फ्यूनरल’ नाम से अंग्रेजी अनुवाद लब्धप्रतिष्ठ लेखक भीष्म साहनी ने किया था। इसमें एकदम
तलछट का जीवन का प्रामाणिक अंकन हुआ है। मनुष्य होने मात्र से व्यक्ति मानवीय
गरिमा का हकदार हो जाता है। कोई भी स्थिति जीवन की ऐसी नहीं हो सकती, जिसमें
बुनियादी मानवीय गरिमा से भी व्यक्ति को वंचित किया जा सके। मगर विषमता पर टिके
समाज में मनुष्यता की यह आवश्यक शर्त खंडित होती रहती है। बुनियादी इंसानी
अधिकारों से भी निर्वासित किए गए ऐसे लोगों का जीवन पूरी प्रामाणिकता से इस कहानी
में चित्रित होता है और अंत में उस जीवन को उसकी इंसानी ताब लौटाते हुए कहानी जिस
धज के साथ खत्म होती है। इंसानियत की ऐसी धज संवेदन-समृद्ध कलम से ही लिखी जा सकती
थी। मृत्यु को मान देना प्रकारांतर से जिंदगी को
मान देना है। इस कहानी की मुख्य किरदार को जीते जी न सही मरणोपरांत ही
मानवीय गरिमा मिलती है। आदमियत को संभव करने वाली इस यात्रा के सहयात्री उस आबादी
के पात्र हैं जिन्हें सभ्यता ने अपने हाल पर छोड़ दिया है। वे सब मिलकर संसाधन के
बिना भी एक-दूसरे के सहारे यह काम कर जाते हैं। कहानीकार संकेतित करता है कि
लोकतंत्र की बिगड़ी हुई गाड़ी दिन-रात खटने वाली यह विशाल आबादी अपने हाथ में ले
कर ही सुचालित कर सकती है। उनकी सामूहिक ताकत में ही इसकी बिगड़ी चाल का तोड़ है।
कहानी पर
परिचयात्मक टिप्पणी के बाद कहानी का प्रभावी पाठ राजुला शाह ने किया। सबने बहुत ध्यान से सुना और संवेदना को अपने-अपने ढंग
से ग्रहण किया।
रश्मि रावत ने कहा कि हम देख सकते हैं कि कैसे
गाली की तरह बोले जाने वाले ‘रंडी’ शब्द बार-बार कहानी में इस तरह आता है कि अंत तक आते-आते उसमें जो गाली-गलौज
वाली नोकें हैं, वे सब घिस जाती हैं। स्त्रियों को बतौर गाली दिए जाने वाले शब्दों
के काँटे तोड़ कर उन्हें सपाट कर देना उन्नत जेंडर चेतना से ही संभव हो सकता है।
कहानी से यह भी सामने आया कि अलग-अलग कारणों से समाज द्वारा तिरस्कृत लोग एक-दूसरे
की ताकत बनते हैं।
अब दूसरे कहानीकार मुक्तिबोध पर आते हैं। उनके
दृष्टि-संपन्न प्रखर लेखन और जीवन को एक-दूसरे के आईने में साफ देखा जा सकता है।
रचना कर्म-आचरण में बेफाँक रहने वाले ऐसे लेखक किसी भी भाषा में विरले ही होते
हैं। मुक्तिबोध की कहानियों में अक्सर सुगढ़ता की कमी होती है। अपनी बात को कहानी
में सुरुचिपूर्ण ढंग से ढालना वे नहीं जानते। मगर जो सवाल वे उठाते हैं उनसे आँखें
मिलाए बिना मनुष्य होना मुश्किल है। वे जिस तरह औऱ जिन शब्दों में भाव रखते हैं,
कही गई बात भीतर तक बिध जाती है। बतौर कहानीकार वे समर्थ नहीं, मगर उनकी असफलता का
बहुत मोल है। सफल कथाकार संवेदना में जमी बर्फ को चीर पाने में सफल नहीं हो पाते,
वहाँ मुक्तिबोध अनगढ़ शिल्प से भी वह संवेदना जगाने में सफल हो जाते हैं। सफलता
उनके सामने निस्तेज नजर आती है। प्रियंका दुबे जिस ट्रूथफुल होने और विश्वसनीयता
को लेखन के लिए जरूरी बता रही थीं, वह इनमें है।
चयनित कहानी के पात्र अर्थाली के भीतर जो
आध्यात्मिक उद्विग्नता थी, वह मुक्तिबोध में है। ‘क्लॉट इथर्ली’ यथार्थवादी
कहानी नहीं वरन यह हम सबके मन की स्क्रीनिंग है। हमारे समाज की मूल्य-व्यवस्था को
रेखांकित करती हुई यह सभ्यता की समीक्षा करती है। कहानी के इस अंश को रेखांकित
करना चाहूँगी-
“मेरी आँखों में आँखें डालकर उसने कहना शुरू
किया- जो आदमी आत्मा की आवाज कभी-कभी सुन लिया करता है और उसे बयान करके छुट्टी पा
लेता है, वह लेखक हो जाता है। आत्मा की आवाज को लगातार सुनता है और कहता कुछ नहीं,
वह भोला-भाला सीधा-सादा बेवकूफ है। जो उसकी आवाज बहुत ज्यादा सुना करता है और वैसा
करने लगता है, वह समाज-विरोधी तत्वों में यों ही शामिल हो जाया करता है। लेकिन जो
आदमी आत्मा की आवाज जरूरत से ज्यादा सुन करके हमेशा बेचैन रहा करता है और उस
बेचैनी में भीतर के हुक्म का पालन करता है, वह निहायत पागल है। पुराने जमाने में
संत हो सकता है। आजकल उसे पागलखाने में डाल दिया जाता है।”
योगेंद्र आहूजा ने मुक्तिबोध की कहानी ‘क्लॉड इथरली’ का बेहतरीन पाठ
किया। माहौल की संजीदगी और खामोशी और अधिक गहरा गई। इतनी कि कहानी सुनते हुए लग
रहा था पेड़ों के साँस छोड़ने और पत्तों के हिलने की भी आवाजें आ रही हैं।
उनके कहानी-पाठ के बाद नवयुवा चेहरों पर घिर आई
अतिरिक्त गंभीरता को देखते हुए रश्मि रावत ने कहा कि आप सबने पहली बार यह कहानी
सुनी होगी। कहानी सरस भी नहीं है। आत्म-साक्षात्कार करने वाली, अपने आप से बोलती
हुई चिंतनपरक कहानी है तो सुनने से कम समझ आती है। आप लोग इसे एकांत में पढ़ोगे तो
समझ आएगी। फिलहाल जितने आशय ग्रहण हुए, उनसे संतुष्ट होते हुए अपनी चेतना को आगे
के कार्यक्रम की ओर ले जाएँ तो अच्छा रहेगा। उनके तनाव को ढीला करने के बाद कहानी
सुनने के दौराम मन में आई बातें उन्होंने कहीं-
हिंसा कितने रास्तों से किस-किस तरह आ सकती है
और इसमें पढ़े-लिखे मध्यम वर्ग, अमीर वर्ग की प्रत्य़क्ष-अप्रत्यक्ष भूमिका जो हो
सकती है, उसकी कई परतें कहानी में खुलीं। समाज की संरचना हिंसा पर टिकी है, जब तक
यह सत्य बना रहेगा तब तक अपराध-बोध से बरी व्यक्ति मानवीय नहीं हो सकता। अपराध-भाव
मानवीय चेतना का जरूरी हिस्सा है। आज के सूचना-विस्फोट के समय में यह शक्ति छीज
रही है। इससे मानवीयता संकटग्रस्त हो रही है।
फणीश्वरनाथ रेणु
मेरे प्रिय कथाकार हैं। शिल्प की असली चमक रेणु की कहानियों में पाई जाती है।
प्रेमचंद सामान्य आम आदमी के करीब पाठकों को ले गए थे। रेणु उस आम आदमी को उसके
वैशिष्ट्य से नवाजते हैं। उसकी सांस्कृतिकता उसे लौटाते हैं। उस आदमी के चेहरे की
लकीरें, उस पर लगी धूल-मिट्टी के कणों, तरह-तरह की ध्वनियों, रोजमर्रा के खटरागों और तमाम चीजों से पहचानी जा सकती है। प्रेमचंद
का विराट यहाँ सूक्ष्म लकीरों में दिखता है। जीता-जागता-साँस लेता यह व्यक्ति भारत
का सांस्कृतिक मानस गढ़ने में अपनी विशिष्ट भूमिका निभा रहा होता है। ‘रसप्रिया’ कहन और गठन की
दृष्टि से मुकम्मल कहानी है। बड़ा परिपक्व
शिल्प है। एक भी शब्द फालतू नहीं। कोई बोझिलता नहीं। दृश्य जैसे रचे गए हैं। अद्भुत प्रेम कहानी है। पंचकौड़ी मृदंगिया को
जातिगत विषमता के कारण अपनी प्रेमिका का साथ मिलना समाज में असंभव है। मगर इस
वंचना में भी प्रेम को अपने भीतर संजो कर रखते हुए दोनों प्रेमी बाहर से जो ढाँचा
जीवन का गढ़ते हैं। मनुष्य मन का सूक्ष्म पारखी उदात्त मानवीय भाव वाला लेखक ही इस
कौशल से पंचकौड़ी मृदंगिया और रमपतिया के किरदार गढ़ सकता था।
प्रिया वर्मा ने
‘रसप्रिया’ कहानी का सरस और जीवंत पाठ किया। उसमें इतनी
तरह की ध्वनियाँ और टोन और क्षेत्रीय बोली की भंगिमायें थीं, प्रिया उन सबको समेटे
हुए कहानी पढ़ रही थी इसलिए भाव-संप्रेषण में स्थानीयता के तत्व के कारण बाधा नहीं
पड़ी।
कितनी मार्मिक
कहानी है न? पूछने पर युवाओं ने हामी में सिर हिलाते हुए कहा कि एक बार
खुद से पढ़ेंगे तो अधिक समझ आएगी। फिलहाल मैं उसके आशयों को थोड़ा खोलूँ-
रश्मि रावत ने
कहा कि मेरी नजर में तो बहुत ही सशक्त कहानी है। रगों में जीवन के प्रवाह को
बढ़ाने में सक्षम। पंचकौड़ी और रमपतिया का जिया गया सांझा जीवन मोहन में घुला हुआ
है। वह इन दोनों की सांस्कृतिक संतति है। इन दोनों के व्यक्तित्व का विस्तार है।
जिनसे रमपतिया प्रेम नहीं करती, मगर विपदा में घिरने पर एक स्त्री के साथ मर्दवादी
अन्यायपूर्ण जो सलूक करता है, उसके कारण जैविक पिता कोई वर्चस्व-संपन्न व्यक्ति
भले हो। मगर उसने तो अपनी संतान के कानों में अपने प्रेमी के रसप्रिया गान और साझा
जीवन के किस्सों को घोला है। लगता है जैसे वर्चस्वथ नंदुओं के ऐन नाक के नीचे से
असली देश मोहन को यानी आम आदमी की अगली पीढ़ी को पकड़ा दिया हो। रसप्रिया बजाते
हुए पंचकौड़ी की टेढ़ी उंगली पढ़ते हुए एकलव्य का कटा अँगूठा भी याद आता है कि देश
की जड़ परंपराएँ उससे उसका गान और प्रेम का बलिदान ले रही हैं। झूठ पर टिकी समाज
की व्यवस्था में सच्चा प्रेम खुद को झूठ कहने के लिए बाध्य होगा ही। जीते-जागते
किरदारों की धड़कती कहानी में व्यवस्था को सिर से पैर के बल खड़ा रेणु जैसा
हुनरमंद ही कर सकता था। इन शब्दों के साथ अंतिम दिन के पहले सत्र का समापन हुआ। हर
कोई रेणु के मोह में बिंधा हुआ सा चाय-पानी के लिए उठा।
28 अगस्त पहला और शिविर का अठारहवाँ सत्र : कविता
पाठ
कविता पाठ के इस सत्र का प्रभावी संचालन जया
जादवानी ने किया। संजीदगी और कुशलता पूर्वक किए गए उनके संचालन ने कविताओं के पाठ
के असर को उठान दी
सत्र का आगाज योगेंद्र आहूजा द्वारा अविनाश
मिश्र की कविताओं के पाठ से हुआ। ( आग्नेय जी के शोक-संदेश को सुनने के तुरंत
बाद अविनाश जी दिल्ली के लिए रवाना हो गए थे।)
चार कविताएँ पढ़ी गईं। उनके शीर्षक थे -‘अनुकरण’, ‘भाषा’, ‘सोना’, ‘देश’
युवा कवि प्राची साहू ने ‘यात्रा’, ‘फूटने पर’, ‘कलावाद’, ‘स्मृतियाँ’, ‘सप्ताह भर में
लिखी गई कविताएँ’ पढ़ीं।
चर्चित युवा कवि प्रिया वर्मा ने ‘सलीब की वसीयत’, ‘पंचर बनाने वाले
के हाथ देखते हुए’, ‘लगातार बरसता
पानी’ और हाल में ही लिखी हुई एक कविता पढ़ी जिसका
शीर्षक नहीं था। कुल्हाड़ी से पत्नी को मार देने वाली हौलनाक घटना के हवाले से
दैनंदिन जीवन में अनकही हिंसा के अनेक रूप दिखाए गए थे। कविता में यह पीड़ा भी कही
गई थी कि ऐसी घटनाएँ कैसे हर अनुभव को आशंका में तब्दील कर देती हैं।
वरिष्ठ लेखक सत्यनारायण ने ‘साठ पार’ संग्रह की ये
कविताएँ पढ़ीं - ‘साठ’, ‘तुम्हारा नाम’, ‘मृत्यु-एक’, ‘मृत्यु-चार’, ‘मृत्यु-ग्यारह’, ‘आठ शब्द भी’, ‘स्त्री का दुख’
युवा मुदित ने एक शीर्षक विहीन कविता का पाठ किया।
मधु बी जोशी ने 6 कविताएँ पढ़ीं जिसमें
से दो शीर्षकविहीन थीं और बाकी चार के शीर्षक थे- बेरियाँ, कुंती उवाच,
हरिद्वार, अंधेरा।
आशुतोष दुबे ने सात कविताओं का पाठ किया
: छाया मत छूना मन, मृगया, तीज की रात, आवाज, मौत के बाद, आज्ञाकारी-मृत्यु के
पास जाते पिता, अनसुना
समापन सत्र खुले माहौल में अनौपचारिक रूप से
हुआ। पानी के बहने की कलकल और जंगल की सुखविभोर आवाजों को सुनते हुए विराट
प्राकृतिक सौंदर्य के बीच उन्नत चेतना वाले सहभागियों के साथ होने की आखिरी शाम के
एहसास ने इस अंतिम सत्र को एक अनूठा सांस्कृतिक संस्पर्श दे दिया था। रामकुमार
तिवारी ने रचना-शिविर में सबकी सक्रिय भागीदारी की सराहना करते हुए उनका धन्यवाद
किया। बाकी सबने भी इस शिविर का हिस्सा होने को समृद्ध करने वाला बताकर उनका
धन्यवाद किया। सबके आग्रह करने पर उन्होंने दो-तीन कविताएँ भी सुनाईं। अन्य लोगों
ने भी गाने गाए। साहित्यिक-सांस्कृतिक उस शाम का सबसे खूबसूरत हिस्सा था राजुला
शाह का कबीर गायन। उनकी संजीदा आवाज जैसे श्रोताओं को चेतना के दूसरे ही धरातल
पर ले गयी और सभी ने उनकी आवाज में आवाज मिलाकर उसे कोरस गान बना दिया । हम बेसुरा
कर रहे हैं गाने को, यह कहने पर उन्होंने कहा कि कबीर गान में कोई बेसुरा नहीं
होता । उसे कोई भी गा सकता है, अपनी आवाज और अपनी धुन में ।राजुला जी को सुनते हुए
लगता है कि कबीर की चेतना को उन्होंने अपने भीतर आत्मसात कर लिया है। गगन गिल के
इसरार पर उन्होंने रवीन्द्र संगीत के भी दो टुकड़े गाए। सबका मन था कि वह शाम कभी
खत्म न हो । मगर सभी को सुबह अपने-अपने घरों को निकलना था ।
रामकुमार तिवारी जी का विचार था कि क्यों न हम
एक संकल्प को साथ ले कर चलें। देश में होने वाली हिंसा के सभी रूपों का प्रतिकार
करते हुए उन्होंने कहा कि साहित्यिक मंचों से देश की साझा संस्कृति को अक्षुण्ण
रखने की पुरजोर आवाजें जरूर उठनी चाहिए । उन्होंने कहा कि आज लेखकों की आवाज़ क्षीण
होने के अनेकानेक कारणों में से एक यह भी है कि वे अलग-अलग लघु-वृत्तों में बंटे
हैं । वे आपस में संवाद करें, आज यह पिछले किसी भी समय से ज्यादा ज़रूरी है । ऐसा
होने पर ही लेखकों की अपनी आवाज होगी। अभी उनकी कोई आवाज ही नहीं है। सभी
सहभागियों के अपने भीतर थोड़े-थोड़े कबीर, बहुत सी यादें और हिंसा के प्रतिकार का
संकल्प लेने से रचना-शिविर की अंतिम रात का समापन हुआ।

प्रतिदिन अंतिम सत्र के बाद आस-पास के दर्शनीय
स्थलों का सामूहिक भ्रमण एक अविस्मरणीय अनुभव रहा । नर्मदा उद्गम कुंड, सोनमुड़ा,
श्रीयंत्र मंदिर, माई की बगिया, कपिल धारा, दूध धारा, कबीर आश्रम, कल्याण सेवा
आश्रम, सर्वोदय जैन मंदिर, ज्वालेश्वर महादेव मंदिर, अमरेश्वर महादेश मंदिर और
शंभूधारा एक साथ सब घूमे और आस-पास की प्रकृति और आबादी से मिलने अपने-अपने हिसाब
से सुबह की सैर में सहभागी चले जाया करते थे । सबसे यादगार रहा शंभूधारा का अनुभव।
वहाँ ऊबड़-खाबड़ और फिसलन भरे पत्थरों पर मचलती नदी की धाराओं को पार करना आसान न
था । एक-दूसरे के सहयोग से ही वहां तक जाना संभव हुआ जहाँ पहुँचकर अनुपम प्राकृतिक
नजारे दृष्टिगोचर होने थे। इस अनुभव ने हमें परस्पर नजदीक लाने में भूमिका निभाई ।
संग-साथ के ऐसे अनुभव भी आँखों में पड़े चश्मों को ढीला करने और ‘दूसरेपन’ का,
व्यक्ति की अद्वितीयता का सम्मान करना सिखाते हैं । यही तो रचना-शिविर का उद्देश्य
था ।