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Tuesday, October 27, 2026

अब भी वह फ़िलिस्तीन है : यादवेन्द्र


 

 


 

 (आज दुनिया में शायद ही कोई संवेदनशील इंसान होगा जिसे फिलिस्तीन के हालात ने विचलित न  किया हो। लंबे समय से जारी संघर्ष, सैन्य कार्रवाइयों  और नाकेबंदी के कारण वहां के नागरिकों का जीवन अस्त व्यस्त हो चुका है यह सब खबरों में आ रहा है लेकिन फिलिस्तीनियों के मन की उखाड़ पछाड़ को तो साहित्य ही दर्जकर रहा है। यादवेन्द्र  लगातर इस साहित्य को अनुवाद के जरिये हिन्दी के पाठकों के सामने लाते रहे हैं। अब यह किताब के रुप में सामने आया है। यहाँ प्रस्तुत है , इस किताब की भूमिका)

  

अब भी वह फ़िलिस्तीन है

कोई सुबूत न होगा 
तुम्हारे होने का
न आया फ़न 
जो क़लम खून में डुबोने का
                         -- रईसुदीन रईस

हमारी पीढ़ी फ़िलिस्तीन, दक्षिण अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और संयुक्त राज्य अमेरिका की अश्वेत आबादी इत्यादि के मुक्ति संघर्ष की खुली और चेतन सांस्कृतिक हवा में बड़ी हुई है और नेल्सन मंडेला, चे ग्वेरा, नाज़िम हिकमत और महमूद दरवेश हमारे उसी श्रेणी के अपने नायक रहे हैं जैसे भगत सिंह, सुकांत भट्टाचार्य, पाश, गोरख पांडेय और धूमिल। हमारे देखते-देखते पूरी दुनिया का भौगोलिक नक़्शा बदलता गया और ये नायक इतिहास के एपिक में अपनी-अपनी धमाकेदार पारी खेल कर शारीरिक रूप से विदा तो हो गए, परंतु किताबों में संकलित उनके लेख, भाषण, कहानी, कविता और विचार मनुष्य जाति की सांस्कृतिक विरासत की कालजयी श्रृंखला की कड़ी बन कर आगामी पीढ़ियों के लिए उपलब्ध रहे। वे उन्हें विकट परिस्थितियों में हौसला देते रहे और अन्याय-अत्याचार को न बर्दाश्त करने के लिए प्रेरित भी करते रहे। वह ऐसी प्रेरक विरासत है जिसने दरअसल दुनिया को भिन्न-भिन्न श्रेणियों की सरहदों में बाँटने की कुटिल साज़िशों को बेअसर किया है - क्षेत्रीय, भाषाई और राष्ट्रीय दीवारें ढहाई हैं और प्रतिकार के नए-नए वैकल्पिक रास्तों को सुझाते हुए एक-दूसरे से सीखने के औज़ार उपलब्ध कराए हैं।

सबसे पहले फ़िलिस्तीन की बात - लंबे समय से दुनिया भर में चौधरी की भूमिका निभाता अमेरिका और उसकी चाभी से संचालित उसके मुंशी इजराइल की आधिकारिक किताबों और शब्दावली में फ़िलिस्तीन नाम का कोई देश नहीं है। पर सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि 2025 में फ़िलिस्तीन को 157 देशों की (संयुक्त राष्ट्र के 81%) मान्यता प्राप्त थी और हाल-फ़िलहाल तक यह गिनती बढ़ती जा रही है। 1948 से आज तक कभी युद्ध तो कभी अनेक अघोषित अभियानों के ज़रिए यह गिरोह फ़िलिस्तीनी भूमि को हड़पता रहा है, उसकी आबादी को आतंकित, विस्थापित और नष्ट करता रहा है, फ़िलिस्तीनियों की भाषा-संस्कृति, जीवन शैली और विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान को हमेशा के लिए मिटा डालने की पुरज़ोर कोशिश करता रहा है। इन हमलों में कितने फ़िलिस्तीनियों की हत्या हुई इसका कोई प्रामाणिक आँकड़ा उपलब्ध नहीं है, लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़ा पर इजराइल ने जो हमले शुरू किए, वे अब तक जारी हैं। 16 मई 2026 को द गार्डियन में प्रकाशित एक लेख में संयुक्त राष्ट्र के हवाले से बताया गया है कि सिर्फ़ ग़ज़ा में तब से अब तक बमबारी में 72619 फ़िलिस्तीनियों की जान जा चुकी है - हर दिन 75 से ज़्यादा असामयिक मौतें। विडंबना यह है कि आज फ़िलिस्तीन की मूल भूमि पर जितने फ़िलिस्तीनी रह रहे हैं, संख्या में उससे ज़्यादा विदेशों में शरणार्थी बन कर रह रहे हैं।

वे अपनी मेधा और विद्वत्ता के दम पर एकेडेमिक्स, कला और साहित्य में खूब ऊँचाइयों पर पहुँचे लेकिन आज तक उन्हें, जहाँ वे रहते काम करते हैं, उनकी राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली। लेकिन उन्होंने अपनी फ़िलिस्तीनी पहचान का परित्याग नहीं किया। अनेक फ़िलिस्तीनी लेखकों-कवियों ने बार-बार हवाई अड्डों और सरहद पर इसे आधार बना कर रोके जाने के अपमानजनक अनुभव बयान किए हैं.... फ़िलिस्तीन के राष्ट्रकवि के तौर पर याद किए जाने वाले महमूद दरवेश इस बारे में अपने भाव सबसे ज्यादा तड़प और संताप के साथ व्यक्त करते हैं:
जैसा हर बार होता रहा है इस एयरपोर्ट पर भी आपको अवांछित व्यक्ति घोषित कर दिया जाता है -आपके हाथ में जो दस्तावेज़ हैं वे भूगोल के साथ नाम जोड़ कर देखने के तर्क पर खरे नहीं उतरते : जिस देश का अस्तित्व दुनिया से ख़त्म हो गया उस देश का नागरिक होने का दावा करने वाला भला कैसे मौजूद हो सकता है? आप गैर मौजूद देश के रूपक की बात करोगे तो उनका जवाब होगा : तो फिर जो देश गैर मौजूद है वह है ही नहीं।

आज के दौर में पूरी दुनिया में ग़ौर से सुने जाने वाले युवाल नोवा हरारी कहते हैं:
कहानी गढ़ना और कहना हमारा सुपर पावर है। पूरे ब्रह्मांड में मनुष्य ही ऐसी नायाब प्रजाति है जिसे ख़ुद को व्यक्त करने के लिए भाषा का प्रयोग करना आता है - वह चाहे किसी चीज़ को देखने, चखने और छूने से प्राप्त अनुभव हो या फिर जो सचमुच में उपस्थित नहीं है उन चीज़ों की कल्पना और आविष्कार करने की कला।

इतना ही नहीं हरारी तो ज़ोर देकर यह कहते हैं कि सेपियंस (मनुष्य के पूर्वज) पूरी दुनिया पर राज इसलिए कर सके क्योंकि उनमें कहानी कहने का हुनर था। उन्होंने ऐसी कहानियाँ कहीं जिससे व्यापक स्तर पर लोग एक दूसरे से जुड़े और साथ-साथ काम करने को प्रेरित हुए।

समाज के जीवन में कहानियों की क्या भूमिका होती है, इसके बारे में बात करते हुए प्रख्यात जर्मन सांस्कृतिक आलोचक वाल्टर बेंजामिन को स्मरण करना ज़रूरी है जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के बाद के अनुभवों पर आधारित अपने बेहद चर्चित लेख स्टोरीटेलर (1936) में कहानियों के बारे में कहा है कि वे सिर्फ़ सूचनाएँ नहीं होतीं बल्कि उनका आधार, पृष्ठभूमि और स्वरूप सामूहिक अनुभवों और ज्ञान के साझेपन और आदान-प्रदान का होना चाहिए। वे आगे कहानियों के अपने समय और स्थान में गहरे धँसे होने और पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होते जाने के बारे में भी बात करते हैं।

उनका यह बहुचर्चित लेख आगे कहता है कि कैसी विडंबना है कि मनुष्य सुनने-पढ़ने और अपने अनुभवों को एक-दूसरे के साथ साझा करने की नैसर्गिक इच्छा तो रखता है, लेकिन तकनीकी प्रगति और सत्ता तंत्र का ऐसा स्वरूप विकसित होता जा रहा है जिसमें वह अपनी आवाज़, अपने हाथ और यहाँ तक कि अपना जीवन भी गँवाता जा रहा है। दुनिया भर में हर ओर ऐसी घटनाएँ घटती दिखाई दे रही हैं कि अपना जीवन पूरा जी पाने से बड़ी संख्या में लोग वंचित किए जा रहे हैं। ऐसे में एक-दूसरे से अनुभव साझा करने के वास्ते लिखने और लिखे जाने की संभावना दिनों दिन क्षीण होती जा रही है।

7 अक्टूबर 2023 को ग़ज़ा में शुरू हुई इजराइली बमबारी में मारे गए कवि-चिंतक रफ़ात अल अरीर ने हाल के बरसों में युवा फ़िलिस्तीनियों को किसी दिन मार दिए जाने से पहले अपने अनुभव किसी न किसी विधा में दर्ज करने के लिए प्रेरित किया कविता, कहानी, संस्मरण, डायरी, फोटोग्राफ, वीडियो, सोशल मीडिया सब में। अपने जीवन की अनिश्चितता को जानते हुए उन्होंने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा भीः

यदि मुझे मरना पड़ता है
तो तुम्हें पक्के तौर पर जीना पड़ेगा
ताकि लोगों को बता सको मेरी कहानी
***
यदि मुझे मरना पड़ता है
तो इस से उम्मीद फूटनी चाहिए 
इसे कहानी की तरह लोगों को सुनाना।

दुनिया भर में बसे फ़िलिस्तीनियों ने अपने-अपने तरीक़ों से 1948 के विस्थापन की त्रासदी को याद करते हुए उस पश्चिमी विमर्श को अहिंसक ढंग से चुनौती दी है, जिसने उन्हें अनपढ़, गँवार, जाहिल, संस्कृतिविहीन और इतिहासविहीन ठहराने का प्रयास किया। तभी तो इतने बमवर्षक और बुलडोजर लगा कर भी फ़िलिस्तीनी गाँवों के जैतून के बाग़ों की तरह उनकी स्मृतियों को नष्ट नहीं किया जा सका। जितना ही उनका खून बहता है उतना ही वे रक्तबीज की तरह नए-नए रूप में उग आते हैं। नृतत्वशास्त्री मानते हैं कि तीन-चार पीढ़ियाँ बीत जाने के बाद भी उनके सपनों को नष्ट नहीं किया जा सका तो इसलिए कि फ़िलिस्तीनियों ने अपने संताप को क़िस्से-कहानियों की वर्चुअल प्रवहमान नदी का रूप दे दिया है। बाहरी आक्रमण कितने भी विध्वंसकारी हों अगली पीढ़ी को हस्तांतर होती हुई स्मृतियों में उनकी विरासत अक्षुण्ण बनी रही। उन्हें हर पल यह याद रहता है कि उन्हें उनके घरों से बलपूर्वक खदेड़ कर निकाला गया था, वे अपने छूटे हुए घरों और भूमि के असल मालिक हैं (अपने गले में उन घरों की चाभियाँ लटकाए रहना फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध का प्रतीक है) और एक दिन वे लौट कर अपनी धरती पर ज़रूर जाएँगे।

इस सिलसिले में प्रतिष्ठित फ़िलिस्तीनी आर्किटेक्ट और संरक्षण विशेषज्ञ खल्दून बशरा को उद्धृत करना प्रासंगिक होगाः

फ़िलिस्तीनी शरणार्थी अपने भीतर के गहरे ज़ख़्म याद रखने के लिए उन चाभियों को अपने गले में लटकाए रहते हैं जिनका प्रयोजन और इस्तेमाल बेमानी हो चुका है, उनसे व्यावहारिक तौर पर किसी तरह का कोई कार्य संपन्न नहीं किया जा सकता -अब ये चाभियाँ कहीं किसी घर का दरवाज़ा नहीं खोल सकतीं। सब कुछ जानते हुए ज़ाहिर तौर पर इस तरह की अनावश्यक शिल्पकृति को सीने से लगाए हुए रहने के मायने कुछ और हैं।

तभी तो महमूद दरवेश अपनी एक बेहद चर्चित कविता में कहते हैं:

हमलावरों को स्मृतियाँ भयभीत करती हैं
दरिदों को गीत डराते हैं
उसका नाम पहले भी फ़िलिस्तीन था
अब भी वह फ़िलिस्तीन है।

फ़िलिस्तीनी कविता से हमारा परिचय तो लंबे समय से रहा है लेकिन फ़िलिस्तीनी कहानियों के साथ दुर्भाग्य से वैसा रिश्ता हिंदी पाठकों का नहीं बन पाया क्योंकि हिंदी में वे उपलब्ध नहीं रहीं। हाल-फ़िलहाल में गस्सान कनफ़ानी की कहानियों के अनुवाद उपलब्ध हुए हैं लेकिन उनको हमारे बीच से गए हुए भी पचास साल से ज़्यादा हो गए। इस दरमियान फ़िलिस्तीन का भूगोल, समाज, संस्कृति, सब कुछ बहुत बदल गया - यह बदलाव स्वाभाविक नहीं था बल्कि सब कुछ बलपूर्वक बदल दिया गया... और साम, दाम, दंड, भेद हर तरह से कोशिश की गई कि फ़िलिस्तीन के नाम से जुड़ा हुआ ऐसा कुछ भी धरती पर न बचे जो उसके इतिहास, विरासत, संस्कृति इत्यादि का सबूत दे सके।

इन हालात में हमें यह ज़रूरी लगा कि अमानवीय अत्याचारों और पैशाचिक जनसंहार के बीच फ़िलिस्तीनियों के साथ भावनात्मक एकजुटता दिखाने का (भारत सरकार तो उनके विरुद्ध युद्ध अपराधों में खुले तौर पर शामिल है) एक रास्ता यह है कि इन विकट परिस्थितियों में उनके बीच बची हुई उम्मीद की लौ को सहारा दिया जाए.... चारों ओर से मौत से घिरे हुए बेहद सुसंस्कृत समाज की रचनाशीलता में कहानी का संधान किया जाए। समकालीनता के आग्रह के साथ तैयार इस संकलन की मार्फ़त हम फ़िलिस्तीनी समाज को थोड़ा आश्वस्त कर पाएँगे कि वे भुला दिए गए लोग नहीं हैं... हमें याद है कि यासिर अराफ़ात और इंदिरा गांधी के बीच भाई-बहन का प्यार और सम्मान था।

ख़ुद इतिहास के अँधेरे दौर को झेल चुके प्रसिद्ध जर्मन नाटककार कवि बर्टोल्ट ब्रेख्त ने सवाल जवाब शैली में बिल्कुल सही कहा है:

क्या अँधेरे में भी गीत गाए जाएँगे?
हाँ, अँधेरे में
अँधेरे के बारे में गीत गाए जाएँगे।

हमें विश्वास है कि जब अँधेरे की बात की जाएगी तो उजाले की कामना इसमें स्वतः शामिल हो जाएगी। 

 

 

  फ़िलिस्तीन की कहानियों के संकलन येरुशलम का पत्थर (वाम प्रकाशन, नई दिल्ली) से साभार 

 

Sunday, October 11, 2026

विश्व कविता श्रृंखला (एक) नाजिम हिकमत

 

 

 c

चित्र सौजन्य :  Hans-Joachim Koch - https://www.deutschefotothek.de/documents/obj/90080184, CC BY-SA 4.0, https://commons.wikimedia.org/w/index.php?curid=157663582

 

पहले अपने देश की आज़ादी के लिए कमाल अतातुर्क पाशा का सहयोग किया लेकिन बतौर कम्यूनिस्ट पाशा की जनविरोधी नीतियों का विरोध करने पर उन्हे बार-बार जेल की यातनाएं भुगतनी पड़ीं। 
प्रथम विश्व युद्ध के बाद  मास्को विश्व विद्यालय में पढ़ाई की।  रूसी कवि मायोकोव्स्की और लेनिन के विचारों से प्रेरित हुए। 

 ("विश्व कविता श्रृंखला " के अंतर्गत प्रस्तुत है तुर्की के प्रसिद्ध कवि नाज़िम हिक़मत (1902--1963) की कविताएं।

हमारे लिए इनका हिन्दी में अनुवाद  चन्द्रनाथ मिश्र ने किया है।)

 

 

 कैसी आजादी

 

तुम अपनी आंखों के उजाले

और अपने हाथों की मेहनत

को बर्बाद कर रहे होते हो,

जब दर्जन भर

लोगों की उस रोटी

के लिए आटा गुंधते हो,

जिसका एक भी निवाला

तुम्हें हासिल नहीं होना है.

 

तुम आज़ाद हो

अपने आप को

गुलाम बनाने के लिए.

तुम आज़ाद हो

अमीरों को

और अमीर बनाने के लिए.

पैदा होने के साथ ही

खड़े कर दिए जाते हैं

तुम्हारे चारों ओर

ऐसे कारखाने,

जो गढ़ते  हैं झूठ और झूठ,

इतना झूठ

जो तुम्हारे पूरे जीवन के लिए

पर्याप्त  होता है.

 

तुम अपनी महान आजादी

के आगोश में

अपनी कनपटी पर

उंगली रख कर सोंचो,

क्या तुम्हारी अंतरात्मा भी उतनी ही आज़ाद हैं.

 

तुम्हारा सर झुका होता है

जैसे उसे गर्दन के नीचे से

आधा काट दिया गया हो.

तुम्हारे हाथ लंबे होकर

झूल रहे होते हैँ

और तुम बेरोजगार होने कि आजादी के साथ मस्ती में

लम्बे लम्बे डग

भर रहे होते हो,

 

तुम अपने देश से

प्यार करते हो,

अपनी सबसे नजदीकी

और कीमती  चीज की तरह.

लेकिन एक दिन,

(उदाहरण के लिए),

तुम्हें पता चलता है

कि उसको

अमेरिका को बेच दिया गया.

और साथ ही तुम्हें भी,

तुम्हारी महान आज़ादी के साथ.

फिर तुम बस

एक 'एयर बेस' भर बने रहने की आज़ादी

के हकदार रह जाते हो.

 

तुम ऐसी घोषणा कर सकते हो

कि इंसान को एक औजार,

एक संख्या, एक लिंक

की तरह नहीं

बल्कि एक मनुष्य की तरह

जीने देना चाहिए.

लेकिन इसके तुरंत बाद

तुम्हारे हाथों में हथकड़ियां होगी.

इसके बाद

तुम गिरफ्तार होने,

जेल जाने,

यहां तक की फांसी पर

लटकने के लिए भी आजाद होगे.

 

तुम्हारी जिंदगी के समक्ष

कोई लोहे, लकड़ी

या लिली के फूलों का

पर्दा नहीं है.

तुम्हारे सामने अलग से

आजादी को चुनने का

प्रश्न या जरूरत नहीं.

बल्कि तुम वास्तव में

नैसर्गिक रूप से आजाद हो.

लेकिन ऐसी आजादी अभी

सितारों के नीचे

एक उदास सपने की तरह है. 

    ( Taner Baybars के अंग्रेजी अनुवाद 'A sad state of freedom'   से प्रेरित.)

 

  

 जिंदगी 

 

 जिंदगी जीना कोई मजाक नहीं है 
 तुम्हें जिंदगी बहुत गंभीरता से जीनी चाहिए
 एक गिलहरी की तरह,
 मेरा मतलब है, 
ऊपर नीचे क्या है,
 इसे बिना सोचे,
 मेरा मतलब है जिंदगी जीना तुम्हारा 
 संपूर्ण व्यवसाय होना चाहिए.

 जिंदगी जीना कोई मजाक नहीं है
 तुम्हें जिंदगी बहुत गंभीरता से जीनी चाहिए
 इतनी गंभीरता से और इस हद तक
 जैसे तुम्हारे हाथ पीछे बंधे हो 
और तुम्हारी पीठ दीवार से लगी हो,
--
 या किसी प्रयोगशाला मे,
 सफ़ेद कोट  और सुरक्षित ऐनक पहने ,
 तुम लोगों के लिए अपनी जान दे सको, 
उन लोगों के लिए 
 जिनके चेहरे तुमने कभी देखे भी ना हो,
 बावजूद इसके तुम जानो 
 की जिंदगी सबसे वास्तविक और खूबसूरत चीज है.

 मेरा मतलब है तुम्हें जिंदगी इतनी गंभीरता से जीनी चाहिए,
 जैसे उदाहरण के लिए, 
सत्तर साल की उम्र में भी 
 जैतून का पौधा लगाओ-
 अपने बच्चों के लिए नहीं,
 बल्कि इसलिए कि हालांकि तुम मौत से डरते हो 
फिर भी तुम्हारा इसमें विश्वास नहीं, 
 क्योंकि जिंदगी  का वजन, मेरा मानना है ,
 इस ख्याल से कहीं भारी है.

 (   Randy Blasing और Mutlu Konuk के अंग्रेजी अनुवाद On Living से प्रेरित)

 

 

Friday, April 17, 2026

परिवार को बीच से काटने वाली दीवार - गादा कारमी



डा. गादा कारमी

 

(1939 में फिलिस्तीन में जन्मीं डॉक्टर, शोधकर्ता और लेखक गादा कारमी ने दुनिया के बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशनों में फिलिस्तीन का पक्ष रखने के लिए प्रचुर लेखन किया है। फिलिस्तीन पर उन्होंने आधा दर्जन संस्मरणात्मक किताबें लिखी हैं। उनके एक संमरण का अंश   यादवेन्द्र ने विशेष रूप से ‘लिखो यहां वहां’ के  लिये प्रस्तुत किया है. यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं  )


दीवार कम से कम 8 मीटर या 26 फीट ऊँची थी और मुझे यह देखकर अचरज हो रहा था कि सलेटी रंग के कंक्रीट के स्लैब्स से बनी हुई दीवार को कोई पार कैसे करता होगा। यह बिल्कुल असंभव है। जहाँ तक निगाह जाती दूर तक फैली हुई इस दीवार पर जगह-जगह कुछ नारे लिखे हुए थे या फिलिस्तीनियों के समर्थन में कुछ रेखाचित्र बनाए हुए थे। ये चित्र इतने सजीव और यथार्थपूर्ण थे कि मैं आश्चर्य में पड़ गई। ऐसे चित्र मुझे कलंदिया चेक पॉइंट पर भी देख कर महसूस हुआ कि उनके पीछे कितनी यथार्थवादी सोच और कलात्मकता है। मुझे याद आया कि एक चित्र किसी गोल छिद्र सरीखा था जिसे देखकर दीवार को बेधते हुए वास्तविक छिद्र बने होने की अनुभूति होती थी - जिसके पीछे नीला आसमान और हरे-भरे खेत दिखाई दे रहे थे। किसी के लिए भी इसे देखकर वास्तविक मान लेना एकदम स्वाभाविक था।

मैं दीवार से हटकर खड़ी हो गई और अपनी हथेलियों से उसे छूकर, दबा कर देखा, कंक्रीट एकदम ठंडा था और अपनी हथेलियों के फिसलने से एहसास हुआ कि इसकी ऊपरी सतह ख़ासी समतल और चिकनी है। दीवार का शिखर इतना ऊँचा था कि वहाँ तक देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन पीछे ले जाकर नीचे झुकानी पड़ी। देख कर साफ़ लगता था कि बेहद मज़बूत और गहरी नींव वाली अडिग दीवार है। तभी मुझे लगा कोई मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया है।

‘इस दीवार के उस पार मेरे पति रहते हैं।’ वह लंबी छरहरी शरीर वाली फिलिस्तीनी स्त्री नायला थी। मैंने उसे पहली बार देखा था। 

‘मैं दीवार के इस पार और वे दीवार के उस पार इस वजह से रहते हैं क्योंकि उन्होंने हमें एक साथ रहने की इजाज़त नहीं दी।’ उसने मुझे बताया। मेरे साथ जो स्थानीय लोग थे, हो सकता है उनको पहले से इस बारे में मालूम हो लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल नई और हैरत में डालने वाली बात थी।

अबू दिस में उनका अपना घर था, लेकिन जब यह दीवार बनाई गई तो वह घर इजराइल की तरफ़ चला गया। ऐसा होने पर उन दोनों के पास अलग-अलग रहने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह स्त्री अन्य अरब नागरिकों की तरह पूर्वी यरुशलम की नीला पहचान पत्र धारी 'नागरिक' मानी गई। लेकिन उसके पति को वेस्ट बैंक की नागरिकता वाला नारंगी पहचान पत्र दिया गया - इसका प्रशासनिक मतलब यह हुआ कि वह इजराइल की भूमि पर (जहाँ उसकी पत्नी रहती है) क़दम नहीं रख सकता और यदि उधर जाना ही है तो उसे हर बार स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देना होगा और इजाज़त मिली तो निर्धारित अवधि के लिए जाना संभव होगा। जब भी उसे अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की इच्छा होती है, वह स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देता है और इजाज़त मिलने पर दिन भर के लिए दीवार के उस पार जाता है, पर अँधेरा होते-होते वापसी की शर्त के साथ। उसकी यह कथित आज़ादी भी मनमर्जी नहीं, इजराइली शासन जब चाहता है यह सुविधा छीन लेता है।

मैंने यह कहानी जानकर अफ़सोस जाहिर किया और पूछा कि तुम यहाँ से जाकर अपने पति के साथ क्यों नहीं रहतीं?

‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? यदि मैं यहाँ से चली भी गई तो वे मेरा यरुशलम का नीला पहचान पत्र ज़ब्त कर लेंगे और मैं कभी इधर चाहने पर भी आ नहीं पाऊँगी।’

उसने आगे बताया कि यह पहचान पत्र न रहने पर वह ज़रूरत पड़ने पर न तो इजराइल के किसी हवाई अड्डे तक पहुँच सकती है न अपने बच्चों को यरुशलम के स्कूलों में पढ़ा सकती है, न ही वहाँ के किसी अस्पताल में इलाज के लिए जा सकती है। वेस्ट बैंक और ग़ज़ा के फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ यही तो बंदिश है कि उन्हें चारों ओर से घेर कर इस तरह क़ैद कर दिया गया है कि वे किसी काम के लिए बाहर नहीं निकल सकते, चाहे संकट में उनकी जान ही क्यों न निकल जाए।

ऐसी विकट प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पति-पत्नी अपना जीवनयापन किसी तरह से कर रहे हैं हालाँकि यह कहना मुश्किल है कि उनके आपसी संबंधों पर इसका कितना असर हुआ है।

मेरी असहजता देखकर नायला ने कहा, ‘जो है सो ठीक है। ऐसा नहीं है कि इस दीवार के कारण सिर्फ़ हमारी जिंदगी बिखर गई है। यक़ीन मानो, हमारी तरह बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अलग-अलग रहने को अभिशप्त हैं। अलग रहना बार-बार आने वाली दूसरी भयानक मुसीबतों के आगे बहुत छोटी बात लगने लगती है। लेकिन हम पहले की मुश्किलों की तरह इसको भी निभा लेंगे।’


(‘रिटर्न: ए पैलेस्टीनियन मेमॉयर’ से साभार)

 

प्रस्तुति : यादवेन्द्र 

Monday, April 6, 2026

बोर्खेस और मैं : अनुवाद - योगेन्द्र आहूजा



 

 

इस रचना (दार्शनिक गद्य) में बोर्खेस अपने दो रूपों—एक “सार्वजनिक लेखक बोर्गेस” और दूसरा “निजी ‘मैं’”—के बीच के संबंध और तनाव पर विचार करते हैं। इसमें कोई कथानक या घटनाक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, एक लेखक के ‘स्व’ और सार्वजनिक पहचान पर, उनके आपसी रिश्ते पर दार्शनिक विमर्श है।-  योगेन्द्र आहूजा 

 

 बोर्खेस और मैं

(बोर्खेस)

वह जो ‘दूसरा’ है, बोर्खेस, वह है जिसके साथ चीज़ें घटती हैं। मैं ब्यूनस आयर्स की गलियों में यूँ ही भटकता रहता हूँ; आजकल कभी-कभी बेख़याली में ठहरकर किसी दरवाज़े की मेहराब और उसके लोहे के फाटक को देख लेता हूँ। बोर्खेस के बारे में मुझे ख़तों में ख़बर मिलती है; उसका नाम प्रोफ़ेसरों की सूची में दिखता है, और बायोग्राफिकल गजट्स में भी। मुझे रेत-घड़ियाँ पसंद हैं, नक़्शे, अठारहवीं सदी के फ़ॉन्ट, कॉफ़ी का ज़ायका, और स्टीवेंसन की गद्य-शैली। दूसरे को भी यही सब भाता है, मगर उसकी ख़ुदपरस्ती इन्हें एक तरह की नाटकीय सजावट बना देती है। यह कहना कि हमारा रिश्ता दुश्मनी का है, कुछ ज़्यादा हो जाएगा। मैं जीता हूँ, ज़िंदा रहता हूँ, ताकि बोर्खेस अपना साहित्य रच सके — और वही साहित्य मेरे होने का औचित्य भी है। मैं आसानी से मान लेता हूँ कि उसकी कुछ पंक्तियाँ सार्थक हैं, लेकिन वे पंक्तियाँ मेरी मुक्ति नहीं हैं। शायद इसलिए कि अच्छा लेखन किसी एक व्यक्ति का नहीं होता — उस दूसरे का भी नहीं — बल्कि भाषा और परंपरा का होता है। बाक़ी जो कुछ है, मेरी तक़दीर में तो पूरी तरह गुम हो जाना लिखा है; मुमकिन है मेरा बस एक छोटा-सा हिस्सा उस दूसरे में ज़िंदा रह जाए। मैं धीरे-धीरे सब कुछ उसके हवाले करता जा रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि उसमें चीज़ों को विकृत करने और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की एक खराब आदत है। स्पिनोजा जानता था कि हर वस्तु अपने वजूद का स्थायित्व चाहती है — पत्थर पत्थर बने रहना चाहता है और बाघ बाघ, सदा के लिए। मुझे बोर्खेस में बने रहना है, ख़ुद अपने भीतर नहीं (अगर सचमुच मेरा कोई “मैं” है भी), फिर भी मैं अपने आपको उसकी किताबों में उतना नहीं पहचानता जितना कई अन्य किताबों में, या फिर गिटार की गहरी झंकार में। कुछ बरस पहले मैंने उससे बच निकलने की कोशिश की थी — उपनगरों की कथाओं से निकलकर काल और अनंत के खेलों में जा पहुँचा था। मगर अब वे खेल भी बोर्खेस के हो चुके हैं — मुझे कुछ और सोचना होगा। इस तरह मेरा जीवन एक पलायन है। मैं सब कुछ खो दूँगा, और सब कुछ या तो विस्मृति में चला जाएगा, या उस दूसरे के पास।

मुझे नहीं मालूम कि हम दोनों में से किसने यह लिखा है।

Friday, February 27, 2026

मार्खेज़ और जॉनी बेल्च की कविता : कठपुतली

 

 


जॉनी बेल्च


 

 

1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण अमेरिकी कथाकार गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज को लंबी बीमारी के बाद 1999 में डॉक्टरों ने कैंसर से पीड़ित घोषित कर दिया था और 'जादुई यथार्थवाद' के इस अद्भुत चितेरे के स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया में फैले प्रशंसकों में चिंता उभरने लगी। अचानक एक दिन- 29 मई, 2000 को पेरू के लोकप्रिय दैनिक 'लॉ रिपब्लिक' में एक कविता छपी जिसका शीर्षक था 'कठपुतली (द पपेट)' और इसके रचयिता के तौर पर मार्खेज का नाम छपा। देखते ही देखते, पूरे दक्षिण अमेरिकी समाज में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई- बहुत सारे अखबारों ने इसे उद्धृत किया, रेडियो और टेलीविजन पर इसका पाठ किया गया और यह कहा गया कि जीवन की आखिरी बेला में मार्खेज ने इस कविता के माध्यम से अपने मित्रों और प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।  जब इस बाबत मार्खेज से पूछा गया तो मुस्करा भर दिए, पर धीरे-धीरे यह राज खुल ही गया कि मार्खेज ने ऐसी कोई कविता नहीं लिखी। बाद में यह खबर भी सामने आई कि मैक्सिको में स्टेज पर मूकाभिनय करने वाले जॉनी बेल्च ने अपने एक कठपुतली शो के लिए यह कविता लिखी थी जो छपी तो पर इसमें रचयिता के तौर पर किसी गलती से मार्खेज का नाम छप गया। अपने एक इंटरव्यू में वेल्च ने कहा कि वे कोई बड़े कवि नहीं हैं, पर दुनियाभर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी एक रचना को लिखने का श्रेय उन्हें नहीं मिला इसका उन्हें गहरा दुख है। आज इस कविता को दुनिया के बड़े 'होक्स' के रूप में यहां-वहां उद्धृत किया जाता है।- यादवेन्द्र




 
 जॉनी बेल्च की कविता 

कठपुतली

(अनुवाद: यादवेन्द्र)  

यदि पलभर को ईश्वर भूल जाए कि 
मैं रद्दी और कबाड़ से बना एक गुड्डा हूं 
और जीवन का एक कतरा और मुझे बख्श दे 
तो बहुत संभव है 
मैं वे सब बातें न कह पाऊंगा
जो सोचता रहा हूं 
पर इतना तय है कि 
उन तमाम बातों को सोचूंगा जरूर 
जो मुझे कहनी हैं।

मैं सभी चीजों को खूब सम्मान दूंगा 
पर उनकी चमक-दमक देखकर नहीं 
बल्कि इसलिए कि 
उनके मायने जीवन में क्या हैं।

अब से सोऊंगा कम
और स्वप्न ज्यादा देखूंगा 
मैं जानता हूं कि जब हम 
एक मिनट के लिए अपनी आंखें मूंदते हैं
तो रोशनी साठ सैकंड तक 
हमसे दूर चली जाती है।

लोगबाग चाहें तो यूं ही 
सड़कों की लंबाई मापते रहें 
मैं तो खूब सोच-समझकर 
एक-एक कदम आगे बढ़ाऊंगा।
दूसरे लोग चाहे सोते रहें, 
मुझे जागते रहना है 
खूब गौर से वह सब सुनते रहना है
जो दूसरे बोलेंगे 
और यह सीखने की कोशिश भी करूंगा कि अच्छी चॉकलेट आइसक्रीम खाते हुए इसका भरपूर आनंद कैसे लिया जाए।

यदि ईश्वर जीवन का 
एक कतरा और मुझे बख्श दे तो
मैं सादगी भरे मामूली लिबास पहन लूंगा और सूरज के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाऊंगा 
जाहिर है मेरे शरीर को तो धूप मिलेगी ही अंदर तक आत्मा भी प्रकाशमान हो जाएगी।

हे ईश्वर, यदि मेरे हदय की धड़कन शेष है
 तो मैं अपनी तमाम घृणा उतारकर 
बरफ की सिल्लियों पर रख दूंगा 
और सूरज के चमकने का इंतजार करूंगा वॉनगाग का स्वांग धारण करूंगा
और 
फिर सितारों के बदन पर 
बेनेदेत्ती की कविता चित्रित कर दूंगा 
और तोहफे में चंद्रमा को
मेरेट का एक गीत प्रस्तुत करूंगा।

गुलाब की क्यारियां 
मैं अपने आंसुओं से सींचूंगा 
जिससे उनके कांटों की चुभन और
पंखुड़ियों के दैवी चुंबन महसूस कर सकूं...
यदि ईश्वर जीवन का एक कतरा और 
 मुझे बख्श दे।

मैं ऐसा एक दिन भी नहीं गंवाऊंगा जब सचमुच जिन सबसे प्रेम करता हूं
 उनसे यह न कह पाऊ 
कि में उन्हें कितना प्रेम करता हूं।

मैं हर किसी को यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि 
वे मेरे सबसे अजीज़ हैं 
दरअसल ऐसे में प्रेम के साथ 
मैं खूब प्रेम से रहूंगा।

मैं लोगों को साबित करके दिखाऊंगा कि उन्हें इस बात की गलतफहमी है 
कि बुढ़ापे में प्रेम के सागर में नहीं डूबा जा सकता 
उन्हें इल्म ही नहीं कि 
प्रेम के जीवन से तिरोहित होते ही 
बुढ़ापा अपने भारी पांव पसारने लगता है।

मैं' बच्चों के हाथ उड़ने वाले 
खूबसूरत तोहफे पकड़ा तो दूंगा 
पर कहूंगा कि अपने आप उड़ान भरना सीखो।

और बूढ़े हो चुके लोगों को बताऊंगा 
कि बुढ़ापे की वजह से नहीं 
बल्कि स्मृतियों के लोप से आती है मृत्यु।

साथियों, मैंने आपके साथ क्या कुछ नहीं सीखा
मैंने सीखा कि जिसे देखो वह 
पहाड़ के शिखर पर चढ़कर टिक जाना चाहता है 
पर यह सच्चाई उससे छूट जाती है कि वास्तविक आनंद पहाड़ के शिखर 
में नहीं 
पहाड़ पर चढ़ने के 
हमारे ढंग में निहित होता है।

मैंने यहीं सीखा कि जब एक नवजात शिशु अपने नन्हें हाथ में पिता की अंगुलियां भींचता है 
तो यह स्पर्श जीवन भर के लिए 
वहीं ठहर जाता है।

मैंने यह भी सीखा कि किसी को 
दूसरे आदमी को ओर आंखें उठाकर देखने का हक तभी मिलता है 
जब उसके हाथ साथी को सहारा देकर खड़े करने के लिए आगे बढ़े हुए हों।

मैंने लोगों से बहुत सारी बातें सीखीं समझीं पर अब जब जीवन के अंतिम छोर तक आ पहुंचा हूं
तो इनमें से अधिकांश चातों के अर्थ खो जाएंगे 
अब तो बस मुझे ताबूत में बंद किया जाना शेष है
जहां मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। 

 

(प्रस्तुति: यादवेन्द्र) 

Saturday, July 23, 2022

क्रूर सलाहों के विरुद्ध

जीवन तकलीफों की खान है। तकनीक के विकास की जितनी भी कोशिशें हैं, तकलीफदेय स्थितियों को कम करते जाने और जीवन परिस्थितियों को सहज बनाने की अवधारणा उसके मूल में निहित दिखाई देती है। नैतिकता और आदर्श की स्थापनाओं के ख्यालों से भरा सारा मानवीय उपक्रम ही नहीं, बल्कि छल-छद्म को रचने वाले विध्वंसक कार्यरूप भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष में जीवन को सहज बनाने की अवधारणा से प्रे‍रित होकर ही किये जाते रहे हैं। यही मानवीय लीला है। मनुष्य और अन्य जीवों के बीच यही फर्क, चेतना के रूप में दिखायी देता है। इस फर्क ने ही मनुष्यं को खुद की गतिविधियों की आलोचना करने का भी सऊर दिया है। इसी से समझना आसान होता है कि जीवन को खुशहाल बनाने की बजाय उदास करने वाले उपक्रमों से असहमति एवं विरोध ही कला और साहित्य के कार्यभार हैं। यदि कोई रचना इस तरह के उददेश्य से निरपेक्ष है तो कला की कसौटी पर उसे रचना मानने से परहेज किया जाना चाहिए। रचना की शर्त ही है कि बेहतर जीवन स्थितियों के लिए बेचैनी का विचार वहां होना चाहिए। कान्ता घिल्डियाल की कविताओं में प्रकृति की जो छटाएं हैं, देख सकते हैं कि वे सिर्फ सौन्दीर्य की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि मनुष्य जीवन की बेहतरी के लिए उस सौन्दर्य की भूमिका का आंकलन और उसकी अवश्यम्भाविता की पहचान वहां स्‍पष्‍ट है। उसको बचाने की बेचैनी है- '' मैं खोना नहीं चाहती,/ मन ही मन बतियाना पक्षियों से/ निहारना भिन्न्ता को''।



हाल ही में कान्ता घिल्डियाल ने हिमांशु जोशी के उपन्यास 'कगार की आग' का गढवाली अनुवाद किया है जो 'बीस बीसि' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व कान्ता घिल्डियाल दो अन्य पुस्तकों 'शहीद अब्दुल हमीद' अर 'मटकू बोलता है' का भी गढ़वाली भाषा में अनुवाद कर चुकी हैं। ये दोनों ही अनुवाद राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) से प्रकाशित हैं। अनुवाद के ये काम कान्ता घिल्डियाल के उस व्याक्तित्वत से परिचित होने का अवसर देते हैं जिसमें एक व्यक्ति के लेखन की ओर उन्मुख होने के कारणों को तलाशा जा सकता है। अपनी धरती, अपनी भाषा और उस भाषा की समृद्धि का ख्याल, कान्ता घिल्डियाल के व्‍यक्तित्‍व की विशेषता बन रहा है। उनके व्याक्तित्व के इस पहलू को जानकर भी उनकी रचनाओं के पाठ तक पहुंचने के रास्ते पर चला जा सकता है।उनकी हिंदी कविताओं का संग्रह 'मुट्ठी भर रंग' शीर्षक से प्रकाशित है। 

प्रस्तुत हैं देहरादून में रहने वाली कान्ताा घिल्डियाल की कुछ नयी कविताएं।


विगौ

कान्ता घिल्डियाल


मेरा वसंत

 

अलसुबह रोज़ र्बोगेनवेलिया पर

आने लगी हैं

घिंडुड़ी, सिंटुली, बुलबुल, तोते, कौऔं

और नन्‍हीं चिड़ियां

 

सूरज की आमद से पहले

शुरू हो जाता है एक सुरीला ऑर्केस्ट्रा

अफसोस कि पड़ोस में है कसमसाहट

नींद में पड़ रहा खलल  

नहीं जानते वे

गाँव और शहर के बीच पुल बन रही बेल

मन-प्राणों पर छा सकती है

सुगंध की तरह,

 

अक़्सर मिलती हैं

बोनसाई बनाने की क्रूर सलाहें

 

मैं खोना नहीं चाहती,

मन ही मन बतियाना पक्षियों से

निहारना भिन्‍नता को

 

वैसे कभी-कभी तो मुझे भी हो ही जाती है शिकायत

बढ़ जाता है बोझ एक अतिरिक्त काम का

हवा से गलबहियां करती शाखें

जब झरती हैं फूल, पत्तियां

 

पर सच कहूं

बोगेनवेलिया के बेल

मेरा वसंत है

तकिया है ,नींद और सपने है

और हर सुबह की 

सुनहरी शुरुआत है।

 

 

मेरा हौंसला हो तुम

 

 

चिड़ियों !

क्या तुम्हें

धूल-धूसरित आसमान में उड़ते हुए

किसी बहेलिए का डर नहीं सताता ?

 

पुष्पकलिकाओं !

क्या तुम्हें खिलखिलाकर हँसते हुए

मसले जाने का ख़ौफ़ नहीं होता ?

 

गर्भ में पल रही,

जन्म लेने को आतुर बच्चियों !

क्या तुम नहीं जानती हो

बड़ी-बड़ी टोही आँखे

हाथों में हथियार लिए

कत्ल करने को तैयार हैं ?

 

नृशंस हत्याओं के धुंध इरादे

खून की लकीरें खींच रहे लगातार

मुझे तो हर पल डराता है

तुम सब मेरा हौंसला हो पर

तुम्‍हें बेखौफ बने रहना है इसी तरह।   

 

 

ए‍क जरूरी भाव

 

 

अपमान की अग्नि

नज़र नही आती

पर बढ़ तो जाता ही है

शरीर का ताप

अंतस की

भीतरी तहों को भेदकर

डस जाती है

सर्पजिभ्या

आत्मा का कोई भी हिस्सा

नहीं रहता घाव विहीन....

 

  

गुलाबी गाँव

 

एक

चैत के महीने भीटों पर

खिली फ्योंली को देख

भले ही पियरी पहने चहक उठता हो गांव

पर गुलाबी नहीं होता

 

रोटी की तलाश में जा चुके बेटों के

कभी-कभार लौटने से भले ही

हरी हो जाती हो गांव की रंगत

पर गांव ग़ुलाबी नहीं होता

 

खेतों को बिलाकर बनी सड़क पर

धूल उड़ाती गाड़ी से उतरती

नई-नवेली दुल्हन को देख

बेशक सतरंगी हो जाता है गाँव

पर गुलाबी नहीं होता

 

गुलाबी हो उठता है गाँव

जब उसे वर्षों बाद दूर धार में दिखती है

अपने पास आती हुई कोई ब्याही बेटी ,

अचानक हो जाते हैं हरे

उससे गलबहियां करने को आतुर

खेतों के किनारे खड़े

भीमल खड़ीक के पुराने पेड़,

चूडियों भरी हथेलियों को चूमकर

स्वागत गीत गाने को आतुर होता है

खुदेड स्वरों में बहता मंगरों का मीठा पानी ,

बरसों बाद उसकी छुअन महसूस कर

उसके पदचिन्हों को चूमती हैं

बचपन के खेलों की गवाह टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ ,

खारे नमकीन पानी से भीग जाती हैं

तिबारी के छज्जे में

माथे पर झुर्रियों भरे हाथ टिकाए

बाट जोहती बूढ़ी आँखें ,

सूनी गलियां सुहागन बन पूछती हैं

कुटुंब-परिवार की कुशल-क्षेम ,

जंक लगे तालों संग

आँखों के कोरों को पोंछती हैं

सीलन और उदासी से नम हो चुकी

खाली खूंटों की पहरेदारी करती

गोबर मिट्टी से लिपी दीवारें ,

सुहाग की सलामती के साथ

दूधो नहाओ पूतो फलो के

आशीषों से नवाजते हैं

वीरान पड़े देवी-देवताओं के मंडुले ,

संबंधों में गरमाहट का गवाह

गांव के बीचोबीच खड़ा पीपल

अंग्वाळ बटोरकर पूछता है हाल

लाडो ! 

गाँव तो बेटियों के होते हैं

जब तक बेटियाँ न बिसराएँगी इसे

तब तक गुलाबी ही रहेंगे गाँव।

 

दो

गाँव से शहर ब्याही गयी

बेटियों के सपनों में रोज़ आते हैं

छूट चुकी नदी , पहाड़

और सीढ़ीनुमा खेत

 

नदी की गोद में गिरता झक्क सफ़ेद झरना

सुरों में बहने लगता है

कानों में संगीत घोलती है

गाँव को जाती सड़क

चीड़ , देवदार , काफ़ल और बुरांस

शहर की उमस भरी गर्मी को सोख लेना चाहते हैं

देह और आत्मा में ठंडक घोलता है

धारे-मंगरों का ठंडा-मीठा पानी

उदास मुख पर

उजास बिखेरता है

गाँव की सुबह का बाल सूरज

 

तीन

सूरज की किरणों से 

बिखरता है सोना पहाड़ पर

हवा संग गलबहियां कर

गीत गाते हैं पत्ते

उड़ती चिडियाँ

छज्जे पर आकर

घर के साथ जोड़ती है

पहला संवाद।

पहाड़ के हँसने , रोने , गाने

और नाराज़ होने की

पहली राज़दार होती हैं नदियाँ..