Showing posts with label अनुवाद. Show all posts
Showing posts with label अनुवाद. Show all posts

Friday, April 17, 2026

परिवार को बीच से काटने वाली दीवार - गादा कारमी



डा. गादा कारमी

 

(1939 में फिलिस्तीन में जन्मीं डॉक्टर, शोधकर्ता और लेखक गादा कारमी ने दुनिया के बड़े और प्रतिष्ठित प्रकाशनों में फिलिस्तीन का पक्ष रखने के लिए प्रचुर लेखन किया है। फिलिस्तीन पर उन्होंने आधा दर्जन संस्मरणात्मक किताबें लिखी हैं। उनके एक संमरण का अंश   यादवेन्द्र ने विशेष रूप से ‘लिखो यहां वहां’ के  लिये प्रस्तुत किया है. यादवेन्द्र जी के प्रति आभार व्यक्त करते हुए हम इसे प्रकाशित कर रहे हैं  )


दीवार कम से कम 8 मीटर या 26 फीट ऊँची थी और मुझे यह देखकर अचरज हो रहा था कि सलेटी रंग के कंक्रीट के स्लैब्स से बनी हुई दीवार को कोई पार कैसे करता होगा। यह बिल्कुल असंभव है। जहाँ तक निगाह जाती दूर तक फैली हुई इस दीवार पर जगह-जगह कुछ नारे लिखे हुए थे या फिलिस्तीनियों के समर्थन में कुछ रेखाचित्र बनाए हुए थे। ये चित्र इतने सजीव और यथार्थपूर्ण थे कि मैं आश्चर्य में पड़ गई। ऐसे चित्र मुझे कलंदिया चेक पॉइंट पर भी देख कर महसूस हुआ कि उनके पीछे कितनी यथार्थवादी सोच और कलात्मकता है। मुझे याद आया कि एक चित्र किसी गोल छिद्र सरीखा था जिसे देखकर दीवार को बेधते हुए वास्तविक छिद्र बने होने की अनुभूति होती थी - जिसके पीछे नीला आसमान और हरे-भरे खेत दिखाई दे रहे थे। किसी के लिए भी इसे देखकर वास्तविक मान लेना एकदम स्वाभाविक था।

मैं दीवार से हटकर खड़ी हो गई और अपनी हथेलियों से उसे छूकर, दबा कर देखा, कंक्रीट एकदम ठंडा था और अपनी हथेलियों के फिसलने से एहसास हुआ कि इसकी ऊपरी सतह ख़ासी समतल और चिकनी है। दीवार का शिखर इतना ऊँचा था कि वहाँ तक देखने के लिए मुझे अपनी गर्दन पीछे ले जाकर नीचे झुकानी पड़ी। देख कर साफ़ लगता था कि बेहद मज़बूत और गहरी नींव वाली अडिग दीवार है। तभी मुझे लगा कोई मेरे बगल में आकर खड़ा हो गया है।

‘इस दीवार के उस पार मेरे पति रहते हैं।’ वह लंबी छरहरी शरीर वाली फिलिस्तीनी स्त्री नायला थी। मैंने उसे पहली बार देखा था। 

‘मैं दीवार के इस पार और वे दीवार के उस पार इस वजह से रहते हैं क्योंकि उन्होंने हमें एक साथ रहने की इजाज़त नहीं दी।’ उसने मुझे बताया। मेरे साथ जो स्थानीय लोग थे, हो सकता है उनको पहले से इस बारे में मालूम हो लेकिन मेरे लिए यह बिल्कुल नई और हैरत में डालने वाली बात थी।

अबू दिस में उनका अपना घर था, लेकिन जब यह दीवार बनाई गई तो वह घर इजराइल की तरफ़ चला गया। ऐसा होने पर उन दोनों के पास अलग-अलग रहने से बचने का कोई रास्ता नहीं था। वह स्त्री अन्य अरब नागरिकों की तरह पूर्वी यरुशलम की नीला पहचान पत्र धारी 'नागरिक' मानी गई। लेकिन उसके पति को वेस्ट बैंक की नागरिकता वाला नारंगी पहचान पत्र दिया गया - इसका प्रशासनिक मतलब यह हुआ कि वह इजराइल की भूमि पर (जहाँ उसकी पत्नी रहती है) क़दम नहीं रख सकता और यदि उधर जाना ही है तो उसे हर बार स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देना होगा और इजाज़त मिली तो निर्धारित अवधि के लिए जाना संभव होगा। जब भी उसे अपनी पत्नी और बच्चों से मिलने की इच्छा होती है, वह स्पेशल परमिट के लिए आवेदन देता है और इजाज़त मिलने पर दिन भर के लिए दीवार के उस पार जाता है, पर अँधेरा होते-होते वापसी की शर्त के साथ। उसकी यह कथित आज़ादी भी मनमर्जी नहीं, इजराइली शासन जब चाहता है यह सुविधा छीन लेता है।

मैंने यह कहानी जानकर अफ़सोस जाहिर किया और पूछा कि तुम यहाँ से जाकर अपने पति के साथ क्यों नहीं रहतीं?

‘मैं ऐसा कैसे कर सकती हूँ? यदि मैं यहाँ से चली भी गई तो वे मेरा यरुशलम का नीला पहचान पत्र ज़ब्त कर लेंगे और मैं कभी इधर चाहने पर भी आ नहीं पाऊँगी।’

उसने आगे बताया कि यह पहचान पत्र न रहने पर वह ज़रूरत पड़ने पर न तो इजराइल के किसी हवाई अड्डे तक पहुँच सकती है न अपने बच्चों को यरुशलम के स्कूलों में पढ़ा सकती है, न ही वहाँ के किसी अस्पताल में इलाज के लिए जा सकती है। वेस्ट बैंक और ग़ज़ा के फिलिस्तीनी नागरिकों के साथ यही तो बंदिश है कि उन्हें चारों ओर से घेर कर इस तरह क़ैद कर दिया गया है कि वे किसी काम के लिए बाहर नहीं निकल सकते, चाहे संकट में उनकी जान ही क्यों न निकल जाए।

ऐसी विकट प्रतिकूल परिस्थितियों में भी पति-पत्नी अपना जीवनयापन किसी तरह से कर रहे हैं हालाँकि यह कहना मुश्किल है कि उनके आपसी संबंधों पर इसका कितना असर हुआ है।

मेरी असहजता देखकर नायला ने कहा, ‘जो है सो ठीक है। ऐसा नहीं है कि इस दीवार के कारण सिर्फ़ हमारी जिंदगी बिखर गई है। यक़ीन मानो, हमारी तरह बहुत सारे परिवार ऐसे हैं जो अलग-अलग रहने को अभिशप्त हैं। अलग रहना बार-बार आने वाली दूसरी भयानक मुसीबतों के आगे बहुत छोटी बात लगने लगती है। लेकिन हम पहले की मुश्किलों की तरह इसको भी निभा लेंगे।’


(‘रिटर्न: ए पैलेस्टीनियन मेमॉयर’ से साभार)

 

प्रस्तुति : यादवेन्द्र 

Monday, April 6, 2026

बोर्खेस और मैं : अनुवाद - योगेन्द्र आहूजा



 

 

इस रचना (दार्शनिक गद्य) में बोर्खेस अपने दो रूपों—एक “सार्वजनिक लेखक बोर्गेस” और दूसरा “निजी ‘मैं’”—के बीच के संबंध और तनाव पर विचार करते हैं। इसमें कोई कथानक या घटनाक्रम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन, एक लेखक के ‘स्व’ और सार्वजनिक पहचान पर, उनके आपसी रिश्ते पर दार्शनिक विमर्श है।-  योगेन्द्र आहूजा 

 

 बोर्खेस और मैं

(बोर्खेस)

वह जो ‘दूसरा’ है, बोर्खेस, वह है जिसके साथ चीज़ें घटती हैं। मैं ब्यूनस आयर्स की गलियों में यूँ ही भटकता रहता हूँ; आजकल कभी-कभी बेख़याली में ठहरकर किसी दरवाज़े की मेहराब और उसके लोहे के फाटक को देख लेता हूँ। बोर्खेस के बारे में मुझे ख़तों में ख़बर मिलती है; उसका नाम प्रोफ़ेसरों की सूची में दिखता है, और बायोग्राफिकल गजट्स में भी। मुझे रेत-घड़ियाँ पसंद हैं, नक़्शे, अठारहवीं सदी के फ़ॉन्ट, कॉफ़ी का ज़ायका, और स्टीवेंसन की गद्य-शैली। दूसरे को भी यही सब भाता है, मगर उसकी ख़ुदपरस्ती इन्हें एक तरह की नाटकीय सजावट बना देती है। यह कहना कि हमारा रिश्ता दुश्मनी का है, कुछ ज़्यादा हो जाएगा। मैं जीता हूँ, ज़िंदा रहता हूँ, ताकि बोर्खेस अपना साहित्य रच सके — और वही साहित्य मेरे होने का औचित्य भी है। मैं आसानी से मान लेता हूँ कि उसकी कुछ पंक्तियाँ सार्थक हैं, लेकिन वे पंक्तियाँ मेरी मुक्ति नहीं हैं। शायद इसलिए कि अच्छा लेखन किसी एक व्यक्ति का नहीं होता — उस दूसरे का भी नहीं — बल्कि भाषा और परंपरा का होता है। बाक़ी जो कुछ है, मेरी तक़दीर में तो पूरी तरह गुम हो जाना लिखा है; मुमकिन है मेरा बस एक छोटा-सा हिस्सा उस दूसरे में ज़िंदा रह जाए। मैं धीरे-धीरे सब कुछ उसके हवाले करता जा रहा हूँ, यह जानते हुए भी कि उसमें चीज़ों को विकृत करने और बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने की एक खराब आदत है। स्पिनोजा जानता था कि हर वस्तु अपने वजूद का स्थायित्व चाहती है — पत्थर पत्थर बने रहना चाहता है और बाघ बाघ, सदा के लिए। मुझे बोर्खेस में बने रहना है, ख़ुद अपने भीतर नहीं (अगर सचमुच मेरा कोई “मैं” है भी), फिर भी मैं अपने आपको उसकी किताबों में उतना नहीं पहचानता जितना कई अन्य किताबों में, या फिर गिटार की गहरी झंकार में। कुछ बरस पहले मैंने उससे बच निकलने की कोशिश की थी — उपनगरों की कथाओं से निकलकर काल और अनंत के खेलों में जा पहुँचा था। मगर अब वे खेल भी बोर्खेस के हो चुके हैं — मुझे कुछ और सोचना होगा। इस तरह मेरा जीवन एक पलायन है। मैं सब कुछ खो दूँगा, और सब कुछ या तो विस्मृति में चला जाएगा, या उस दूसरे के पास।

मुझे नहीं मालूम कि हम दोनों में से किसने यह लिखा है।

Friday, February 27, 2026

मार्खेज़ और जॉनी बेल्च की कविता : कठपुतली

 

 


जॉनी बेल्च


 

 

1982 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित दक्षिण अमेरिकी कथाकार गेब्रिएल गार्सिया मार्खेज को लंबी बीमारी के बाद 1999 में डॉक्टरों ने कैंसर से पीड़ित घोषित कर दिया था और 'जादुई यथार्थवाद' के इस अद्भुत चितेरे के स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया में फैले प्रशंसकों में चिंता उभरने लगी। अचानक एक दिन- 29 मई, 2000 को पेरू के लोकप्रिय दैनिक 'लॉ रिपब्लिक' में एक कविता छपी जिसका शीर्षक था 'कठपुतली (द पपेट)' और इसके रचयिता के तौर पर मार्खेज का नाम छपा। देखते ही देखते, पूरे दक्षिण अमेरिकी समाज में यह खबर जंगल के आग की तरह फैल गई- बहुत सारे अखबारों ने इसे उद्धृत किया, रेडियो और टेलीविजन पर इसका पाठ किया गया और यह कहा गया कि जीवन की आखिरी बेला में मार्खेज ने इस कविता के माध्यम से अपने मित्रों और प्रशंसकों के प्रति कृतज्ञता प्रकट की है।  जब इस बाबत मार्खेज से पूछा गया तो मुस्करा भर दिए, पर धीरे-धीरे यह राज खुल ही गया कि मार्खेज ने ऐसी कोई कविता नहीं लिखी। बाद में यह खबर भी सामने आई कि मैक्सिको में स्टेज पर मूकाभिनय करने वाले जॉनी बेल्च ने अपने एक कठपुतली शो के लिए यह कविता लिखी थी जो छपी तो पर इसमें रचयिता के तौर पर किसी गलती से मार्खेज का नाम छप गया। अपने एक इंटरव्यू में वेल्च ने कहा कि वे कोई बड़े कवि नहीं हैं, पर दुनियाभर में प्रसिद्धि प्राप्त कर चुकी एक रचना को लिखने का श्रेय उन्हें नहीं मिला इसका उन्हें गहरा दुख है। आज इस कविता को दुनिया के बड़े 'होक्स' के रूप में यहां-वहां उद्धृत किया जाता है।- यादवेन्द्र




 
 जॉनी बेल्च की कविता 

कठपुतली

(अनुवाद: यादवेन्द्र)  

यदि पलभर को ईश्वर भूल जाए कि 
मैं रद्दी और कबाड़ से बना एक गुड्डा हूं 
और जीवन का एक कतरा और मुझे बख्श दे 
तो बहुत संभव है 
मैं वे सब बातें न कह पाऊंगा
जो सोचता रहा हूं 
पर इतना तय है कि 
उन तमाम बातों को सोचूंगा जरूर 
जो मुझे कहनी हैं।

मैं सभी चीजों को खूब सम्मान दूंगा 
पर उनकी चमक-दमक देखकर नहीं 
बल्कि इसलिए कि 
उनके मायने जीवन में क्या हैं।

अब से सोऊंगा कम
और स्वप्न ज्यादा देखूंगा 
मैं जानता हूं कि जब हम 
एक मिनट के लिए अपनी आंखें मूंदते हैं
तो रोशनी साठ सैकंड तक 
हमसे दूर चली जाती है।

लोगबाग चाहें तो यूं ही 
सड़कों की लंबाई मापते रहें 
मैं तो खूब सोच-समझकर 
एक-एक कदम आगे बढ़ाऊंगा।
दूसरे लोग चाहे सोते रहें, 
मुझे जागते रहना है 
खूब गौर से वह सब सुनते रहना है
जो दूसरे बोलेंगे 
और यह सीखने की कोशिश भी करूंगा कि अच्छी चॉकलेट आइसक्रीम खाते हुए इसका भरपूर आनंद कैसे लिया जाए।

यदि ईश्वर जीवन का 
एक कतरा और मुझे बख्श दे तो
मैं सादगी भरे मामूली लिबास पहन लूंगा और सूरज के सामने सीना तान कर खड़ा हो जाऊंगा 
जाहिर है मेरे शरीर को तो धूप मिलेगी ही अंदर तक आत्मा भी प्रकाशमान हो जाएगी।

हे ईश्वर, यदि मेरे हदय की धड़कन शेष है
 तो मैं अपनी तमाम घृणा उतारकर 
बरफ की सिल्लियों पर रख दूंगा 
और सूरज के चमकने का इंतजार करूंगा वॉनगाग का स्वांग धारण करूंगा
और 
फिर सितारों के बदन पर 
बेनेदेत्ती की कविता चित्रित कर दूंगा 
और तोहफे में चंद्रमा को
मेरेट का एक गीत प्रस्तुत करूंगा।

गुलाब की क्यारियां 
मैं अपने आंसुओं से सींचूंगा 
जिससे उनके कांटों की चुभन और
पंखुड़ियों के दैवी चुंबन महसूस कर सकूं...
यदि ईश्वर जीवन का एक कतरा और 
 मुझे बख्श दे।

मैं ऐसा एक दिन भी नहीं गंवाऊंगा जब सचमुच जिन सबसे प्रेम करता हूं
 उनसे यह न कह पाऊ 
कि में उन्हें कितना प्रेम करता हूं।

मैं हर किसी को यह भरोसा दिलाना चाहता हूं कि 
वे मेरे सबसे अजीज़ हैं 
दरअसल ऐसे में प्रेम के साथ 
मैं खूब प्रेम से रहूंगा।

मैं लोगों को साबित करके दिखाऊंगा कि उन्हें इस बात की गलतफहमी है 
कि बुढ़ापे में प्रेम के सागर में नहीं डूबा जा सकता 
उन्हें इल्म ही नहीं कि 
प्रेम के जीवन से तिरोहित होते ही 
बुढ़ापा अपने भारी पांव पसारने लगता है।

मैं' बच्चों के हाथ उड़ने वाले 
खूबसूरत तोहफे पकड़ा तो दूंगा 
पर कहूंगा कि अपने आप उड़ान भरना सीखो।

और बूढ़े हो चुके लोगों को बताऊंगा 
कि बुढ़ापे की वजह से नहीं 
बल्कि स्मृतियों के लोप से आती है मृत्यु।

साथियों, मैंने आपके साथ क्या कुछ नहीं सीखा
मैंने सीखा कि जिसे देखो वह 
पहाड़ के शिखर पर चढ़कर टिक जाना चाहता है 
पर यह सच्चाई उससे छूट जाती है कि वास्तविक आनंद पहाड़ के शिखर 
में नहीं 
पहाड़ पर चढ़ने के 
हमारे ढंग में निहित होता है।

मैंने यहीं सीखा कि जब एक नवजात शिशु अपने नन्हें हाथ में पिता की अंगुलियां भींचता है 
तो यह स्पर्श जीवन भर के लिए 
वहीं ठहर जाता है।

मैंने यह भी सीखा कि किसी को 
दूसरे आदमी को ओर आंखें उठाकर देखने का हक तभी मिलता है 
जब उसके हाथ साथी को सहारा देकर खड़े करने के लिए आगे बढ़े हुए हों।

मैंने लोगों से बहुत सारी बातें सीखीं समझीं पर अब जब जीवन के अंतिम छोर तक आ पहुंचा हूं
तो इनमें से अधिकांश चातों के अर्थ खो जाएंगे 
अब तो बस मुझे ताबूत में बंद किया जाना शेष है
जहां मृत्यु मेरी प्रतीक्षा कर रही है। 

 

(प्रस्तुति: यादवेन्द्र) 

Saturday, July 23, 2022

क्रूर सलाहों के विरुद्ध

जीवन तकलीफों की खान है। तकनीक के विकास की जितनी भी कोशिशें हैं, तकलीफदेय स्थितियों को कम करते जाने और जीवन परिस्थितियों को सहज बनाने की अवधारणा उसके मूल में निहित दिखाई देती है। नैतिकता और आदर्श की स्थापनाओं के ख्यालों से भरा सारा मानवीय उपक्रम ही नहीं, बल्कि छल-छद्म को रचने वाले विध्वंसक कार्यरूप भी प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष में जीवन को सहज बनाने की अवधारणा से प्रे‍रित होकर ही किये जाते रहे हैं। यही मानवीय लीला है। मनुष्य और अन्य जीवों के बीच यही फर्क, चेतना के रूप में दिखायी देता है। इस फर्क ने ही मनुष्यं को खुद की गतिविधियों की आलोचना करने का भी सऊर दिया है। इसी से समझना आसान होता है कि जीवन को खुशहाल बनाने की बजाय उदास करने वाले उपक्रमों से असहमति एवं विरोध ही कला और साहित्य के कार्यभार हैं। यदि कोई रचना इस तरह के उददेश्य से निरपेक्ष है तो कला की कसौटी पर उसे रचना मानने से परहेज किया जाना चाहिए। रचना की शर्त ही है कि बेहतर जीवन स्थितियों के लिए बेचैनी का विचार वहां होना चाहिए। कान्ता घिल्डियाल की कविताओं में प्रकृति की जो छटाएं हैं, देख सकते हैं कि वे सिर्फ सौन्दीर्य की प्रस्तुति नहीं है, बल्कि मनुष्य जीवन की बेहतरी के लिए उस सौन्दर्य की भूमिका का आंकलन और उसकी अवश्यम्भाविता की पहचान वहां स्‍पष्‍ट है। उसको बचाने की बेचैनी है- '' मैं खोना नहीं चाहती,/ मन ही मन बतियाना पक्षियों से/ निहारना भिन्न्ता को''



हाल ही में कान्ता घिल्डियाल ने हिमांशु जोशी के उपन्यास 'कगार की आग' का गढवाली अनुवाद किया है जो 'बीस बीसि' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। इससे पूर्व कान्ता घिल्डियाल दो अन्य पुस्तकों 'शहीद अब्दुल हमीद' अर 'मटकू बोलता है' का भी गढ़वाली भाषा में अनुवाद कर चुकी हैं। ये दोनों ही अनुवाद राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (NBT) से प्रकाशित हैं। अनुवाद के ये काम कान्ता घिल्डियाल के उस व्याक्तित्वत से परिचित होने का अवसर देते हैं जिसमें एक व्यक्ति के लेखन की ओर उन्मुख होने के कारणों को तलाशा जा सकता है। अपनी धरती, अपनी भाषा और उस भाषा की समृद्धि का ख्याल, कान्ता घिल्डियाल के व्‍यक्तित्‍व की विशेषता बन रहा है। उनके व्याक्तित्व के इस पहलू को जानकर भी उनकी रचनाओं के पाठ तक पहुंचने के रास्ते पर चला जा सकता है।उनकी हिंदी कविताओं का संग्रह 'मुट्ठी भर रंग' शीर्षक से प्रकाशित है। 

प्रस्तुत हैं देहरादून में रहने वाली कान्ताा घिल्डियाल की कुछ नयी कविताएं।


विगौ

कान्ता घिल्डियाल


मेरा वसंत

 

अलसुबह रोज़ र्बोगेनवेलिया पर

आने लगी हैं

घिंडुड़ी, सिंटुली, बुलबुल, तोते, कौऔं

और नन्‍हीं चिड़ियां

 

सूरज की आमद से पहले

शुरू हो जाता है एक सुरीला ऑर्केस्ट्रा

अफसोस कि पड़ोस में है कसमसाहट

नींद में पड़ रहा खलल  

नहीं जानते वे

गाँव और शहर के बीच पुल बन रही बेल

मन-प्राणों पर छा सकती है

सुगंध की तरह,

 

अक़्सर मिलती हैं

बोनसाई बनाने की क्रूर सलाहें

 

मैं खोना नहीं चाहती,

मन ही मन बतियाना पक्षियों से

निहारना भिन्‍नता को

 

वैसे कभी-कभी तो मुझे भी हो ही जाती है शिकायत

बढ़ जाता है बोझ एक अतिरिक्त काम का

हवा से गलबहियां करती शाखें

जब झरती हैं फूल, पत्तियां

 

पर सच कहूं

बोगेनवेलिया के बेल

मेरा वसंत है

तकिया है ,नींद और सपने है

और हर सुबह की 

सुनहरी शुरुआत है।

 

 

मेरा हौंसला हो तुम

 

 

चिड़ियों !

क्या तुम्हें

धूल-धूसरित आसमान में उड़ते हुए

किसी बहेलिए का डर नहीं सताता ?

 

पुष्पकलिकाओं !

क्या तुम्हें खिलखिलाकर हँसते हुए

मसले जाने का ख़ौफ़ नहीं होता ?

 

गर्भ में पल रही,

जन्म लेने को आतुर बच्चियों !

क्या तुम नहीं जानती हो

बड़ी-बड़ी टोही आँखे

हाथों में हथियार लिए

कत्ल करने को तैयार हैं ?

 

नृशंस हत्याओं के धुंध इरादे

खून की लकीरें खींच रहे लगातार

मुझे तो हर पल डराता है

तुम सब मेरा हौंसला हो पर

तुम्‍हें बेखौफ बने रहना है इसी तरह।   

 

 

ए‍क जरूरी भाव

 

 

अपमान की अग्नि

नज़र नही आती

पर बढ़ तो जाता ही है

शरीर का ताप

अंतस की

भीतरी तहों को भेदकर

डस जाती है

सर्पजिभ्या

आत्मा का कोई भी हिस्सा

नहीं रहता घाव विहीन....

 

  

गुलाबी गाँव

 

एक

चैत के महीने भीटों पर

खिली फ्योंली को देख

भले ही पियरी पहने चहक उठता हो गांव

पर गुलाबी नहीं होता

 

रोटी की तलाश में जा चुके बेटों के

कभी-कभार लौटने से भले ही

हरी हो जाती हो गांव की रंगत

पर गांव ग़ुलाबी नहीं होता

 

खेतों को बिलाकर बनी सड़क पर

धूल उड़ाती गाड़ी से उतरती

नई-नवेली दुल्हन को देख

बेशक सतरंगी हो जाता है गाँव

पर गुलाबी नहीं होता

 

गुलाबी हो उठता है गाँव

जब उसे वर्षों बाद दूर धार में दिखती है

अपने पास आती हुई कोई ब्याही बेटी ,

अचानक हो जाते हैं हरे

उससे गलबहियां करने को आतुर

खेतों के किनारे खड़े

भीमल खड़ीक के पुराने पेड़,

चूडियों भरी हथेलियों को चूमकर

स्वागत गीत गाने को आतुर होता है

खुदेड स्वरों में बहता मंगरों का मीठा पानी ,

बरसों बाद उसकी छुअन महसूस कर

उसके पदचिन्हों को चूमती हैं

बचपन के खेलों की गवाह टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियाँ ,

खारे नमकीन पानी से भीग जाती हैं

तिबारी के छज्जे में

माथे पर झुर्रियों भरे हाथ टिकाए

बाट जोहती बूढ़ी आँखें ,

सूनी गलियां सुहागन बन पूछती हैं

कुटुंब-परिवार की कुशल-क्षेम ,

जंक लगे तालों संग

आँखों के कोरों को पोंछती हैं

सीलन और उदासी से नम हो चुकी

खाली खूंटों की पहरेदारी करती

गोबर मिट्टी से लिपी दीवारें ,

सुहाग की सलामती के साथ

दूधो नहाओ पूतो फलो के

आशीषों से नवाजते हैं

वीरान पड़े देवी-देवताओं के मंडुले ,

संबंधों में गरमाहट का गवाह

गांव के बीचोबीच खड़ा पीपल

अंग्वाळ बटोरकर पूछता है हाल

लाडो ! 

गाँव तो बेटियों के होते हैं

जब तक बेटियाँ न बिसराएँगी इसे

तब तक गुलाबी ही रहेंगे गाँव।

 

दो

गाँव से शहर ब्याही गयी

बेटियों के सपनों में रोज़ आते हैं

छूट चुकी नदी , पहाड़

और सीढ़ीनुमा खेत

 

नदी की गोद में गिरता झक्क सफ़ेद झरना

सुरों में बहने लगता है

कानों में संगीत घोलती है

गाँव को जाती सड़क

चीड़ , देवदार , काफ़ल और बुरांस

शहर की उमस भरी गर्मी को सोख लेना चाहते हैं

देह और आत्मा में ठंडक घोलता है

धारे-मंगरों का ठंडा-मीठा पानी

उदास मुख पर

उजास बिखेरता है

गाँव की सुबह का बाल सूरज

 

तीन

सूरज की किरणों से 

बिखरता है सोना पहाड़ पर

हवा संग गलबहियां कर

गीत गाते हैं पत्ते

उड़ती चिडियाँ

छज्जे पर आकर

घर के साथ जोड़ती है

पहला संवाद।

पहाड़ के हँसने , रोने , गाने

और नाराज़ होने की

पहली राज़दार होती हैं नदियाँ..


Sunday, August 2, 2020

अपने शब्दों में सेरेना विलियम्स

यह हमारे लिए गर्व की बात है कि वर्ष 2008 के आस-पास इंटरनेट की दुनिया में अपने लिखे हुए के प्रकाशन के लिए यादवेन्द्र जी ने सर्वप्रथम इस ब्लाग को ही चुना। दूसरी भाषओं के अनुवाद ही नहीं, यादवेन्द्र जी की रचनाएं भी इस ब्लाग को तब से ही समृद्ध करती रही हैं।

इस दौरान अनुवादों पर आधारित उनकी दो किताबें प्रकाशित हुई हैं।

हिंदी की दुनिया यादवेन्द्र जी को उनके अनुवादों की वजह से ही नहीं, उनके विषय चयन से भी पहचानती है। टेनिस खिलाड़ी सेरेना विलियम्स के जीवन संघर्ष का ब्योरा प्रस्तुत करने की कोशिश उनकी अगली पुस्तक का विषय है।

प्रस्तुत है संभावना प्रकाशन,हापुड़ से इस साल के अंत तक प्रकाशित होने वाली उनकी किताब का एक अंश।

यादवेन्द्र

 

हालाँकि सेरेना अपने बारे में व्यक्तिगत विवरणों का ज्यादा खुलासा करने की अभ्यस्त नहीं हैं फिर भी मीडिया में उपलब्ध उनके कुछ इंटरव्यू से लिए गए उद्धरणों के आधार पर उनकी शख्सियत को समझना कुछ कुछ संभव है : 

 

वैसे मैं बहुत साफ तौर पर तो नहीं जानती लेकिन मुझे लगता है कि मैंने जब से होश संभाला तब से मुझे मालूम है कि मैं काली हूं। जिस दिन से मैं टेनिस की दुनिया  में आई हूँ  उस दिन से मुझे ऐसा ही लगता है। जब हम छोटे थे उस समय के बारे में बताती हूँ : हम घर से बाहर निकल कर पास के पार्क में जाते थे जहाँ  हम खेलने की प्रैक्टिस करते थे। उन पार्कों में हमें हमेशा गोरे लोग दिखाई देते थे , शायद ही कोई काला इंसान दिखाई देता था...वे वहाँ  टेनिस खेला करते थे। जहाँ  तक मेरी स्मृति जाती है, मुझे लगता है कि शुरू से मुझे मालूम था : मैं काली हूँ । मुझे यह भी मालूम था कि मैं औरों से थोड़ी अलग हूँ , जो मैं कर रही हूँ वह औरों से कुछ अलग है। हमारे साथ हमारा परिवार होता था, वीनस होती थी हमारी अन्य बहनें भी होती थीं।एक बार की बात याद आती है जब मैं और वीनस प्रैक्टिस कर रहे थे, आसपास के तमाम गोरे लड़के हमारे पास आये और हमें घेर कर खड़े हो गए -वे ब्लैकी ब्लैकी कह कर हमें चिढ़ाने लगे।तब मेरी उम्र सात साल के करीब रही होगी... मुझे अच्छी तरह याद है,उनका चिढाना सुन कर मेरे मन में निश्चय आया : मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता,तुम्हें जो कहना हो कहते रहो। अब सोचती हूँ तो लगता है कि उस उम्र में ऐसी बातें सोचना बहुत सामान्य नहीं था, उसके लिए बहुत हिम्मत चाहिए.... वह हिम्मत मुझ में शुरू से ही थी।

 

मेरे माता पिता शुरू से यह चाहते थे और हमें सिखाते थे कि हम जो हैं जैसे हैं,उसके लिए हमारे मनों में किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं बल्कि गर्व का भाव होना चाहिए।      अफ़सोस यह कि अपने आसपास हम देखते हैं बहुत सारे काले लोगों -खास तौर पर युवाओं  को -हर पल यह कह कर निरुत्साहित किया जाता रहता है कि तुम बदसूरत हो...तुम्हारे केश भद्दे लगते हैं...तुम्हारी त्वचा कितनी काली है। हमें शुरू से खुद को प्यार करना, खुद को सम्मान देना सिखाया गया। मेरे डैड हमेशा कहते कि तुम्हें अपना इतिहास अपनी विरासत जाननी चाहिए - जो अपनी विरासत  अपना इतिहास जानता है वही अपने भविष्य को महान ऊँचाइयों तक ले जा सकता है। हम लोगों को शुरू से टीवी पर अपने इतिहास, अपने संघर्षों, अपने विरासत के प्रोग्राम देखने को कहा जाता था .......एलेक्स हेली के आत्मकथात्मक उपन्यास पर आधारित रूट्स जैसे प्रोग्राम - इस तरह के कार्यक्रम हम जरूर देखते थे और ढूंढ ढूंढ कर देखते थे जिससे हम अपने इतिहास से रू ब रू हो सकें। जब आप अपने पुरखों को इस तरह के संघर्षों से जूझते हुए विजयी होकर निकलते हुए देखते हैं तब आपका मन गर्व से भर जाता है और भविष्य के लिए रास्ते खुलते हैं। माया एंजेलू ने भी तो अपनी कविता में कहा है: हम गुलामों की उम्मीदें हैं, हम गुलामों के सपने हैं। यह पता चलने के बाद कि अपने पुरखों के ऐसे कठिन संघर्षों की बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं और ढ़ंग की जिंदगी जी रहे हैं , मैं काले रंग के अलावा किसी और रंग में जन्म नहीं लेना चाहती। किसी और कुल वंश (रेस) का  सैकड़ों सैकड़ों सालों का ऐसा कठिन संघर्ष का इतिहास नहीं रहा है और यह तो जगजाहिर है कि मजबूत इंसान ही काल के थपेड़ों को झेल कर जिंदा बच पाते हैं,पनप पाते हैं - कोई शक नहीं कि हम काले लोग शरीर और मन दोनों से सबसे मजबूत लोग हैं।अपने जीवन के पल पल मैं अपना काला रंग धारण कर के गौरवान्वित महसूस करती हूं।

 

वीनस ने और  मैंने टेनिस की दुनिया में जब से कदम रखा है सफलता हमारे पक्ष में रही है और हम दोनों एक के बाद एक अगली  सीढ़ी पर चढ़ते गए हैं। हम दोनों में एक और बात समान थी कि हम अपने किए को लेकर कभी किसी तरह की शर्मिंदगी नहीं महसूस करते थे।हम अपने केशों में जिस तरह की लड़ियाँ  बनाते थे उसको लेकर हमें कभी यह नहीं लगा कि घर से बाहर निकलेंगे तो कैसा लगेगा। गोरों की दुनिया का खेल है टेनिस और हम काले थे लेकिन हमें कभी उनके बीच रहकर खेलते हुए डर नहीं लगता...यह कोई सहज सामान्य बात नहीं थी पर हममें थी।

 

हमारी माँ ने हमें बचपन से भावनात्मक रूप से मजबूत बनाया जिससे जब दर्शक हमारे काले होने या स्त्री होने को लेकर फब्तियाँ  कसें या हमें निशाना बनाएँ तो मालूम हो हमें उससे कैसे निबटना है। उन्होंने हमें यह पाठ पढ़ाया कि हम जैसे हैं  उस पर किसी तरह की शर्मिंदगी न महसूस करें - खास तौर पर अपने केश और शारीरिक बनावट को लेकर , अपनी विरासत, अपने पुरखों के संघर्ष को लेकर मन में निरंतर गर्व का भाव महसूस करें। मुझे उनकी परवरिश का यह पक्ष सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण लगता है। मैं अपनी बेटी को इन्हीं मूल्यों के साथ बड़ा कर रही हूँ ।

 

 जब मैं किसी काम को हाथ लगाती हूँ  तो उतना फोकस अपने काम में लाती हूँ  जिससे मैं दुनिया में सर्वश्रेष्ठ बन जाऊँ - और ऐसा नहीं कि मैं इतने से संतुष्ट हो जाती हूँ   बल्कि निरंतर और बेहतर काम करने की कोशिश करती हूँ । काफी कम उम्र में - जहाँ  तक मुझे याद आता है 17 साल की उम्र में - मैंने अपने बारे में अखबारों में छपा कोई समाचार पढ़ना छोड़ दिया था।मुझे लगता है कि इस आत्मसंयम के कारण मुझे बहुत लाभ हुआ, मैं अपने खेल पर ज्यादा फोकस कर पाई। मैं उन दिनों को याद करती हूँ तो मुझे लगता है  मेरे खेल की ज्यादा नुक्ताचीनी इस लिए की जाती थी क्योंकि मैं मुझमें आत्मविश्वास कूट कूट कर भरा हुआ था - लोगों को ताज्जुब होता था मैं गोरी नहीं बल्कि काली हूँ , गोरों का खेल टेनिस खेलती हूँ  और आत्मविश्वास से इतनी लबरेज हूँ , ऐसा कैसे हो सकता है?

 

मैं अपने आप को हमेशा यह कहती थी कि मैं एक दिन दुनिया की नंबर एक टेनिस खिलाड़ी बनूँगी, मुझ में वह काबिलियत है। और हाँ मैं क्यों न सोचूँ  ऐसा - जब मैं दुनिया के शिखर पर होने के बारे में सोचूँगी ही नहीं तो मैं उस श्रेणी का खेल खेल भला कैसे सकती हूँ ?

 

एक समय ऐसा था जब अपने शरीर को लेकर मैं खुद भी असहज रहती थी, मुझे लगता था कि मैं बहुत बलवान और हृष्ट पुष्ट हूँ । फिर एक सेकंड को सोचती: कौन कहता है कि मैं इतनी बलवान और तगड़ी हूँ ? इसी शरीर ने तो मुझे दुनिया का महानतम खिलाड़ी बनाया, मैं उसके बारे में ऐसी ऊल जलूल बातें भला क्यों सोचने लगी।और आज मेरा यही शरीर एक स्टाइल बन गया है, मुझे इसके बारे में सोच सोच कर बहुत अच्छा लगता है। अब वह समय आ गया है जब मेरा यही शरीर दुनिया भर में एक स्टाइल बन कर धूम मचा रहा है। यहाँ  तक पहुँचने में वक्त लगा - जब मैं पीछे मुड़ के देखती हूँ  तो अपने अपनी मॉम और डैड का शुक्रिया अदा करना कभी नहीं भूलती जिन्होंने बचपन से मुझ में विश्वास कूट कूट कर भरा।

ऐसा भी तो हो सकता था कि वे  रंग,केश और शरीर को लेकर मुझे औरों की तरह हतोत्साहित करते... तब तो मैं आज जिस सीढ़ी पर हूँ  वहाँ  तक पहुँचने का कोई सवाल ही नहीं होता। तब मैं अलग तरह से अपना जीवन जीती,अलग ढंग की एक्सरसाइज करती, कोई और अलग ही काम कर सकती थी। आज यहाँ खड़े होकर मैं जो कुछ भी हूँ , जैसी भी हूँ  उसको लेकर  बेहद खुश हूँ ,जिन लोगों ने मुझे इस मुकाम तक पहुँचने में मदद की उनकी  शुक्रगुजार हूँ । मुझे इस रूप में ऐसा होना बहुत रास आ रहा है, यहाँ खड़ी होकर मैं बेहतर और शक्ति संपन्न महसूस कर रही हूँ।"

 

अपनी आत्मकथा "क्वीन ऑफ़ द कोर्ट : ऐन ऑटोबायोग्राफ़ी" में सेरेना विलियम्स बचपन का उदहारण देती हैं कि अपने को सर्वश्रेष्ठ मानने की धुन मेरे  ऊपर इस कदर सवार थी कि प्रेरक उद्धरणों को कागज़ पर लिख कर मैं  अक्सर अपने रैकेट बैग के ऊपर उन्हें चिपका देती स्व मार्टिन लूथर किंग जूनियर का यह उद्धरण मुझे  बेहद प्रिय था :" अपने भावों को चेहरे पर मत आने दो तुम काले हो और तुममें कुछ भी झेल लेने की कूबत है ....डटे रहो डिगो नहीं ,झेल लो जो भी सामने आये .... बस तन कर खड़े रहो। " और "शक्तिशाली बनो काले हो तो क्या हुआ अब तुम्हारे चमकने निखरने का वक्त आ गया है अपनी श्रेष्ठता पर भरोसा रखो। लोग तुम्हें क्रोधित देखना चाहते हैं .... क्रोध करो,पर ऐसे करो कि लोगों को यह आग दिखायी न दे।" 

जाहिर है उन्हें अपनी ऐतिहासिक भूमिका और जिम्मेदारी का भरपूर एहसास है तभी तो वे कहती हैं :"मैं खुद के लिए खेलती हूँ पर साथ साथ उनके लिए भी खेलती हूँ जिनकी हैसियत मुझसे ज्यादा बड़ी है - मैं उनका प्रतिनिधित्व भी करती हूँ। मैं अपने बाद आने वाली पीढ़ी के लिए भी दरवाज़े खोलती हूँ।"

 

(सेरेना की तस्‍वीरें इंटरनेट से साभार ली जा रही हैं)