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Monday, August 17, 2026

राजेश सकलानी की लघुकथाएं

 
 

 


 

 ( कवियों का गद्य पढ़ना एक अलग तरह का अनुभव है। आज हम पाठकों के लिये विशेष रुप से राजेश सकलानी की कुछ लघुकथाएं प्रस्तुत कर रहे हैं । लिखे जाने के चार दशक बाद भी इनकी आभा मन्द नहीं पड़ी है।)

 

 

 

 

चिड़िया 

उस आदमी को मैं एकदम पहचान गया। मैंने उसे आवाज दी। यह सरासर फिजूल था। वह मुझे भूल चुका था। कीमती कपडों में वह शानदार लग रहा था। मैंने उसे एक सफेद कागज और पैन दिया और उससे कहा कि वह एक चिड़िया इस पर बना दे।

"चिड़िया!" वह चौंककर बोला। उसका चेहरा क्रूर लगने लगा। कुछ क्षण पहले वह बहुत ही विनम्र लग रहा था।

"मैं चिड़िया नहीं बना सकता।" अपनी क्रूरता को कम करने की कोशिश करते हुए उसने कहा।

"मेरा मतलब यह नहीं कि तुम हू-ब-हू चिड़िया बनाओ। चिड़िया जैसा कुछ भी बना सकते हो। आखिर बच्चे भी चिड़िया बना लेते हैं। तुम क्यों नहीं बना सकते?" मैंने उसे प्रेरित करने का प्रयास किया।

"मैं चिड़िया नहीं बनाऊँगा!" परेशानी और क्रोध में उसने अपना निर्णय सुनाया। वह अपने कोट के बटन खोलने लगा। अंदर की एक जेब में पिस्तौल झाँक रही थी। दूसरी जेब में छोटे आकार की एक बोतल थी।

"वह डिब्बे. जैसा क्या है?" मैंने उसके कोट के बाहरी जेब की ओर इशारा करते हुए पूछा।

"यह ब्लू फिल्म है।" उसने डिब्बे को बाहर से छूते हुए कहा। उसका आत्म-विश्वास फिर लौट आया था।

"तुम गोली चलाने का साहस रखते हो?" मैंने पूछा। वह समझ गया कि मैंने उसे जाल में फंसा लिया है।

``देखो, ये सब बातें तुम नहीं समझ सकते।" यह उसने ऐसे कहा जैसे किसी बच्चे पर तरस खा रहा हो। कुछ ही क्षणों में समीकरण बदल गया था। वह अपनी संपन्नता की ओर इशारा करना चाह रहा था। यह उसका नहीं हथियार भी था।

ढाल ही "अच्छा तो बताओ, तुम चिडिया क्यों नहीं बना सकते?" मेरे यह कहते ही उसका चेहरा तन गया।

"नहीं बनाता... जाओ।" वह लगभग चीखने लगा। कोई सही कारण नहीं बता पाने पर उसे चुप हो जाना पडा जबकि वह और चीखना चाहता वा धमकाने की असफल कोशिश के बाद वह दूसरा रास्ता ढूँढना चाहता था। लेकिन रास्ते में चिड़िया दाना चुग रही थी।

“देखो, चिड़िया तो तुम्हें बनानी ही होगी। तुम बना सकते हो। सचमना।" मैंने उसे पुचकारते हुए कहा।

"देखो, ऐसा है..." उसने अपना स्वर धीमा कर दिया, जैसे कोई रहस्य खोल रहा हो।

"मुझे डर है!” यह कहते हुए उसकी आँखों में प्रस्तुत भेट को छिपाए रखने का आग्रह करने लगा- "कि मैं चिड़िया बनाने की कोशिश करूंगा कोई खतरनाक चीज़ बन जाएगी।" भयभीत आवाज़ में वह यह सब कह गया।

"कुछ नहीं होगा।" मैंने कहा और एक दूसरा कागज दिया जिसम चिड़िया बनी हुई थी- "यह चिड़िया बचपन में तुमने ही बनाई है।

वह आश्चर्य से उस कागज़ को देखे जा रहा था। वह मिर एकक जमीन पर बैठ गया और बोला- "हे भगवान!"

चित्र: राजेश सकलानी


 

 

जूते


वे शानदार किस्म के जूते थे। इस तरह के जूते शहर मैं अभी कुछ ही लोगों के पास थे। सब लोगों का कहना था कि कुछ ही दिनों में बहुत सारे लोगों के पास इस तरह के जूते हो जायेंगे। उनके दाम के बारे में अभी लोग इतना ही जानते थे कि वे बहुत ही मंहगे हैं। क्या बच्चे, क्या बूढ़े सब अपनी ही दृष्टि से कहते थे कि इन जूतों की चाल बहुत ही शानदार है।

उन जूतों में वास्तव में गजब की चमक थी। उनका सबसे बड़ा गुण यह था कि वे शक्ल तक ढांप लेते थे और उनको पहनने वाला कोई दूसरों के समझ न आने वाली चाल चल सकता था। उनके बारे में कई तरह की अफवाहें सुनाई पड़ रही थीं। लोग अरुमंजस में थे। अक्सर अफवाहें सच सिद्ध होती थीं और सच अफवाह की तरह लगता था ।

ताजातरीन अफवाह या सच यह था कि सड़क पर चलता हुआा हर जूता उठनी हुई बहस को अपनी ओर खींच लेता है। कुछ लोगों का कहना था कि फुसलाये में आकर बहस खुद ही उनकी गोद में चली जाती है। लोग यह तो अनुभव करते थे कि हर मुद्दा  कील की तरह चुभता है। वे अपनी तकलीफ में व्यस्त रहते हैं और बहस गायव हो जाती है। कुछ बहसें गायब होने के बाद दुबारा दिखलाई देनी शुरू हुई, लेकिन वे बिल्कुल बदली हुई थीं। बहुत सारे भले लोग अपने परिचितों को इन बहसों में नहीं पड़ने देने की सलाह देने लगे। सचमुच बहसों की बन आई थी। उनके चेहरों पर मनमानी करने का भाव था। उन्होंने लोगों के भय को पहचान लिया था। लोग कहने लगे जिसका जूता उसकी बहस ।

वे जूते चलते हुए अपनी आवाज से भी पहचाने जाने लगे। उनको आते देख सूखे पत्ते जमीन के कान में फुस-फुसाने लगते। वे आपस में टकराते तो सारा शहर उसकी झंकार को सुनने के लिए अपने काम काज छोड़कर बैठ जाता। नंगे पैर लोग तो जूते की चमक से इतने प्रभावित थे कि जो भी जूता सामने मिलता उसके पीछे हो लेते थे। जूतों की अपनी-अपनी प्रतिष्ठा थी । अपने पीछे की भीड़ देखकर वे गर्व करते थे।

और शानदार चाल चलते थे।

 

 

चित्र : राजेश सकलानी

 

 पुराना कोट

जाड़े का मौसम शुरू हुआ तो उसे पिछले जाड़ों की याद आई। हमेशा ऐसा ही होता है कि किसी विशेष दिन अचानक पता लगता है कि मौसम बदल गया है और उसे पिछले वर्ष के इन्हीं दिनों की याद आती है। लड़की गुनगुनाने लगी । हल्का जाड़ा उसके बदन में उंगलियाँ चुभा रहा था। पिछले जाड़ों की याद में बह उजली धूप में स्वेटर बुनती हुई अपने को देख रही थी। यह एक सम्पूर्ण घटना थी- स्वेटर बुनती हुई लड़की पर धूप झुकी हुई और लड़की धूप को पाते हुए बदन को गर्म होता हुआ अनुभव कर रही थी।

यह स्वप्न आदमी ने तोड़ा। वह नल के पास बैठा कुल्ला कर रहा था । ठंडा पानी उसके दाँतो में लग रहा था। उसने सोचा कल से वह गुनगुने पानी से कुल्ला करेगा। तौलिये से मुँह पोंछते हुए उसने आवाज दी। लड़की भागकर आई। आदमी ने कहा उसका कोट निकाल देना । सुबह साईकिल से काम पर जाते समय ठंड लगती है।

कोट सबसे नीचे वाले लकड़ी के बक्से में था। उसके ऊपर तीन बक्से और एक टोकरी रखी थी। लड़की बारी-बारी से सबको उतारने लगी । दूसरा बक्सा अभी हाथ में ही था कि सब्जी जलने की गन्ध रसोई से आने लगी। लड़की ने हल्के से चीख कर बक्सा पटक दिया। वह रसोई की तरफ भागी। गुसलखाने से औरत की आवाज आ रही थी। सब्जी जलने की गन्ध उस तक पहुंच गई थी। उसने नल बन्द कर दिया था। लड़की ने चूल्हे से सब्जी उतारते हुए जोर से कहा कि सब्जी अधिक नहीं जली है।

 कल से नहाने के लिए पानी गर्म किया करेगी। औरत ने सोचा ।

 लड़की बड़ी उत्सुकता से बक्से में झाँक रही थी। वह बक्सा महीनों बाद खुल रहा था। उसे आशा थी कि बक्से में कुछ ऐसी चीज मिल जायेगीे जिसे वह भूल चुकी है और जिसे पाकर उसे  सुखद आश्वर्यं होगा। उसने हल्की सर्दी भी अनुभव की और उत्तेजना भी। अचानक उसके हाथ एक पुराना स्कार्फ पड़ गया । वह बिल्कुल गुजमुज हो गया था। उसने उसे फैलाकर थोड़ा तान  दिया। आसमानी स्कार्फ में मुर्झाया हुआ लाल फून अचानक खिल गया। सलवटों के बावजूद पत्तियां हरी और चमकदार लग रही थी। वह एक पुराना स्कार्फ था। उसे देखकर वह अपना  बचपन याद करने लगी ।

आदमी का कोट सबसे नीचे दबा हुआ था, नीम की पुरानी पत्तियों की तह के ऊपर। लड़की ने उसे खींचकर बाहर निकाल लिया। सूखी हुई पत्तियाँ जो कोट से चिपकी हुई थी बाहर बिखर गई। लड़की ने कोट को फैलाकर देखा । कोट का कॉलर और जेवें फिर फटे हुए नजर आने लगे। पिछले वर्ष उसने बड़ी बारीकी से उन्हें सिला था। अगले जाड़ों तक वह यहां नहीं होगी। कुछ ही दिनों में उसका विवाह होने वाला है। अगले वर्ष इस कोट को वह ठीक नहीं कर पायेगी। उसे भक से रोना फूटने लगा ।

उसको गले में कुछ अनुभव हुआ । कोट कमरे की मैली दीवार पर छाया की तरह लटका हुम्रा था। लड़की ने अलमारी से सूई धागा का डिब्बा निकाला और सुई में धागा पिरोने लगी ।

 

 

 

विरोध का  एक दिन



मैं प्रार्थना में शामिल नहीं हुआ। ईश्वर कोई थानेदार तो नहीं है जो मेरे घर की छत पर लट्ठ बजायेगा। इतना अधिकार तो मैं रखता है कि चाहूं तो अपने इरादों को छिपा कर रखूं। अपने इरादों को सामने रखने का मेरा कोई इरादा नहीं है।


शहर के बीच चहल-पहल के इलाके में आज एक शक्तिशाली बम विस्फोट हुआ । लोग डरे हुए हैं और कुछ न समझ पाने की उलझन में हैं। हवा में ऐसी  अफवाह है कि कभी भी कुछ अप्रिय घटित हो सकता है। मैं डबल रोटी खरीदने मौहल्ले की दुकान में गया। चौराहे पर पुलिस वाला खड़ा था। मैंने पूछा," भाई साहब, आप बता सकते हैं कि क्या हो रहा है?"  घबराहट में उसने मेरे ही सवाल को दोहराया  "क्या हो रहा है?" उसको परेशानी से बचाने के लिए मैंने उससे अपना ध्यान हटा लिया। दुकान पर एक आदमी दूसरे से पूछ रहा है कि कुल कितनेआदमी मरे ? आप जानते हैं ?

मेरे इरादों की हद के अन्दर जो साँस भर रहा है वह बम नहीं है। वह बम से कहीं अधिक शक्तिशाली है। आदमी से बदला लेने के लिए उसे जान से मार देना सबसे घटिया तरीका है। यह उस बीमार आदमी का तरीका है जो जल्दी-जल्दी लगने वाली अपनी पेशाब को नहीं रोक सकता।

आज सभी लोग प्रार्थना में गए, सिर्फ मुझे छोड़कर। वे सिर्फ उसे ढूँढते हैं जो प्रार्थना में शरीक नहीं होते । वे शिकारियों की तरह निकल पड़ते हैं। लोग या तो डर रहे हैं  या हत्याएं कर रहे हैं।लोग इस तरह दो तरह के लोगों में बंट गये हैं। जो हत्याएं कर रहे हैं ,क्या वे भी डरे हुए है? लोगअपनी-अपनी जगहों पर अपने-अपने तरीके से हत्या कर रहे हैं। 

Sunday, May 10, 2026

अवधेश कुमार की लघुकथाएं

 

 

अवधेश कुमार ( 1951-1999)

 ( अवधेश कुमार को एक कवि और कलाकार के रूप में जाना जाता है। चौथा सप्तक में लिखे आत्मलेख में उन्होंने बड़े गर्व के साथ यह कहा था कि वे एक ही स्थिति पर कविता, कहानियाँ और लघुकथाएं लिख सकते हैं।‘ उसकी भूमिका’ नाम से उनका कहानी संकलन भी प्रकाशित हुआ है।यहाँ उनकी कुछ लघुकथाएं दी जा रही हैं)

 

 

 

 दिल्ली

उबले हुए अंडे की तरह ठोस और मृत, गदराया हुआ और मूल्यवान यह शहर मिर्च और नमकदानियों के साथ हर किसी मेज पर सजा हुआ, हर समय उपलब्ध ।

यह शहर अपने से थोड़ा अलग खिसका हुआ शहर है-झनझनाता हुआ एक शहर से चिपका दूसरा से चिपका तीसरा से चिपका चौथा। कैमरा हिल जाने से जैसे तस्वीर में कई एक जैसी तस्वीरें पैदा हो जाएँ ।

यह शहर हमारे चारों तरफ छिलके के खोल की तरह शामिल हमारी परछाइयों को हमारे शरीरों से नोंचकर उतार फेंकने की कोशिश में तिलमिलाता है और निराशा और भय से इसके चेहरे की जर्दी काली पड़ जाती है।

पूरे देश पर छाने की कोशिश में निरन्तर मग्न और पीड़ित यह शहर फूटे हुए अंडों के मलबे के ढेर में धँसा हुआ करवट तक लेने में अस-मर्थ है।

आमीन ।

 

 

 

भूख की सीमा से बाहर

उन्होंने मुझे पहले तीन बातें बताईं -

एक : जब तक लोहा काम करता रहता है, उस पर जंग नहीं लगता। दो : जब तक मछली पानी में है, उसे कोई नहीं खरीद सकता। तीन : दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं है कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।

यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने खाने की मेज पर छुरी के साथ एक बहुत बड़ी भुनी हुई मछली लाकर रख दी और बोले, "आओ यार अब इसे खाते हैं और थोड़ी देर के लिए भूल जाओ वे बातें जो भूख की सीमा के अन्दर नहीं आतीं।" 

 

 

अधूरा नशा

एक अधूरे नशे में बौखलाए हुए आदमी की तरह असहज, वह बहुत अनर्गल सोच में अधभीगा, ठिठुरते हुए अपने दोनों हाथ बाँध लेता है।

एक खास तरह की ऊब और जकड़न में कसा उसके नशे का अधूरा चेहरा बड़बड़ाता है उसकी आँखों से, शब्दों से, उसकी चाल और उसके हाथ हिलाने के ढंग से। और इस तरह वह असंदिग्धरूप से कायर मनुष्य कर्म और नियति के दो अधूरे नशों के बीच अपनी असली औकात पहचानने की कोशिश करता है।

पता है उसे कि बहुत सारे विचार, निर्णय और परिकल्पनाएँ ठूंस-ठूंसकर भर दी गई हैं उसकी जेबों में। कोई-कोई तो बहुत गैरजरूरी और कोई बहुत कारगर उसके लिए ठीक उसी वक़्त में। पर वह चुनाव नहीं कर सकता, क्योंकि साथ में उसे जो एक अधूरा नशा भी दे दिया गया है।

वह यह भी नहीं जानता कि उसे अब कैसी शराब चाहिए या कि कैसा नशा सही रहेगा उसके लिए, जबकि एक कबाड़घर में प्रवेश करने के लिए साहस जुटाना है उसे और जिसके जुटाए जाने को अव और स्थगित नहीं किया जा सकता।

रात के इस तीसरे पहर में जबकि नींद में वह जहाँ होता अब नहीं है वहाँ- उसके पास हल्की-सी उम्मीद के सिवा तलब, और उसके सिवा सुबह का इंतजार बचा है।

और एक जवाबदेही जो उसने जितनी अपनी देह को देनी है, उतनी ही अगली सुबह सामने पड़नेवाले काम को भी ।

फिर उसने अपनी जेब में पड़े पैसे टटोले और उसे वे सबके सब नेक और जरूरी काम याद आने लगे, जिनमें उन्हें खर्च करना था। और इस प्रकार और इस कदर अधूरे नशे की जद से बाहर निकलते हुए वह-सुबह के दरवाजे के रास्ते एक दूसरी दुनिया के भीतर निडर धड़बड़ाते हुए घुस पड़ा। 

 

 

कौवा

चिड़िया की लघुकथा में मेरी ऊब से पैदा हुई यह कौवे की लघुकथा। लेकिन चिड़िया मुझसे ऊबकर कहाँ गई होगी ? कौन-से आकाश में ? मुझे नहीं मालूम ।

मैं यही जानता हूँ कि जब मैंने कौवे की लघुकथा लिखने का निश्चय किया, तो नहीं पता था कि वह समस्यापूति की तरह कठिन था। मगर कौवा हंस की चाल के साथ फड़फड़ाता हुआ उतरा इस कागज पर, स्याही के धब्बे में आकर बैठ गया और अपनी कानी आँख से मुझे देखने लगा ।

मुझे उसका इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा और उससे बचाने के लिए मैं कागज पर यूंही आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचने लगा। कौवे पर लिखने को कुछ था ही नहीं।

तब उसने स्याही के धब्बे में से अपनी चोंच बाहर निकाली और बोला- "मैं बताता हूँ, लिखो-'आज एक लेखक एक कौवे से डर गया'।" 

Monday, April 8, 2013

दिल्ली :अवधेश कुमार की याद (३)

 
    (अवधेश कुमार की यह लघुकथा लगभग तीस वर्ष पूर्व लिखी गयी थी. आज के समय में इसकी प्रासंगिकता ध्यान खींचती है)
                                    दिल्ली

          उबले हुए अंडे की तरअह ठोस और मृत,गदराया हुआ और मूल्यवान यह शहर मिर्च और नमकदानियों के साथ हर किसी मेज पर सजा हुआ, हर समय उपलब्ध.
        यह शहर अपने से थोड़ा खिसका हुआ शहर है-झनझनाता हुआ एक शहर से चिपका दूसरा से चिपका तीसरा से चिपका चौथा.कैमरा हिल जाने से जैसे तस्वीर में कई एक जैसी तस्वीरें पैदा हो जायें.
        यह शहर हमारे चारों तरफ छिलके के खोल की तरह शामिल हमारी परछाईयों को हमारे शरीरों से नोंचकर उतार फेंकने की कोशिश में तिलमिलाता है और निराशा और भय से चेहरे की जर्दी काली पड़ जाती है.
       पूरे देश पर छाने की कोशिश में निरन्तर मग्न और पीड़ित यह शहर फूटे हुए अंडों के मलबे के ढेर में धँसा हुआ करवट तक लेने में असमर्थ है.
     आमीन.
 


Monday, July 26, 2010

एक रात, एक पात्र और पांच कहानियां(१)

( कोई पन्द्र्ह वर्ष पूर्व ये लघुकथायें लिखी गयी थीं और फिर कागजों के ढेर में गुम हो गयीं।अब यहां दो किस्तों में इस ब्लोग के पाठकों के लिये प्रस्तुत हैं-नवीन कुमार नैथानी)

अकेला
वह सड़क पर अकेला था.उसे याद नहीं आ रहा था कि वह अकेला क्यों है.याद करने की कोशिश में उसे मस्तिष्क को खोजना होगा जब्कि उसे देह को संभालने में दिक्कत हो रही है.वह आगे बढा और उसे लग कि आगे बढना मुश्किल है.वह पीछे हटा और उसे लगा कि पीछे हटना मुश्किल है.वह वहीं बैठ गया - डिवाइडर के ऊपर.बैठते ही उसे लगा कि लेट जाये . वह लेट गया और सो गया.
उस पल बहुत से लोग सडक से गुजर रहे थे.रात में भी इतनी रोशनी थी कि लोग उसे देख सकते थे.लोगओं ने देखा और सोच लिया-एक आदमी मर गया.

प्यास
प्यास के साथ वह उठा . सूखे गले के साथ कुछ दूर चला.तब उसने पाया कि वह सडक पर है.सामने सार्वजनिक जल की टंकी होनी चाहिये जिससे चौबीस घंटे पानी रिसता है.टंकी मिली,पानी मिला-रिसता हुआ. उसने अपने हाथ टंकी की दीवार से लगायेऔर होंठ गीले किये.बहुत देर तक वह अपनी प्यास से लडाता रहा.नीचे जमीन पर बहुत पानी था और जमीन में काई जम गयी थी.
उसका पैर जमीन पर फिसला और वह गिर पडा

घर
अंधेरी रत में वह धीमे-धीमे उठा.देह पर चोट थी .इसे संभालने के लिये उसे मस्तिष्क का साथ चाहिये.मस्तिष्क ने साथ दिया और उसे याद आया-बिछडने से पह्ले वह दोस्तों से घिरा था!
"अच्छा दोस्त!मुझे घर जाना है"
"अच्छा यार फिर मिलेंगे.घर पहुंचने के लिये बहुत देर हो गयी."
"अच्छा बन्धु!चलते हैं"
"अच्छा रहा यार,तुम कहां जाओगे?"
वह मुस्कराता रहा.दोस्त एक-एक कर घर चले गये.
"अच्छा है" वह बड़बडाया,"उनके पास घर तो है"