Showing posts with label लघुकथा. Show all posts
Showing posts with label लघुकथा. Show all posts

Sunday, May 10, 2026

अवधेश कुमार की लघुकथाएं

 

 

अवधेश कुमार ( 1951-1999)

 ( अवधेश कुमार को एक कवि और कलाकार के रूप में जाना जाता है। चौथा सप्तक में लिखे आत्मलेख में उन्होंने बड़े गर्व के साथ यह कहा था कि वे एक ही स्थिति पर कविता, कहानियाँ और लघुकथाएं लिख सकते हैं।‘ उसकी भूमिका’ नाम से उनका कहानी संकलन भी प्रकाशित हुआ है।यहाँ उनकी कुछ लघुकथाएं दी जा रही हैं)

 

 

 

 दिल्ली

उबले हुए अंडे की तरह ठोस और मृत, गदराया हुआ और मूल्यवान यह शहर मिर्च और नमकदानियों के साथ हर किसी मेज पर सजा हुआ, हर समय उपलब्ध ।

यह शहर अपने से थोड़ा अलग खिसका हुआ शहर है-झनझनाता हुआ एक शहर से चिपका दूसरा से चिपका तीसरा से चिपका चौथा। कैमरा हिल जाने से जैसे तस्वीर में कई एक जैसी तस्वीरें पैदा हो जाएँ ।

यह शहर हमारे चारों तरफ छिलके के खोल की तरह शामिल हमारी परछाइयों को हमारे शरीरों से नोंचकर उतार फेंकने की कोशिश में तिलमिलाता है और निराशा और भय से इसके चेहरे की जर्दी काली पड़ जाती है।

पूरे देश पर छाने की कोशिश में निरन्तर मग्न और पीड़ित यह शहर फूटे हुए अंडों के मलबे के ढेर में धँसा हुआ करवट तक लेने में अस-मर्थ है।

आमीन ।

 

 

 

भूख की सीमा से बाहर

उन्होंने मुझे पहले तीन बातें बताईं -

एक : जब तक लोहा काम करता रहता है, उस पर जंग नहीं लगता। दो : जब तक मछली पानी में है, उसे कोई नहीं खरीद सकता। तीन : दिल टेबिल क्लॉथ की तरह नहीं है कि उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।

यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने खाने की मेज पर छुरी के साथ एक बहुत बड़ी भुनी हुई मछली लाकर रख दी और बोले, "आओ यार अब इसे खाते हैं और थोड़ी देर के लिए भूल जाओ वे बातें जो भूख की सीमा के अन्दर नहीं आतीं।" 

 

 

अधूरा नशा

एक अधूरे नशे में बौखलाए हुए आदमी की तरह असहज, वह बहुत अनर्गल सोच में अधभीगा, ठिठुरते हुए अपने दोनों हाथ बाँध लेता है।

एक खास तरह की ऊब और जकड़न में कसा उसके नशे का अधूरा चेहरा बड़बड़ाता है उसकी आँखों से, शब्दों से, उसकी चाल और उसके हाथ हिलाने के ढंग से। और इस तरह वह असंदिग्धरूप से कायर मनुष्य कर्म और नियति के दो अधूरे नशों के बीच अपनी असली औकात पहचानने की कोशिश करता है।

पता है उसे कि बहुत सारे विचार, निर्णय और परिकल्पनाएँ ठूंस-ठूंसकर भर दी गई हैं उसकी जेबों में। कोई-कोई तो बहुत गैरजरूरी और कोई बहुत कारगर उसके लिए ठीक उसी वक़्त में। पर वह चुनाव नहीं कर सकता, क्योंकि साथ में उसे जो एक अधूरा नशा भी दे दिया गया है।

वह यह भी नहीं जानता कि उसे अब कैसी शराब चाहिए या कि कैसा नशा सही रहेगा उसके लिए, जबकि एक कबाड़घर में प्रवेश करने के लिए साहस जुटाना है उसे और जिसके जुटाए जाने को अव और स्थगित नहीं किया जा सकता।

रात के इस तीसरे पहर में जबकि नींद में वह जहाँ होता अब नहीं है वहाँ- उसके पास हल्की-सी उम्मीद के सिवा तलब, और उसके सिवा सुबह का इंतजार बचा है।

और एक जवाबदेही जो उसने जितनी अपनी देह को देनी है, उतनी ही अगली सुबह सामने पड़नेवाले काम को भी ।

फिर उसने अपनी जेब में पड़े पैसे टटोले और उसे वे सबके सब नेक और जरूरी काम याद आने लगे, जिनमें उन्हें खर्च करना था। और इस प्रकार और इस कदर अधूरे नशे की जद से बाहर निकलते हुए वह-सुबह के दरवाजे के रास्ते एक दूसरी दुनिया के भीतर निडर धड़बड़ाते हुए घुस पड़ा। 

 

 

कौवा

चिड़िया की लघुकथा में मेरी ऊब से पैदा हुई यह कौवे की लघुकथा। लेकिन चिड़िया मुझसे ऊबकर कहाँ गई होगी ? कौन-से आकाश में ? मुझे नहीं मालूम ।

मैं यही जानता हूँ कि जब मैंने कौवे की लघुकथा लिखने का निश्चय किया, तो नहीं पता था कि वह समस्यापूति की तरह कठिन था। मगर कौवा हंस की चाल के साथ फड़फड़ाता हुआ उतरा इस कागज पर, स्याही के धब्बे में आकर बैठ गया और अपनी कानी आँख से मुझे देखने लगा ।

मुझे उसका इस तरह देखना अच्छा नहीं लगा और उससे बचाने के लिए मैं कागज पर यूंही आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींचने लगा। कौवे पर लिखने को कुछ था ही नहीं।

तब उसने स्याही के धब्बे में से अपनी चोंच बाहर निकाली और बोला- "मैं बताता हूँ, लिखो-'आज एक लेखक एक कौवे से डर गया'।" 

Monday, April 8, 2013

दिल्ली :अवधेश कुमार की याद (३)

 
    (अवधेश कुमार की यह लघुकथा लगभग तीस वर्ष पूर्व लिखी गयी थी. आज के समय में इसकी प्रासंगिकता ध्यान खींचती है)
                                    दिल्ली

          उबले हुए अंडे की तरअह ठोस और मृत,गदराया हुआ और मूल्यवान यह शहर मिर्च और नमकदानियों के साथ हर किसी मेज पर सजा हुआ, हर समय उपलब्ध.
        यह शहर अपने से थोड़ा खिसका हुआ शहर है-झनझनाता हुआ एक शहर से चिपका दूसरा से चिपका तीसरा से चिपका चौथा.कैमरा हिल जाने से जैसे तस्वीर में कई एक जैसी तस्वीरें पैदा हो जायें.
        यह शहर हमारे चारों तरफ छिलके के खोल की तरह शामिल हमारी परछाईयों को हमारे शरीरों से नोंचकर उतार फेंकने की कोशिश में तिलमिलाता है और निराशा और भय से चेहरे की जर्दी काली पड़ जाती है.
       पूरे देश पर छाने की कोशिश में निरन्तर मग्न और पीड़ित यह शहर फूटे हुए अंडों के मलबे के ढेर में धँसा हुआ करवट तक लेने में असमर्थ है.
     आमीन.
 


Monday, July 26, 2010

एक रात, एक पात्र और पांच कहानियां(१)

( कोई पन्द्र्ह वर्ष पूर्व ये लघुकथायें लिखी गयी थीं और फिर कागजों के ढेर में गुम हो गयीं।अब यहां दो किस्तों में इस ब्लोग के पाठकों के लिये प्रस्तुत हैं-नवीन कुमार नैथानी)

अकेला
वह सड़क पर अकेला था.उसे याद नहीं आ रहा था कि वह अकेला क्यों है.याद करने की कोशिश में उसे मस्तिष्क को खोजना होगा जब्कि उसे देह को संभालने में दिक्कत हो रही है.वह आगे बढा और उसे लग कि आगे बढना मुश्किल है.वह पीछे हटा और उसे लगा कि पीछे हटना मुश्किल है.वह वहीं बैठ गया - डिवाइडर के ऊपर.बैठते ही उसे लगा कि लेट जाये . वह लेट गया और सो गया.
उस पल बहुत से लोग सडक से गुजर रहे थे.रात में भी इतनी रोशनी थी कि लोग उसे देख सकते थे.लोगओं ने देखा और सोच लिया-एक आदमी मर गया.

प्यास
प्यास के साथ वह उठा . सूखे गले के साथ कुछ दूर चला.तब उसने पाया कि वह सडक पर है.सामने सार्वजनिक जल की टंकी होनी चाहिये जिससे चौबीस घंटे पानी रिसता है.टंकी मिली,पानी मिला-रिसता हुआ. उसने अपने हाथ टंकी की दीवार से लगायेऔर होंठ गीले किये.बहुत देर तक वह अपनी प्यास से लडाता रहा.नीचे जमीन पर बहुत पानी था और जमीन में काई जम गयी थी.
उसका पैर जमीन पर फिसला और वह गिर पडा

घर
अंधेरी रत में वह धीमे-धीमे उठा.देह पर चोट थी .इसे संभालने के लिये उसे मस्तिष्क का साथ चाहिये.मस्तिष्क ने साथ दिया और उसे याद आया-बिछडने से पह्ले वह दोस्तों से घिरा था!
"अच्छा दोस्त!मुझे घर जाना है"
"अच्छा यार फिर मिलेंगे.घर पहुंचने के लिये बहुत देर हो गयी."
"अच्छा बन्धु!चलते हैं"
"अच्छा रहा यार,तुम कहां जाओगे?"
वह मुस्कराता रहा.दोस्त एक-एक कर घर चले गये.
"अच्छा है" वह बड़बडाया,"उनके पास घर तो है"