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Wednesday, March 18, 2026

कार्टून से कौन डरता है -अरविंद शेखर

 

  


(अरविंद शेखर ने पत्रकारिता की शुरुआत फ्रीलांस जनपक्षधर कार्टूनिस्ट व पत्रकार के रूप में की। बीते ढाई दशक वह अमर उजाला, दैनिक जागरण, हिंदुस्तान, राष्ट्रीय सहारा में विभिन्न पदों पर रहे हैं। खुद को मूल रूप से कार्टूनिस्ट मानने वाले अरविंद शेखर ने कुछ अरसा हिमाचल टाइम्स, बद्री विशाल,  युगवाणी को भी सहयोग दिया। हालांकि वह अधिकांश वक्त रिपोर्टिंग में व्यस्त रहे हैं मगर बीच-बीच में कार्टून के जरिए राजनीतिक-सामाजिक विद्रूपताओं पर निशाना भी साधते रहे हैं )

 
         कुछ साल हुए, एक निजी टीवी चैनल ने अपने कार्टूनिस्ट मंजुल को नौकरी से हटा दिया। मंजुल ने कोरोना की दूसरी लहर में केंद्र सरकार की नाकामी पर ऐसे तीखे कार्टून बनाए कि उनके कार्टूनों से खफा केंद्र सरकार ने उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल को ही देश के कानूनों के खिलाफ बताते हुए उन पर कार्रवाई के लिए ट्विटर को पत्र लिखा । हैरत इस बात की है कि सरकार ने यह नहीं बताया कि मंजुल का कौन सा कार्टून देश के कानून के खिलाफ है। ट्विटर ने मंजुल को नोटिस भेजा मगर किया कुछ नहीं। पर चैनल ने मंजुल को नौकरी से ही हटा दिया। हाल में सुप्रीम कोर्ट के वकील और जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण द्वारा बैंकों की सरकारी लूट पर सतीश आचार्य का कार्टून ट्विटर पर साझा करना केंद्र सरकार को इतना नागवार गुजरा कि उसने ट्विटर पर दबाल डाल कर उन्हें नोटिस भिजवा दिया।

ये हमारे समय के ही कार्टून होते जाने की ताजा मिसाल हैं।

देश में कार्टून से खौफ खाने वाले सत्ताधारी बीते कुछ दशकों में बहुत बढ़ गए हैं। पर पहले भी ऐसे सत्ताधारियों की कमी नहीं रही है। हालांकि तब वे उंगलियों पर गिने जाने लायक होते थे। अटल सरकार के समय 1999 में आउटलुक के कार्टूनिस्ट इरफान हुसैन की अपहरण के बाद हत्या कर दी गई थी। वह भी तीखे राजनीतिक कार्टून बनाते थे। उन्हें राजनीतिक लोगो से धमकियां भी मिलीं थीं। कार्टूनिस्ट अपनी तरह से इतिहास को दर्ज करता है और इतिहास में खलनायक के रूप मे दर्ज हो जाने के डर से सत्ता पर बैठे छोटे दिल के नेता उसकी कूची को तोड़ देना चाहते हैं। हालांकि इसके पंडित जवाहर लाल नेहरू जैसे अपवाद भी हैं। कार्टूनिस्ट शंकर ने जब पंडित नेहरू को गधे के रूप मे दर्शाया तो पंडित नेहरू ने उन्हें फोन कर कहा-“क्या आप एक गधे के साथ शाम की चाय पीना पसंद करेंगे।” शंकर वहां गए। चाय पी और हल्के माहौल में खूब गप-शप हुई। शंकर की पत्रिका शंकर्स वीकली के लोकार्पण के मौके पर पंडित नेहरू ने उनसे कहा था –“मुझे भी अपने निशाने पर रखना शंकर।” क्या आप आजकल के किसी नेता से ऐसी उम्मीद कर सकते हैं।



कार्टून से तो शायद अंग्रेज भी इतना नहीं डरते थे जितना कि आज के काले अंग्रेज। शंकर ने कई वायसरायों पर भी कार्टून बनाए। उन्हें हिंदुस्तान टाइम्स में नौकरी शुरू किए चार महीने ही हुए थे कि उनका उस समय के वायसरॉय लॉर्ड विलिंगटन पर बनाया एक कार्टून पहले पेज पर प्रकाशित हुआ। शाम को वायसरॉय का बुलावा आ गया। शंकर घबरा गए। सारी रात उन्हें नींद नहीं आई। अगले दिन सुबह जब शंकर उनसे मिलने पहुंचे तो वायसरॉय ने उन्हें गले लगा लिया। उनके साथ चाय पीते हुए कहा- “आई एन्जॉय योर कार्टून, माय ब्वॉय ।”

शंकर ने लॉर्ड लिनलिथगो का भी एक कार्टून बनाया था जिसमें उन्हें श्मशान में शव पर खड़ी देवी भद्रकाली के रूप में दिखाया था। शंकर को भी बाद में लगा कि उन्हें यह कार्टून नहीं बनाना चाहिए था। अगले दिन 11 बजे वायसरॉय के मिलिट्री सेक्रेटरी का फोन आ गया। वायसरॉन ने उन्हें बुलाया था। शंकर ने समझा कि उनके करियर का बस अंत हो गया। डरे- सहमे हुए शंकर वायसरॉय के पास पहुंचे। उम्मीद थी झाड़ पड़ेगी, धमकी मिलेगी। पर मुस्कराते हुए लॉर्ड लिनलिथगो ने उनसे कहा- “शंकर माय ब्वॉय यू हैव ड्रॉन ए वंडरफुल कार्टून, आई वांट यू टू सेंड मी द ऑरिजनरल इमिडिएटली।” आजादी से पहले द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान उन्होंने वायसराय कौंसिल के सदस्य सर मोहम्मद उस्मान पर एक कार्टून बनाया। कार्टून में एक बहुत बड़ा सा गुब्बारा गवनर्मेंट हाउस के ऊपर रखा हुआ था। कार्टून के नीचे लिखा था- भारत सुरक्षित है। हम दिल्ली में सुरक्षित हैं, हमारे पास समुचित रक्षा का प्रबंध है। कार्टून देख गुस्से में पागल उस्मान वायसराय के पास भागे-भागे गए और चिल्ला कर बोले-शंकर को कैद कर लेना चाहिए। इसी तरह वायसराय की एक्जीक्यूयिव कौंसिल के सदस्य ज्योति स्वरूप श्रीवास्तव भी शंकर से खफा होकर उन पर कार्रवाई कराना चाहते थे पर वायसरॉय ने कोई कार्रवाई नहीं की। हिंदुस्तान टाइम्स में छपने वाले इन तीखे कार्टूनों के कारण शंकर को दिल्ली का शैतान कहा जाता था।

भारत में राजनैतिक कार्टून बनाने की परंपरा 1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम के काफी समय बाद शुरू हुई। बीसवीं सदी के पहले दशक में मुबंई के हिंदी पंच के नवरोज जी के अलावा एक और कार्टूनिस्ट एचए तलचेरकर थे जिन्होंने लॉर्ड कर्जन के शासनकाल में कई प्रमुख व्यक्तियों के कैरीकैचर और कार्टून बनाकर काफी मकबूलियत पाई थी। पहले विश्वयुद्ध से पहले एमए शर्मा शर्माज पोर्टफोलियो ऑफ ड्राइंग नाम से हास्य व्यंग्य चित्रों की पत्रिका निकालते थे। मॉन्टेग्यू चेम्स फोर्ड सुधारों पर शर्मा के कार्टूनों ने ऐसा तहलका मचाया कि रवींद्र नाथ टैगोर ने उन्हें बधाई देते हुए लिखा-“आपने जो विषय चुने हैं वे बड़े वैविध्यपूर्ण और दिलचस्प हैं।”

सत्तर के दशक में जब देश में कांग्रेस का निष्कंटक राज था तब सुधीर दर ने कांग्रेसी दिग्गज विद्याचरण शुक्ला पर एक तीखा कार्टून बनाया तो उन्हें फोन पर धमकी दी गई पर बात आगे नहीं बढ़ी।

अस्सी के दशक में यानी 29 मार्च 1987 को तमिल पत्रिका आनंद विगलन में एक कार्टून छपा। इस कार्टून में एक व्यक्ति दो नेताओं की ओर इशारा करते हुए कह रहा है-वो जो जेबकतरा सा दिखता है, विधायक है और जो चोर सा दिखता है मंत्री है। इस कार्टून को लेकर तमिलनाडु विधानसभा में ही नहीं देश भर में बवाल हुआ। मामला संसद तक पहुंचा। कार्टूनिस्ट पर विधायिका का अपमान करने का इलजाम लगाया गया। एक तरफ पूरी प्रेस थी तो दूसरी तरफ संसदीय संस्थाएं। बाद में कुछ अक्लमंद नेताओं के दखल के बाद मामला शांत हुआ।
दुनिया भर में सच दिखाने की कीमत कार्टूनिस्टों ने देश निकाला और अपनी जान देकर चुकाई है।
ब्रिटिश कलाकार 'विलियम-होगार्थ' (1697-1764) को यूरोप में सामान्यतः पहला व्यंग्य-चित्रकार माना जाता है। ब्रिटेन में होगार्थ ने ही व्यक्तियों के कैरीकेचर से आगे बढ़कर राजनीति को चित्रित करना शुरू किया। जबकि पहले कार्टून के नाम पर केवल व्यक्तियों के विरूपित चित्र बनाए जाते थे, जो इटली में शुरू हुए थे। इस तरह होगार्थ ही वह पहला ज्ञात कार्टूनिस्ट था जिसने कार्टून को राजनैतिक रंग दिया था।

दरअसल, व्यंग्य चित्र कला अपने मूल में ही प्रतिरोध की संस्कृति को समोए हुए है। पंद्रहवीं सदी में जब यूरोप कैथोलिक चर्च की जकड़न में फँसा था। राजनीति धार्मिक कठमुल्लाओं की दासी थी। समाज की कोई भी गतिविधि बिना चर्च की अनुमति के सम्पन्न नहीं हो सकती थी। इसी वक्त में यूरोप में चर्च ने सम्पत्तिशाली वर्ग को धन के बदले पापमोचन पत्र बेचकर पापमुक्त करना शुरू कर दिया था, यहाँ तक कि लोगों को ऊँचे दामों पर स्वर्ग का टिकट भी बेचना शुरू कर दिया था। तब जर्मनी में पाप मोचन पत्रों की बिक्री के खिलाफ पादरी मार्टिन लूथर के आंदोलन की खबर चार हफ्ते में ही सारे ईसाई जगत में फैल गई, जर्मनी के पीछे-पीछे दूसरे यूरोपीय देशों में भी धर्मसुधार आंदोलन शुरू हो गया। सभी जगह कैथोलिक चर्च का प्रभाव घटने लगा। लोग कैथोलिक पादरियों और धर्माधिकारियों की खिल्ली उड़ाने लगे। पोप और धर्माधिकारियों को लेकर व्यंग्यचित्र बनने और सामने आने लगे। गधे के रूप में पोप नामक एक कार्टून सामने आया जिसके नीचे लिखा गया- "पोप बाइबिल की उससे बेहतर व्याख्या नहीं करता, जैसा गधा बांसुरी बजाता है या संगीत की स्वरलिपि को समझता है। विरोध की इससे बेहतर कलात्मक अभिव्यक्ति और क्या हो सकती है। इसी तरह स्पेन में गोया (1746-1828) ने खुद को एक प्रखर व्यंग्य-चित्रकार के रूप में स्थापित किया था। उसने तत्कालीन स्पेन नरेश फर्नेण्डो VII के कुछ ऐसे चित्र बनाए कि राजा उसका दुश्मन हो गया राजा के बार-बार उत्पीड़न के चलते वह स्पेन छोड़कर फ्रांस चला गया। जहाँ निर्वासन में उसकी मृत्यु हो गई।

फ्रांस में ही एक कार्टूनिस्ट को लुई चौदहवें को उसकी रखैल के साथ चित्रित करने के कारण जिन्दा जला दिया गया था।

फ्रांस में 'ओनोर दौमिया' ने व्यंग्य चित्रकला को ललित कला की ऊँचाई दी थी, उसके द्वारा फ्रांस के राजा लुईस फिलिप को खून से सना एक नर-पशु चित्रित करने से राजा उससे नाखुश हो गया और दौमिया को जेल जाना पड़ा। जेल की सजा होने के बाद भी दौमिया लगातार अपने राजनैतिक व सामाजिक कार्टूनों के जरिए व्यवस्था पर प्रहार करते रहे। सख्त सेंसरशिप भी दौमिया को अपने समय की सच्चाई को तीखे कार्टूनों के रुप में पेश करने से रोक नहीं पाई। आज 'दौमिया' को राजनैतिक व्यंग्यचित्र कला का 'संरक्षक-संत' माना जाता है। समय बहुत आगे बढ़ गया है पर कार्टूनों से अपनी पोल खुल जाने से खौफजदा सत्ताएं उन्हें डराने के नए-नए तरीके इजाद कर रही हैं। पर कार्टूनिस्ट डरा नहीं है। कार्टून के तंज को बर्दाश्त न कर सकने वाली नेताओं की पीढ़ी भी शायद आज एक वजह है कि अखबारों, खासकर हिंदी अखबारों से कार्टून गायब हो रहा है। अब जब सोशल मीडिया और वेबसाइटें कार्टून को वैकल्पिक मंच दे रही हैं तो वे भी सत्ता शक्तियों के निशाने पर हैं। कार्टून एक ऐसा चित्र है जिसे देखते ही हर व्यक्ति समझ जाता है कि उसमें क्या अभिव्यक्त किया गया है। फिर चाहे देखने वाला पढ़ा-लिखा हो या अनपढ़। सत्ताएं हमेशा कलाओं और कलाकारों को अपना चारण-भाट बना देना चाहती है जो केवल उनका गुणगान करें। लेकिन जिस कार्टून कला का जन्म ही प्रतिरोध के एक औजार के रूप में हुआ हो वह सत्ता का वंदन तो नहीं कर सकती। अपने समय को दिल में उतर जाने वाले व्यंग्य चित्र के रुप में अभिव्यक्त करना ही तो कार्टून कला की आत्मा है। भला अपनी आत्मा को मारकर कार्टून कैसे जिंदा रह सकता है।

क्या प्रसिद्ध फ्रांसीसी लेखक बाल्जाक की यह बात फिर से मौजूं नहीं हो गई है- "हमसे सुंदर चित्रों की माँग की जाती है, किन्तु उनके प्रेरणा इस समाज में है कहाँ? आपके घिनौने वस्त्र, आपकी अपरिपक्व क्रांतियाँ, आपका बातूनी बुर्जुआ, आपका मृत धर्म, आपकी निकृष्ट शक्ति, बिना सिंहासन के आपके बादशाह, ये क्या इतने काव्यात्मक हैं कि इनका चित्रण किया जाए? हम अधिक से अधिक इसका मखौल उड़ा सकते हैं।"




Wednesday, July 10, 2019

यह काटता नहीं है

युगवाणी एक लोकप्रिय व्‍यवसायिक पत्रिका है। लिहाजा ‘स्वप्‍नदर्शी’ समय और ‘दहशतगर्द’ स्थितियों की एकसाथ प्रस्‍तुति उसमें प्रकाशित होना पेशेवर ईमानदारी के दायरे में ही कही जाएगी। ‘स्वप्‍नदर्शी’ समय जिनकी प्राथमिकता हो वे किसी भी स्‍टॉल से युगवाणी खरीद कर पढ़ सकते हैं।
युगवाणी के जुलाई 2019 के अंक में प्रकाशित राजेश सकलानी के कॉलम ‘अपनी दुनिया’ का एक हिस्‍सा यहां प्रस्‍तुत है।   


वो फुर्तीला और चौकन्ना है। उसकी ओर देखो तो डर लगता है। एक सिहरन उठती है और शरीर बचाव के लिए तैयार होने लगता है। एक सुरक्षात्मक प्रतिहिंसा जायज हो जाती है।
ऐसा अक्सर होता है कि हम आत्मीयता की तलाश में अचानक एक खूंखार नजर आने वाले कुत्ते के सामने पड़ जाते हैं। आप तुरन्त अस्थिर हो जाते हैं और दिल की धड़कनें तेज हो जाती हैं। मनःस्थिति घबराहट में चली जाती है। न आगे कदम बढ़ता है और न पीछे। तभी मेजबान मुस्कराते हुए प्रकट होते हैं, आपकी खराब हालत की परवाह न करते हुए सिर्फ एक वाक्य कहते हैं, ‘’यह काटता नहीं है।‘’
यह तो कोई बात न हुई। इतनी बुरी हालत और अनियंत्रित रक्तचाप पैदा करने की जिम्मेदारी तो आखिर उन्हीं की बनती है। जिन्हें किसी से भी सद्भावना और प्रेम न हो वे हमेशा दूसरों को धमकाने के लिये डरावना कुत्ता पाल सकते हैं और उस पशु पर अपने नियंत्रण को ताकत का हथियार बना सकते हैं। पशु का क्या भरोसा। देखते न देखते वह हमला कर काट भी सकता है। अपने मालिक को वपफादारी का सबूत दे सकता है।
कोई समूह या संगठन ऐसी विचारधारा का प्रसार कर सकते हैं जिससे उनकी धाक नागरिकों को बेचैन करती हो। हमेशा एक अनिश्चितता में डाले रहती हो। फिर वे ताकत और अधिकार के भाव से यह कहते हों कि यह काटता नहीं है। लेकिन वह एक दिन काट लेता हो और फिर वे धमका कर कहें जी हाँ, जो हमारे रास्ते नहीं चलता ये उसे काट लेता है।
कुछ तो कुत्तों को काटने के लिये तैयार करते हैं पर कहते जाते हैं कि यह काटता नहीं है। यह प्रवृत्ति संस्थागत भी होती है। लोगबाग ऐसे संगठन बना लेते हैं। अपने सदस्यों को समझा-बुझा देते हैं। काल्पनिक दुश्मनों की तस्वीरें दिखला देते हैं। सामाजिक व्यवस्था के भीतर अपना दबदबा बना लेते हैं। ऐसे संगठनों की गीली जीभ हवा में धमकती है। पैने और नुकीले दांत चमकते रहते हैं। यदि आप उनके समर्थक नहीं हैं तो बस डरते रहिये और उनका रौब स्वीकार कर लीजिये। वे वाचाल होते हैं और कुतर्कशास्त्र में महापण्डित होते हैं। वे इतिहास, भूगोल, राजनीति और समाजशास्त्र को अपनी मनमानी से बदल देते हैं। वे लोकतंत्र की आजादी का मजा लेते हैं और लोकतांत्रिक भावना का कचूमर निकालने में कोई कसर नहीं छोड़ते। जाहिर है वैज्ञानिक पद्धति के तर्क में वे हमेशा कमजोर पड़ते हैं और तुरन्त धर्म और परम्परा के खोल में घुस जाते हैं। फिर जमकर कोलाहल मचाते हैं। परम्परायें निरन्तर प्रवाहमान होती हैं और ऐतिहासिक चरणों में नया रूप लेती हैं। वे अपनी निरर्थक होती कोशिकाओं को छोड़ देती हैं और जीवन की नई धारा को ओढ़ लेती हैं। जो तत्व सामाजिक सहृदयतापूर्ण और मानवीय होते हैं वे बाराबर बने रहते हैं। लेकिन संकीर्ण और अलोकतांत्रिक राजनैतिक संगठन परम्परा को जड़ बना डालते हैं। जो उनकी ताकत से असहमत होता है तो भौंकने की आवाज आने लगती है। वे संविधान और देश के कानूनों से परे जा कर अपनी सेनाएँ बनाने की हास्यासपद और समाजविरोधी हरकत करते हैं। सामाजिक मंचों पर यही कहते हैं कि यह काटता नहीं है।

Tuesday, December 8, 2015

नवजागरण…भारतीय अबलाओं का नवीनीकरण

नाज़िया फातमा

      19वी शताब्दी में भारतीय जन समाज में आई वैचारिक क्रांति का मूल अर्थ उस ‘नई चेतना’ से रहा जो समाज में हर स्तर पर धीरे-धीरे अपना प्रसार कर रही थी l सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक हर पहलू इससे प्रभावित हो रहा था l पश्चिमी ज्ञान-विज्ञान से प्रभावित एक नया बुद्धिजीवी वर्ग तैयार हो रहा था l इस नये बुद्धिजीवी वर्ग की आकांक्षाएं पहले से काफी भिन्न थीं, जो कि हर तरफ कुछ बदलाव चाह रहा था l इस नए वर्ग को स्त्रियों की स्थिति में भी कुछ बदलाव की ज़रूरत महसूस हुई l इस नए वर्ग की आकांक्षाओं के अनुरूप स्त्रियों को ढालने के लिए, उनकी स्थिति में परिवर्तन करना आवश्यक था l परिवर्तन की इस लहर में ‘स्त्री’ और उसका जीवन बहस का केन्‍द्रीय मुद्दा होकर सामने आया। डॉ. राधा कुमार के शब्दों में “उन्नीसवीं शताब्दी को स्त्रियों की शताब्दी कहना बेहतर होगा क्योंकि इस सदी में सारी दुनियां में उनकी अच्छाई-बुराई, प्रकृति, क्षमताएं एवं उर्वरा गर्मागर्म बहस का विषय थेl”[1] 
समाज में स्त्री शिक्षा का मुद्दा हमेशा से ही विवादस्पद रहा हो ऐसा नहीं है अगर हम थोडा इतिहास में जाये तो पता चलता है कि प्राचीन समय में स्त्रियाँ शास्त्रसम्मत थीं l  प्राय: वह शास्त्रों का अध्ययन करती थीं  ये वो समय था जब इस्लाम का आगमन भारतवर्ष की भूमी पर नहीं हुआ था l मध्यकाल में इस्लाम का प्रवेश हुआ तब तक स्त्री शिक्षा की संख्या में थोड़ी गिरावट आई प्राय: उनका विवाह छोटी उम्र में ही कर दिया जाता था इसका कारण चाहे जो हो लेकिन स्त्री शिक्षा गायब नहीं हुई थी l लेकिन 19वीं शताब्दी तक आते- आते स्त्री शिक्षा का मुद्दा बड़े पैमाने पर विवादित रहा l स्त्रियों की शिक्षा पूरे परिवार और समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकती है, इस तथ्य से सम्पूर्ण पुरुष समाज परिचित था इसलिए उसे शिक्षित करने का साहसपूर्ण कदम उठाया गया l लेकिन यहाँ स्त्री शिक्षा का अर्थ था ‘भारतीय अबलाओं का नवीनीकरण’ l इस नवीनीकरण का केवल एक ही उद्देश्य था और वह था  कि समाज में उदित हुए इस नये बुद्धिजीवी वर्ग के अनुरूप स्त्रियों को ढालना l यहाँ यह बात ध्यान रखने योग्य है की इन स्त्रियों को शिक्षित करने का उद्देश्य इन्हें अपने पैरों पर खड़ा करना या आत्मनिर्भर बनाना नहीं था l इन स्त्रियों का एक मात्र उद्देश्य केवल अपने पति की अनुगामिनी बनाना था l इस षड्यंत्र का साफ़-साफ़ उल्लेख हमे नवजागरण का अग्रदूत कहे जाने वाले भारतेंदु हरिश्चंद्र के इस कथन में मिलता है “ऐसी चाल से उनको(स्त्री) शिक्षा दीजिये कि वह अपना देश और धर्म सीखें, पति की भक्ति करें और लड़कों को सहज में शिक्षा दें l”[2]
भारतेन्दु के इस वक्तव्य से ही हमें तत्कालीन स्त्री शिक्षा की दशा समझ में आनी चाहिए l  तत्‍कालीन समाज में स्त्री शिक्षा की स्‍वीकार्यता नहीं थी। स्त्री शिक्षा का सवाल एक जटिल विषय की तरह था, जो धार्मिक  मान्‍यताओं से निर्धारित किया जाता था। धर्म के अनुपालन के लिए प्रतिबद्ध पुरुष वर्ग स्त्री की पवित्रता को लेकर भी उतना ही चिंतित था l प्राय: ये धारणा सर्वव्‍यापी थी कि स्त्री को पढ़ाने से वह पथ भ्रष्ट हो जाएगी या उसे विवाह उपरांत वैधव्य का सामना करना पड़ेगा(चोखेरबाली) l ऐसे में तथाकथित समाज सुधारों का रास्ता उसे शिक्षित करने को तो सहमत था लेकिन उस चाल से नहीं जैसे लड़कों को किया जा रहा था। पूरे नवजागरण में स्त्री को लेकर कमोबेश यही दृष्टि तत्‍कालीन समाज सुधारकों में दिखाई देती है l इस समय समाज में जो स्त्री शिक्षा दी जा रही थी वो उसे  केवल एक निपुण गृहिणी बनाने तक ही सीमित थी। प्राय: उनको रसोई में खाना बनाने और खर्च में मितव्‍यतता बरतने की शिक्षा दी जाती थी l

 भारतेंदु हरिश्चंद्र के उपरोक्त वक्तव्य पर टिप्पणी करते हुए डॉ. वीर भारत तलवार लिखते हैं कि “भारतेंदु ने लड़कियों की शिक्षा के लिए आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की जगह चरित्रनिर्माण, धार्मिक और घरेलू प्रबंध के बारे में बतानेवाली किताबें पाठ्यक्रम में लगाने के लिए कहा...भारतेंदु के समकालीन और सर सैय्यद के साथी डिप्टी नज़ीर अहमद ने 1869 में स्त्री शिक्षा के लिए मिरातुल उरुस(स्त्री दर्पण) किताब लिखी जिसमें दो बहनों की कहानी के ज़रिये भद्र्वर्गीय स्त्रियों को माँ, बहन, बेटी और पत्नी के रूप में अपने परम्परागत कर्त्तव्यों को और भी कुशलता के साथ पूरी करने की शिक्षा दी गयी है l इसी तरह 19वीं सदी के मुस्लिम नवजागरण की सबसे महत्वपूर्ण संस्था देवबंद दारुल उलूम से संबंधित मौलाना अशरफ़ अली थानवी ने बहिश्ती ज़ेवर किताब लिखी जो एक ऐसा वृहद कोश था जिसमें  भद्र्वर्गीय मुस्लिम स्त्री को धर्म, पारिवारिक, कानूनों घरेलू संबंध, इस्लामी दवा-दारु वगैरह की शिक्षा दी गई थी l उर्दू में लिखी गई ये दोनों किताबें भद्र्वर्गीय मुस्लिम परिवारों में हर लड़की को उसके ब्याह के समय उपहार के रूप में दी जाती थी l”
  
समाज में व्याप्त कुरीतियों को जड़ से मिटाने के लिए जो उपाय किये जा रहे थे उनमें स्त्री की दशा सुधारना एक महत्वपूर्ण काम था। साथ ही यह भी उल्‍लेखनीय है कि पितृसत्तात्मक अनुकूलन के कारण समाज सुधारकों – चाहें वह हिन्दू हों या मुसलमान उनकी दृष्टि एकांगी ही थी। वे यह तो जानते थे कि उन्हें कैसी स्त्री चाहिए लेकिन स्त्री को क्या चाहिए, इस पर उनका ध्यान नहीं था l इस बात पर आम सहमती थी कि स्त्रियों को शिक्षा देनी चाहिए लेकिन उस शिक्षा का स्वरुप कैसा हों, स्त्रियों को कैसी, कितनी शिक्षा दी जाए इस पर न वह एकमत थे और न ही इसकी कोई स्पष्ट योजना ही उनके पास थी l स्त्रियाँ पढ़ना तो सीखें लेकिन वह आत्मनिर्भर  न बने l इसीलिए इस दौर में स्त्री को शिक्षित करने का ये रास्ता निकाला गया जिसमें उनको उनके घरेलू दायरे में भी रखा जा सके और वे थोड़ा घर-गृहस्थी का ज्ञान भी प्राप्‍त कर सकें। शिक्षा की ये दोहरी नीति थी।
इसी उद्देश्य की पूर्ती हेतु इस समय पाठ्यपुस्तकों की आवश्यकता महसूस हुई जिसके फलस्वरूप  पहले उर्दू और फिर हिंदी में बड़े पैमाने पर पाठ्यपुस्तकें तैयार करवाई गयीं l जिसमें लड़कियों के पाठ्यक्रम के लिए अलग और लड़कों के लिए अलग थीं l सर्वप्रथम मुसलमान लड़कियों की शिक्षा के लिए उर्दू का पहला उपन्यास ‘मिरातुल-उरुस’ की रचना डिप्टी नज़ीर अहमद ने सन् 1869 में की यह अपने समय की प्रसिद्ध पुस्तक है l इसका महत्व इस बात से साबित होता है कि तत्कालीन समय में इसे अंग्रेज़ डायरेक्टर तालीमात ने एक हज़ार रूपए के पारिश्रमिक से नवाज़ा था l और इसी उपन्यास से प्रेरणा लेकर ही “मुंशी ईश्वरी प्रसाद और मुंशी कल्याण राय ने 224 पृष्ठों का 'वामा शिक्षक' (1872 ई.) उपन्यास लिखा। भूमिका में ईश्वरी प्रसाद और कल्याण राय ने लिखा कि 'इन दिनों मुसलमानों की लड़कियों को पढ़ने के लिए तो एक दो पुस्तकें जैसे मिरातुल ऊरूस आदि बन गई  हैं, परंतु हिंदुओं व आर्यों की लड़कियों के लिए अब तक कोई ऐसी पुस्तक देखने में नहीं आई जिससे उनको जैसा चाहिए वैसा लाभ पहुँचे और पश्चिम देशाधिकारी श्रीमन्महाराजाधिराज लेफ्टिनेंट गवर्नर बहादुर की यह इच्छा है कि कोई पुस्तक ऐसी बनाए जिससे हिंदुओं व आर्यों की लड़कियों को भी लाभ पहुँचे और उनकी शासना भी  भली-भाँति हो l” आगे मिरातुल-उरुस की प्रेरणा लेकर ही “हिंदी में उस वक़्त हिंदी के कुछ लेखकों ने भी इसी ढंग की कुछ किताबें बनाई, जैसे देवरानी-जेठानी की कहानी और भाग्यवती l”[3]  
            उन्नीसवीं समय का भारतीय समाज स्त्री के प्रति विभेदपूर्ण नीति से ग्रसित था l पुरुषों को जहाँ पाश्चात्य ज्ञान-विज्ञान, दर्शन,गणित,अंग्रेज़ी आदि की शिक्षा पाने का पूरा अधिकार था l वहीं स्त्रियों को मात्र घर-गृहस्थी और आदर्श बेटी, पत्नी, बहू और माँ बनने की शिक्षा तक ही सीमित रखा जाता था l इस बात की पुष्टि लेखक द्वारा इस कथन से होती है “और किसी काम के लिए औरतों को इल्म की ज़रूरत शायद ना भी हो मगर औलाद की तरबियत(पालन-पोषण) तो जैसे चाहिए बेइल्म के होनी मुमकिन नहीं l लड़कियाँ तो ब्याह तक और लड़के अक्सर दस बरस की उम्र तक घरों में तरबियत पाते हैं और माओं की ख़ूबी उनमें असर कर जाती है l पस अय औरतों ! औलाद की अगली जिंदगी तुम्हारे अख्तियार में है l चाहो तो शुरू से उनके दिलों में ऐसे ऊँचे इरादे और पाकीज़ा ख़याल भर दो कि बड़े होकर नाम ओ नमूद पैदा करें और तमाम उम्र आसाइश में बसर कर के तुम्हारे शुक्रगुज़ार रहें और चाहो तो उनकी उफ्ताद को ऐसा बिगाड़ दो कि जूं-जूं बड़े हों, खराबी के लच॒छन सीखतें जाएँ और अंजाम तक इस इब्तदा का तस्सुफकिया करें l”[4] भारतेंदु  कि उक्ति की ‘लकड़ो को सहज में शिक्षा दी जाये’ इसी विभेदपूर्ण नीति को स्त्पष्ट करती है l
       मिरातुल उरुस का कथानक इस प्रकार है कि अकबरी और असगरी दो बहने हैं जिसमे अकबरी बड़ी और असगरी छोटी बहिन है अकबरी बचपन से ही अपनी नानी के घर  बड़े लाड़-दुलार से पली है जिसके कारण वह जिद्दी और मुहजोर हो गई है लेकिन असगरी इसका बिलकुल उलट है वो माँ-बाप की हुक्म की तामील करती है, घर में सबका ख्याल रखती है, घर के सब काम जानती है, घर की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाती है l दोनों बहनों का ब्याह एक ही घर में तय  किया जाता है जिसमे अकबरी घर कि बड़ी बहु और असगरी छोटी बहु बनती है l अकबरी अपने बदमिजाज और गुस्से के कारण उपेक्षित पात्र घोषित होती है जबकि असगरी अपनी खूबियों के कारण घर-परिवार में सराहनीय पात्र बनकर उभरती है l पूरे उपन्यास का मूल्य बिंदु है कि अशिक्षित स्त्री घर को सँभालने में कुशल नहीं होती जबकि शिक्षित स्त्री ही सर्वश्रेष्ठ होती है l  उपन्यास की भूमिका में सैय्यद आबिद हुसैन लिखते हैं कि “मिरातुल-उरूस, जो इस वक़्त आप के सामने है, नज़ीर अहमद का एक छोटा सा नावेल है जो उन्होंने छपवाने के लिए नहीं बल्कि अपनी लड़की के पढ़ने के लिए लिखा था  इत्तिफ़ाक से इसका मसौदा अंग्रेज़ डायरेक्टर तालीमात की नज़र से गुज़रा l वह इसे पढ़ कर फड़क उठा l उसी की तवज्जो से यह किताब छपी और इस पर मुसन्निफ़ को हुकूमत की तरफ से एक हज़ार रुपया इनाम मिला l”[5]
 आगे  नज़ीर अहमद अपना मंतव्य स्त्पष्ट करते हुए  लिखते हैं कि “मुझको ऐसी किताब की जुस्तजू हुई जो इखलाक ओ नसायह से भरी हुई हो और उन मामलात में जो औरतों की जिंदगी में पेश आते हैं और औरतें अपने तोह्मात और जहालत और कजराई की वजह से हमेशा इनमें मुब्तिलाए-रंज ओ मुसीबत रहा करती है, इनके ख़यालात की इस्लाह और उनकी आदात की तहज़ीब करें और किसी दिलचस्प पैराये में हो जिससे उनके दिल न उकताय, तबीयत न घबराय l मगर तमाम किताब खाना छान मारा ऐसी किताब का पता ना मिला l तब मैनें इस किस्से का मनसूबा बाँधा l” [6]
 ‘मिरातुल उरुस’ की नायिका ‘असगरी’ एक शिक्षित  स्त्री के रूप में चित्रित की गई है जो बचपन से ही पढ़ने-लिखने का शौक रखती है इसीलिए लेखक कहता है “उसने छोटी सी उम्र में ही कुरान-मजीद का तर्जुमा और मसायल की उर्दू किताबें पढ़ ली थी l लिखने में भी आजिज़ न थी .... हर एक तरह का कपड़ा सी सकती थी और अनवाआ और अकसाम के मजेदार खाने पकाना जानती थी l”[7] अपने हुनर के कारण ही वह विवाहोपरांत अपनी ससुराल में सबकी  आँख  का तारा  बनती है l अपनी समझदारी के कारण वह, हिसाब में हुई गड़बड़ी का पता लगाती है l पूरे उपन्यास में स्त्री शिक्षा के लाभ  बताए गए हैं l पूरा उपन्यास इस बात का प्रमाण है कि किस प्रकार एक स्त्री गृहस्थ धर्म की शिक्षा लेकर उसका अपने जीवन में उपयोग कर सकती हैं या किस प्रकार एक शिक्षित स्त्री ही निपुणता से अपने गृहस्थ जीवन को सुखमय बना सकती है l
वस्तुतः उर्दू का यह पहला उपन्यास नवजागरण के दौर में मुस्लिम समुदाय में स्त्री-शिक्षा की स्थिति की यथार्थ अभिव्यक्ति करता है l स्त्रियों की शिक्षा पूरे परिवार और समाज को प्रगति के पथ पर अग्रसर कर सकती है इसे डिप्टी नज़ीर अहमद अच्छी तरह जानते थे l अत: मुस्लिम स्त्री शिक्षा की आदर्श स्थिति हेतु ‘मिरातुल-उरुस’ की रचना की गई l
       



[1]स्त्री संघर्ष का इतिहास १८००-१९९० – राधा कुमार  अनुवादएवं संपादन – रमा शंकर सिंह ‘दिव्यदृष्टि’ पृ सं.23
[2][2]रस्साकशी – वीरभारत तलवार पृ. सं. 39
[3]  रस्साकशी – वीरभारत तलवार पृ.सं.39
[4] मिरातुल-उरूस(गृहिणी- दर्पण)लेखक नज़ीर अहमद टिप्पणियाँ तथा हिंदी लिप्यंतर-मदनलाल जैन पृ सं. 22
[5] मिरातुल-उरूस(गृहिणी- दर्पण)लेखक नज़ीर अहमद टिप्पणियाँ तथा हिंदी लिप्यंतर-मदनलाल जैन पृ सं. 6
[6]मिरातुल-उरूस(गृहिणी- दर्पण)लेखक नज़ीर अहमद,टिप्पणियाँ तथा हिंदी लिप्यंतर-मदनलाल जैन पृ.सं10
[7]मिरातुल-उरूस(गृहिणी- दर्पण)लेखक नज़ीर अहमद टिप्पणियाँ तथा हिंदी लिप्यंतर-मदनलाल जैन पृ.सं36

नाज़िया फातमा जामिया, नई दिल्‍ली में शोधार्थी है। अपने विषय से बाहर जाकर भी हिन्‍दी लेखन की समाकालीन दुनिया में हस्‍तक्षेप करना चाहती है। प्रस्‍तुत आलेख उसकी बानगी है। 
उर्दू के पहले उपन्यास मिरातुल-उरुस’ के बहाने भारतीय नवजागरण दौर में मुस्लिम समुदाय में स्त्री-शिक्षा की स्थिति की पहचान करती नाज़िया फातमा की यह कोशिश उललेखनीय है। 
- वि.गौ.