Showing posts with label देहरादून. Show all posts
Showing posts with label देहरादून. Show all posts

Saturday, June 6, 2026

अवधेश कुमार की कविताएँ

 

 

 


 

अवधेश कुमार(7     - 

 

(सात जून अवधेश कुमार का जन्मदिन है।उन्होंने सृजन के लिये  बहुत सारे कला-रुपों को अपनाया ।  आज से  हम उन्हें याद करते हुए एक विशेष श्रृंखला शुरु करने जा रहे हैं। पहली कड़ी मे  1980 मे प्रकाशित उनके एकमात्र कविता-संग्रह ‘जिप्सी लड़की’ से कुछ  कविताएँ राजेश सकलानी की टिप्पणी के साथ दे रहे हैं।)

 

अवधेश का पहला और अकेला काव्य संग्रह " जिप्सी लड़की " वर्ष 1980 में प्रकाशित हुआ। तब वे मात्र 29 वर्ष के थे और अज्ञेय के चौथा सप्तक का हिस्सा बन चुके थे। देहरादून जैसे छोटे शहर के युवा रचनाकार के लिए यह बड़ी बात थी। दिल्ली के मशहूर साहित्यकारों के बीच उनकी अच्छी पहचान बन चुकी थी। धीर गंभीर संपादक अज्ञेय से वे बेझिझक मिलते थे। संग्रह की भूमिका में विष्णु खरे लिखते हैं कि हिन्दी का युवा कवि देश की सामाजिक राजनीतिक स्थितियों के कारण प्रौढ़ कविता लिखने को बाध्य होता है। छटे दशक से युवावस्था का लोप कैसे हुआ ?
यह अवधेश की  विशिष्टता है कि युवा सुलभ स्वतन्त्रता, चंचलता, जीवंतता, निश्चिंतता, आत्म निर्भरता और जोख़िम उठाने की साहसिकता जैसी प्रवृतियां  साहित्य में अपनी जगह बनातीं हैं। 
 पहली कविता " फूल, कांच, मुर्गे वगैरह " में मृत्यु सामान्य घटना बन जाती है। वे कामना करते हैं कि
 

‘ कोई मरी हुई चीज़, ताजी;
आज़ाद रहे बहुत देर तक 

रहे बहुत देर तक ज़िन्दा, 
मरने के बाद भी. ’

              यह मानवीय आकांक्षा और यह शिल्प एक जीवंत युवा ही ले कर आ सकता है। भौतिक और भावनात्मक दुनिया के बीच संतुलन , ऐंद्रिकता और सौन्दर्य दृष्टि हिन्दी कविता को एक आधुनिक और नया अनुभव देती है। इनमें किसी बड़े बदलाव की घोषणा नहीं है लेकिन  संयत उल्लास और सामाजिक लगाव का बर्ताव है। फूल, कांच और मुर्गा, ये संज्ञाएं एक जगह पर आधुनिक कला के संवेदन से रचना में मौज़ूद हैं। यह चित्रकला सदृश काव्य सौन्दर्य है।अपने दौर की कविताओं से यह भिन्नता सुखद है।
         जिप्सी लड़की काव्य संग्रह में तत्कालीन राजनीतिक आंदोलनों का सीधा प्रभाव नहीं दिखता है लेकिन ये कविताएं अपने  समाज के चरित्र और उसकी असफलताओं - निराशाओं से स्वाभाविक और गतिशील संबंध बनाए रखतीं हैं। ‘ चिरे हुए आदमी की गंध ’ या ‘चिंता की जमुहाई ’ जैसी रचनाएं इसका उदाहरण हैं। ‘चौथा सप्तक’ में प्रकाशित अपनी कविताओं से वे आगे बढ़ चुके थे। कई बार कहने के बावज़ूद उन्होने पुस्तक नहीं दिखाई जो तब बाज़ार में भी उपलब्ध नहीं थी। ( अभी हाल ही  में उसका पुन: प्रकाशन हुआ है। )

          एक कलाकार की तरह अवधेश अपने कथ्य को शान्त और सौम्य तरह से रखते हैं। वे सपना देखते हैं ('कुछ नहीं तो ')


 कुछ नहीं तो बस यही कि उस सपने में सबको 
सबके सब दिखाई दिये हों 

अपने अपने एक जैसे सपनों के साथ। 
 

‘भूख की सीमा से बाहर ’  कविता लघु फ़िल्म की तरह लगती है। इसकी गतिशील चित्रात्मकता और नाटकीयता की पृष्ठभूमि में सामाजिक विट का कलात्मक संयोजन  है। इस तरह की कविताएं (और लघु कथाएं) लिखने वाले अवधेश संभवत हिन्दी के अकेले रचनाकार हैं। उनकी लघु कथाएं और कविताएं अपनी बनावट और आंतरिक अनुशासन में एक समान लगतीं हैं। चित्रकला जैसी दृश्यात्मकता और प्रभाव अंतरधारा में महसूस होता है।
           ‘ बैलाडीला (बस्तर) : 5 अप्रेल 1978 ’ शीर्षक  कविता चौथा सप्तक के पूर्व लिखी गई थी। पहली पंक्ति ‘ तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए ’ से शुरू हो कर यहां समाप्त होती है 

  तेरी ताक़त तेरे बेइन्तिहा जुनून में है, 
तेरा बदला तेरे दुश्मन के ख़ून में है  


          संग्रह की   शीर्षक कविता ‘ जिप्सी लड़की ’ और  अन्य कई कविताएं युवोचित उत्साह और सौन्दर्यपरकता के  बेहतरीन उदाहरण हैं जिनमें उन्होंने नए मोटिफ और मानवीय प्रयोजन सलीके से पिरोए हैं। ‘जिप्सी’ शब्द भारतीय नहीं है। लेकिन कवि इस भेद के आधीन नहीं है। यह रूमानियत और सार्वजनीनता का विस्तार करता है ।यह दिलचस्प रचना है।‘ मैने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की ’ से शुरू होती रचना नाटकीय तरह से एक सान्द्र और ऐन्द्रिक अनुभव पर ख़त्म होती है -


   खुशनसीब है तू  
   ओ जिप्सी लड़की 
   तुझे मिला प्यार 
   दोनों तरह के जंगलीपन का 
              
इस एकमात्र संकलन की सभी कविताएं भाषा और शिल्प के  नएपन के कारण उल्लेखनीय हैं। आधुनिक कला का प्रभाव लिए ये कविताएं संभवत भविष्य में भी याद की जाएंगी।‘ जिप्सी लड़की’ अवधेश कुमार का एकमात्र प्रकाशित काव्य संग्रह है।दूसरे संग्रह के लिए तैयार की गई पांडुलिपि को उन्होने किन्ही निराश क्षणों में आग के हवाले कर दिया था ।यह हादसा चौदह जनवरी 1999 को उनके निधन से कुछ माह पूर्व  हुआ । उनकी बहुत सारी रचनाएं और रेखाचित्र  नष्ट हो गए। अन्य पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाएं फ़िलहाल उपलब्ध नहीं हैं।  ‘जनसत्ता’ के साहित्यिक परिशिष्ट में दिल्ली पर लिखी गज़ल शायद किसी शायर दोस्त को जबाव देने के लिए लिखी थी।
       इस संकलन में प्रकाशित 51 कविताएं संयत आवेग ,लयात्मक भाषा और अन्वेषणात्मक शिल्प के कारण ध्यान आकर्षित करतीं हैं। एक युवा कलाकार का  धैर्य ,स्पष्टता  और परिवेश से रागात्मक लगाव कविता के तत्व के रूप में इनमें मौज़ूद है। 
      ' फूल, कांच ,मुर्गा वगैरह ' के साथ चाकू, टेबल क्लाथ ,छुरी, पेड़, आदि भी सजीव पात्र हैं। अपने सजीव व्यवहार के साथ।मनुष्य के जीवन को प्रकाशित करने के लिए। - राजेश सकलानी  

 

 

  • मुक्ति एक आद्योपांत 

 

जिस तरह नदी किनारे उगी घास झुक कर 

देखती है अपना चेहरा बहते जल में।



जिस तरह यह नन्हा पक्षी अपने

 पंखों पर आसमान को तौलता है।



जिस तरह कोई फूल पंखड़ियों के ओठों से

 अपना मुंह खोलता है।



और जिस तरह इन्द्रधनुष का बोझ उतारने

 के लिए वह बदहवास तितली 

इधर उधर डोलती अपने पंख फड़फड़ाती है।



कालधारा में कौंधते हर संभव स्मृति-क्षण के भीतर

 आद्योपांत, जहां तक पहुंच सकता हूं मैं 

लौकिक-अलौकिक संदर्भों में और तब तक

 प्रयत्नपूर्वक भी कि जब तक प्रेम का यह अनुभव

 संस्कार नहीं बन जाता ।



उन सब की तरह मैं भी जल में, आकाश में

 सुगंध में और रंग में तुम्हारी स्वतन्त्रता के प्रति

 अपनी मुक्ति को खोजता हूं । 

 

 

 

 

बैलाडीला (बस्तर) : ५ अप्रैल १९७८



तू थी अबला पर नहीं थी बलात्कार के लिए 

तू था अशक्त पर नहीं था अत्याचार के लिए

               अखबारों में जैसी तेरी ख़बर है 

            नहीं मानता वो ही असली खबर है



तू हुई लोकसभा के लिए, तू हुआ विधानसभा के लिए

 तुम्हारी मौत की संवेदना हुई सिर्फ आमसभा के लिए 

            हर सभा में हरेक कोई तेरी तरफ है 

           असल क्या पता किसकी मंशा किधर है



तू था बदले के लिए, तू थी वासना के लिए 

तुम दोनों थे किसी की हित-साधना के लिए

           उसकी मुट्ठी में पैसा है सारी पुलिस है 

          उसकी नजरों में तू असहाय मुफलिस है

उठ कि तू है मर्द, है हथियार के लिए 

उठ कि तू है औरत, नये संसार के लिए

       तेरी ताकत तेरे बेइन्तिहा जुनून में है

       तेरा बदला तेरे दुश्मन के खून में है 

 

 

मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 

 

सुबह-एक हल्की-सी चीख की तरह

 बहुत पीली और उदास  धरती की करवट में

 पूरब की तरफ एक जमुहाई की तरह 

मनहूस दिन की शुरुआत में खिल पड़ी।



मैं गरीब, मेरी जेब गरीब पर इरादे गरम 

लू के थपेड़ों से झुलसती हुई आंखों में

 दावानल की तरह सुलगती उम्मीद ।



गुमशुदा होकर इस शहर की भीड़ को 

ठेंगा दिखाते हुए न जाने कितने नौजवान 

कब कहां चड़े बसों में और कहां उतरे

 जाकर : यह कोई नहीं जानता।



कल मेरे पास कुछ पैसे होंगे 

बसों में भीड़ कम होगी 

संसद की छुट्टी रहेगी

 सप्ताह भर के हादसों का निपटारा हो चुकेगा 

हो चुकेगा सुबह-सुबह 

अखबारों की भगोड़ी पीठ पर लिखा हुआ।



सड़कें खाली होने की हद तक बहुत कम

 भरी होंगी: पूरी तरह भरी होगी दोपहर

 जलाती हुई इस शहर का कलेजा।



और किस-किस का कलेजा नहीं जलाती हुई।

 यह दोपहर आदमी को नाकामयाब करने की

 हद तक डराती हुई उसके शरीर के चारों तरफ।



मिलो दोस्त, जल्दी मिलो

 मैं गरीब, तुम गरीब

 पर हमारे इरादे गरम । 

 

 

 प्यार

 

बहुत बार न जाने कितनी बार 

टूट कर चीत्कार के होने से पहले ही 

बिना किसी प्रार्थना के बिना किसी मूकता और

 बिना किसी संवाद के

 बिना किसी सरलता बिना किसी अवसाद के

 उड़ते हुए आकाश में ठहरते हुए अपनी उड़ान में

 एकाएक सोच में ठिठकते हुए बार-बार ।



बहुत बार : न जाने कितनी बार 

जब-जब ठहरा मैं अपनी उड़ान में 

मुझे थामे रहा शून्य आकाश में - वही प्यार ।



जब-जब अटका मैं अपनी चीत्कार में 

दम साधे खड़ा रहा वह मेरे रोने के क़रीब-करीब । 

 

 

 

जिप्सी लड़की : एक

 

मैंने तुझे देखा ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की

 पेड़ों के जंगल में 

और आदमियों के जंगल में भी !



लेकिन तू बनी रही हम सब की इच्छा ही 

और उलझ पड़ी यह इच्छा

 आदमियों के जंगल से कभी और कभी 

पेड़ों के जंगल से ।



तूने फेंका अपना लाल रुमाल 

दूसरे जंगल में जब कभी : मैंने लोक लिया 

उसे अपने जंगलीपन में।



मैंने देखा तुझे कभी दूसरे के जंगल में 

और अपने जंगल में कभी ।



खुशनसीब है तू 

ओ खूबसूरत जिप्सी लड़की 

तुझे मिला प्यार

 दोनों तरह के जंगलीपन का । 

 

 

असंभव वापसी

चीन से लौट कर कहा विदेश मंत्री ने 

अपने देश में: कि-

 'जल्दी से जल्दी लौटे चीन वापस बीएतनाम से ।'



गांव से घबरा कर शहर भागे 

गिरधर गोपाल से गांव की माटी ने

 कहा पुकार के-कि वह एकदम से लौट आए अपने गांव ।



फूल की टूटी हुई पंखुरियों से कहा

 बचे हुए फूल ने तड़प कर 

कि लौट आएं वे उसके पास उड़कर सुदूर से ।



लेकिन पंखुरियां नहीं लौटीं वीएतनाम से

 शहर से चीन 

पतझर से गिरधर गोपाल । 

 

 

भूख की सीमा से बाहर



जब तक लोहा काम करता रहता है उसमें जंग नहीं लगता।

 जब तक मछली पानी में है उसे कोई नहीं खरीद सकता।

दिल-टेबल-क्लॉथ नहीं है-

जो तुम उसे हर किसी के सामने बिछाते फिरो ।



यह कहते हुए मेरे दुनियादार और अनुभवी मेजबान ने 

खाने की मेज पर छुरी के साथ

 एक बहुत बड़ी मछली ला कर रख दी और बोला- कि 

आइए, इसे खाते हैं और भूल जाते हैं 

थोड़ी देर के लिए उन शब्दों को 

जो भूख की सीमा में नहीं आते । 

 

 

चिरे हुए आदमी की गंध

 

एक दुःस्वप्न आरे की तरह चीर गया मुझे 

चिरे हुए आदमी की गंध फैल गई गली में 

अनदिखे बसन्त की तरह।



चीर गया एक पूरा दिन मेरी गली को

 चिरी हुई गली की शक्ल का हुलिया

 कल फिर दुरस्त होगा दुनियादारी में। 

सवारी में, तिजोरी में, बोरी में, व्यापार में 

भावताव में, बचाव में, वार में।

नोट कर लेने लायक नहीं थे : इतने बड़े नहीं

 थे दुःस्वप्न-लिख लेने लायक नहीं थे। 

छोटे-छोटे ही थे याद रहने लायक 

दो पैसे-चार पैसे के लाला के उधार की तरह।



बड़े व्यापार की तरह छोटे-छोटे दुःस्वप्नों की चिंता

 नहीं करनी चाहिए थी मुझे 

जब कि गली में अनदिखा बसन्त आया हो ।



पर जो एक चिरी हुई गंध 

गली के पूरे हुलिये पर छाई है 

बच पाना मुश्किल है उससे-

दिखते हुए बसत में भी पहुंचकर ।

 

 

फूल, कांच, मुर्गा वगैरह

 
डाली से टूटने के बाद यह फूल 

इतने दिन तक खिला रहा।



टूटने के बाद जरा भी नहीं खिला मैं।



कांच के ऊपर इतनी धूल जमने के बाद भी 

चमक ज्यों की त्यों बनी रही कांच पर



अपनी धूल झाड़ने के बाद भी मैं रद्दी हो गया।



गरदन कट जाने के बाद भी मुर्गा दौड़ता रहा 

अकड़ के साथ - खून के फौव्वारे छोड़ता हुआ

 इस बंद कमरे में।



लिखे जाने से पहले शब्द कितने स्वतंत्र थे

 लिखे जाने के तुरंत बाद वे मेरी बाती मृत्यु हो गए।



चुपचाप मैं कोशिश करने लगा बनने की फूल

 कांच, मुर्गा और शब्द वगैरहः कोई मरी हुई

 चीज ताजी; आजाद रहे बहुत देर तक



रहे बहुत देर तक जिंदा, मरने के बाद भी।




 

 

 

Monday, June 1, 2026

जयप्रकाश ‘नवेन्दु’ और उनकी कुछ कविताएं

 

 

 

  

 

 


 (जयप्रकाश ‘नवेन्दु’ ने विपुल लेखन किया है। देहरादून की सड़कों ने सवेरे  उगते हुए सूरज के साथ उन्हें विचारलीन घूमते हुए देखा है। एक वक्त था जब वे पूरी तरह कविता में डूबे हुए थे।फिर वे कविता से बाहर निकल कर अलौकिक अनुभवों की  राह पर चल निकले। लेकिन कविता उन्हें बार-बार इस दुनिया में ले आती है।उनकी इस यात्रा पर कवि राजेश सकलानी एक नज़र डाल रहे हैं। साथ में उनकी कुछ कविताएं भी हैं)

 

मई 25 , 2026 की दोपहर को जब तापमान 38 डीग्री था

कवि नवेन्दु ने अपने मित्रों को बीच शहर के तिराहे पर स्थित एक छोटे से पार्क में अपनी 130 वीं पुस्तक जारी करने के लिए आमंत्रित किया । गैर साहित्यिक ये मित्र भिन्न राजनीतिक विचारों को मानने वाले हैं और कंडवाल जी की टी शाप पर " चौपाल " लगाते हैं। मौसम चाहे अच्छा हो या ख़राब बहस मुबाहिसा दिन भर जारी रहता है।

फ़कीर तबियत के नवेन्दु की प्रकाशित 130 पुस्तकों में 75 काव्य संकलन हैं। अक्सर 3 ,4 या 5 संकलन एक साथ प्रकाशित होते रहें हैं। कविता ही उनका जीवन है। आठ सितंबर 1955 में जन्मे नवेन्दु गांधी इंटर कालेज से अवकाश प्राप्त हैं।

उन्होने अपने लिए कुछ भी जमा नहीं किया। न विवाह किया और न घर ही बनाया। जैसे वैन गाग के साथ लियो का नाम जुड़ा है। ठीक इसी तरह नवेन्दु के साथ उनके एम ए पास छोटे भाई विक्रम सिंह हैं। शायद ही उनके जैसा कोई दूसरा उदाहरण होगा। अपने भाई की देखरेख करते हैं। न विवाह किया और न नौकरी। अपने बाल्यकाल से बड़े भाई के सहयोगी की तरह जीवन बिताया है।यह सब वे निर्द्वन्द और सन्तुष्ट हो कर करते हैं। घर-बार चलाना और साहित्य पढ़ना। उन्हे घूमते फिरते भी कभी नहीं देखा। विनम्र और प्रसन्नचित्त हैं।

" बंद होठों में ज़हर " पुस्तक में उनकी श्रंखला -बद्ध पांच आत्मकथाओं का समवेत है। बाकर नंगला, जिला बिजनौर (तत्कालीन) उनका जन्मस्थान है। नगीना धामपुर मिलाकर इस पूरे इलाके का जनजीवन बेहतरीन तरीके से इसमें व्यक्त हुआ है। आपके पिता साधारण किस्म का काम करते थे। छोटी उम्र में एक दुर्घटना में मां की मृत्य हो गई। वे मूलत: प्रेम के कवि हैं। उच्च पढ़ाई करने देहरादून आए। वर्ष 1980 में पक्की नौकरी लगने से पहले छुटपुट शिक्षण कार्य किया। कामना (1980),एकांत वीणा (1981) और घनी धूप के दिन (1985) की कविताओं पर छायावाद और अज्ञेय का प्रभाव है। कोर्स की कविताओं के ज़रिए यह प्रभाव आया था। फ़िर वाम साहित्य से परिचय हुआ तो

" कविताएं 1991" प्रकाशित हुई।

पत्र पत्रिकाओं में कुछ कविताएं छपीं।

" ख़ामोशी बुन रही खतरा " वर्ष 2000 संकलन का ब्लर्ब लीलाधर जगूड़ी जी द्वारा और " गंगा वाले देश का दुखांत "वर्ष 2001

का ब्लर्ब मंगलेश डबराल जी द्वारा लिखा गया था।

तब तक नवेन्दु की पहचान दलित कवि के रूप में नहीं थी। बाद के संकलनों में वर्ण व्यवस्था के प्रति गहरा क्षोभ देखा जा सकता है।

वे साहित्यिक गोष्ठियों से दूर रहते हैं लेकिन पूरा दिन आमजनों के बीच विशेषकर चाय की दुकानों पर समय बिताते रहे। बिना कुछ कहे अपने चिंतन में लीन रहते। कभी अपने दिव्य अनुभवों का ज़िक्र करते। " महर्षि " उपनाम धारण किया। एक पंथ की परिकल्पना की। समाज ऐसा हो कि कोई भेदभाव न रहे। सिर्फ सौहार्द दुनिया में रहे। प्रेम और मान के अलावा नवेन्दु को और कुछ भी नहीं चाहिए। वह भी पूरी दुनिया के लिए।

अपने लिए तो उन्होने कोई सामान नहीं जुटाया है। किराए के घर में रहतें हैं। देहरादून से उन्हे गहरा इश्क है।

नवेन्दु जी की जीवन चर्या बहुत अलग तरह की रही है। वे खूब पैदल चलते हैं बिना दाएं बाएं देखे। वे हमेशा किसी चिंतन मुद्रा में उन्हे देखा जाता। सुबह सात बजे बिना चाय नाश्ता के लिए डी एल रोड स्थित घर से चार किलोमीटर दूर गांधी स्कूल के लिए निकल पड़ते। दोपहर दो तीन बजे टिप टाप रेस्त्रां में दिन की पहली चाय पीते। कुछ खाने पीने की बात उनके दिमाग में नहीं। किसी को पता नहीं होता कि उन्हे आज कहीं जाना है। कोई न कोई दोस्त उन्हे पैदल चलते देख लेता। देर शाम को घर पर पहुंचते। फ़िर भाई विक्रम खाना बनाता।तो उनका पहला भोजन रात को ही संभव हो पाता। वह मांसाहार

के बेहद शौकीन हैं।

उनके खुद के कथनानुसार वे सुबह उठते ही किसी संत कवि या दार्शनिक के विचारों पर सोचना शुरू करते हैं। पूरा दिन इसी में निकल जाता है। सुकरात, गुरुनानक जैसे महापुरुषों की बीसिंयों जीवनी पढ़ चुकें हैं। उन्होने शंकराचार्य की जीवनी भी पढ़ी है।कहते हैं मुझे जातिवादी मानवता घृणा नापसंद है।मनुष्य के उत्थान का कोई भी साहित्य उन्हे प्रिय है। यही उनके दिमाग में चलता रहता है।

वे विशेष तौर पर इंटर कक्षा के कोर्स की कविता का उल्लेख करते हैं जिसे वे हमेशा याद रखते हैं।

 

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है।देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से,

सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से

जाति भेद की,

धर्म-वेश की

काले गोरे रंग-द्वेष की

ज्वालाओं से

जलते जग में

इतना शीतल बहो

कि जितना मलय पवन है,

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है

नए हाथ से वर्तमान का रूप संवारो

नई तूलिका से चित्रों के रंग उभारो

नए राग को नूतन स्वर दो

भाषा को नूतन अक्षर दो

युग की नई मूर्ति-रचना में

इतने मौलिक बनो कि जितना स्वयं सृजन है॥

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है॥

(द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी)

नवेन्दु की पारिवारिक और सामाजिक पृषठभूमि ग्रामीण थी। स्त्री-पुरुष हाथ का काम करते थे। जीवन के साधन काम चलाऊ थे लेकिन आपसी जीवन परस्पर गुथा हुआ था। पिता मजदूरी करते थे। ऐसी जगहों में परस्परता और कलह सघन रूप में बनी रहती है। युवजनों के लिए प्रकृति का खुला मैदान उपलब्ध होता है। मातृविहीन बालक के लिए ये कठिन समय था। छोटी मोटी ज़रूरतों के लिए परेशान होना पड़ता है। पढ़ने लिखने में कुशल,सक्षम और संवेदनशील युवा के लिए ये संकल्प के दिन थे। इसी दौर में एक साहित्यकार का उदय हो रहा था।

देहरादून में एम ए,, बी एड करना और फ़िर अध्यापककी नौकरी पाना एक बड़ी राहत थी। अवधेश कुमार, हरजीत, अरविंद शर्मा, नवीन नैथानी, राजेश सेमवाल, सुभाष पंत, ओमप्रकाश वाल्मीकि, राजेश सकलानी, सुखवीर विश्वकर्मा, जितेन ठाकुर, राजेन्द्र गुप्ता, सूरज प्रकाश, सुरेश उनियाल, मनमोहन चढ्ढा व अन्य बहुत सारे साहित्यिक मित्र साथ थे। लेकिन प्राय: बहसों में सिर्फ़ हल्के से मुस्करा कर रह जाते।

शहर की भिन्न सड़कों पर उन्हे विचरते हुए देखा जाता। कभी किसी व्यस्त जगह पर लोगों को सिर्फ़ देखते रहते। रोल किया हुआ जनसत्ता अख़बार उनकी हथेली सें कसमसाता रहता। (वह पसीने से काला पड़ जाता )

दुनिया के अंतर्विरोधों और भुगती हुई उपेक्षाओं से गुज़र कर फ़िर प्रेम की आंकाक्षाओं को दीप्त करने की कोशिशें जारी रहतीं।

तो मई माह की इस तपती धूप में वे अपनी 130 वीं पुस्तक को लोकार्पित करते हैं। इसका शीर्षक है

"अनहद पंथ " । सार रूप में इसके सोलह बिन्दु हैं।

यही कि पूरी दुनिया में प्यार और सम्मान का राज कायम हो।

 -राजेश सकलानी 

   

जयप्रकाश ‘नवेन्दु’ की कुछ कविताएं 

 

उदासी के बिना.

 

उदासी के बिना रहना बहुत चाहता हूँ लेकिन

बाहरी और भीतरी कुछ ऐसा दबाव जी पर रहता है कि

उदासी के बिना जिसे सहते नहीं बनता

 

कितनी हँसी के बीच फूटते ठहाके कितनी सभाओं में परिचित अपरिचित

 कितनी बार रोज की दोहराई जाती निरर्थक बहसें

जिन्हें सुनते जो जी में उठता है उसे कहने की कोशिश करता हूँ।

पर कहते नहीं बनता.

 

 

 

 

 

कल

 

कल तुम्हारे लिए

यह एक कविता होगी

 

जबकि मैं शब्दों को चीर कर

अर्थ की जगह

अपने को भर रहा हूँ

 कल जीने की कोशिश में

आज मर रहा हूँ.

 

 

 

उछाल.

 

उछाल दिया गया हूँ

समय और शब्दों के हाथों

ऊपर आकाश में

डाल दिया गया हूँ

 

पृथ्वी अब मेरा परदेश है

शरीर अब मेरा परदेश है

मेरा मैं अब मेरा परदेश है

 

जिन के बाहर अब मैं

सदा के लिए निकाल दिया गया हूँ.

 

 

 

 

 घर

 

जी हाँ

मेरा यह घर है

 

न कोई छत

न कोई दीवार

 न कोई दर है

 

जिसके भीतर

हवा निर्बाध बहती

पंछी दिन भर

मुक्त स्वर में चहचहाते हैं

और चन्द्रमा

रात को अपनी शीतल

चाँदनी बिखेरता

 

और जिसको

 तूफान में टूटने और

न उड़ने का डर है

 

यह मेरा घर है.

 

 

 

 

शब्द.

 

मन जिस पल

 शब्द छोड़ता है

सबसे पहले मुझे तोड़ता है

 

मेरे टूटते ही

 

नीले आलोक का

 फव्वारा छूट जाता

 जो दूर तक फैला अन्धकार फोड़ता है

 

क्षणभर का

 मेरा विध्वंस ही

 

मुझे नई शक्ति दे जाता

 कण कण मेरा

वह फिर-फिर

जोड़ता है.

 

 

 

अंगार.

 

जितनी बार भी हवा का हमला हुआ यह अंगार कुछ अधिक ही दहका

 जिजीविषा इसकी उम्र के साथ घटी नहीं और बढ़ती ही गई।

 

 

 

एक नई कविता.

 

सामने से चली आती

वह दिखती रही देर तक

सहसा आहट पा चौंकी

 और बीच राह से

मुड़कर भाग गई

लाज से सिहरती सी.