Showing posts with label विज्ञान. Show all posts
Showing posts with label विज्ञान. Show all posts

Friday, July 1, 2022

द्वंदात्मकता ही वैज्ञानिकता है

    

अवैज्ञानिकता के कारण चारों ओर फैली सामाजिक अफरातफरी, राजनैतिकअराजकता, व्‍यवहारिक झूठ, अंधविश्‍वास, हिंसकता, आत्‍ममुग्‍धता, अहंकार, लोभ-लालच आदि सेहर वक्‍ त बेचैन रहने वाले एवं ऐसी गडबडों को ठिकाने लगाने के लिए जिद्द की हद तक बहस मुबाहिसों में उलझे रहने को उतारू भाई गजेन्‍द्र बहुगुणा ने पिछले कुछ समय से यह तय किया है कि वैज्ञानिक समझदारी केेप्रसार केे लिए अब वे कुछ गम्‍भीरता से काम करेंगे। इसी समझ के साथ पिछले दिनों उन्‍होंने कुछ मित्रों को जुटाकर कुछ जरूरी बातें शेयर करने का प्रयास किया था। वे बातें कुछ व्‍यवस्थित तरह से समाज के बीच जायें, इधर वे उसी की तैयारी में जुटे हैं। इस बात को ध्‍यान में रखते हुए ही उन्‍होंने एक छोटी सी टिप्‍पणी मुझे शेयर की थी। उनकी अनुमति से वह टिप्‍पणी इस ब्‍लाग के पाठकों के साथ शेयर है। 



गजेन्‍द्र बहुगुणा साहित्‍य,इतिहास, राजनीति एवं विज्ञान के अध्‍येता हैं। पेट्रोलिय इंस्‍टीटयूट में वरिष्‍ठ तकनीकी अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे हैं। खेतीबाड़ी एवं बागबानी में इनका दिल रमता है।  

वि.गौ.



गजेन्‍द्र बहुगुणा

vigyan-विज्ञान सत्य का वास्तविक रहस्योद्घाटन करता ही जा रहा है ! विज्ञान पूर्वाग्रह, leaning, preconceived idea से परे observe किए आंकड़ो के आधार पर निष्कर्ष निकलता है ! जहां datapoint या प्रयोग या नमूने  के आंकड़े  नहीं होते ! वहाँ उपलभ्द जानकारी के आधार पर निष्कर्ष निकले जाते हैं ! ब्रह्माण्ड-Universe, जीवन का जन्म कैसे हुआ ?? इस पर बहुत से आंकड़े उपलभ्द नही हैं ! इसीलिए विज्ञान ज्ञात जानकारी के आधार पर prediction, निष्कर्ष निकालता है ! 

सबसे बड़ी बात विज्ञान मे विश्वास रखने वाले कठमुल्ले या fundamentalist नहीं होते ! वे observe किये गये तथ्यों के आधार पर अपने विचार बदलने को तैयार रहते हैं !  आधुनिक विज्ञान के स्तम्भ चार्ल्स डार्विन, आइज़ेक न्यूटन हों या एल्बर्ट आइन्स्टाइन सभी ईश्वर को किसी प्रकार, किसी रूप से मानते थे ! और कई सालों तक अपने शोध को जनता के बीच लाने मे हिचकिचाते रहे ! चार्ल्स डार्विन की पत्नि ईश्वर की सत्ता मे अंधभक्ति जैसा घनघोर विश्वास करती थी ! जब डार्विन ने पाया कि उनका शोध ईश्वर कि ईक्षा के विरुद्ध प्राकृतिक चुनाव कि ओर ले जा रहा है ! तो कई सालों तक उन्होने अपनी रिसर्च को छापा नहीं, यह सोचकर कि घर मे क्लेश हो जाएगा  ! पर जब उनके दूसरे साथियों, जूनियर शोधकर्ताओं ने वह बात सार्वजनिक करना प्रारम्भ कर दिया तो डार्विन को अपनी  " नयी प्रजातियों द्वारा प्राकृतिक चुनाव " वाली रिसर्च प्रकाशित करनी पड़ी ! और विश्व को पता चला कि नयी प्रजातियाँ कैसे पैदा हो जाती हैं ! इसी प्रकार अल्बर्ट आइन्सटाइन भी ब्रह्मांड के चार बलों -जिनसे दुनिया टिकी और चलती है-स्ट्रॉंग न्यूक्लियर फोर्स, वीक न्यूक्लियर फोर्स, एलेक्ट्रो -मेग्नेटिक फोर्स और गुरुत्वाकर्षण-gravitational Force को एकीकृत करके एकएकीकृत समीकरण बनाना चाहते थे , तो बार-बार उसमे ऐक constant डालते रहे ! और फेल हो गये ! Einstein सपने मे भी सोच नहीं पाये कि ब्रह्माण्ड मे कुछ भी स्थिर नहीं है ! हर कण-कण गतिशील और चलाएमान है ! सम्पूर्ण ब्रह्मांड फैल रहा है ! इसके गृह, ऐक दूसरे से दूर भागते जा रहे हैं ! आइन्सटाइन कहते थे ! God doesn't play dice ! यानि ईश्वर पासे नहीं खेलता .... और यह अस्थिर नहीं हो सकता ! इस तरह से आइन्सटाइन विश्व-ब्रह्मांड  को जोड़कर चलाने वाले बलों को ऐक करके नया समीकरण नहीं दे पाये ! कुछ हद तक इस काम को आगे बढ़ाने के लिए  1979 में पाकिस्तानी वैज्ञानिक डॉ. अब्दुस सलाम को फिजिक्स के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया क्योंकि पार्टिकल फिजिक्स में उनके बेहतरीन काम की वजह से ही ‘हिग्स बोसॉन’ की खोज सम्भव हुई, जिसे ‘गॉड्स पार्टिकल’ कहा जाता है। नोबेल पुरुस्कार विजेता आइन्सटाइन गलत साबित हुवे !  उसके बाद स्टीफन हव्किंग जैसे वैज्ञानिक ने तो कहा कि ब्रह्मांड के जन्म के लिए किसी ईश्वर की जरूरत ही नहीं है ! अपनी पुस्तक मे हाकिंग ने इन बातों का जिक्र किया है ! चर्च ने गैलीलियो के साथ हुए दुर्व्यवहार के माफी भी मांगी है ! पर भारत के किसी धार्मिक परंपरा के मत-मन्दिर परम्परा ने आजतक चरवाक या अनीश्वरवादियों पर हौवे जुल्म के लिए कोई माफी नहीं मांगी ! कार्ल मार्क्स ने जिस dailectic  materialism principle द्वंदात्मक भौतिकवाद सिद्धान्त का प्रतिपादन किया ! सभी वैज्ञानिक उस सिधान्त का अनुसरण करते हैं ! इसीलिए वैज्ञानिक मूलतः 
वामपंथी ही होते हैं ! वे नए निष्कर्षों को स्वीकार करने मे कठमुल्लपन नहीं दिखाते ! द्वंदात्मक भौतिकवाद नए तथ्यों को अपने पुराने निष्कर्ष मे जोड़ता जाता है !  हर बार   " Thesis + Anti Thesis = Synthesis " के आधार पर नए प्रतिवादन जुडते जाते हैं और नए  प्रतिपादन स्वीकार कर लिए जाते हैं ! इसीलिए विज्ञान दिशा भी दे रहा है ! और विजेता भी है ! विज्ञान ही भविष्य भी तय करेगा ! कठमुल्ले कहीं भी हों, उनका भविष्य अंधकारमय है ! जनता कभी न कभी उनको नकार ही देगी !