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Friday, April 10, 2026

ऋतु डिमरी नौटियाल की कुछ कविताएं

 

 

 

 



 (  ऋतु डिमरी नौटियाल की रचनाओं में अपने समकाल की मुश्किलों, विडंबनाओं और प्रतिगामी प्रवृतिओं  के विरुद्ध हस्तक्षेप करने की विकलता गौर करने लायक है। इसी  कारण उनमें राजनैतिक नैराश्य से जूझने का संकल्प दिखता है।और थोड़ी ज़ल्दबाजी भी । लेकिन यह तय है कि उनके संघर्ष की जगह रचना की दुनिया है।वे शोषण की प्रवृतियों और उसकी व्याप्ति को ख़ूब पहचानतीं हैं। पित्रसत्तात्मकता और सामाजिक  वंचना का प्रतिकार
उनकी मूल प्रतिज्ञा है। - राजेश सकलानी  )

 

 

1. हारे हुए लोग

 

 

वो पीले पत्ते की तरह झड़ते हैं 

और पेड़ को देख रो पड़ते हैं 


वो बन रहे होते हैं 

और रास्ते में ही बिगड़ पड़ते हैं 


इतने अस्थिर

कि ढकेल दिए जाते हैं

और लक्ष्य तक 

पहुंचने से पहले 

कहीं और निकल पड़ते हैं 



वे बेल की तरह 

चलते हुए में रुके होते हैं 

और रुके हुए में चलते हैं 



शब्द से नि: शब्द तक

नि: शब्द से शब्द तक


एक गति में , 

स्व क्षति में हमेशा 



हारे हुए लोग

 मुझे कवि लगते हैं .



2. फरवरी 


जनवरी तक ये 

संतरे का पेड़ नहीं था,

यहां एक लम्बी सूखी टहनी थी,


ग्वाला इससे गाय हंकाता 

या किसी चूल्हे की भेंट चढ़ जाता 


फरवरी 

तुमने इसे नई टहनियों और 

पत्तियों से भर दिया है 


तुमने इसका अर्थ बदल दिया है 

इंद्रियों को प्रिय 

अब ये दृश्य और गंध है ,

 उम्मीद है इनके हृदय में 

और फल की कामना है



फरवरी 

में उभरती है

गाजा की याद.



3. कुर्सी - दृश्य 


पहले किताबों से भरी होती थी

लाइब्रेरी की अलमारियों की ताकें 


फिर बैठने की वजहें बदलने लगीं 

तदनुसार बैठने की प्रक्रियायें


एक दिन 

लाइब्रेरी की अलमारी की एक ताक के कोने से 

एक कुर्सी निकली


 और एक आदमी किताब पे बैठकर 

 कुर्सी पढ़ रहा था


  कुर्सी एक महामारी की तरह 

  फैल रही थी


   एक आदमी और उसके बाद कई आदमी 

    न्याय पे बैठकर 

    कुर्सी लिखने लगे 


     एक बच्चा कागज पे लिख रहा था

     "एक कुर्सी के मुंह के भीतर 

      शेर के दांत थे "

     


 4. मुलाक़ात. 


वो बस अड्डे में मिलते या

रेलवे स्टेशन में ,

जब एक दूसरे के शहर से गुजरते 


किसी पार्क में 

नजदीक बैठकर 

बातें करते 



किसी धूप में खुल जाते

लोकतांत्रिक संवाद ,

 मेटाफर की तरह लिखे जाते

  उपन्यास के चैप्टर या

 अप्रकाशित कविताओं से 

  होती मुलाक़ात 



   दोनों एक दूसरे को 

   घर में आने का

   निमंत्रण नहीं देते कभी,

   स्त्री और पुरुष 

    परवश.

   

  

   5. भूख की लिपि 


वियतनाम से सीरिया तक

सोमालिया से गजा तक

बन रही एक वैश्विक भाषा


हमारे समय का प्रतिनिधित्व करती

 बन रही एक लिपि.

Monday, August 8, 2022

नमक की बूंदें


स्वाद की सबसे आधारभूत जरुरत की जब भी बात होगी, नमक के जिक्र के बिना वह बात पूरी नहीं हो सकती. बल्कि ऐसी कोई भी बात तो नमक का जिक्र करते हुए ही शुरु होगी. इस तरह से देखें तो जीवन के सत को यदि कोई परिभाषित कर सकता है तो निश्चित ही वह तत्व नमक हो सकता है. ॠतु डिमरी नौटियाल की कविता में यह नमक बार बार प्रकट होता है. उदासी के हर क्षण में स्त्री मन की भाव दशा को रेखांकित करने के लिए ॠतु उसको सबसे सहज और सम्प्रेषणीय प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करती है. अपनी उपस्थिति से स्त्री और पुरुष के भीतर को प्रभावित कर देने की क्षमता संपन्न नमक की यह भी विशेषता है कि वह अपने सबसे करीबी के कंधों में टंगे थैलों में कुछ गैर जरुरी किताबों के साथ बैनर पोस्तर हो जाना चाहता है. प्रस्तुत है ॠतु की कुछ कविताएँ.

 
ऋतु डिमरी नौटियाल
शिक्षा : स्नातकोत्तर (सांख्यिकी) 
कृतित्व :

समर प्रकाशन द्वारा (प्रकाशानाधीन) सौ कवियों की कविताओं के साझा संग्रह में कविताएँ सम्मिलित

आजकल पत्रिका के जून अंक में कविताएँ प्रकाशित

इंदौर समाचार दैनिक पत्र में कविताएँ प्रकाशित 
मोबाइल नंबर : 9899628430


 

ॠतु डिमरी नौटियाल 




भार 

 

 जब तक हवा रही भीतर

 फेफडों में  आक्सीजन बनकर

 उड़ती रहीं गुब्बारे के मानिंद,

 

अब शून्य है

लेकिन भारी  इतना

कि उठने ही न दे

मानो कैद हो गयी देह

कोठरी में

 


निशान

 

नदी!!

मरने के बाद

गहराई छोड़ जाती है;

 

आंसू!!

ढुलकने  के बाद

लकीर छोड़ जाते हैं;

 

भाषा!!

विलुप्‍त कर दिये जाने के बाद भी

इतिहास छोड़ जाती है;

 

विछोह !! 

छोड जाता है स्मृतियाँ

उस घाव की तरह

जिसे कुरेद कुरेद के

हरा किया जा सकतता है प्रेम

 

कहाँ खतम हो पाता है सब कुछ यूंही  

 

   

पूरक

 

मेरा तुमको देखना

तुम्हारा मुझको देखना

कभी एक सा नहीं

 

मेरे भीतर के जंगल में

तुम बोन्साई ढूंढते हो,

कतरते हो एक एक टहनी

संभावित बाग के लिए

 

जब तुम पतझड़ बनते हो

मैं पेड़ बन जाने की कामना करती हूँ

जिसमें तुम अपना बसंत आना भी देख सको

 

 

जब मैं रेगिस्तान में 

ढूढती हूं प्‍यास

छायाएं भ्रम खडा कर देती हैं

तुम भी उस वक्‍त मेरे भीतर

बो देते हो कैक्टस

 

जब तुम अपने भीतर के समन्दर में

मोती होने का दावा करते हो

मुझे मिलती हैं सिर्फ नमक की बूंदें

प्यास बुझाने की झिझक में

जिन्‍हें मीठा कर देती हूँ मैं

 

 


 नमक

 

उतर गया शरीर का

सारा नमक

बचा रह गया

फिर भी आंसुओं में,

एक कतरा

सहेज लेना चाहती है

फिर से अपने भीतर