Monday, June 14, 2010

क्या यह मेरे आग्रह ही हैं

पिछले दिनों भारत भूषण अग्रवाल सम्मान से सम्मानित कवियों पर वरिष्ठ आलोचक विष्णु खरे जी से असहमति दर्ज करते हुए मैंने अपने आग्रहों का जिक्र करते हुए उस प्रव्रत्ति की ओर ध्यान आक्रष्ट करना चाहा था कि आलोचना कैसे आज शार्ट लिस्टिंग करने की एक युक्ति होती चली जा रही है। संदर्भ के तौर पर कुछ युवा कथाकारों को लेकर मचाए गए हल्ले का भी जिक्र किया था कि समकालीन कहानियों पर लिखी जा रही आलोचनात्मक टिप्पणियां तो आज कोई भी उठा कर देख सकता है-जिनमें किसी भी रचनाकार का जिक्र इतनी बेशर्मी की हद तक होने लगा है कि यह उनकी दूसरी कहानी है, यह तीसरी, यह चौथी और बस अगली पांचवी, छठी कहानी आते ही उनकी पूरी किताब, जो अधूरी पड़ी है, पूरी होने वाली है। बाजारू प्रवृत्तियों से ओत-प्रोत वह चलताऊ भाषा जिसमें क्रिकेट की कमेंटरी जैसी उत्तेजना है।
आज सुबह फ़िर वैसी ही एक प्रस्तुति अपने प्रिय ब्लाग सबद में देखने के बाद तुरंत प्रतिक्रिया करने का मन हुआ था और वह की भी। पर अफसोस की सबद जैसा जनतांत्रिक-सा दिखता मंच उस प्रतिक्रिया को प्रकाशित करने से गुरेज कर गया और उसे प्रकाशित न कर पाने की अपनी मजबूरी से भी उसने अपने पाठक को अवगत कराना जरूरी न समझा। जबकि टिप्पणी बेनामी भी नहीं थी-स्पष्टरुप से मैंने अपने नाम से ही की थी।
की गई टिप्पणी इस ब्लाग के पाठकों के लिए यहां दर्ज की जा रही है-
उम्र न सही
रचना पर ही हो जाए जलसा
६१वीं कविता लिख चुका है कवि
करो मित्रों घोषणा करो आयोजन की
ताकि युवा कवि लिख सके ६२वीं। 

9 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

प्रस्तुति की वह स्टाईल मुझे भी खटकी थी।

व्योमेश की कवितायें मुझे आकर्षित करती हैं। लेकिन जिस तरह सबद पर कुछेक लोग एक दूसरे को ऐसे ही समारोहपूर्वक प्रस्तुत करते हैं और जिन प्रवृतियों पर गाजे-बाजे बजाये जाते हैं…मैं आपकी तरह न तो उसे 'प्रिय' कह पाता हूं न ही 'जनतांत्रिक' सा दिखता मंच मानता हूं। इसीलिये ऐसे समारोहपूर्ण इंट्रो मुझे अधिक निराश नहीं करते।

मैने बस वहां कवितायें पढ़ीं जिन्होंने मुझे रोमांचित किया… गांधी का उदाहरण लूं तो 'पिन' रख लिया। :-)

indli said...

नमस्ते,

आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

शरद कोकास said...

सहमत ।

Jandunia said...

सार्थक पोस्ट

अजेय said...

vijay bhai, padh to lee ye saaree kavitaayen.... par kuchh kahane ka man nahin hua. ho sakata hai, yah vyomesh se kuchh zyada ki apeksha rakhane ke karan hua ho.vyomesh, aap ka qad aade aa raha hai. xama karen.
yahi tppanee vahan bi kar aya hoon.

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

Anonymous said...

मैंने आपके द्वारा उद्धृत पोस्ट देखी। उस मूढ़ बालक ने शरद कोकास के लिए जैसी भाषा का प्रयोग किया है वह भी सख्त आपत्तिजनक है। यह उसकी उदण्डता और अहंकार ही है। व्योमेश अभी शदर कोकास का पासंग भी नहीं ठहरेगा। उक्ति-वैचित्र्य गढ़ कर कोई कवि बहुत ज्यादा दूर तक नहीं जा सकता। यह बात तो आज नहीं तो कल व्योमेश के मामले में साबित हो जाएगी।

एक दिन विरल संयोग से ही वहां पहुंच गया। और कमेंट कर बैठा। कवि-प्रशासक (व्योमेश जी के शब्द) सुदीप बनर्जी विशेषां की विष्णु खरे की लिखी भूमिका की भूमिका में व्योमेश ने जो भूमिका लिखी थी मैंने उसकी भाषा की आलोचना की थी। अनुराग वत्स ने मेरी भी टिप्पणी नही प्रकाशित की थी।

मैंने अपनी टिप्पणी में किसी भी अपशब्द या लांक्षना का प्रयोग नहीं किया था। मैंने विशुद्ध शास्त्रीय आलोचना की थी। मैंने व्योमेश का ध्यान उनकी भाषा की मरोड़ और कई विभत्स वाक्य प्रयोगों की तरफ दिलाया था। मैंने "प्रकाण्ड अपवाद" जैसे विभत्स प्रयोग का उदाहरण भी दिया था। व्योमेश संस्कृत और हिन्दी के मूर्धन्य लेखकों से पूछ ले कि यह प्रयोग अर्थ संयोजन के हिसाब से किस दर्जे का है। खैर,आपने मुझे इतना कहने पर मजबूर कर दिया !

मैंने सबद देखा। आप सबके कमेंट वहां दिख जाते हैं। मैंने एक युवा कवि के विचलन को देखकर पहली बार मोहवश टिप्पणी की भी तो अनुभव बुरा रहा। वैसे भी ऐसे आत्मरत-आत्मप्रचारक गुटों का न्याय इतिहास ही करता है। व्यक्ति नहीं।

Meghansh said...

Vyomesh ek sudo securarist hai. Aise hi sudo secularists ne desh ko gulam banaya hai. Sudo secularism ka naash hona chahiye.

अशोक कुमार पाण्डेय said...

यह श्यूडो सेकुलरिज़्म क्या होता है…शायद संघ गैंग और आडवाणी के अलावा कोई नहीं जानता…पर मेघांश कोई श्यूडो पर्सनालिटी ज़रूर हैं…