Sunday, March 13, 2011

उत्तराखण्ड में भाषा-बोली

                               

दुनिया के पैमाने पर आज कितनी ही जनभाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं और कितनी ही विलुप्त हो चुकी हैं। दुनिया पर राज करती मुद्रा और भाषा के चौतरफा हमले के चलते सब कुछ इतनी तेजी से घट रहा है कि यह भी समझना मुश्किल हो जा रहा है कि कब और कैसे हम स्वंय भी हमले के षड़यंत्र के शिकार हो चुके हैं और अनजाने में ही उसके तर्कों के साथ खड़े हैं। बिना इस बात को ठीक तरह से जाने, सिर्फ अस्मिता के सवाल के साथ न तो किसी भाषा को बचाया ही जा सकता है और न ही ऐसा भाषायी आंदोलन खड़ा किया जा सकता जिसके व्यापक विस्तार की संभावना बने।
सामाजिक व्यवस्था की विसंगतियों को समग्रता में देखे बिना और समग्रता में ही मुखालफत किये बिना जन भाषाओं के बचाव के लिए की जा रही कोई भी पहल अधूरी साबित होने वाली है। फिर यह भी देखने और समझने की बात है कि ऐसी विकट स्थितियों में भाषायी सवाल पर गैर-सरकारी संस्थानिक आंदोलनों का बाजारू फंडा क्या है ? दुनिया के विकास का मौजूदा मॉडल किस तरह का वैश्विक ढांचा खड़ा करना चाहता है, गैर-सरकारी संस्थानों की भूमिका उसके बीच किस तरह की है ? शासन प्रशासन के पूंजीवादी मॉडल के भीतर गैर-सरकारी संस्थानों की दखल जिस तरह की सामाजिक विसंगति के सवालों को अपनी परियोजनओं का हिस्सा बनाती है, उसके निहितार्थ उस समग्रता को छू पाते हैं क्या ? यह भी देखना होगा कि जनभावनाओं के निरादर वाली पूंजीवादी मॉडल की शासन प्रणाली को बचाये रखने की चालाकियों के साथ जनभाषाओं को बचाए रखना क्या आज संभव रह गया है ? गैर-सरकारी संस्थानों का ढांचा ऐसी ही शासन-प्रणालियों से पोषित होता हुआ है, यह कोई छुपी हुई बात नहीं रह गया है। उसको ही बचाये रखने के ध्येय के साथ अनुदानों की आर्थिक मद्द से चलने वाले संगठन या सदस्यों के सहयोग से चलने वाली संस्थाओं की कार्यशैली में कोई ज्यादा फर्क है नहीं। देखा जा सकता है कि जनभावनाओं का निरादर ही नहीं अपितु उसे पूरी तरह से कुचलने की शासन प्रणालियों वाला यह मॉडल न सिर्फ अपनी प्रवृत्ति में षड़यंत्रकारी है बल्कि उसके तंत्र का जाल बेहद उलझा हुआ है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन से लेकर राज्य निर्माण की पूरी प्रक्रिया के सिलसिलेवार अध्ययन से एक सिरा जो हाथ लगता है उसमें दिखायी देता है कि जनआकांक्षाओं को शिकस्त प्रतीकात्मक तरह से भी दी जा सकती है। राज्य का नाम उत्तरांचल करने की घोषणा उसका एक नमूना है। परिणाम सीधा-सीधा यह रहा कि राज्य निर्माण की प्रक्रिया अपनाये जाने के बाद भी जनता खुद को ठगा हुआ पाती है - समझना मुश्किल हो जाता है कि जनता की जीत का राज्य निर्माण हुआ है या फिर राज्य के नाम पर एक और चोर जेब सा कुछ हाथ आया है। प्रतीक के तौर पर बदले गये नाम को ही सही और एकमात्र सही नाम बताने वाले एवं चोर जेब के तंत्र को स्थापित करने के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया को अंजाम देने वालों की चालाकी भरी चुप्पी कोई छुपी हुई बात नहीं है। बहुत से जनतांत्रिक सवालों को छुपाये रखने की यह ऐसी षड़यंत्रकारी कार्रवाई रही,  जिसमें वास्तविक संघर्ष को दरकिनार रखते हुए- मात्र अस्मिता के सवाल के साथ नाम बदलने की लड़ाइयां ही सर्वोपरी मान ली जाती रही। जन विरोधि नीतियों के प्रतिरोध की वाष्प को मात्र नाम बदलने की कार्रवाई में झोंक देने को मजबूर कर और अंतत: उसे पूरा कर दिये जाने की प्रक्रिया, एक खेल खेलने जैसा ही रहा है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या जन भाषाओं के बचाव की लड़ाई संविधान की आठवीं अनुसूची तक की एक निरर्थक कोशिश है या उसकी यात्रा का उन पड़ावों से गुजरना है जहां जल, जंगल, जमीन और रोजी-रोजगार के ठिकाने मौजूद हैं ? उत्तराखण्ड में आज भाषा-बोली का जो सवाल जोर पकड़ता जा रहा उसके केन्द्र में सिर्फ गढ़वाली और कुमाऊंनी को ही तरजीह दी जा रही है। यदा-कदा जौनसारी का जिक्र भी हो जा रहा है। पंजाबी, गोरखाली और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश की वह भाषा जो राज्य की राजधानी के एक बड़े भू-भाग में मौजूद है, उसका जिक्र बहुधा छूट जा रहा है। यहां सवाल यह नहीं है कि आंदोलन के केन्द्र में सिर्फ गढ़वाली, कुमाऊंनी को ही तरजीह क्यों दी जा रही है, बल्कि उस बिन्दु को छेड़ना है जो उत्तराखण्ड में सारे मुद्दों को, मात्र अस्मिता के नाम पर दरकिनार कर देना चाहता है। जरूरत है राज्य के भीतर व्याप्त विसंगतियों और रोजी रोजगार के दूसरे मसलों की रोशनी में ही जनभाषाओं के बचाव की मुहिम जारी हो। एक बड़े फलक पर बोली जाने वाली भाषा हिन्दी, जो कि देश और दुनिया के पैमाने पर वैसे ही उपेक्षित होने की स्थिति में है जैसे किसी भी राज्य में बोली जाने वाली दूसरी अन्य भाषाएं, उत्तराखण्ड राज्य में एक हद तक काम-काज की भाषा है। यह अपने आप में उल्लेखनीय है कि राज्य के बहुभाषी चरित्र को पूरी तरह से समेटने में ज्यादा स्वीकार्य भी है।   
          

8 comments:

प्रदीप कांत said...

सवाल गम्भीर है

पर मालिक जब राष्ट्र भाषा ही उपेक्षित है तो जनभाषा की बात कौन करेगा। और नई पीढी, जिसे बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में काम करना है उससे तो कतई उम्मीद करना बेकार है।

हाँ इस तरह के आलेहख कुछ कर सकें तो।

अजेय said...

विचारोत्तेजक.
वस्तुत: भूमण्डलीय युग मे भाषा को, या संस्कृति के किसी भी उपकरण को अस्मिता या भावनात्मक स्तर पर जोड़ कर देखना ही बेमानी लगने लगा है. संस्कृति को उत्पादन, श्रम, पूँजी , और बाज़ार के परिप्रेक्ष्य मे समझना हमारी मज़बूरी हो चुकी है. कहना कठिन है कि साँस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा आगे कितना उपयोगी/ज़रूरी रह जाने वाला है..... लेकिन यदि हमें लगता है कि हमें लोक जीवन मे मौजूद मूल्यों को मानवीयता के पक्ष बचाना है,तो शुरुआत हमें * मिनि* से करना होगा. यानि गाँव मुहल्ले की लोक भाषा. क्यों कि हिन्दी जैसी *मेटा* भाषाएं, जिन्हे हम आज साहित्य/ मीडिया मे बरत रहे हैं, खुद बाज़ार और सत्ता का उपकरण बनी जा रही है.... लोक चेतना से कटी जा रही है.

अजेय said...

विचारोत्तेजक.
वस्तुत: भूमण्डलीय युग मे भाषा को, या संस्कृति के किसी भी उपकरण को अस्मिता या भावनात्मक स्तर पर जोड़ कर देखना ही बेमानी लगने लगा है. संस्कृति को उत्पादन, श्रम, पूँजी , और बाज़ार के परिप्रेक्ष्य मे समझना हमारी मज़बूरी हो चुकी है. कहना कठिन है कि साँस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा आगे कितना उपयोगी/ज़रूरी रह जाने वाला है..... लेकिन यदि हमें लगता है कि हमें लोक जीवन मे मौजूद मूल्यों को मानवीयता के पक्ष बचाना है,तो शुरुआत हमें * मिनि* से करना होगा. यानि गाँव मुहल्ले की लोक भाषा. क्यों कि हिन्दी जैसी *मेटा* भाषाएं, जिन्हे हम आज साहित्य/ मीडिया मे बरत रहे हैं, खुद बाज़ार और सत्ता का उपकरण बनी जा रही है.... लोक चेतना से कटी जा रही है.

अजेय said...

विचारोत्तेजक.
वस्तुत: भूमण्डलीय युग मे भाषा को, या संस्कृति के किसी भी उपकरण को अस्मिता या भावनात्मक स्तर पर जोड़ कर देखना ही बेमानी लगने लगा है. संस्कृति को उत्पादन, श्रम, पूँजी , और बाज़ार के परिप्रेक्ष्य मे समझना हमारी मज़बूरी हो चुकी है. कहना कठिन है कि साँस्कृतिक अस्मिता का मुद्दा आगे कितना उपयोगी/ज़रूरी रह जाने वाला है..... लेकिन यदि हमें लगता है कि हमें लोक जीवन मे मौजूद मूल्यों को मानवीयता के पक्ष बचाना है,तो शुरुआत हमें * मिनि* से करना होगा. यानि गाँव मुहल्ले की लोक भाषा. क्यों कि हिन्दी जैसी *मेटा* भाषाएं, जिन्हे हम आज साहित्य/ मीडिया मे बरत रहे हैं, खुद बाज़ार और सत्ता का उपकरण बनी जा रही है.... लोक चेतना से कटी जा रही है.

विजय गौड़ said...

विजय भाई,
उत्तराखंड की अपनी जनभाषाओँ की उपेक्षा और अंततः उनकी विलुप्ति की बाबत अपने जो टिप्पणी की है वह विकास के हमारे पूंजीवादी माडल के बरक्स बहुत महत्वपूर्ण है.थोक उत्पादन (mass production ) की संस्कृति में लोक कलाकारों के हुनर की तरह भाषाएँ भी एथनिक उत्पादों की तरह संग्रहालयों और ड्राईंग रूमों की शोभा बढ़ाने लगेंगी.पर सवाल इतना ही नहीं है,उत्तराखंड को माध्यम बना कर भगवा राजनीति इन लोक भाषाओँ की कब्र के ऊपर संस्कृत की फसल उगने की जिस जुगत में है उसपर भी गौर करना चाहिए...देश में उत्तराखंड अकेला ऐसा राज्य है जहाँ संस्कृत राजभाषा ( द्वितीय ही सही) का दर्जा प्राप्त करने के बाद सरकारी धन और फरमान से पुनर्जीवित् की जाएगी.हरिद्वार और ऋषिकेश संस्कृत नगर घोषित हो चुके हैं और हर जिले में एक एक संस्कृत ग्राम चयनित किये जाने हैं.इस बारे में सरकारी आदेश लागू हो गए हैं जनाब....कुछ इनपर भी लिखा जाना चाहिए.

यादवेन्द्र

विजय गौड़ said...

पिछले अक्तूबर में चीन के कुछ इलाकों में तिब्बती भाषा के बोलने लिखने और पढ़ाये जाने पर जब सरकारी पाबन्दी लगा दी गयी तो नौजवानों ने इसके विरोध में उग्र प्रदर्शन किये. इसका विवरण देते हुए इन्ही में से किसी ने www.highpeakspureearth.com वेब साईट पर भाषाओँ को बचाए जाने की वकालत करती हुई एक कविता उधृत की :

जब आप साँस लेना बंद कर देते हैं
हवा बचती नहीं,नष्ट हो जाती है.
जब आप चलना फिरना बंद कर देते हैं
तो लुप्त हो जाती है धरती भी.
जब आप बोलना बंद कर देते हैं
तो शेष नहीं बचता एक भी शब्द...
सो, बोलिए बतियाइए जरुर
अपनी अपनी भाषा में.

लगभग इसी सन्दर्भ में www.thaiwomantalks.com नामक वेब साईट पर एक थाई कविता का अंग्रेजी तर्जुमा मिला :

यदि आप संगीत का रियाज बंद कर दें सात दिन
तो संगीत आपको छोड़ कर विदा हो जायेगा..
यदि आप अक्षरों को लिखना पढना बंद कर दें सिर्फ पाँच दिन
तो सम्पूर्ण ज्ञान लुप्त हो जायेगा देखते देखते..
यदि आप स्त्री को ध्यान से ओझल किये किये बिसार दें तीन दिन
तो रहेगी नहीं वो वही स्त्री और चली जाएगी मुंह फेर कर आपसे दूर..
यदि आप अपना चेहरा बगैर धोये रह गए एक दिन भी
तो बिनधुला चेहरा आपको बना देगा निहायत कुरूप और लिजलिजा.

यादवेन्द्र

शिवकुमार ( शिवा) said...

सुंदर प्रस्तुति ..
कभी समय मिले तो http://shiva12877.blogspot.com ब्लॉग पर भी अपने एक नज़र डालें .फोलोवर बनकर उत्सावर्धन करें .. धन्यवाद .

विजय गौड़ said...

Anonymous noreply-comment@blogger.com

10:11 PM (16 hours ago)

to me
Anonymous has left a new comment on your post "उत्तराखण्ड में भाषा-बोली":

A topic near to my heart thanks, ive been wondering about this subject for a while.