Wednesday, March 20, 2013

मैं हूँ उन सब भाषाओं का जोड़: अवधेश कुमार की याद (१)






अवधेश कुमार हिन्दी की कुछ विलक्षण प्रतिभाओं में थे.कवि, चित्रकार, कहानीकार,नाटक कार और रंगकर्मी  अवधेश के नाम हिन्दी की कितनी ही प्रसिद्ध /अप्रसिद्ध पुस्तकों के आवरण पृष्ठ भी दर्ज हैं .कितनी ही पत्रिकाओं में उनके रेखाचित्र बिखरे पडे हैं.१४ जनवरी १९९९में यह दुनिया छोड़ चले अवधेश पर ‘लिखो यहाँ-वहाँ’ की विशेष शृँखला में आज प्रस्तुत  हैं उनके दो गीत

मैं हूँ


      जितने सूरज उतनी ही छायाएँ
      मैं हूँ
     उनसब छायाओं का जोड़
    सूरज के भीतर का अँधियारा
    छोटे-छोटे
   अँधियारों का जोड़

   नंगे पाँव चली
  आहट उन्माद की
  पार जिसे करनी
  घाटी अवसाद की
   एक द्वन्द्व का भँवर
    समय की
   कोख में
  नाव जहाँ
  डूबी है
  यह संवाद की

  जितने द्वन्द्व कि
   उतनी ही भाषाएँ
  मैं हूँ उन सब भाषाओं का जोड़



   उग रही है घास


  उग रही है घास
   मौका है जहाँ
          चुपचाप
  जहाँ मिट्टी में जरा सी जान है
   जहाँ पानी का जरा सा नाम है
    जहाँ इच्छा है जरा-सी धूप में
    हवा का भी बस जरा-सा काम
    बन रहा आवास
     मौका है जहाँ
     चुपचाप

     पेड़ सी ऊँची नहीं ये बात है
    एक तिनका है बहुत छोटा
     बाढ़ में सब जल सहित उखड़े
    एक तिनका ये नहीं टूटा
     पल रहा विश्वास
     मौका है जहाँ चुपचाप





4 comments:

Dinesh Joshi said...

Avdesh Ji ki muskarahat aur unki chamkti hui aankhen sakar ho uthi hain in kavitauon ko pad ke.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

सुन्दर भावप्रणव प्रस्तुति!

विजय मधुर said...

कारवाँ देहरादून द्वारा आयोजित पांच दिवसीय अखिल भारतीय नाट्य समारोह १६ सितम्बर से २० सितम्बर 1९९२ में स्वर्गीय अवधेश कुमार जी के साथ कार्य करने का मौका मिला । इस नाट्य समारोह में उन्ही के द्वारा लिखित दो नाटकों का मंचन किया गया । पहला ' कोयला भई ना राख ' जिसे 'वातायन' की ओर से श्री राम प्रसाद अनुज द्वारा निर्देशित किया गया । उन्ही के द्वारा लिखित दूसरी प्रस्तुति ' वन गाथा ' आयोजक संस्था 'कारवाँ ' द्वारा अवधेश कुमार जी के निर्देशन में ही मंचित की गयी । इस सामारोह के दौरान उनके साथ समय बिताने का बहुत ज्यादा सौभाग्य प्राप्त हुआ क्योंकि एक तो इस आयोजन में प्रकाशित होने वाली स्मारिका के सम्पादन की जिम्मेदारी मुझ पर थी । कला पक्ष के क्षेत्र में उस समय स्व अवधेश कुमार के अतिरिक्त कोई नाम याद ही नहीं था । इसलिए इस स्मारिका में कला पक्ष उन्ही का था । साथ ही पर्यावरण संरक्षण पर आधारित नाटक ' वन गाथा ' में ' इंद्र ' की भूमिका निभाने का मौका भी उनके निर्देशन में मिला । स्व . अवधेश कुमार जी का जन्म ७ जून १९५१ में हुआ और निधन १४ जनवरी ' १९९९ . उनका प्रमुख साहित्य नाटक 'कोयला भई ना राख ' , ' वन गाथा ' , ' सूखी धरती प्यासा मन ' , कथा संग्रह 'उसकी भूमिका ' काव्य संग्रह ' जिप्सी लड़की ' और उनके बनाये पोस्टर , चित्र आदि हैं । मरणोपरांत स्व. अवधेश कुमार जी को ' कारवाँ ' संस्था द्वारा विश्व रंगमंच दिवस २७ मार्च ' २००१ पर " रंग भूषण " सम्मान से सम्मानित किया गया । साथ ही दून रंगमंच के सशक्त हस्ताक्षर दादा अशोक चक्रवर्ती और राहुल वर्मन को भी " रंग भूषण " सम्मान से सम्मानित किया गया ।
विजय मधुर http://vijaymadhur.blogspot.in

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति