Monday, April 22, 2013

पेशावर विद्रोह की वर्षगांठ (23 अप्रैल:) पर विशेष



हुतात्मा एक सच्चे जनयोद्धा की महाकाव्यात्मक संघर्ष गाथा
एक सच्चे जनयोद्धा की महागाथा


उषा नौडियाल



डॉ. शोभा राम शर्मा द्वारा रचित महाकाव्य हुतात्मा पेशावर विद्रोह के महानायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के संपूर्ण जीवन की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति है। आत्मविज्ञापन, आत्मश्लाघा के इस दौर में जब हर वस्तु, हर विचार बाजारवाद का शिकार या पोषक हो रहा है। ऐसे समय में साहित्य ही मनुष्य को उसके जीवन मूल्यों का बोध कराने के साथ साथ उसकी संघर्षशीलता का स्मरण करा सकता है। 
आजादी के सच्चे सिपाहियों के जीवन संघर्ष और आत्म बलिदान से अवगत कराए बिना दिग्भ्रमित युवा पीढी को विचार शून्यता से बचाना असं व है। उत्तराखंड समेत पूरे देश में आज निजी स्वार्थों को लेकर जिस तरह की राजनीति हो रही है उसमें पेशावर विद्रोह के नायक वीर चंद्र सिंह गढ़वाली और ी प्रासंगिक हो गए हैं। इन स्थितियों में वंशवाद व सांप्रदायिकता में लिपटी थोथी देशभक्ति की पोल खोलना ी जरूरी है। चंद्र सिंह गढ़वाली जिन्हे पहले अंग्रेजों ने करीब 13 वर्ष फिर देश की आजाद सरकार ने कई बार कारावास में रखा। आर्य समाज से गांधीवाद, फिर कम्युनिज्म तक उनकी विचारयात्रा ,उथलपुथल से री 20वीं सदी के ारत के राजनीतिक इतिहास की महागाथा है। तमाम विपरीत परिस्थितियों में ी वीर चंद्र सिंह गढ़वाली टूटे न झुके। वह चाहते तो आसानी से विधायक या सांसद हो सकते थे। पंडित नेहरू ने उन्हे खुद कांग्रेस का टिकट देने की पेशकश की थी। लेकिन उन्होनेे विचारधारा से समझौता नहीं किया। आर्थिक तंगी के वावजूद वे विचारधारा की तलवार लिए आजादी के बाद ी वंचित वर्ग की असली आजादी के लिए लड़ते रहे। जिसका स्वप्न कितने कर्मवीरों और शहीदों ने देखा था। कविता के रूप में उनके संघर्ष का समग्र चित्रण निश्चय ही पाठकों को कौतुहूल के साथ उद्वेलित, आनंदित व किंचित विस्मित करने में समर्थ है। 
कविता का वास्तविक उद्देश्य जितना पाठकों के हृदय में सौंदर्यानुभूति जगाना है,उससे अधिक उद्दात मानवीय अनुभूतियों का प्रस्फुटन करना है। प्रकृति की तरह ही कविता ी त्रस्त हृदय के लिए मरहम का काम करती है। 
नर को अपना लोक न ाता, ाता मन का छायालोक। 
त्रस्त हृदय की पीड़ा हरता, सुख सपनों का मायालोक।। (केदार यात्रा पृष्ठ-28)
उच्च कोटि की कविता में एक यूनिवर्सल अपील होती है। वह सार्वभौमिक और सर्वकालिक होती है। हुतात्मा महाकाव्य का फलक अपने नाम के अनुरूप विस्तृत और व्यापक है। जहां एक ओर नायक के जीवन का सूक्ष्मातिसूक्ष्म विवरण है, वहीं दूसरी ओर तत्कालीन समाज, उसके परिवेश, संस्कृति का सूक्ष्म और गहन चित्रण ी है। मानवीय ावनाओं पर गहरी पकड़ और अंतर्मन की गुत्थियों को उजागर करता मनोवैज्ञानिक विश्लेषण ी परिलक्षित होता है। प्रामाणिक युग चित्रण कवि की विद्वता और अध्ययनशीलता की छाप छोड़ जाता है। महाकाव्य एक ओर गुलाम ारत में ब्रिटिश हुकूमत द्वारा दारुण यंत्रणा का मार्मिक चित्रण है वहीं दूसरी ओर प्रथम विश्वयुद्ध व सके कारणों और प्रभावों का सरल विवरण है
पूरबपश्चिम, उत्तर दक्खिन बांट चुके सब योरुप वाले।
दुनिया उनके हाथों में थी, दास बने जन पीले काले।।
बाजारों की छीनाझपटी, अपनी अपनी धाक जमाना।
गौरांगों में होड़ लगी थी, युद्ध-युद्ध का छेड़ तराना।। (प्रथम विश्वयुद्ध पृष्ठ-4)
  ारत की आजादी के संघर्ष का हो या आजादी के बाद का काल। तमाम राष्ट्रीय अंतर्राष्ट्रीय घटनाओं का विशद विवरण निश्चय ही गहन अध्ययन और सूक्ष्म अनुसंधान के बिना सं व नहीं हो सकता। पर्वतवासियों के सरल जीवन की विकट परिस्थितियों का चित्रण, उनकी स्वभावगत सरलता, जुझारूपन और खुद्दारपन का चित्रण गढ़वालीजी के जीवन चित्रण के माध्यम से उ रकर आया है। पलायन की समस्या पर ये पंक्तियां सटीक और मार्मिक प्रतीत होती हैं- 
इस धरा के फूल कितने खल अ ावों में पले हैं।
शठ उदर का पेट रने हर छलावों में छले हैं।।
स्वर्ग जैसी ूमि से उड, दूर बीती है जवानी।
हिम शिलाओं के तले यह आपबीती है पुरानी ।।(केदारभूमि पृष्ठ-14)
प्रगतिशीलता के प्रति कवि की निजी प्रतिबद्धता, व्यवस्था परिवर्तन की अदम्य आकांक्षा काव्य में आद्योपांत झलकती है। अभिव्यक्ति की स्पष्टता, ावोें की संप्रेषणीयता ाषा के सहज सौंदर्य व सौष्ठव के माध्यम से बरकरार है। प्रकृति चित्रण में संस्कृतनिष्ठ शब्दावली का प्रयोग जहां अनिवार्य प्रतीत होता है वहीं अन्य घटनाओं के चित्रण में बोलचाल की ंिहदी और स्थानीय गढ़वाली शब्दों का प्रयोग प्रशंसनीय है। करीब 300 पृष्ठो का यह महाकाव्य इन अर्थों में महत्वपूर्ण है कि हिंदी कविता से लग ग बाहर कर दी गई छंदबद्ध कविता को यह पुनर्प्रतिष्ठित करने का प्रयास करता है। हुतात्मा को ंिहदी कविता में महाकाव्य और छंद की वापसी के तौर पर ी देखा जा सकता है। महाकाव्यो में जहां नायक राजा महाराजा, उच्चकुल उत्पन्न, दिव्यगुणों, महान आदर्शों वाले व मानवीय दुर्बलताओं से मुक्त होते हैं वहीं हुतात्मा का नायक वीर ढ़़वाली एक सामान्य कुल में उत्पन्न आम आदमी हैं जिन्होंने उच्च मानवीय आदर्शों को जिया। इस नाते यह पुस्तक महाकाव्य की शाóीय परिभाषा की रुढ़ि को ी तोड़ती है।  

6 comments:

Rajesh Kumari said...

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल २३ /४/१३ को चर्चा मंच पर राजेश कुमारी द्वारा की जायेगी आपका वहां हार्दिक स्वागत है ।

ब्लॉग बुलेटिन said...

आज की ब्लॉग बुलेटिन भारत की 'ह्यूमन कंप्यूटर' - शकुंतला देवी - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति..!
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शस्य श्यामला धरा बनाओ।
भूमि में पौधे उपजाओ!
अपनी प्यारी धरा बचाओ!
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पृथ्वी दिवस की बधाई हो...!

Onkar said...

सुन्दर प्रस्तुति

Anonymous said...

yah pustak kahan milegi

PAnkhuri Sinha said...

Hutatma mahakavya parampara ki itni sundar prastuti ke liye dhanyawad. Pahad ke anchal mein swatantra sangram ki sundar prishtbhoomi ke liye dhanyawad. Pahadi ithaas kum padhne ka awasar mila hai. isliye aur khaas. Peshawar Vidroh ke mahanayak ko anek pranam.