Thursday, May 8, 2014

चाय की प्याली में तूफान उठा देने वालों

हमारे सहयोगी यादवेन्द्र जी का यह आलेख उनके लेखन की ऐसी बानगी है कि हमारा आसपास बज बजाता हुआ सामने आने लगत है.



आज सुबह चाय बना कर पीने ही जा रहा था कि एक मित्र का फ़ोन आ गया -- आम तौर पर देर से उठने के आदी मित्रों और परिजनों के फ़ोन से मुक्त रहती हैं मेरी सुबहें ,पर कुछ चुनिंदा लोगों को सुबह सुबह मुझे पकड़ लेने की तरकीब मुफ़ीद लगती है। मित्र ने मुझसे कुछ पढ़ कर सुनाने का आग्रह किया सो चाय किनारे रखनी पड़ी -- हाँलाकि बीच बीच में चुस्कियाँ लेने से खुद को रोक नहीं पा रहा था।
पर अंत में बची हुई चाय ने अपने हाव भाव ( स्वाद और गंध) से साफ़ साफ़ कह दिया कि पीनी है तो ढंग से चाय पियो प्यारे.... कई काम एक साथ करते हुए सब के साथ नाइंसाफ़ी और तौहीनी करते हो .... मुझे यह बिलकुल पसंद नहीं।
चाय ने सचमुच इस बेरुखी पर क्रोधित होकर अपना स्वाद बदल लिया था -- सुबह की ताज़गी के बदले उसमें उबा देने वाला बासीपन घर कर गया था। दिलचस्प बात ये कि एक घूँट ख़राब चाय पी कर चार पाँच बार अच्छी चाय पी भी लें तो मामला बनता नहीं -- चाय मेरे लिए ऐसी प्रेमिका की मानिंद है जो पल पल समझाती रहती है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी श्रेष्ठ और चमकदार है उसमें उसका स्थान हमेशा सबसे ऊपर रहेगा … जिसका मूड ख़राब करने का जोखिम आप उठा नहीं सकते .... और ऐसी गलती कर ही बैठे तो आपको  एड़ी छोटी का जोर लगाना पड़ेगा , फिर भी सब कुछ सहज सामान्य हो ही जाएगा इसकी कोई गारण्टी नहीं।
दरअसल चाय के इतने रूप रंग होते हैं कि एक से दूसरे के बीच के अंदर को मैं पहचान तो सकता हूँ पर शब्दों में उनका वर्णन नहीं कर सकता .... जैसे सुबह सुबह बनायी चाय के ही थोड़े से अंतराल के बाद बदल गये दो अलग अलग स्वाद को ही लें। यदि चाय किसी पतली गर्दन वाले बर्तन में बनाई जाये तो भगौने जैसे चौड़े मुँह के बर्तन में बनाई गयी चाय से उसका स्वाद बिलकुल अलग होगा। वैसे ही उबलते पानी में चाय की पत्ती डाल कर ढक्कन से ढँक दिया जाए तो उसका स्वाद बगैर ढक्कन के देर तक उबाल कर बनायीं गयी चाय से बिलकुल अलहदा होगा। जो लोग पानी और दूध बगैर नापे अंदाज से डाल कर चाय बनाते हैं उनकी चाय का स्वाद सब कुछ नाप तोल कर डाली गयी सामग्री की चाय से जुदा होगा। पानी दूध और चीनी का अनुपात  बदल जाने से ज़ाहिर है चाय का स्वाद बदल जाता है। गाय ,भैस और डेयरी के दूध ( वह भी टोन्ड और फ़ुल क्रीम ) से बनायीं गयी चाय एकदम अलग स्वाद और गंध की होती है। इतना ही नहीं अलग अलग व्यक्ति की बनायीं चाय में अलग अलग स्वाद मिलेगा। शाम को दफ़्तर की थकान के बाद मिलने वाली दैनिक रूटीन वाली चाय का स्वाद वह हो ही नहीं सकता जो लिखाई पढ़ाई में तल्लीन रहने पर देर रात मिलती है .... या रात भर अच्छी नींद लेकर उठने के बाद दिन की पहली चाय ( आहार) का होता है।यानि चाय पानी दूध चीनी चाय की पत्ती को फेंट कर तैयार किया गया महज़ एक द्रव नहीं होती बल्कि एक जीवंत शख्सियत होती है --- और मन के भावों के प्रति बेहद संवेदनशील होती है।

मुझे याद है जब 1995 में मैं पहली दफ़ा विदेश ( अमेरिका ) गया और वहाँ पहुँच कर होटल में चाय की माँग की तो मुझे मिंट ( पुदीना ) की गंध वाली चाय का पैकेट दिया गया --- जबरदस्त तलब के बावज़ूद मैं उस चाय को स्वीकार नहीं कर पाया ,क्योंकि अपने चालीस साल के जीवन में पहले कभी चाय के साथ पुदीने की गंध /स्वाद का अनुभव नहीं किया था। जब मुझसे पुदीने वाली चाय नहीं चली तो बार बार माँगने पर दूसरी गंध वाले टी बैग्स मिले , सादा चाय मिली ही नहीं। जैसे तैसे कुछ घंटे होटल में गुज़ारने के बाद मैं निकल कर खुद डिपार्टमेंटल स्टोर गया और सादा चाय के लिए मगजपच्ची करता रहा। पूछ ताछ करने पर मुझे बताया गया कि दार्जिलिंग टी का पैकेट खरीदो ,यहाँ सादा चाय वही मानी जाती है --- हाँलाकि मुझ जैसे इंसान के लिए उबाल कर बनायी गयी सादा  चाय ही चाय का स्थायी भाव है ,दार्जिलिंग चाय तो कभी कभार मिल जाने वाली लग्ज़री है। इसी यात्रा में मेरा सामना काँच के पारदर्शी प्याले में बर्फ़ और नींबू की पतली फाँक तैरती हुई ठण्डी चाय से हुआ --- तज़ुर्बे के तौर पर मेरी स्मृति में सिर्फ़ आग पर उबली हुई चाय मौज़ूद थी और बर्फ़ वाली चाय मुझे बड़ी अटपटी लगी थी पर बाद के दिनों में जब भारत में नेस्ले ने आइस टी बेचनी शुरू की तो इसका स्वाद मेरे मुँह को खूब लगा।

पिछले साल राजस्थान में नाथद्वारा जाने पर पुदीने वाली चाय पी और खूब छक कर पी -- यह वहाँ की वैसी ही खासियत है जैसे सैकड़ों की संख्या में बनी दूकानों में बिक रहा मंदिर में दिन में सात बार चढ़ाया गया प्रसाद। जब जब वहाँ चाय पीता  हूँ मुझे अमेरिका का वह अनुभव याद आता है और अचरज होता है कि वहाँ जिसको स्वीकार करना मुश्किल था वहीँ नाथद्वारा पहुँचते ही मुझे पुदीने वाली चाय की जबरदस्त तलब होती है।
 
पचमढ़ी में खूब देर तक अदरक के साथ उबाल कर तीन चरणों में बनायीं गयी चाय लोगों के इतने मुँह लगी रहती है कि एक कप चाय के लिए बीस पच्चीस मिनट तक इन्तज़ार करते हैं-- इस प्रक्रिया को पूरा होने में आधे घंटे तक का समय लगता है।पहली बार में मुझे तेज अदरक वाली यह चाय इतनी कड़वी लगी कि एक दो घूँट के बाद छोड़ दी पर थोड़ी देर बाद उसमें ही अनूठा स्वाद आने लगा।

तिरुपति में चाय बनाने का अलग ढंग है -- कॉफी के लिकर की तर्ज पर चाय का भी लिकर बना कर ताम्बे के लम्बे गोल बर्तन में रखा जाता है और ग्राहक के आने पर दूध और चीनी मिला कर दे दिया जाता है।

हालिया अनुसंधान से मालूम हुआ कि हमारी नाक लाखों अलग अलग गंधों को पहचान सकती है ,यह अलग बात है कि हम अपनी इस क्षमता का उपयोग करना भूलते जा रहे हैं। वैसे ही हमारी जीभ और स्वाद पहचानने वाली ग्रंथियाँ भी भिन्न भिन्न प्रकार के स्वाद पहचान सकती हैं पर हम उनका प्रयोग करना भूलने लगे हैं .... और  उनके बारीक अंतर को शब्दों में बयान करना तो बिलकुल असंभव है।

कैसी विडंबना है कि चाय के  इतने सारे भिन्न स्वरुपों को समेट कर हम देशवासियों पर यह धौंस जमा रहे हैं कि चाय पीनी है तो सिर्फ़ नमो चाय पियो ,वरना पाकिस्तान जाओ।    

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यादवेन्द्र
*Mob.*    *+ 09411100294*

3 comments:

ब्लॉग बुलेटिन said...

ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन बाबा का दरबार, उंगलीबाज़ भक्त और ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

Ankur Jain said...

चाय की चुस्की ऐसी भी हो सकती है कभी सोचा नहीं..प्रभावी पोस्ट।।।

आशुतोष कुमार said...

"एक घूँट ख़राब चाय पी कर चार पाँच बार अच्छी चाय पी भी लें तो मामला बनता नहीं -- चाय मेरे लिए ऐसी प्रेमिका की मानिंद है जो पल पल समझाती रहती है कि मेरे जीवन में जो कुछ भी श्रेष्ठ और चमकदार है उसमें उसका स्थान हमेशा सबसे ऊपर रहेगा … जिसका मूड ख़राब करने का जोखिम आप उठा नहीं सकते .... और ऐसी गलती कर ही बैठे तो आपको एड़ी छोटी का जोर लगाना पड़ेगा , फिर भी सब कुछ सहज सामान्य हो ही जाएगा इसकी कोई गारण्टी नहीं।"--- एक समझदार जायकेदार पोस्ट . शक्रिया इसे लिखने छापने के लिए .