Monday, August 18, 2014

मुश्किल रास्ता

प्रथम युगवाणी पुरस्कार से सम्मानीत कथाकार गुरूदीप खुराना का का उपन्यास ''रोशनी में छिपे अंधेरे" 1960 के आसापास के गुजरात की कथा को हमारे सामने रख्ता है। स्पष्ट है कि 1960 के आसपास जो स्थितियां थी उनसे नृशंसता के प्रतीक 2002 के गुजरात की कल्पना नहीं की जा सकती थी लेकिन 2002 का गुजरात भी आज इतिहास की एक हकीकत होकर सामने आया है। देख सकते हैं धर्म की आड़ लेकर लगातार तकात बटोरते गये दया भाईयों को सामाजिक रूप से विलग न कर देने के परिणाम कहां तक पहुंचे हैं। बेशक, कथाकार के निशाने में 2002 का गुजरात नहीं है लेकिन उपन्यास की कथा तो पाठक को खुद ब खुद वहां तक ले जा रही है। प्रस्तुत है इसी उपन्यास से एक अंश।
वि. गौ.

चांद खेड़ा की सरकारी कालोनी में एक मिस्टर चौधरी रहते थे। वो थे तो इन्जीनियर, पर विशेष अनुरोध पर उन्होंने स्टाफ के क्वार्टरों में एक एलॉट कराया हुआ था। थे तो हैदराबाद के रहने वाले, पर यह कोई नहीं जानता था कि वो मुस्लिम है। नाम के।बी। चौधरी से यह अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि कुंज बिहारी है या करीम बक्श या जो भी रहा हो। उनकी पत्नी बाकी औरतों की ही तरह बिन्दी वगैरा लगाती थी। बड़े ही शांत स्वभाव के व्यक्ति थे। 

दंगों के दौरान पता नहीं दंगईयों को कैसे उनके मुस्लिम होने की भनक लग गई और बड़ी संख्या में आकर उन्होंने उनके क्वार्टर पर धावा बोल दिया। 

जिस बेरहमी से उन्होंने पूरे परिवारजनों को मारा और जिस तरह बेइज़्जत करके मारा, उसे सुनकर कानों पर विश्वास नहीं होता था। मिस्टर चौधरी के गुप्तांग को काटकर उसके मुंह में डालना और फिर ज़िन्दा जलाना और इससे मिलता जुलता ही सलूक बाकी परिवार जनों के साथ करना। यह ऐसी वारदात थी कि सुनकर अमन को आंखों के आगे अंधेरा सा छा गया। यह हो क्या रहा है? वह हैरान था। 

ऐसा ही भयंकर प्रहार हिन्दुओं को भी सहने पड़े, उन इलाकों में जहां मुस्लिम समुदाय का बोलबाला था। इसी कारण शायद ये लोग मौका देखकर बदला लेने आये थे। लेकिन यह कैसा बदला। दंगई भी अपने घ्ारों में सुरक्षित थे और बदला लेने वाले भी। पिस रहे थे बेचारे बेकसूर, दोनों तरफ़। 

ऐसी घटनाएं चाहे इक्का दुक्का ही हो रही थी, पर उनसे वातावरण में भयंकर दहशत भर गई थी। हिन्दु मुस्लिम इलाकों में जाने से डरते थे और मुस्लिम हिन्दु इलाकों में आने से। मुस्लिम इलाकों में रहने वाले हिन्दुओं की और हिन्दु इलाकों में रहने वाले मुसलमानों की जान सूखी रहती थी कि पता नहीं कब क्या हो जाए। 

एक शाम अमन को दया भाई टकरा गए, 'कैसे हो चौधरी साहब?" एक कुटिलता भरी टेढ़ी सी मुस्कुराहट थी उनके चेहरे पर। 

’मैं ठीक हूं, आप सुनाएं’ उसने बड़े शांत स्वर में पूछा, 'क्या खबर है?’ 

'खबर तो अच्छी है चौधरी साहेब। अब तो उनके दांत खट्टे कर दिए। उन्हें उनकी औकात समझा दी। चुन चुन कर सफ़ाया कर दिया सबका।। अब भी कुछ हैं जो छिपे बैठे हैं।। वो भी बच के किधर जायेंगे?’ 

अमन का मन खट्टा हो गया। हमेशा दया भाई से मिलकर यही होता था। 'चलता हूं।’ उसने आज्ञा मांगी। 

'आपको हमारी बात अच्छी नहीं लगी?’ 

'इसमें अच्छी लगने जैसी क्या बात थी?’ 

'एक बात बोलूं चौधरी साहेब?,

'जी कहिए?, 

'सुना है आपके ऑफ़िस की कालोनी में एक आप जैसे चौधरी साहब रहते थे, उनकी भी छुट्टी हो गई।’

'हूं। बहुत बुरा हुआ।’ 

'आपको दु:ख हुआ?’ 

'नेचुरली।’ 

'आपका भाईबंध था।’

'नहीं, मैं तो कभी उससे मिला भी नहीं।’

'ऐसा? पर था तो आपकी ही बिरादरी का।’ 

'मेरी बिरादरी का? क्या बात करते हैं, वो तो मुस्लिम था।’

 'पर वो भी ऐसा बताता तो नहीं था। उसकी भी वाईफ़ शुभ्रा बेन की तरह बिन्दी-विंदी लगाती थी।" 

'आप क्या कहना चाहते हैं?" 

 'यही कि--- प्रमाण तो आपके पास भी हिन्दु होने का कुछ नहीं। आपके घर में तो आपने कोई पूजा वूजा का कोना भी नहीं रखा। कोई देवी-देवता की तस्वीर भी नहीं। कोई गीता-रामायण भी नहीं।" 

'ये सब आपको कैसे पता?" 

'पता तो रखना पड़ता है न साहिब। हर घर की पूरी खबर रखनी पड़ती है। हमें यह भी पता है कि आपके ज्यादातर दोस्त मियां लोग हैं और यह भी कि अमन मुस्लिम लोग का नाम होता है।" 

'मेरा पूरा नाम अमनदीप है। दीप मुस्लिम लोगों के नाम में नहीं होता।" 

अगर हिन्दु के नाम में अमन हो सकता है तो मुस्लिम के नाम में दीप होने में क्या है---ऐसे भी कोई अपना नाम दिलीप कुमार रखने से हिन्दु नहीं हो जाता। 

'कैसी बातें कर रहे हैं दया भाई, इतनी छोटी बातें करना आपको शोभा नहीं देता।" 

'देखो अमन भाई, टालने से नहीं चलेगा। हमें प्रमाण चाहिए आपके हिन्दु होने का।" 

'मैं इसकी कोई जरूरत नहीं समझता, न मैं अपने आप को किसी धर्म के साथ जोड़ता हूं। हम केवल मानवता में विश्वास रखते हैं और वह ही हमारा धर्म है। आपको प्रमाण देने की मैं कोई जरूरत नहीं समझता।" 

'बहुत अकड़ नहीं दिखाने का अमन भाई। हमारे हिन्दु समाज में हिन्दु ही रह सकते हैं। इसलिए यह प्रमाण भी आपको देना होगा। नमस्कार।" 

अमन घर पहुंचा तो शुभ्रा ने उसका लटका चेहरा देखकर पूछा, 'खैरियत तो है?" 

'पता नहीं।" 

'पता नहीं? क्या मतलब?" 

'यहां एक शख्स रहता है जो मेरे खून का प्यासा है।" 

 'कौन?" 

'वही दया भाई, और कौन?" 

'अरे छोड़ो, उसकी बातों पर ध्यान न दिया करो। उसे मुंह ही मत लगाया करो।" 

'जानती हो आज क्या कह रहा था?" 'क्या?" 

'कि तुम मुस्लिम नहीं, इसका क्या प्रमाण है?" 

'ऐसा क्यों पूछ रहा था?" 

अमन ने पूरी बात सुनाई तो वह बोली, 'तुम उस नीच की बात की परवाह करना बन्द कर दो। क्या बिगाड़ लेगा वो तुम्हारा?" 

'तुला तो हुआ है वो मेरा कुछ न कुछ बिगाड़ने को। देखो!" 

'भूल जाओ उसे। आज देखो चाय के साथ क्या है!" 

'ओह! बटाका पोंहा।" 

अमन ने मुस्कराने की कोशिश की। 

'पापा, यह बटाका पोंहा होता है कि बटाटा पोंहा?" गुड़िया ने पूछ लिया। 

'तुम्हारे ख्य़ाल से क्या होना चाहिए?" उसने पूछा। 

'पता नहीं।" गुड़िया सोच में पड़ गयी। बोली, 'मुझे बटाटा कहने में ज्यादा अच्छा लगता है।" 

'तो बस फिर, आज से इसका नाम बटाटा पोंहा ही होगा।" 

गुड़िया को लगा, पापा इस समय उदार हो रहे हैं तो मौके का फ़ायदा उठाना चाहिए। बोली, 'पापा चाय पीकर मेरे साथ सांप-सीढ़ी खेलोगे?" 

वह टालते हुए बोला, 'यार सांप तो आज बहुत हो गया, आज रहने दो।" 

'कोई बात नहीं, आप भी सीढ़ी सीढ़ी खेल लेना।" 

चार साल की गुड़िया, जब भी पापा के साथ बैठकर सांप-सीढ़ी खेलती, तो सांप के मुंह में गोटी आ जाने पर रोने लगती। पापा ने इस कारण उसे छूट दे रखी थी कि वह केवल सीढ़ी-सीढ़ी का लाभ उठाए, सांप छोड़ दे। परिणाम स्वरूप वह हमेशा बाजी जीत जाती। अब उसका मनोबल इतना बढ़ गया कि वह पापा से कह रही है कि वह भी सीढ़ी-सीढ़ी खेलें, सांप छोड़ दें। 

अमन ने गुड़िया को अभी दो-तीन बाजी जिताईं थीं कि विश्वनाथ जी आ पहुंचे। अमन को जैसे उन्हीं के साथ की जरूरत थी। दया भाई की बातों से जो मन कलुषित हुआ था वह विश्वनाथ जी से बात करके काफ़ी कुछ शांत हो गया। 

अगली शाम जब वह ऑफ़िस से लौटा, तो भाग्य से दया भाई सामने नहीं पड़े। वह घर पहुंचा तो पीछे पीछे अनवर साहब भी आ पहुंचे। अमन उन्हें शाम के समय देख कर चौंका, 'अरे कमाल कर दिया, जनाब ,आपने तो। आजकल तो आसपास वालों की भी शाम को आने की हिम्मत नहीं पड़ती, कर्फ्यू के डर से।" 

'भई क्या बताएं। शुभ्रा जी के हाथ के पकौड़ों की याद आई तो रुका नहीं गया।" 

'क्या बात है! आपने तबियत खुश कर दी, अनवर साहब।" 

'एक बात कहूं?" अनवर साहब कहने लगे, 'आजकल मुझे अनवर न बुलाया करें, बस जॉन ही बुलाए। समझ रहे हैं न आप।" 

'खूब समझ रहा हूं। मैं तो खुद नाम में अमन होने से ही मुश्किल में हूं।" 

'अरे क्या बताएं आपको, मुझे तो इस अनवर नाम ने बहुत परेशान किया। जो भी खत आते है उन पर जे।अनवर ही लिखा रहता है। इसलिए शक के घेरे में लगातार बना रहता हूं। जा जा कर सबको बताना पड़ता है कि अनवर मेरा नाम नहीं तखल्लुस है, पर बहुत मुश्किल है सबको समझाना।" 

'और, आपके शायर दोस्तों की कोई खबर?" 

'कुछ नहीं। हां रहमत भाई एक बार जरूर मिले थे। अपनी पूरी फ़ैमिली के साथ। साबरमती स्टेशन पर फंसे हुए थे। कहीं बाहर से आ रहे थे। दंगों का सुनकर साबरमती में ही उतर गए। आगे अहमदाबाद स्टेशन जाना तो इतना खतरे से भरा नहीं था, लेकिन अहमदाबाद स्टेशन से जमालपुर पहुंचना तो खतरे से खाली नहीं था। कहने लगे-अनवर भाई हमें किसी तरह अपने घर पनाह दे दो। मैं जिन्दगी भर यह अहसान नहीं भूलूंगा। मैं कुछ समझ नहीं सका उनकी कैसे मदद करूं। मैंने अपनी मजबूरी समझाई। बताया कि पहले से ही मैं शक के घ्ोरे में हूं। यह भी बताया कि साबरमती में जहां-जहां पता लग रहा है, चुन-चुन कर मार रहे हैं। क्या बताऊं। मैं इतनी शर्मिंदगी महसूस करता रहा और अब तक कर रहा हूं कि एक रात भी चैन से नहीं सो पाया। मेरे इतने पुराने दोस्त, और मुझ से ऐसा टके सा जवाब मिला उन्हें।" अनवर साहब ने एक ठंडी सांस भरी। 

कुछ इधर उधर की बातें हुई। चाय-पकौड़ों का दौर पूरा हुआ और अनवर साहब ने अपनी घ्ाड़ी की तरफ देखा। सवा-सात। वो उठ खड़े हुए। बोले, 'अब मुझे फौरन निकलना चाहिए। आठ बजे कर्फ्यू से पहले साबरमती पहुंचना है।" 

अमन साथ चल पड़ा वाड्ज बस-अड्डे तक जाने के लिए। 

'नहीं आप तकल्लुफ न करें" अनवर साहब ने रोका, 'वाड्ज तक पैदल आने जाने में आठ से ऊपर का टाईम हो जाएगा।" 'चलिए, जहां साढ़े सात होंगे लौट पड़ूंगा।" 

'ठीक है। ज़रा ध्यान रखना टाईम का।" 

नाराणपुरा से वाड्स जाते हुए रास्ते में बहुत बड़ा मैदान पड़ता था। किसी कारण वहां की जमीन अभी प्लॉटों में नहीं बंटी थी। इस कारण उस सुनसान पड़े खाली भूखण्ड को सब मैदान की संज्ञा देते थे। बरसातों के बाद इस मौसम में, रेत के बीच काफ़ी झाड़-झंखाड़ भी उग आया था। 

अभी वे लोग मैदान पार के मेन रोड पर पहुंचे ही थे कि अनवर साहब ने घ्ाड़ी देखकर अमन से कहा, 'बस अब साढ़े सात हो गए हैं अब आप लौट चलिए। खुदा हाफ़िज।" 

सितम्बर के महीने का अंतिम सप्ताह चल रहा था। अंधेरा कुछ जल्दी ही होने लगा था। उस लम्बे चौड़े मैदान के बीच जो भावी सड़क का शॉर्ट-कट था जिससे कि वह लौट रहा था वहां तब कोई बिजली का खंभा नहीं था। बस अंधेरा ही अंधेरा था। अमन को ऐसा माहौल बहुत पसंद था। उसका मन हो रहा था कि वह कोई गाना गुनगुनाए। 

लेकिन तभी, कोई पांच-छ: परछाईयां एकाएक उसकी तरफ़ लपकी। उसे पता ही नहीं चला कि कैसे किसी ने उसके मुंह पर कपड़ा डाला। मुंह बंद करके, आंखों के आगे भी कपड़ा डाल कर दोनों हाथ पीछे बांध दिए। बात यहीं नहीं रुकी। उसे लगा उसकी पैंट खोली जा रही है। उस ज़माने में पैंट में ज़िप नहीं लगा करती थी। बटन ही होते थे। एक एक करके पैंट के बटन खुले और टार्च की रोशनी चमकी। फिर आवाज़ें सुनाई दी 'ठीक ही लग रहा है", कटवा तो नहीं।" 'बरोबर छे।" 'गलत आदमी को पकड़ने को बोल दिया। जावा दो!" किसी ने कहा और उसके हाथ खोल दिए गए। हुकुम हुआ, 'पीछे मुड़कर नहीं देखना साहब, वर्ना खल्लास।" 

जब तक वह होश संभालता और पैंट बांधता, वे परछाईयां विलुप्त हो चुकी थी। इस पूरे घटना-चक्र में बमुश्किल पांच मिनट लगे होंगे। 

वह तेज़-तेज़ कदमों से घर की तरफ़ जा रहा था, जितना तेज़ चल सकता था, चलकर वह इस अंधेरे इलाके से बाहर पहुंचना चाहता था। दिल की धड़कन बेकाबू हो रही थी। उसका दिमाग कुछ काम नहीं कर रहा था। आखिर ऐसा क्यों हुआ उसके साथ। इतना भयानक! आबरू लुटने जैसा हादसा। 

जरूर यह दया भाई का ही करा धरा है, उसे लगा। वही प्रमाण मांग रहा था। अमन का मन हो रहा था वह सामने पड़ जाए तो उसका मुंह नोच ले। उस दया भाई की गलीच मुस्कुराहट याद आती, तो उसका मुा तन जाता उसके दांत तोड़ने के लिए। इतना गुस्सा उसे कभी नहीं आया था किसी पर। 

आठ बजे से पहले ही वह कॉलोनी तक पहुंच गया। कॉलोनी के लोग हमेशा की तरह घेरा बनाए खड़े थे और दया भाई का व्याख्यान चल रहा था। 

'केम चौधरी साहेब, तबियत तो ठीक है।" दया भाई ने पूछा। 

 'जी।" अमन बिना उस तरफ़ देखे, बिना रुके, अपने घर की तरफ बढ़ गया। 

शुभ्रा ने उसे देखते ही पूछ लिया, 'क्या बात है? सब ठीक तो है?" 

'हूं", उसने टालते हुए कहा, 'एक गिलास पानी दे दो।" 

'ये बाल-वाल क्यों बिखर रहे हैं कहीं गिरे थे क्या? कोई चर-वर तो नहीं आया।" 

'पता नहीं, कुछ ऐसा ही समझ लो।" 

'हो सकता है पकौड़े खाने से पेट में गैस हो गई हो, कोई बात नहीं, लेट जाओ थोड़ी देर।" 

एक तो वह गुड़िया के सामने कुछ बताना नहीं चाहता था, दूसरा इस समय उसका बात करने का मन ही नहीं हो रहा था। वह आंखे बंद करके चुपचाप लेट गया और मन शांत करने के लिए लम्बी-लम्बी सांसे लेने लगा। दिमाग में जैसे एक भूचाल सा आया हुआ था। समुुंदरी भूचाल। पहाड़ सी ऊंची और विकराल लहरें थमने में ही नहीं आ रही थीं। उसे लग रहा था कि कहीं दिमाग की नसें फट ही न जाएं। 

शुभ्रा खाना बनाकर और नन्हीं को सुलाकर उसके पास आ बैठी। उसके माथे पर हाथ फेरा तो चौंकी, 'अरे तुम्हारा तो माथा तप रहा है। तुम्हें बुखार है क्या?" 

'नहीं, बुखार-वुखार कुछ नहीं, सिर्फ माथा गर्म है। ठीक हो जाएगा। तुम पहले हाथ रखती तो अब तक ठीक हो गया होता।" 

'तुम कुछ छिपा रहे हो, दीप। सच सच बताओ, हुआ क्या? चर ही आया था या---?" 

'बाद में बताऊंगा" वह धीमे से बोला, 'गुड़िया के सो जाने के बाद।" 

'ऐसी भी क्या बात!" वह धीमे से फुसफुसाई। 

'है।" अमन ने चेहरे पर मुस्कुराहट लाने की पूरी कोशिश की। 

'सुनो, खाना तैयार है, लगा दूं।" शुभ्रा ने पूछा। 

 'बिल्कुल।" 

रात के खाने के बाद अमन को आदत थी टहलते हुए पान की दुकान तक जाने की। कालोनी के बाहर ही मेन रोड पर थी दुकान। वह एक सादे पान की गिलोरी मुंह में रखता, एक मीठा पान शुभ्रा के लिए बंधवाता, और एक सिगरेट सुलगा कर थोड़ी चहलकदमी करता। ऐसी आदत उन दिनों बड़ी आम हुआ करती थी। तम्बाकू-सिगरेट के नुकसान तब तक उजागर नहीं हुए थे। इन दिनों रात के कर्फ्यू के चलते वह दुकान बन्द रहती थी। कभी उसे याद रहता तो पहले से पान लाकर रख लेता था। लेकिन आज तो प्रश्न ही नहीं उठता था। फिर भी आदतन वह बाहर निकला और कालोनी की गली में ही चहलकदमी करने लगा। दो तीन चर लगाने के बाद वह जैसे ही दया भाई के घर के सामने से निकल रहा था तो भीतर से आवाज़ आई, 'चौधरी साहेब, रुकना एक मिनट।" 

न चाहते हुए भी उसके कदम थम गए। दया भाई प्रकट हुए, तो बोले, 'हमसे नाराज़ हैं कुछ चौधरी साहेब?" 'आप से नाराज़गी दिखाकर हमें जान से हाथ धोना है?" 

'ऐसा क्यों बोलते हो साहेब?" 

'ऐसा ही है दया भाई। आपकी ताकत का हमें परिचय मिल गया है।" 

'कैसी बातें करते हो भाई। मैंने तो आपको यह पूछने को रोका कि शाम आपने हमसे बात नहीं किया, क्या नाराज़गी है।" 

'आपको सब पता है, भाई साहब!" 

'क्या पता है, क्या हुआ? कुछ बोलो न अमन भाई।" 

'आपको मेरे मुस्लिम न होने का प्रमाण चाहिए था, सो आपको मिल गया।" 

'सुनो, अमन भाई, हमारे साथ ऐसा कड़क ज़बान में बात नहीं करने का। क्या?--- हमको कैसे पता होगा आपके साथ क्या हो गया? हम पर किस बात का इल्जाम डाल रहे हो?" 

'सॉरी।" अमन को अपनी आवाज़ के इतना ऊंचा होने पर स्वयं हैरानी हो रही थी। 

'कोई बात नहीं। जाने दो अमन भाई। यह बताओ कि हुआ क्या? क्या तुम्हारा छान-बीन हुआ?" 

'छान-बीन? इसे आप छान-बीन कहते हैं। इस तरह बेइज़्जत करना और वो भी बिना किसी कसूर के? इसलिए कि आपको प्रमाण चाहिए था?" 

'मुझ पर क्यों बरस रहे हो अमन भाई? मैंने प्रमाण का बात जरूर किया, परन्तु इसका मतलब यह तो नहीं कि छान-बीन भी मैंने करवाया। हद करते हो अमन भाई। देखो हमारी बात ज़रा ध्यान से सुन लो।" 

'कहिए।" 

 'देखो, यह जो कुछ भी हुआ छान-बीन वगैरा, इससे आप को जो कष्ट पहुंचा यह तो ठीक नहीं हुआ, परन्तु वैसे एक हिसाब से ठीक हो गया। अब आप पर कोई मियां होने का संदेह नहीं करेगा। क्या? आप नास्तिक हो, कोई बात नहीं, परन्तु मियां नहीं हैं, यह सबके लिए संतोष की बात होगी।" 

'इतनी घ्रणा। पूरी मुस्लिम जात से ऐसी घ्रणा?" 

'ऐसा है अमन भाई, हमारा सोचने का तरीका आपसे फर्क है। हम तो यह मानते है कि यह मियां लोग की कौम, जब तक इधर में बाकी है, हमारे राष्ट्र को खतरा ही खतरा है। मुट्ठी भर लोग अरब से आए थे, आज इधर में दो पाकिस्तान तो बना चुके हैं, अब कश्मीर भी उनके निशाने पर है और जिस रफ्तार से इनकी संख्या बढ़ रही है, वो दिन दूर नहंी जब पूरा भारतवर्ष पाकिस्तान बन जाएगा। जानते हो अमन भाई, एक एक मियां चार चार शादी करता है और दो दर्जन से कम बच्चे नहीं पैदा करता। ऐसे में कितने दिन टिक पायेंगे हम इनके सामने? इसलिए अमन भाई, इनका सफाया जरूरी है। अच्छा है कि आप उनमें से नहीं हो।" 

'कैसी बातें करते हो दया भाई। हमारे तो इतने मुस्लिम दोस्त हैं, न तो किसी की एक से ज्यादा शादी हुई है न ही ज्यादा बच्चे हैं।" 

'अमन भाई, अब क्या बोले? आपको उनकी बात पर ज्यादा विश्वास होता है, हमारी बात गलत लगती है। यही दुर्भाग्यपूर्ण है, अरे अगर आप सच्चे राष्ट्रवादी हैं तो आपको इन लोगों के साथ दोस्ती नहीं पालनी चाहिए। समझ गए न अमन भाई! हम हमेशा आपका भला सोचकर बात करते हैं।" फिर अपनी घड़ी की तरफ देखकर बोले, 'अच्छा अब आप को और नहीं रोकेंगे। शुभ्रा बेन इन्तजार देखती होगी। नमस्ते!" 

भारी कदमों में वह घर की तरफ बढ़ गया। 'क्या बात हो गई थी?" शुभ्रा ने दरवाज़ा खोलते हुए पूछा। 'कब? अभी या शाम को।" 

'दोनों ही बता दो।" 

'गुड़िया सो गई क्या?" 

'हां सो गई।" 'ठीक है तो आओ बैठो। पहले शाम वाली बात से शुरू करता हूं।" उसने शाम वाली पूरी वारदात सुना दी। 

शुभ्रा ने एक लम्बी सांस भरी। बोली, 'हुआ तो बहुत बुरा, बॅट टेक इट इज़ी। खाली देखा ही तो उन कमबख्तों ने, कुछ ले तो नहीं लिया। फ़ॉरगेट इट।" 

अमन ने कहा, 'सोचो, अगर मेरी जगह सोमेश होता, जिसे पेशाब में रूकावट के कारण सर्कमसीज़न कराना पड़ा था, उसका ये क्या हाल करते?" 

'अरे, ऐसे कहां तक सोचेगे," शुभ्रा ने कहा, 'यह तो अगर साई बाबा भी आ जाते तब भी वही सलूक करते। ऐसे में कोई दिमाग का इस्तेमाल थोड़े ही करते हैं।" फिर पूछने लगी, 'क्या दया भाई से भी अभी इसी बारे में बात हो रही थी।" 

'हूं।" 

 'उसका क्या लेना देना है इससे?" 

 'इसका मतलब तुम समझी ही नहीं पूरी बात। यह सब कारस्तानी उस दयाभाई की ही तो है। उसी को प्रमाण चाहिए था मेरे मुस्लिम न होने का।" 

 'इतना घटिया इन्सान है वो?" 

'फिलहाल इस घटियापन का ही बोलबाला है। सभी उसके पीछे पीछे चल रहे हैं। नफ़रत होने लगी है मुझे यहां के इस मुर्दा माहौल से। घ्ाृणा का इतना ज़हर भर गया है यहां कि यह जगह अब रहने लायक नहीं रही। अब यह पहले वाला अहमदाबाद नहीं रहा।" 

शुभ्रा उसकी आंखों में देखते हुए धीरे से बोली, 'नहीं दीप, ऐसी बात तुम्हारे मुंह से अच्छी नहीं लगती। अगर हालात ऐसे बने हैं तो इसमें शहर का क्या दोष। ऐसे दया भाई तो कहीं भी हो सकते हैं। कब, कहां ऐसा ज़हर भर दें, कुछ नहीं कह सकते। बहुत दिन नहीं ठहरेगा यह ज़हर। देखना जल्दी सब नार्मल हो जाएगा।" 

'मुझे तो लगता है इस दौरान नफ़रत के जो बीज बो दिए गए हैं उनका असर पुश्तों तक चलेगा।" 

'यह तो है। नफ़रत फैलाने में घड़ियां लगती हैं और मिटाने में सदियां।" 

'बिल्कुल ठीक।" 

'वैसे मैं एक बात और भी कहना चाहती हूं--- कह दूं?" 

 'जरूर!" 

'देखो दीप, घ्रणा केवल वही नहीं जो दया भाई जैसे लोग फैला रहे हैं--- घ्रणा वो भी है जो तुम्हारे मन में पल रही दया भाई के प्रति।" 

'कहना क्या चाह रही हो।" 

'यही कि वह घ्रणा भी कम घतक नहीं। मैं तो सोचती हूं--- उन लोगों के बारे में भी घ्रणा से नहीं, प्यार से भर कर सोचो। आखिर वे कोई अपराधी तत्व नहीं। अपनी तरफ़ से वे भी जो कर रहे हैं राष्ट्र हित में कर रहे हैं। बस दिशा भटक गए हैं। बहके हुए लोग हैं वे। अगर अब तुम्हें किसी भी कारण से अपना मानने लगे हैं तो तुम्हें मुंह मोड़ने के बजाए उन्हें अपना मान कर अपनी बात समझाने की कोशिश करनी चाहिए।" 

'क्या बात करती हो, दया भाई जैसे लोगों पर कोई असर होगा हमारी बात का?" 

'कुछ तो होगा, प्यार से समझाओगे, तो जरूर होगा। चाहे ज़रा सा ही हो। पूरा असर होने में तो खैर सदियां लग जाएंगी, पर जो भी हो सकता है, प्यार से ही हो सकता है, नफ़रत से नहीं।" 'बड़ा मुश्किल रास्ता सुझा रही हो।" 

'तुम्हारे लिए कोई मुश्किल नहीं।"

2 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल मंगलवार (19-08-2014) को "कृष्ण प्रतीक हैं...." (चर्चामंच - 1710) पर भी होगी।
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श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कविता रावत said...

गुरूदीप खुराना जी उनके उपन्यास ''रोशनी में छिपे अंधेरे" से परिचय और उपन्यास के अंश प्रस्तुति के लिए धन्यवाद