Sunday, January 25, 2009

पहले फिराक को देखा होता, अब तो बहुत कम बोलते हैं

वरिष्ठ कवि अनूप सेठी के हम आभारी हैं, जिन्होने विजय वर्मा सम्मान समारोह के दौरान, वरिष्ठ आलोचक नामवर सिंह द्वारा दिए गए वक्तव्य को अपने मोबाइल फ़ोन से रिकार्ड कर हम तक पहुंचाया। ज्ञात हो कि कथाकार योगेंद्र आहूजा की पुस्तक अंधेरे में हंसी और कवि अलोक श्रीवास्तव की गजलों की किताब आमीन को, 17 जनवरी 2009 को मुम्बई में, वर्ष 2008 के विजय वर्मा सम्मान से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर कथाकर योगेंद्र आहूजा द्वारा दिए गए वक्तव्य को आप पहले ही पढ चुके हैं।




Friday, January 23, 2009

दोर्जे गाईड की बातें



रोहतांग
बर्फ से ढका हुआ है। लाहौल में जनजीवन की हलचल को जानने के लिए टेलीफोन के सिवा कोई दूसरा रास्ता दिखाई देता है। केलांग लाहुल का हेडक्वार्टर है जहां हमारे प्रिय कवि अजेय रहते है। फोन की घंटी बजती है, देखता हूं अजेय का नाम उभर रहा है। बर्फ की दीवार के पार से सीलन भरे मौसम की खामोशी को तोड़ती अजेय की आवाज सुनायी देती है। कुछ मौसम की, कुछ अपनी कारगुजारियों की और एक हद तक साहित्य की दुनिया की हलचलों पर बातें होती हैं। रोहतांग की सरहद के पार से दुनिया जहान की हलचलॊं के साथ हिस्सेदारी की बेचैनी से भरा अजेय बताता है कुछ कविताएं लिखी हैं उसने इस बीच। पर उन पर काम होना अभी बाकी है। जब तक कवि उन्हें मुकम्मल करे तब तक के लिए अजेय की कुछ चुनिंदा कविताओं को यहां सबके पढ़ने के लिए रख दिया जा रहा है। पढ़ें अपनी कविताओं के बारे में अजेय का कहना है-


''कविता मेरे लिए आत्माभिव्यक्ति का एक सशक्त माध्यम है। मैं अपनी कविताओं द्वारा अपने पहाड़ी जनपद की उस सैलानी -छवि को तोड़ना चाहता हूं जो मेरे बर्फ़ीले जनपद को रहस्यभूमि (वंडरलेंड) बना कर पेश करते हैं। मैं यह बताना चाहता हूं कि यहां भी लोग शेष विश्व के पिछड़े इलाकों और अनचीन्हे जनपदों के निवासियों की भांति सुख-दुख को जीते हैं-पीड़ाओं को झेलते और उनसे टकराने वाले लोग बसते हैं। जिनके अपने छोटे-छोटे सपने और अरमान हैं। हम और अध्कि रहस्य, रोमांच, मनोरंजन अथवा शो-पीस बनकर चिड़ियाघर या अजायबघर की वस्तु बन कर नहीं जीना चाहते।"

अजेय

कविता खत्म नहीं होती
(मेन्तोसा1 पर एडवेंचर टीम)

पैरों तक उतर आता है आकाश
यहां इस ऊँचाई पर
लहराने लगते हैं चारों ओर
मौसम के धुंधराले मिजाज़
उदासीन
अनाविष्ट
कड़कते हैं न बरसते
पी जाते हैं हवा की नमी
सोख लेते हैं बिजली की आग।

कलकल शब्द झरते हैं केवल
बर्फीली तहों के नीचे ठंडी खोहों में
यदा-कदा
अपने ही लय में टपकता रहता है राग।

परत-दर-परत खुलते हैं
अनगिनत अनछुए बिम्बों के रहस्य
जिनमें सोई रहती है ज़िद
छोटी सी
कविता लिख डालने की।

ऐसे कितने ही
धुर वीरान प्रदेशों में
निरंतर लिखी जा रही होगी
कविता खत्म नही होती,
दोस्त ....................
संचित होती रहती है वह तो
जैसे बरफ
विशाल हिमनदों में
शिखरों की ओट में
जहाँ कोई नही पहुँच पाता
सिवा कुछ दुस्साहसी कवियों के
सूरज भी नहीं।

सुविधाएं फुसला नही सकती
इन कवियों को
जो बहुत गहरे में नरम और खरे
लेकिन हैं अड़े
संवेदना के पक्ष में
गलत मौसम के बावजूद
छोटे-छोटे अर्द्धसुरक्षित तम्बुओं में
करते प्रेमिका का स्मरण
नाचते-गाते
घुटन और विद्रूप से दूर

दुरूस्त करते तमाम उपकरण
लेटे रहते हैं अगली सुबह तक स्लीपिंग बैग में
ताज़ी कविताओं के ख्वाब संजोए
जो अभी रची जानी हैं।


1. लाहुल की मयाड़ घाटी में एक पर्वत शिखर(ऊँचाई 6500मी0)


गाँव में चक्का तलाई

मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।
गुज़र गई है एक धूल उड़ाती सड़क
गाँव के ऊपर से
खेतों के बीचों बीच
बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ
लाद ले जाती हैं शहर की मंडी तक
नकदी फसल के साथ
मेरे गाँव के सपने
छोटी छोटी खुशियाँ --
मिट्टी की छतों से
उड़ा ले गया है हेलीकॉप्टर
एक टुकड़ा नरम धूप
सदिZयों की चहल पहल
ऊन कातती औरतें
चिलम लगाते बूढ़े
`छोलो´ की मंडलियाँ
और विषअमृत खेलते बच्चे।
टीन की तिरछी छतों से फिसल कर
ज़िन्दगी
सिमेंटेड मकानों के भीतर कोज़ी हिस्सों में सिमट गई है
रंगीन टी वी के
नकली किरदारों में जीती
बनावटी दु:खों में कुढ़ती --
´´कहाँ फँस गए हम!
कैसे निकल भागे पहाड़ों के उस पार?´´
आए दिन फटती हैं खोपड़ियाँ जवान लड़को की
बहुत दिन हुए मैंने पूरे गाँव को
एक जगह/एक मुद्दे पर इकट्ठा नहीं देखा।
गाँव आकर भूल गया हूँ अपना मकसद
अपने सपनों पर शर्म आती है
मेरे सपनों से बहुत आगे निकल गया है गाँव
बहुत ज्यादा तरक्की हो गई है
मेरे गाँव की गलियाँ पक्की हो गई हैं।


आलू का सीज़न

गोली मार टरक को यार।
अब तो रात होने को है
ठंड भी कैसी है
कमबखत
वो सामने देखते हो लेबर कैम्प
सोलर जल रहा जहाँ
मेटनी के तम्बू में
चल , दो घूंट लगाते हैं
जीरे के तड़के वाली
फ्राईड मोमो के साथ
गरमा जाएगा जिसम
गला भी हो जाएगा तर
दो हाथ मांगपत्ता हो जाए
पड़े रहेंगें रात भर
सुबह तक पटा लेगें किसी उस्ताद को हज़ार पाँच सौ में
खुश हो जाएगी घरवाली।


छतड़ू में कैम्प फायर

ऐसे ही बैठे थे
`फायरप्लेस´ के सामने
हम पाँच छह जने
कि अचानक दीवार पर टंगी सूली से
उतर आया जीजस
चुपचाप हमारी बकवास में शमिल हो गया।

रात भर बतियाते रहे हम
अलाव तापते
बीयर के साथ
दुनियादारी की बातें
मौसम की
रंगों
कीट पतंगों की
आदमी की, पैसों की
कफ्र्यू और दंगों की
हँसता रहा पैगम्बर
रातभर।

अंतत:
सरूर में
पप्पू ने गिटार उठाई
शामू ने बाँसुरी
मैंने सीटी
स्वामी ने ताली बजाई
और झूमते हुए ईश्वर के बेटे ने गाया
एक सुन्दर यहूदी गीत-
``- - ईश्वर मरा नहीं
सो रहा है।´´


`ट्राईबल´ में स्की-फेस्टिवल

सन सन सर्र सर्र
बर्फ पर
चटख झंडे
लाल पीले नीले
मजेन्टा और पर्पल और फलॉरेसेन्ट बच्चे
पाऊडर स्कीईंग
वाह जी वाह!
अभी कल ही तो पड़ी है
पाँच-छह फुट समझो
इस बार तो
कुल मिलाकर
गाँव में बड़ी मस्ती है
उम्मीदें जगी है
बुजुर्गों ने कहा है बच जाएंगी फसलें ।
बड़ा महंगा होगा
नही शर्मा जी,
यह `इकुपमिंट´ ?
इंपोर्टिड.........
अच्छा, `स्मगल्ड´ है ?
वाह जी वाह!
मनाली वाले हैं
दो चार `इंस्ट्रक्टर´
कुछ `फोर्नर´
ये `फोर्नर´ भी बस ......
और ये छोकरू अपने
उनके पीछे-पीछे ।
वैसे एक बात कहूं सर,
यह एडवेंचर
और मस्ती-
स्वस्थ मनोरंजन है
`टॉनिक´ कहो `.......काइंड आफ´ ।
वही तो,
हमारे ऋषि मुनि
क्या करते थे दुर्गम कन्दराओं में ?
एडवेंचर तो
`हेल्दी थिंकिंग डिवलेप´ करता है जनाब ।
`एक्ज़ेक्टली सर !`
और कैसे पीके `गच्च´ रहते हैं
यहां के लोग
पिछली बार याद है
कितना नाचे थे
कपूर साब
रात भर `छंका`.........
और कैसी प्यारी-प्यारी लड़कियां आई थीं
दारचा से
वाह जी वाह!
गिल साब का भांगडा
जगह नहीं थी
हाँल में तिल धरने को ।
मैंने तो डी´स्साब से कहा
यह रौनक मेला लगे रहना चाहिए
ट्राईबल में
और क्या है
टाईम पास ।
हाँ जी, हाँ ।





केलंग
(सर्दियां -2004)

1/ हरी सिब्ज़याँ

`फ्लाईट´ में सब्ज़ी आई है
तीन टमाटर
दो नींबू
आठ हरी मिरचें
मुट्ठी भर धनियाँ
सजा कर रखी जाएँगी सिब्ज़याँ
`ट्राईबेल फेयर´ की स्मारिका के साथ
महीना भर
जब तक कि सभी पड़ोसी सारे कुलीग
जान न लें
फ्लाईट में हरी सिब्ज़याँ आई है।

2/ पानी

बुरे बक्त में जम जाती है कविता भीतर
मानो पानी का नल जम गया हो
चुभते हैं बरफ के महीन क्रिस्टल
छाती में
कुछ अलग ही तरह का होता है, दर्द
कविता के भीतर जम जाने का
पहचान में नहीं आता मर्ज़
न मिलती है कोई `चाबी´
`स्विच ऑफ´ ही रहता है अकसर
सेलफोन फिटर का।

3/ बिजली

`सिल्ट´ भर गया होगा
`फोरवे´ में
`चैनल´ तो शुरू साल ही टूट गए थे
छत्तीस करोड़ का प्रोजेक्ट
मनाली से `सप्लाई´ फेल है
सावधान
`पावर कट´ लगने वाला है
दो दिन बाद ही आएगी बारी
फोन कर लो सब को
सभी खबरें देख लो
टी. वी. पर
सभी सीरियल
नहा लो जी भर रोशनियों में खूब मल-मल
बिजली न हो तो
ज़िन्दगी अँधेरी हो जाती है।

4/ सड़कें

अगली उड़ान में `शिफ्ट` कर दिया जाएगा
`पथ परिवहन निगम´ का स्टाफ
केवल नीला टेंकर एक `बोर्डर रोड्स´ का
रेंगता रहेगा छक-छक-छक
सुबह शाम
और कुछ टेक्सियाँ
तान्दी पुल-पचास रूपये
स्तींगरी-पचास रूपये
भला हो `बोर्डर रोड्स´ का
पहले तो इतना भी न था
सोई रहती थी सड़कें, चुपचाप
बरफ के नीचें
मौसम खुलने की प्रतीक्षा में
और पब्लिक भी
कोई कुछ नहीं बोलता ।

दोर्जे गाईड की बातें
(ग³् स्ता³् हिमनद का नज़ारा देखते हुए)


इससे आगे?
इससे आगे तो कुछ भी नहीं है सर!
यह इस देश का आखिरी छोर है।
इधर बगल में तिबत है
ऊपर कश्मीर
पश्चिम मे जम्मू
उधर बड़ी गड़बड़ है
गड़बड़ पंजाब से उठकर
कश्मीर चली गई है जनाब
लेकिन हमारे पहाड़ शरीफ हैं
सर उठाकर
सबको पानी पिलाते हैं
दूर से देखने मे इतने सुन्दर
पर ज़रा यहाँ रूककर देखो .................
नहीं सर,
वह वैसा नहीं है
जैसा कि अदीब लिखता है-
भोर की प्रथम किरणों की
स्वर्णाभा में सद्यस्नात्
शंख-धवल मौन शिखर,
स्वप्न लोक, रहस्यस्थली .......
वगैरा-वगैरा
जिसे हाथों से छू लेने की इच्छा रखते हो
वो वैसा खामोश नहीं है
जैसा कि दिखता है।
बड़ी हलचल है वहाँ दरअसल
बड़े-बड़े चट्टान
गहरे नाले और खì
खतरनाक पगडंडियाँ हैं
बरफ के टीले और ढूह
भरभरा कर गिरते रहते हैं
गहरी खाईयों में
बड़ी ज़ोर की हवा चलती है
हिìयाँ काँप जाती हैं, माहराज,
साक्षात् `शीत´ रहता है वहाँ!
यहाँ सब उससे डरते हैं
वह बरफ का आदमी
बरफ की छड़ी ठकठकाता
ठीक `सकरांद´ के दिन
गाँव से गुज़रते हुए
संगम में नहाता है
इक्कीस दिनों तक
सोई रहती है नदियाँ
दुबक कर बरफ की रज़ाई में
थम जाता है चन्द्रभागा का शोर
परिन्दे तक कूच कर जाते हैं
रोहतांग के पार
तन्दूर के इर्द गिर्द हुक्का गुडगुड़ाते बुजुर्ग
गुप चुप बच्चों को सुनाते हैं
उसकी आतंक कथा।
नहीं सर
झूठ क्यों बोलना?
अपनी आँखों से नहीं देखा है उसे
पर कहते हैं
घर लौटते हुए
कभी चिपक जाता है
मवेशियों की छाती पर
औरतें और बच्चे
भुर्ज की टहनियों से
डंगरो को झाड़ते हैं-
``बर्फ की डलियाँ तोडो
`डैहला´ के हार पहनो
शीत देवता
अपने `ठार´ जाओ
बेज़ुबानों को छोड़ो´´
सच माहराज, आँखों से तो नहीं............
कहते हैं
गलती से जो देख लेता है
वहीं बरफ हो जाता है
`अगनी कसम´।
अब थोडा अलाव ताप लो सर,
इससे आगे कुछ नहीं है
यह इस देश का आखिरी छोर है
`शीत´ तो है यहाँ
उससे डरना भी है
पर लड़ना भी है
यहाँ सब उससे लड़ते हैं जनाब
आप भी लड़ो।

Saturday, January 17, 2009

भाषा एक उत्तोलक है

"रात किसी पुरातन समय का एक टुकड़ा है, जिसे सन्नाटे ने थाम रखा है।" बहुआयामी काव्य-भाषा से गूंजता योगेन्द्र आहूजा का गद्य उनके कथा संग्रह "अंधेरे में हंसी", उनके रचना कौशल का ऐसा साक्ष्य है जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि भाषा एक उत्तोलक है। अनुभव के संवेग से पैदा हुई उनकी कहानियों की भाषा सिर्फ अपने समय की शिनाख्त करने वाली है बल्कि कहा जा सकता है कि रचनाकार की जीवन दृष्टि को भी पाठ्क के सामने प्रस्तुत कर सकने में सक्षम है। भाषा रूपी इसी उत्तोलक से योगेन्द्र आहूजा ने अपनी उस पक्षधरता को भी साफ किया है जो पुनर्निमाण और खुलेपन की उस षड़यंतकारी कथा का पर्दा फाश करने वाली है जिसने मनुष्यता के बचाव में रचे गये तमाम ऐतिहासिक प्रयासों को वातावरण में शेष बचे रहे धुधंलके के साथ धूल के ढेर में दबा दिया है।
उत्तोलक की वह सभी किस्में जो अपने आलम्ब के कारण अलग पहचान बनाती है, योगेन्द्र आहूजा के आयास को ऊर्जा में या अनुभव की ऊर्जा को आयास में बदलकर कहानियों के रूप में सामने आयी हैं। नींबू निचोड़ने की मशीन भी उत्तोलक ही है। अनुभव के रसों से भरा नींबू और उसका तीखा स्वाद ही योगेन्द्र आहूजा की कथाओं का रस है- "वही जो भूतपूर्व सोवियत संघ के राष्ट्रपति थे, जिनके माथे पर जन्म से एक निशान है, जो अपने देश से ज्यादा अमरिका में लोकप्रिय थे, जो वोदका नहीं छूते, जिनकी शक्ल के गुड्डे पश्चिमी बाजारों में धड़ाधड़ बिकते थे, जो खुलेपन और पुनर्निमाण के प्रवक्ता थे, और आजकल कहां हैं, पता नहीं। गोर्बाचोव, हम मामूली लोगों की इस आम फ़हम कहानी में?"
दसवें विजय वर्मा कथा सम्मान से योगेन्द्र आहूजा को उनके कथा संग्रह अंधेरे में हंसी पर सम्मानित किया गया है।सम्मान समारोह आज दिनांक 17/1/2009 को मुम्बई में सम्पन्न हुआ सम्मान समारोह में अपनी रचना प्रक्रिया का खुलासा कथाकर योगेंद्र ने कुछ यूं किया-


वक्तव्य

योगेंद्र आहूजा

स्व. विजय वर्मा की स्मृति में स्थापित इस पुरस्कार के लिये मैं हेमंत फाउंडेशन के नियामकों संतो्ष जी और प्रमिला जी और अन्य सदस्यों और आप सबका आभार व्यक्त करना चाहता हूँ । मेरे लिये यह एक खास क्षण है और इसे बहुत दूर तक, शायद जीवन भर एक गहन स्मृति की तरह मेरे साथ रहना है। इस अवसर पर खुशी महसूस करना स्वाभाविक है, लेकिन इस समय जिन एहसासों के बीच हूँ, उन्हें बताने के लिये खु्शी शब्द बहुत नाकाफी है। ऐसे मौकों पर तमाम मिले जुले एहसासों की आँधी से, एक भावनात्मक तूफान से गुजरना होता है । मन कच्ची मिट्टी के घड़े जैसा होता है जिसमें लगता है कि इतना प्यार समेट पाना मुश्किल है - और दूसरी ओर बहुत सारे दरकिनार कर दिये गये सवाल और हमेशा साथ रहने वाले कुछ संशय, शंकायें और दुविधायें ऐसे क्षणों में एक साथ सिर उठाते हैं, समाधान माँगते हुए । मेरी अभी की मन:स्थिति में एक रंग संकोच और लज्जा का भी जरूर होगा। 72 वर्ष की उम्र में बोर्गेस ने, जो निस्संदेह बीसवीं सदी के सबसे बड़े साहित्यिक व्यक्तित्वों में से एक थे, कहा था कि वे अभी भी कवि बनने की कोशिश में लगे हैं । मैं भी अपने बारे में यही कह सकता या कहना चाहता हूँ कि लेखक बनने की को्शिश में लगा हूँ - अपनी रचनाओं को लेकर किसी आश्वस्ति या सुकून से बहुत दूर । संकोच की एक वजह तो यह है और दूसरी ---


मैं यहाँ आप सबके सामने जो मेरे आत्मीयजन, मित्र और पाठक हैं, एक कनफेशन करना चाहता हूँ। मैं सचमुच नहीं जानता लेखक होना क्या होता है, कोई कैसे लिखता है। मैं लेखक नहीं, सिर्फ एक स्टैनोग्राफर हूँ। एक मुंशी महज, या रिकार्डकीपर। लिखता नहीं, सिर्फ कुछ दर्ज कर लेता हूँ। जो थोड़ा बहुत लिखा है वह दरअसल किसी और ने लिखवाया है । शायद आपको लगे कि मैं ऐसा कहकर लिखने की प्रक्रिया को अतींद्र्रिय, रहस्यात्मक या जादुई बना रहा हूँ । शायद मैं किसी इलहाम या दूसरी दुनिया के संदे्शों की बात की रहा हूं। नहीं, ऐसा बिल्कुल नहीं है, मैं पूरी तरह इहलोक का वासी हूँ, अध्यात्म से अरुचि रखने वाला और अपने जीवन में रेशनेलिटी और तर्कबुद्धि से चलने वाला। लेकिन मेरा एक संवाद जरूर है अलग अलग वक्तों में हुए सार्वकालिक महान लेखकों, महाकवियों, विचारकों, मनीषियों से, जो मृत्योपरांत भी मेरे कानों में कभी कभी कुछ कह जाते हैं। मैं उनकी फुसफुसाहटें रिकार्ड कर लेता हूँ, उन्हें समकालीन संदर्भो से जोड़कर और एक आधुनिक शिल्प में तब्दील कर । मैं इतना ही श्रेय लेना चाहता हूँ कि वह संवाद बना रहे इसकी एक सचेत को्शिश मैंने लगातार की है, और हाँ शायद स्मृति को जागृत रखने की भी - बेशक रचनाओं की कमियों की जिम्मेदारी तो मेरी ही है। हमारे यहाँ कहा गया है कि गुरू कोई एक, केवल एक ही होना चाहिये। यशपाल जी ने कहीं लिखा था कि दत्तात्रेय ने अपने 20 या 22 गुरू बनाये थे और इसके लिये निंदा और परिहास का पात्र बने थे। यशपाल जी लिखते हैं, मैं नहीं जानता मैं कितनी निंदा का पात्र हूँ, क्यों कि मेरे गुरूओं की संख्या तो 20 से कहीं ज्यादा है। वे सैकड़ों तो हैं ही अगर हजारों नहीं, जिनमें न जाने कितनी भाषाओं और देशों के लेखक, कवि, विचारक, संत, दृ्ष्टा और दार्शनिक शामिल हैं । मैं इस संबंध में यशपाल जी का ही अनुकरण करना चाहता हूँ । मेरे भी तमाम गुरू हैं - अलग अलग वक्तों के तेजस्वी, विराट और मेधावी मस्तिष्क, जिनसे सीख पाया - कोई आस्था या गुरुमंत्र जैसी चीज नहीं, बल्कि उसके विपरीत, संदेह करना और सवाल करना, लेकिन संदेहवाद को भी कोई मूल्य न बनाना, संदेह पर भी संदेह करना । और अपनी भा्षा के वे अग्रज लेखक जिन्होंने खुद के उदाहरण से बताया कि जीवन में सृजन और कर्म का रिश्ता क्या होता है, रचनाकार के दायित्व और लिखित शब्द की गरिमा के क्या मानी होते हैं । उनमें से तमाम ऐसे हैं जिन्हें जीवन भर रो्शनियाँ नसीब नहीं हुई। हमारी भा्षा के सबसे बड़े आधुनिक कवि मुक्तिबोध के जीवन काल में उनकी कोई किताब प्रकाशित नहीं हुई और यह उनकी आखिर तक अधूरी तमन्ना रही कि उनके नाम का कोई बैंक खाता हो । मुक्तिबोध, शैलेश मटियानी और मानबहादुर सिंह ने जो जीवन जिया और जैसी मौतें पायीं, उसके ब्यौरे हमें स्तब्ध और निर्वाक करते हैं। ये सब मेरे गुरूओं में से हैं --- और जीवन में सौभाग्य की तरह आये वे सीनियर और समकालीन लेखक, जिन्होंने बेपनाह प्यार और भरोसा दिया और असंख्य बार यह दर्शा कर अचंभित किया कि एक व्यक्ति दूसरे के लिये कितनी बड़ी मदद हो सकता है, कितनी खुशी बाँट सकता है। मैं उनका आभार उस मदद और खुशी के लिये नहीं, इसलिये करना चाहता हूँ कि उन्होंने मुझे ऐसे विचारों से बचा लिया कि इस धरती पर मनु्ष्य एक बुराई । मैं इन सब चीजों, बातों को विस्मरण के हामी इस वक्त में एक जिद की तरह याद रखना चाहता हूँ, समझदारों के द्वारा पुराना और पिछड़ा समझा जाने की कीमत पर भी । कोई भी शख्स केवल एक शख्स नहीं होता, वह तमाम शख्स होता है, यहाँ तक कि वह पूरी मानव जाति होता है । इसी तरह कोई भी लेखक केवल एक लेखक नहीं होता, उसमें जीवित मृत, अपनी और दूसरी भाषाओं के, और अलग अलग देशों और वक्तों के तमाम लेखक और लोग शामिल होते हैं । एक अकेला लेखक होना नामुमकिन है । इसलिये यहाँ अकेले खड़ा होना मुझे संकोच और लज्जा से भर रहा है ।

आभारी हूँ लेकिन यह अवसर सिर्फ आभार व्यक्त करने का नहीं । इसे एक उत्सव की तरह मनाना इस मौके को गँवा देना, सिर्फ बरबाद करना होगा । उत्सव या जश्न का कोई कारण, कोई मौका नहीं । मुम्बई और उसके साथ पूरे देश को पिछले दिनों एक दु:स्वप्न से गुजरना पड़ा है। बीस बरस पहले जो आर्थिक प्रायोजना जोशो खरो्श से लागू की गयी थी, अब उसकी साँसें मंद पड़ रही हैं । जिन जीवनमूल्यों को नवजागरण और स्वतंत्रता आंदोलन के एक लंबे दौर में हासिल किया गया, यह जैसे उनकी प्रति अभिव्यक्ति का वक्त है । विवेक के लुंज होने के तमाम संकेत है। अब जो कुछ भी "दूसरा" है, दुश्मन है - दूसरा धर्म, भाषा, इलाका, पहनावा, विचार यह प्रतिक्रियावाद के प्रसार का, उत्पीड़कों और मतांधों का स्पेस बढ़ते जाने का एक बेहद खतरनाक समय है ऐसे में इस मौके का सही इस्तेमाल लेखनकर्म की प्रकृति, प्रयोजन और उद्देद्गय पर, लेखक के कार्यभारों पर दुबारा विचार करने के लिये हो सकता है। कुछ सवाल होते हैं जिनके कोई अंतिम समाधान नहीं होते और उन पर बार बार सोचते रहना, यह रचनाकर्म का ही हिस्सा होता है । मसलन, कोई क्यों लिखता है और लिखने से क्या होता है । In the beginning was the word, इन शब्दों में बाइबिल बताती है कि सृ्ष्टि की शुरुआत शब्द यानी ध्वनि से हुई थी और इसी से मिलती जुलती बात आधुनिक विज्ञान कहता है कि यह सारी सत्ता, पूरी कायनात, जो कुछ भी अस्तित्वमान है, वह एक बिग बैंग, एक महाविस्फोट से अस्तित्व में आया । ध्वनियाँ और विस्फोट और वह अनंत खामोशी जिसमें धार्मिकों के अनुसार एक दिन सब कुछ विलीन हो जायेगा ईश्वर के सृजन सही, लेकिन मनुष्य का काम उनसे नहीं चलता । उसे कोरी आवाजों और धमाकों की नहीं, वाक्यों की जरूरत होती है जो जूतों, जहाजों, घड़ियों, सीढ़ियों, नक्शों और नावों इत्यादि की तरह मनु्ष्य को अपने लिये खुद बनाने होते हैं । अपने कमरे या कोने में धीरज के साथ कोरे कागज का सामना करता, किसी अज्ञात, रहस्यमय अंत:प्रेरणा की दस्तक सुनता, अपने भीतर एक उथल पुथल और धुकधुकी का पीछा करता लेखक भी सिर्फ यही तो करता है । वाक्य बनाता है, उसमें कौमा और विराम चिह्नों को इधर इधर करता हुआ, बिना जाने कि उनका क्या हश्र होगा, वे कहाँ तक जायेंगें । मगर उसकी आकांक्षायें और इरादे बहुत बड़े होते हैं - अपने वक्त की टूटफूट और त्वरित बदलावों को समझना, उनमें से किसी खास को रेखांकित करना, संदेहों का इजहार, कोई स्वीकारोक्ति, पुराने विचारों की पुनर्परीक्षा, केंद्रीयताओं का प्रश्नांकन - पूरे समाज, पूरे अर्थतंत्र और मनुष्य के मन का अपनी आंकाक्षाओं के अनुसार पुनर्निर्माण । चाहता है चीख और खामो्शी के बीच के सारे अर्थों को समेट ले । दुनिया उसकी आंकाक्षाओं के रास्ते पर नहीं चलती, और उसकी उसकी आकांक्षाओं को दुनिया के किसी कोने में, कहीं हाशिये पर ही थोड़ी सी जगह मिल पाती है। मुझे लगता है कि आने वाले वक्तों में वह थोड़ी सी जगह भी छिनने वाली है। शब्द की सत्ता पर खतरे बढ़ते जा रहे हैं, बाहरी और भीतरी दोनों तरह के । साहित्य की दुनिया में उत्सवधर्मिता, तात्कालिक उत्तेजना और एक धोखादेह किस्म के रोमांच का अधिकाधिक बढ़ते जाना, इसे मैं एक भीतरी खतरे के रूप में देखता हूँ, और बाहरी खतरा हमारे समय की तेज रफ्तार जितनी देर हम अपनी मेधा की पूरी शक्ति से अपने वक्त को समझने की को्शिश करते हैं, उतनी देर में वक्त बदल जाता है। हमारे वक्त में संक्रमण की, बदलाव की रफ्तार अभूतपूर्व है। हमारे रा्ष्ट्रीय और सामाजिक जीवन में लगातार नयी सत्तायें उभर रही हैं और नये गठजोड़ बन रहे हैं। वे लगातार व्याख्या, निगरानी और संधान की माँग करते हैं और यह जोखिम बना रहता है कि इस को्शिश में जितना वक्त लगेगा, उतनी देर में वे कुछ और बदल चुके होंगे । इस तेज रफ्तार में लेखकों के लिये खतरा यह है कि आप थोड़ी देर को असावधान हुए और समाज के स्पंदनों, उसके अतीत और आगत की मीमांसा की आपकी सामर्थ्य चुकी। खतरा यह है कि खुद विचार करने में असमर्थ होकर लेखक बाजार की डिब्बाबंद और रेडीमेड चीजों की तरह तैयारशुदा विवेचनाओं से काम चलाने लगे । हमारे इस विचारशिथिल वक्त में बने बनाये आकर्षक विचारों की कोई कमी नहीं - इतिहास का अंत, विचार का अंत, परिवार, चेतना, स्मृति, आकांक्षाओंश और मानवीय संबंध यानी जीवन में जो कुछ भी मूल्यवान था, सबका अंत - और लेखक की मृत्यु और सभ्यताओं का संघर्ष । हमारे चारों तरफ ऐसे विचारों और व्याख्याओं का एक घना जाल है जिसे पेशेवर बौद्धिकों और चालाक चिंतकों ने बुना है, वे प्रखर और प्रतिभाशाली हैं, इसमें क्या शक । वे कहते हैं कि पिछले दो तीन दशकों में कुछ ऐसे अप्रत्या्शित, सर्वव्यापी और मूलगामी परिवर्तन हुए हैं जिन्होंने सब कुछ बदल डाला है और इन परिवर्तनों को समझने के लिये पहले के संदर्भ, उपकरण और प्रत्यय अनुपयोगी हैं, मनुष्य ने अब तक जो भी ज्ञान विज्ञान अर्जित किया है, बेकार है, इन परिवर्तनों के आगे बेबस है । अब एक उत्तर आधुनिक, उत्तर औद्द्यौगिक, उत्तर समाजवादी, तकनीकी समाज सामने है । जो नयी विश्व व्यवस्था बन रही है, वही मुकददर है । वे विकसित टेक्नालाजी के सामने मनु्ष्य की दयनीयता का, उसकी निरुपायता का हलफनामा लिखते हैं और उसे एक महान सत्य की तरह पे्श करते है। वे बताते हैं कि इस वक्त जो समाज बन रहा है उसके केंद्र में मनुष्य नहीं होगा, न उसका जीवन । अब केंद्र में केवल सत्ता होगी और मनुष्य केवल पर्यावरण का हिस्सा होगा । यह शोर बीस बरसों से जारी है, हाँलाकि अब विश्वव्यापी मंदी में जरूर थोड़ा थमा है । लेकिन क्या मनुष्यता के इतिहास में सच कभी इतना निर्वैयक्तिक, इतना नि्शंक, इतना निरपेक्ष, इतना आसान रहा है ? नियंत्रणकारी ताकतें जो एक छद्म चेतना को गढ़ने के प्रयासों में हैं, अब हमारे चारों तरफ हैं । हमारी स्मृतियों और संवेदनाओं पर उनका चौतरफा हमला है । आकर्षक और सम्मानित नामों से साम्प्रदायिकता लोगों के स्नायुतंत्र के साथ इतिहास और सत्ता पर कब्जा करने के लिये सन्नद्ध है । शायद आने वाले वक्त में हमारा लगभग सर्वस्व दॉंव पर लगने वाला है - लोकतंत्र का अस्तित्व, मूलभूत नागरिक अधिकार, इजहार की आजादी सब कुछ । ऐसे वक्त में लेखक का काम, उसका धर्म, दायित्व --- जाहिर है, वह और भी मुश्किल होने वाला है । यह कहना कतई काफी नही कि लेखक की सच से एक अटूट प्रतिबद्धता होनी चाहिये - यह तो बुनियादी बात है ही । हमारे वक्त में जब सच, झूठ और सही गलत की पहचान भी साफ नहीं, लेखक की जिम्मेदारी ज्यादा बड़ी, ज्यादा मु्श्किल है । इस पहचान को साफ करने के लिये उसे सत्ता समर्थित व्याख्याओं के महीन, घने जाल को काटने की कोशिश भी करनी है । उसे हर सवाल पर एक साफ पोजी्शन लेनी है हवाई किस्म की उस गोल मोल, बेमानी मानवीयता से बचते हुए जो आततायियों के पक्ष में जाती है । समाज में पैदा होने वाली नयी उम्मीदों और नये जीवन मूल्यों की पहचान और रेखांकन यह भी उसका एक जरूरी काम है । और हाँ, उसे विस्मरण के प्रतिवाद की को्शिशों में भी शामिल रहना है ।

मैंने स्मृतियों की, स्मृति को जागृत रखने की बात कही थी । हमारी भा्षा के एक कवि असद जैदी की एक कविता में --- रेलवे स्टेशन पर पूड़ी साग खाते हुए उन्हें रूलाई छूटने लगती है याद आता है कि मुझे एक औरत ने जन्म दिया था, मैं यूँ ही किसी कुँए या बोतल में से निकल कर नहीं चला आया था । हम सब भी जो अपने को लेखक होने के गौरव से जोड़ना चाहते हैं, उल्कापात की तरह जमीन पर नहीं टपके, न किसी बोतल की संतान हैं । हम अपनी भा्षा और पड़ोस की भाषा उर्दू की उस रवायत से आये हैं जिसे असाधारण और विराट व्यक्तित्वों ने अपने प्राणों और खून से बनाया । प्रेमचंद, सज्जाद जहीर, मंटो, बेदी, इस्मत चुगताई, मुक्तिबोध, निराला, नागार्जुन, शम्शेर और अन्य तमाम, अपने वक्तों के सर्वाधिक जागृत, तेजस्वी और अग्रग्रामी व्यक्तित्व। शायद आप कहना चाहें, भला यह भी कोई कहने की बात है। लेकिन नहीं, अब यह सब कहना भी जरूरी हो गया है। हमारे वक्त में स्मृतियाँ मिटाने के तमाम सत्तापोषित उपक्रम जारी हैं जिनके बीच कुछ याद करना और रखना एक कठोर आत्मसंघर्ष के बाद मुमकिन हो पाता है । सागर जी की अद्वितीय फिल्म 'बाजार' जो हम सब ने बार बार देखी है का एक वाक्य है - करोगे याद तो हर बात याद आयेगी । लेकिन इस वक्त भुलाने की भी कीमत मिलने लगी है । साहित्य के एक हल्के में अतीत से पीछा छुड़ाने की कोशिशें हैं, जैसे वह कोई बोझ हो। वे भुला देना चाहते हैं अपनी भाषा के सरोकारों, तनावों, नैतिकता और प्रतिवादों की - और चाहते हैं कि साहित्य महज लफ्जों का खेल रह जाये। ऐसे में भूलने के विरूद्ध होना और याद दिलाते रहना इस वक्त लेखक का एक अतिरिक्त कार्य भार है । लिखने के तरीके, शिल्प, भाषा और बयान का अंदाज, यह सब तो हमेशा ही बदलेगा लेकिन उद्दे्श्य, सरोकार और चिंतायें फै्शन की तरह नहीं बदले जा सकते । निर्मल वर्मा की एक बात याद आती है जो उन्होंने एक निबंध में लिखी थी - वे शहर अभागे हैं जिनके अपने कोई खंडहर नहीं । उनमें रहना उतना ही भयानक अनुभव है जितना किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना जो अपनी स्मृति खो चुका है, जिसका कोई अतीत नहीं। इसी बात को आगे बढाते हुए --- वह भाषा कितनी अभागी होगी जिसमें पूर्वज लेखकों और उनके लिखे की, उनकी आंकाक्षाओं और जददोजहद की स्मृति विलुप्त हो जाय। रघुवीर सहाय ने तकरीबन तीन दशक पहले एक कविता "लोग भूल गये हैं" में चिंता व्यक्त की थी - जब अत्याचारी मुस्कराता है, लोग उसके अत्याचार भूल जाते हैं" । देवी प्रसाद मिश्र की कहानी "अन्य कहानियाँ और हैल्मे" के एक मार्मिक प्रसंग में नैरेटर अपमान सहने के बाद होम्योपैथी की दुकान में अपमान के भूलने की दवा लेने जाता है और बूढ़ा डाक्टर मना करते हुए कहता है कि अपमान को भूलने के साथ अन्याय की स्मृति भी जाती रहेगी । इस तरह न्याय पाने के प्रयत्न भी खत्म हो जायेंगे । लेखक के लिये जरूरी है याद दिलाते रहना कि भुलाना भूल ही नहीं, बहुत सारे मामलों में जुर्म, एक अक्षम्य जुर्म होता है । इसलिये कि जो भुला दिया जाता है वह अपने को पहले से भी जघन्य और नृशंस रूपों में दुहराता है। इस भूलने और भुलाने के विरूद्ध एक संघर्ष भी लगातार जारी हैश। मैं भी इसी संघर्ष में रहना चाहता हूँ, कुछ ऐसा लिख पाने की कोशिशों के रूप में जो एक साथ अपने वक्त का बयान भी हो और अपनी भाषा के श्रेष्ठतम की याद भी ।

मुम्बई आने पर और सागर जी की मौजूदगी में, थोड़ा सा फिल्मी होना माफ होना चाहिये । मुक्तिबोध जो मराठी भा्षी थे, लेकिन लिखा उन्होंने हमारी भाषा में, की कविता पंक्तियाँ हैं : दुनिया जैसी है उससे बेहतर चाहिये, इसे साफ करने के लिये एक मेहतर चाहिये । इन पंकितयों से याद आया एक दृश्य जो हाल की एक फिल्म 'मुन्ना भाई एम बी बी एस' का है, लेकिन लगता है चैप्लिन की किसी फिल्म का । एक मेहतर है, अस्पताल में सफाई करता, और जो उसकी मेहनत को बरबाद करते गुजर रहे हैं, उन पर चीखता चिल्लाता । नायक जाकर उसे गले लगा लेता है, जिसकी उसे न कोई उम्मीद थी न कोई तमन्ना । वह अवाक रह जाता है और उसके मुँह से यही निकल पाता है - चल हट, रुलायेगा क्या ? यह सम्मान ग्रहण करते हुए ऐसी ही कुछ फीलिंग्स मेरे मन में हैं । मैं इस वादे के साथ अपनी बात खत्म करता हूँ कि अपना काम जारी रखूँगा और कोशिश करूँगा कि और भी बेहतर तरीके से उसे कर सकूँ ।

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Friday, January 16, 2009

खास तुम्हारे लिये

जिस वक्त यह ब्लाग बनाया गया था, एक विचार मन में था कि बहुत कुछ ऎसा जो बहुधा और कहीं प्रकाशित नहींहोता, या जिसको ज्यादा से ज्यादा लोगों तक जाना चहिए, मित्रों से लिखवाकर इस पर डालते रहेंगे और एकपत्रिका की तरह ही इसे चलाएंगे। अभी तक इसे ऎसे ही चलाने की कोशिश भी हुई है। पर यदा कदा जब समय पर ऎसा कुछ नहीं मिला तो अपनी रचनाओं से भी काम चलाना पडा है। फ़िर भी कोशिश जारी है। इस कोशिश का ही यह परिणाम है कि कथाकार नवीन नैथानी ने यह आलेख लिखा। ब्लाग में इसे देते हुए भाई नवीन का आभार व्यक्त करना चाह्ते हैं।
नवीन एक महत्पूर्ण कथाकार हैं। अपनी कल्पनाओं के सौरी को उन्होंने अपनी कहानियों मेंजिन्दा किया है। ग्यानपीठ से सौरी की कहानियां उनका प्रकाशनाधीन कथा संग्रह है। वर्ष २००५ में नवीन को उनकी कहानी पारस पर रमा कान्त स्म्रति सम्मान प्राप्त हुआ इससे पूर्व कथा सम्मान से भी वे सम्मानित हुए हैं। प्रस्तुतआलेख में नवीन अपने देहरादून को याद कर रहे हैं



नवीन नैथानी


मुझे नही लगता कि कोई शहर अपने होने को लेकर इस तरह से आत्म-मुग्ध होता होगा जितना देहरादून. यह शहर उन साहित्यकारों का गढ नहीं रहा जो हिन्दी जगत को अपने ईशारों से नचाते रहे. सम्मान ऒर पुरस्कार पाने ऒर बटोरने वाले लेखक इस शहर की फ़ितरत में ही नहीं हैं. यह उन लेखकों का शहर रहा है ऒर है जो साहित्यिक जीवन की रगों मैं लहू बनकर दॊड्ते हैं. फ़िर भी देहरादून की हवा में कुछ इस तरह की तासीर है कि यहां का लेखक इस शहर से दूर नहीं जा पाता. अगर रोजी-रोटी की मजबूरियां शहर से दूर खेंच के जाती हैं तो भी उसकी सांसें देहरादून में ही प्राण-वायु पाती हैं. अवधेश तो दिल्ली में पूरी तरह से स्थापित होने के बाद देहरादून लॊट आया था- वह एक यायावर की आत्महंता वापसी थी. सुरेश उनियाल तो दिल्ली में रहने ऒर बसने के बाद भी देहरादून इस तरह लॊटते हैं जैसे उनकी गर्भ-नाल देहरादून के किसी मुहल्ले की उस रसोई में गढी हुई है , जहां हिन्दुस्तान की आजादी के तत्काल बाद पंजाब ऒर दूसरे हिस्सों से आयी हुई एक दूसरी सभ्यता देहरादून को रचने लगी थी. यह देहरादून का एक सामान्य परिचय है-थोडा सा रहस्य की धुन्ध में ऒर थोडा कुहरे के कम्बल में- ऒपनिवेशिक समय से बना हुआ शहर जो निरन्तर बनते रहने का भ्रम रचता है. यहां यह उल्लेख अवांछित नहीं है कि कुछ बडे नाम संप्रति स्थाई रूप से देहरादून में रहते हैं- जीवन की उत्तरशती में. पद्मश्री लीलाधर जगूडी इस शहर के उतने ही सम्मानित बाशिन्दे हैं जितने आदरणीय कामरेड विद्यासागर नॊटियाल.
देहरादून संभवतः उन विरल शहरों म्रें है जहां से पत्रिकायें नहीं निकलतीं ऒर शहर के साहित्यकार अपने शहर पर इठ्लाते फ़िरते हैं -
शहर में ढूंढता तुझको तुझी में शहर बसता था
तेरे गेसू से बिखरी जो बासमती की खुशबू थी
(दर्द भोगपुरी)
खैर,इस शहर का बाशिदा मैं भी हूं, यहां मैं शहर को कुछ व्यक्तियों ,कुछ घ्टनाऒ ऒर कुछ संस्थाऒ के बहाने याद करने की कोशिश कर रहा हूं. और इस शुभ काम की शुरूआत हरजीत ऒर अवधेश के जिक्र के साथ क्यों न की जाये!
दर असल मैं ठीक- ठीक समझ नहीं पा रहा हूं कि एक ब्लोग में यह दर्ज करते हुए कितना अपना समय बचा रहा हूं. मुझे स्वीकार करते हुए थोडा कष्ट होता है कि तनिक गम्भीर साहित्यकार इस माध्यम को नितान्त अगम्भीरता से लेते हैं . समय वैसे भी उतना पारदर्शी कहां रहा? इस बात में कष्ट से अधिक विडम्बना झलकती है.
हरजीत से पहले मैं अवधेश से मिला था. इन दोनों से पहले अतुल शर्मा से. ऒर इन सबसे पहले राज शर्मा से! यह संदर्भ १९८६ का है.उन दिनो मैं शोध छात्र था. डीएवी कालेज में .राजेश सेमवाल मेरे साहित्यिक सफ़र का पहला हमकदम था. वे सिर्फ पढ्ने के दिन थे, सेमवाल के साथ मेरा सफ़र १९७९ से शुरू हुआ था- मैं भोगपुर से शहर आया था-पिछले तीस बरस से यह मेरा शहर है. उन दिनों हम खूब पढते थे.जो भी मिल गया वह पढ लिया. तो उन दिनों हम सुनते थे कि देहरादून में दो बडे सहित्यकार हैं-सुभाष पन्त ऒर अवधेश कुमार.अवधेश तो हमारा हीरो था.बाद जब मैं अवधेश से मिला तो आतंक, सम्मान ऒर कॊतुक का भाव जगता रहा-शुरू मैं .यह एक अलग प्रसंग है-इस पर चर्चा अन्यत्र कर चुका हूं .यहां तो जिक्र देहरादून की उस फ़ितरत का हो रहा है-जो आत्म-मुग्धता के बाग में टहलते हुए ऒर मस्त हुई जाती है.
यह शहर कभी भी हडबडाहट में नही दिखता. कम से कम साहित्यिक द्रष्टि से तो नहीं. यहां कभी भी फोन करने के बाद किसी मित्र के यहां जाने का रिवाज नहीं रहा. अब थोडा सा चलन बदला है.जब इस शहर में अवधेश ऒर हरजीत रहते थे तब शहर शाम को अंगडाई लेता ऒर रात उतरने के साथ खामोश सडकों को धुन्ध ऒर कुहरे की चादर में छुपाये लुका-छिपी का मनोरंजक खेल खेलता था.कई बार हम रात के वक्त दूर दूर बिखरे दोस्तों के घरों तक पहुंचकर दरवाजे खटखटा देते. यह देहरादून का ही कलेजा है जो बिना उफ किये पूरी गर्म-जोशी से स्वागत करता ऒर कोई नयी कहानी, कविता सुनने के लिये सहर्ष तैयार रहता . शहर का यह मिजाज आज भी बचा हुआ है. अब न अवधेश है ऒर न ही हरजीत .कभी दर्द भोगपुरी ने कहा था:
उठा भी तू, आया भी तू ऒर फिर पलट लिया
हमने तेरी अंगडाई से कुछ ऒर ही मतलब लिया
अब लगता है कि उन दोनों के जाने के बाद शहर अंगडाई लेना शायद भूल गया है-थोडा सा सयाना हो गया है-एक बुजुर्गियत शहर पर तारी हो गयी है.लेकिन वह बचपना अभी भी कहीं बचा हुआ है. यही इस शहर को बचाये हुए है.विजय गॊड,सुरेश उनियाल ऒर मदन शर्मा के संस्मरण देहरादून के मिजाज को समझने में मददगार हैं. यह शहर शब्दों में बयां नहीं हो पाता.इसे सुनने के लिये ऒर इससे कहने के लिये इसकी हवाओं में मॊजूद रहना पड्ता है.योगेन्द्र आहूजा ने जिस बालकनी का जिक्र किया है, उसी बालकनी में हरजीत को एक सरदारजी(वे ट्र्क-ड्राईवर थे) ने यह शे'र सुनाया था जो वे पता नहीं मुल्क के कॊन से ढाबे से सहेज कर लाये थे-खास हरजीत के लिये (यह हरजीत का प्रिय जुमला था-खास तुम्हारे लिये)
मैखाना-ए-हस्ती का जब वक्त खराब आया
कुल्हड में शराब आयी, पत्ते में कबाब आया
आमीन


भाई योगेन्द्र आहूजा को वर्ष २००८ के विजय वर्मा कथा सम्मान के लिए बहुत बहुत शुभकामनाएं। सम्मान समारोह कल दिनांक १७//२००९ को मुम्बई में सम्पन्न होगा। इस अवसर पर योगेन्द्र जी के द्वारा दिये जाने वाले वक्तव्य को आप कल दिनांक १७//२००९ को यहां पढ सकेंगे।

Thursday, January 8, 2009

किसी नयेपन की तलाश में

संस्मरण

मदन शर्मा

देहरादून में, घंटाघर चौराहे से, पल्टन बाजार और चकराता रोड के मध्य और हनुमान मंदिर के पीछे, 'चाट वाली गली" है। इसी गली से निकलती एक अन्य गली, 'भगवान नगर" कहलाती है। इसी भगवान नगर के एक मकान के प्रथम तल पर, हिंदी की सुप्रसिद्ध कथा लेखिका शशि प्रभा शास्त्री का निवास था।
मैं अब तक विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में, शशी प्रभा शास्त्री की रचनाएं पढ़ता रहा था। किंतु यह नहीं मालूम था, कि वे देहरादून में ही रहती है। एक दिन, जब '1970" साप्ताहिक के साहित्य सम्पादक इन्द्र कुमार कड़, श्रीमती शास्त्री से भेंट के लिये जाने लगे, तो मैं भी उनके साथ हो लिया।
उनकी सादगी देख, ऐसा ज़रा भी नहीं लगा, कि वे एक बड़ी या प्रसिद्ध लेखिका हैं। साधारण पहनावा, जैसे अचानक किचन से निकल कर इधर आ बैठी हों। घर का रख-रखाव और बातचीत भी अति साधारण और सहज।
इन्द्र कुमार ने उन्हें मेरे बारे में बताया, कि मैं कहानियां वगैरा लिखता हूं और हाल ही में, एक उपन्यास भी प्रकाच्चित हुआ है। सुन कर वे प्रसन्न हुईं और उपन्यास दिखाने का आग्रह किया। मैं 'शीतलहर" की प्रति साथ लेकर गया था। झिझक के साथ, प्रति उन्हें भेंट कर दी।
एक सप्ताह बाद, उनका पत्र मिला। पढ़ने की कोशिश की, तो पढ़ा ही नहीं गया। इतना ही अनुमान लगा सका, कि 'शीतलहर" के बारे में कुछ लिखा है और किसी दिन मिलने का भी आग्रह किया है।
मेरा यह प्रथम उपन्यास, किस स्तर का है, मुझे पता चल ही चुका था। उस पर अन्य क्या-क्या टिप्पणियां सुनने को मिल सकती हैं, इसका अनुमान भी लगा चुका था। इस के बावजूद, मैं भगवान नगर जा पहुंचा।
सीढ़ियां चढ़ कर ऊपर पहुंचा और कालबेल का बटन दबाया। दरवाज़ा खुला और वे नज़र आईं।
""कहिये?'' उन्होंने प्रश्न किया।
अर्थात, उन्होंने मुझे नहीं पहचाना था।
""मैं मदन शर्मा हूं।'' मैंने लज्जित सा होकर कहा।
""अरे अरे, मैं भी बस क्या हूं! आइये आइये।।। बैठिये।''
कुशल क्षेम पूछ, वे भीतर जाकर चाय बना कर ले आईं। चाय के साथ-साथ उन्होंने 'शीतलहर" के बारे में बातचीत शुरू कर दी।।। मैंने आपका उपन्यास पढ़ लिया। आप अच्छा लिखते हैं, मगर पुस्तक में छपाई की बहुत गलतियां हैं। संवादों में कहीं कहीं कच्चेपन की झलक है। भा्षा में भी कई जगह अटपटापन नज़र आता है। मगर एक बात है, कि आप कहानी और घटनाओं को काफी रंगीन बना लेते हैं। वैसे ओवर आल, आप का यह उपन्यास रोचक है।।।
मैं कुछ नहीं बोला।
अचानक उन्होंने पूछा, ""आपने एम0 ए0 किस विषय में किया था?''
मैंने कहा, ""मैंने तो बी0 ए0 भी नहीं किया। दरअसल, मैं बहुत कम पढ़ा लिखा हूं। थोड़ी उर्दू और अंग्रेज़ी ही पढ़ी है।''
वे न जाने क्या सोचने लगीं। फिर बोलीं, ""आप जब अपना अगला उपन्यास छपने के लिये भेजने लगें, तो मुझे ज़रूर दिखा दें।''
मैंने बताया, कि मैं अगला उपन्यास प्रका्शक के पास भेज चुका हूं।
तब उन्होंने पुन:शीतलहर पर बातचीत शुरू कर दी और उसकी कमियों की ओर मेरा ध्यान दिलाया।
द्राच्चिप्रभा शास्त्री से मेरी तीसरी भेंट, उनके एम0 के0 पी0 कालेज में हुई। उस समय वे वहां प्रचार्या के पद पर थीं। मैं अपने संस्थान की ओर से, अपने एक सहयोगी के साथ, डिफेंसफंड एकत्रित करने के सिलसिले में वहां गया था। उन्होंने इस बार भी मुझे नहीं पहचाना था। हम लोग डिफेंस फंड के बारे में बातचीत करते रहे। जब उठने लगे, तो मैंने कह ही दिया, ""आपने शायद मुझे पहचाना नहीं।''
""आप को मैंने।।। कहीं देखा तो है।'' वे कुछ याद करने की कोशिश कर रही थीं।
""मैं मदन शर्मा हूं।'' आज मैं, फिर से अपना परिचय देते लज्जित नहीं हुआ।
""ओह।।।!''
उन्हें अपनी स्मरण शक्ति पर, सचमुच अफ़सोस हो रहा था। मैंने 'कोई बात नहीं" कहा और हम दोनों हंसते हुए, दफ़तर से बाहर चले आये। मैं अब अपने सहयोगी से आँखें चुरा रहा था, क्योंकि मैंने अपने संस्थान में डींग मार रखी थी, कि मेरा शशिप्रभा शास्त्री से, अच्छा परिचय है।
दैनिक 'पंजाब केसरी" के साहित्य सम्पादक अशोक प्रेमी ने आग्रह किया था, कि मैं कथा लेखिका शशिप्रभा शास्त्री के बारे में एक लेख लिख कर भेजूं। मैंने तुंरत इन शब्दों के साथ लेख शुरू कर दिया--- आप को यदि श्रीमती शशिप्रभा शास्त्री से भेंट करनी हो, तो भगवान नगर जाना होगा और जितनी बार आप उन से मिलना चाहेंगे, हर बार नये सिरे से आपको अपना परिचय देना होगा---
'पंजाब केसरी" में छपा मेरा वह लेख चर्चित हुआ। शशिप्रभा ने उसे पढ़ा और किसी दिन मिलने के लिये मुझे पत्र लिखा।
मैं अपने नव प्रकाशित उपन्यास 'अंधकार और प्रकाश" की प्रति लेकर उनके निवास पर पहुंचा। उस दिन दरवाजा, उनके पति धर्मेंद्र शास्त्री जी ने खोला। वे बोले,
""वे तो घर पर नहीं हैं। मेसेज छोड़ जाइये।''
""कह दीजियेगा, मदन द्रार्मा आया था।''
""अरे, आप मदन शर्मा हैं! आइये आइये, भीतर आकर बैठिये।''
धर्मेंद्र शास्त्री के बारे में मैंने सुन रखा था, कि वे यहां के डी0 ए0 वी0 कालेज में संस्कृत के विभागाघ्यक्ष हैं और किसी ऐरे-गैरे को घास डालना पसन्द नहीं करते। किंतु उस दिन जिस गरम जोशी के साथ, उन्होंने मेरा स्वागत किया, स्वयं चाय बना कर लाये, तो लोगों की उनके प्रति बनी धारणा निर्मूल सिद्ध हुई।
""आप का पंजाब केसरी में छपा लेख मैंने पढ़ा। वाह! क्या खूब लिखते हैं आप!
मज़ा आ गया!''
मैं पानी-पानी हुआ जा रहा था। पछता रहा था, क्यों मैंने यह हिमाकत की!
इतने में शशिप्रभा जी भी आ पहुंची। आज उन्होंने मुझे पहचानने में भूल नहीं की थी। बजाय नाराज़ होने के, उन्होंने भी मेरे लेख की प्रशंसा की और यह भी कहा,
""मदन जी, आप में एक अच्छे व्यंग्य लेखक होने के गुण मौजूद हैं। आप अपने अभ्यास को जारी रखें और मैं यह बात मज़ाक में नहीं कह रही हूं।''
मैंने अपने नये उपन्यास की प्रति उन्हें भेंट की। वे बहुत खु्श हुई और कहा, ""पढ़ कर बताउंगी, कैसा हैं।'' मेरा यह उपन्यास उन्हें बहुत पसन्द आया था। उन्होंने तीन प्रष्ठ लम्बी प्रतिक्रिया के साथ, आश्चर्य भी व्यक्त किया, कि शीत लहर जैसे अति साधारण उपन्यास के एक दम बाद मैं कैसे एक अच्छा उपन्यास लिख पाया।
उसके बाद, मैं अकसर प्रकाशनार्थ भेजने से पूर्व, अपनी रचना के बारे में शशिप्रभा जी से राय ले लेता। वे अपनी नि्श्पक्ष राय देतीं। किंतु यह कभी ज़ाहिर न होने देतीं, कि वे स्वयं बहुत बड़ी साहित्यकार हैं। वे स्वयं अपनी रचनाओं के बारे में मेरी राय जानना चाहतीं। उन्होंने अपने कई उपन्यास और कहानी संग्रह स्ास्नेह मुझे भेंट किये। उन्होंने ही मुझे 'संवेदना" और 'साहित्य संसद" की गोष्ठियों में नियमित भाग लेने की सलाह दी और बताया, कि वे स्वयं जो कुछ सीख पाई हैं, वह इन गोष्ठियों के माध्यम से ही सम्भव हुआ है।
बहुत से लोगों का उन के बारे में नज़रिया कुछ भिन्न ही रहा।।। वे घंमडी हैं लोगों से मिलना जुलना या बात करना पसंद नहीं करतीं, वगैरा वगैरा--- मगर मुझे वे कभी ऐसी नहीं लगीं। मूडी ज़रूर थीं। रिज़र्व भी थीं। बात तभी करती थीं, जब बहुत ज़रूरी हो। मैं जब भी उन से मिला, वे प्रसन्न ही नज़र आई। घंटों तक बातचीत होती। वे एक अच्छी मेहमान नवाज़ थीं।
एक दिन मैंने कह ही दिया, ""दीदी, आप अपने माहौल से कभी बाहर क्यों नहीं निकलती?''
वे चकित होकर बोली, ""कौन सा माहौल?''
""लोगों से मिलिये जुलिये। आम लोगों की तकलीफ़ों और समस्याओं को नज़दीक से परखिये। कम से कम, कमरे से बाहर निकल कर, ताज़ा हवा में चहल कदमी का आनन्द लीजिये।''
वे हंसने लगीं। फिर पूछा, ""उस से क्या हो जायेगा?''
""बहुत कुछ नया मिलेगा। लेखन में ताज़गी आयेगी।''
वे अब गम्भीर नज़र आने लगीं। फिर लम्बी सांस लेकर बोलीं, ""क्या करना नयेपन या ताज़गी का! मेरे लिये यह पुराना और बासी ही काफ़ी हैं। वैसे मैं लिखती भी क्या हूं! बस, यों ही उल्टी सीधी लकीरें खींच मारती हूं।''
मैंने पूछा, ""आप के हाथ से लिखा, प्रेस वाले पढ़ते कैसे होंगे?'' वे हँस कर बोली, ""टाइप कर के भेजती हूं।''
किंतु वे जब एक बार अपने उस कमरे या घर से बाहर निकलीं, तो सीधी अमरीका ही जा पहुंचीं। उनका बेटा वहां सपरिवार रहता था। वहां वे कई महीने रहीं। वहीं से लिखा उनका पत्र मिला। लिखा था--- यहां बहुत कुछ देख लिया। नया और ताज़ा, यही तो चाहते थे न आप! अब शीघ्र ही वापिस लौटूंगी और आप सभी से मिलूंगी--- वे वहां से यादों का पुलंदा बांध कर अपने साथ लाईं और यहां आते ही एक संस्मरणात्मक उपन्यास लिख डालां यह उपन्यास पर्याप्त रोचक था, किंतु यह भी उनके अन्य उपन्यासों की तरह र्चर्चित न हो पाया।
उनके कई उपन्यास और कहानी संग्रह पढ़ने को मिले। किंतु एक छोटा सा उपन्यास 'छोटे छोटे महाभारत" मुझे सबसे अच्छा मालूम पड़ा। हालांिक स्वयं शशिप्रभा जी को अपना यह उपन्यास बहुत मामूली लगा था।
कुछ महानुभावों का कहना था, कि उनके अपने पति के साथ सम्बन्ध खुशगवार न थे। मगर मुझे कभी ऐसा नहीं लगां। एक रात जब शास्त्री जी सोये, तो सुबह, जगाये जाने पर भी न उठे। तब उन पर जैसे गम का पहाड़ ही टूट पड़ा था। उसके बाद मैंने उन्हें कभी हंसतें हुए नहीं देखा। ऐसा लगता था, जैसे टूट सी गई हों। उसके बाद उन्होंने जो लिखा, वह भी जैसे बेमन से ही लिखा।
फिर वे कभी बच्चों के पास दिल्ली चली जातीं और कभी देहरादून लौट आतीं। फिर पता भी न चला, उन्होंने कब देहरादून वाला अपना मकान बेच कर, नोएडा में एक फलैट खरीद लिया और देहरादून स्थायी रूप से छोड़ दिया।
उनकी अंतिम रचनाओं में, 'हंस" में प्रकाशित एक कहानी, देहरादून में काफी चर्चित हुई। दरअसल यह कहानी, स्त्री विमर्श के मसीहा श्री राजेन्द्र यादव के 'टेस्ट" की थीं। किंतु शशिप्रभा शास्त्री के स्वभाव के बिल्कुल बरअक्स। इस रचना में देहरादून के चंद साहित्यकार मित्रों को बेबाकी से लपेट लिया गया था और इस प्रकार की कहानी की, कम से कम शशिप्रभा से उम्मीद न थीं। मुझे इस किस्म की कहानी पढ़कर धा सा लगा। मैंने पत्र लिख कर कहानी का ज़िक्र किया, तो उन्होंने टालने के मूड़ में मुझी से पूछा, कि मेरा नाटक 'एडीटर" आकाशवाणी से प्रसारित हुआ या नहीं।
उसके बाद बहुत दिन तक उनका कोई समाचार न मिला और न कोई रचना ही कहीं पढ़ने में आई।
अर्सा बाद, एक पोस्ट कार्ड मिला। लिखा था--- मैं इन दिनों काफी बीमार हूं। कमज़ोरी बहुत बढ़ गई है।।।
मैंने उन्हें फ़ोन पर सूचित किया, कि उन्हें देखने नोएडा पहुंच रहा हूं। उन्होंने 'अच्छा" कहा। किंतु साथ ही पत्र लिखा।।। मदन जी, आप अभी इधर न आयें। मैं इस वक्त आप का स्वागत करने की स्थिति में नहीं हूं।।।
मैं बड़ा निरा्श हुआ, क्योंकि मैं यहां से चलने के लिये तैयार था और वहां सिर्फ उनका पता लेने ही जाना था।
कुछ दिन बाद, उनका फिर पत्र मिला--- मैं अब पहले से काफी ठीक हंू। आप यहां अवश्य आयें। मिलकर अच्छा लगेगा।।।
उस समय मैं स्वयं बीमार पड़ा था। या समझिये, मिलना भाग्य में न था।
थोड़े ही दिन बाद, अखबार में समाचार छपा था।।। हिंदी की सुप्रसिद्ध लेखिका शशिप्रभ शास्त्री अब नहीं रहीं---
घुली हुई शाम, वीरान रास्ते और झरने, अमलतास, नावें, सीढ़िया, छोटे छोटे महाभारत, परछाइयों के पीछे और कितनी ही अन्य छोटी या लम्बी रचनाओं की यात्रा समाप्त कर, वे शायद किसी नयेपन की तलाश में, बहुत दूर जा पहंुची थीं और मैंने अपनी स्नेहमयी बड़ी दीदी को हमे्शा के लिये खो दिया था।