Sunday, March 13, 2011

उत्तराखण्ड में भाषा-बोली

                               

दुनिया के पैमाने पर आज कितनी ही जनभाषाएं विलुप्ति के कगार पर हैं और कितनी ही विलुप्त हो चुकी हैं। दुनिया पर राज करती मुद्रा और भाषा के चौतरफा हमले के चलते सब कुछ इतनी तेजी से घट रहा है कि यह भी समझना मुश्किल हो जा रहा है कि कब और कैसे हम स्वंय भी हमले के षड़यंत्र के शिकार हो चुके हैं और अनजाने में ही उसके तर्कों के साथ खड़े हैं। बिना इस बात को ठीक तरह से जाने, सिर्फ अस्मिता के सवाल के साथ न तो किसी भाषा को बचाया ही जा सकता है और न ही ऐसा भाषायी आंदोलन खड़ा किया जा सकता जिसके व्यापक विस्तार की संभावना बने।
सामाजिक व्यवस्था की विसंगतियों को समग्रता में देखे बिना और समग्रता में ही मुखालफत किये बिना जन भाषाओं के बचाव के लिए की जा रही कोई भी पहल अधूरी साबित होने वाली है। फिर यह भी देखने और समझने की बात है कि ऐसी विकट स्थितियों में भाषायी सवाल पर गैर-सरकारी संस्थानिक आंदोलनों का बाजारू फंडा क्या है ? दुनिया के विकास का मौजूदा मॉडल किस तरह का वैश्विक ढांचा खड़ा करना चाहता है, गैर-सरकारी संस्थानों की भूमिका उसके बीच किस तरह की है ? शासन प्रशासन के पूंजीवादी मॉडल के भीतर गैर-सरकारी संस्थानों की दखल जिस तरह की सामाजिक विसंगति के सवालों को अपनी परियोजनओं का हिस्सा बनाती है, उसके निहितार्थ उस समग्रता को छू पाते हैं क्या ? यह भी देखना होगा कि जनभावनाओं के निरादर वाली पूंजीवादी मॉडल की शासन प्रणाली को बचाये रखने की चालाकियों के साथ जनभाषाओं को बचाए रखना क्या आज संभव रह गया है ? गैर-सरकारी संस्थानों का ढांचा ऐसी ही शासन-प्रणालियों से पोषित होता हुआ है, यह कोई छुपी हुई बात नहीं रह गया है। उसको ही बचाये रखने के ध्येय के साथ अनुदानों की आर्थिक मद्द से चलने वाले संगठन या सदस्यों के सहयोग से चलने वाली संस्थाओं की कार्यशैली में कोई ज्यादा फर्क है नहीं। देखा जा सकता है कि जनभावनाओं का निरादर ही नहीं अपितु उसे पूरी तरह से कुचलने की शासन प्रणालियों वाला यह मॉडल न सिर्फ अपनी प्रवृत्ति में षड़यंत्रकारी है बल्कि उसके तंत्र का जाल बेहद उलझा हुआ है। उत्तराखण्ड राज्य आंदोलन से लेकर राज्य निर्माण की पूरी प्रक्रिया के सिलसिलेवार अध्ययन से एक सिरा जो हाथ लगता है उसमें दिखायी देता है कि जनआकांक्षाओं को शिकस्त प्रतीकात्मक तरह से भी दी जा सकती है। राज्य का नाम उत्तरांचल करने की घोषणा उसका एक नमूना है। परिणाम सीधा-सीधा यह रहा कि राज्य निर्माण की प्रक्रिया अपनाये जाने के बाद भी जनता खुद को ठगा हुआ पाती है - समझना मुश्किल हो जाता है कि जनता की जीत का राज्य निर्माण हुआ है या फिर राज्य के नाम पर एक और चोर जेब सा कुछ हाथ आया है। प्रतीक के तौर पर बदले गये नाम को ही सही और एकमात्र सही नाम बताने वाले एवं चोर जेब के तंत्र को स्थापित करने के बाद नाम बदलने की प्रक्रिया को अंजाम देने वालों की चालाकी भरी चुप्पी कोई छुपी हुई बात नहीं है। बहुत से जनतांत्रिक सवालों को छुपाये रखने की यह ऐसी षड़यंत्रकारी कार्रवाई रही,  जिसमें वास्तविक संघर्ष को दरकिनार रखते हुए- मात्र अस्मिता के सवाल के साथ नाम बदलने की लड़ाइयां ही सर्वोपरी मान ली जाती रही। जन विरोधि नीतियों के प्रतिरोध की वाष्प को मात्र नाम बदलने की कार्रवाई में झोंक देने को मजबूर कर और अंतत: उसे पूरा कर दिये जाने की प्रक्रिया, एक खेल खेलने जैसा ही रहा है। ऐसे में यह सवाल महत्वपूर्ण है कि क्या जन भाषाओं के बचाव की लड़ाई संविधान की आठवीं अनुसूची तक की एक निरर्थक कोशिश है या उसकी यात्रा का उन पड़ावों से गुजरना है जहां जल, जंगल, जमीन और रोजी-रोजगार के ठिकाने मौजूद हैं ? उत्तराखण्ड में आज भाषा-बोली का जो सवाल जोर पकड़ता जा रहा उसके केन्द्र में सिर्फ गढ़वाली और कुमाऊंनी को ही तरजीह दी जा रही है। यदा-कदा जौनसारी का जिक्र भी हो जा रहा है। पंजाबी, गोरखाली और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश की वह भाषा जो राज्य की राजधानी के एक बड़े भू-भाग में मौजूद है, उसका जिक्र बहुधा छूट जा रहा है। यहां सवाल यह नहीं है कि आंदोलन के केन्द्र में सिर्फ गढ़वाली, कुमाऊंनी को ही तरजीह क्यों दी जा रही है, बल्कि उस बिन्दु को छेड़ना है जो उत्तराखण्ड में सारे मुद्दों को, मात्र अस्मिता के नाम पर दरकिनार कर देना चाहता है। जरूरत है राज्य के भीतर व्याप्त विसंगतियों और रोजी रोजगार के दूसरे मसलों की रोशनी में ही जनभाषाओं के बचाव की मुहिम जारी हो। एक बड़े फलक पर बोली जाने वाली भाषा हिन्दी, जो कि देश और दुनिया के पैमाने पर वैसे ही उपेक्षित होने की स्थिति में है जैसे किसी भी राज्य में बोली जाने वाली दूसरी अन्य भाषाएं, उत्तराखण्ड राज्य में एक हद तक काम-काज की भाषा है। यह अपने आप में उल्लेखनीय है कि राज्य के बहुभाषी चरित्र को पूरी तरह से समेटने में ज्यादा स्वीकार्य भी है।   
          

Friday, March 11, 2011

• प्रेमचन्द और दलित समस्या

हिन्दी भाषी भौगोलिक क्षेत्र में दलित राजनीति का उभार और हिन्दी साहित्य में दलित धारा का उदय का आरम्भिक काल लगभग एक समान आक्रामकता का चरण कहा जा सकता है। राजनीति में तिलक, तराजू और--- की गूंज तो सत्ता की चौहदी के लिए बेशक चरदार गलियों में गलबहियां डालने को मजबूर हो गई पर संवेदनाओं के गहरे दंश को अपने लेखन का हिस्सा बनाने वाले रचनाकारों ने अपने संशयों से मुक्ति की रचना के साथ एक ठोस वैचारिक जमीन को आधार बनाया है और साहित्य के मूल्यांकन के कुछ ऐसे मानदण्डों को खड़ा करने का लगातार प्रयास किया है जिसकी रोशनी में भारतीय समाज व्यवस्था के सामंति ढांचे में बहुत भीतर तक पैठी हुई मानसिकता उदघाटित होती हुई है। हाल में जनसत्ता में प्रकाशित दलित धारा के चिंतक, रचनाकार ओम प्रकाश वाल्मीकि का आलेख जो कथादेश मासिक फरवरी में प्रकाशित आलोचक चमन लाल के आलेख के प्रत्युत्तर में है, उसकी एक बानगी कहा जा सकता है। कथाकार प्रेमचंद की रचनाओं के मूल्यांकन के सवाल पर यह आलेख दलित धारा के चिंतन के उस दृष्टिकोण को सामने रखता है जिससे एक बहस जन्म ले रही है। दलित धारा के साहित्य के शुरुआती समय में जो बहस कफन कहानी को लेकर समकालीन जनमत से शुरू हुई थी बिल्कुल एक अलग ही अंदाज में आज दुबारा जिन्दा होती हुई है। कथाकार और कवि ओमप्रकाश वाल्मीकि का मूल आलेख बिना किसी भी तरह के संपादन के साथ यहां इसी उद्देश्य से प्रकाशित किया जा रहा है कि एक स्वस्थ बहस आकार ले। अपनी प्रतिक्रिया तो मैं अवश्य ही लिखूंगा, चाहता हूं कि इस ब्लाग के सचेत पाठक और जिम्मेदार लेख कइस बहस को आगे बढ़ाये। अपनी प्रतिक्रियाओं के टिप्पणी के अलावा विस्तार से भी मेल कर सकते हैं- vggaurvijay@gmail.com

वि.गौ.
प्रेमचन्द ने अछूत समस्या पर जो भी लिखा ,उसे लेकर हिन्दी साहित्य में दो विपरीत ध्रुव निर्मित हो चुके है.हाल ही में कथादेश (फरवरी,2011) के अंक मे चमनलाल का आलेख ‘प्रेमचन्द साहित्य में दलित विमर्श ‘के द्वारा उस विभेद को और ज्यादा पुख्ता करने की कोशिश की गयी है.
क्या दलित रचनाकारोँ को अपना स्वतंत्र –मत निर्मित्त करना साहित्य – विमर्श में गैर जरूरी है? क्या प्रेमचन्द का साहित्य भी धार्मिक –साहित्य की श्रेणी में स्थापित कर दिया गया है, कि उसकी आलोचना नहीं की जा सकती ? जिससे कुछ लोगों की धार्मिक भावंना को ठेस लगती है.
अपने आलेख के प्रारम्भ मे ही बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ के हवाले से चमनलाल जी प्रेमचन्द के विरुद्ध बोलने वालों को चेतावनी देते है- ‘प्रेमचन्द के निन्दक मारे जायेंगे ,लेकिन प्रेमचन्द जीवित रहेंगे ,’चमन लाल जी की दृष्टि मे दलितों द्वारा प्रेमचन्द पर उठाये गये सवाल अतिवादी दृष्टि कोण है.साहित्य आलोचना और विमर्श के लिए जो स्पेस होता है ,उसे अतिवादी दृष्टिकोण कहकर खारिज करना ,क्या साहित्य की मूल भावना और उसके सामाजिक उत्तरदायित्व के पक्ष में जाता है? क्या दलित रचनाकारोँ को अपना स्वतंत्र –मत निर्मित्त करना साहित्य – विमर्श में गैर जरूरी है? क्या प्रेमचन्द का साहित्य भी धार्मिक –साहित्य की श्रेणी में स्थापित कर दिया गया है, कि उसकी आलोचना नहीं की जा सकती ? जिससे कुछ लोगों की धार्मिक भावंना को ठेस लगती है. बेहतर होगा प्रेमचन्द को धार्मिक आडम्बरों से मुक्त रखा जाये .आज यदि प्रेमचन्द जिन्दा हैं तो उन निरंतर और नयी –नयी आयामो से होने वाली चर्चा के कारण. बिना चर्चा के किसी भी रचनाकार की श्रेष्ठ रचनायें भी समय के गर्त में खो जाती हैं. उन्हें भूला दिया जाता है.किसी आलोचक ने यदि कोई स्थापना दे दी तो क्या आने वाली पीढ़ी को भी उस स्थापना को आँख मूँद कर मानते रहना चाहिए ?क्या यह प्रवृत्ति साहित्य के कालजयी होने के पक्ष में जाती है? ‌‌‌
प्रेमचन्द की अछूत-समस्याओं के सन्दर्भ में ,जो शंकाये और विचार दलित लेखकों के मन मे उठे ,उन्हें बेबाकी से रखा गया .जिसमें प्रेमचन्द की निन्दा करना ध्येय नहीं रहा ,बल्कि दलित दृष्टिकोण से तथ्यों को परखने की कोशिश की गयी .इस कोशिश को ‘अतिवादी’ कह कर खारिज करने वालो की वाणी और सोच पर अंकुश लगाने की न तो दलित लेखको की कोई मंशा रही है,न जिद्द .अपने पूर्व साहित्यकारो के कृतित्व ,उनकी प्रतिबद्धता ,उनके सामाजिक दायित्व और उनके जीवन अनुभवो को जानना,समझना यदि साहित्यिक दृष्टि से गलत है,तो यह गलती दलित लेखको ने की है,अपनी सामाजिक चेतना और दायित्व के निर्वाह के लिए .क्योंकि साहित्य ही एक माध्यम है ,मानवीय संवेदनाओँ और सरोकारो को जानने का.
73-74 वर्ष पूर्व प्रेमचन्द ने ‘क़फन ’ कहानी लिखी थी,जो मूल उर्दू मे थी.हिन्दी में यह कहानी बाद मे छपी.हिन्दी आलोचको ,विद्वानो ने इस कहानी को कला,शिल्प और विचार की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ कहानी कहा. तब से और आज तक यही भाव साहित्य मे मान्य रहा है.लेकिन हिन्दी मे दलित साहित्य के उभरने के साथ –साथ इस कहानी पर सवाल उठने लगे ,तो हाय तौबा मच गयी......’अब प्रेमचन्द दलित विरोधी हो गये ...जैसे शीर्षक छपने लगे.और साहित्य मे एक अजीब तरह का वातावरण निर्मित करने की कोशिशे शुरू हो गयी .कई प्रतिष्ष्ठित आलोचको ने यह भी कहने मे गुरेज नहीं किया – दलित लेखक प्रेमचन्द से अच्छा लिख कर दिखाएँ ...यानि प्रेमचन्द रूपी लाठी से दलित लेखको को डराया –धमकाया जाने लगा.जैसे दलित लेखक उनके अहम और वर्चस्व को खंडित करने ,उनके आरक्षित क्षेत्र मे घुसपैठ करने की कोशिश कर रहे थे.लेकिन विद्वानो ने दलित पक्ष को जानने ,समझने का प्रयास ही नही किया .क्योंकि यह उनके संस्कारो के विरुद्ध है. उन्हें सिखाने की आदत है ,सीखने की नहीं.
दलित का कोई वैचारिक पक्ष भी हो सकता है ,यह सच्चाई गले नहीं उतर रही है.ऎसे ही विद्वानों ने ‘क़फन’ को दलित पक्षधरता की कहानी सिद्ध करने के लिए अनेक तर्क गढ लिए थे.और इस कहानी को पाठ्यक्रमो में ससम्मान शामिल करते रहे हैं .शिक्षक भी उन्ही तर्कों के सहारे भाव विभोर होकर इस कहानी को संवेदनशील (?) कह कर छात्रों के भीतर उतारते रहे हैं.यह वह समय था, जब हिन्दी में कुछ खास प्रवृत्ति और संस्कारों के लेखकों ,आलोचकों ,शिक्षा-तंत्र से जुडे विद्वानो क वर्चस्व था. लेकिन गत शताब्दी के उत्तरार्द्ध् में स्थिति बदल गयी. इस कहानी की संवेदना ,श्रेष्ठता ,शिल्प ,गठन ,और दलित पक्षधरता पर सवाल उठने लगे. यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि हिन्दी साहित्य प्रारम्भ से ही सनातनी मूल्यों का ध्वजवाहक रहा है.’क़फन ‘ कहानी इन ध्वजवाहकों ,जिनमे मार्क्सवादी आलोचक भी काफी मात्रा मे हैं, की दृष्टि मे यह कहानी कलात्मक हो सकती है,संवेदनशील भी हो सकती है.क्योंकि साहित्य के सृजन और विश्लेषण मे संस्कारों का बहुत बड़ा हाथ होता है.लेकिन जब दलित चेतना और अस्मिता के साथ इस कहानी को जोड़कर देखने के प्रयास होते हैं ,तब ‘अर्थ’ और ‘आशय’ बदलने लगते हैं. यहाँ यह कहना भी असंगत नहीं होगा कि भारतीय समाज में हज़ारों साल से शूद्र ,अंत्यज,अस्पृश्यों, चाण्डाल् ,डोम आदि के प्रति घृणा की भावना को आदर्श रूप में नैसर्गिकता के साथ स्वीकार किया जाता रहा है.जो आज भी पूर्वाग्रहों के रूप में मौजूद है.हिन्दू समाज मे मौजूद इन पूर्वाग्रहों को यह कहानी अपने पूरे सरोकारो के साथ सुदृढ करती है. इसी लिए संस्कारी मन को यह कहानी संवेदनशील लगती है.लेकिन जब एक दलित अपनी चेतना और अस्मिता के साथ इस कहानी को पढ़ता है ,तो उसे यह कहानी वैसी नहीं लगती जैसी नामवर सिह ,परमानन्द श्रीवास्तव ,काशीनाथ सिह,विश्वनाथ त्रिपाठी ,राजेन्द्र यादव, पी.एन.सिह, बच्चन सिह ,चमन लाल ......आदि को लगती है.
प्रेमचन्द ने अछूत –समस्या पर विपुल साहित्य रचा है.नि:सन्देह ,यह सही भी है, इस समस्या पर उनसे ज्यादा किसी प्रतिष्ठित स्थापित लेखक ने नहीं लिखा .
दलित लेखको ने इस कहानी को लेकर जो सवाल उठाये हैं, उनके उत्तर देना चमनलाल जी को जरूरी नहीं लगा .अपने आलेख में भरपूर उद्धरणो के द्वारा यही सिद्ध करते हैं कि प्रेमचन्द ने अछूत –समस्या पर विपुल साहित्य रचा है.नि:सन्देह ,यह सही भी है, इस समस्या पर उनसे ज्यादा किसी प्रतिष्ठित स्थापित लेखक ने नहीं लिखा . उन्होंने वैचारिक लेख ,टिप्पणियाँ ,सम्पादकीय ,कहानी उपन्यास अछूत – समस्या पर लिखे.उनकी सहानुभूति किसान,मजदूर और अछूतों के साथ थी.लेकिन जब उनके ही जीवन काल में एक निर्णायक मोड़ आया तो स्थितियाँ बदल गयी .प्रेमचन्द ही नहीं ,तमाम पारम्परिक स्थापित लेखक ,प्रगतिशील,जनवादी,मार्क्सवादी ,कहे जाने वाले रचनाकारों ,आलोचकों ,विद्वानों की भी,ऎसे निर्णायक मोड आते ही, भूमिकाएँ और प्राथमिकताएँ बदल जाती हैं. उस वक्त दलित उनकी प्राथमिकता से बाहर हो जाता है.यह पहले भी हुआ है और आज भी जारी है.
प्रेमचन्द के सामने भी ऎसा ही एक निर्णायक मोड़ आया था.जब दलितों ने सामाजिक वैमनस्य ,उत्पीडन ,शोषण ,और मौलिक अधिकारों से वंचित ,त्रस्त होकर डा. अम्बेडकर के नेतृत्व में ‘प्रथक –निर्वाचन’ की मांग रखी थी.जो उनके हज़ारों साल की दासता से मुक्त होने का सवाल था.यह निर्णायक मोड गाँधी जी को स्वीकार्य नहीं था, क्योंकि गाँधी जी की दृष्टि में यह हिन्दू धर्म के लिए खतरा था.इसी मुद्दे पर गाँधी जी गोलमेज –कांफ्रेंस से निराश और दुखी होकर लौटे थे. क्योंकि डा. अम्बेडकर ने यह ‘दलित –मुक्ति’ का सवाल अंतराष्ट्रीय मंच से उठाया था.इसी लिए गाँधी जी के लिए यह जीवन-मरण का सवाल बन गया था.और गाँधीजी ने भूख हड़ताल करके डा.अम्बेडकर पर दबाव बनाया कि वे इस सवाल और मांग को वापस लें. गाँधी जी इस में सफल रहे थे.पूना-पैक्ट के रूप में डा. अम्बेडकर को झुकना पडा. एक तरफा समझौता डा. अम्बेडकर की हार थी. ऎसे वक्त में प्रेमचन्द की भूमिका को भी जान लेना जरूरी है,कि इस निरणायक मोड पर वे किस ओर खडे़ थे.
‘प्रथक – निर्वाचन’ की मांग का मुद्दा गाँधी जी के लिए नैतिक और धार्मिक था.जबकि डा.अम्बेडकर के लिए ‘दलित –मुक्ति‘ और लोकतांत्रिक अधिकार पाने का सवाल था.प्रेमचन्द इस मुद्दे को गाँधी जी की दृष्टि से धार्मिक और राष्ट्रीय मान रहे थे.प्रेमचन्द भी दलितों की इस मांग को शंका की दृष्टि से ही देख रहे थे. यानि धर्म और राष्ट्र भी शोषितो .पीड़ितों की लाशों से ही फलते –फूलते हैं.’पूना –पैक्ट’ के बाद जहाँ डा.अम्बेडकर और दलितों में घोर निराशा थी,वहीं प्रेमचन्द इसे ‘राष्ट्रीयता की विजय ‘ कहकर ,इसी शीर्षक से 26,अक्टु,1932 ,के जागरण में सम्पादकीय लिख रहे थे- ‘.... शत्रू ने लक्ष्य भी उसी स्थान पर किया था ,जो कमजोर है,लेकिन गाँधी जी की तपस्या ने पासा पलट दिया और न जाने कितनी देवी शक्ति लेकर सामने आ गयी और शत्रूओं से घिरी हुई राष्ट्रीयता अपने मोरचे से निकल कर साम्प्रदायिकता का सहार कर रही है....’
‘प्रथक – निर्वाचन’ की मांग का मुद्दा गाँधी जी के लिए नैतिक और धार्मिक था.जबकि डा.अम्बेडकर के लिए ‘दलित –मुक्ति‘ और लोकतांत्रिक अधिकार पाने का सवाल था.प्रेमचन्द इस मुद्दे को गाँधी जी की दृष्टि से धार्मिक और राष्ट्रीय मान रहे थे.प्रेमचन्द भी दलितों की इस मांग को शंका की दृष्टि से ही देख रहे थे. यानि धर्म और राष्ट्र भी शोषितो .पीड़ितों की लाशों से ही फलते –फूलते हैं.’पूना –पैक्ट’ के बाद जहाँ डा.अम्बेडकर और दलितों में घोर निराशा थी,वहीं प्रेमचन्द इसे ‘राष्ट्रीयता की विजय ‘ कहकर ,इसी शीर्षक से 26,अक्टु,1932 ,के जागरण में सम्पादकीय लिख रहे थे- ‘.... शत्रू ने लक्ष्य भी उसी स्थान पर किया था ,जो कमजोर है,लेकिन गाँधी जी की तपस्या ने पासा पलट दिया और न जाने कितनी देवी शक्ति लेकर सामने आ गयी और शत्रूओं से घिरी हुई राष्ट्रीयता अपने मोरचे से निकल कर साम्प्रदायिकता का सहार कर रही है....’
यानि दलितों का हजारो साल की दासता से मुक्ति का संघर्ष प्रेमचन्द की दृष्टि में साम्प्रदायिक था,जिससे देश को दैविक शक्तियों ने बचाया .प्रेमचन्द की यह भूमिका और निर्णायक मोड पर आते ही अछूत – सहानुभूति अपना पाला बदल लेती है.’हंस’ के मुखपृष्ठ पर बाबा साहेब का चित्र तो छापते हैं,लेकिन उनकी प्राथमिकता में दलित पक्ष की जगह गाँधी जी का पक्ष ज्यादा महात्त्वपूर्ण था.जो पूना-पैक्ट के रूप में दलितों के हितों के खिलाफ ही गया.यह ऎतिहासिक सच्चाई है.और प्रेमचन्द उस वक्त भी डा.अम्बेडकर को शंका की दृष्टि से ही देख रहे थे.इस तथ्य को चमन लाल भी स्वीकार करते हैं- ‘..... दलित प्रश्न पर अधिक विचार मिलते हैं और ये विचार गाँधी और गाँधीवाद से प्रभावित हैं.’
अपने लेख में चमन लाल लिखते हैं – ‘..........पहली बार एक दलित को उपन्यास का नायक बनाने का सराहनीय समझा गया ,लेकिन उपन्यास छपने के अस्सी वर्ष बाद दलित नायकत्व स्थापित करने वाले उपन्यास को इस आधार पर ‘दलित विरोधी .कहा गया कि सूरदास क उल्लेख ‘जातिवाचक ‘नाम से किया गया है....” चमन लाल ही नहीं हिन्दी के स्वमनाम धन्य आलोचक इस बात से तो गदगद हैं कि एक दलित को नायकत्व प्रदान किया गया और अस्सी वर्षों तक इस नायकत्व पर किसी ने उंगली नहीं उठाई.लेकिन यह भूल जाते हैं कि उंगली उठाने वालों के हाथ में कलम कहाँ थी.और यदि थी भी तो उन्हें छापा नहीं जाता था.दूसरे प्रेमचन्द ने एक अछूत को नायकत्व प्रदान किया.लेकिन किस रूप में ?उस नायक के आदर्श क्या हैं ?एक दलित जो पैदा होते ही ‘जाति- उत्पीडन क दंश झेलते हुए बड़ा होता है,और घृणा के प्रति उसके मन में कहीं कोई प्रतिक्रिया न हो ,क्या यह सम्भव है?वहाँ कहीं कोई विरोध ,उस दंश की कोई छाया ,कोई अक्स, दिखाई नहीं पडता .उस पीडा ,दर्द को कहीँ किसी भी रूप में अभिव्यक्त नहीं करता ? हजारों साल के इस उत्पीडन पर यदि नायक चुप है,तो उस नायक के जीवन का उद्देश्य क्या है?नायक चेतना विहीन क्यों है?समाज ,धर्म ,व्यवस्था के प्रति उस नायक को कोई शिकवा नहीं ,कोई शिकायत नहीं ,ऎसे नायक पर गर्व किया जाये य उस पर शंर्मिन्दा हों ?सूरदास गाँधी जी के आदर्शों पर चलने वाला ‘दलित’ नहीं एक ‘हरिजन’ है.उसका सत्याग्रह भी गाँधी वादी आदर्शों की प्रतिछाया है. जबकि उस दौर में ,जब ‘रंगभूमि ‘उपन्यास ‘लिखा गया, डा. अम्बेडकर का ‘मुक्ति- आन्दोलन’समाज में चेतना पैदा कर रहा था.उ.प्र.में अछूतानन्द का आन्दोलन जारी था.पंजाब में मंगूराम ने अपने तरीके से दलितों को जागरुक करने का अभियान चलाया था.लेकिन प्रेमचन्द इन सभी आन्दोलनों को अनदेखा करके सिर्फ गाँधी जी के ‘अछूतोद्धार’ की सीमाओं में नायकत्व खड़ा कर रहे थे. इसी लिए सूरदास में दलित चेतना की शुन्यता है.
यही स्थिति ‘कफन’ कहानी की भी है.हजारों साल से हिन्दू समाज दलितों के प्रति नकारात्मक सोच रखता आ रहा है.यह सोच साहित्य के माध्यम से भी प्रचारित की गयी.और समाज में श्रेष्ठता भाव के साथ दलितों को दीन- हीन बनाने की मुहिम चलाई गयी.उनके लिए असभ्य,उज्जड,नीच,कमीन,ढेड,गंवार,निकम्मे,जाहिल जैसे शब्दों का प्रचलन जारी रहा है. बडे से बडे रचनाकारों आलोचकों ,विद्वानों ने इन शब्दों का प्रयोग दलितों के सन्दर्भ में किया है.दलित जातियों को गाली की तरह प्रयोग् करने की परम्परा आज भी समाज में मौजूद है.यही नकारात्मकता प्रेमचन्द के पात्रों ‘घीसू – माधो’ में भरपूर मात्रा में दिखाई देती है.जिसे प्रेमचन्द ने कुशलता से स्थापित किया है.यहाँ ‘कफन’ के शिल्प और संरचनात्मकता की बात नहीं कर रहे हैं .केवल ‘आशय’ की बात कर रहे हैं.क्योंकि चमन लाल जी के आलेख का केन्द्र बिन्दु भी यही है.
अक्सर ‘गोदान’ के मातादीन – सिलिया प्रसंग को आलोचक बहुत ऊंचे स्वर में रेखांकित करते हैं.इसी प्रसंग में प्रेमचन्द के अंतिम निष्कर्ष को भी देख लें .मातादीन और सिलिया का प्रेम-प्रकरण वियोगात्मक नहीं है.प्रेमचन्द उन दोनों के बीच होने वाले संवाद के जरिये बहुत कुछ ऎसा कहते हैं जिसे आलोचक अनदेखा करते रहे हैं –
‘......मैं डर रही हूँ,गांव वाले क्या कहेंगे ...’ ’जो भले आदमी हैं ,वह कहेंगे ,यही इसका धर्म था.जो बुरे हैं ,उनकी मैं परवाह नहीं करता.’ ’और तुम्हारा खाना कौन पकायेगा ?’ ’मेरी रानी ,सिलिया.’ ’तो ब्राह्मण कैसे रहोगे ?’ ’मैं ब्राह्मण नहीं ,चमार रहना चाहता हूँ .जो धरम का पालन करे ,वही ब्राह्मण ,जो धरम से मुँह मोडे़ ,वही चमार.’
सिलिया ने उसके गले में बाँहे डाल दी.( गोदान ,पृष्ठ -288-89 )
क्या प्रेमचन्द की उपरोक्त परिभाषा पूर्वाग्रहों पर आधारित नहीं है?इसी प्रकार के विरोधाभास प्रेमचन्द की अन्य रचनाओं में भी दिखाई देते हैं.मातादीन जिसके पूर्णत: बदल जाने का उल्लेख प्रेमचन्द करते हैं,उसके संवाद में श्रेष्ठता भाव जड़ जमाये बैठा है.मातादीन किस धर्म के पालन की बात कर रहा है,जो दलित का कभी हुआ ही नहीं.क्या एक चमार के लिए भी वह उतना ही स्वीकार्य है या नहीं ,इस बिन्दु पर प्रेमचन्द जैसे महान लेखक ने विचार करना क्यों जरूरी नहीं समझा ?क्या यह कथन् मानवीय गरिमा के अनुकूल है? इस वाक्य को जब एक चमार पढ़ता है ,तो क्या वह हीनता बोध का शिकार नहीं होगा ? यहाँ यह भी बताना जरूरी है कि ‘गोदान’ का रचनाकाल 1936 ई.है.प्रगतिशील् लेखक संघ अस्तित्व में आ चुका था.अम्बेडकर – आन्दोलन राष्ट्रीय पहचान बना चुका था.पूना- पैक्ट पर हस्ताक्षर हो चुके थे .उस दौर में प्रेमचन्द की यह टिप्पणी – जो धरम का पालन करे ,वही ब्राह्मण ,जो धरम से मुँह मोडे ,वही चमार.’, गले नहीं उतरती.चमनलाल जी विद्वान हैं ,किसी भी तर्क से प्रेमचन्द को सही सिद्ध कर सकते हैं.लेकिन एक दलित होने के नाते मुझे यह टिप्पणी पूर्वाग्रह से परिपूर्ण लगती है. यहाँ यह कहना भी जरूरी लगता है कि किसी भी रचना का मूल्यांकन ,विश्लेषण ,बौद्धिक शब्दजाल या आख्यान भर नहीं होता.इससे परे भी कुछ अर्थ होते हैं .जिनके सामाजिक सरोकार होते हैं.प्रेमचन्द की रचनाओं को एक दलित ठीक उसी तरह स्वीकार करे ,जैसे गैर दलित उन्हें समझा रहे हैं .क्या परिवेशगत ,पारिवारिक संस्कारों की मनुष्य की सामाजिक चेतना के निर्माण में कोई भूमिका नहीं होती?क्या उन समीक्षकों ,विद्वानों की स्थापनाओँ को आँख मूँद कर स्वीकार कर लेना चाहिए ,जो मंचो ,सभा गोष्ठियों में मार्क्सवादी हैं और घर की देहरी पर कट्टर सामंतवादी,ब्राह्मणवादी संस्कारो से लैस हैं ? जो वर्ण और जाति के समर्थक बने हुए हैं ? ऎसे लोगो को प्रेमचन्द के लेखन में अंतर्विरोध दिखाई नहीं देते हैं.क्योंकि उनके लिए यह सहज और सामान्य है.

Thursday, March 10, 2011

याद आली टिहरी

पहली ग्ढ़वाली फिल्म के निर्माता-निर्देशक पाराशर गौड़, लोक गायक गोपालबाबू गोस्वामी एवं लोक गायिका कबूतरी देवी को सम्मानित करने के साथ-साथ यंग उत्तराखण्ड द्वारा सीरीफोर्ट, नई दिल्ली में आयोजित पुरस्कार समारोह में गढ़वाली फिल्म  याद आली टिहरी को सर्वश्रेष्ठ फिल्म से पुरस्क्रत किया गया। अन्य पुरस्कारों की घोषणा के साथ यंग उत्तराखंड सिने अवार्ड्स २०११ में उनके सिनेमा एवं संगीत छेत्र में जिन कलाकारों को सम्मानित किया गया वे इस प्रकार है |

सर्वश्रेष्ठ गीतकार (Best lyricist)
नरेन्द्र सिंह नेगी - बिनिसिरी की बेला (सलान्या श्याली)

सर्वश्रेष्ठ गायक (Best singer male)
किशन महिपाल - सुनिंदी रात्यूं माँ (सामन्या बौजी )

सर्वश्रेष्ठ गायिका (Best singer female)
मीना राणा - औ बूलाणु यो फहाड़ा (दिन जवानी चार)

सर्वश्रेष्ठ संगीतकार (Best music director)
नरेन्द्र सिंह नेगी - (सलान्या श्याली)

सर्वश्रेष्ठ संगीत एल्बम निर्देशक (Best Music album director)
किशन महिपाल - (सामन्या बौजी )

सर्वश्रेष्ठ संगीत एल्बम (Best Music album)
सलान्या श्याली

सर्वश्रेष्ठ हास्य अभिनेता (Best actor in comic role)
रमेश रावत - गुल्लू

सर्वश्रेष्ठ खलनायक अभिनेता (Best actor in nagetive role)
पन्नू गुसाईं - छम घुन्गुरु

सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (Best actor in supporting role – Male)
राकेश गौड़ - कभी त होली सुबेर

सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेत्री (Best actor in supporting role – Female)
संगीता नेगी - छम घुन्गुरु

सर्वश्रेष्ठ कैमरामैन (Best cinematographer)
जयदेव भट्टाचार्य - याद आली टिहरी

सर्वश्रेष्ठ अभिनेता (best actor in lead role-male)
मदन डुकलान - याद आली टिहरी

सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री (Best actor in lead role – female)
रचित कुकरेती - माँ के आंसूं

सर्वश्रेष्ठ फिल्म निर्देशक (Best film director)
अनुज जोशी- याद आली टिहरी

सर्वश्रेष्ठ फिल्म (Best film)
याद आली टिहरी

Wednesday, March 9, 2011

इतिहास के अंदर सांस लेना

 क्या यह समाचार वाकई इतना गैरजरूरी है कि रस्सी को सांप बनाने वाले मीडिया को सांप सूंघा हुआ है।

      समझौता एक्सप्रेस और मालेगांव में हुए बम धमाकों में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक शामिल थे, स्वामी असीमानंद का इकबालिया बयान---

अला अल असवानी  (Alaa Al Aswany)
मिस्र की नयी पीढ़ी के प्रमुख लेखक हैं जो पेशे से तो दन्त चिकित्सक हैं पर  अरबी के लोकप्रिय और सामाजिक रूप में सजग कहानीकार उपन्यासकार हैं.होस्नी मुबारक की सत्ता का मुखर विरोध इनकी रचनाओं में दिखाई देता है.हाल में उनके एक लोकप्रिय उपन्यास पर एक लोकप्रिय फिल्म भी बनी है. हमारे मित्र और एक सजग अनुवादक यादवेन्द्र जी ने उनकी एक कहानी का अनुवाद पिछले तीन चार साल पहले किया था कथादेश में वह प्रकाशित हुई है । 
मिस्र के लोकतान्त्रिक आन्दोलन का संक्षिप्त विवरण अला अल असवानी ने पिछले दिनों विभिन्न माध्यमों में दिया है, इंटरनेट पर अंग्रेजी में उपलब्ध ऐसी ही कुछ सामग्रियों को संकलित कर के साथी पाठकों के लिए यह प्रस्तुति यादवेन्द्र जी के मार्फत है ...
 
मेरे लिए यह अविस्मरणीय अनुभव था.काहिरा में मैं आन्दोलनकारियों के काफिले में शामिल हुआ – पूरे मिस्र से इकठ्ठा हुए हजारों लोग काहिरा की सड़कों पर आजादी की मांग कर रहे थे और पुलिस की बेरहम हिंसा का उन्हें बिलकुल भय नहीं था.मिस्री शासन के सुरक्षा तंत्र में करीब पन्द्रह लाख सैनिक हैं और करोड़ों की राशि खर्च कर के सिर्फ एक काम के लिए ही प्रशिक्षित किया जाता है – देश की जनता को घुटने टेकने के लिए डराते धमकाते रहना. 
मैं हजारों मिस्री युवाओं के काफिले में शामिल हो गया – देश के अलग अलग हिस्सों से आये इन नौजवानों के बीच एक ही बात सामान्य थी कि वे सत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए भरपूर बहादुरी और दृढ संकल्प से भरे हुए थे.इनमें अधिकतर विश्वविद्यालय के छात्र हैं जिनके सामने पढ़ लिख कर सामने आने वाले भविष्य का कोई स्पष्ट खाका नहीं है.रोजगार की उन्हें उम्मीद नहीं दिखाई देती इसलिए शादी को लेकर भी उनके मन में गहरी निराशा का भाव है.उनके ह्रदय में इस अन्याय के मद्देनजर क्रोध की जैसी आवारा चिंगारी उठ रही है उसपर काबू पाना अब किसी के बस की बात नहीं.

इन क्रांतिकारियों के क्रियाकलापों से मैं जीवनपर्यंत अभिभूत रहूँगा.सभा के दौरान इन सब ने जो कुछ भी कहा उनमें गहरी राजनैतिक समझ और आजादी के वास्ते जान हथेली पर लेकर निर्भीकतापूर्वक आगे कदम बढ़ाने का जज्बा स्पष्ट देखा जा सकता है.आंदोलनकारियों ने मुझसे सभा को संबोधित करने के लिए कहा – हांलाकि मैं इस से पहले भी सैकड़ों दफा जनसभाओं में बोल चुका हूँ पर इस बार बिलकुल अनूठी अनुभूति हुई.मैं करीब तीस हजार प्रदर्शनकारियों से मुखातिब था जो समझौते जैसी कोई बात सुनने को बिलकुल तैयार नहीं थे और बीच बीच में नारे लगा कर इसको जतलाते भी जाते थे : होस्नी मुबारक मुर्दाबाद और आवाज दे रही है अवाम,उखाड़ फेंको बर्बर निज़ाम

जब कोई व्यक्ति प्यार में गहरे ढंग से डूब जाता है तो वह पुराना इंसान नहीं रहता बल्कि बेहतर इंसान बन जाता
है. क्रांति भी प्यार जैसी ही क्रिया है.इसमें जो कोई भी हिस्सा लेता है वह बखूबी जनता है कि पहले वो कैसा इंसान था और आन्दोलन ने उसको किस तरह प्रभावित किया और बदल डाला.क्रांति के बाद वही व्यक्ति अलग ढंग से सोचने और बर्ताव करने लगता है.जैसे हम मिस्रवासी ही हैं जो अपने दैनिक जीवन में अब ज्यादा गरिमा महसूस करने लगे हैं और हमें अब कोई भी बात भयाक्रांत नहीं करती.

मैंने उन्हें बताया कि उनकी उपलब्धियों पर मुझे फख्र है और अब दमन के शासन का अंत आसन्न है.अब हमें
कोई भय नहीं – न तो गोलियों का और न ही हथकड़ियों का, क्योंकि हमारी सामूहिक ताकत के मुकाबले उनकी खूंखार ताकत अब कहीं टिकने वाली नहीं.उनके पास दमन के वास्ते दुनिया के सबसे नृशंस हथियार हैं पर हमारे पास उनसे ज्यादा शक्तिशाली साधन हैं – हमारी हिम्मत और आजादी का संकल्प.होस्नी मुबारक तमाम निरंकुश तानाशाहों की तरह अपने अंत से पहले के स्वाभाविक चरणों से गुजर रहा है—पहले अकड़ भरा इनकार,उसके बाद नेस्तनाबूद कर देने की धौंसपट्टी और फिर विरोधियों को शांत करने के लिए मामूली सी रियायतों की घोषणा.अब उसके लिए एक ही रास्ता खुला है—अपना सूटकेस पैक करे और हवाई अड्डे का रास्ता नापे.यह सुनकर आंदोलन कारी एकदम जोश से भर गए और समवेत स्वर में बोल पड़े – हमने जिस आंदोलन की शुरुआत की है उसको तार्किक परिणति तक पहुंचाए बगैर हम चैन की सांस लेने वाले नहीं.

आन्दोलनकारी खूब पक्के इरादों वाले नौजवान हैं.उनके सामने बोलते वक्त जब भी मैंने मुबारक के लिये
राष्ट्रपति संबोधन का इस्तेमाल किया,वे गुस्से से उखड़ पड़े( ये लेख लिखे जाते समय तक होस्नी
मुबारक ने सत्ता छोड़ी नहीं थी). उसके लिए वे सिर्फ मुबारक या अधिक से अधिक पूर्व राष्ट्रपति
जैसा संबोधन सुनना चाहते हैं.

मेरे साथ एक मित्र स्पैनिश पत्रकार भी हैं जिन्होंने पूर्वी यूरोप के कई देशों के स्वतंत्रता संग्रामों को निकट
से देखा है.वे बताते हैं कि मेरा इतने सालों का तजुर्बा यही बतलाता है कि जब इतना बड़ा जनसमूह
जानमाल की परवाह किये बिना इतने पक्के इरादों के साथ सड़कों पर उमड़ पड़े तो सत्ता परिवर्तन
सिर्फ थोड़े वक्त की बात रह जाता है.

मिस्री जनता आखिर इतने संकल्प के साथ कैसी खड़ी हो गयी ? इस सवाल का जवाब इस शासन के अपने
चरित्र में छुपा हुआ है.दमनकारी शासन लोगों से उनकी आजादी छीन सकता है पर बदले में उन्हें जीवन के सर्व
सुलभ साधन आसानी से मुहैय्या करा सकता है.जनतांत्रिक शासन भले ही गरीबी का निराकरण न कर पाए पर
जनता को आजादी और गरिमा तो प्रदान कर ही सकता है.मिस्री शासन ने लोगों को सभी चीजों से वंचित कर दिया

– यहाँ तक कि आजादी और गरिमा से भी—दैनिक जरुरत की वस्तुओं की उपलब्धता की तो बात ही मत करिये.यहाँ इकठ्ठा हुए हजारों हजार मिस्री लोग उन्हीं वंचितों का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं.

हैरत में डाल देने वाली सच्चाई है कि ट्यूनीशिया से बरसों पहले मिस्र में राजनैतिक सुधारों की मांग उठाई
जाने लगी थी पर ट्यूनीशिया में जो कुछ घटित हुआ उसने मिस्र में एक उत्प्रेरक का काम किया.अब
लोगों के सामने यह उदाहरण था कि कोई तानाशाह चाहे कितनी बड़ी फ़ौज खड़ी कर ले जनता के
व्यापक विद्रोह के सामने वह फ़ौज तानाशाह की जीवन भर की गारंटी नहीं दे सकती.इस देश में तो
स्थितियाँ ट्यूनीशिया से भी ज्यादा बदतर हैं – हमारी आबादी का बड़ा हिस्सा गरीबी के बोझ तले दम
तोड़ रहा है और यहाँ की क्रांति का अनुसरण कर सकते हैं—वैसे ही इश्तिहार काहिरा की सड़कों पर भी देखने को मिल रहे हैं.अब तो आजादी की मांग की यह आवाज यमन तक जा पहुंची है.

यहाँ के सत्ता प्रतिष्ठान को अब यह समझ आने लगा है कि उनके तमाम इंतज़ाम प्रदर्शनों को रोकने में
कामयाब नहीं हो पा रहे हैं.फेसबुक के जरिये प्रदर्शन आयोजित करने की बात सही है क्योंकि इसकी प्रामाणिकता और निष्पक्षता पर लोगों का भरोसा है.जब सरकार ने इनपर पाबंदी लगाने की कोशिश की तो जनता ज्यादा सयानी साबित हुई.सुरक्षा बलों की दिनों दिन बढती जा रही हिंसा के बावजूद जनता बगावत के लिए उठ खड़ी हुई है.इतिहास गवाह है कि एक हद लाँघ जाने के बाद सामान्य पुलिसकर्मी भी अपने लोगों पर फायरिंग करने का हुक्म मानने से इनकार कर देता है.

मैंने चोरी छिपे बाहर लाया गया एक गोपनीय सरकारी फरमान देखा है जिसमें मिस्री टेलीविजन के अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि वे खोज खोज कर वैसी औरतों की तस्वीरें दिखाएँ जो भयभीत हों और अपनी सुरक्षा के लिए तानाशाही उस से भी ज्यादा समय से कुंडली मार कर बैठी हुई है.हम पडोसी देश
मुबारक की गुहार लगाती हों.

पुलिस को ठेंगा दिखा कर बगावत का रास्ता पकड़ने वाले अधिकांश लोग सामान्य देशवासी हैं.एक नौजवान
आन्दोलनकारी ने अपना अनुभव मुझे सुनाया कि परसों वह पुलिस की मार से बच कर भागते हुए देर रात एक
रिहायशी इलाके में घुस गया और एक दरवाजे के सामने खड़े होकर घंटी बजाने लगा.साठ साल के एक बुजुर्ग ने जब दरवाजा खोला तो जाहिर है उनके चेहरे पर बदहवासी का भाव था.नौजवान ने पुलिस से छिपने के लिए अंदर आने की इजाजत माँगी,बुजुर्ग ने उसका आइडेंटीटी कार्ड देखा फिर अंदर आने के लिए कहा.फिर अपनी युवा बेटी को सोते से जगाया और उसके लिए कुछ खाने को बनाने को कहा.रात में ही तीनों ने साथ मिल कर चाय पी और इस तरह से घुलमिल कर बातें करने लगे जैसे बरसों की पहचान हो.सुबह जब पुलिस का आतंक थोडा कम हुआ तो उस बुजुर्ग ने नौजवान को मुख्य सड़क तक साथ जाकर पहुँचाया,एक टैक्सी रोकी और उसको गंतव्य तक जाने के लिए पैसे देने लगे.नौजवान ने पैसे लेने से मना कर दिया और उनको शुक्रिया अदा किया.इसपर बुजुर्ग ने कहा कि शुक्रिया तो बेटे मुझे तुम्हारा अदा करना चाहिए कि अपने जान की बाजी लगा कर तुमलोग मुझ जैसे तमाम मिस्र वासियों को इन आततायियों से बचा रहे हो.

हमें यह अनूठा अवसर मिला है जब हम इतिहास के बारे में पढ़ ही नहीं रहे हैं बल्कि इतिहास के अंदर साँस भी ले रहे हैं. कुछ इसी तरह मिस्री बसंत का आगाज हुआ.


क्रांति का यह पल बेहद रोमांचक और अनुभवों को समृद्ध करने वाला था.लाखों लोग अपने अपने घरों से निकल कर सड़कों पर आ गए थे,उनके जोश को देख कर मैं भी उनमें शामिल हो गया.मैंने पूरे 18 दिन उनके साथ बिताये और इस अद्भुत तजुर्बे ने मुझे कई नयी चीजें लिखने की प्रेरणा दी-- अब मुझमें कई नयी कहानियाँ लिखने की स्फूर्ति है.मुझे आदमीयत पर भरोसा मजबूत करने वाले अनेक पलों की नायाब सौगात मिली-- यह मेरे जीवन का शानदार दौर रहा.और यह सिर्फ मेरा ही अनुभव नहीं है बल्कि अनेक लेखक और कलाकार इन अनुभूतियों को मेरे साथ साझा करते हैं.
     मुझे बहुत अरसे से यह लगता रहा है कि मिस्र में क्रांति अवश्यम्भावी और आसन्न है और अपने पिछले कई इंटरव्यू   में जब मैंने ये बातें कहीं तो कई लोगों को इसका यकीन नहीं हुआ.2007 में न्यूयार्क टाइम्स  को दिए एक इंटरव्यू में मैंने साफ़ साफ़ कहा था कि मिस्र एक बड़े परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा हुआ है--इस अचानक होने वाले बदलाव से हम सब चौंक जायेंगे.
     इस क्रांति का सर्वश्रेष्ठ पक्ष ये रहा कि विभिन्न तबके के लोगों की अद्भुत एकता और अखंडता दिखाई दी... धैर्य और सहिष्णुता ...हर किसी ने आपको सहज भाव से स्वीकार किया.चाहे बुरकानशीं स्त्री हो या आधुनिक युवती...अमीर हो या गरीब...मुस्लिम हो या गैर मुस्लिम...सब ने.एक उदाहरण देता हूँ: तहरीर चौक पर सेना खाने पीने का सामान नहीं ले जाने दे रही थी पर हमें मालूम था कि इसमें कस्र अल नील  कि तरफ एक गेट है जहाँ से खाने का सामान यहाँ तक लाया जा सकता है.चौक पर तैनात सैनिक भी हमें दिखा दिखा कर निर्देश दे रहे थे कि खाना अंदर लाना है तो उस गेट की ओर जाओ.
       मैंने यहाँ डटे हुए ऐसे लोगों को देखा जो देखने से फटेहाल गरीब लगते  थे पर हमारे लिए ऐसे लोग भी अपने साथ झोलियों में भर के तीन चार सौ संद्विच लेकर आये--उनकी शक्ल सूरत और पहनावा देख कर जाहिर था कि इसकी कीमत चुकाने में उन्हें जरुर मुश्किल आई होगी.कई साधन संपन्न लोग भी थे जो क्रांति को अपना पूरा समर्थन दे रहे थे,पर उन तंग हाल लोगों का जज्बा देख कर प्रेरणादायक हैरानी होती है. हमें वहाँ बैठे हुए पता ही नहीं लग पाता था कि आन्दोलनकारियों को खाने पीने का समान कैसे और कहाँ से मिल जाता है.
    वहाँ मौजूद सभी लोग बेहद अनुशासित थे -- संघर्ष करने वालों से लेकर उनको रोकने वाले सुरक्षा कर्मियों तक.जब मुबारक सरकार ने गुंडों मवालियों को ट्रकों में भर कर वहाँ मारकाट करने के लिए छुट्टा छोड़ दिया तो तो आन्दोलन कर्मी नौजवानों ने सामूहिक तौर पर उनका जम कर मुकाबला किया-- इनमें सभी व्यवसायों के लोग शामिल थे.थोड़े समय में सब कुछ व्यवस्थित हो गया.वहाँ सिगरेट पीना माना है-- मुझे जब इसकी  तलब लगी तो मैंने एक सिगरेट निकाल कर सुलगा ली पर तभी वहाँ एकत्र समूह में से किसी की आवाज आई कि जनाब,आप यहाँ सिगरेट नहीं पी सकते...एक रात का वाकया है,करीब दो बजे थे.मैंने सिगरेट का एक खाली पाकेट वहीँ फेंक दिया,तभी एक सत्तर साल की बुजुर्ग महिला  मेरे पास आयी और मुझसे बोली: मैं तुम्हारी बहुत बड़ी प्रशंसक हूँ बेटे और मैंने तुम्हारी एक एक किताब पढ़ी हुई है...पर ये सिगरेट का डिब्बा यहाँ से उठा लो , ऐसा करना ठीक नहीं...हम यहाँ मिलजुल कर एक नए मिस्र का निर्माण करने के लिए इकठ्ठा हुए हैं..इस नए मुल्क को खूब सुन्दर और साफ़ सुथरा होना चाहिए....इसी लिए मैं बार बार ये कहता हूँ की तहरीर चौक पर जो सब कुछ घटा वह अविस्मरणीय था...एक सुखद स्वप्न के साकार होने जैसा.


Thursday, March 3, 2011

खिलखिलाने दो उसे सरे बाजार

मौज लेना एक चालू मुहावरा है। फिर उसके साइड इफ़ेक्ट पर बात करना ? ली गई मौज को मस्ती मान लिया जाए तो मौज बहार आ जाए। मौज का यथार्थ थोड़ा ज्यादा शालीन और कम औपचारिक होते हुए दोस्तानेपन का सबब बने।
हमारे घर के पास रहने वाला वह लड़का जो बोलते हुए हकलाता था, अल्टी नाम था उसका, सब उससे मौज लेते थे। वह भी कम न था। हकला-हकला कर गाली देते हुए पीछे भागता और मौज लेने को आतुर भीड़ से दूसरे की भी मौज लिवाने में कोई कसर न छोड़ता। हालांकि, नहीं जानता था कि उसके हुनर में ही वह ताकत है जो हर एक को मौज लेने का अवसर देती है और माहौल को कुछ ज्यादा आत्मीय बनाती है। डॉक्टर 'होगया’ भी ऐसे ही हुनर का मास्टर, उपन्यास 'फाँस’ का एक पात्र है। प्रस्तुत है उपन्यास का एक छोटा-सा अंश।


         रात के अंधेरे को परे धकेल, खुल चुकी सुबह का वह ऐसा समय था, जब अलसाई हुई दुनिया के मुँह पर पानी की छपाक मारता वह बाजार, जो कस्बे को शहर में तब्दील करने की ओर था, आँखें धो चुका था। रेहड़ी वाले मण्डी से उठाए माल को झल्लियों और माल ढुलाई के लिए लगी गाड़ियों पर लदवा रहे थे। ज्यादातर सब्जी वाले लद चुकी रेहड़ियों को धकेलते हुए अपने-अपने ठिकानों को निकल चुके थे। ठिकानों पर पहुँच चुकी रेहड़ी वाले रेहडियों पर सब्जियां सजाने लगे थे। फल वालों का माल अभी झल्लियों में झूलता चला आ रहा था। टमाटर वाला पेटियों को खोल-खोलकर एक-एक टमाटर उठाता, झाड़न से साफ करता और बहुत ही तल्लीनता से मीनार दर मीनार चढ़ाता जा रहा था। गारे मिट्टी की दीवारों को चिनने वाला कोई कारीगर देखता तो जरूर ही ठिठ्कता। ईर्ष्या करना भी चाहता तो टमाटर के रंग और उनकी चमकती सतह पर टिकी निगाहें उसे उल्लास से भर देती। वह फल वाला, जो पहले सब्जी का काम करता था और अब पफल बेचने लगा था, अपनी पूर्व आदत के साथ अब भी तड़के ही माल उठाने मण्डी पहुँच जाता। उन फल वालों की तरह उसने अपनी आदत बदली नहीं थी, सब्जी वालों के निकल जाने के बाद जो मण्डी पहुँचते और इस तरह देर से मण्डी पहुँचने में अपनी शान समझते। टमाटर वाले की तरह उसके हाथ भी पफलों को झाड़ने-पोंछने में व्यस्त थे। सँतरों को झाड़न से पोंछ-पोंछकर रेहड़ी पर सजाते हुए, चमकते छिलों को देखकर उसका मन प्रफुल्लित हो रहा था। केले के गुच्छे अभी रेहड़ी के किनारे ही रखे थे, बहुत जल्द ही वह उन्हें धागे से लटका देने वाला था। रेहड़ी पर उठायी हुई छप्पर में लगाई गईं खपच्चियाँ उसने पहले से ही केलों के लिए निर्धरित की हुई थी। सेब की पेटी को उसने अभी तोड़ा नहीं था।
आलू-प्याज वाले ने आलू और प्याज के बोरों का खुला मुँह अपनी ओर को रख, उन्हें ज्यों का त्यों बिछाकर अपना ठिया जमा लिया था। गंदे नाले का वह किनारा, लम्बे समय से टूटी पुलिया के कारण जो पैदल चलने वालों के लिए कुछ खतरनाक हो गया था, उसका ठिया था। बगल में ही खड़ी रेहड़ी से एक कप चाय और साथ में बेकरी का बना पंखा, जो मुँह में जाते ही किरच-किरच करता, उसने खरीदा और सुबह का नाश्ता करने लगा। पुलिया के ठीक सामने, दूसरी ओर, सड़क के किनारे वाली कपड़ों की दुकान का मालिक शॅटर को मत्था टेकने के बाद ताला खोल चुका था और बादलों की गड़-गड़ाहट-सी आवाज करते शॅटर को उसने ऊपर उठा दिया था। दुकान के अन्दर धूप-बत्ती कर और गल्ले को हाथ जोड़ने की कार्रवाई अभी उसे जल्द से निपटानी थी और ग्राहक के इंतजार में मुस्तैदी से बैठ जाना था। बगल की दुकान में बर्तन वाला धूप-बत्ती करने के बाद आतुरता से बोहनी हो जाने का इंतजार कर रहा था। दूसरे दुकानदार भी व्याकुलता से बोहनी का ही इंतजार कर रहे थे।

- बिना हील-हुज्जत वाला ही ग्राहक आए---हे भगवान!

केले वाला मन ही मन कल सुबह-सुबह ही आ गए उस ग्राहक की याद को अपने मन से मिटा नहीं पाया था, जिसने बोहनी के वक्त ही तू-तू, मैं-मैं कर देने को मजबूर कर दिया था और जिसका असर दिन भर की बिक्री पर पड़ा, ऐसा वह माने बैठा था।

- हे भगवान कहीं आज पिफर ऐसा न हो जाए!

लेकिन डॉक्टर 'होगया" की उपस्थिति में उस ग्राहक की स्मृतियां उसके भीतर बची रहने वाली नहीं थी। अपने क्लीनिक की ओर आते डॉक्टर को देख वह बीते दिन के वाकये को एकदम से भूल चुका था और जोर से चिल्लाया -        

- होगया--- होगया---।

डॉक्टर उसी की ओर देख रहा है, यह ताड़ते ही उसने भरसक कोशिश की चुप होने की लेकिन एक क्षण को उसका मुँह खुला का खुला ही रह गया। शब्द मुँह से छूट चुके थे। डॉक्टर की निगाह से वह अपने को छुपाने में पूरी तरह से नाकामयाब रहा। क्लीनिक में भी अभी ठीक से न पहँुचा डॉक्टर 'होगया’ केले वाले की हरकत से बुरी तरह चिढ़ गया था। उसके मुँह से दना-दन गालियां फूटने लगी। केले वाला आगे-आगे और डॉक्टर उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा। डॉक्टर की पकड़ में आने से बचने के लिए केले वाला बित्ती भर चुका था। अब डॉक्टर होगया के लिए उसको पकड़ना आसान नहीं था। कहाँ पचास पार कर चुका डॉक्टर और कहाँ उसकी आधी उमर का वह उदंड। डॉक्टर की साँस उखड़ने लगी थी। वह एक ही जगह पर खड़े होकर उखड़ती साँसों से गालियां बकने लगा,

- ओ तेरी माँ का हो गया---साले हरामी तेरा हो गया।

डॉक्टर को रुका हुआ देख, बचकर भाग रहा वह केले वाला भी रुक गया और वहीं से खड़े होकर डॉक्टर को चिढ़ाने लगा। दूर से खड़े होकर अपने को चिढ़ाते उस हरामी का क्या करे ?, डॉक्टर की समझ नहीं आ रहा था। तभी कोई दूसरा चिल्लाया,

- होगयाह्णह्णह्ण--- होगयाह्णह्णह्ण---।

डॉक्टर नीचे झुका हुआ था और पाँव से चप्पल निकाल रहा था। परेशान था कि कैसे निपटे इन हरामियों से। निगाहें उसी पर टिकी थी, जो अब भी दूर से खड़ा होकर तरह-तरह की हरकत करते हुए चिढ़ाये जा रहा था। डॉक्टर अचानक उस ओर को घूमा जिधर से दूसरी आवाज आई थी और बिना देखे ही उसने चप्पल उस ओर को दे मारी। चप्पल सीधे उस झल्ली वाले के लगी, जो सिर पर रखी केलों की झल्ली को नीचे उतार रहा था। चारों ओर से हँसी का फव्वारा छूट गया। सड़क के आर पार के रेहड़ी वालों के साथ-साथ, बिना ग्राहकों के खाली बैठे दुकानदार भी खिल-खिलाने लगे और शुरु हो चुके तमाशे में शामिल हो गए। मुश्किलों से ही जिनके चेहरे पर हँसी की कोई रेखा खिंचती हो, ऐसे लोगों के लिए भी मुस्कराये बिना चुप रहना संभव न रहा। झल्ली वाला, चप्पल जिसके बेवजह पड़ी थी, खुद भी खिल-खिला रहा था,

-क्या ---'होगया’--- डॉक्टर साहिब --- यूं ही बिना देखे ही हमको बजा दिये ?

बेवजह ही एक निर्दोष को चप्पल मार देने पर डॉक्टर को अपनी गलती पर माफी माँगनी चाहिए, ऐसा सोचने वाले अजनबियों के लिए तो पूरा मामला ही पेचिदा हो गया कि डॉक्टर तो उल्टा झल्ली वाले को भी गालियां सुना रहा है।

- हरामखोर अभी देखता  तुझे --- साले तेरे नहीं होता है क्या ?
  
झल्ली वाला और भी खिल-खिलाकर हँसने लगा। उसके इस तरह खिल-खिलाने से खिसियाया हुआ डॉक्टर पिफर से गालियां बकने लगा। ''होगया--- होगया" की आवाजें अब हर तरफ से आ रही थीं। डॉक्टर कभी एक ओर को मुँह कर गाली देता तो कभी दूसरी ओर। उछल-उछल कर गाली देते हुए उसकी साँस फूलने लगी थी। चप्पल उठाने के लिए झल्ली वाले की ओर दौड़ ही रहा था कि तभी न जाने कहाँ से तुफैल दौड़ता हुआ आया और 'होगया" चिल्लाते हुए उसने चप्पल पर जोर से किक जमा दी। चप्पल हवा में उछलकर उस ओर जा गिरी जिधर बित्ती भरकर दौड़ने वाला, खड़ा होकर सुस्ता रहा था। वह आश्वस्त था कि अब तो डॉक्टर उसकी बजाए तुफैल से निपटना चाहेगा। तुफैल की हरकत पर डॉक्टर पूरी तरह से झल्ला भी गया,

- अबे रुक साले कटवे के--- तेरी माँ का होगा मादरचो---। हरामखोर अभी तो तू भी पूरी तरह से नी हुआ---।

दूसरे पाँव की चप्पल उतार कर उसने उस ओर उछाली, जिधर तुफैल दौड़ रहा था। पिद्दी-सा तुफैल तेजी से दौड़कर सड़क के पार निकल चुका था। अबकी बार केले की ठेली के बगल में बैठा वह कुत्ता चपेट में था, खुजलीदार शरीर पर उड़ चुके बालों की वजह से जो मरगिल्ला-सा दिखायी देता था। चप्पल उसके न जाने किस अंग पर लगी कि जोर से किकियाने लगा। कुत्ते की कॉय-कॉय और डॉक्टर की गालियों से पूरा माहौल ही तमाशे में बदल गया। चिढ़ाने वालों के पीछे-पीछे, सड़क के इधर-उधर दौड़ता डॉक्टर हँसी का पात्र हो चुका था। आस-पास के दुकानदार भी दुकानों से बाहर निकल, दौड़-दौड़ कर गाली देते डॉक्टर से मजा ले रहे थे। जानते थे कि डॉक्टर को कुछ भी कहना, खुद को भी गालियों का शिकार बना लेना है तो भी वे ऐसा करने से बाज न आ रहे थे। हँसी की उठती स्वर लहरियां नौकरों को भी दुकान में आए ग्राहकों से निबटने की बजाय कुछ देर लुत्फ उठा लेने की छूट दे रही थी। महावर क्लाथ हाऊस का सेल्समैन, जिसे क्षण भर भी कभी खाली बैठने की छूट न होती, गज में पँफसाये कपड़े को हाथ में पकड़े हुए, गद्दी से बाहर को लटक कर तमाशे का मजा लूटने लगा। सामने बैठी ग्राहक के द्वारा चुन लिये गए कपड़े को उसने पूरा नाप लिया था और काटकर बस अलग ही करना था। ग्राहक भी हँसे बिना न रह पा रहा थी।