Sunday, May 15, 2011

विश्वास रखो, रास्ते में विश्वास रखो


पिछले साल 14 जुलाई, २०१० को जब बादल दा ८५ के हुए थे, हम में बहुत से साथियों ने  लिख कर और उन्हें सन्देश भेजकर जन्मदिन की बधाई के साथ  यह आकांक्षा प्रकट की थी कि वे और लम्बे समय तक हमारे बीच रहें . लेकिन परसों १३ जुलाई ,२०११ को वे हम सबसे अलविदा कह गए.  भारतीय रंगमंच के  क्रांतिकारी, जनपक्षधर  और अनूठे रंगकर्मी बादल दा को जन संस्कृति मंच लाल सलाम पेश  करता है.  उनके उस लम्बे, जद्दोजहद  भरे सफर को  सलाम पेश  करता है, जो १३ मई  को अपने अंतिम मुकाम को पहुंचा.  लेकिन हमारे संकल्प , हमारी स्मृति  और सबसे बढ़कर  हमारे कर्म में बादल दा का सफ़र कभी विराम नहीं लेगा. क्या उन्होंने ही नहीं लिखा था, "और विश्वास  रखो, रास्ते में विश्वास  रखो. अंतहीन रास्ता, कोइ मंदिर नहीं हमारे लिए. कोइ भगवान नहीं, सिर्फ रास्ता. अंतहीन रास्ता"  
     जनता का हर बड़ा उभार अपने सपनों और विचारों को विस्तार देने के लिए अपना थियेटर माँगता है. बादल दा का थियेटर का सफ़र नक्सलबाड़ी  को पूर्वाशित करता सा शुरू हुआ, जैसे कि मुक्तिबोध की ये अमर पंक्तियाँ जो आनेवाले कुछेक वर्षों में ही विप्लव की आहट को  कला की अपनी ही अद्वितीय घ्राण- शक्ति से सूंघ लेती हैं-
'अंधेरी घाटियों के गोल टीलों, घने पेड़ों में
कहीं पर खो गया,
महसूस होता है कि वह , बेनाम
बेमालूम  दर्रों के इलाकों में 
( सचाई के सुनहरे तेज़ अक्सों के धुंधलके में )
मुहैय्या कर रहा  लश्कर
हमारी हार का बदला चुकाने आएगा
संकल्प्धर्मा चेतना का रक्ताप्लावित स्वर
हमारे ही ह्रदय का गुप्त स्वर्णाक्षर
प्रकट हो कर विकट हो जाएगा. 
  नक्सलबाड़ी के महान विप्लव ने जनता के बुद्धिजीवियों से मांग की कि वे जन -कला की क्रांतिकारी भूमिका के लिए आगे आएं.  सिविल इंजीनियर और  टाउन प्लैनर  के पेशे  से अपने वयस्क सकर्मक जीवन की शुरुआत  करने वाले बादल दा जनता की चेतना के  क्रांतिकारी दिशा में बदलाव के  किए तैय्यार करने के  अनिवार्य उपक्रम के  रूप में नाटक और रंगमंच को  विकसित करनेवाले अद्वितीय रंगकर्मी के रूप में इस भूमिका के  लिए समर्पित हो गए.  ”थर्ड थियेटर” की  ईजाद के साथ उन्होने  जनता और  रंगमंच, दर्शक और कलाकार की दूरी को  एक झटके  से तोड  दिया. नाटक अब हर कहीं हो सकता था. मंचसज्जा, वेषभूशा और  रंगमंच के  लिए हर तरीके  की विशेष ज़रूरत को उन्होंने  गैर- अनिवार्य बना दिया. आधुनिक नाटक गली, मुहल्लों ,चट्टी-चौराहों , गांव-जवार तक यदि पहुंच सका , तो  यह बादल दा जैसे महान रंगकर्मी की भारी सफलता थी. 1967 में स्थापित ”शताब्दी” थियेटर संस्था के  ज़रिए उन्होंने  बंगाल के  गावों में  घूम-घूम कर राज्य आतंक और गुंडा वाहिनियों के हमलों का खतरा उठाते हुए जनाक्रोश को  उभारनेवाले व्यवस्था-विरोधी  नाटक किए. उनके  नाटको  में नक्सलबाडी किसान विद्रोह का ताप था. 
     हमारे आन्दोलन  के नाट्यकर्मियों ने   खासतौर पर  १९ ८० के दशक में बादल दा से प्रेरणा  और प्रोत्साहन प्राप्त किया. वे  इनके बुलावे पर इलाहाबाद और  हिंदी क्षेत्र के दूसरे हिस्सों में भी बार बार आये, नाटक किए, कार्यशालाएं   कीं, नवयुवक  रंगकर्मियों  के साथ-साथ रहे , खाए , बैठे  और उन्हें  सिखाया.  जब मध्य बिहार के क्रांतिकारी किसान संघर्षों के इलाकों में युवानीति और हमारे दूसरे नाट्य-दलों पर सामंतों के हमले होते तो साथियों को जनता के समर्थन से  जो बल मिलता सो मिलता ही, साथ ही यह भरोसा और प्रेरणा भी मन को बल प्रदान करती कि बादल सरकार जैसे अद्वितीय कलाकार बंगाल में  यही कुछ झेल कर जनता को जगाते आए हैं.
    एबम इंद्रजीत, बाकी इतिहास, प्रलाप,त्रिंगशा शताब्दी, पगला घोडा, शेष  नाइ, सगीना महतो ,जुलूस, भोमा, बासी खबर और  स्पार्टाकस(अनूदित)जैसे उनके  नाटक भारतीय थियेटर को  विशिष्ट  पहचान तो  देते ही हैं, लेकिन उससे भी बडी बात यह है कि बादल दा के  नाटक किसान, मजूर, आदिवासी, युवा, बुद्धिजीवी, स्त्री, दलित आदि समुदाय के संघर्षरत लोगों के  साथी हैं, उनके  सृजन और संघर्ष में  आज ही नहीं, कल भी मददगार होंगे ,उनके  सपनॉ के  भारत के  हमसफर होंगे.
( प्रणय कृष्ण , महासचिव, जन संस्कृति मंच द्वारा जारी) 

Friday, May 13, 2011

अक्लांत कौरव



अरविंद शेखर
      ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित महाश्वेता देवी साहित्य-प्रेमियों के लिए कोई अनजाना नाम नहीं है। उत्पीडित, वंचित और शोषित लोगों के लिए सहानुभूति से भरा उनका लेखन स्वयं में एक मिसाल है। अपने अधिकारों के लिए संघर्षरत जनता के संघर्ष को प्रमाणिकता के साथ, सटीक ढंग से प्रस्तुत करने में सफल रही है।
        अक्लात कौरव लघु उपन्यास उनकी अन्य प्रसिद्ध कृतियों जंगल के दावेदार, टैरोडिक्टल, 1084वें की मां, शालगिरह की पुकार पर, मास्टर साहब, श्रीश्री गणेश महिमा के क्रम में ही आता है। महाश्वेता देवी लगातार आदिवासी समाजों से जुडी रही है और उनके बीच कार्य करती रही हैं। उनके अन्य उपन्यासों की तरह अक्लात-कौरव के केंद्र मे पश्चिमी बंगाल का अत्यंत पिछडा इलाका चौबीस परगना और उसके आस-पास के क्षेत्र का आदिवासी समाज है।
        इस उपन्यास की कथा जायज संघर्षो में हारे लोगों की कहानी है जो स्वयं को संघर्ष के लिए पुन: तैयार कर रहे हैं। कहानी का समय सत्तर के दशक के नक्सलवादी आंदोलन के बाद का है। जबकि आंदोलन के असफल होने का बाद पश्चिम बंगाल में सी।पी।एम। के नेतृत्व वाला वाममोर्चा सत्तारूढ हो चुका है। यह उपन्यास बताता है कि किस तरह सत्तारूढ होने के बाद वाममोर्चा अपने प्रमुख चुनावी वादे भूमि-सुधर को पूरा करने में असफल ही नहीं हो जाता बल्कि यथास्थिति बनाए रखने की कोशिश भी करता है। यही नहीं जनदबाब बढ़ने पर वहां की भूमि सुधर के नाम पर सिपर्फ छोटी जमीन के मालिकों को ही छेड़ा जाता है। जबकि बड़े जमींदार क्योंकि पाला बदलकर अब सी।पी।एम। को चंदा देने लगे है अत: पार्टी नेतृत्व उन्हें पूरा-पूरा संरक्षण देता है। परिवर्तन के नाम पर चुनाव जीत कर सत्ता में आई सरकार के यहां ग्राम जीवन में भी कोई परिवर्तन नहीं होता है, बल्कि पुराने संपत्ति-शाली वर्ग की सत्ता ही कायम रहती है। बदलता है तो सिर्फ झंडा- तिरंगे के स्थान पर लाल। लेखिका के शब्दों में- ''चूड़ामणि जैसे लोग समाज के प्रतिष्ठित अंग है। सरकारें आती है, सरकारें जाती है, चूड़ामणियों का कुछ नही बिगड़ता ।" निर्वाचित प्रतिनिधि सामंत पर टिप्पणी करते हुए वह कहती हैं-''शासकदल के निर्वाचित नेता के तौर पर सामंत जागुला में सभी को दबा कर रख सकते है, कलकत्ता में वह संभव नहीं है। जागुला के विरोधियों से सामंत नहीं डरता। गुप्त समझोते में उन्होंने जागुला का बंटवारा उसके नाम पर कर दिया है। वास्तव में शहर, अभी उनके गुण्डे-मस्तान-ठेकेदार-व्यापारियों के कब्जे में है। इस शासन से सभी खुश है। मनमाना मुनाफा लूटा जा रहा है, मनमानी गुंडागर्दी चल रही है। मनमानी कीमतें बढाई जा रही है, कालाबाजारी जोरों पर है। इसके बाद भी इस शासन का पतन कौन चाहेगा, क्यों चाहेगा सामंत सोच भी नहीं पाता।"
        अक्लांत कौरव की कथा छोटी सी, परन्तु बहुत सी कड़वी सच्चाईयां उजागर करती है। इस कथा का नायक इंद्र सी।पी।एम। का एक ईमानदार कैडर है। वह पहले मजदूर संगठन में कार्य कर चुका है तथा अब ग्रामीण क्षेत्रा में कार्य करना चाहता है। लेकिन जब वह आदिवासी संथालों के बीच पहुंचता है तो पाता है कि भूमि सुधर का आपरेशन बर्गा लुंज-पुंज ढंग से चल रहा है। यहां तक कि उनकी पार्टी का निर्वाचित प्रतिनिधि सामंत भी आपरेशन बर्गा को सफल नहीं होने देना चाहता। और उसने भ्रष्ट पुलिस और प्रशासन से भी एक नापाक गठजोड़ कायम कर लिया है। इस सबके चलते अपने अधिकारों और मूलभूत आवश्यकताओं से वंचित ग्रामीणों की हालात बद से बदतर हो गयी है। ये वे ही आदिवासी है जिनकी संघर्ष की एक लम्बी परंपरा रही है। विरसा मुंडा, सिंधु कानू के ये वंशज अपना संघर्षशील चरित्र छोड़ दें इसलिए उनके बीच एक अध्येता बुद्धिजीवी द्वैपायन सरकार को प्रवेश कराया जाता है। द्वैपायन सरकार दिल्ली में स्थित विदेशी देशों से धन लेकर चलने वाले एक फाउंडेशन से संबंद्ध है। द्वैपायन सरकार आदिवासियों को कायरता तथा संघर्ष से विरत रहने का पाठ ही नहीं पढ़ाना चाहता बल्कि वह सिद्ध कर देना चाहता है कि संथाल एक डरपोक व लालची कौम है। परन्तु अपने इस षडयंत्र में वह सफल नहीं हो पाता, भले ही उसे सत्ताधरियों का पूरा सहयोग प्राप्त होता है।
        इंद्र को अपने प्रवास के दौरान नक्सलवाडी के दिनों के ईमानदार नेता कालीबाबू  के विषय में पता चलता है कि जिनकी सामंत की शह पर पुलिस ने निगर्म हत्या ही नहीं कर दी थी बल्कि इस तथ्य को छुपाने की पूरी कोशिश आज भी जारी है। इंद्र को इस पर सहसा विश्वास नहीं होता और व काफी समय तक वह सही गलत के अंर्तद्वन्द का शिकार रहता है। एक तरफ पार्टी के सिद्धांत और दूसरी तरफ नेतृत्व की काली करतूतें। पर अंत में उसका विश्वास गहरा होता जाता है। जब सामंत और पार्टी नेतृत्व उसे व उसके साथियों को संघर्ष से दूर रहने के लिए शांति का पाठ पढ़ाता है। यहां तक कि जब वह भूमिहीन मजदूरों के लिए मजदूरी की सरकारी दरें लागू करवाने हेतु आंदोलन करता है तो इस भटकाव कहा जाता है। और उसे उत्पीड़क पुलिस प्रशासन से सहयोग करने को कहा जाता है। इतना ही नहीं वरन जायज हकों की बात करने पर उस पर नक्सली होने जाने का आरोप लगाया जाता है। इस तरह वह अपने अंर्तद्वन्द से मुक्त होता जाता है और सच्चाई की राह पर अग्रसर होता जाता है। आदिवासी भी उस पर आसानी से विश्वास नहीं करते पर उसकी ईमानदारी तथा उत्पीडितों के प्रति पक्षधरता के कारण वे उसे पहचान लेते है, और जान लेते हैं कि वह उनका सच्चा हितैषी है।
        यही अक्लांत कौरव की कथा है जो धीरे-धीरे पश्चिमी बंगाल के बहुप्रचारित भूमि-सुधरों के ढोल की पोल खोलते हुए, सत्ताधरियों के चरित्र की बखिया उधेडते हुए आगे बढती है। बांग्ला से अनुदित होने के कारण संभवत: यह मूल उपन्यास का सा आनन्द न दे परन्तु अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक तेवरों के कारण यह पठनीय ही नहीं अपितु संग्रहणीय है।

Monday, May 9, 2011

सार्वभौमिक-आंचलिकता का परिवेश से क्या संबंध है


दांये या बांए बेला नेगी की पहली फिल्म है। हिन्दी फिल्म होते हुए भी उसमें एक खास किस्म की आंचलिकता बिखरी हुई है। उसे आंचलिक फिल्म कहना ही ज्यादा ठीक लग रहा है। न सिर्फ उत्तराखण्ड की भौगोलिक पृष्ठभूमि में रचा गया उसका विन्यास अपनी विशिष्टता के साथ है बल्कि गढ़वाली और कुमांउनी लहजे में बोली जाती हिन्दी भाषा में रचे गये संवाद उसे दूसरी हिन्दी फिल्मों से अलग किए दे रहे हैं। यहां यह सवाल बेशक हो सकता है कि हिन्दी की प्रकाशित रचनाओं में आंचलिकता के पैमाने तो पात्रों के संवाद को कथा पृष्ठभूमि की भाषा में होने पर भी उसे हिन्दी की रचना ही मानने वाले हैं तो माध्यम का फर्क भर होने से दांये बांऎ को सिर्फ हिन्दी फिल्म क्यों नहीं माना जा सकता ? वैसे यहां रेणु के उपन्यास मैला आंचल को आंचलिक उपन्यास कहने वाले तथ्य भी हैं। अपने कथ्य और भाषा से ही नहीं बल्कि एक विशिष्ट भूगोल के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से जूझते रचनाकार की प्रतिबद्धता की स्पष्टता रेणु के मेला आंचल को आंचलिकता का एक तर्क देती है। यहां आंचलिकता अपने अन्तर्निहित अर्थों का निषेध करते हुए ज्यादा व्यापक और सार्वभौमिक हो उठती है। वैसे दांये या बांए फिल्म को प्रथम दृष्टया एक निश्चित भू-भाग से भरे दृश्य में देखना तो फिल्म के प्रभाव को सीमित कर देने वाला भी लग सकता है या फिर फिल्मकार का अपने भूगोल के प्रति अतिश्य मोह भी उसे कहा जा सकता है। उपभोक्तावाद से ग्रसित सम्पूर्ण समाज को उत्तराखण्ड की खिलंदड़ी भाषा और बेढब भूगोल तक सीमित मानते हुए पारम्परिक अर्थतंत्र की वकालत तो वैसे भी संभव नहीं है, इसमें दो राय नहीं। पर सवाल फिर भी है कि उसी विशिष्ट भूगोल पर केन्द्रित हिन्दी फिल्म राम तेरी गंगा मैली और बेला नेगी की दांये या बांए में वह मूलभूत अंतर क्या है जो दोनों ही फिल्मों में पहाड़ी उबड़ खाबड़ रास्तों पर समान रूप से दौड़ते कैमरे को भिन्न बना देता है ? स्पष्ट है कि राम तेरी गंगा मेली में झरनों और पहाड़ों की उपस्थित एक ऐसा सौन्दर्य रचती है जो जीवन के उबड़-खाबड़पन को ढक देता है। लेकिन दांये या बांए में उसका सौन्दर्य चक्करदार रास्तों पर दौड़ती मोटर में बैठी सवारी को हो जाने वाली "कै" को न सिर्फ यथावत रखता है बल्कि शहरी बुनावट में विकसित हुई मानसिकता पर व्यंग्य भी करता है। दृश्यों की जीवन्तता और संवादो की मारक भाषा में वह विशिष्ट भूगोल पूरी फिल्म का कथ्य ही हो जाता है।
मुम्बई के लिए आज भी बम्बई उच्चारित होते उस भूगोल में लौट कर स्कूल की अध्यापकी कर रहे रमेश मांजिला पर व्यंग्य करती छात्रों की पहाड़ी लटकन वाली भाषा में कहा गया संवाद- पेट अन्दर सीना बाहर, तन कर बैठो, एक मात्र उदाहरण नहीं है बल्कि बहुत सी ढेरों स्थितियां हैं, जहां उस कथ्य को पकड़ा जा सकता है जो फिल्म को आंचलिक बना दे रहे हैं। अंचल विशेष के समाज के भीतर व्याप्त वर्तमान चुंधियाती दुनिया की तस्वीर पूरी फिल्म में बहुत स्पष्ट है। प्रतिरोध की भाषा का व्यंग्यात्मक रूप दृश्यों को जीवन्त बनाने वाला है। संवादों की भाषा का वह लालित्य जो गढ़वाली और कुमांउनी लहजे में बोली जाती हिन्दी के साथ शायद किसी अन्य भूगोल में मिस्फिट हो जाता, उत्तराखण्डी भाषा के उस रूप को रख देता है जो जन के बीच ज्यादा स्वीकार्य और एकेडमिक बहसों से बाहर है। हाल ही में उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा आयोजित तीन दिवसीय लोकभाषा कार्यक्रम में हुई चर्चाओं के दौरान उभरी राय के आधार पर कहना पड़ रहा है कि उत्तराखण्ड की लोक भाषाओं को गढ़वाली कुमांउनी तक सीमित कर देने की मानसिकता एक अतार्किक जिद्द है। दांये या बांये की भाषा का लोक तत्व ज्यादा प्रभावी और प्रचलित रूपों के साथ है। अभिव्यक्ति में ज्यादा ग्राहय उस भाषा को हाल में हुए लोकभाषा के आयोजन के बीच शुद्धिकरण की मानसिकता ने बेशक हिकारत के साथ रखने की चेष्टा की है पर अपने वक्तव्यों के प्रस्तुतिकरण में वक्ता स्वंय उसके उपयोग से खुद को भी बचा न पाये। उत्तराखण्ड में निर्मित हुई अभी तक की आंचलिक फिल्मों में भाषा के स्तर पर यह अनूठा प्रयोग उल्लेखनीय है। आंचलिकता के नाम पर शुद्ध रूप से गढ़वाली भाषा में निर्मित फिल्मों में, सिर्फ पहली गढ़वाली फिल्म जग्वाल को यदि हटा कर देखें, तो पात्रों की वेष भूषा और चाल ढाल ही नहीं उनके बनावटी ठसाव में एक असंगत किस्म का बेमेल रहा है। हाल-हाल में प्रदर्शित याद आली टिहरी भी, जिसे यूं तो काफी लोकप्रियता मिली, इस तंग दायरे से बाहर न रह पायी जबकि उसमें भी मुख्य पात्र वैसी ही शहरी मानसिकता के साथ है जैसा कि दांये या बांये का पात्र रमेश मांजिला। भाषायी आग्रहों की जिद्द में एक पिलपिले किस्म की भावुकता अभी तक की उत्तराखण्डी आंचलिक फिल्मों की एक कमजोरी रही है जिसे दांये या बांये पाटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सामाजिक स्तर को परिभाषित करने में उसके संवाद ज्यादा स्वभाविक हैं जो लिखे जाते हुए तो खड़ी बोली हिन्दी के करीब दिखायी देते हैं पर पात्रों के मुंह से सुनते हुए जिनका लोकरंग स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है। ठेठ पहाड़ी स्त्रियों की आपसी बातचीत के संवादों की एक बानगी कुछ इस तरह है-
शहर की जिन्दगीी भागा दौड़ी की ठहरीीी।
यहां "ठहरी" का किया गया उच्चारण उस स्वाभाविक लय में है कि उसे कहीं से भी खड़ी बोली हिन्दी का संवाद नहीं कहा जा सकता।
यहां तो खाना बनायाऽऽ, घास काटाऽऽऽ फिर खाना बनायाऽऽऽऽ।
कहानी के स्तर पर फिल्म में उन सभी स्थितियों पर व्यंग्य बहुत गाढ़ा है जो सैलानी मानसिकता से पहाड़ की समस्या को देखने जानने और उसके निदान के लिए किये जाते प्रयासों के रूप् में दिखायी देते हैं। एन0जी0ओ0 किस्म की आर्थिक गतिविधियों से संचालित उद्यमिता भी निशाने पर है। फिल्म की खूबसूरती इस बात में है कि सब कुछ बहुत ही स्वाभाविक और बिना वाचाल हुए प्रकट होता है। बाज दफा तो इतना सहज कि दर्शक सिर्फ दृश्य की स्वाभाविकता में ही टिका रह जाता है और अन्य अर्थों तक जाने की जरूरत ही नहीं समझता। पहाड़ का भूगोल सिर्फ काव्य रचना के ही अनुकूल है यह मिथ रमेश मांजिला की मानसिकता में भी है। सांस्कृतिक केन्द्र की स्थापना के लिए उसकी हवाई बातों के इर्द-गिर्द ही फिल्म की कहानी आकार लेती है। चलताऊ मुहावरे में- पहाड़ो में यदि यहां का पानी और जवानी ठहर जाए तो पहड़ो का नक्शा बदल जाएगा, रमेश मंाजिला भी अपने तर्कों के साथ है और पहाड़ो के पीछे से एक नया सूरज उग रहा है जैसी आशावादी बातों से भरा उसका व्यक्तित्व जमीनी हकीकतों से दूर रह कर सोचने वाले बुद्धिजीवियों की छवी जैसा ही है। कक्षा में पूछे गये सवाल पर कि उसकी बातों का छात्र-छात्राओं पर क्या प्रभाव है ? एक छात्रा का बहुत ही स्वभाविक जवाब- स्ार आप बम्बई से आए हो, दर्शकों को गुदगुदाने लगता है। पेट अन्दर, सीना बाहर, तन के बैठो दोहरा-दोहरा कर छात्रों द्वारा बोला जाने वाला रमेश मांजिला का संवाद क्या सिर्फ बच्चों की स्वाभाविक चंचलता का नमूना है ? इससे व्यंजित होता वह अर्थबोध जो व्यापक शहरी मध्यवर्गीय मानसिकता में इस दौर में ज्यादा घ्ार करता गया, क्या इसके निशाने में नहीं? योग और ध्यान से गम्भीर किस्म के रोगों की चिकित्सा की सीमाएं दरवाजे की चौखट से टकरा जाते रमेश मांजिला को सिर पकड़ लेने को मजबूर करते दृश्य में दिखायी दे जाती है।     

भौर का सांझ का आग उमंग
आस का प्यार का लाल है रंग

ईंट का पान का भी लाल है रंग।

गाड़ी आ गयी तो जंगल जाने वाली स्त्रियों के दिन फिर गये।
बकरियां ले जानी है तो गाड़ी पर लादा जा सकता है उन्हें।


there are miles to go before we sleep

एक लड़का है जो घर के आगे से आती जाती गाड़ी पर पत्थर फेंकता है।

बछड़ा तो पत्थरों में अटका है और लाल गाड़ी का एक सही उपयोग होता है उस चोटी तक पहुंचने के लिए होता है। फिल्म यदि यहीं पर खत्म हो जाती तो ज्यादा व्यापक अर्थ देती। तमाम उपभौकतावद के विरूद्ध पारम्परिक उद्योग पर यकीन के साथ। क्यों यहीं पर वह दीपा दिखायी देती है जिसे अपने जीता यानी रमेश माजिला की उस जिन्स पर शर्म आती है जिस पर उसकी सहेलियां हंसती है और उसके जीजा का मजाक बनाती है। उससे आगे कांडा कला केन्द्र को दिखाने का कोई अर्थ फिल्म में दिखता नहीं। और न ही कोई ऐसा संकेत ही उभरता है जिससे वह खिलंदड़ पन जो पूरी फिल्म में बिखरा हुआ था कोई व्यंग्य पैदा करे।
विजय गौड़  
जनसंदेश टाइम्स( लखनऊ) में ८ मई २०११ को प्रकाशित

Sunday, May 8, 2011

पैरेट मिर्ची खाता है, रैबिट कैरेट खाता है


मानव जीवन और पशु जीवन के बीच के आपसी रिश्तों के असंगत व्यवहार वाली पर्यावरणीय मानसिकता को जन्म दिया है। जंगलों और उसके आस-पास निवास करने वाले ग्रामीणों के लिए जंगल और पशु उनके आर्थिक आधार हैं, इस बात को ऐसे स्थानों पर रह रहे ग्राम वासी वर्षों से जानते हैं। लेकिन पर्यावरण की एकांगी समझ ने न सिर्फ मानवीय जीवन को ही दूभर बनाया हुआ है बल्कि जंगली पशुओं के प्रति एक झूठे प्रेम का ढकोसला रचा हुआ है। जंगलों के आस-पास निवास कर रहे ग्रामीणों का किस तरह से ऐसी ही मानसिकता से बने कानून के दायरे का शिकार होना पड़ जाता है इसका ताजा उदाहरण उत्तराखण्ड के रिखणीखाल इलाके में घटी हाल की घटना है। कानूनी दायरे ने मामले को इस कदर पेचीदा बना दिया है कि उत्तराखण्ड के विभिन्न इलाकों में पुलिस प्रशासन के खिलाफ आवाजें हर ओर सुनायी दे रही है। धरने प्रदर्शनों के लिए मजबूर जनता गिरफ्तार किये गये ग्रामीणों की रिहाई के लिए सड़कों पर उतरने को मजबूर हो रही है। विस्तृत सूचना के लिए विभिन्न पत्रों की रिपोर्ट की तस्वीरें यहां दी जा रही है। पर्यावरणीय मामले की पड़ताल करता डॉ सुनिल कैंथोला का आलेख एक सचेत नागरिक की चिन्ताओं के साथ है।
डा. सुनील कैंथोला








‘‘लामा जी उवाच’’
 ‘पैरेट मिर्ची खाता है, रैबिट कैरेट खाता है।’ 
लामा जी अभी सिर्फ ढाई साल के हैं और रंग-बिरंगे चित्रों से भरपूर अपनी किताब से बारहखड़ी सीखने के खेल में जुटे रहते हैं। ये किताब लामाजी को दुनियां भर का ज्ञान बटोरने का अवसर प्रदान करेंगी, परन्तु यदि वे इस किताबी ज्ञान का ही सच मान लेंगे और अपने सामान्य ज्ञान को नजर अंदाज करेंगे, तो यह उनके लिए घातक भी हो सकता है। जैसे किताबें कहेंगी कि भोजन चक्र के अनुसार बाघ का भोजन वनों के शाकाहारी प्राणी हैं, तो यह लामाजी व उनकी किताबों के लिए एक क्रूर मजाक ही होगा। क्योंकि उत्तराखंड में बाघ बच्चे भी खाता है और उनकी माताओं को भी। ऐसा बहुत पहले से होता आ रहा है। तार्किक आधार पर यह भी कह सकते हैं कि ऐसा तो उस समय से होता आ रहा है, जब जंगलों में बाघ के प्राकृतिक आहार की कोई कमी न थी और भोजन चक्र में बाघ के लिए पर्याप्त भोजन उपलब्ध हुआ करता था। ’’मैन ईटर आॅफ रुद्रप्रयाग’’ में जब जिम कार्बेट उस बाघ का किस्सा लगाते हैं, जो तीर्थयात्रियों से भरी एक झोपड़ी के भीतरी कक्ष से एक स्थानीय महिला को उठाकर ले जाता है, तो क्या यह ये इंगित नहीं करता कि उत्तराखंड के बाघों के भोजन चक्र का हिस्सा यहां की महिलाएं बन चुकी थी।
वन्यजीव शास्त्री संभवतः इसे हंसी में उड़ा दें, किन्तु वन्यजीव शास्त्र अभी इतना परिपक्व भी नहीं हुआ है। फिर इसे साबित करने के लिए मात्र वन्यजीव शास्त्रियों के पुस्तकालयों और शोधपत्रों को खंगालने मात्र से ही समस्या का समाधान नहीं होने जा रहा है। निश्चित रूप से वन्यजीव शास्त्र को इस विवाद में शामिल किए जाने की आवश्यकता है, किंतु समग्र रूप में यह सवाल राजनैतिक है।

मैं अपना तर्क इस स्थापना ;हाइपोथीसीस से शुरू करता हूं कि उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बाघ के भोजन चक्र में स्थानीय महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। इसके पक्ष में मुझे आंकड़े प्रस्तुत करने की आवश्यकता नहीं लगती, क्योंकि यह सर्वविदित है कि बाघ लगातार हमारे बच्चों और महिलाओं को दबा रहा है। ऐसा तब से है, जब वनों में उसके लिए प्रचुर आहार मौजूद था। ऐसा कहा जा सकता है कि बूढ़ा अथवा घायल बाघ ही नरमांस का भक्षण करता है। तब भी बात वहीं की वहीं रहती है, क्योंकि हर बाघ यदि घायल न भी हो तो बूढ़ा तो होगा ही अर्थात् बाघ जब बच्चा होता है, तो मां का दूध पीता है, जवानी में हिरन वगैरह खाता है और बुढ़ापे में हमारे बच्चों और महिलाओं को अपना निवाला बनाता है। ऐसा संभवतः इसलिए भी हो कि विकट पहाड़ में हिरन का शिकार मैदानी क्षेत्रों की तुलना में अधिक श्रमपूर्ण हो, अन्यथा न लिया जाए तो मैदानी तथा पर्वतीय क्षेत्रों में बाघ द्वारा हिरन के आखेट में कुल ऊर्जा ;कैलोरी व्यय पर तुलनात्मक अध्ययन पर पीएचडी कोई बुरी बात न होगी।
बहरहाल! मैं पुनः बाघ के भोजन चक्र में शामिल हो चुके अपने पहाड़ों के बच्चों तथा महिलाओं के प्रश्न पर आता हूं। समाचार पत्रों में नरभक्षी बाघों के आंतक की घटनाएं लगातार छपती आ रही हैं। इन्हें नरभक्षी ;मैन ईटर कहना भी उचित न होगा, क्योंकि उत्तराखंड के बाघ नर का भक्षण नहीं करते। वे अपने भोजन चक्र को लेकर बहुत ही चूजी हैं। उन्हें सिर्फ महिलाएं और बच्चे ही चाहिए। चंूकि पहाड़ के अर्थतन्त्र की रीढ़ कहे जाने वाली महिला और भविष्य कहे जाने वाले बच्चे राजनैतिक रूप से हाशिए पर हैं। अतः देश में बाघ के  संरक्षण के नाम पर उनका बाघों का भोजन बन जाना कोई बड़ा सवाल पैदा नहीं करता।
इन्हीं क्षेत्रों में हमारे भाई लोग भी तो शाम को झूमते हुए निकलते हैं। कभी ज्यादा हो जाए, तो कहीं थोड़ा बहुत आराम भी कर लेते हैं। रसोई में खाना बनाती महिला के सामने से उसके बच्चे को उठा ले जाने के तो अनेक किस्से मिल जाएंगे, पर ऐसा नहीं सुना कि रास्ते में टुन्न पड़े अपने किसी भाई पर बाघ ने हमला कर दिया हो। शायद बाघ उसे सूंघ कर या उस पर कुछ कर के चला जाए, पर उसे हानि नहीं पहुंचाएगा। इससे कुछ लोग यह भी निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि बाघ संभवतः शराब विरोधी आन्दोलन के सदस्य होते हों।
किन्तु इस विषय पर चर्चा करना इस लेख का उद्देश्य नहीं है। यहां तो मैं मात्र अपने महान देश के विकास और संरक्षण के लिए अर्पित अपने समुदाय की बात निम्न बिन्दुओं के आधार पर रखने का प्रयास कर रहा हूं। 

1. उपलब्ध आंकड़े और ज्ञात इतिहास यह इंगित करते हैं कि महिलाएं और बच्चे बाघ के भोजन चक्र का हिस्सा बन सकते हैं।

2. अपना उत्तराखंड बन जाने के बाद भी हमारे सैकड़ों बच्चे और महिलाएं बाघ का शिकार बनी हैं। किसी गांव में आक्रोशित जनता द्वारा पिंजड़े में कैद बाघ को जलाया जाना निश्चित रूप से गैर कानूनी है, पर महानगरों में बैठे पर्यावरण प्रेमियों के बच्चे और महिलाएं बाघ के आतंक से महफूज हैं और पर्यावरण प्रेमी, पहाड़ की महिलाओं और बच्चों की त्रासदी से अनजान हैं।

3. बाघ नरभक्षी नहीं अपितु महिला एवं बालभक्षी होता है। कम से कम उत्तराखण्ड के परिप्रेक्ष्य में तो यह तथ्य स्वीकार करना ही पड़ेगा, किन्तु इसका मतलब यह नहीं है कि नरभक्षी बाघ होते ही नहीं हैं। हमारे यहां वे भी पाए जाते हैं, किन्तु मनुष्य के रूप में। ये संख्या में कम हैं, पर दबंग हैं। इन पर अभी हाल ही में कुलानन्द घनसाला ने ’मनखी बाघ’ के नाम से एक नाटक भी खेला था। ये कई रूपों में और व्यवसाय में मिल जाएंगे। ये अभी हाल ही में बड़ी तेजी से फले-फूले हैं। इन पर उंगली उठाना अपने को ‘विनायक सेन’ बनाना है। इनकी कचहरी में बाघों का आंतक कोई मुद्दा नहीं है। इसीलिए उत्तराखण्ड की महिलाओं और बच्चों का बाघ से मुक्ति का फिलहाल कोई रास्ता नहीं है।

4. ऐसा नहीं कि बाघों को संरक्षण की आवश्यकता नहीं। वे उत्तराखण्ड की जैव विविधता का अभिन्न अंग हैं, किन्तु इनको बचाने की प्रक्रिया में कहीं तो कोई खोट है। इस बारे में सूचना के अधिकार का उपयोग करके बहुत कुछ सामने लाया जा सकता है कि कहीं सर्कस के बाद तो यहां नहीं छोड़े या नरभक्षी की समस्या को सरकारी विशेषज्ञ किस स्तर पर देखते हैं। शायद कभी कोई सिरफिरा सवाल पूछने की हिम्मत करे वरना ज्यादातर संस्थाएं तो पर्यावरण संरक्षण में ही जुटी हैं, क्योंकि फिलहाल पैसा उसी के लिए आ रहा है।

5. टाईगर बचाने के लिए टास्क फोर्स बन सकता है, तो हमारे बच्चे बचाने के लिए क्यों नहीं? यहां तात्पर्य वन कर्मियों को तोप तमंचे से लैस करने का नहीं, अपितु नरभक्षी होने के कारणों पर विशेषज्ञ समिति के गठन से है।

5. इस लेख के माध्यम से मैं उत्तराखण्ड पुलिस का हार्दिक आभार व्यक्त करना चाहता हूं, जिन्होंने धामधार गांव की श्रीमती बिल्ला देवी को तब तक गिरफ्तार नहीं किया, जब तक वे जंगल से घास काट कर नहीं लाई और अपने पशुओं के चारे का इंतजाम कर सकी। श्रीमती बिल्ला देवी भी बाघ को जलाने की आरोपी हैं। भाईसाब, ऐसी दरियादिली और मानवता तो अपने देवभूमि उत्तराखण्ड की पुलिस में ही हो सकती है। उत्तर प्रदेश की बात होती, तो आसपास के 5-7 गांव के लोग गिरफ्तार कर लिए जाते और वो सब कबूल भी कर लेते कि ’ हां साब बाघ हमने जलाया है’। ये हुआ अपना प्रदेश बनाने का फायदा।

रीजनल रिपोर्टर से..

Tuesday, May 3, 2011

आदत हो चुके ढकोसले



अपने लिखे या कहे की सत्यता पर तर्क करना, दृढ़ रहना एक बात है लेकिन उसे अन्तिम सत्य मान लेना, दूसरी बात। यह दूसरी बात ही है जो विवादों को जन्म देती है। आरोप और प्रत्यारोप का मैदान इसी की चौहद्दी में फलता फूलता है। यह बात मैं उस कविता पर बात करने के लिए कह रहा हूं जिसे पिछले दिनों अशोक ने फेस बुक पर लगाया। कवि बोधिसत्व की कविता- अब जबकि जान गया हूं।  कविता के प्रस्तुतिकरण का शीर्षक और उस के पक्ष में दर्ज अशोक की टिप्पणी के आधार पर कविता के पाठ में आ रही दितों को असहमति के रूप में दर्ज करने का मन हुआ था। इधर हिन्दी साहित्य की बिगड़ैल प्रवृति में जो खतरा दिखाई देता है, उसका शिकार हो जाने की आशंकाओं ने बहुत संभलकर लिखने की हिदायत दी थी, जिसका अक्षरस: पालन न कर पाने का खामियाजा भुगतना ही पड़ा। टिप्पणी पर रचनाकार बोधिसत्व की व्यंग्योक्ति से भरी प्रतिक्रिया का जवाब फेस बुक में दिया जाना संभव न लगा।
 

चींटियों को पिसान्न डालने से मोक्ष का कोई द्वार नहीं खुलता
(कवि अग्रज बोधिसत्व की यह कविता मैंने असुविधा पर भी लगाई थी...इस कविता में मुझे जो खास लगा वह यह कि कोई प्रगतिशीलता मनुष्यता के बिना सम्पूर्ण नहीं. जो मानवीय गुणों और व्यवहार से च्युत है वह किसी समाज के लिए आधुनिक या क्रांतिकारी नहीं हो सकता. अक्सर परम्परा को आधुनिकता के नाम पर खारिज कर दिया जाता है...लेकिन यह कविता कबीर के सार-सार को गहि रहे वाले विवेक से परम्परा के मानवीय पक्षों को बचा ले जाने की वकालत करती है)
अब जबकि जान गया हूँ
 

जबकि जान गया हूँ
चींटियों को पिसान्न डालने से मोक्ष का कोई द्वार नहीं खुलता
तो क्या चींटियों को पिसान्न डालना रोक दूँ।

जबकि जान गया हूँ
बाझिन गाय को चारा न दूँ
खूंटे से बाँध कर रखूँ या निराजल हाँक दू दो डंडा मार कर
वध करूँ मनुष्य का या पशु का
कोई नर्क नहीं कहीं
तो क्या उठा लूँ खड्ग

जबकि जान गया हूँ कि क्या गंगा क्या गोदावरी
किसी नदी में नहाने से
सूर्य को अर्ध्य देने से
पेड़ को जल चढ़ाने से
खेत में दीया जलाने से कुछ नहीं मिलना मुझे
तो गंगा में एक बार और डूब कर नहाने की अपनी इच्छा का क्या करूँ
एक बार सूर्य को जल चढ़ा दूँ तो
एक बार खेत में दिया जला दूँ तो
एक पेड़ के पैरों में एक लोटा जल ढार दूँ तो


जबकि जान गया हूँ आकाश से की गई प्रार्थना व्यर्थ है
मेघ हमारी भाषा नहीं समझते
धरती माँ नहीं
तो भी सुबह पृथ्वी पर खड़े होने के पहले अगर उसे प्रणाम कर लूँ तो...
यदि आकाश के आगे झुक जाऊँ तो
बादलों से कुछ बूँदों की याचना करूँ तो

जबकि जान गया हूँ
जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है वहाँ
देवता तो क्या मनुष्य भी नहीं बचे हैं अब
तो भी यदि अपनी पत्नी को देवी मान कर पूजा कर दूँ तो
अपनी माँ को जगदम्बा कह दूँ तो

जबकि जान गया हूँ
अन्न कोई देव नहीं
उसे धरती को जोत-बो कर उगाते हैं लोग
किंतु यदि कौर उठाते शीश झुका दें तो

ऐसा बहुत कुछ है
जो न जानता तो पता नहीं क्या होता
लेकिन अब जो जान गया हूँ तो
क्या करूँ..... पिता
क्या करूँ गुरुदेव
क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का
vijay: "क्या करूँ देवियों और सज्जनों
अपने इस जानने का" yahi tou sankat hai is duniya ka ki ek vaigyanik jo jaan raha hota hai ki chhoda ja raha upgrah yadi kinhi karano se apni kasha tak nahi pahunch paayega tou zaroor koi kharabi aajane ki wajah... se hi esa hua par use chhode jane se pahle nariyal phodne ka anushthan karte hue wah apni asfalta ke prarambh ke maafiname ke liye juta hota hai. mareej ka ilaj sirf marj ki pahchan aur sahi aushdhi se ho sakta hai yah jaane wale bhi upar wale ke bharoshe ki baat karta hai, na jane kitne uddaharna hai. aapka janna unse alag kahan hai bodhi ji, dekh nahi paa raha hu. sirf kavita me kah dene bhar se mukat ho jaana ek suvidha se jyada kuchh nahi. kavita ek kharab awdharna ko bhi pusht kar ahi hai, mujhe tou yahi lag raha hai. ummeed hai itni tareefo ke beech is ek asahamati ko anytha nahi lenge. jo laga kaha.

बोधिसत्वमैं क्या कह सकता हूँ.....विजय भाई. कमप्यूटर की दूकान का उदघाटन अगरबत्ती के धुएँ और आरती के बीच करनेवाले लोग हैं समाज में। गोर्की ने लिखा है कि ढाई हजार हार्सपावर का जहाज पादरी के आशीष और पूजादि के बाद पानी पर चलाया गया। यह कैसी वैज्ञानिकता ...है। और व्यक्तिगत रूप से मैं भी जानता हूँ कि भुना हुआ गेहूँ चाहे आप कहीं भी बो दें नहीं उगेगा। अगर कविता एक खराब अवधारणा को पुष्ट करती है तो बहुत अच्छा नहीं करती। आगे कोशिश करंगे कि किसी क्रांतिकारी अवधारणा की पुष्टि करने वाली कोई कविता लिख पाऊँ। आप का काव्यास्वाद इस कविता ने बिगाड़ा यह अपपराध क्षमा करें। आगे गलती न करने की कोशिश करूँगा....
बोधिसत्व: "आगे कोशिश करंगे कि किसी क्रांतिकारी अवधारणा की पुष्टि करने वाली कोई कविता लिख पाऊँ।" 
vijay:  jwab shraratpurna hai bodhi bhai, lagta hai dostana rai aapko pasand na aayi. Khair.
बोधिसत्व: सचमुच अच्छा लगा विजय भाई लेकिन खराब अवधारणा को पुष्ट करने वाली बात को थोड़ा सा समझा दें....मुझे सचमुच नहीं समझ आया....
मैं राह देख रहा हूँ...देखूँगा.....बिना नाराज हुए....
vijay:  kya zaroori hai abhi hi darj karu ? yadi kahenge tou vistar se likhunga
kavita ko save kiye le raha hu, dusri any rachnao par jinse asahmati ubharti rahi hai, baat karte hue jikar karne ki koshish karunga, aalekh aapko bhi mail kar dunga. kab likh payunga abhi nahi kah sakta, haa likhunga zaroor

 

बोधिसत्व: अगली गलती करूँ कि उसके पहले कुछ समझा दो भाई...यहाँ कुछ संक्षेप में ही कह दो...कौन जीता है तेरी जुल्फ सके सर होने तक...
vijay: "सूर्य को अर्ध्य देने से
पेड़ को जल चढ़ाने से
खेत में दीया जलाने से कुछ नहीं मिलना मुझे...

तो गंगा में एक बार और डूब कर नहाने की अपनी इच्छा का क्या करूँ
एक बार सूर्य को जल चढ़ा दूँ तो
एक बार खेत में दिया जला दूँ तो
एक पेड़ के पैरों में एक लोटा जल ढार दूँ तो" is tou ke baad ka rth
hai tou kya ho jayega, yahi na. yahi kya ho jayega tou wahan bhi hai ki "कमप्यूटर की दूकान का उदघाटन अगरबत्ती के धुएँ और आरती के बीच करनेवाले लोग हैं समाज में।" kahir aapke wyangy ko mai kinhi any artho me nahi le raha hu . wyangy se parhej nahi yadi usme wyaktigat aham aur dusre ko dhool chatane ki sweekarokti na ho tou. aapka wyangy dhool chatata hua. afsos hai mujhe jo tippni dene ki himakat ki. yah aap akele ki dikkat nahi hai bodhi bhai. apr mera aasay kabhi bhi vivad paida karne ka nahi raha hai. aapko lutf aaye tou bhi ab aage mujhe yahan kahna uchit nahi lag raha.
बोधिसत्व: मैं आपकी पहली बात से सहमत हूँ....वह व्यंग नहीं आपके कथन का समर्थन था....अगर आप कुछ न कहना चाहें तो बात अलग है....उसके लिए आप कोई भी राह चुन सकते हैं....

''मात्र आदत हो चुके ढकोसलों में लगभग विलुप्त हो चुकी भावना का सतर्क शोध करती" यह कविता जिस बिन्दु से शुरू होती है वहां स्पष्ट एक चुनौति है। एक ऐसी चुनौति जिसमें हुंकार है, गर्जना है और दम्भ। ये तीनों क्यों हो ? गर्वोक्ति से भरी इन पंक्तियों के उत्स क्या हैं ? उनके निहितार्थ क्या हैं ? ये कुछ सवाल हैं जिनके दायरे में ही पाठ को खोला जाना संभव हो सकता है।

जबकि जान गया हूं
चीटिंयों को पिसान्न डालने से मोक्ष का द्वार नहीं खुलता
तो क्या चीटिंयों को पिसान्न डालना रोक दूं।


कविता के उत्स का जो अपना तर्क शास्त्र है, स्पष्ट है कि जो कुछ आदत हो चुके ढकोसलों में किया जा रहा था, उसकी निरर्थकता को जान भी लिया है तो भी उसे दुनिया के बदलाव की किसी भी गतिविधि को आगे बढ़ाते रहने में क्या फर्क पड़ने वाला है। वैसे "क्या" यहां प्रश्न के रूप में नदारद है, बल्कि कहें कि निरर्थक कार्रवाइयों को जारी रखते हुए ही गतिविधियों का आगे बढ़ाते रहने की सैद्धान्तिकी की जिद्द है। कविता में जिस पड़ने वाले फर्क की बात हो रही है, संभवत: किन्हीं खास सकारात्मक स्थितियों की ओर इशारा जैसा ही कुछ होना चाहिए, ऐसा मान रहा हूं। कविता के प्रस्तोता अशोक की टिप्पणी भी ऐसे ही अर्थ तक पहुंचने की राह दिखाती है। बावजूद इसके कविता में तर्क की जगह एक कुतर्क मुझे क्यों दिखायी दे रहा है ? यदि कुतर्क न भी कहूं तो जो तर्क है उसमें दम्भ, हुंकार और गर्जना क्यों सुनायी दे रही है ? यानी एक ऐसा तर्क जो किसी तरह के अन्य तर्क की गुजांइश से परे मानने की अवधारणा को साथ लिए चलता है। तर्क वही जो अक्सर सुनायी देते हैं कि क्या फर्क पड़ता है यदि एक मंदिर और बन जाये तो। ईश्वर तरंग हैं और मंदिर रेडियो स्टेशन। ब्रहमाण्ड रूपी ब्रॉड कास्ट स्टेशन से छूटने वाली तरंगे हर रेडियों में उतर जाएंगी। बनाओ, बनाओ, खूब बनाओ मन्दिर। लड़ो उन सब खाली पड़ी जगहों के लिए, मचाओ मार-काट, जो मानवता की जरूरत के लिए भी इसलिए उपयोग में नहीं दी जा सकती कि उस पर किसी न किसी पुरखे का अधिकार है।

यह कहना उपयुक्त लग रहा है कि सिद्धान्त और व्यवहार की अस्पष्टता के चलते ही हावी होते मनोगतवाद से कवि संचालित दिखाई दे रहा है। स्पष्ट है कि मनोगतवाद जब हावी होने लगता है तो स्थितियों का समूचित मूल्यांकन इतना भ्रामक होता है कि दिखाई दे रही स्थितियों से निपटने के लिए कर्ता अनायास ही व्यवहार की उस चपेट में होता है जिसको सिद्धान्त: अस्वीकारे हुए हो। यानी सिद्धान्त और व्यवहार की भिन्नता में प्रतिक्रान्ति का भाष्य हो जाना एक प्रवृत्ति हो जाती है। बेशक क्रान्ति को बेहद स्थूल अर्थों में इस्तेमाल करते हुए कवि बोधिसत्व ने प्रतिक्रिया के जवाब में उस व्यंग्यात्मकता का सहारा लिया हो जिसमें क्रान्ति का मखौल उड़ाया जाना निहित हो, पर कविता के भाष्य में निहित शब्द "क्रान्ति" तो वहां मौजूद ही है। हां सिद्धान्त और व्यवहार की भिन्नता में "प्रतिक्रान्ति" का वाहक हो जाना उसकी स्वाभाविकता है। कविता में मौजूद गड़बड़ी जिसको इशारे में खराब अवधारणा को पुष्ट करती हुई है, कहकर, मैंने सिर्फ एक छोटी सी टिप्पणी भर करनी चाही थी। आशय बिल्कुल स्पष्ट था कि कविता के मूल विचार से सहमति नहीं बन रही है।

इस कविता पर बात करने के लिए एक सवाल मन में उठ रहा है कि रचनाकार का भौतिक जीवन और सास्कृतिक जीवन क्यों एक नहीं होना चाहिए ? रचनाकार के जीवन की सम्पूर्ण पदचाप क्यों उसकी रचनाओं में सुनायी नहीं देनी चाहिए ?
व्यवहार ज्ञान से बढ़कर है। यह मेरा कथन नहीं महान विचारक लेनिन कह गये। क्योंकि मानते थे कि उसमें न सिर्फ सर्वव्यापकता का गुण होता है बल्कि प्रत्यक्ष वास्तविकता का गुण भी होता है। प्रत्यक्ष वास्तविकता की व्याख्या के लिए आस-पास के आन्तरिक अन्तर्विरोधों की पड़ताल जरूरी होती है। तभी देखी-जानी स्थितियों से प्राप्त ज्ञान से उस सिद्धान्त का प्रतिपादन हो सकता है जो उन्न्त से उन्न्त की ओर अग्रसर होता है। व्यवहार और सिद्धान्त का संक्षिप्तिकरण या एकमेव हो जाना इससे अलग नहीं हो सकता। बोधिसत्व की कविता में वे अपने अपने जुदा रास्तों के साथ है।

जबकि जान गया हूं
जहां स्त्रियों की पूजा होती है वहां
देवता तो क्या मनुष्य भी नहीं बचे हैं अब
तो भी यदि पत्नी को देवी मान कर पूजा कर दूं तो
अपनी मां को जगदम्बा कह दूं तो

बहुत स्पष्ट श्ब्दों में जो स्वीकारोक्ति है वह सिद्धान्त के साथ है, जिसमें अभी तक के ज्ञान विज्ञान से बनी समझ के प्रति कोई संदेह नहीं लेकिन व्यवहार में उसके लागू करने के सवाल पर जो द्विविधा और असमंजस है वह एक तर्क बन जा रहा है- यदि ऐसा कर दूं तो
और इस "तो" से जो ध्वनी उठती है वह एक चुनौति भी है कि तो क्या हो जाएगा ?

यहां कहना पड़ रहा है कि अप्रत्यक्ष अनुभव से प्राप्त ज्ञान व्यवहारिक दिक्कतों का कारण हो जाता है। ज्ञान प्रत्यक्ष का दर्शन है। प्रत्यक्ष ही रूप की समस्या को हल करने में सहायक होता है और विषय वस्तु का सवाल सिद्धान्त से हल किया जा सकता है। लेकिन इन दोनों समस्याओं को व्यवहार से अलग कतई हल नहीं किया जा सकता। पर कविता व्यवहार के सवाल पर ही एक गलत समझ के साथ हो जाने की चुनौतियों को रख रही है। स्पष्ट है कि यह दम्भ भरी चुनौति अप्रत्यक्ष ज्ञान से ही हासिल हुई समझ का नमूना है। यह अप्रत्यक्षता कहां से आती है ? तय है कि इसका उत्स फेशन में मौजूद प्रगतिशीलता के मानक हैं जबकि भीतर जड़ जमायी संकीर्णता अवचेतन के बहाव में आ जाती है। यही कारण है कि उसका बहुत प्रकट रूप वहां ज्यादा साफ दिख रहा होता है जब रचनाकार के निजी जीवन और रचना से उदघाटित होते सत्य स्पष्ट होते हैं और साथ-साथ दिखाई देते हैं। अप्रत्यक्ष ज्ञान की यह दिक्कत ही है कि जब चाहे उस पर यकीन किया जा सकता है और जब मन हो भाषायी घुमेर देकर उस से हटा जा सकता है। विचलन की इस अवस्था को कई बार व्ववहार में लचीलेपन की संज्ञा वाली शब्दावली कह दिया जा रहा होता है। यहां लचीलेपन की वह प्राकृतिक व्याख्या अट नहीं पा रही होती है जो शहतूत की टहनी-सा मजबूती वाला वास्तविक लचीलापन होता है। व्यवहार में वास्तविक लचीलापन सिद्धान्त पर दृढ़ रहते हुए ही संभव हो सकता है। कला में वही यथार्थ को परिभाषित करता है, वहां यथार्थ की पूर्णता के लिए यथार्थ की जरूरत होती है। जोखिम उठाने की ललक होती है। विश्व के रूपान्तर में सक्रिय सहयोग का निर्धारण होता है। महज ज्ञान प्राप्त कर लेने और अमल में लाये बिना उसका जाप करते रहने से दुनिया के रूपान्तर की प्रक्रिया का एक भी कदम नहीं बढ़ सकता।
क्रांति सिर्फ मारकाट की कार्रवाइयां नहीं, जैसा कि बोधिसत्व जी की टिप्पणी इशारा करती है। सिद्धान्त और व्यवहार की सही समझ के साथ चरण बद्ध प्रक्रिया में अपनी निश्चित भूमिका के साथ मौजूद रहना भी क्रांति का हिस्सा हो जाना होता है। एक रचनाकार की भूमिका उसकी रचना के सत्य से ही निर्धारित होती है। सत्य को लागू करने में आ रही दितों को बेचारगियों की तरह जाहिर करने से सत्य कहीं अंधेरे कोनों में खो जाता है। व्यवहारिक दिक्कतों को ठीक से समझकर, लागू करने की अस्पष्टता को, बहस का हिस्सा बना देना कहीं ज्यादा सार्थक है। रही बात सामंती मूल्यों की, दक्षिपंथी मान्यताओं की, तो दुनिया के कई हिस्सों में आगे बढ़ चुके समाजों के अनुभव आज हमारे सामने हैं। उनकी सत्यता के सवाल पर संदेह न रहा है। उन्हें फिर-फिर परखने की कार्रवाइयां एक झूठ को स्थापित करने की चालाक कोशिशें हैं। मनोगत कारणों से उपजा एकांगीपन। वस्तुगत यथार्थ के आगे बढ़ जाने की स्थितियों से पिछड़ जाने पर ही कटटरपंथी मान्यताएं लुभाने लगती हैं। रचना के सत्य और जीवन के सत्य को अलग-अलग मानने की हठधर्मिता व्यवहार का हिस्सा हो जा रही होती है। रचना में कलावाद को इससे अलग नहीं माना जा सकता।

समाज को बदलने की प्रक्रिया और उसे बेहतर देखने की उम्मीदों भरी हमारी रचनाओं की पड़ताल की जाए तो देखेंगे कि उसकी सीमाएं वैज्ञानिकता और तकनालॉजी की सीमा भर नहीं है, बल्कि वस्तुगत यथार्थ से हमारे आत्म साक्षात्कार की श्रेणीबद्धता उसका एक कारण है। सामाजिक बदलाव में दर्शन की विशिष्टता आध्यात्मिक और भौतिकवादी अन्तर्विरोधों पर निर्भर होती है। विशिष्टता के इस पहलू के आधार पर ही दोनों की परस्पर निर्भरता तथा विरोधपूर्ण समग्र मूल्यांकन पर ही रचनात्मक कृति की वैचारिक पृष्ठभूमि तैयार होती है। अन्तर्विरोधों की विशिष्टता और जटिलता पर विचार किए बगैर रचना के किसी एक धुर छोर तक पेंग मार जाने की अवस्था से बचा नहीं जा सकता। भाववादी रचनाओं के साथ यही दिक्कत होती है कि विशिष्टता से बचकर वे नितांत निजीपन की स्थितियों को सर्वोपरी मान लेने के साथ होती हैं। व्यवहार में एकांगीपन भी इन्हीं स्थितियों में जन्म लेता है। सिर्फ परम्परा और आधुनिकता का जिक्र भर कर देने से अन्तर्विरोधों की विशिष्टता उभर नहीं पाती है। मनोगत आग्रहों से मुक्त होकर ठोस धरातल पर टिका हमारा आत्म खुद की आलोचना का आधार दे सकता है। आत्म से साक्षात्कार की उन्नत अवस्था में ही स्वंय की रचना पर आलोचनात्मक टिप्पणी हमें तिलमनाने की बजाय फिर से पुनर्विचार करने का अवसर दे सकती है। तर्क की जमीन पर खड़े होकर तभी हम दोस्ताना संघर्ष के रास्ते को चुन सकते हैं।
 

विजय गौड़