Friday, October 14, 2011

मुस्कराओ कि मुस्कराने का धर्म नहीं होता


मुस्कराओ कि मुस्कराने का धर्म नहीं होता। मुस्कराना एक भाव है, भीतर से उठती एक बहुत गहरी हूक जिसके मायने मुसिबतों से निपटने की अविकल ध्वनी के रूप्ा में सुने जा सकते हैं। मौसम के खिलाफ, दुख के खिलाफ और एक खुशहाल भविष्य की उम्मीदों भरी स्थितियों में बहुत हौले से मुड़ गए होंठों का ऐसा चित्र जिसमें जीवन के राग रंग की भी अभिव्यक्ति को सुना देखा जा सकता है, गीता गैरोला की कविता में लौट लौट कर आता हुआ भाव है। सामाजिक जड़ता के खिलाफ गीता गैरोला का रचनात्मक योगदान उनकी साक्षात कार्रवाइयों के रूप्ा में है। यूं उनकी पहचान एक रचनाकर्मी से ज्यादा एक सामाजिक कार्याकर्ता और उत्पीड़ित स्त्रियों की मुक्ति के लिए ढूंढी जाने वाली युक्तियों के साथ है। रचनात्मक दुनिया से उनके तालुकात ऐसी ही कोशिशों में मद्द लगाती गुहार होते हैं। बहुत संकोच के साथ अपनी रचनाओं को सार्वजनिक करने की उनकी अनुमति का स्वागत है।   प्रस्तुत है गीता गैरोला की कुछ कविताएं। 
वि. गौ.



एक


वे होती हैं नदी
जिनके तटबंध
जिंदगी को वसासतें देते हैं
वे होती हैं जंगल
अपनी रगों और रेशों से
सांस-सांस जीती
वो होती है
निशब्द खिलती और
बिखरती बुरांश
वे होती है
आंख मिचौली करती
उजले चॉद की लोलक
वे सदियों की दहलीज पर
खड़ी शताब्दियों को आकार देती हैं।




दो


जब बादलों के पीछे से
चुपके से झाकेंगा आधा चांद
तुम मुझे याद करना---
नैनी के ऊपर कोहरे के धुधँलके के साथ
झील में तैरती हों बतखें
तुम मुझे याद करना---
अयांरपाटा के गदेरे में
उतरती हो सुरमई सांझ
दूरगाँव मैं टिमटिमाने लगे बत्तियां
तुम मुझे याद करना
सन्नाटे में उड़ रहे हो बर्फ के फाहे
नैनी में थरथराती हों रोशनी की परछाइयां
तुम मुझे याद करना---
पाषाण देवी में बजने लगे घन्टियॉं
थरथराती लगें दिये की लौ
तुम मुझे याद करना---
जब वरसता हो धारों धार पानी
भरभरा के बहने लगें गदेरे
चीना पीक की पहाड़ी पर
उड़ते कोहरे के साथ
झिलमिलाता हो इन्द्र धनुष
तुम मुझे याद करना---
तुम्हारे खेत में आडू का पेड़
लक-दक भर जाये बैजनी फूलों से
और गॉंव के ऊपर वाला जंगल
बुरांस के फूलों से जलने लगे
तुम मुझे याद करना।।।
खेतों की मुडेरों पर
खिलने लगे फ्योली के नन्हें फूल
तुम मुझे याद करना---


तीन 

मुस्कराओं कि मुस्कराने का धर्म नहीं होता
मर्म होता है
मुस्कराहट चांदनी सी उजली
और गन्धहीन होती है।
मुस्कराने की वजह होती है।
सूरत नहीं होती
स्वाद होता है ।                       



आकांक्षा

दूर
देवदार के घने झुरमुट में
जहॉं से
दिखती हो
बर्फीली चोटियां
हवा महकती हो
देवदार की खुशबू से
घने कोहरे के बादल
उड़ते हो जहॉं,
जाना है वहॉं
दूर देवदार के घने झुरमुट में।

संयोगिता

संयोगिता
ये तेरे गालों के नीले निशान
बाहों पे खूनी लकीरें
किसने बनाई

बस कल की बात है
धूम से गूंजी थी शहनाई
तूने फलसई रंग के लहगें पर
ओढ़ी थी सुनहरे गोटे वाली ओढ़नी
तेरे गदबदे हाथों पर मह-मह
महकी थी मेंहदी
प्रीत की लहक से
भर गई थी कोख
गर्वीली आँखों से सहलाती थी
जिन्दगी का ओर छोर

कुछ तो दरक गया है कहीं
ये किस माया की छाया है संयोगिता
जो तू डोल रही है
बसेरे की खोज में
तपता तन-मन लिए
पीत की लहक मेंहदी की
महक कहां हिरा गई संयोगिता

बस इतना जान ले संयोगिता
ठस्से से जीने को
एक दुश्मन जरूरी है।


Wednesday, October 12, 2011

हमलावर संस्कृति का विरोध करो

देहरादून

कानून के भीतर बेशक अभिव्यक्ति की स्वंतत्रता वर्णित हो लेकिन देख रहे हैं कि हमलावर संस्कृति की लगातार बढ़ रही कार्रवाइयों के जरिये एक अराजक किस्म का माहौल बनता जा रहा है। दबंगई और गुंडई का बोलबाला बहुत खुलेआम और बेखौफ है। सत्ता पर कब्जे की राजनीति उसे शरण देती हुई है।
अभी हाल ही में, स्त्री अधिकारों और धर्म की आड़ भ्रष्टता के खेले जा रहे खेल के प्रतिकार को अपने लेखन और सीधी कार्रवाइयों का हिस्सा बनाने वाली रचनाकार शीबा असलम फहमी के घर पर हुआ हमला और आज ही दिल्ली में घटी वह ताजा घटना जिसमें प्रशांत भूषण पर हमले की सूचनायें हैं, ऐसी ही राजनीति की सीधी कार्रवाइयां हैं। उधर गुजरात में संजीव भट्ट की गिरफ्तारी ।
11 अक्टूबर को देहरादून के रचनाकारों की संस्था संवेदना ने रचनाकार शीबा असलम फहमी पर हुए हमले की चर्चा करते हुए हमलावर संस्कुति की मुखालफत की है। अपराधियों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्रवाई और शीबा असलम फहमी के साथ एकजुटता को प्रदर्शित करने के लिए आयेजित चर्चा में मुख्यतौर पर कथाकार सुरेश उनियाल, मनमोहन चडढा, डॉ जितेन्द्र भारती, अनिता दिघे, गीता गैरोला, रश्मि रावत, जावेद अख्तर, प्रवीण भट्ट, कमल जोशी, प्रतिमान उनियाल आदि उपस्थित थे।   

Sunday, October 9, 2011

हिन्दी कहानी का पाठक

कहानी
भटकुंइयाँ इनार का खजाना


कथादेश का सितम्बर अंक उस वक्त मेरे पास था जब कानपुर से इलाहाबाद जा रहा था। कहानी पढ़ लेने के बाद मैंने पत्रिका एक ओर रख दी और कहानी पर सोचने लगा। मेरे बगल में बैठे एक बुजुर्ग सज्जन ने पत्रिका उठायी- पन्ने दर पन्ने पलटते हुए इस कहानी पर आकर रुक गये और कहानी पढ़्ने लगे। शायद भाषा ही नहीं परिवेश ने भी उन्हें बांध लिया था, पूरी कहानी पढ़ गये। कहा कुछ नहीं लेकिन वे भी उसी मुद्रा में थे जैसी मुद्रा में मैं कहानी पढ़ने के बाद पहुंचा हुआ था- कहानी में दर्ज स्थितियों और उठते सवालों से टकराता हुआ। थोड़ी देर बाद पत्रिका एक युवा के हाथ में थी।वह नव युवक पुलिस इंस्पेक्टर की परिक्षा देकर लौट रहा था। शायद उसे खागा उतरना था। वह भी कई पन्नों को पलट्ने के बाद भटकुंइयाँ इनार का खजाना पर था और कहानी ठहर कर पढ़ रहा था। कहानी पढ़ने के बाद बहुत चुपके से उसने पूछा यह किताब ( पत्रिका) कहां मिलती है ?
वि. गौ.


Tuesday, October 4, 2011

पहाड़ की जख्मी देह पर नर्म हरे फाहे



  महेश चंद्र पुनेठा 
                                                                                          
 युवा कवि सुरे्श सेन नि्शांत के कविता संग्रह " वे जो लकड़हारे नहीं हैं' को पढ़ते हुए मुझे लोकधर्मी  कवि केशव तिवारी की " मेरा गॉव' कविता की ये पंक्तियॉ बार-बार याद आती रही - मेरा गॉव मेरी वल्दियत / जिसके बिना ला पहचान हो जाऊंगा मैं /मित्र कहते हैं /पॉच सितारा होटल में भी / झलक जाता है मेरा देशीपन / मुझे लगता है झलकना नहीं/ साफ दिखना चाहिए / जब मैं धनहे खेत से आ रहा हूं /तो मुझे दूर से ही गमकना चाहिए। कवि की  जिस पहचान तथा दूर से गमकने की बात केशव तिवारी अपनी इन पंक्तियों में करते हैं वो सुरे्श सेन नि्शांत की कविताओं में साफ-साफ दिखाई देती हैं।  नि्शांत की कविताओं का कथ्य हो या भाषा उससे गुजरते ही उनका पहाड़ीपन गमकने लगता है । उनकी कविता पहाड़ की पूरी पहचान के साथ हमारे सामने आती है। पहाड़ का रूप-रंग -रस-गंध उनके इंद्रियबोध में उतर आता है। अपनी धरती और अपने लोग उनमें बोलने लगते हैं। एक आम पहाड़ी के दु:ख-दाह ,ताप-त्रास व मुसीबतें-मजबूरियॉ  उनकी कविता की अंतर्वस्तु बनती हैं। पहाड़ की प्रकृति और पहाड़ का समाज जीवंत हो उठता है।वहॉ के लोगों की निर्दोष आस्थाएं और मासूम विश्वास कविता में स्थान पाते हैं। देखिए ये पंक्तियॉ- चुपचाप गुजरो / इस वृक्ष के पास से / प्रार्थना में रत है यहॉ एक औरत / उसे विश्वास है / इस वृक्ष में बसते हैं देवता/और वे सुन रहे हैं उसकी आवाज । पहाड़ की हरी-भरी देह भी और पहाड़ की जख्मी देह भी इन कविताओं में देखी जा सकती है। सुरेश की कविता उन पथरीले पहाड़ो की कविता है जहॉ उगती है ढेर सारी मुसीबतें -ही -मुसीबतें/ जहॉ दीमक लगे जर्जर पुलों को / ईश्वर के सहारे लॉघना पड़ता है हर रोज / जहॉ जरा-सा बीमार होने का मतलब है / जिंदगी के दरवाजे पर / मौत की दस्तक ।

Thursday, September 29, 2011

बीवी के नाम ख़त

नाजिम हिकमत तुर्की के महान कवि थे जिनकी कवितायेँ पूरी दुनिया में दमन और अत्याचार के खिलाफ लड़ने वाली जनता के बीच खूब लोकप्रिय हैं.उनके जीवन का अधिकांश समय जेल में(कुल तेरह साल) या निर्वासन में ही बीता.भारत में भी उनकी कविताओं के अनेक अनुवाद प्रकाशित हैं.
जेल से अपनी पत्नी को लिखी उनकी कवितायेँ मुझे बहुत पसंद हैं.उन्ही में से कुछ कवितायेँ यहाँ प्रस्तुत हैं:

यादवेन्द्र
                                                                                        -- नाजिम हिकमत

अपना वो ड्रेस अलमारी से निकालना जिसमें मैंने
तुम्हें देखा था पहली बार
दिखो आज अपने सबसे सुन्दर रूप में
आज दिखना है तुम्हें
जैसे गदराया लगता है वृक्ष बसंत के आगमन पर
अपने बालों में खोंसना
जेल से अपनी चिट्ठी में डाल के
जो भेजा था तुम्हारे लिए कारनेशन...
अपना चौड़ा धारीदार और चुम्बनीय माथा ऊँचा रखना
आज हताश और दुखियारी बिलकुल नहीं लगना
कोई सवाल ही नहीं...ना मुमकिन
आज तो नाजिम हिकमत की प्रिय को
दिखना है बला की खूबसूरत
बिलकुल बगावत के एक परचम की मानिंद...


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मेरी इकलौती और सिर्फ एक तुम ...
तुम्हारी पिछली चिट्ठी में लिखा था:
मेरा माथा फटा जा रहा है
और दिल डूब रहा है...
तुमने यह भी लिखा:
यदि उन्होंने तुम्हें फाँसी पर चढ़ा दिया
यदि मुझसे तुम बिछुड़ गए
तो मैं मर जाउंगी.
तुम्हें जीना पड़ेगा मेरी प्रिय..
मेरी स्मृतियाँ तो देखते देखते ऐसे तिरोहित हो जाएँगी
जैसे बिखर जाती है हवा में काली राख.
फिर भी तुम जिन्दा रहोगी
मेरे दिल की लाल बालों वाली मलिका..
बीसवीं सदी में
बिछोह का दुःख टिकता ही कितनी देर है
सिर्फ एक साल...ज्यादा नहीं.
मौत...
रस्सी से लटकती हुई एक लाश
मेरा दिल
ऐसी मौत को तो कतई स्वीकार नहीं करता.
पर
तुम बाजी लगा सकती हो
कि किसी गरीब जिप्सी के बालों से ढंके
काले और रोंये वाले हाथ
सरका भी देते हैं
यदि मेरी गर्दन में रस्सी
तो भी नहीं पूरी हो पायेगी उनकी उम्मीद
कि देखें नाजिम की नीली आँखों में
किसी प्रकार का खौफ.
पिछली रात के अंतिम प्रहर में
मैं
देखूंगा तुम्हें और अपने दोस्तों को
और खुद चल कर पहुंचूंगा
अपनी कब्र तक
और मेरे मन में अफ़सोस रहेगा तो सिर्फ ये कि
नहीं पूरा कर पाया मैं अपना अंतिम गीत.
मेरी प्रिय
नेक दिल इंसान
सुनहरे रंग वाली
मधु मक्खी की आँखों से भी सुन्दर
जिसकी आँखें हैं
मैंने आखिर क्यों लिख दिया तुम्हें
कि वो मुझे फाँसी पर चढाने की तैय्यारी कर रहे हैं?
अभी तो मुकदमा शुरू ही हुआ है
और वो किसी इंसान की गर्दन
वैसे तो तोड़ नहीं सकते
जैसे नोंच ली जाती है डाल से कोई कली
देखो...ये सब ऊल जलूल बातें भूल जाओ
तुम्हारे पास यदि कुछ पैसे हों
तो मेरे लिए फलानेल की एक चड्ढी खरीद दो...
मेरा साइटिका फिर से परेशान करने लगा है
और हाँ, ये मत भूलना
कि एक कैदी की बीवी को
हमेशा मन में अच्छे ख्याल ही लाने चाहियें.


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मैं चाहता हूँ
तुमसे पहले आये मेरी मौत
मेरी इच्छा है
कि मैं मरुँ तो तुमसे पहले मरुँ
क्या तुम्हें लगता है कि जो बाद में मरेगा
वो सीधा पहुँच जायेगा पहले वाले के पास?
मुझे तो इसका कोई इल्म नहीं
तुम तो ये करना
कि मुझे जला देना
और एक जार में डाल कर
अपने चूल्हे के ऊपर रख देना.
ध्यान रखना जार कांच का बना हुआ हो
पारदर्शी..साफ सुथरे कांच का बना हुआ
जिस से तुम अंदर देख सको
मुझे
और मेरी शहादत को
मैंने दुनिया ठुकरा दी
मैंने फूल बनने की चाहत ठुकरा दी
बस मैं सिर्फ तुम्हारा साथ चाहता हूँ.
मैं बनने को आतुर हूँ
धूल का कण
जिस से नसीब हो सके तुम्हारा साथ...
बाद में जब तुम्हारे मरने का पल आये
तो तुम भी समा सको
मेरे साथ इसी जार के अन्दर.
हम दोनों फिर से साथ साथ रह सकेंगे
मेरी राख मिली रहेगी तुम्हारी राख में
जब तक कि कोई नयी दुल्हन
या शरारती नाती पोता
लापरवाही से
हमें निकाल कर बाहर ही न फेंक दे...
पर ऐसा होने तक तो
हम एक दूजे के साथ साथ इस ढंग से
घुल मिल कर रह ही लेंगे
कि कूड़ेदानी में भी
हमारे कण आस पास गिरें
मिट्टी में साथ साथ पड़ेंगे हमारे पाँव
और एक दिन आएगा
कि धरती में उगे कोई जंगली पौध
तो इसमें बिना शक
खिलेंगे एक नहीं
दो दो फूल एक साथ:
एक तुम होंगी
एक मैं होऊंगा.
मुझे अभी अपनी मौत के बारे में कोई आभास नहीं
मुझे मन कहता है
कि मैं जनूँगा एक और बच्चा...
जीवन तो सैलाब की तरह मुझसे
बह कर बिखर रहा है
मेरा लहू खौल रहा है
मैं जियूँगा
खूब खूब लम्बे वक्त तक
और अकेला बिलकुल नहीं
तुम्हारे संग संग.
हांलाकि मौत का मुझे कोई डर नहीं
फिर भी लाश को जलाने का ढंग
मुझे रुचता नहीं जरा भी.
जब मैं मरुँ
तब तक उम्मीद है
थोड़ा बेहतर हो जायेगा अंत्येष्टि का ये ढब.
आजकल के हालात देख के क्या तुम्हें
लगता है कि तुम निकल पाओगे जेल से बाहर?
मेरे अंदर से आती है एक आवाज:
मुमकिन है, ऐसा ही हो जाये.


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क्या तुम जागे हुए हो?
कहाँ हो तुम इस वक्त?
घर पर.
पर अभी आदत नहीं पड़ी इसकी...
जागे या सोये...
अपने घर का एहसास अभी पूरा नहीं आया.
यह हो सकता है कोई अजूबा अचरज ही हो
तेरह साल से जेल के अंदर रहते रहते
जो मन के अंदर कौंध गया हो.
तुम्हारे बगल में कौन लेटा है?
हर बार की तरह अकेलापन नहीं
बल्कि यह तो तुम्हारी बीवी है
फ़रिश्ते की बख्शी गहरी नींद में
दुनिया से बेखबर होकर खर्राटे ले रही है.
गर्भ एकदम से बढ़ा देता है
देखो तो कैसे स्त्री की खूबसूरती.
अभी कितना बज रहा है?
आठ...
इसका मतलब यह हुआ कि शाम तक
तुम ठीक ठाक और सुरक्षित बचे हो
यहाँ तो पुलिस का रवैय्या ये होता है
कि दिन की गहमा गहमी में शांत बैठो
और अँधेरा हुआ नहीं कि बागियों की पकड़ धकड़ शुरू करो.