Friday, August 1, 2014

उपन्यास अंश

एक हद तक अन्तिम ड्राफ्ट की ओर सरकते उपन्यास 'भेटकी" का यह एक छोटा-सा अंश है। कोशिश रहेगी कि अपने स्तर पर अन्तिम ड्राफ्ट को जल्द पूरा कर लूं और कुछ ऐसे मित्रों की मद्द से जो बेबाक राय देने में हिचकिचाहट महसूस न करते हों, के बाद ही ड्राफ्ट को उपन्यास का रूप दे सकूं।
वि.गौ.


ज्ञानेश्वर ने फार्म हाऊस में एक मस्त पार्टी एरेंज की। लोन आफिसर, जमीन का मालिक और प्रदीप मण्डल तीन ऐसे चेहरे थे जिनके ईर्द-गिर्द ही पार्टी की पूरी रौनक को सिमटना था। हकीकत भी इससे अलग नहीं थी। बल्कि प्रदीप मण्डल का अंदाज सबसे निराला था। ज्ञानेश्वर के घेरे के लम्पटों के चेहरों पर बहुत शालीन किस्म की मुस्कान थी। पार्टी की सारी जिम्मेदारियां वे बखूबी निभा रहे थे। नशे को कुछ अधिक रंगीन एवं पार्टी को लोन ऑफिसर की ख्वाहिश पर हसीन यादगार में तब्दील करने के लिए ज्ञानेश्वर ने नाच गाने की व्यवस्था भी की हुई थी। पैग हाथ में लिये वह खुद कभी इधर और कभी उधर आ जा रहा था। कहीं कोई चूक न रह जाये, उसका सारा ध्यान इसी पर था। बेहद सीमित अतिथियों वाली वह कोई मामूली पार्टी नहीं थी। पूरा माहौल उसे एक भव्य कार्यक्रम में बदल दे रहा था।

नाच गाना चालू था, ज्ञानेश्वर चाहता था कि आज की यह यादगार शाम अतिथियों के मन मस्तिष्क में किसी रंगीन वाकये की तरह दर्ज रह सके। मेहमान भी उसकी आत्मीयता के कायल हुए जा रहे थे।

अनौपचारिक-सी स्थितियों की औपचारिक अदायगी प्रहसन हो जाती है।

यूं, प्रहसन को प्रहसन की तरह से पकड़ने के लिए गम्भीरता की जरूरत होती है। लेकिन बहुत औपचारिक कार्यक्रमों की हू-ब-हू तर्ज पर जब कुछ वैसा ही किया जाये तो उस वास्तविक प्रहसन को बहुत साफ देखा जा सकता है, जिसे गम्भीर सी दिखने वाली स्थितियों के कारण पकड़ना बहुत मुश्किल हो रहा होता है। प्रदर्शन की भव्यता के भुलावे में दर्शक बहुत करीब घट रहे घटनाक्रम के साथ ही आत्मसात हुआ होता है। बहुत बेढ़ंगे तरह से सरके हुए परदे के पीछे का बेढंगापन उसकी निगाहों से छूट जाता है।

कार्यक्रम को वाचाल बनाने के लिए ज्ञानेश्वर को खुद वाचाल बनना पड़ रहा था। जो कुछ भी वह पेश कर रहा था, हर कोई हंसते हुए, दोहरा हो-होकर उसका लुत्फ उठा रहा था। उसके घेरे के लम्पटों को तो वैसे भी बेवजह हंसने की आदत थी। ज्ञानेश्वर का ज्यादा से ज्यादा करीबी हो जाने वाली अघोषित प्रतियोगिता में वे कुछ भी करते हुए होड़ कर सकते थे। फिर यहां तो मामला हंसने भर का ही था। उनकी किसी भी गतिविधि को आपे से बाहर हो गयी नशेबाजों की स्थिति नहीं कहा जा सकता था। लोन अधिकारी को कंधे पर बैठाकर नाचने की होड़ में वे लड़खड़ा रहे थे। घोड़े की उचकती पीठ पर सवारी करने का आनन्द उठाता लोन अधिकारी कभी इधर डोलता कभी उधर। खुद को संभालने की कोशिश में वह बहुत अराजक तरह से घ्ाोड़ों के चेहरों को ही भींच ले रहा था। जिसका अंदाजा ऊपर को चेहरा न उठा पाने की स्थितियों में फंसे घ्ाोड़ों का उस वक्त होता जब बहुत बेतुके ढंग से कोई एक हाथ उनके एक ओर के थोपड़े पर पड़ता। खुद को संभालने की कोशिश में लम्पटों के नाक, मुंह और गालों पर कितने ही चींगोडाें के निशान लोन ऑफिसर ने बना दिये थे लेकिन अभी तक किसी ने भी इस बात का बुरा नहीं माना था। आगे भी उनमें से कोई बुरा मानने की स्थिति में नहीं था। वे खुश थे और खुशी के उन पलों को हमेशा खून-खराबे में रहने वाली स्थितियों के साथ नहीं जीना चाहते थे। हर स्थिति के प्रति पूरी तरह सचेत थे और जानते थे कि बोस के मेहमान की हर ज्यादियों के बाद भी यदि वे उसे खुश रखने में सफल हो पाये तो करीब से करीब जाने का रास्ता तैयार होता रह सकता है। किसी भी तरह की गुस्ताखी पर चूतड़ों पर पड़ने वाली ज्ञानेश्वर की पहली किक के बाद अनंत किकों की स्थितियों से कोई भी अनभिज्ञ न था। दिमाग के संतुलन को नापने का पैमाना होता तो नशे के बावजूद लोन अधिकारी के चेहरे की मंद-मंद मुस्कराहटों को व्यक्त करना आसान हो जाता कि उन मासूम मुस्कराहटों की कितनी ही बिजलियां जो अभी तक मचलती हुई उसके चेहरे पर फिसल गयीं उनका धनत्व कितना रहा होगा। प्रदीप मण्डल और जमीन मालिक भी उसकी रोशनी में नहा गये थे। जमीन की कीमत की रकम का चैक, जिसे जमीन मालिक अगले दिन अपने खाते में जमा करने वाला था, ज्ञानेश्वर ने उसे साथ लेते आने की हिदायत उसी वक्त दे दी थी ज बवह उसे पकड़ाया जा रहा था। इस वक्त जमीन मालिक को वही चैक अपनी गंजी की अंदरूनी जेब से बाहर निकालने का इशारा ज्ञानेश्वर ने इतने चुपके से किया कि जमीन-मालिक के अलावा किसी को नहीं दिखा। ऑरकेस्ट्रा की धुन पर बहुत धूम धड़ाका कर रहे गायक के हाथ का माइक, ज्ञानेश्वर ने अपने हाथ में ले लिया था।

''हां तो हाजरिन आज की इस रंगीन शाम हम आप सबके साथ हमारे आज के अजीज मेहमान श्रीमान गोगा साहाब का हृदय से आभार करते हैं। हमारे इस गरीब तबेले पर पहुंच कर उन्होंने हमारा मान बढ़ाया है। श्रीमान गोगा की तारीफ में ज्यादा कुछ न कहते हुए सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि दुखियारों के दुख के संकटों के निवारण में वे हमेशा बढ़-चढ़ कर आगे रहे हैं और अपनी कलम की नोंक पर बैठी उस चिड़िया को बेझिझक उन कागजों में बैठाने में भी उन्होंने कभी गुरेज न किया जिनके मायने एक जरूरतमंद का सहारा बन जाते है। उनके कलम की नोंक की चिड़िया की उड़ान पर ही हमारे सबसे प्रिय मित्र, बड़े भाई प्रदीप मण्डल ने जो ताकत हासिल की है वह किसी से छुपी नहीं है। आज का यह जलसा गोगा साहाब के हाथों भाई प्रदीप मण्डल को नवाजा जाने वाला यादगार दिन बन कर हमारे सामने है। मैं गोगा साहाब से अनुरोध करता हूं अपने पावन कर कमलों से दादा प्रदीप मण्डल को अपने हाथों वह चैक अदा करें जिसमें लाखों के वारे न्यारे करने की ताकत है। बारह लााख रूपये का तौहफा जरूरतमंद का सहारा बने।"

सभी का ध्यान ज्ञानेश्वर की ओर था। मानो उसे सुनने के लिए ही इक्टठा हुए हों। कुछ क्षणों के लिए माहौल का खिलंदड़पन जाने कहां गायब हो गया था। इधर-उधर की कह लेने के बाद जमीन-मालिक से अपनी कस्टडी में कर लिये गये चैक को बाहर निकाल कर उसने ऐसे लहराया कि मानो अभी उसे हवा में उड़ा देना चाहता हो। लोन अधिकारी गोगा साहब के हाथों प्रदीप मण्डल को सौंपे गये चैक का दृश्य वह फिर से जीवन्त कर देना चाहता था। उसकी कोशिश थी कि वास्तविक घटनाक्रम से जुड़ी ऐसी ही गतिविधियों की नकल के जरिये ही वह पार्टी को एक अनोखा रंग दे सकता है। उसके मौलिक अंदाजों ने हर एक को उत्साह से भर दिया था। हर कोई अपने को उन घट चुकी घटनाओं का जीवन्त हिस्सा महसूस कर रहा था। प्रदीप मण्डल के चेहरे पर तो पहली बार हाथ में आ रहे चैक की सी खुशी झलक रही थी। गोगा साहब भी डोलते हुए ऐसे खड़े हो रहे थे मानो चैक को किसी दूसरे के हाथों में सौंपनस ही नहीं चाहते हों। लेकिन मजबूर करता बैंक कर्मचारीपन लोन प्राप्त करता के सामने असहाय हो जा रहा हो। ज्ञानेश्वर ने हाथ आगे बढ़ा कर चैक उनका सौंपना चाहा तो नशे की लड़खड़ाहाट में गोगा साहब चैक पकड़ने से सूत भर फिसल गये और संभलने की कोशिश में डगमगाने लगे। गिरने-गिरने को थे। लेकिन ज्ञानेश्वर ने तेजी से लपक कर संभाल लिया। गोगा साहब की पेंट की जिप खुली हुई थी। नाच-गाना रूका हुआ था। किनारे खड़ी डांसिंग गर्ल्स के साथ-साथ सामने बैठे ज्ञानेश्वर के घेरे के हर लम्पटों तक की निगाह खुला हुआ लेटर बाक्स अटक रहा था। जोरदार हंसी का फव्वारा छूट गया। किसी लम्पट की फब्तियां हंसी का तूफान उठा देने वाली थी,

''अरे गोगा साहाब लोकर खुला पड़ा है उसे बंद कर लो वरना खुले लोकर पर धावा बोलने वालों की कमी नहीं यहां।"

हो हो हो की आवाज में कितने ही स्वर थे। लम्पटों की निगाहें सामने खड़ी डांसिग गर्ल्स को ताकती हुई थीं। बहुत तेज आवाज में दूसरी ओर से कोई कह रहा था,

''किस्तों की रकम वाले लॉकर का ग्राहक कोई नहीं यहां गोगा साहेब, बंद कर लो इसका ढक्कन।''

''गोगा साहब यदि उंगलिया कांप रही हों तो कहिय---बंद करने को बहुत सी मुलायम-मुलायम उंगलियों का इंतजाम किया है हमारे बोस ने।"

हंसी थी कि थम ही नहीं रही थी। बहुत तीखे नैन नक्श और बेहद तंग चोली वाली डांसिंग गर्ल की आंखों में बहुत खिलखिलाहट थी। अपनी उपस्थिति को उसकी आंखों में देखने को उत्सुक हर कोई, बहुत बढ़-चढ़ कर फब्तियां कसने लगा। डांसिग गर्ल का ध्यान सिर्फ ज्ञानेश्वर की ओर था। ज्ञानेश्वर से निगाहें मिलते ही उसने अपने बदन को कुछ इस तरह हिलाया था, घास में लोट लोट कर थकान मिटाती घोड़ी जैसे बीच-बीच में बदन को झटकती है, और नजरों को मटकाते हुए जाने ऐसा क्या कहा कि हंसी की बहुत तेज फुलझड़ियां भी मंद मुस्काराहटों में बदल गयी। पुकारे गये अपने नाम सुन कर प्रदीप मण्डल चैक लेने के लिए कुछ ऐसे खड़ा हुआ था मानो किसी महत्वपूर्ण पारितोषिक समारोह में हो। बहुत ही विनम्र होकर चैक को दोनों हथेलियों के बीच थामते हुए वह गोगा साहब से हाथ मिला रहा था। कुछ देर को खामोश हो गया ऑरकेस्ट्रा ड्रम गिटार और दूसरे वाद्य यंत्रों के स्वर हॉल को झन-झनाने लगा था। डांसिग गर्ल्स की करतल ध्वनियों पर चिल्लाहटों के तेज स्वर में लम्पटों के हाथ भी स्वत: तालियां की गूंज बन गये। सम्मान की रस्म अदायगी का यह पहला पड़ाव था। माइक पर ज्ञानेश्वर की आवाज फिर उभर रही थी।

''दोस्तों दादा प्रदीप मण्डल जैसे शख्स की महानता का बखान शब्दों में नहीं किया जा सकता। हमारे इस बेहद पिछड़े इलाके के बीच प्रदीप मण्डल सरीखे अपने मित्रों के दम पर ही हमने इलाके की तस्वीर संवारने की जिम्मेदारी ली है। यह जिम्मेदारी स्वैछिक है। किसी सरकारी एजेन्सी ने नहीं सौंपा है कि तन्ख्वाह के खतिर हमें इसके लिए खटना हो। गैर सरकारी संस्थाओं का विकास के नाम पर गांट हथियाऊ मामला भी हमारा नहीं। हम तो सचमुच में जन विकास की चिन्ताओं के साथ अपने नागरिक कर्तव्य को निभाना चाहते हैं। वरना आप ही बताइये--- ऐसी बंजर भूमि जो कि वर्षों से पूर्वज की जायदाद कह कर संभालने वालों के लिए ही जब एक दम निरर्थक साबित हो रही हो तो अपने जीवन की आज तक की गाढ़ी कमाई को यहां फूक देने वालों को क्या दे देने वाली है। इस पर भी दादा प्रदीप मण्डल ने हमारे आग्रह को स्वीकारा और हमारे बुजर्ग, नवाब सैनी साहब, जिनके जीवन का मामला इस बंजर भूखण्ड की चौकीदारी से तो चलने वाला था नहीं, उसके एक छोटे से हिस्से के बदले अच्छी खासी रकम से उन्हें नवाजने का फैसला लिया, हम उनके शुक्रगुजार हैं। मैं दादा से अनुरोध करता हूं कि अब वे अपने हाथों ही उस चैक को नवाब काका को सौंपने का कष्ट करें जो हमारे गोगा साहब ने बैंक के बिहाफ से उन्हें अभी कुछ क्षण पहले सौंपा है, ताकि इस दुर्लभ दिन का बखान करने का अवसर हमें मिल सके और इलाके के दूसरे जरूरत मंद भी बिना हिचकिचाये हमारे इस पुनीत कार्य में शामिल हो सके और इलाके को संवारने में बढ़-चढ़ कर आगे आ सके हैं। हम हमारे बड़े भाई, दोस्त और ऐसे सामाजिक कार्य के लिए हमेशा हमारे साथ खड़े रहने वाले बैंक के लोन अधिकारी गोगा साहब के भी आभारी हैं, जिनके सहयोग से ही प्रदीप मण्डल सरीखे हमारे दोस्त उस ताकत को हांसिल कर पाता है जिसमें वे अपने सामाजिक जिम्मेदारी को तत्काल निभा सकने की एक मुश्त ताकत हांसिल कर पाते हैं। दोस्तों हमें विश्वास है कि बंजर पड़ी सारी जमीनों को हम प्रदीप सरीखे अपने दोस्तों की मद्द से गांव के विकास के रास्ते खोलने के अवसर उपलब्ध करा सकेगें। यह आंकड़ों में सुना जा रहा एफडीआई नहीं बल्कि सीधे निवेशित होती पूंजी से गांव भर के लोगों के जीवन को रोशन करने वाला होगा। इस तरह से मिलने वाली रकम का एक बड़ा हिस्सा उन सभी आधारभूत जरूरतों पर खर्च करने के दूसरे आकर्षक प्रोग्राम भी हम गांव वालों की सुविधा के लिए बनवाना चाहते हैं जिससे हमेशा के अपने वंचित जीवन में वे भी खुशीयों की आधुनिकता लाने में सक्षम हों और आधुनिक उपभोग का वह सारा बाजार बिना हो हल्ले के उनके घरों के भीतर, कीचन के भीतर उनकी सेवा में हर वक्त मौजूद रह सके। गांव भर स्त्रियां बेवजह के कामों में जो अपने जीवन के कीमती समय को बेइंतिहा नष्ट करने को मजबूर हैं, एक हद तक छुटकारा पा सके और बचे हुए समय में दुनिया जहान की खबरें देते कार्यक्रमों का लुत्फ ही नहीं बल्कि कुछ हंसोड़ किस्म के दूसरे कार्यक्रमों को देखने का समय भी उन्हें हांसिल हो सके। "

चैक अदायगी की रस्म ने फिर से हो-हल्ले की संरचना कर दी। प्रदीप मण्डल खुश था कि जमीन खरीदने का उसका उपक्रम मात्र बैंक से लिये जाने वाले लोन का मामला भर नहीं बल्कि एक सामाजिक कर्म भी है। नवाब सैनी ही नहीं ज्ञानेश्वर के घेरे में बोक्सा जनजाति के तमाम युवकों के भीतर प्रदीप मण्डल के लिए गहरा सम्मान उपज रहा था। ज्ञानेश्वर का एक ही तीर कई-कई लक्ष्यों को बेध रहा था।

Monday, July 28, 2014

ऑल द बेस्ट मॉ

हिन्दी कविता में पहाड़ के दर्द को दर्ज करने वाले कवियों के बीच रेखा चमोली की रचनाओं में पहाड़ की स्त्रियों के जीवन के अनेकों चित्र देखें जा सकते हैं। स्त्री विमर्श के व्यापक दायरे में उनके संकेत, बहुत सीमित लेकिन लगातार के सामाजिक बदलावों में अपने व्यवहार को बदलते पुरूष के प्रति स्त्री मन की स्वीकरोकित के साथ हैं। सीधे वार करने की बजाय दोस्ताना असहमतियों में अपने साथी पुरूष को उन सामंती प्रवृत्तियों से मुक्त होने का अवसर देते हुए, जो हजारों सालों की परम्परा में पुरूष प्रकृति में ऐसे समाया हुआ होता है कि प्रगतिशील होने की चाह रखता कोई भी पुरूष कभी भी जिसकी जद में देखा जा सकता है। पुरूष मन के भीतर जाकर लिखी गयी कविता ताना-बाना अपने ऐसे कथ्य के कारण महत्वपूर्ण हो जाती है। प्रस्तुत है रेखा की नयी कविताऐं।
 यूं अभिव्यक्ति का कच्चापन रेखा की कविताओं को किसी खास वैचारिक दायरे की बजाय मासूमियत भरा है। विमर्श की प्रकिया में रचनात्मक कमजोरी के इस बिन्दु से रेखा को लगातार टकराना चाहिए ताकि विचार की परिपक्वता में कविताओं के दायरे विस्तार पायें।
वि.गौ.

ताना-बाना                            


किसी जुलाहे के ताने-बाने से कम नहीं
उसके तानों का जाल
जिसमें न जाने कैसी-कैसी
मासूम चाहतें
पाली हैं उसने  
कभी एक फूल के लिए महकती
तो कभी
धुर  घुमक्कड बनने को मचलती
रोकना-टोकना सब बेकार
ऐसा नहीं कि
मेरा मन नहीं पढ़ पाती
बनती जान बूझकर अनजान
कभी नींद में भी सुलझाना चाहूॅं
उसके तानो का जाल तो
खींचते ही एक धागा
बाकि सब बजने लगते सितार से
हो जाती सुबह
धागा हाथ में लिए
उसके कई तानों का
मुझसे कोई सरोकार नहीं
जानकर भी
मन भर-भर तानें देती
तानेबाज कहीं की

उसके तानों के पीछे छिपी बेबसी
निरूत्तर कर देती
तो कोई शरारत भरा ताना
महका जाता तन-मन
जब कभी
मस्त पहाड़न मिर्ची सा तीखा छोंका पड़ता
उस दिन की तो कुछ ना पूछिए
और जब
कई दिनों तक
नहीं देती वो कोई ताना
डर जाता हूॅ
कहीं मेरे उसके बीच बने ताने-बाने का
कोई धागा ढीला तो नहीं हो गया।                  


नींद


एक सुकून भरी नींद चाहिए
जिसमें ना हो
कोई सपना
प्रश्न
द्धन्द
चीख
खून
ऑसू
दुख
बीमारी
जन्म-मृत्यु
यहॉ तक कि
हॅसी-खुशी
यादें
भविष्य के लिए योजनाऍ
भी ना हों
बस एक शांत नींद चाहिए।



चाहना


चाहना कि
प्रेम के बदले मिले प्रेम
स्नेह के बदले सम्मान
मीठे बोलों के बदले आत्मीयता
तार्किक बातों के बदले वैचारिक चर्चाऍ
मिट जाएं समस्याऍ
सॅवर जॉए काम
आसान नहीं
बदलाव के लिए
और भी बहुत कुछ करना होता है
चाहने के साथ।


कसूर


कपडे-मेकअप
चाल-ढाल
खान-पान
रहन-सहन
उठना-बैठना
शक्ल-सूरत
रंग-ढंग
सब हमारा दोष
तुम तो बस
अपनी कुंठाओं से परेशान
उसे यहॉ-वहॉ उतारने को आतुर
तुम्हारा क्या कसूर ?


ऑल द बेस्ट मॉ


घर -गृहस्थी, नौकरी
पचासों तरह की हबड-तबड के बीच
मॉ को कहॉ समय
देख पढ ले किताबें
मॉ के काम
मानों दन्त कथा के अमर फूल
जितने झरते उससे कई गुना खिलते
पलक झपकाने भर आराम के बीच
किताबें तकिया बन जाती
बुद्ध न बन पाने की सीमाओं के बाबजूद
मैत्रेयी और गार्गी बची रह गयीं
मन के किसी कोने में
इसीलिए
मनचाहा विषय ना मिलने पर भी
मॉ नहीं घबरायी
अब तक मनचाहा मिला ही कितना था ?
तो , मुझे अच्छा लगेगा कहकर
मॉ ने जता दिया
इसबार कोई उसे रोक नहीं पाएगा
आज मॉ निकली है
बेहद हडबडी में
परीक्षा देने
वैसे ही जैसे
रोजमर्रा के अनगिनत मोर्चों पर निकल पडती है
अकेली ही
ऑल द बेस्ट मॉ।


ड्राइवर


मत चलाओ
इतनी तेज गाड़ी
ये पहाड़ी रास्ते
गहरी घाटियों में बहती तेज नदी
जंगल जले हुए
लुढ़क सकता कोई पत्थर
जला पेड़
मोड़ पर अचानक

तेज बरसात से
बारूदी बिस्फोटों से
चोटिल हैं पहाड़
संभल कर चलो
गाड-गदने अपना
पूरा दम खम दिखा रहे

ड्राइवर
मत बिठाओ
इतनी सवारी
शराब पीकर गाड़ी मत चलाओ
फोन पर बात फिर कर लेना

कुछ दिन पहले
देखा तुम्हें
कॉलेज आते-जाते
कहाँ सीखी ये हवा से बातें करना?

ऐसा भी क्या रोमांच?
जो गैरजिम्मेदार बना दे

मेरे घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं
तुम्हारे घर में कौन-कौन हैं?







रेखा चमोली
जोशियाडा
 उत्तरकाशी ,उत्त्ाराखण्ड
मो 9411576387




Friday, July 18, 2014

स्कूली शिक्षा का प्रोजक्टीय रूप

समाज शास्त्री एवं स्कूली शिक्षा जैसे विषयों से लगातार टकराने वाले रचनाकार प्रेमपाल शर्मा जी का यह महत्वपूर्ण आलेख जनसत्ता से साभार प्रस्तुत है. आलेख आज के जनसत्ता में "दुनिया मेरे आगे" स्तम्भ में प्रकाशित हुआ है. आलेख दिल्ली के पब्लिक स्कूलों में जारी स्थितियों से मुखातिब है पर देख सकते हैं कि देश के दूसरे क्षेत्रों में भी स्थितियां कमोबेश इससे अलग नहीं. स्कूली शिक्षा का यह ’प्रोजक्टीय’ रूप हर ओर व्याप्त है.

स्कूल में धंधा

प्रेमपाल शर्मा
prempalsharma@yahoo.co.in

दिल्ली की संभ्रांत कॉलोनियों के बीच स्थित किताब, स्टेशनरी की दुकान। जब से यहां निजी स्कूल बढ़े हैं, उससे कई गुना ज्यादा ऐसी दुकानें बढ़ी हैं, जहां बच्चों के होमवर्क, मॉडल, अंग्रेजी की किताबें आसानी से मिल सकती हैं। स्कूल खुलने से पहले होमवर्क पूरा न होने का तनाव। दुकान के बाहर मां-बाप और उनकी अंगुली पकड़े बच्चों की कतार है। एक महिला पूछती है- ‘आपके पास सुपर विलेन का चार्ट होगा!’ व्यस्त दिख रहा दुकान का मालिक सोचने का अभिनय करता है- ‘सुपर विलेन नहीं, विलेन का चार्ट है।’ बच्चे और उसकी मां को नहीं मंजूर, क्योंकि स्कूल के होमवर्क में ‘सुपर विलेन’ लिखा है। वह दुकानदार क्या जो अपने ग्राहक को वापस जाने दे! उसने शाम को आने को कहा कि कंप्यूटर से निकलवा देंगे। कल आकर ले जाना। जाहिर है, कल मुंहमांगे पैसे देकर ‘सुपर विलेन’ का चार्ट मिल जाएगा, उस बच्चे के लिए, जिसकी उम्र मुश्किल से पांच वर्ष होगी। दूसरे बच्चे के साथ माता-पिता दोनों हैं। ‘स्नो मैन बनाना है। उसका सामान दे दीजिए।’ दुकानदार को पता है। वह थर्माकोल, तार, कॉटन, फेवीकॉल, बटन आदि निकाल कर दर्जन भर चीजें रखता जाता है। घर पर बनाने का काम मां-बाप का। अगला होमवर्क है गैस का ग्लोब गुब्बारा बनाना। दुकानदार समझाता है कि हम बना-बनाया दे देंगे। पैसे की सौदेबाजी हुई। मामला तय हो गया। चलते-चलते अभिभावक ने इतना वादा लिया कि कल सुबह ही चाहिए, क्योंकि परसों स्कूल खुल जाएगा। दिल्ली जैसे महानगरों के हजारों निजी स्कूलों और उसमें पढ़ने वाले लाखों बच्चे। सबको उनके निजी स्कूलों में ऐसे ही विचित्र ‘प्रोजेक्ट’ दिए जाते हैं। अंग्रेजी की कुछ किताबें रटने के साथ-साथ। मैंने हिम्मत करके पूछा तो पता लगा कि लगभग पंद्रह सौ रुपए तो खर्च हो ही जाएंगे तीसरी क्लास की बच्ची के ‘प्रोजेक्ट’ पर। मैंने कहा- ‘आप मना क्यों नहीं करते कि इससे बच्चों की पढ़ाई का क्या लेना-देना है? विलेन, स्नो मैन के मॉडल दूसरी-तीसरी का बच्चा कैसे बनाएगा और क्यों? स्कूल का नाम क्या है?’ अचानक उस बच्चे की मां चुप हो गई। मानो स्कूल का नाम बताने से कहीं स्कूल से ही न निकाल दिया जाए। मैंने फिर ललकारा कि आप स्कूल के शिक्षक को समझाओ तो सही कि ये मां-बाप का होमवर्क है या बच्चों का! अब उन्होंने चुप्पी तोड़ी- ‘हमारे अकेले के कहने से क्या होता है।’ और वे वहां से निकल गए। यह है आजादी के साढ़े छह दशक बाद के लोकतंत्र में दिल्ली में शिक्षा की स्थिति। यह उस मध्यवर्गीय कायरता का भी बयान है जिसकी सही मुद्दों पर बोलने पर भी घिग्गी बंधी हुई है। आप पाएंगे कि नब्बे फीसद इस किस्म के होमवर्क में जीवन की समझ का एक भी होमवर्क नहीं है। इससे कई गुना अच्छा तो ग्रामीण वातावरण में पढ़े बच्चे होते हैं, जिन्हें फसल, खेती आदि के सभी काम अपने आप आ जाते हैं। शुरुआत होती थी कई बार भैंस या गाय के गले में सांकल डालने और खूंटे से रस्सी में अंटा बांधने से। जरूरी नहीं कि शहर के बच्चों को यही काम सिखाए जाएं, लेकिन खाना पकाना, सफाई या रोजाना की शहरी जिंदगी के वातावरण से जुड़ी वह शिक्षा तो दी ही जा सकती है जो पश्चिमी शिक्षा पद्धति में भी शामिल है। कम से कम वे ‘स्नो मैन’ या ‘सुपर विलेन’ जैसे वाहियात काम पर पैसे और समय की बर्बादी से तो बचेंगे। महात्मा गांधी के प्रसिद्ध निबंध ‘छात्र और छुट्टियां’ को इन स्कूलों में फिर से पढ़ाने की जरूरत है। गांधीजी ने यह भाषण इलाहाबाद विश्वविद्यालय में 1920 के आसपास दिया था। उन्होंने विद्यार्थियों को सलाह दी कि छुट्टियों के दिनों में वे किताबी दुनिया से दूर रहें और देश के नए-नए क्षेत्रों और स्थानों को देखें, सफाई शिक्षा के सामाजिक कार्यों से अपने को जोड़ें। छुट्टियां होती ही इसीलिए हैं कि आपका अनुभव संसार बढ़े। पढ़ने के लिए तो पूरा वर्ष होता ही है। इस पैमाने से कम से कम देश के ग्रामीण क्षेत्र के स्कूल तो बेहतर ही कहे जा सकते हैं। अफसोस यह है कि आदिवासी या पिछड़े क्षेत्रों के इन बच्चों का ज्ञान और अनुभव कई गुना बेहतर होने के बावजूद देश की किसी परीक्षा में नहीं पूछा जाता। परीक्षा में पूछा जाता है निजी अंग्रेजीदां स्कूलों का बनावटी ज्ञान और रटंत। इसी के बूते वे बड़े पद पाने के योग्य समझे जाते हैं। संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में पिछले दो-तीन वर्ष में किए गए बदलाव इसीलिए ग्रामीण पृष्ठभूमि के बच्चों के खिलाफ जा रहे हैं। लेकिन इसे बदला जाए तो कैसे? न बच्चे के अभिभावक स्कूल के खिलाफ मुंह खोलने को तैयार और न मेरे शहर के बड़े लेखक, बुद्धिजीवी, पत्रकार। इसमें पिस रहे हैं तो वे मासूम बच्चे और उनके मां-बाप, जिन्हें इन ‘प्रोजेक्ट’ का न मतलब पता, न उद्देश्य। सरकार को तुरंत ‘प्रोजेक्ट’ के इस धंधे पर रोक लगाना चाहिए।

Sunday, July 13, 2014

पसंद से ज्यादा नापसंद का इज़हार

                                      ---  यादवेन्द्र 
सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ति वाला गोपाल सुब्रहमण्यम मामला अभी ठण्डा भी नहीं हुआ था कि वर्तमान शासन की सोच से मेल न खाती एक फ़िल्म के प्रति नापसंदगी को ज़ाहिर करता अधैर्य सामने आ गया।  
एक छोटी सी लगभग अचर्चित ख़बर यह है कि 2013 के 61 वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों से सम्मानित फ़िल्मों के जून के अंतिम दिनों में संपन्न दिल्ली समारोह की पूर्व घोषित प्रारंभिक फ़िल्म हंसल मेहता की शाहिद थी पर बदले हुए राजनैतिक परिदृश्य में बगैर कोई तार्किक कारण बताये इसके स्थान पर मराठी की सुमित्रा भावे निर्देशित अस्तु दिखला दी गयी। सभी राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त फ़िल्मों को दिखलाना ही था सो शाहिद  को अगले दिन प्रदर्शित किया गया।इस बदलाव से पूर्ववर्ती कार्यक्रम के लिए स्वयं उपस्थित रहने की अपनी औपचारिक सहमति दे चुके हंसल मेहता ने न सिर्फ़ दुखी और अपमानित महसूस किया बल्कि उन्हें इसमें राजनैतिक रस्साकशी की बू भी आयी। 
  
ध्यान रहे कि 61 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों की जूरी के अध्यक्ष अलबर्ट पिंटो को गुस्सा क्यों आता है और नसीम जैसी अविस्मरणीय फ़िल्में बनाने वाले सईद अख़्तर मिर्ज़ा थे और एम एस सथ्यु ( गर्म हवा जैसी मील का पत्थर फ़िल्म के निर्देशक )और उत्पलेंदु चक्रवर्ती( सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार पाने वाली बांग्ला फ़िल्म चोख के निर्देशक ) समिति के सदस्य थे --इसी जुड़ी ने शाहिद को श्रेष्ठ निर्देशन और अभिनय  के लिए पुरस्कृत किया गया तो अस्तु को श्रेष्ठ संवादों और सहायक अभिनेत्री के लिए इनाम दिया गया। यहाँ तक तो हिसाब किताब बराबर पर सृजनात्मक कृतियों को तुलनात्मक तौर पर वैसे बिलकुल नहीं तोला जा सकता है जैसे तराजू पर कोई सामान रख कर डंडियों का झुकाव देख लिया जाता है -- ज़ाहिर है अपने अपने तरीके और दृष्टिकोण से शाहिद और अस्तु नाम से दो अलहदा फ़िल्में बनायीं गयी हैं और उनको डंडी वाले तराजू पर सामान की माफ़िक तोला नहीं जा सकता। पहली फ़िल्म मानवाधिकारों की रक्षा और निर्दोष गरीबों को इन्साफ़ दिलाने के लिए अपनी जान तक जोखिम में डाल देने वाले वकील शाहिद काज़मी के जीवन की वास्तविक घटनाओं पर आधारित बायोपिक फ़िल्म है जबकि दूसरी फ़िल्म डिमेंशिया से ग्रसित एक वृद्ध संस्कृत विद्वान और पिता की चिंता में दिन रात एक किये हुए उनकी बेटी के आपसी रिश्तों की बारीक और आम तौर पर ओझल रहने वाली परतों की मार्मिक कथा है जिसमें बेटी कभी बेटी तो कभी माँ की भूमिका में नज़र आती है। इन दोनों की तुलना कैसे की जा सकती है ?

आहत हंसल मेहता जब यह कहते हैं कि किन्हीं कारणों से यदि मेरी फ़िल्म को प्रारम्भिक फ़िल्म के गौरव से वंचित करना ही था तो उसकी जगह आनंद गांधी की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार जीत चुकी शिप ऑफ़ थीसियस का प्रदर्शन किया जा सकता था …  हाँलाकि वह अगली साँस में ही बतौर एक फ़िल्म अस्तु की प्रशंसा करना भी नहीं भूलते।बेशक किसी भी कलाकार का अपनी कृति के साथ गहरा भावनात्मक लगाव और आग्रह जुड़ा होता है पर उसके स्थानापन्न के चुनाव में "अ" बनाम "ब" का मापदण्ड अपनाना उचित और नैतिक नहीं होगा। 

पर हंसल मेहता ने इस घटना के सन्दर्भ में जिन प्रश्नों को उठाया है उनसे मुँह मोड़ना चिंगारी देख कर भी धुँए से इंकार करने सरीखा होगा। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि फिल्म के प्रदर्शन में बदलाव के कारण सिनेमा से परे हैं -- उन्होंने अनौपचारिक तौर पर बतलाये गए कारणों (शाहिद की  विषयवस्तु  के कारण कम दर्शकों की उपस्थिति की आशंका और अस्तु के कास्ट और क्रू का समारोह स्थल पर उपस्थिति होना ) को सिरे से नकार दिया। पर उनको समारोह के पहले दिन 29 जून को फ़िल्म के साथ आमंत्रित करने की तारिख ( 15 मई ) पर गौर करें तो सबकुछ शीशे की तरह एकदम साफ़ हो जाता है --- अगले दिन देश का राजनैतिक नक्शा पूरी तरह से बदल जाता है। ऐसे में सम्बंधित अफ़सरान की निष्ठा इधर से उधर हो जाये तो इसमें अचरज कैसा ?
हंसल इस बर्ताव से गहरे तौर पर आहत हुए हैं और कहते हैं कि शाहिद को पुरस्कार मिलने पर कई लोगों ने इसकी सृजनात्मक श्रेष्ठता को नहीं बल्कि एक समुदाय विशेष का पृष्ठपोषण करने को रेखांकित किया … पर यह फिल्म भारतीय समाज में बड़े पैमाने पर व्याप्त गैर बराबरी चाहे वह किसी भी जाति या सम्प्रदाय की हो के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है।गहरी पीड़ा के साथ वे आगे कहते हैं कि वे पिछली सरकार की आडम्बरपूर्ण तुष्टिकरण की नीतियों का विरोध करते थे और शाहिद इन्हीं विचारों का प्रखर दस्तावेज़ है।वैसे ही वे बदले हुए माहौल में देश के ऊपर मँडरा रही अराजक बहुसंख्यावादी शक्तियों का भी अपनी कला के माध्यम से भरसक विरोध करेंगे। उन्होंने आयोजनकर्ताओं को सिनेमा को सिनेमा रहने देने की नसीहत दी और आग्रह किया कि वे अपने राजनैतिक बाध्यताएँ सिनेमा के ऊपर न थोपें।

अच्छे दिनों की यह गला घोंटने वाली कैसी आहट है ? 

Saturday, July 12, 2014

शंका समाधान

झूठ की खुल जाए पोल


कितने टंगे हैं कपड़े इन बहुमंजिला इमारतों में
कितनों से चू रहा है पानी
कितने सूखने-सूखने को हैं
लाल रंग के कितने
कितने रंग छोड़ते हुए हो गए धूसर
अच्छा बताओ
सफेद रंग जो दूर तक दिख रहा,
हर बैलकनी में खिंची तार पर टंगा
क्या वह सिर्फ दीवारों का है
या दीवारों पर भी डली हुई चादरों का,
गद्दे रजाईं के लिहाफों
या बच्चों की स्कूली ड्रेस का

टंगे हुए कितने कपड़े हैं बच्चों ंके
बड़ों के हैं कितने
मर्दुमशुमारी करने वालों के लिए
यह कोई तथ्य नहीं

सूख रहे बुर्को को भी दर्ज कर लो
साड़ियां घूंघट के साथ कितनी है
कितने के लहरा रहे पल्ले कंधों पर
बेशक न पता लगा पाओ पहनने वाले की उम्र,
पर दर्ज कर ही लो सूट-सलवार भी

सारे का सारा आंकड़ा करो इस तरह तैयार
कि उनकी मर्दुमशुमारी का आंकड़ा
हो जाए दुरस्त
जो पेज दर पेज भर दे रही
झूठे आंकड़ों को


(यह कविता मुझे पूरी तरह से मेरी मूल अभिव्यक्ति नहीं लग रही है। नहीं जानता किस कवि का प्रभाव मेरे भीतर रहा होगा उस वक्त जब यह लिखी गयी। यदि ऐसा नहीं है तो भी मैं तब तक इसे मूल रूप से अपनी कविता नहीं कह सकता जब तक कि दूसरे भी इसे न पढ़ लें और बता पायें कि किस कवि की संवेदनाओं के प्रभाव में यह लिखी गयी।
विजय गौड़)