Saturday, July 19, 2008

इस कुंआरी झील में झांको

(केलांग को मैं अजेय के नाम से जानने लगा हूं। रोहतांग दर्रे के पार केलांग लाहुल-स्पीति का हेड क्वार्टर है। अजेय लाहुली हैं। शुबनम गांव के। केलांग में रहते हैं। "पहल" में प्रकाशित उनकी कविताओं के मार्फत मैं उन्हें जान रहा था। जांसकर की यात्रा के दौरान केलांग हमारे पड़ाव पर था। कथाकार हरनोट जी से फोन पर केलांग के कवि का ठिकाना जानना चाहा। फोन नम्बर मिल गया। उसी दौरान अजेय को करीब से जानने का एक छोटा सा मौका मिला। गहन संवेदनाओं से भरा अजेय का कवि मन अपने समाज, संस्कृति और भाषा के सवाल पर हमारी जिज्ञासाओं को शान्त करता रहा। अजेय ने बताया, लाहौल में कई भाषा परिवारों की बोलियां बोली जाती हैं। एक घाटी की बोली दूसरी घाटी वाले नहीं जानते-समझते। इसलिए सामान्य सम्पर्क की भाषा हिन्दी ही है। भाषा विज्ञान में अपना दखल न मानते हुए भी अजेय यह भी मानते हैं कि हमारी बोली तिब्बती बोली की तरह बर्मी परिवार की बोली नहीं है, हालांकि ग्रियसेन ने उसे भी बर्मी परिवार में रखा है। साहित्य के संबंध में हुई बातचीत के दौरान अजेय की जुबान मे। शिरीष, शेखर पाठक, ज्ञान जी ज्ञान रंजन से लेकर कृत्य सम्पादिका रति सक्सेना जी का जिक्र करते रहे। एक ऐसी जगह पर, जो साल के लगभग 6 महीने शेष दुनिया से कटा रहता है, रहने वाले अजेय दुनिया से जुड़ने की अदम्य इच्छा के साथ हैं। उनसे मिलना अपने आप में कम रोमंचकारी अनुभव नहीं। उनकी कविताओं में एक खास तरह की स्थानिकता पहाड़ के भूगोल के रुप में दिखायी देती है। जिससे समकालीन हिन्दी कविता में छा रही एकरसता तो टूटती ही है। कविताओं के साथ मैंने अजेय जी एक फ़ोटो भी मांगा था उनका पर नेट के ठीक काम न करने की वजह से संलग्नक उनके लिये भेजना संभव न रहा. कविताऎं भेजते हुए अपनी कविताओं के बारे में उन्होंने जो कहा उसे पाठकों तक पहुंचा रहे हैं - u can publish my poems without photo and all. poems should reflect my inner image....thats more important , i suppose, than my external appearence.....isnt it ?---------- ajey)

अजेय 09418063644

चन्द्रताल पर फुल मून पार्टी

इस कुंआरी झील में झांको
अजय
किनारे किनारे कंकरों के साथ खनकती
तारों की रेज़गारी सुनो

लहरों पर तैरता आ रहा
किश्तों में चांद
छलकता थपोरियां बजाता
तलुओं और टखनों पर

पानी में घुल रही
सैंकडों अनाम खनिजों की तासीर
सैंकडों छिपी हुई वनस्पतियां
महक रही हवा में
महसूस करो
वह शीतल विरल वनैली छुअन------------

कहो
कह ही डालो
वह सब से कठिन कनकनी बात
पच्चीस हज़ार वॉट की धुन पर
दरकते पहाड़
चटकते पठार

रो लो
नाच लो
जी लो
आज तुम मालामाल हो
पहुंच जाएंगी यहां
कल को
वही सब बेहूदी पाबंदियां !

(जिमी हैंड्रिक्स और स्नोवा बार्नो के लिए)
चन्द्रताल,24-6-2006

भोजवन में पतझड़

मौसम में घुल गया है शीत
बैशरम ऎयार
छीन रहा वादियों की हरी चुनरी

लजाती ढलानें
हो रही संतरी
फिर पीली
और भूरी

मटमैला धूसर आकाश
नदी पारदर्शी
संकरी !

कॉंप कर सिहर उठी सहसा
कुछ आखिरी बदरंग पत्तियां
शाख से छूट उड़ी सकुचाती
खिड़की की कांच पर
चिपक गई एकाध !

दरवाजे की झिर्रियों से
सेंध मारता
बह आखिरी अक्तूबर का
बदमज़ा अहसास
ज़बरन लिपट गया मुझसे !

लेटी रहेगी अगले मौसम तक
एक लम्बी
सर्द
सफेद
मुर्दा
लिहाफ के नीचे
एक कुनकुनी उम्मीद
कि कोंपले फूटेंगी
और लौटेगी
भोजवन में ज़िन्दगी ।
नैनगार 18-10-2005

14 comments:

प्रभाकर पाण्डेय said...

कहो
कह ही डालो
वह सब से कठिन कनकनी बात
पच्चीस हज़ार वॉट की धुन पर
दरकते पहाड़
चटकते पठार।

सुंदरतम।

Mired Mirage said...

पहाड़ों की सुगन्ध लिए बहुत सुन्दर कविताएँ !
घुघूती बासूती

मुनीश ( munish ) said...

J A A R I RAHIYE MAHARAAJ . THANX A LOT . GREAT POST

दिलीप मंडल said...

इन शानदार रचनाओं को हम सब तक पहुंचाने के लिए धन्यवाद। लेकिन एक विनम्र संशोधन है।

लाहुल-स्पीति के मुख्यालय केलंग में दो अजय हैं। कवि अजय अपना नाम अजेय लिखते हैं। उनकी ही कविताएं यहां छपी हैं। जबकि अजय लाहुली पत्रकार हैं और कई महत्वपूर्ण अखबारों में रिपोर्टिंग कर चुके हैं। लिखते वो भी शानदार हैं। दोनों ही मेरे अच्छे मित्र हैं। अजेय जी का नंबर आपने छापा ही है। अजय लाहुली से आप 09418157538 पर संपर्क कर सकते हैं।

अजेय की कविताएं हम तक पहुंचाने के लिए एक बार फिर धन्यवाद। चंद्रताल वाली कविता को बारालाचा ला को समझने वाला कोई शख्स ही लिख सकता है।

दिलीप मंडल said...

माफी चाहूंगा। आपने कवि का परिचय सही दिया है। "अजेय लाहुली" पढ़कर भ्रम हुआ था।

परमजीत बाली said...

बहुत बेहतरीन रचनाएं प्रेषित की हैं।आभार।

Udan Tashtari said...

poems should reflect my inner image....
thats more important ,
i suppose, than my external appearence.....
isnt it ?----------

---ajey

यह भी एक कविता सी ही बात लग रही है, बहुत उम्दा लगी सभी रचनाअयं..बहुत आभार इस प्रस्तुति का.

अशोक पाण्डेय said...

पहाड़ों की अनुभूति हम तक पहुंचाने के लिए आभार। आपकी संवेदनशीलता और आपका लेखन दोनों काबिले तारीफ है।

अनुराग said...

इन सब को पढ़वाने के लिए बेहद शुक्रिया.......आपकी यात्रा दिलचस्प रही है.....

ajey said...

thanx to all.and esp vijay gaur. i'll feel high for a week at least.....ajey

anup said...

अजेय की कविताएं पहले शिरीश के यहां देखीं फिर यहां. मजा आ गया. तीन महीने पहले कुल्‍लू में कवि मुख से सुनी थीं. मुझे फक्र है कि बजेय मेरा दोस्‍त है. आपने उसे पहचाना और जगह दी, इसके लिए धन्‍यवाद.

Anonymous said...

dear Ajay thanx for a wonderful lines as i have been to chandertaal recently on 9th Aug 2008 and enjoyed a lot, but i think it is no more kuwari,it is being raped,....

any how once again thanx a lot

roshan thakur thorangpa

Anonymous said...

dear Ajay thanx for a wonderful lines as i have been to chandertaal recently on 9th Aug 2008 and enjoyed a lot, but i think it is no more kuwari,it is being raped,....

any how once again thanx a lot

roshan thakur thorangpa

Rangyul said...

Ajay ji,

Excellent to say the least. Couldn't stop till I read them all. I liked the "Dorje guide ki baatain' the most.
The happy blend of subtlety and vividness in your expression is wonderful.
Many thanks for sharing with the group. I am sure your thought provoking poems would open many doors to intellectual inquiry and locate avenues for practical actions in our valleys.
I would suggest you to post your poems also at the lahoul-spiti group at orkut (link below) where many of our youth socialize.
http://www.orkut.com/Main#Community.aspx?cmm=2382401
I am pretty sure that your poems would be very inspirational and and provide leads to reflective opportunities.

ak